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Monday, August 02, 2010

कुछ मर्दों की निगाह में लेखिकाएं 'छिनार’ हो गई हैं?

बैठक के लिए ये बातचीत प्रेमचंद सहजवाला ने की है...विभूतिनारायण राय के विवादस्पद बयान के बाद उन्होंने कुछ साहित्य से जुड़ी कुछ हस्तियों से इस विषय पर प्रतिक्रिया मांगी है...ये लेख उन्हीं प्रतिक्रियाओं का निचोड़ है साथ ही अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस का संपादकीय भी लगा रहे हैं जो इसी मुद्दे पर छपा है



‘लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने की कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है’ यह बयान है अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का जो उन्होंने ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा. उनकी इस बात पर साहित्य जगत में तो मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई ही है, पर मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को इस बात पर सर्वाधिक आक्रोश हुआ लगता है. कपिल सिब्बल ने तुरंत उस पत्रिका के अंक की मांग की जिसमें यह साक्षात्कार छपा है और कहा है कि यह सब अस्वीकार्य बात है. यह महिलाओं का अपमान है और विशेषकर लेखिका वर्ग का भी. कपिल सिब्बल ने कहा है कि इतने बड़े ओहदे पर बैठे किसी व्यक्ति की ओर से यह बयान उस व्यक्ति की मानसिक बुनावट की ओर संकेत करता है जो पूर्णतः उस ओहदे की गरिमा के विरुद्ध है’.

आज प्रातः के समाचार-पत्रों में यह खबर पढ़ कर मेरा मन भी स्वाभाविक रूप से विचलित हो गया और मैंने सब से पहले स्वयं विभूतिनारायण राय जी को फोन मिलाया. वे उस समय दिल्ली में थे और मैंने जब उन से इस विषय पर विचार जानने चाहे तो उन्होंने कहा कि उन्होंने दरअसल ‘बेवफाई’ शब्द का उपयोग किया है. मंत्री महोदय ने ‘छिनाल’ शब्द का अर्थ वेश्या लगाया है जो कि गलत है. उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ वे रहते हैं वहां तो यह शब्द पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है. परन्तु मुझे लगा कि इस विषय पर लेखक जगत से भी प्रतिक्रिया जानना ज़रूरी है क्यों कि उक्त बयान से तात्पर्य अगर ‘वेश्या’ से नहीं भी है और ‘बेवफाई’ से है तो भी क्या यह मान लिया जाए कि लेखिकाएं ‘छिनाल’ या ‘बेवफा’ होती हैं? इस विषय पर पहली और गुस्से भरी प्रतिक्रिया मुझे सुप्रसिद्ध कवयित्री पुष्पा राही की मिली जिन्होंने फोन पर बात सुनते ही कहा कि लेखिकाएं क्या करती हैं, इसे ले कर विभूति नारायण राय क्यों परेशान हैं? और फिर ‘बेवफाई’ का संबंध तो हमारे समाज में पुरुषों से अधिक है. फिर इतनी बड़ी कुर्सी पर बैठ कर क्या लेखिकाओं के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग अच्छा लगता है? पुष्पा जी खासी गुस्से में थी और बोली कि उन्हें तो अपने शब्दों के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. मेरे यह बताने पर कि विभूति नारायण राय ने कहा है कि इस शब्द का सर्वाधिक उपयोग तो प्रेमचंद ने किया है, पुष्पा जी ने कहा कि आप (विभूति नारायण राय) कोई प्रेमचंद तो नहीं हैं? वे पहले प्रेमचंद का साहित्य तो पढ़ें और समझें कि प्रेमचंद ने किस सन्दर्भ में इस शब्द का उपयोग किया है. लेकिन इस विषय पर जब मेरी बात कवयित्री अर्चना त्रिपाठी से हुई तब उन्होंने ज़ोर शोर से विभूति नारायण राय का पक्ष लेते हुए कहा कि रमणिका गुप्ता जैसी कुछ लेखिकाओं ने तो अपनी आत्मकथाओं में यह तक लिखा है कि उन्होंने अपने जीवन में कितने लड़कों को बिगाड़ा है, इस का कुछ हिसाब तक उनके पास नहीं है. रमणिका ने तो यह भी लिखा है कि मेरा जो बेटा है वह किसी कामरेड का बेटा है. उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि अपने उपन्यासों में वे नारी-पुरुष सम्भोग का इतना खुला वर्णन करती हैं कि जिस की कोई ज़रूरत तक नहीं. मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ पर भी उनकी वही प्रतिक्रिया है कि कुछ पन्नों में ‘काश मैं एक उरोज होती...’ जैसे अनुच्छेदों की ज़रूरत तक नहीं. अर्चना त्रिपाठी ने कहा कि जो कुछ विभूति नारायण राय ने कहा है वही बात डॉ. धर्मवीर अपनी पुस्तक ‘तीन द्विज हिंदू स्त्री-लिंगों का चिंतन’ में कह चुके हैं. इस पुस्तक में उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान व रमणिका गुप्ता के लेखन पर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि क्या लेखिकाएं सेक्स के खुले वर्णन के अलावा लिख ही नहीं सकती? और क्या एकनिष्ठ्त्ता व चरित्र की समाज में कोई महत्ता ही नहीं रह गई है?

प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी जी ने भी यह तो माना कहा कि जो कुछ विभूति नारायण राय ने कहा है उस में कुछ हद तक सच्चाई है, परन्तु विभूति नारायण राय जी को अपनी बात कहते समय भाषा की गरिमा का भी ख्याल रखना चाहिए था. परन्तु पुरुष साहित्यकारों में से अशोक चक्रधर जी ने फोन पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महिलाएं हमारे समाज का बेहद सम्मानजनक् हिस्सा हैं और इतनी ज़िम्मेदार कुर्सी पर बैठ कर ऐसी भाषा उपयोग करने के वे घोर विरोधी हैं.

इस विषय पर जबकि इतना बड़ा बवाल खड़ा होने पर गंगाप्रसाद विमल जी को सर्वाधिक आक्रोश है और उन्होंने कहा कि आज लेखक के लिए स्वतंत्रता से कुछ भी कहने का कोई ‘स्पेस’ नहीं बचा है. विभूति नारायण राय ने यह बात अश्लीलता के सन्दर्भ में कही है और इस पर इतना बड़ा विवाद खडा ही नहीं होना चाहिए था. उन्होंने ‘छिनाल’ शब्द का अनुवाद ‘वेश्या’ करने वाले पत्रकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ऐसे पत्रकार जिनमें अनुवाद करने तक की तमीज़ नहीं है, उन के मालिकों को चाहिए कि उन्हें नौकरी से निकाल बाहर करें. उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज जितना खुलापन लेखन में आया है वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण ही सम्भव हुआ है जबकि कुछ शक्तियां इस आज़ादी को हड़प लेना चाहती हैं.

सुपरिचित कवि कथाकार रामजी यादव लेकिन विभूति नारायण के प्रति ही बेहद आक्रोश रखते हैं. उनके अनुसार वे हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं और उस पद पर बैठ कर उनका यह वक्तव्य बेहद गैर-ज़िम्मेदाराना सा है जो यह साबित करता है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है. उन्होंने कहा कि विभूति नारायण राय को तुरंत अपने पद से निकाल देना चाहिए. रामजी यादव पूछते हैं कि जो लेखिकाएं स्वयं विभूति नारायण राय के निकट हैं उनके विषय में ऐसी बात उन्होंने क्यों नहीं कही. जैसे ममता कालिया जैसी दूसरे स्तर की लेखिका को विभूति नारायण राय मैत्रेयी पुष्पा जैसी बड़ी लेखिकाओं से भी बड़ी साबित करने में लगे हैं.

इस विषय पर कई अन्य साहित्यकारों विशेषकर लेखिकाओं से बात करने का मन था पर सब से संपर्क स्थापित नहीं हो सका. मेरी अन्तिम बातचीत इस सन्दर्भ में सुविख्यात कहानीकार उपन्यासकार मृदुला गर्ग से हुई जिनका उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ अपने समय का सर्वाधिक विवादस्पद उपन्यास रहा, हालांकि मैं व्यक्तिगत रूप से यही कहूँगा कि ‘चित्तकोबरा’ की मूल आत्मा उस कृति के उत्कृष्ट होने की ओर संकेत करती है. परन्तु विरोधियों की चेतना उस के कुछ पन्नों पर टिकी थी. मृदुला गर्ग जैनेन्द्र की साहित्यिक शिष्या हैं और जैनेन्द्र के उपन्यास ‘सुनीता’ पर भी जो बावेला खड़ा हुआ था उसे उनके परवर्ती साहित्यकारों ने व्यर्थ का विवाद माना और कहा कि नारी-पुरुष संबंधों का बेबाक व खुला वर्णन आपत्तिजनक है ही नहीं. परन्तु मृदुला गर्ग लेखक और लेखन के बीच बहुत सुलझे हुए तरीके से फर्क करती हुई बोली कि किसी के भी लेखन यथा ‘चित्तकोबरा’ पर अपने विचार लिखने का अधिकार सभी को है. परन्तु विभूति नारायण के सन्दर्भ में उनका कहना स्पष्ट है कि जो उन्होंने कहा है वह लेखिकाओं के बारे में कहा है, न कि लेखन के बारे में, जो गलत है. अपनी बात कहते हुए कि विभूतिनारायण राय को शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए. यह पूछे जाने पर कि क्या जैसा कपिल सिबल ने कहा है, विभूतिनारायण राय पर कार्रवाई होनी चाहिए, मृदुला जी ने कुछ कहने से इनकार कर दिया और कहा कि यह विषय तो स्वयं कपिल सिबल जी का है और वे इस विषय पर कुछ भी नहीं कहना चाहेंगी.

कुल मिला कर मेरे मन में यह जिज्ञासा हुई कि विभूति नारायण राय ने कोई बात किसी विशेष सन्दर्भ में कही, पर क्या उस से इतना बड़ा विवाद खड़ा होना उचित था? और कि क्या शब्दों का स्वतंत्र उपयोग कोई इतनी बड़ी बात हो सकती है कि एक मंत्री को चेतावनी देनी पड़े? इस पर मैं कोई अपना निष्कर्ष दूं, बेहतर कि यह लेख पढ़ने वाले स्वयं अपनी धारणा से अवगत कराएं.

प्रेमचंद सहजवाला

Saturday, March 27, 2010

इंडिया बनाम भारतवर्ष

~शंकर शरण

अंग्रेजी कहावत है, नाम में क्या रखा है! लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह कहने पर लोग आपकी ओर अजीब निगाहों से देखेंगे कि कैसा अहमक है! पिछले कुछ महीनों से वहां के कुछ बड़े शहरों, प्रांतों के नाम बदलने को लेकर देशव्यापी विवाद चल रहा है। प्रीटोरिया, पॉटचेफ्स्ट्रोम, पीटर्सबर्ग, पीट रेटिफ आदि शहरों, प्रांतों के नाम बदलने का प्रस्ताव है। तर्क है कि जो नाम लोगों को चोट पहुंचाते हैं, उन्हें बदला ही जाना चाहिए।
यह विषय वहां इतना गंभीर है कि साउथ अफ्रीका ज्योग्राफीकल नेम काउंसिल (एसएजीएनसी) नामक एक सरकारी आयोग इस पर सार्वजनिक सुनवाई कर रहा है। प्रीटोरिया का नाम बदलने की घोषणा हो चुकी थी। किसी कारण उसे अभी स्थगित कर दिया गया है। प्रीटोरिया पहले त्सवाने कहलाता था जिसे गोरे अफ्रीकियों ने बदल कर प्रीटोरिया किया था। त्सवाने वहां के किसी पुराने प्रतिष्ठित राजा के नाम से बना था जिसके वंशज अभी तक वहां हैं।
इस प्रकार नामों को बदलने का अभियान और विवाद वहां लंबे समय से चल रहा है। पिछले दस वर्ष में वहां 916 स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। इनमें केवल शहर नहीं; नदियों, पहाड़ों, बांधों और हवाई अड्डों तक के नाम हैं। सैकड़ों सड़कों के बदले गए नाम अतिरिक्त हैं। वहां की एफपीपी पार्टी के नेता पीटर मुलडर ने संसद में कहा कि ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदलने के सवाल पर अगले बीस वर्ष तक वहां झगड़ा चलता रहेगा। उनकी पार्टी और कुछ अन्य संगठन प्रीटोरिया नाम बनाए रखना चाहते हैं।
इसलिए नाम में बहुत कुछ है। यह केवल दक्षिण अफ्रीका की बात नहीं। पूरी दुनिया में स्थानों के नाम रखना या पूर्ववत करना सदैव गंभीर राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्त्व रखता है। जैसे किसी को जबरन महान बनाने या अपदस्थ करने की चाह। इन सबका महत्त्व है जिसे हल्के से नहीं लेना चाहिए। इसीलिए कम्युनिज्म के पतन के बाद रूस, यूक्रेन, मध्य एशिया और पूरे पूर्वी यूरोप में असंख्य शहरों, भवनों, सड़कों के नाम बदले गए। रूस में लेनिनग्राद को पुन: सेंट पीटर्सबर्ग, स्तालिनग्राद को वोल्गोग्राद आदि किया गया। कई बार यह सब भारी आवेग और भावनात्मक ज्वार के साथ हुआ। हमारे पड़ोस में भी सीलोन ने अपना नाम श्रीलंका और बर्मा ने म्यांमा कर लिया। खुद ग्रेट ब्रिटेन ने अपनी आधिकारिक संज्ञा बदल कर यूनाइटेड किंगडम की। इन सबके पीछे गहरी सांस्कृतिक, राजनीतिक भावनाएं होती हैं।
हमारे देश में भी शब्द और नाम गंभीर माने रखते हैं। अंग्रेजों ने यहां अपने शासकों, जनरलों के नाम पर असंख्य स्थानों के नाम रखे, कवियों-कलाकारों के नाम पर नहीं। फिर, जब 1940 में मुसलिम लीग ने मुसलमानों के अलग देश की मांग की और आखिरकार उसे लिया तो उसका नाम पाकिस्तान रखा। जैसा जर्मनी, कोरिया आदि के विभाजनों में हुआ था- पूर्वी जर्मनी, पश्चिमी जर्मनी और उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया- वे भी नए देश का नाम ‘पश्चिमी भारत’ या ‘पश्चिमी हिंदुस्तान’ रख सकते थे। पर उन्होंने अलग मजहबी नाम रखा। इसके पीछे एक पहचान छोड़ने और दूसरी अपनाने की चाहत थी। यहां तक कि अपने को मुगलों का उत्तराधिकारी मानते हुए भी मुसलिम नेताओं ने मुगलिया शब्द ‘हिंदुस्तान’ भी नहीं अपनाया। क्यों?
इसलिए कि शब्द कोई उपयोगिता के निर्जीव उपकरण नहीं होते। वे किसी भाषा और संस्कृति की थाती होते हैं। कई शब्द तो अपने आप में संग्रहालय होते हैं, जिनमें किसी समाज की सहस्रों वर्ष पुरानी परंपरा, स्मृति, रीति और ज्ञान संघनित रहता है। इसीलिए जब कोई किसी भाषा या शब्द को छोड़ता है तो जाने-अनजाने उसके पीछे की पूरी अच्छी या बुरी परंपरा भी छोड़ता है। इसीलिए श्रीलंका ने ‘सीलोन’ को त्याग कर औपनिवेशिक दासता के अवशेष से मुक्ति पाने का प्रयास किया। हमने वह आज तक नहीं किया है।
सन 1947 में हमसे जो सबसे बड़ी भूलें हुईं उनमें से एक यह थी कि स्वतंत्र होने के बाद भी देश का नाम ‘इंडिया’ रहने दिया। लब्ध-प्रतिष्ठित विद्वान संपादक गिरिलाल जैन ने लिखा था कि स्वतंत्र भारत में इंडिया नामक इस ‘एक शब्द ने भारी तबाही की’। यह बात उन्होंने इस्लामी समस्या के संदर्भ में लिखी थी। अगर देश का नाम भारत होता, तो भारतीयता से जुड़ने के लिए यहां किसी से अनुरोध नहीं करना पड़ता! गिरिलाल जी के अनुसार, इंडिया ने पहले इंडियन और हिंदू को अलग कर दिया। उससे भी बुरा यह कि उसने ‘इंडियन’ को हिंदू से बड़ा बना दिया। अगर यह न हुआ होता तो आज सेक्युलरिज्म, डाइवर्सिटी, ह्यूमन राइट्स और मल्टी-कल्टी का शब्द-जाल और फंदा रचने वालों का काम इतना सरल न रहा होता। अगर देश का नाम भारत या हिंदुस्तान भी रहता तो इस देश के मुसलमान स्वयं को भारतीय मुसलमान कहते। इन्हें अरब में अब भी ‘हिंदवी’ या ‘हिंदू मुसलमान’ ही कहा जाता है। सदियों से विदेशी लोग भारतवासियों को ‘हिंदू’ ही कहते रहे और आज भी कहते हैं।
यह पूरी दुनिया में हमारी पहचान है, जिससे मुसलमान भी जुड़े थे। क्योंकि वे सब हिंदुओं से धर्मांतरित हुए भारतीय ही हैं (यह महात्मा गांधी ही नहीं, फारूक अब्दुल्ला भी कहते हैं)। अगर देश का सही नाम पुनर्स्थापित कर लिया जाता, तो आज भी मुसलमान स्वयं को हिंदू या हिंदवी ही कहते जो एक ही बात है। यह विचित्र है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे अनेक प्रांतों और शहरों के नाम बदले, लेकिन देश का नाम यथावत छोड़ा हुआ है। जिन लोगों ने मद्रास को तमिलनाडु, बोंबे को मुंबई, कैलकटा को कोलकाता या बैंगलोर को बंगलुरु, उड़ीसा को ओडीशा आदि पुनर्नामांकित करना जरूरी समझा- उन्हें सबसे पहले इंडिया शब्द को विस्थापित करना चाहिए था। क्योंकि यह वह शब्द है जो हमें पददलित करने और दास बनाने वालों ने हम पर थोपा था।
विदेशियों द्वारा जबरन दिए गए नामों को त्यागना अच्छा ही नहीं, आवश्यक भी है। इसमें अपनी पहचान के महत्त्व और उसमें गौरव की भावना है। इसीलिए अब तक जब भी भारत में औपनिवेशिक नामों को बदल स्वदेशी नाम अपनाए गए, हमारे देश के अंग्रेजी-प्रेमी और पश्चिमोन्मुखी वर्ग ने विरोध नहीं किया है। पर यह उन्हें पसंद भी नहीं आया। क्योंकि वे जानते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। ऐसे में एक दिन अंग्रेजी को भी राज-सिंहासन से उतरना पड़ेगा। इसीलिए, जब देश का नाम पुनर्स्थापित करने की बात उठेगी, वे विरोध करेंगे। चाहे इंडिया को बदलकर भारतवर्ष करने में किसी भाषा, क्षेत्र, जाति या संप्रदाय को आपत्ति न हो। वैसे भी भारतवर्ष ऐसा शब्द है जो भारत की सभी भाषाओं में प्रयुक्त होता रहा है। बल्कि जिस कारण मद्रास, बोम्बे, कैलकटा, त्रिवेंद्रम आदि को बदला गया, वह कारण देश का नाम बदलने के लिए और भी उपयुक्त है। इंडिया शब्द भारत पर ब्रिटिश शासन का सीधा ध्यान दिलाता है। आधिकारिक नाम में इंडिया का पहला प्रयोग ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ में किया गया था जिसने हमें गुलाम बना कर दुर्गति की। पर जब वह इस देश में व्यापार करने आई थी तो यह देश स्वयं को भारतवर्ष या हिंदुस्तान कहता था। क्या हम अपना नाम भी अपना नहीं रखा सकते?
अगर देश का नाम पुन: भारतवर्ष कर लिया जाए तो यह हम सब को स्वत: इस भूमि की गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति से जोड़ता रहेगा जो पूरे विश्व में अनूठी है। अन्यथा आज हमें अपनी ही थाती के बचाव के लिए उन मूढ़ रेडिकलों,वामपंथियों, मिशनरी एजेंटों, ग्लोबल सिटिजनों से बहस करनी पड़ती है जो हर विदेशी नारे को हम पर थोपने और हमें किसी न किसी बाहरी सूत्रधार का अनुचर बनाने के लिए लगे रहते हैं।
इसीलिए जब देश का नाम भारतवर्ष या हिंदुस्तान करने का प्रयास होगा- इसका सबसे कड़ा विरोध यही सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिक करेंगे। उन्हें ‘भारतीयता’ और ‘हिंदू’ शब्द और इनके भाव से घोर शत्रुता है। यही उनकी मूल सैद्धांतिक टेक है। इसीलिए चाहे वे कैलकटा, बांबे आदि पर विरोध न कर सकें, पर इंडिया को बदलने के प्रस्ताव पर वे चुप नहीं बैठेंगे। यह इसका एक और प्रमाण होगा कि नामों के पीछे कितनी बड़ी सांस्कृतिक, राजनीतिक मनोभावनाएं रहती हैं। वस्तुत: समस्या यही है कि जिस प्रकार कोलकाता, चेन्नई और मुंबई के लिए स्थानीय जनता की सशक्त भावना थी, उस प्रकार भारतवर्ष के लिए नहीं दिखती। इसलिए नहीं कि इसकी चाह रखने वाले देश में कम हैं। बल्कि ठीक इसीलिए कि भारतवर्ष की भावना कोई स्थानीयता की नहीं, राष्ट्रीयता की भावना है। लिहाजा, देशभक्ति और राष्ट्रवाद से किसी न किसी कारण दूर रहने वाले, या किसी न किसी प्रकार के ‘अंतरराष्ट्रीयतावाद’ से अधिक जुड़ाव रखने वाले उग्र होकर इसका विरोध करेंगे।
यानी चूंकि इंडिया शब्द को बदल कर भारतवर्ष करना राष्ट्रीय प्रश्न है, इसीलिए राष्ट्रीय भाव को कमतर मानने वाली विचारधाराएं, हर तरह के गुट और गिरोह एकजुट होकर इसका प्रतिकार करेंगे। वे हर तरह की ‘अल्पसंख्यक’ भावना उभारेंगे और आधुनिकता के तर्क लाएंगे।
वैसे भी, उत्तर भारत की सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना और स्वाभिमान मंद है। यहां वैचारिक दासता, आपसी कलह, विश्वास, भेद और क्षुद्र स्वार्थ अधिक है। इन्हीं पर विदेशी, हानिकारक विचारों का भी अधिक प्रभाव है। वे बाहरी हमलावरों, पराए आक्रामक विचारों आदि के सामने झुक जाने, उनके दीन अनुकरण को ही ‘समन्वय’, ‘संगम’, ‘अनेकता में एकता’ आदि बताते रहे हैं। यह दासता भरी आत्मप्रवंचना है।
डॉ राममनोहर लोहिया ने आजीवन इसी आत्मप्रवंचना की सर्वाधिक आलोचना की थी जो विदेशियों से हार जाने के बाद ‘आत्मसमर्पण को सामंजस्य’ बताती रही है। अत: इस कथित हिंदी क्षेत्र से किसी पहलकदमी की आशा नहीं। इनमें अपने वास्तविक अवलंब को पहचानने और टिकने के बदले हर तरह के विदेशी विचारों, नकलों, दुराशाओं, शत्रु शक्तियों की सदाशयता पर आस लगाने की प्रवृत्ति है। इसीलिए उनमें भारतवर्ष नाम की पुनर्स्थापना की कोई ललक या चाह भी आज तक नहीं जगी है। अच्छा हो कि देश का नाम पुनर्स्थापित करने का अभियान किसी तमिल, मराठी या कन्नड़ हस्ती की ओर से आरंभ हो। यहां काम दक्षिण अफ्रीका की तुलना में आसान है, पर हमारा आत्मबल क्षीण है।

(जनसत्ता से साभार)

Monday, November 09, 2009

क्या आप 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगीत मानते हैं?

हाल ही में देवबंद,उ प्र में हुए जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द के सम्मेलन में वंदेमातरम के विरोध में फ़तवा जारी किया गया। देश के गृहमंत्री चिदम्बरम व योगगुरु रामदेव भी वहाँ उपस्थित थे। चूँकि वंदेमातरम देश भक्ति से जुड़ा गीत है (ऐसा इसके आजादी के समय किये गये इस्तेमाल से कहा जा सकता है), इसलिये कुछ संस्थानों व संतों ने इस फ़तवे का विरोध किया। हालाँकि कांग्रेस के सलमान खुर्शीद व भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी, जो दोनों खुद भी मुस्लिम हैं, दोनों ने ही इस फ़तवे पर ऐतराज़ जताया है।

आनन्द मठ: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यही वह बांग्ला उपन्यास है जिसका एक गीत राष्ट्रगीत बन गया। लेकिन इसके राष्ट्रगीत बनने के बाद से अब तक यह विवादों से घिरा रहा है। वैसे हमारे देश में कोई भी ऐसी घटना या व्यक्ति नहीं जिस पर विवाद न हुआ हो। चाहें मोहनदास करमचंद गाँधी हों या "जन गण मन"। हमारा इतिहास ही ऐसा रहा है। आज भी बदस्तूर जारी है। वैसे आज बात करेंगे वंदेमातरम की। पिछले वर्ष ये उपन्यास पढ़ा था और जैसे जैसे पढ़ता गया वैसे वैसे कौतूहल जागा कि आखिर मुस्लिम समुदाय इससे नाराज़ क्यों है? जब सरकार इसको स्कूलों में गाने को कहती है तो चारों ओर से विरोध की आवाज़ें क्यों उठती हैं? इंटेरनेट पर काफी खोजबीन की तो कुछ बातें पता चली। आगे हम आनन्दमठ के कुछ आंश भी पढ़ते रहेंगे।

आइये जानने की कोशिश करते हैं इसके कुछ शुरूआती अंशों से:

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समुद्र आलोड़ित हुआ, तब उत्तर मिला-तुमने बाजी क्या रखी है?
प्रत्यूत्तर मिला,मैंने ज़िन्दगी बाजी पर चढ़ाई है।
उत्तर मिला, जीवन तुच्छ है,सब कुछ होमना होगा।
और है ही क्या? और क्या दूँ?
तब उत्तर मिला, भक्ति।
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यह उपन्यास १८८२ में प्रकाशित हुआ, किन्तु वंदेमातरम १८७५ में लिखा जा चुका था। ये कहानी है संन्यासी विद्रोह की जो १७६५-७० के बीच प्रकाश में आया। आइये जानते हैं इसकी पृष्ठभूमि को। १७५७ में सिराजुद्दोला नाम का नवाब बंगाल पर राज करता था। यही वो समय भी था जब अंग्रेज़, ईस्ट इंडिया कम्पनी के नाम से कलकत्ता के रास्ते भारत में घुसना चाहते थे। नवाब अंग्रेज़ को खिलाफ था और उनके खिलाफ लोगों को एकत्रित करता था। परन्तु किसी हिन्दू को ऊँचा दर्जा दिये जाने के विरोध में मीर जाफर नाम के एक दरबारी ने नवाब के खिलाफ बगावत कर दी। उसी साल पलासी का युद्ध हुआ। मीर जाफर अंग्रेज़ों से जा मिला और सिराज को बंगाल छोड़ना पड़ा। आगे कुछ सालों तक मीर जाफर और उसका जमाई मीर कासिम बंगाल में नवाब बन कर रहे। ये वो समय था जब नवाब अंग्रेज़ों की कठपुतलियाँ बन कर रहते थे। राज नवाब का, पैसा अंग्रेज़ों का। अंग्रेज़ ही लोगों से कर लिया करते थे। एक तरह से उन्हीं का ही कब्जा हो गया था। उसी का नतीजा था संन्यासी विद्रोह। कहते हैं कि १८५७ पहली क्रांति थी अंग्रेज़ों के खिलाफ पर लगता है कि उससे पहले भी कईं क्रांतियाँ संन्यासी विद्रोह के रूप में कलकत्ता ने देखी हैं।

संन्यासी समूह उन लोगों का समूह था जो इकट्ठे हुए थे अंग्रेज़ों के खिलाफ। सब कुछ छोड़ कर भारत माँ को आज़ाद कराने में जान की बाजी लगा रहे थे। १७६५ के आसपास ही बंगाल में सूखा पड़ा और वहाँ लाखों की तादाद में मौतें हुईं। जनता में आक्रोश फूट पड़ा था। और वो आक्रोश था नवाबों पर। ’नजाफी’ हुकूमत के खिलाफ।

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वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् |

महेंद्र गीत सुनकर विस्मित हुए। उन्होंने पूछा- माता कौन?

उत्तर दिये बिना भवानंद गाते रहे:

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम् ||

महेंद्र बोले-ये तो देश है, माँ नहीं।

भवानंद ने कहा, हम लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। हम कहते हैं, जन्मभूमि ही हमारी माता है। हमारी न कोई माँ है, न बाप, न भाई, न बन्धु, न पत्नी, न पुत्र, न घर, न द्वार- हमारे लिये केवल सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां ....

महेंद्र ने पूछा-तुम लोग कौन हो?

भवानन्द ने कहा-हम संतान हैं।

किसकी संतान।

भवानन्द बोले-माँ की संतान।
.....
.....
.....

देखो, जो साँप होता है, रेंगकर चलता है, उससे नीच जीव मुझे कोई नहीं दिखाई पड़ता। पर उसके भी कंधे पर पैर रख दो तो वह भी फन उठाकर खड़ा हो जाता है। देखो, जितने देश हैं, मगध, मिथिला,काशी, कांची, दिल्ली, कश्मीर किस शहर में ऐसी दुर्दशा है कि मनुष्य भूखों मर रहा है और घास खा रहा है, जंगली काँटे खा रहा है। दीमक की मिट्टी खा रहा है, जंगली लतायें खा रहा है! किस देश में आदमी सियार, कुत्ते और मुर्दा खाते हैं?.... बहू-बेटियों की खैरियत नहीं है...राजा के साथ सम्बंध तो यह है कि रक्षा करे, पर हमारे मुसलमान राजा रक्षा कहाँ कर रहे हैं? इन नशेबाज़ मुसट्टों को निकाल बाहर न किया जाये तो हिन्दू की हिन्दुआई नहीं रह सकती।

महेंद्र ने पूछा, बाहर कैसे करोगे?
-मारकर
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शायद ये वाक्य हमारे मुस्लिम समुदाय को अच्छे नहीं लगे। हो सकता है। किन्तु ये वाक्य कब और किस परिस्थिति में कहे गये ये जानने की जरूरत भी तो है। इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा। आगे के कुछ पन्नों में भारत माँ को देवी का दर्जा दिया गया है। इस्लाम में मूर्ति पूजा की खिलाफत है। और इस्लाम में केवल खुदा ही पूजा जाता है। इसी उपन्यास में मुसलमानों के घर जलाने की बात भी कही गई है। शायद यह बात भी वंदेमातरम के खिलाफ जा रही है।

अब जानते हैं कि संतान दल में किस प्रकार से प्रतिज्ञा ली जाती है-

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तुम दीक्षित होना चाह्ते हो?
हाँ, हम पर कृपा कीजिये।
तुम लोग ईश्वर के समक्ष प्रतिज्ञा करो। क्या सन्तान धर्म के नियमों का पालन करोगे?
हाँ।
भाई-बहन?
परित्याग करूँगा।
पत्नी और पुत्र?
परित्याग करूँगा।
रिश्तेदार, दास-दासी त्याग करोगे?
सब कुछ त्याग करूँगा।
धन, सम्पत्ति, भोग, सब त्याग दोगे?
त्याग करूँगा।
जितेंद्रिये बनोगे और कभी स्त्रियों के साथ आसन पर नहीं बैठोगे?
नहीं बैठूँगा, जितेंद्रिये बनूँगा।
रिश्तेदारों के लिये धन नहीं कमाऒगे, उसे वैष्ण्वों के धनागार में दे दोगे?
दे दूँगा।
कभी युद्ध में पीठ नहीं दिखाऒगे?
नहीं।
यदि प्रतिज्ञा भंग हुई तो?
तो जलती चिता में प्रवेश करके या कहर खा कर प्राण दे दूँगा।
तुम लोग जात-पात छोड़ सकोगे? सब समान जाति के हैं, इस महाव्रत में ब्राह्मण-शूद्र में कोई फर्क नहीं।
हम जात-पात नहीं मानेंगे। हम सब एक ही माँ के संतान हैं।
तब सत्यानंद ने कहा, तथास्तु, अब तुम वंदेमातरम गाओ।
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इसमें संन्यासी/संतान व्रत की कर्त्तव्यनिष्ठा और समर्पण का पता चलता है कि किस प्रकार जन्मभूमि पर ये वीर सेना अपने प्राणन्योछावर करने को तत्पर थी।
बंकिमचंद्र के इस उपन्यास में कुछ हद तक मुसलमानों (नजाफी हुकूमत) और काफी हद तक अंग्रेज़ों दोनों के खिलाफ कहा गया है। उन्होंने ये सब १८वीं सदी की घटनाओं को ध्यान में रख कर किया, किन्तु चाह केवल इतनी कि मातृभूमि को कोई आँच न आये।

यही गीत आगे चल कर एक क्रांतिकारी गीत बन गया। जब १८९५ में पहली बार इसका संगीत दिया गया तब बंकिमचंद्र (१८३८-१८९४) इस दुनिया में नहीं थे। हर तरफ वंदेमातरम की ही गूँज सुनाई दी जाने लगी। अंग्रेज़ों ने इस उपन्यास पर प्रतिबंध तक लगा दिया। १९३७ में टैगोर ने इस गीत का विरोध भी किया क्योंकि उनका मानना था कि मुसलमान "१० हाथ वाली देवियों" की पूजा नहीं करेंगे। १९५० में राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया। इस गीत के केवल पहले दो छंद ही गाये जाने की बात कही जाने लगी क्योंकि आगे की पंक्तियों में भारत को ’दुर्गा’ तुल्य माना गया।

हालाँकि मुस्लिम बिरादरी में इस गीत को कुछ लोगों ने अपनाया भी है। और सिख व ईसाइ समुदाय भी इसको मान रहा है। इस उपन्यास की क्रांतिकारी विचारधारा ने सामाजिक व राजनीतिक चेतना को जागृत करने का काम किया। कांग्रेस के अधिवेशन में ही इसको प्रथम बार गाया गया और यही गीत आगे चल कर स्वतंत्रता का पर्याय बना। और विडम्बना यह कि आज कांग्रेस सरकार गृहमंत्री इसके विरोध पर मुहर लगा आते हैं।

मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करी है कि मैं वंदेमातरम पर हो रहे विवाद और आनन्दमठ (संन्यासी विद्रोह) की कहानी को आप तक पहुँचा पाऊँ। अब मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ कि वे (१८वी सदी के घटनाक्रम को ध्यान में रखकर) सच्ची देशभक्ति व समर्पण अथवा त्याग के प्रतीक इस गीत को राष्ट्रगीत मानें या नहीं।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम
शस्यश्यामलां मातरम्......।
शुभ्र ज्योत्सना-पुलकित यामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां, वरदां मातरम्।।
वन्दे मातरम्.....
सप्तकोटिकण्ठ-कलकल निनादकराले,
द्विसप्तकोटि भुजैधर्ृत खरकरवाले,
अबला केनो मां तुमि एतो बले!
बहुबलधारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥ वन्दे....
तुमी विद्या, तुमी धर्म,
तुमी हरि, तुमी कर्म,
त्वं हि प्राण : शरीरे।
बाहुते तुमी मां शक्ति,
हृदये तुमी मां भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गड़ी मन्दिरे-मन्दिरे।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणीं,
कमला कमल-दल-विहारिणीं,
वाणी विद्यादायिनीं नमामि त्वं
नमामि कमलां, अमलां, अतुलाम,
सुजलां, सुफलां, मातरम्
वन्दे मातरम्॥
श्यामलां, सरलां, सुस्मितां, भूषिताम्
धरणी, भरणी मातरम्॥
वन्दे मातरम्..

जय हिन्द।

यहाँ भी देखें:
http://en.wikipedia.org/wiki/Vande_Maataram
http://en.wikipedia.org/wiki/Anandamatha
http://en.wikipedia.org/wiki/Sannyasi_Rebellion
http://en.wikipedia.org/wiki/Nawab_of_Bengal
http://en.wikipedia.org/wiki/Bankimchandra_Chattopadhyay

--तपन शर्मा

Sunday, November 01, 2009

क्या आप भी 'बाप के ज़माने' के गाने सुनते हैं?

हाल ही में एक एफ़ एम चैनल पर कहते सुना कि वे बाप के जमाने के गाने नहीं सुनायेंगे। और यही बात ज़ोर-ज़ोर से बार बार दोहरा रहे थे। पर ये साबित क्या करना चाहते हैं? मेरी समझ में तो यह आया कि आज की पीढ़ी के सभी गाने अच्छे हैं और पिछली पीढ़ी के "गँवारों" वाले गाने "बेकार" थे (?)। जो वर्तमान पीढ़ी है वो "समझदार" है और पिछली पीढ़ी "मूर्ख" थी जो बेकार गाने बनाती व सुनती थी। यहाँ ये मेरे, आपके और "समझदार" पीढ़ी के सभी पिताओं व संगीत के महारथियों को गलत ठहराने पर तुले हुए हैं जिनके बूते ही आज की फ़िल्म इंडस्ट्री टिकी हुई है।

पुरानी पीढ़ी को "बोर" कहने वाला यह चैनल चाहे-अनचाहे कईं बातें कह जाता है। लता मंगेशकर ने जितने भी सदाबहार गाने गाये इनके हिसाब से सुनने लायक नहीं हैं। "समझदार" पीढ़ी जब प्रीतम व अनु मलिक के चुराये हुए "बेहतरीन" गानों पर नाचे व झूमे तो अच्छा होता है। पर आर.डी बर्मन, नौशाद आदि का संगीत हो तो सुना ही क्यों जाये? चैनल इस बात से खुश होता कि बाप के जमाने के गाने न बजा कर जो बदलाव आया है वो बहुत "अच्छा" है और हमारी पीढ़ी इससे खुश है (?)। ये चैनल किशोर व रफ़ी का मुकाबला आतिफ़ असलम व हिमेश रेशमिया से करता है और अपनी इस "कामयाबी" पर खुश भी होता है। जिन गानों को सदाबहार कहा जाता है उन्हीं गानों को यह चैनल नकार रहा है। क्या आज के गानों को सदाबहार गानों का दर्जा मिला है?

इन सबके बीच जो बात और भी ज्यादा चुभती है वो है उनका विज्ञापन के जरिये "बाप के जमाने" की खिल्ली उड़ाना। क्या यहाँ कोई सेंसर बोर्ड नहीं आता? इसी बात को अलग तरीके से कहा जा सकता था। जिस तरह से अपने फ़ूहड़ चुटकुलों से हँसाने की कोशिश ये करते हैं वो पूरा परिवार मिलकर तो नहीं सुन सकता। अपनी बात स्वतंत्रता से कहने का अधिकार हमारा कानून देता है पर भद्दा मजाक करने का नहीं। सनी देओल की आवाज़ में एक चैनल पर फ़ूहड़ चुटकुले सुनाये जाते थे जिस पर सनी देओल ने बाद में ऐतराज़ भी जताया था। है कोई रेडियो के इन चैनलों पर नकेल कसने वाला? "बाप के ज़माने" को दकियानूसी कहने वाला चैनल है ९३.५ रेड एफ़ एम।

खैर मीडिया को मैं हमेशा बुरा कहता आया हूँ और कहता रहूँगा क्योंकि जो कार्य ये मीडिया कर सकता है वो ये करते नहीं। राजू श्रीवास्तव के बिग बॉस में कपड़े उतरे वो ये चैनल बार-बार दिखाते हैं जिसे बच्चे भी देख रहे हैं। किस तरह का दायित्व ये लोग उठा रहे हैं मेरी समझ से बाहर है। जल्दबाजी के शिकार होते हैं और राम को द्वापर में पहुँचा देते हैं। बिना पड़ताल किये कुछ भी लिख देते हैं और कहते हैं "खबर हर कीमत पर"। काल कपाल व भूत पिशाच दिखाते हैं और फिर एक खबर में कहते हैं कि 21वीं सदी में भारत के लोग अँधविश्वास में जी रहे हैं। समाज को नुकसान पहुँचा रहा है मीडिया। दोहरे मापदंड अपनाता है मीडिया।

हिन्दी के चैनलों व समाचार पत्रों का हाल बुरा है। भारत ने दूसरा मैच जीता था, ठीक उसी दिन अम्पायर डेविड शैफ़र्ड का निधन भी हुआ। लेकिन मुझे अखबार व चैनलों से ये खबर नदारद थी। क्रिकेट के चाहने वाले सभी लोग ये जानते हैं कि डेविड शेफ़र्ड की शख्सियत क्या थी। वे लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय अम्पायरों में से रहे। लेकिन फिर भी खेल पृष्ठ पर उनकी मृत्यु की खबर न देख कर मुझे हैरानी हुई। हालाँकि अंग्रेजी के अखबारों में ये खबर छपी थी। इससे पता चलता है कि ये लोग युवराज व धोनी की शोपिंग देखने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं।

रेड एफ़. एम द्वारा शुरू किया गया ये "बेहतरीन" कार्य इसी गैर जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। जब छोटा बच्चा ये सुनेगा कि "बाप के जमाने" के गाने सुनने लायक नहीं (?) हैं तो आप समझ सकते हैं कि भविष्य में किस तरह के गाने सुनने को मिलेंगे। किशोर, रफ़ी, मुकेश, हेमंत, लता, आशा के गाने अब कूड़े में डाल दीजिये और सुनना शुरु कीजिये रेशेमिया व प्रीतम के "रेडियो" को जो एफ़ एम वाले "बजाते" रहेंगे।

---तपन शर्मा

Thursday, October 29, 2009

जंगल में फंसी राजधानी

जंगल में ट्रेन रोकी गई, ख़बर मिली, टीवी स्क्रीन रौशन हुए, 800 सौ यात्री बंधक, ड्राइवर का अपहरण, अब क्या होगा? क्या देश में एक नया देश बन गया है? कुछ दिन पहले छूटे पुलिस ऑफिसर के सीने पर ‘प्रिज़नर ऑफ वार’ का पट्टी लिखा ये संकेत फिर से उभर आया। कुल मिलाकर जो कुछ सुनाई और दिखाई पड़ रहा था वो शाम तक इस सुकून के साथ खत्म हुआ कि ड्राइवर को छोड़ दिया गया, यात्रियों को जाने दिया गया पांच घंटे बाद ट्रेन फिर से अपने गंतव्य को चल पड़ी। लेकिन ये संदेश लेकर कि जंगलों में भी एक आबादी रहती है जो मूलभूत सुविधाओं के लिये पिछले तीन दशकों से राजधानी की राह देख रही है। इस बीच माओवादियों की एक मांग भी देश की सरकार के सामने रखी गयी ‘छत्रधर महतो, कबाड़ और जेल में बंद उनके एक और समर्थक/ हिमायती को रिहा कर दिया जाए’। शाम तक टीवी चैनलों का रुख थोड़ा नरम हुआ और हजारों यात्रियों समेत ट्रेन के अपहरण की खबर माओवादी समर्थित पीसीपीए की अगुवाई में सैकड़ों गांव वालों द्वारा किये गये चक्का जाम में बदल गयी। मीडिया के कैमरे लोगों के बयान दर्ज कर रहे थे लेकिन यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, वो तो भला हो एक बच्चे का जिसने बताया कि उसने गाड़ी रोकने वाले लोगों को सबके साथ, अपने साथ अच्छा सुलूक करते हुए पाया, “वो हम सबको पानी भी पिला रहे थे”।

जिस तरह से ट्रेन पर बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी में उनके द्वारा लिखा दिख रहा था वो साफ़ इशारा करता है कि ये सब इसलिये किया गया ताकि देश की सरकार के साथ-साथ (उसके साथ तो वार्तालाप का सिलसिला दशकों से जारी है) देश की जनता के सामने भी नक्सली / माओवादी / जिंदा रहने की लगभग अंतिम लड़ाई लड़ रहे हजारों लोग, अपना एजेंडा पहुँचाएँ। इन इलाकों के विकास को लोकर जो जमीनी कार्यकर्ताओं की मांग है और जिस विकास कार्य का प्रयत्न सरकार के द्वारा किया जा रहा है उसमें ज़मीन आसमान का अंतर है। सवाल ये नहीं है कि उन्हें किया मिल रहा है, उनके सवाल वो हैं जो उन्हें चाहिये।

इस घटना से जुड़ा एक पहलू ये भी है कि आंदोलन ज़रूर जंगल में रहने वालों का है लेकिन उनके हक़ के लिये लड़ने वाले अकेले जंगल के नहीं हैं बल्कि देश और दुनिया में रहने वाले समाज चिंतक और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग भी हैं (सरकार ऐसे लोगों से माओ वादियों और नक्सलियों का बौद्धिक समर्थन न करने की अपील भी कर रही है)। उधर जंगल में सड़कें, अस्पताल, स्कूल और बिजली-पानी भले न हों, सूचना तंत्र बहुत विकसित है। कुछ दिन पहले ही 20 गांववासियों को छुड़वाकर जो नया रक्त संचार आंदोलन की रगों में हुआ है उसके जोर पर कुछ ऐसा करने की चाहत बलवती हो गई जो मामले को गरम रखे। इंफोटेनमेंट के सहारे 24 घंटे दर्शक सेवा में मशगूल खबरिया चैनल ऐसी घटनाओं को हाथों हाथ लेंगे, राजधानी पर हमले के पीछे ये सोच भी जरूर रही होगी। ऐसे में जंगल को ये सुनहरा मौक़ा लगा अपने एजेंडे की लोकप्रियता हासिल करने का।

अब सारा दारोमदार सरकार के कंधों पर है कि वो देश को इस चुनौती से कैसे निकाले। गृहमंत्री जितने सभ्य दिखते हैं अगर वो उसी चश्में से समस्या को देखेंगे तो शायद आने वाले दिनों में ये हो कि सरकार और माओवादी चिंतक बैठकर कुछ ऐसा करते दिखें जिसे जंगल के लोग अपनी तरफ़ बढ़ा एक क़दम मानें। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ये कहते नहीं थकते कि सोनिया जी ने पिछली कई चुनौतियों में देश को संकट से निकालने का रास्ता हमवार करवाया है, देखना है कि इस समस्या से वो कैसे निपटती हैं। वो इस समय ताक़त के उस शिखर पर हैं कि मुख़ालिफ़ हवाओं का भी सामना बख़ूबी कर सकती हैं।

अगर ऐसा न हुआ तो सारा बोझ बंगाल की वाम सरकार पर आ जायेगा और वो इसके समर्थन में वही दर्दमंदी दिखायेगी जो उसने पिछले दिनों बीस जंगल निवासियों को रिहा करते हुए दिखाई थी कि “हमारे देश के संविधान और इज़्राइल के संविधान में फर्क है, दूसरे ये कि जब कंधार और रुबया सईद की रिहाई के लिये विदेशी आतंकियों को छोड़ा जा सकता है तो एक पुलिस अधिकारी जो देश वासी है और देश की कानून व्यवस्था की रक्षा करने का काम करता है, उसके लिये 20 गरीब जंगल वासियों को, जिनपर कोई इल्ज़ाम अभी साबित भी नहीं हुआ है, बेल पर क्यों नहीं छोड़ा जा सकता?”। इसके बाद जो बातें इस घटनाक्रम के मद्देनजर सामने हैं वो खिचड़ी जैसी हैं, मसलन घटना की जिम्मेदार पीसीपीए, वही है जिसका समर्थन ममता बैनर्जी एंड पार्टी करती है, तृणमूल का मानना है कि ये सब कुछ वाम सरकार वोट के लिये कर रही है। वाम मंथी इसे ममता की सियायत मानते हैं, “इसे कैसे ढूँढ़ लिया, जो दो साल से लापता हैं वो कहां हैं?”, “आपकी गल्ती ये है कि आपने कभी पीसीपीए जैसे संगठनों की सोच को खारिज नहीं किया, वो आपके पार्टी सहयोगी हैं” वगैरह वगैरह।

इसी बीच ये भी संयोग ही है कि पिछले सप्ताह नक्सली हकों के लिए काफी मुखर अरूंधति राय अचानक टीवी चैनल पर ये कहती हुई दिखाई पड़ी हैं कि छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर पिछले 30 साल से नक्सली रह रहे हैं लेकिन अभी ही क्यों युद्ध जैसे हालात बनाये जा रहे हैं? वो मानती हैं कि सरकार युद्ध चाहती है ताकि छत्तीसगढ़ और झारखंड के उन इलाकों को खाली कराया जा सके जिन्हें एमओयू के जरिये बंधित किया जा चुका है लेकिन वहां बसने वालों के आंदोलन/विरोध की वजह से उसपर खनन का काम नहीं शुरू किया जा सका है।” यानी सरकार को कभी न कभी इस इल्जाम का जवाब देना ही पड़ेगा कि क्या वो खनन माफियाओं के लिये सरकारी संगीने मुहय्या कर रही है? सूचना तंत्र और आर टीआई जैसे साधन जनता के पास मौजूद हैं इसलिए उसे सरकार के जवाब का इंतेजार रहेगा।

26/11 को छोड़ दें तो देश ने एक अर्से से अपने अंदरूनी हालात पर कोई बड़ी बहस नहीं की है। उससे ज़्यादा तो हम पाकिस्तान के अंदरूनी हालात पर बहस कर डालते हैं। और हमारी अंदरूनी हालत ये है कि हमारी चिंता आतंक, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्री लंका, गोते खाते शेयर मार्केट और दुनिया की अर्थव्यवस्था, सस्ते चीनी सामान की घुसपैठ से बच बचा कर जब घर लौटती है तो म्यूनिस्पिल कार्पोरेशन से लेकर अरुणाचल प्रदेश के रंगहीन चुनावी माहौल में रंग भरने में जुट जाती है, कुछ बहाने बनाकर देश-विदेश घूमने की व्यस्तताओं में ख़ुद को फंसा लेते हैं। विपक्ष के अपने मुद्दे इतने टर्मिनल स्टेज पर हैं कि सर्जरी और कीमियोथ्रेपी की सलाहें दी जा रही हैं। ऐसे में या तो राजधानी को जंगल में रोका जायेगा या फिर वीराने में बैठकर निदा फाजली के ये ताजातरीन शेर (ये भी एक तरीका है) गुनगुनाएगा-
तीन चौथाई से ज़ायद हैं जो आबादी में
उनके ही वास्ते हर भूख है, मंहगाई है
कोई हिंदू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सबने इंसान न बनने की कसम खाई है
सिंर्फ मंसूबों में मौसम के बदलते हैं मिजाज
सिर्फ तकरीरें बताती हैं बहार आई है

--नाज़िम नक़वी
बी-1/924 टॉवर न. 16
सिल्वर सिटी अपार्टमेंट
सेक्टर 93ए
नोएडा, गौतम बुद्ध नगर

Wednesday, October 28, 2009

सीता से भी ज्यादा अग्नि परीक्षाएँ देती है आज की नारी

लंदन में रहने वालीं शन्नो अग्रवाल नारियों की वर्तमान हालत को ध्यान में रखते हुए कुछ मासूम सवाल कर रही हैं-

गौर करिये कि सीता को दो बार अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी थी वह भी रामराज्य में पर आज की कितनी ही नारियों को आये दिन तरह-तरह की अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। अग्नि केवल धधकती हुई लपटों वाली ही नहीं होती बल्कि जहाँ यातनाएँ बढ़ती जाती हैं अंतरात्मा झुलसने लगती है और नारी को उस यातना की अग्नि से गुजरना पड़ता है जो असहनीय होती है और मरते दम तक जलाती रहती है, वह भी एक अग्नि ही है। यहाँ पर सीता मैया और आज की नारी के बीच कुछ मोटे-मोटे से तथ्य हैं जिनपर भी नज़र डालना ज़रूरी है। कुछ में समानता है और कुछ में नहीं।
1. उस समय के हिसाब से सतयुग की सीता का जीवन बहुत सीधा-सादा व सरल सा था। घर गृहस्थी के मामले में भी और उम्मीदों की तुलनात्मक दृष्टि से भी। क्योंकि आज की नारी कलियुग की होते हुये भी उस युग की नारी से मानसिक विकास में अधिक बड़ी हैं, साथ में मानसिक परेशानियाँ भी झेलती है। उसे ना जाने कितनी उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है और उससे न जाने कितनी उम्मीदें बढ़ती ही रहती हैं.....जिनका अंत ही नहीं होता। मानसिक और शारीरिक रूप से कामों में व्यस्त व सजग रहती है। उसके बाद भी कितनी ही अंतर्मन को झुलसा देने वाली अग्नि-परीक्षाओं से वह गुजरती है। लेकिन सीता को आज की नारी की तरह इतना कुछ नहीं सहना पड़ा था......फिर भी उनके नाम का ही उदाहरण दिया जाता है।
2. सीता के साथ हुये अन्याय के लिये राम ही जिम्मेदार थे जिन्होंने अपनी पत्नी को दूसरों के शक करने पर उनकी अग्नि परीक्षा ली पर उन्होंने कभी अपनी पत्नी का अपमान नहीं किया। लेकिन आज के तमाम राम (पति परमेश्वर) समाज के लिये नहीं बल्कि समाज से छिपा कर स्त्री में दोष ढूंढकर उसका अपमान करते हैं। कभी-कभी घरवालों के संग मिलकर भी ज्यादतियां और अत्याचार करते जाते हैं। (औरत इसमें दहकती है)।
3. राम सीता के कहने पर केवल मृग के पीछे इसलिए भागे थे ताकि सीता को वह हिरन पकड़ कर दे सकें। किन्तु आज के राम की बुद्धि के कपाट कब बंद हो जाएँ पता ही नहीं चलता और कब वह किसी मायाविनी के पीछे पड़कर अपनी सीता जैसी पत्नी को तज दे उस छलना के लिये.....कहना मुश्किल है। (औरत इसमें दहकती है)।
4. कलियुग में भी घर के बाहर बहुत से रावण मिलेंगें जो स्त्री पर बुरी दृष्टी रखते हैं। किन्तु जिस रावण ने सीता मैया का अपहरण किया था उसने पवित्रता की मर्यादा नहीं लांघी और सीता पवित्र रहीं। वह रावण एक विद्वान व धार्मिक व्यक्ति था किन्तु उसने केवल अपनी बहन की जिद के आगे झुककर बदले की भावना से ही अपहरण के बारे में सोचा था। फिर भी सीता की पवित्रता पर शक किया गया। आजकल के युग में भी बाहरी रावणों से स्त्री बचती रहती है पर फिर भी शक किया जाता है, और ताने सुनती है। (औरत फिर दहकती है)।
5. लक्ष्मण ने तो केवल कुटिया के बाहर ही रेखा खींची थी और सीता ने किसी बुरे इरादे से उसे नहीं लांघा था किन्तु उनका धोखे से अपहरण हो गया। और बाद में शक का शिकार बनीं, और आज की नारी वैसे तो निकलती है घर के बाहर लेकिन उसके लिये आज भी कुछ सामाजिक दायरों का बंधन है जिसका कभी धोखे से भी उल्लंघन हो गया तो पुरुष के शक की कटारी आ गिरती है उसपर। किसी पुरुष के संग निर्दोषता से भी हँसने-बोलने या बाहर जाने पर उसे सबकी निगाहों व बातों का शिकार बनकर ताने सुनने पड़ते हैं। लेकिन पुरुष अपनी मनमानी करते रहते हैं और कितने लोग अनदेखी कर जाते हैं। (औरत फिर दहकती है)।
6. चलो मानते हैं कि उस समय रामराज्य था और उस समय की विचारधारा और थी। और एक राजा ने प्रजा को प्रभावित करने के लिए अपनी पत्नी को अग्नि परीक्षा देने को मजबूर कर दिया। उस प्रभावशाली व्यक्ति या देवता ने इस अक्षम्य अपराध को किया। पर आज के युग में..... ऐसा क्यों? क्या पुरुष भी ऐसी ही अग्नि परीक्षा देकर अपने को साबित कर सकते थे/ हैं? क्या कहा....नहीं।
इसका मतलब है कि रामराज्य और कलियुग की नारी में एक बात की समानता अब भी है....और वह है उसपर शक किया जाना और परीक्षाओं से गुजरना।
आज का युग कलियुग कहा जाता है, नारी हर दिशा में सतयुग की नारी से बढ़-चढ़ कर है और हर क्षेत्र में पुरुष की बराबरी करने की इच्छा व क्षमता रखती है और सिद्ध कर चुकी है...पर आज के कितने पुरुषों की विचारधारा नारी को लेकर बदली है? कोई बतायेगा? आज की नारी मानसिक रूप से समर्थ होते हुये भी पुरुष से तरह-तरह की मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना सहती है। देश-विदेश में हर जगह देखो पुरुष का अहम् ही नारी का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। नारी की साधना, उसका आत्म विश्वास, उसका खिलखिलाना जब पुरुष तोड़ता है तो सब मुरझाकर भस्म हो जाता है। जीते जी कितनी ही नारियाँ सुलग रही हैं समाज में चारों तरफ। मिलने-जुलने वाले लोग आते हैं और अपनेपन की बातें करते हैं दिखावे को व मन बहलाने के लिए किन्तु जैसे ही वहां पर किसी नारी पर अत्याचार होने का आभास पाते हैं तो तुंरत ही वह सब अपने को एक किनारे कर लेते है, सोचते हुये कि ' हम क्यों किसी की बुराई-भलाई व झगडे में पड़ें'... उस समय उस लाचार औरत को कितने अकेलेपन का अहसास होता होगा क्या कभी किसी ने सोचा है? सभी अपने उस समय पराये हो जाते हैं उसके लिये। सबको अपनी-अपनी पड़ी रहती है इस दुनिया में। इसीलिए शायद कहा गया है कि 'यह दुनिया केवल मुंह देखे की है', जहाँ किसी को सुख में देखा तो जलन और किसी को परेशानी में देखा तो मुँह छिपा कर खिसक लेते हैं लोग। एक टूटता हुआ इंसान सहारा न पाकर बिलकुल ही टूट जाता है। ऐसी स्थिति में एक इंसान की नहीं बल्कि कइयों के संबल की आवश्यकता होती है मुसीबत की मारी किसी नारी को। एक नहीं बल्कि तमाम आवाजों से किसी अत्याचार की दीवारें हिलाई जा सकती हैं। वरना जब तक हम यह चाहेंगे और होने देंगें तब तक यह सब होता रहेगा.... क्योंकि नारी वसन लज्जा कहा जाता है और उस लज्जा से वह अपनी असलियत को नंगा नहीं करती क्योंकि अत्याचार के विरुद्ध बोलने से उसकी बदनामी होती है....और मुंह बंद रखकर कष्ट झेलती रहती है घर भर का सम्मान बचाने को। घर की मान-मर्यादा बचाकर सबके सामने अपनी तकलीफों को छिपाने का ढोंग करती रहती है जाने-पहचाने लोगों में.....लेकिन फिर अन्दर ही अन्दर मन में घुटकर किसी के जाने बिना ही वह सबकी निगाहों से बचकर अपनी अग्नि में एक दिन वास्तव में मर जाती है...स्वाहा कर देती है अपने को अत्याचार की आग में....कितना दुखद और अजीब है यह क्रम!! सोचती हूँ कि सीता में तो दैविक शक्ति थी जो आज की नारी में नहीं है. और वह दूसरी बार अग्नि परीक्षा से गुजरते हुये अपमान को न झेल पायीं थीं और पृथ्वी में समा गयीं हमेशा के लिये. किन्तु आज की नारी तिल-तिल कर जलती है सोचते हुये कि वह भी धरती में समा जाये ताकि और अपमान ना सहना पड़े।

माँ, बहन, बेटी का रूप और पुरुष की सहचरी
जो सृष्टि की रचना करती वह तो केवल नारी है
दया-धरम, प्यार-ममता की मूरत का प्रतिरूप
इतना होने पर भी नारी इस धरती पर भारी है।

--शन्नो अग्रवाल

चित्र-साभार- राधिकिता

Saturday, October 03, 2009

इस बार भी तैयारी से निकली है कादम्बिनी

पिछले हफ़्ते 'कादम्बिनी' के पत्रिका के स्वरूप को लेकर विद्वानों ने अपनी चिंता ज़ाहिर की थी। इस बार हमारे एक प्रबुद्ध पाठक ने कादम्बिनी के अक्टूबर 2009 अंक की समीक्षा भेजी है॰॰॰

1) प्रधान सम्पादक के संपादकीय स्तम्भ को 'परिचय' नाम दिया गया है और पृष्ठ पर सम्पादकीय के साथ संपादक का परिचय भी प्रकाशित किया गया है। यूँ सम्पादकीय के साथ सम्पादक का परिचय प्रकाशित करना भी हिन्दी पत्रकारिता की एक ऐतिहासिक घटना है।
2) हँसी-दिल्लगी पृष्ठ (पृष्ठ 62) पर यूसुफ़ नाज़िम का एक व्यंग्य छपा है जिसमें जो चित्र लगा है उस चित्र का उस व्यंग्य से कोई लेना-देना नहीं लगता। उसी पृष्ठ पर नीचे खोजा के किस्से छपे हैं, उसके साथ लगे चित्र का भी मैटर से कोई सम्बंध नहीं है।
3) अंक में प्रकाशित तीन कहानियों में से 2 के रचनाकारों का कानपुर से ताल्लुकात है, तीसरे कहानीकार जयशंकर प्रसाद है।
4) प्रतिभा पृष्ठ पर प्रकाशित कुल 3 रचनाकारों में से 2 कानपुर के हैं। इस अंक में प्रकाशित सर्वाधिक रचनाकार कानपुर के हैं। सम्पादक का कानपुर प्रेम उल्लेखनीय है।
5) आवरण पर परमहंस योगानंद की डायरी से एक रचना विज्ञापित है, जबकि पत्रिका में यह रचना है ही नहीं। हाँ, परमहंस योगानंद पर एक सामग्री पत्रिका में ज़रूर है, जो रॉय यूज़िन डेविस की पुस्तक 'परमहंस योगानंद'- जैसा मैंने जाना- से उद्धृत है।
6) पत्रिका में गुरुदत्त पर प्रकाशित एक लेख में सबसे बड़ी तस्वीर किशोर कुमार की लगी है, गुरुदत्त की नहीं।
7) घर-परिवार स्तम्भ में आयुर्वेद पर आधारित पंचकर्म पर एक सामग्री प्रकाशित है, जिसे स्त्म्भ में वेद से बताया गया है। वेद तो चार ही हैं, संपादक आयुर्वेद को पाँचवाँ वेद मानते हैं।
8) मतांतर पृष्ठ पर तीसरा पत्र-दो छपे हैं- तीसरा पत्र-1, तीसरा पत्र-2। जबकि पहला और दूसरा पत्र कहीं नहीं छपा है। तीसरा पत्र 1-2 छापने का आशय क्या है? तीसरा पत्र-चौथा पत्र क्यों नहीं।
9) अगले अंक से कादम्बिनी अपने 50वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। देखना है उसकी भी कितनी तैयारी है।

Monday, September 21, 2009

कादम्बिनी के सरोकार और समकालीनता के सवाल (परिचर्चा)

पिछले दिनों मोहल्लालइव पर किसी प्रबुद्ध बेनामी लेखक ने लिखा कि 'कादम्बिनी क्या खाकर निकल रही है और क्यों निकल रही है'। किसी समय में कादम्बिनी की बहुत प्रतिष्ठा थी जो सांस्कृतिक और साहित्यिक जागरण के संस्कारों से सिंचित थी। हमें लगा कि हिन्द-युग्म भी एक साहित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका है, ऐसे में इस बहस को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रबुद्ध लोगों से राय ली जा सकती है कि क्या इस पत्रिका को छपते रहना चाहिए, इसी तरह के विषय वस्तु के साथ? इस संदर्भ में हमारी टीम ने राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ट, भारत भारद्वाज, मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, रामजी यादव, प्रमोद कुमार तिवारी, विमल चंद्र पान्डेय और गौरव सोलंकी से बातचीत की। मंगलेश डबराल ने कहा कि मैं हर विषय पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। बाकी लोगों ने जो कहा वह संपादित रूप में आपके सामने प्रस्तुत है। कुछ बातचीत की रिकॉर्डिंग भी सुनने के लिए उपलब्ध है॰॰॰


बड़े घरानों की पत्रिकाओं में तीखी बहसें नहीं हो पाती- राजेन्द्र यादव

ये कादम्बिनी नाम दिया था बालकृष्ण राव ने, उन्होंने यह पत्रिका निकाली थी। राजेन्द्र अवस्थी के पास आकर यह भूत-प्रेत, अंधविश्वास और ज्योतिष की पत्रिका हो गई, यानी लगभग अपठनीय हो गई। बाद में विष्णु नागर आये तो इन्होंने कुछ सम्हालने की कोशिश की, पठनीय बनाया और उपयोगी चीज़ें दी। और धीरे-धीरे लगा था कि इसका एक स्थान बनेगा। लेकिन हुआ ये कि विष्णु नागर चले गये और फिर से उसी तरह की मैगजीन हो गई जैसी सरिता ग्रुप की पत्रिकाएँ होती हैं। इनमें कोई सीरियस बात तो होती नहीं, बस पाठक होते हैं और उनका मनोरंजन होता है।

एक बात साफ कर दूँ कि बड़े घरानों की पत्रिकाओं में वो चाहे साप्ताहिक हिन्दुस्तान हो, चाहे धर्मयुग हो या चाहे कुछ तीखी बहसें नहीं हो पातीं। इन्होंने कभी नहीं की। ख़ासकर राजनीति को लेकर और सेक्स लेकर, इनमें तरह-तरह के बंधन हैं कि यह बहू-बेटियों की या परिवार की पत्रिका है। इसलिए यह उम्मीद कि यहाँ कोई बहस होगी, यह सोचना बेकार है।

हम समझते हैं कि बहुत निकल ली, काफी चल लीं। हम समझते हैं कि इसकी सामाजिक या पाठकीय उपयोगिता शून्य है। यदि प्रकाशकों को मुनाफा है तो निकाले नहीं तो नहीं।

विष्णू नागर के वक्त में मैं इसका रेगुलर पाठक था। नागर को यह पत्रिका जिस रूप में मिली थी, उससे उन्होंने बहुत बढ़िया स्थिति में ला खड़ा किया था। लेकिन जो भी थी, पठनीय हो गई थी पत्रिका। यदि विष्णू नागर जैसा कोई दूसरा संपादक इस पत्रिका को मिलता है तो इसे 1-2 सालों में फिर से पठनीय पत्रिका बनाया जा सकती है। जहाँ तक आवश्यक फेरबदल का सवाल है तो उसमें पहली बात तो मौलिक रचनाएँ छपनी चाहिएँ तथा इसे यह तय करना चाहिए कि यह कविता की पत्रिका है, कहानी की, बहस की, कला या फिर कुछ और।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰॰राजेन्द्र यादव(प्रख्यात साहित्यकार, संपादक- हंस)


कादम्बिनी एक दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है- पंकज बिष्ट

इस पत्रिका का पूरा इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव भरा है। शुरू में जब यह इलाहाबाद से निकलनी शुरू हुई थी तो यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, और इसमें सभी गंभीर लोग रुचि लेते थे। लेकिन जब यह हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के पास आई तो इन लोगों ने रीडर-डाइजेस्ट और नवनीत के तर्ज पर चलाना शुरू किया। इसके बाद जब राजेन्द्र अवस्थी इसके संपादक बने तो इन्होंने इसे तंत्र-मंत्र की पत्रिका बना दी। तबसे इसका पाठक-वर्ग बिलकुल बदल गया। यह एक पापुलर पत्रिका बन गई। जब विष्णु नागर जी आये तो उन्होंने सम्हालने की कोशिश की, एक गंभीर पत्रिका बनाने की कोशिश की। लेकिन दुर्भाग्यवश वे ज्यादा समय तक इसमें नहीं बने रह पाये, उसी का परिणाम है कि अब यह लगभग दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है। इसके संपादकों को यह नहीं समझ में आ पा रहा है कि उन्हें छापना क्या है, इसका टारगेट-रीडर्स कौन है।

एक बात मैं कहना चाहूँगा कि साप्ताहिक या मासिक पत्रिकाओं का संपादन बहुत मुश्किल है। दैनिक पत्रों में समाचार का फ्लो इतना तेज़ है और अलग-अलग पत्र एक ही ख़बर को इतने तरह से कवर कर देते हैं कि मासिक पत्रिका के संपादकों के सामने यह चुनौती होती है कि कैसे वह कुछ नया और सार्थक परोसे और अपना पाठक-वर्ग बचाये रखे।

अगर मालिक चाहे, उसमें इच्छाशक्ति हो तो एक समर्थ संपादक वह चुन सकता है जो बड़े आसानी से पत्रिका को बचा सकता है। हिन्दुस्तान में यह हालत नहीं है कि यह पत्रिका न चले, इस तरह के कंटेंट वाली कोई और मासिक पत्रिका है भी नहीं जिसे इतने बड़े घराने का समर्थन प्राप्त हो। वे चाहें तो इसे बहुत बढ़िया बना सकते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि व्यवसायिक घराने अपनी हिन्दी पत्रिकाओं के लिए कभी भी बहुत अच्छे सम्पादक चुनते ही नहीं। यदि कोई पत्रिका जो टेलीविजन में दिखाया जाता है, उसी की प्रिंटेंड नकल हो तो उसका कोई भविष्य नहीं है।

मैं विष्णु नागर के समय में इस पत्रिका को स्थाई तौर पर देखता था। राजेन्द्र अवस्थी के समय में मैंने इसे देखना भी पसंद नहीं किया। अब मैं इसपर ध्यान नहीं देता।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार, संपादक- समयांतर)


गीली लकड़ी की तरह धुँआने से बढ़िया है भभककर जल जाये- भारत भारद्वाज

कादम्बिनी हिन्दी में निकलने वाली कुछ पुरानी पत्रिकाओं में है। कादम्बिनी का संपादन 1961 में इलाहाबाद से बालकृष्ण राव ने किया था और उस समय इसका पूर्णतः साहित्यिक स्वरूप था। लेकिन बाद में संपादक बदलते-बदलते इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलते-बदलते पूरी तरह से बदल गया। पत्रिका की साहित्यिक प्रवृति नष्ट करने में सबसे बड़ा योगदान है राजेन्द्र अवस्थी का। यह भूत-प्रेत और तमाम धार्मिक अंधविश्वास से लदी पत्रिका तो थी ही विष्णु नागर में टाइम में सेलिब्रिटीज की पत्रिका हो गई। बाद में विजय किशोर मानव ने इसी में थोड़ा-बहुत बदलाव कर दिया।

कादम्बिनी के हर तरह के पाठक थे। साहित्य के तो थे ही, साहित्येत्तर अनुशासन की बहुत सी चीज़े इसमें होती थीं। आर्थिक अभाव के कारण यह पत्रिका बंद नहीं हो रही बल्कि नई अर्थनीति के कारण यह बंद हो सकती है। लगभग 50 साल से यह पत्रिका निकल रही है। मेरा अंदाज़ है वीणा के अलावा (जो 81 साल से निकल रही है) बाद हिन्दी की यह दूसरी पत्रिका है जो इतने लम्बे समय से निकल रही है। अब बहुत निकल ली।

इस पत्रिका के चरित्र में लगातार फेर-बदल हुए। ख़ास तरह की पत्रिका के ख़ास तरह के पाठक होते हैं। इस पत्रिका के हमेशा से ही पाठक बदलते रहे। राजेन्द्र अवस्थी ने इसे जहाँ पहुँचा दिया था उससे इसका जो पाठक-वर्ग तैयार हुआ था, उसे विष्णु नागर से बिलकुल बदल दिया।

हाँ, मैं इस पत्रिका को लम्बे समय से देखता रहा हूँ। 70 के दशक के भी मैंने इसे देखा है, विष्णु नागर के ज़माने में भी और मैंने इसका पिछला अंक भी देखा है। एक अच्छी पत्रिका थी अपने जमाने में, इसकी एक प्रतिष्ठा थी। मेरा कहना है कि गीली लकड़ी की तरह धूँ-धुँआने से बढ़िया है कि भभक कर जल जाये। जब किसी पत्रिका की भूमिका खत्म हो रही हो, उसका तात्पर्य ही न हो तो क्या मतलब है निकलने का! लेकिन बिना किसी सामाजिक भूमिका और हस्तक्षेप के बहुत सी पत्रिकाएँ निकलती रहती हैं। 41 साल से गोपाल राय का संबोधन उदाहरण है। किसी से पूछिए कि आप 'समीक्षा' देखते हो? इसी तरह मुझे लगा कि 'वीणा' बंद हो गई है।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰भारत भारद्वाज (आलोचक, संपादक-पुस्तक-वार्ता)


कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है- मदन कश्यप

सुनें-
कादम्बिनी तो इन दिनों मैं पढ़ भी नहीं रहा हूँ, पहले भी नहीं पढ़ता था। लेकिन नागर जी जब सम्पादक हुए, तो उन्होंने कुछ ऐसी चीजें छापी, जिसके कारण उसको पढ़ने और लिखने में हमारी रुचि हुई थी। जब से नागर जी हटे हैं, मैंने इसका कोई अंक नहीं देखा है। तो अब क्या छप रहा है, यह भी मुझे नहीं मालुम है।

लेकिन मुझे लगता है कि लगातार इसकी पाठक-संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समय के सांस्कृतिक सवालों से जूझने की बात तो छोडिए, तालमेल मिलाकर चलने वाली भी पत्रिका नहीं रही। बिलकुल अपनी डफली-अपना राग की तरह। अगर नागर जी के पीरियड को आप छोड़ दीजिए तो इस पत्रिका में कुछ नहीं था।

हर पत्रिका का अपना एक चरित्र होता है। फिर भी नागर जी ने हर स्तम्भ को रोचक बनाने की कोशिश की। लेकिन जिस तरह से एक कवि की एक कविता और दो पेज़ पर 4,5-6 कवियों की कविताएँ छापते थे। इस शिल्प में इसका कोई स्वरूप बन ही नहीं सकता है। फिर भी कुछ बन रहा था, लेकिन लग रहा था कि कुछ बन रहा है।

कोई पत्रिका महत्वपूर्ण कब होती है, जब वो समय में हस्तक्षेप करे। कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। अगर उससे मुनाफ़ा हो रहा हो तो ओचित्य हो सकता है, लेकिन मालिकान के लिए।

शुरू में यह इतनी बुरी नही थी। लेकिन दिन-दिन प्रतिदिन बुरी होती चली गई। राजेन्द्र अवस्थी के टाइम में भूत-प्रेत की झूठी कहानियाँ छपती थीं, वो भी पैसे लेकर। एक बार कादम्बिनी में छपा कि पटना में बुद्ध मार्ग में एक मंदिर में बाबा है जिन्हें वनदुर्गा सिद्ध है। यह मंदिर तो मेरे कॉम्प्लेक्स के बगल में था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसे किसी बाबा के बारे में नहीं जानता, जो मेरे बगल में रहते हैं। लेख भगवती शरण मिश्र का था। बहुत पता लगाया तो मालुम पड़ा कि वह बाबा भगवती शरण मिश्र के संबंधी हैं।

बाद में पता चला कि उसी बाबा ने एक पत्रिका निकाली। जब बाबा से पूछा गया कि आपने पत्रिका क्यों निकाली, तो उन्होंने बताया कि राजेन्द्र अवस्थी छापने के लिए 3 लाख रुपये माँग रहे थे, तो मैंने सोचा कि इतने में तो एक इस तरह की पत्रिका हम खुद निकाल सकते हैं।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)

मदन कश्यप (कवि, संपादक- द पब्लिक एजेंडा)


एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो - रामजी यादव

सुनें-
किसी भी पत्रिका का महत्व इस बात में है कि वह समकालीन विमर्श में क्या भूमिका निभाती है। इस हिसाब से देखा जाये तो अलग-अलग दौर में, अलग-अलग पत्रिकाओं की अपनी जगह रही है और वे लगभग अनियतकालिन और साधनहीन स्थितियों में निकलती रही है। ढेरों अध्यापक और साहित्यकार ऐसे रहे हैं जिन्होनें उस पत्रिका को विकसित करना अपना एक महत्वपूर्ण सरोकार समझा और उन्होनें इसे निभाया भी, लेकिन 80 के दशक में कुछ पत्रिकाएँ ऐसी निकलीं जो बड़े घरानों की पत्रिकाएँ थी। मसलन टाइम्स ऑफ़ इंडिया का धर्मयुग और हिन्दुस्तान टाईम्स का साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बनी इत्यादि। इससे पहले इन्हीं दोनों घरानों में से किन्हीं का रविवार और दिनमान भी हुआ करता था, रविवार और दिनमान एक बहुत अच्छे सम्पादकीय टीम का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। जिसमें एक साथ रघुवीर सराय और अज्ञेय जैसे लोग एक समय में काम करते थे।

धर्मयुग ने स्वयं एक ज़माने में बहुत बड़े-बड़े लेखकों को एक बडा मंच दिया और वे लेखक मुख्य धारा के साहित्य में आये लेकिन आज शायद मुश्किल से ऐसे लोगों की गिनती की जा सकती है जो किसी ज़माने में धर्मयुग में छपते थे और हीरो हो जाते थे। आज उनकों हम नहीं जानते, किसी भी रुप में नहीं जानते। वे सारे दोयम दर्जे के कहानीकार-रचनाकार है जिनको दोहराना आज के सन्दर्भ में संभव नहीं है।

जहाँ तक कादम्बिनी की बात है, कादम्बिनी ने साहित्य के इतिहास में या समकालीन इतिहास में कोई मील का पत्थर रखा हो ऐसा कहना मुशिकल है और एक तरह से ज्यादती भी है क्योंकि उस पत्रिका की जो सीमायें थीं वह उसके सम्पादकों की भी अपनी सीमायें थीं। सम्पादक प्रायः नौकरियाँ करते थे और साहित्यकार थे इसलिये उन्होंने साहित्य को एक कैप्सूल की तरह अपने यहाँ से बेचने का काम किया।

एक ज़माने में इस कादिम्बनी में काफी साहित्यिक चीज़ें होती थीं, लोग समझते थे लेकिन जो भूमिका सामान्य जन के भीतर सरिता आदि ने निभाई, जैसे हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास इत्यादि कालमों और दूसरे ऐसे अंधविश्वास विरोधी लेखों से समाज को जो रास्ता दिखाया, कादिम्बनी की ऐसी ज़गह कभी नहीं रही। कादिम्बनी मुख्यधारा से साहित्यकारों के प्रेम प्रसंगों, उनके कुछ चर्चित-कुचर्चित प्रसंगों और गैर ज़रूरी बहसों और साक्षात्कारों को छापती रही, जिसमें संवेदना में किसी किस्म का विचलन नहीं पैदा होता या विचार में किसी किस्म की दृढ़ता नहीं पैदा होती थी, लेकिन हम देखते हैं कि बाद में कादिम्बनी में आमूल-चूल परिवर्तन हुये, खासतौर पर विण्णु नागर के सम्पादकत्व में। जब इसको विष्णु नागर ने सम्पादित करना शुरू किया तो पहले तो इसका रूपाकार बदला। हम देखते हैं जिस तरह की सामग्री वह लगातार छापते रहे हैं, उस सामग्री में उस तरह की बात नहीं थी जिसे कहा जाये कि इन्होनें कोई नई बात कही है, वो बहुत पुरानी चीज़ें, बहुत पुरानी कहानियाँ, बहुत स्थापित किस्म के सेलिब्रिटीज और लेखक अभिनेता और गायक और दूसरे-दूसरे महफिलबाज़ किस्म के लोगों की आकांक्षाओं की पत्रिका रही है। इस पत्रिका का दाम तमाम लघुपत्रिकाओं के मुकाबले एक दुखदायी पक्ष रहा है। 25 या 30 रूपये दाम रखना भारत जैसे गरीब देश के, साधारण निम्नवर्गीय पाठक के साथ बड़ी ज्यादती है। चूँकि यह घराने की है और इसको पर्याप्त रूप से विज्ञापन भी मिलते हैं, इसके पास आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी बनी हुयी है तो यदि अपना सरोकार वो जनता और निम्न समाज से तय करती है तो उसे अपने दाम में कटौती कर देनी चाहिये और लगातार इस तरह की सामग्री देनी चाहिये जिससे कि लोगों को लगे कि कादिम्बनी पढ़ने से उनके विचारों में खूबी पैदा होगी या कादिम्बनी में ऐसी सूचना होगी जो दूसरी कहीं नहीं है या अभी तक नहीं मिली।

जहाँ तक उसके चलने या पढ़ने या बंद करने का सवाल है, इन हालात में उसके बंद होने से किसी को कोई हानि नहीं होगी और चलते रहने से किसी को कोई लाभ भी नहीं होगा। ये कहीं भी साहित्य के इतिहास में किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती है। यह एक घराने की है और घराने के नौकर इसके संपादको की भूमिका निभाते हैं, जिनकी समझ बहुत कम है। इसलिये अगर लोगों का इरादा बिरला घराने, टाटा घराने या जैन-साहू घराने से या इस तरह से पैसे को लेकर है तो जैन साहू घराने, बिरला घराने को भी लोगों की आकांक्षओं का ध्यान रखना चाहिये, अगर वे नहीं रखते हैं तो उनकी पत्रिकाओं के बंद होने या चलने में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मैं कभी इस तरह की पत्रिका नहीं पढता। दूर दराज़ के छोटे शहरों और बाकि जगहों से प्रतिबद्ध और सरोकारों वाली पत्रिकाएँ ही पढ़ने की जरुरत पड़ती है और मैं कादिम्बनी इसलिये भी नहीं पढ़ता क्योंकि इसमें मेरे पढने लायक कोई सामग्री नहीं होती।

ऐसा नहीं है की कोई मैं अपनेआप को महान या बौद्धिक लेखक समझता हूँ बल्कि एक ऐसे बेचैन युवक के रूप में अपने आप को देखता हूँ जिसे बहुत कुछ जानना है और साहित्य उसके लिये बड़ा माध्यम है। मुझे दिखता है कि एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो जबकि उसके अभी के सभी अंक देख चुका हूँ।
(शैलेश भारतवासी से हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰रामजी यादव (कवि-कथाकार, फिल्ममेकर, आलोचक)


कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है- प्रमोद कुमार तिवारी

कादम्बिनी पत्रिका बहुत से उतार-चढ़ाव से होकर गुजरी है। राजेन्द्र अवस्थी के समय यह काल-चिंतन और भूत-प्रेत की पत्रिका रही, वहीं विष्णु नागर जी के दौर में इसमें साहित्य और सरोकार की गूँज सुनाई देने लगी। और फिर से अपनी प्रतिष्ठा पाने लगी। आज की तारीख में यह साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका होने की बजाय आनंद, मस्ती, सैर-सपाटा आदि की एक पापुलर पत्रिका होने की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है। पत्रिकाएँ दो तरह की होती हैं, एक वो जिन्हें पाठक खोजकर पढ़ता है, दूसरी वो जिससे पाठक टाइम पास करता है। कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है। मुझे याद है कि नागर जी के समय में इस पत्रिका में मेरे लिए कम से कम 30-35 मिनट की सामग्री होती थी, लेकिन आज 5 मिनट का कंटेंट भी नहीं होता।

अब हिन्दुस्तान समूह में मृणाल पाण्डेय के बाद शशि शेखर आये हैं। जब नया व्यक्ति आता है तो उसके अपने नये संस्कार होते हैं। लेकिन किसी चल रहे सिस्टम को समझने में वक्त तो लगता है। इनसे उम्मीदें हैं कि शायद कादम्बिनी फिर से अपना मुक़ाम हासिल करे। लेकिन इतनी जल्दी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।

कादम्बिनी की अपनी एक सामाजिक उपयोगिता रही है। बहुत पुरानी पत्रिका है, जिसने सामाजिक जागरुकता फैलाने वाले कई स्तम्भ चलाये। एक समय में यह पत्रिका बाल पत्रिकाओं और गंभीर पत्रिकाओं की बीच की कड़ी थी। इसके वर्तमान रूप से मुझे निराशा हुई है, लेकिन हर पत्रिका का यह दौर आता है, मुझे लगता है कि यह परिस्थितियाँ बदल जायेंगी।

॰॰॰प्रमोद कुमार तिवारी (युवा लेखक व पत्रकार)


कादम्बिनी चर्चा करने लायक पत्रिका ही नहीं है- विमल चंद्र पाण्डेय

किसने कहा कि कादम्बिनी की रीडरशीप घट रही है! मुझे लगता है कि कादम्बिनी को स्यूडो-इंटलैक्चयूल तरह के बहुत से पाठक अभी भी इससे जुड़े हैं और अब तो यह पूरी तरह से बाज़ारू पत्रिका हो गई है। और इसपर हमारे बोलने न बोलने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिताजी इस पत्रिका को घर लाया करते थे। तब उनका उद्देश्य अलग था, इसमें बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें होती थीं, लेकिन अब तो भूतों-प्रेतों पत्रिका बनकर रह गई है। यह पत्रिका कभी भी इतनी स्तरीय नहीं रही कि इसपर राजेन्द्र यादव जैसे लोगों को टिप्पणी करनी पड़े। मेरी कविताएँ भी इसमें 'पहचान' स्तम्भ के अंतर्गत छपी थी, जिसमें से एक कविता का सार जो कि उसके अंतिम पंक्तियों में था ही उड़ा दिया गया था। मेरा मानना है कि इसके बंद होने या चलने, पाठक संख्या घटने-बढ़ने पर कोई चर्चा ही नहीं होनी चाहिए।

॰॰॰विमल चंद्र पाण्डेय (नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हिन्दी युवा कहानीकार)


कादम्बिनी ने अपने ही पाठकों को ठेंगा दिखलाया है- गौरव सोलंकी

मैं कभी कादम्बिनी का नियमित पाठक नहीं रहा लेकिन मैंने इसके बदलते हुए रूप पर ज़रूर ग़ौर किया है और इसके बारे में लोगों से बात भी करता रहा हूँ। छ:-सात महीने पहले का कोई अंक मैंने देखा था। मैं यदि कुछ साल पहले की स्थिति को याद करूँ तो यह प्रबुद्ध पाठकों की पत्रिका थी जिसे पढ़ने पर एक किस्म की बौद्धिक समृद्धि का अनुभव होता था। इसका पाठक वर्ग यदि कम हो रहा है तो कम होने का सीधा सा कारण है कि इसने अपने उन्हीं पाठकों को ठेंगा दिखलाते हुए अपना रूप बदल लिया है जो इसकी नींव से जुड़े हुए थे। बाज़ार के चक्कर में कादम्बिनी ने अपना स्तर बच्चों या किशोरों की पत्रिकाओं जैसा बना लिया है। मैंने हाल ही में कादम्बिनी देखी तो मुझे किशोरों की पत्रिका 'सुमन सौरभ' की याद आई। मैं तो बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूँ। इसे छापने वाले लोग भी शायद ठीक से नहीं जानते कि वे किसके लिए पत्रिका निकाल रहे हैं। यदि वे कम पढ़े लिखे आम पाठक की पसन्द तक आना चाहते हैं तो याद रहे कि उन पाठकों के पास इससे कहीं बेहतर विकल्प पहले से ही मौज़ूद हैं। कोई भी उस सामग्री से कैसे संतुष्ट हो सकता है जो दैनिक अख़बारों के बालमंच वाले पृष्ट जैसी हो या इंटरनेट से उठाई गई 'ज्ञानवर्द्धक' सामग्री। मैं कभी कादम्बिनी में प्रकाशित नहीं हुआ।

॰॰॰गौरव सोलंकी (चर्चित युवा कहानीकार व कवि)


आज यानी 25 सितम्बर 2009 को हमें कुछ और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं।


कादम्बिनी पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई- प्रियदर्शन

एक अरसे से कादंबिनी देख नहीं पाया हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल अखबारों और किताबों से फुर्सत नहीं मिल पाती। इत्तेफाक से कादंबिनी छूटती चली गई। सच कहूं तो कभी खरीद कर पढ़ने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। इसकी कोई वैचारिक वजह भी नहीं। बस इसे पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। विष्णु नागर जी संपादक थे तो ओलंपिक पर कवर स्टोरी लिखी थी। और भी थोड़ा-बहुत लिखना तभी हुआ था। तब थोड़ा अच्छी भी लगती थी कादंबिनी।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार)


कादम्बिनी को बंद करने की बात एक अतिरेकी कथन है- पंकज सिंह

रामानंद दोषी के ज़माने से कादंबिनी को देख रहा हूं। उस वक्त इसका डाइजेस्ट वाला स्वरूप था, अच्छा भी लगता था। फिर राजेंद्र अवस्थी संपादक हुए तो कुछ परिवर्तन भी किए। उन्होंने परिचर्चाओं के ज़रिए कादंबिनी को समकालीन से जोड़ने की कोशिश भी की। कोई भी पत्रिका ये तो दिखाती ही है कि उसकी बौद्धिक तैयारी कैसी है। बाद में कादंबिनी राजेंद्र माथुर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं (व्यापक अर्थ में) का शिकार हो गई। फिर विष्णु नागर ने पत्रिका का बड़ी विनम्रता (इतनी ज़रूरी भी नहीं थी) से कायांतरण किया। कई नए स्तंभ, कई नई परिकल्पनाएं दिखीं।

फिर भी किसी का ये कहना कि कादंबिनी जैसी पत्रिका को बंद हो जाना चाहिए, कोरी बकवास है। ये अतिरेकी कथन है। मैं तो कहता हूं कि हंस को बंद हो जाना चाहिए। हंस राजेंद्र यादव की मानसिक विकृतियों का आईना रहा है। पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती। कादंबिनी में हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे युवा कवि भी शामिल हैं। कादंबिनी में लिखने वाले हंस में लिखने वालों से बेहतर हैं। ये हो सकता है कि पढ़नेवालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हों।

मैंने नागपुर के पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में युवाओं के बड़े समूह का नेतृत्व किया था। कादंबिनी ने फोटो के साथ इंटरव्यू छापा था। विष्णु नागर ने भी कुछ कविताएं छापीं, फिर पति-पत्नी का संयुक्त लेख भी छपा। नियमित लेखक कभी नहीं रहा, पाठक अभी भी हूं। मेरे अनुसार जीवन में सिर्फ साहित्य ही महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने बीए किया इतिहास में, जेएनयू से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया, साहित्य से जुड़ाव भी है। मतलब, कादंबिनी ज़िंदगी के पूरे विस्तार को समेटने की कोशिश करती है, तो ये सराहनीय कदम है। वर्तमान संपादक ने कम से कम कोई क्षरण किया हो, ऐसा नहीं लगता।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)

॰॰॰पंकज सिंह (कवि, आलोचक)


जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसका तो सम्मान करें- पूर्णिमा वर्मन

अबकी बार अगस्त में जब मैं भारत से इमारात लौटी तब इकोनॉमी क्लास का टिकट नहीं मिला मजबूरन बिजनेस क्लास में बैठना पड़ा। एअर होस्टेस पत्रिकाओं वाली ट्रे लेकर आयी तो एक दो पत्रिकाएँ हटाकर देखा कि क्या कोई हिंदी पत्रिका है। मुझे कादंबिनी दिखी तो उठा ली। रूप रंग अलग, आकार अलग, पहला पन्ना खोलते ही ऐसा तमाचा पड़ा कि यात्रा का स्वाद ही खराब हो गया। लेख था- "हिंदी जेहादियों से डर लगता है।" लेख में सिद्ध किया गया था कि हिंगलिश ही बोलनी चाहिए। लिखने पढ़ने वाली हिंदी बोलना जेहाद है।

इस प्रकार के लेख प्रकाशित करने वाली हिंदी पत्रिका का प्रकाशित होना हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने वालों के लिए कलंक की बात है। हम जैसे लोग जो दिन-रात विदेशों में हिन्दी के प्रसार के लिए प्रयत्न कर रहे हैं भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ देखें तो दिल टूटना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब घर में इसकी प्रतियाँ डाइजेस्ट की तरह संभाल कर रखी जाती थीं। सब पुरानी पत्रिकाएँ अखबारों के साथ रद्दी में बिकती थीं लेकिन यह नहीं बेची जाती थी। रुपरंग बदलना स्वाभाविक है लेकिन जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।

कुल मिलाकर यह कि गलती पत्रिका की नहीं क्लास की है। बिजनेस क्लास का टिकट लिया तो भुगतना तो था ही। आराम से इकोनॉमी में बैठती। वहाँ एअर होस्टेस पत्रिकाओं के लिए परेशान नहीं करती। दो घंटे सोती और चैन से घर पहुँचती।
(ईमेल द्वारा प्राप्त)

॰॰॰पूर्णिमा वर्मन (बहुतचर्चित ऑनलाइन हिन्दी पत्रिकाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति की संपादिका)


~पढ़ें और अपने मित्रों को पढ़ायें। यह परिचर्चा ईमेल से अपने मित्रों को भेजें~

Wednesday, August 26, 2009

पत्रकारिता में गांव या गांव की पत्रकारिता...

पत्रकारिता में गांव, विषय का संदर्भ मन में एक उत्सुकता जगाने के लिये काफी है। किसी के सीने में लगी, आग तो लगी। दिल्ली जैसे शहरों में गांव का विचार नुमाइशी है। किसी महँगे से इलाक़े में मिट्टी से लिपी दीवारों और बांस की सजावट के साथ खाने-पीने की जगहों पर गांव की ख़ुश्बू सूंघते हुए लोग आते हैं और एक मोटे बिल की अदायगी के साथ चले जाते हैं, बस। अक्सर ऐसा भी होता है कि गांव की दूसरी जानकारियां, एक रुपये की बहस में दस पैसे के बराबर आ जाती हैं। शहर और इससे भी दो क़दम आगे मेट्रो-पोलिटिन शहर गांव को किस नज़र से देखते हैं इस पर घंटों बातें की जा सकती हैं, लेकिन क्यों?

मेरी समझ में नहीं आता कि शहर क्यों गांव पर बातें करते हैं? या फिर ये कि सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ सोने जागने वाले गांव आख़िर क्यों शहर की और ताकते हैं, जहां रात और दिन का फ़र्क़ ही नहीं रह गया है? दोनों की ज़रूरतें अलग हैं। तौर तरीक़े जुदा हैं। उठना बैठना भिन्न है। “पत्रकारिता में गांव”, किस पत्रकारिता में गांव? शहरी पत्रकारिता क्यों गांव पर बात करके अपना वक़्त ख़राब करती है? उससे कहो शहर पर ही ठीक से कुछ लिख ले, वही बहुत है।

असल में गांव का विकास शहर की सोच से बाहर की बात है। वो नहीं बता सकता कि गांव की बेहतरी के लिए क्या किया जाए? गांव का विकास शहर की तर्ज़ पर न हो सकता है न किया जा सकता है। देश का हर भू-भाग शहर में तो तब्दील नहीं हो सकता। न जाने कब और कैसे शहर को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि गांव की बेहतरी के लिए सोचने और कुछ करने का दायित्व उसका है। हो सकता है ये तब हुआ हो जब प्रशासन से बात करने के लिए गांव, शहर के चक्कर लगाने पर मजबूर हुए हों। देश की संसद अगर गांव में होती तो शायद उसे शहर का ये एहसान लेने की भी ज़रूरत न पड़ती। लेकिन वो क्या करें कि उनके नेता चुनाव में जीतते ही शहर भाग जाते हैं। हरिया की जमीन जमींदार ने दाब ली थी और कितने साल उसे अपने नेता के इन आश्वासनों पर ज़िंदा रहना पड़ा था कि “दिल्ली से बात की है, तुम्हारा काम हो जायेगा”, “दिल्ली के कामों में वक़्त तो लगता ही है हरिया..., तुम्हारी तरह बेकार तो बैठी नहीं है दिल्ली” या फिर ये कि “अभी दिल्ली अमरीका गई हुई है, जब लौटेगी तो देखेंगे”।
गांव का विकास ख़ुद गांव को ही करना होगा। आज के दौर में तो ये और भी आसान है। सूचना क्रांति ने जानकारियों पर से शहर की बपौती ख़त्म कर दी है। एक अच्छी बात ये है कि गांवों ने इस दिशा में क़दम उठा लिये हैं, शुरूआत है, है तो सही।

ये अब गांवों को ख़ुद सोचना होगा कि वो कब तक थर्मल पावर के पड़ोस में रहकर भी अंधेरे में टटोल-टटोल कर चलते रहेंगे। रायबरेली, देश की सबसे शक्तिशाली महिला के संसदीय क्षेत्र में लगे थर्मल पावर प्लांट के आस-पास के लगभग सौ गांवों में 19 घंटों की बिजली कटौती उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। सोचिये देश के दूसरे गांव समूहों का क्या हश्र होगा। गांवों के अनगिनत दर्दों में ये ये तो महज़ एक टीस है। घाव देखने और दिखाने की हिम्मत तो अभी आई ही नहीं है। “एक-दो ज़ख्म नहीं सारा बदन है छलनी, दर्द बेचारा परीशां है कहां से उट्ठे”।

पत्रकारिता और साहित्य में गांव नहीं, गांव में साहित्य और पत्रकारिता, विषय होना चाहिये था। गांव को अपना सूचना तंत्र ख़ुद खड़ा करना होगा और प्रशासन से सीधे तौर पर जुड़ना होगा। सरकार और गांव के बीच की हर दूरी स्वंय पाटनी होगी। तकनीक शहर से नहीं आती, पैसे से आती है, ये समझना होगा। अपनी ख़ुदी को ऊंचा कीजिये फिर देखिये दिल्ली में बैठे ज़िल्ले-इलाही कैसे झुक के आपसे पूछेंगे, बताओ हरिया, आप क्या चाहते हो?




अपनी पहली वर्षगांठ पर पाखी पत्रिका ने साहित्य और पत्रकारिता में गांव संगोष्ठी आयोजित करके गांव को याद किया तो सभा के सबसे नौजवान वक्ता पुण्य प्रसून बाजपेयी ने सभा को गांव के मर्म का एहसास कराया। शायद प्रसून ही ऐसा कर सकते थे, क्योंकि वो उस जमात से आते हैं जो कभी शहर आये ही नहीं। उनके गांव में दिल्ली महज़ एक बिंदु का नाम है। प्रस्तुत है पाखी की संगोष्ठी में जो उन्होंने बोला, स्वयं उनकी आवाज़ में –


(यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें)

हिंद युग्म अपनी बैठक में इस चर्चा को और आगे ले जाना चाहता है। क्योंकि हमारा मानना है कि हर दिल एक गांव का नक़्शा है।

Tuesday, April 21, 2009

अहंकारी होते ब्लॉगी कवि

करीबन सवा तीन वर्ष पूर्व मैंने पहली कविता लिखी थी। कविता थी या नहीं ये तो पता नहीं, पर मेरे लिये तो वो कविता ही थी। तब से अब तक हर महीने में एक कविता तो हो ही जाती है। और जब से इंटेरनेट पर हिन्दी का खेल शुरू हुआ है तब से कविताओं की भरमार हो गई है। बचपन में आठवीं तक ही हिन्दी पढ़ी थी, इसलिये महान लोगों की कवितायें पढ़ने से वंचित रहा। जो कुछ कविताओं में सीखा वो पिछले तीन वर्षों में सीखा। पर आज एकाएक मैं कवियों की बात लेकर क्यों शुरु हो गया?

एक जगह दो पंक्तियाँ पढ़ीं थीं, शायद गोपालदास ’नीरज’ द्वारा लिखित हैं। यदि मैं गलत हूँ तो कृपया मुझे बता दें।


आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य॥

इन पंक्तियों को पढ़कर हर कोई कवि होना सौभाग्यशाली मानेगा। अगर किसी को पता चले कि फ़लां व्यक्ति कवितायें लिखता है तो वो अचम्भित हो जाता है। कविता लिखना आसान काम नहीं समझा जाता। कवि के सारे भाव उस कविता में समाहित हो जाते हैं। कवि गोपालदास की बात मानें तो काव्य और कुछ नहीं बल्कि आत्मा का सौंदर्य है जो कवि की लेखनी से बाहर आता है।

एक और पंक्ति है- जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि... कवि अपने शब्दों में ऐसी उपमायें लगा देता है कि साधारण से लगने वाले शब्द भी पढ़ने वाले के दिल को छू जाते हैं। लेकिन दिल से लिखने वाले कवि क्या दिल से अच्छे भी होते हैं? क्या जो लिखा जाता है वो कवि के मन में भी होता है? हो सकता है आज से दशकों पहले ये सवाल न उठता हो, पर आज मैं ये प्रश्न पूछने पर मजबूर हो गया हूँ।

हिन्दी ब्लॉगों की बढ़ती संख्या कहें, हिन्दी अब अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच रही है। जिस हिन्दी को हम नवीं दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया करते थे, आज उस हिन्दी में रोज़ लिख-पढ़ रहे हैं। शायद यही कारण है कि जो कागज़ पर लिखा करते थे, वे अब कम्प्यूटर पर लिखते हैं। जितनी अधिक ब्लॉगों की संख्या, उसी गति से कविताओं के ब्लॉग व साइट की संख्या में बढ़ोतरी।

ब्लॉगजगत पर आजकल एक अजीब सा ट्रैंड दिखाई देने लगा है। कवि एक दूसरे में गलतियाँ निकालने में रहने लगे हैं। उदाहरण देखिये एक ये और एक यहाँ। कोई कहता है कि "मेरी कविता उससे अच्छी", तो कोई कहता है कि फ़लां व्यक्ति की कविता छपने लायक ही नहीं थी। कभी कोई दोष तो कभी कोई। जिस तरह हमारे देश में हर कोई क्रिकेटरों को क्रिकेट सिखाने में लगा रहता है, ठीक उसी तरह ब्लॉग की दुनिया में हर "कवि" दूसरे को सिखाने में लगा हुआ है। क्योंकि हर कोई कहता है कि उसने खूब साहित्य पढ़ा है, इसलिये वो ही ठीक है।

कवि कहने लगते हैं कि फ़लां मंच उनकी कविताओं के लायक ही नहीं है। कवि कहने लगे हैं कि "मेरी कविता का कोई सानी नहीं इसलिये इस साइट पर मैं नहीं छापूँगा क्योंकि अच्छे पाठक नहीं आते"। कविता-अकविता पर विवाद होता है। अकविता क्या होती है ये कोई नहीं बताता। कविता क्या होती है इसकी परिभाषा भी मैंने कभी नहीं पढी क्योंकि मैंने खुद आठवीं के बाद हिन्दी नहीं पढ़ी। पर विवाद जरूर पढें हैं। उदाहरण के तौर पर यह कविता। एक उदाहरण यहाँ है । ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जायेंगे। शायद फिर कोई पाठक एक और उदाहरण चिपका जाये।

कुछ साइट तो अपने ब्लॉग पर से कमेंट तक ये कहकर हटा देती हैं कि वे "अभद्र" हैं। इस लिंक पर आप जायेंगे तो पाठकों की टिप्पणियों को पढ़कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इनमें से कुछ कमेंट हटा लिये गये हैं। ये हाल तब है जब इस साईट को चलाने वाले खुद एक "कवि" हैं। अब कमेंट क्यों हटा लिये गये इन कारणों का पता नहीं। हटाई गई टिप्पणी तो मैं आपको नहीं पढ़ा सकता, लेकिन ऐसा कुछ साइट पर होता है इसका अंदाज़ा आप यहाँ जाकरपहली टिप्पणी पढ़ कर ही लगा सकते है। जब कवि ही कवि की बातों को अभद्र करार दे! आज हालात यह हैं कि कवि कोर्ट-केस की धमकी देने लगे हैं। ज़रा यहाँ जा कर पढें। हालाँकि टिप्पणीकार ने अपनी टिप्पणी को हटा लिया किन्तु फिर भी विवाद तो पता चल ही जायेगा। जिस प्रकार फिल्म इंडस्ट्री में एक दूसरे के गीत चुराने के इल्जाम लगते रहते हैं, वैसे ही अब कविता-जगत में भी शुरु हो गया है।

आजकल "अनामी" टिप्पणीकारों की संख्या में भी इजाफ़ा हो रहा है। ये पढ़िये। ऐसे "कवि" शायद डर गये हैं कि उनकी असलियत सामने न आ जाये। सच कहने से कैसा डर!! ऐसे तो न होते थे गुजरे जमाने के कवि। इसी कविता पर जा कर देखिये कैसे छुपकर "वार" करते हैं "कवि"। यहाँ भी एक डरपोक कवि बैठे हैं। समझ में यह नहीं आता कि सच बोलने से क्यों डरते हैं हम।

मैंने बचपन में संस्कृत के किसी श्लोक में पढ़ा था, जब आपके वाक्यों में "मैं" शब्द आ जाता है तो समझ लें कि "अहम" यानि अहंकार का प्रवेश हो गया है। कमोबेश वही हाल आजकल के कवियों का भी है। या यूँ कहें कि "ब्लॉगी कवि"। मेरा सवाल सरल है। क्या आजकल के इस प्रतियोगी युग में कवि भी कलियुग के शिकार हो गये हैं?

--तपन शर्मा