बड़े घरानों की पत्रिकाओं में तीखी बहसें नहीं हो पाती- राजेन्द्र यादव
![]() |
एक बात साफ कर दूँ कि बड़े घरानों की पत्रिकाओं में वो चाहे साप्ताहिक हिन्दुस्तान हो, चाहे धर्मयुग हो या चाहे कुछ तीखी बहसें नहीं हो पातीं। इन्होंने कभी नहीं की। ख़ासकर राजनीति को लेकर और सेक्स लेकर, इनमें तरह-तरह के बंधन हैं कि यह बहू-बेटियों की या परिवार की पत्रिका है। इसलिए यह उम्मीद कि यहाँ कोई बहस होगी, यह सोचना बेकार है।
हम समझते हैं कि बहुत निकल ली, काफी चल लीं। हम समझते हैं कि इसकी सामाजिक या पाठकीय उपयोगिता शून्य है। यदि प्रकाशकों को मुनाफा है तो निकाले नहीं तो नहीं।
विष्णू नागर के वक्त में मैं इसका रेगुलर पाठक था। नागर को यह पत्रिका जिस रूप में मिली थी, उससे उन्होंने बहुत बढ़िया स्थिति में ला खड़ा किया था। लेकिन जो भी थी, पठनीय हो गई थी पत्रिका। यदि विष्णू नागर जैसा कोई दूसरा संपादक इस पत्रिका को मिलता है तो इसे 1-2 सालों में फिर से पठनीय पत्रिका बनाया जा सकती है। जहाँ तक आवश्यक फेरबदल का सवाल है तो उसमें पहली बात तो मौलिक रचनाएँ छपनी चाहिएँ तथा इसे यह तय करना चाहिए कि यह कविता की पत्रिका है, कहानी की, बहस की, कला या फिर कुछ और।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰॰राजेन्द्र यादव(प्रख्यात साहित्यकार, संपादक- हंस)
कादम्बिनी एक दिशाहीन पत्रिका बनकर रह गई है- पंकज बिष्ट
![]() |
एक बात मैं कहना चाहूँगा कि साप्ताहिक या मासिक पत्रिकाओं का संपादन बहुत मुश्किल है। दैनिक पत्रों में समाचार का फ्लो इतना तेज़ है और अलग-अलग पत्र एक ही ख़बर को इतने तरह से कवर कर देते हैं कि मासिक पत्रिका के संपादकों के सामने यह चुनौती होती है कि कैसे वह कुछ नया और सार्थक परोसे और अपना पाठक-वर्ग बचाये रखे।
अगर मालिक चाहे, उसमें इच्छाशक्ति हो तो एक समर्थ संपादक वह चुन सकता है जो बड़े आसानी से पत्रिका को बचा सकता है। हिन्दुस्तान में यह हालत नहीं है कि यह पत्रिका न चले, इस तरह के कंटेंट वाली कोई और मासिक पत्रिका है भी नहीं जिसे इतने बड़े घराने का समर्थन प्राप्त हो। वे चाहें तो इसे बहुत बढ़िया बना सकते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि व्यवसायिक घराने अपनी हिन्दी पत्रिकाओं के लिए कभी भी बहुत अच्छे सम्पादक चुनते ही नहीं। यदि कोई पत्रिका जो टेलीविजन में दिखाया जाता है, उसी की प्रिंटेंड नकल हो तो उसका कोई भविष्य नहीं है।
मैं विष्णु नागर के समय में इस पत्रिका को स्थाई तौर पर देखता था। राजेन्द्र अवस्थी के समय में मैंने इसे देखना भी पसंद नहीं किया। अब मैं इसपर ध्यान नहीं देता।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰पंकज बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार, संपादक- समयांतर)
गीली लकड़ी की तरह धुँआने से बढ़िया है भभककर जल जाये- भारत भारद्वाज
![]() |
कादम्बिनी के हर तरह के पाठक थे। साहित्य के तो थे ही, साहित्येत्तर अनुशासन की बहुत सी चीज़े इसमें होती थीं। आर्थिक अभाव के कारण यह पत्रिका बंद नहीं हो रही बल्कि नई अर्थनीति के कारण यह बंद हो सकती है। लगभग 50 साल से यह पत्रिका निकल रही है। मेरा अंदाज़ है वीणा के अलावा (जो 81 साल से निकल रही है) बाद हिन्दी की यह दूसरी पत्रिका है जो इतने लम्बे समय से निकल रही है। अब बहुत निकल ली।
इस पत्रिका के चरित्र में लगातार फेर-बदल हुए। ख़ास तरह की पत्रिका के ख़ास तरह के पाठक होते हैं। इस पत्रिका के हमेशा से ही पाठक बदलते रहे। राजेन्द्र अवस्थी ने इसे जहाँ पहुँचा दिया था उससे इसका जो पाठक-वर्ग तैयार हुआ था, उसे विष्णु नागर से बिलकुल बदल दिया।
हाँ, मैं इस पत्रिका को लम्बे समय से देखता रहा हूँ। 70 के दशक के भी मैंने इसे देखा है, विष्णु नागर के ज़माने में भी और मैंने इसका पिछला अंक भी देखा है। एक अच्छी पत्रिका थी अपने जमाने में, इसकी एक प्रतिष्ठा थी। मेरा कहना है कि गीली लकड़ी की तरह धूँ-धुँआने से बढ़िया है कि भभक कर जल जाये। जब किसी पत्रिका की भूमिका खत्म हो रही हो, उसका तात्पर्य ही न हो तो क्या मतलब है निकलने का! लेकिन बिना किसी सामाजिक भूमिका और हस्तक्षेप के बहुत सी पत्रिकाएँ निकलती रहती हैं। 41 साल से गोपाल राय का संबोधन उदाहरण है। किसी से पूछिए कि आप 'समीक्षा' देखते हो? इसी तरह मुझे लगा कि 'वीणा' बंद हो गई है।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰भारत भारद्वाज (आलोचक, संपादक-पुस्तक-वार्ता)
कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है- मदन कश्यप
सुनें-
लेकिन मुझे लगता है कि लगातार इसकी पाठक-संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समय के सांस्कृतिक सवालों से जूझने की बात तो छोडिए, तालमेल मिलाकर चलने वाली भी पत्रिका नहीं रही। बिलकुल अपनी डफली-अपना राग की तरह। अगर नागर जी के पीरियड को आप छोड़ दीजिए तो इस पत्रिका में कुछ नहीं था।
हर पत्रिका का अपना एक चरित्र होता है। फिर भी नागर जी ने हर स्तम्भ को रोचक बनाने की कोशिश की। लेकिन जिस तरह से एक कवि की एक कविता और दो पेज़ पर 4,5-6 कवियों की कविताएँ छापते थे। इस शिल्प में इसका कोई स्वरूप बन ही नहीं सकता है। फिर भी कुछ बन रहा था, लेकिन लग रहा था कि कुछ बन रहा है।
कोई पत्रिका महत्वपूर्ण कब होती है, जब वो समय में हस्तक्षेप करे। कादम्बिनी के निकाले जाने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। अगर उससे मुनाफ़ा हो रहा हो तो ओचित्य हो सकता है, लेकिन मालिकान के लिए।
शुरू में यह इतनी बुरी नही थी। लेकिन दिन-दिन प्रतिदिन बुरी होती चली गई। राजेन्द्र अवस्थी के टाइम में भूत-प्रेत की झूठी कहानियाँ छपती थीं, वो भी पैसे लेकर। एक बार कादम्बिनी में छपा कि पटना में बुद्ध मार्ग में एक मंदिर में बाबा है जिन्हें वनदुर्गा सिद्ध है। यह मंदिर तो मेरे कॉम्प्लेक्स के बगल में था। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं ऐसे किसी बाबा के बारे में नहीं जानता, जो मेरे बगल में रहते हैं। लेख भगवती शरण मिश्र का था। बहुत पता लगाया तो मालुम पड़ा कि वह बाबा भगवती शरण मिश्र के संबंधी हैं।
बाद में पता चला कि उसी बाबा ने एक पत्रिका निकाली। जब बाबा से पूछा गया कि आपने पत्रिका क्यों निकाली, तो उन्होंने बताया कि राजेन्द्र अवस्थी छापने के लिए 3 लाख रुपये माँग रहे थे, तो मैंने सोचा कि इतने में तो एक इस तरह की पत्रिका हम खुद निकाल सकते हैं।
(रामजी यादव से हुई बातचीत पर आधारित)
मदन कश्यप (कवि, संपादक- द पब्लिक एजेंडा)
एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो - रामजी यादव
सुनें-
![]() |
धर्मयुग ने स्वयं एक ज़माने में बहुत बड़े-बड़े लेखकों को एक बडा मंच दिया और वे लेखक मुख्य धारा के साहित्य में आये लेकिन आज शायद मुश्किल से ऐसे लोगों की गिनती की जा सकती है जो किसी ज़माने में धर्मयुग में छपते थे और हीरो हो जाते थे। आज उनकों हम नहीं जानते, किसी भी रुप में नहीं जानते। वे सारे दोयम दर्जे के कहानीकार-रचनाकार है जिनको दोहराना आज के सन्दर्भ में संभव नहीं है।
जहाँ तक कादम्बिनी की बात है, कादम्बिनी ने साहित्य के इतिहास में या समकालीन इतिहास में कोई मील का पत्थर रखा हो ऐसा कहना मुशिकल है और एक तरह से ज्यादती भी है क्योंकि उस पत्रिका की जो सीमायें थीं वह उसके सम्पादकों की भी अपनी सीमायें थीं। सम्पादक प्रायः नौकरियाँ करते थे और साहित्यकार थे इसलिये उन्होंने साहित्य को एक कैप्सूल की तरह अपने यहाँ से बेचने का काम किया।
एक ज़माने में इस कादिम्बनी में काफी साहित्यिक चीज़ें होती थीं, लोग समझते थे लेकिन जो भूमिका सामान्य जन के भीतर सरिता आदि ने निभाई, जैसे हिन्दू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास इत्यादि कालमों और दूसरे ऐसे अंधविश्वास विरोधी लेखों से समाज को जो रास्ता दिखाया, कादिम्बनी की ऐसी ज़गह कभी नहीं रही। कादिम्बनी मुख्यधारा से साहित्यकारों के प्रेम प्रसंगों, उनके कुछ चर्चित-कुचर्चित प्रसंगों और गैर ज़रूरी बहसों और साक्षात्कारों को छापती रही, जिसमें संवेदना में किसी किस्म का विचलन नहीं पैदा होता या विचार में किसी किस्म की दृढ़ता नहीं पैदा होती थी, लेकिन हम देखते हैं कि बाद में कादिम्बनी में आमूल-चूल परिवर्तन हुये, खासतौर पर विण्णु नागर के सम्पादकत्व में। जब इसको विष्णु नागर ने सम्पादित करना शुरू किया तो पहले तो इसका रूपाकार बदला। हम देखते हैं जिस तरह की सामग्री वह लगातार छापते रहे हैं, उस सामग्री में उस तरह की बात नहीं थी जिसे कहा जाये कि इन्होनें कोई नई बात कही है, वो बहुत पुरानी चीज़ें, बहुत पुरानी कहानियाँ, बहुत स्थापित किस्म के सेलिब्रिटीज और लेखक अभिनेता और गायक और दूसरे-दूसरे महफिलबाज़ किस्म के लोगों की आकांक्षाओं की पत्रिका रही है। इस पत्रिका का दाम तमाम लघुपत्रिकाओं के मुकाबले एक दुखदायी पक्ष रहा है। 25 या 30 रूपये दाम रखना भारत जैसे गरीब देश के, साधारण निम्नवर्गीय पाठक के साथ बड़ी ज्यादती है। चूँकि यह घराने की है और इसको पर्याप्त रूप से विज्ञापन भी मिलते हैं, इसके पास आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी बनी हुयी है तो यदि अपना सरोकार वो जनता और निम्न समाज से तय करती है तो उसे अपने दाम में कटौती कर देनी चाहिये और लगातार इस तरह की सामग्री देनी चाहिये जिससे कि लोगों को लगे कि कादिम्बनी पढ़ने से उनके विचारों में खूबी पैदा होगी या कादिम्बनी में ऐसी सूचना होगी जो दूसरी कहीं नहीं है या अभी तक नहीं मिली।
जहाँ तक उसके चलने या पढ़ने या बंद करने का सवाल है, इन हालात में उसके बंद होने से किसी को कोई हानि नहीं होगी और चलते रहने से किसी को कोई लाभ भी नहीं होगा। ये कहीं भी साहित्य के इतिहास में किसी मुकाम पर नहीं पहुँचती है। यह एक घराने की है और घराने के नौकर इसके संपादको की भूमिका निभाते हैं, जिनकी समझ बहुत कम है। इसलिये अगर लोगों का इरादा बिरला घराने, टाटा घराने या जैन-साहू घराने से या इस तरह से पैसे को लेकर है तो जैन साहू घराने, बिरला घराने को भी लोगों की आकांक्षओं का ध्यान रखना चाहिये, अगर वे नहीं रखते हैं तो उनकी पत्रिकाओं के बंद होने या चलने में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
मैं कभी इस तरह की पत्रिका नहीं पढता। दूर दराज़ के छोटे शहरों और बाकि जगहों से प्रतिबद्ध और सरोकारों वाली पत्रिकाएँ ही पढ़ने की जरुरत पड़ती है और मैं कादिम्बनी इसलिये भी नहीं पढ़ता क्योंकि इसमें मेरे पढने लायक कोई सामग्री नहीं होती।
ऐसा नहीं है की कोई मैं अपनेआप को महान या बौद्धिक लेखक समझता हूँ बल्कि एक ऐसे बेचैन युवक के रूप में अपने आप को देखता हूँ जिसे बहुत कुछ जानना है और साहित्य उसके लिये बड़ा माध्यम है। मुझे दिखता है कि एक भी सामग्री ऐसी नहीं है जिसको मैनें कादिम्बनी के माध्यम से देखा हो जबकि उसके अभी के सभी अंक देख चुका हूँ।
(शैलेश भारतवासी से हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰रामजी यादव (कवि-कथाकार, फिल्ममेकर, आलोचक)
कादम्बिनी एक टाइम-पास पत्रिका बनकर रह गई है- प्रमोद कुमार तिवारी
![]() |
अब हिन्दुस्तान समूह में मृणाल पाण्डेय के बाद शशि शेखर आये हैं। जब नया व्यक्ति आता है तो उसके अपने नये संस्कार होते हैं। लेकिन किसी चल रहे सिस्टम को समझने में वक्त तो लगता है। इनसे उम्मीदें हैं कि शायद कादम्बिनी फिर से अपना मुक़ाम हासिल करे। लेकिन इतनी जल्दी मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।
कादम्बिनी की अपनी एक सामाजिक उपयोगिता रही है। बहुत पुरानी पत्रिका है, जिसने सामाजिक जागरुकता फैलाने वाले कई स्तम्भ चलाये। एक समय में यह पत्रिका बाल पत्रिकाओं और गंभीर पत्रिकाओं की बीच की कड़ी थी। इसके वर्तमान रूप से मुझे निराशा हुई है, लेकिन हर पत्रिका का यह दौर आता है, मुझे लगता है कि यह परिस्थितियाँ बदल जायेंगी।
॰॰॰प्रमोद कुमार तिवारी (युवा लेखक व पत्रकार)
कादम्बिनी चर्चा करने लायक पत्रिका ही नहीं है- विमल चंद्र पाण्डेय
![]() |
॰॰॰विमल चंद्र पाण्डेय (नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हिन्दी युवा कहानीकार)
कादम्बिनी ने अपने ही पाठकों को ठेंगा दिखलाया है- गौरव सोलंकी
![]() |
॰॰॰गौरव सोलंकी (चर्चित युवा कहानीकार व कवि)
आज यानी 25 सितम्बर 2009 को हमें कुछ और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं।
कादम्बिनी पढ़ने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई- प्रियदर्शन
![]() |
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰प्रियदर्शन (वरिष्ठ पत्रकार)
कादम्बिनी को बंद करने की बात एक अतिरेकी कथन है- पंकज सिंह
![]() |
फिर भी किसी का ये कहना कि कादंबिनी जैसी पत्रिका को बंद हो जाना चाहिए, कोरी बकवास है। ये अतिरेकी कथन है। मैं तो कहता हूं कि हंस को बंद हो जाना चाहिए। हंस राजेंद्र यादव की मानसिक विकृतियों का आईना रहा है। पत्रिका सिर्फ संपादक की नहीं होती। कादंबिनी में हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे युवा कवि भी शामिल हैं। कादंबिनी में लिखने वाले हंस में लिखने वालों से बेहतर हैं। ये हो सकता है कि पढ़नेवालों को कादंबिनी से अपेक्षाएं ज़्यादा हों।
मैंने नागपुर के पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में युवाओं के बड़े समूह का नेतृत्व किया था। कादंबिनी ने फोटो के साथ इंटरव्यू छापा था। विष्णु नागर ने भी कुछ कविताएं छापीं, फिर पति-पत्नी का संयुक्त लेख भी छपा। नियमित लेखक कभी नहीं रहा, पाठक अभी भी हूं। मेरे अनुसार जीवन में सिर्फ साहित्य ही महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने बीए किया इतिहास में, जेएनयू से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया, साहित्य से जुड़ाव भी है। मतलब, कादंबिनी ज़िंदगी के पूरे विस्तार को समेटने की कोशिश करती है, तो ये सराहनीय कदम है। वर्तमान संपादक ने कम से कम कोई क्षरण किया हो, ऐसा नहीं लगता।
(निखिल आनंद गिरि से टेलीफोन पर हुई बातचीत पर आधारित)
॰॰॰पंकज सिंह (कवि, आलोचक)
जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसका तो सम्मान करें- पूर्णिमा वर्मन
![]() |
इस प्रकार के लेख प्रकाशित करने वाली हिंदी पत्रिका का प्रकाशित होना हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने वालों के लिए कलंक की बात है। हम जैसे लोग जो दिन-रात विदेशों में हिन्दी के प्रसार के लिए प्रयत्न कर रहे हैं भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ऐसा कुछ देखें तो दिल टूटना स्वाभाविक ही है। एक समय था जब घर में इसकी प्रतियाँ डाइजेस्ट की तरह संभाल कर रखी जाती थीं। सब पुरानी पत्रिकाएँ अखबारों के साथ रद्दी में बिकती थीं लेकिन यह नहीं बेची जाती थी। रुपरंग बदलना स्वाभाविक है लेकिन जिस भाषा में पत्रकारिता कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति सम्मान तो होना चाहिए।
कुल मिलाकर यह कि गलती पत्रिका की नहीं क्लास की है। बिजनेस क्लास का टिकट लिया तो भुगतना तो था ही। आराम से इकोनॉमी में बैठती। वहाँ एअर होस्टेस पत्रिकाओं के लिए परेशान नहीं करती। दो घंटे सोती और चैन से घर पहुँचती।
(ईमेल द्वारा प्राप्त)
॰॰॰पूर्णिमा वर्मन (बहुतचर्चित ऑनलाइन हिन्दी पत्रिकाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति की संपादिका)
~पढ़ें और अपने मित्रों को पढ़ायें। यह परिचर्चा ईमेल से अपने मित्रों को भेजें~











मार्कण्डेय