Saturday, March 13, 2010

तलाश-भारत के महानायक की

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसने देश की आजादी में सराहनीय योगदान किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके नेताओं की भूमिका को राष्ट्र नकार नहीं सकता। आज कांग्रेस पार्टी अपना 125 वॉ जन्म वर्ष मना रही है। 1885 में कांग्रेस का जन्म हुआ, जिसके संस्थापक ए0ओ0 ह्यूम जो एक रिटायर्ड अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी थे तथा प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष डब्लू0सी0 बनर्जी हुए। ए0ओ0 ह्यूम, डब्लू सी0 बनर्जी से लेकर सोनियां गॉधी तक कांग्रेस पार्टी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 1885 से लेकर 1905 तक लगातार 20 वर्षों तक कांग्रेस में उदारवादी गुट का प्रभाव रहा, जिसके प्रमुख नेता दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, फिरोज शाह मेहता, गोविन्द राना डे, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय थे। 1905 से 1919 के मध्य नव राष्ट्रवाद तथा गरम पंथियों का उदय हुआ जिसके प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) तथा अरविन्द घोष प्रमुख थे। लाल-बाल-पाल तथा अरविन्द्र घोष के प्रयासों के कारण प्रथम बार 1905 में कांग्रेस के बनारस राष्ट्रीय अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में स्वदेश तथा 1906 के कलकत्ता राष्ट्रीय अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में पहली बार स्वराज की मांग रखी गयी।
स्वतन्त्र भारत पर सबसे अधिक शासन करने वाले उक्त राजनैतिक दल का चारित्रिक पतन देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रारम्भ हुआ। किसी समय
लेखक
राघवेन्द्र सिंह
117/के/145 अम्बेडकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
फोन नं- 9415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)
email: raghvendrasingh36@yahoo.com
ईमानदारी से कार्य एवं सभी को साथ ले चलने वाली कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद अचानक एक परिवार की पार्टी होती चली गयी। उनके साथ काम करने वाले राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थों के चलते एक परिवार के आधीन होते चले गये। जाने-अन्जाने पूरी पार्टी जो किसी समय स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य किरदार थी स्वयं परातन्त्र हो गयी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस विषय पर आपत्तियॉ भी की, परन्तु उनके स्वर नक्कार खाने में तूते की आवाज बनकर रह गये। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी सोनियॉ गांधी की इतालवी अंदाज के हिन्दी भाषणों एवं राहुल गांधी के टोटकों की पार्टी बनकर रह गयी। उक्त राज कुमार कभी दलित के घर में भोजन करते है तो कभी उनके बच्चे को गोंद में उठाकर पुचकारते, कभी उनके यहॉ रात बिताते है तो कभी ए0टी0एम0 से लाइन में लगकर पैसे निकालने से लेकर मैट्रो ट्रेन में सफर कर व्यवहारिक जनसमर्थन हासिल करने का प्रयास करते है। क्या उक्त सभी सामाजिक पैतरेबाजी एवं उनकी कारगुजारियां राजनैतिक जनसमर्थन की तरफ किंचित मात्र भी इंगित नहीं करती? क्या कभी किसी ने उनसे यह पूछने का प्रयास किया है, कि केन्द्र में आपकी ही सरकार है देश में आतंकवादी व्यक्तियों का जीवन छीन रहे है, बढ़ी हुयी प्रयोजित महंगाई सभी पायदान लांघ गरीब के मुह से निवाले हडपने पर आमादा है, अफजल गुरू जैसा कुख्यात आतंकी को आपकी पार्टी ने जिन्दा रख छोड़ा है तथा भारत की नेपाल, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सीमाए पूरी तरह असुरक्षित है। नकली नोट एवं हथियारों के साथ आतंकी उक्त सीमाओं से भारत में प्रवेश कर आतंकी गतिविधियों में संलग्न हैं क्या कभी किसी ने उनसे प्रश्न किया महाराष्ट्र में आपकी सरकार है आप वहॉ की मुख्य भूमिका में है आपकी सहयोगी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उत्तर भारतीयों के साथ गैर मानवीय हरकते क्यों कर रही है। उन्हे महाराष्ट्र प्रदेश छोड़ने को क्यों मजबूर किया जा रहा है। क्या किसी पत्रकार मित्र ने राहुल गॉधी से यह जानने का प्रयास किया वर्ष 2007-08 में आपकी सरकार में गेंहू का समर्थन मूल्य 8.50 पैसे था, उसी समय विदेशों से 14.82 पैसे की दर से गेंहू क्यों आयात किया गया, वर्ष 2009-10 जब हमारे देश में आटा रू0 20/- प्रति किलों की दर से बिक रहा था तो सरकार ने 12.51 पैसे की दर से गेंहू क्यों विदशों में बेचा। वर्ष 2008-09 में गन्ने की सामान्य पैदावार के बावजूद सरकार ने 48 लाख टन चीनी विदेशों में रू0 12.50 प्रति किलो की दर से पहले बेची उसके बाद उक्त निर्यात से आयी किल्लत के कारण रू0 42.00 प्रति किलों की दर से चीनी आयात की। क्या उक्त कुछ आयात-निर्यात के आर्थिक खेल देश की बढ़ी हुयी महंगाई का कारण नहीं प्रतीत होते। क्या किसी ने उनसे यह पूछने की हिम्मत की देश मंे मजहब के आधार पर सर्वेक्षण कराने का कार्य आपकी पार्टी ने क्यों किया। क्या सच्चर कमेटी से रिपोर्ट बनवा ऐसा नही किया गया जैसा लगभग 90 वर्षो पहले अंग्रेजो ने मुस्लिम लीग को शह देकर करवाया था। रंगनाथ मिश्र आयोग बनवा अलग आरक्षण की मांग क्यांे उठवायी गयी। क्या मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग किसी जिम्मेदार मुस्लिम नेता या संगठन ने की थी। देश का प्रधान मंत्री बनने को बेताब उक्त राजकुमार अपनी एयर कंडीशन्ड गाड़ी से घूम, फाइव स्टार होटलों का भोजन गरीब को झोपडी में कर यह जताने का प्रयास कर रहे है कि वे समाज से घुले मिले है। दुर्भाग्य की बात है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्तम्भ पत्रकार बन्धु भी उनके अंदाजों को महिमा मंडित कहने में नही चूकते हैं।
राहुल गॉधी की स्पष्ट एवं आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने एवं देखने को मिलते हैं। समाज का व्यक्ति अन्जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्यम बनता जा रहा है, राजकुमार की छोटे-छोटे विषयों की स्पष्टवादिता समाज का भावनात्मक शोषण कर रही है। वे इतने ही आदर्शवादी है तो बताये आज देश विभिन्न ज्वलन्त समस्याओं से गुजर रहा है। आतंकवादी, महंगाई सरीखे विषय मानव को सशरीर निगल जाने को आमादा है। देश का शायद ही ऐसा कोई भाग हो जहॉ अमन चैन कायम हो। इसके अतिरिक्त देश में और भी कई ऐसे विषय है जिनकी जवाब देही से वे बच नहीं सकते। कहने को तो वे कह सकते है मैं प्रधानमंत्री नहीं हूँ आदि-आदि परन्तु पूरा देश जनता है मनमोहन राज किसके सामने दण्डवत है।
सिर्फ अभी मैं प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हूँ ! या इसी प्रकार के कुछ जुमलों से व्यक्ति स्पष्टवादी दिखने लगे तो यह न्यायोचित नहीं लगता। वे भली प्रकार जानते है उनके पास जो उपनाम की ताकत है, वही उन्हें अनिवार्य एवं अपरिहार्य बनाए हुए है जो कभी जाने वाली नहीं, अतः कांग्रेस पार्टी में उनका सर्वोच्च आसन सुरक्षित हैं वे कुछ भी बोले उससे उनकी विशिष्टता कम होने वाली नही। अतः वे भावनात्म्क कृत्यों एवं बयानो की खुली बाजीगरी कर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास कर रहे है। राहुल जी का यदि आप परिवारवाद विरोध देखें जो सिर्फ उनके बयानों तक ही सीमित हैं उनकी कथनी एवं करनी में जमीन आसमान का अन्तर है। राहुल के खास सिपहसालारों में मिलिंद देवडा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, कनिष्क इधर है क्या वे वंशवाद की श्रेणी में नहीं है, गरीबों के घर में गरीबी देखने वाले राहुल बाबा बयान देते है अगर 1992 में गॉधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न टूटती इस वक्तव्य से सीधे तौर पर यह कहने का प्रयास करते है कांग्रेस पार्टी की हिफाजत एवं देश पर शासन करने की माद्दा शिर्फ गांधी परिवार के पास ही है। क्या उक्त बयान उनके शातिर दिमाग एवं परिवारवाद की तरफ इंगित नहीं करता। एक तरफ वे स्वयं सहित परिवारवाद के विरोधी एवं दूसरी तरफ स्वयं, मित्रों एवं बयानों के आधार पर परिवारवाद के पोषक दोनों ही भूमिका बाखूबी नहीं निभा रहे है वे। यदि उनकी 1992 वाली घटना मान भी ली जाये कि यदि उनके परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो विवादित स्थल न टूटता तो 1984 के सिक्खों के कत्ले-आम के विषय में वे क्या कहेगें उस समय तो उनके परिवार का ही प्रधानमंत्री था। हमारे देश के युवराज राहुल गॉधी योग्य एवं सफल राजनेताओं की बात करते है। तो वे यह भूल जाते है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही इनके रक्त सम्बन्धियों के अलावा भी योग्य एवे राष्ट्र भक्त राजनेता हुए है। लेकिन इनकी वैचारिक शक्ति शिर्फ अपने पिता श्री राजीव गांधी, माता श्रीमती सोनिया गांधी, दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा पर नाना श्री जवाहर लाल नेहरू ही देख सकती है। अन्य के चर्चें वे भूल कर के भी नहीं करते। फिर भी स्वयं को परिवारवाद के विरोधी के रूप में स्थापित करने पर आमदा है राहुल बाबा।
वास्तविकता तो यह है देश की गरीब एवं भावनाप्रधान जनता के साथ राहुल गांधी भावात्मक खेल बाखूबी खेल रहे हैं, वे राष्ट्रीय हित के विषयों पर न जाकर अपनी हल्की फुल्की गतिविधियों से भोली भाली जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे है। उनके रास्ते पूर्व कांग्रेसी नेताओं से भिन्न हो सकते है परन्तु मंजिल एक है। देश का प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले वे यह भूल गये देश को एक ऐसे लौह पुरूष की तलाश है जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरो सके, उनके हितो की रक्षा कर सके, अमेरिका जैसी ताकत को जवाब दे सके, चीन जैसे रंग बदलने वाले गिरगिट को दुरूस्त रख सके तथा पाकिस्तान जैसे बिगडैल को सबक सिखा सके। देश का नहीं चाहिए जो उपनाम की ताकत के माध्यम से देश के सर्वोच्च राजनैतिक आसन पर आसीन होना चाहता हो, उसे तालाश है ऐसे महानायक की जो सही मायने में देश को गति दे सके, साम्प्रदायिक सद्भावना रख सकें, महंगाई पर काबू, आतंकवाद पर लगाम तथा आतंकियो को दण्डित कर सके।

--राघवेन्द्र सिंह

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

बैठकबाज का कहना है :

aniruddha का कहना है कि -

आपने लेख तो अच्छा लिखा है लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि हमारे पास कांग्रेस का जो विकल्प है वो कहीं ज्यादा भयावह है. जिस दल का आधार ही संकीर्णता और ओछापन हो उसे बागडोर देने से अच्छा है कि कांग्रेस को ही दे दें क्योंकि कम से कम कुछ अच्छे और समझदार नेता तो कांग्रेस के पास हैं. दूसरे दल तो भूखों के दल हैं और वैचारिक स्तर पर सभी दीवालिये हैं. आज देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के पास एक भी समझदार नेता नहीं है, सरकार में सिर्फ भाषणों कि ही नहीं अक्ल की भी ज़रुरत होती है जो इनके पास तो नहीं दिखाईदेती.

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)