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Wednesday, July 21, 2010

कॉमनवेल्थ का काम कभी खत्म होगा क्या?


कॉमनवेल्थ गेम्स सर पर हैं पर अभी तक कईं परियोजनायें पूरी नहीं हो पाई हैं। कई परियोजनाओं का तो ये आलम है कि ये खेलों के बाद ही पूरी हो पायेंगी। २००३ में दिल्ली को खेलों की मेजबानी सौंपी गई थी। उसके बाद से दिल्ली में मेट्रो, फ्लाईओवरों का काम तो तेजी से हुआ लेकिन बाकि सब पीछे छूट गया। बुनियादी जरूरतें जैसे बिजली, पानी, सीवर, नाले ये सब पीछे रह गये। फुटपाथ का काम अभी जारी है। मुख्यमंत्री ने दस अगस्त तक सड़कों पर से मलबा हटाने को कह दिया है। बारिश का मौसम आ गया है तो जाहिर तौर से रूकावटें भी आती रहेंगी। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि सात साल मिलने के बावजूद हमारे नेता व सरकार कुछ कर क्यों नहीं पाई।

पिछले दिनों बारिश हुई तो नगर निगम के हिसाब से नालों की सफ़ाई करवाई जा चुकी है और जहाँ-जहाँ पानी भरा है वो उनके अंतर्गत नहीं आती हैं। इसका क्या मतलब हुआ? कितनी एजेंसियाँ सड़क निर्माण में जुटी हुई हैं? नगर निगम के अलावा पी.डब्ल्यू.डी, डी.एम.आर.सी (मेट्रो), राईट्स (RITES) और एन.डी.एम.सी (NDMC) सब जुटी हुई हैं दिल्ली को बुनियादी सुविधायें देने व सौंदर्यीकरण के लिये। आइये जानते हैं कि इन विभागों व एजेंसियों के क्या क्या काम हैं। लोक निर्माण विभाग यानि पी.डब्ल्यू.डी दिल्ली सरकार का ही एक विभाग है जिसके पास सड़क,फ्लाईऑवर निर्माण, फुटपाथ, अस्पताल, स्कूल कॉलेज व सबवे इत्यादि के निर्माण के कार्य आते हैं। यानि निर्माण जो हमें दिल्ली की सड़कों पर नजर आता है वो दिल्ली सरकार के विभाग करते हैं। जो सड़क दिल्ली मेट्रो के आस-पास आती हैं उनका निर्माण उसी विभाग को करना होता है। इसी तरह एक और कम्पनी है RITES| ये भारत सरकार के अंतर्गत आने वाली कम्पनी है जिसकी शुरुआत १९७४ में हुई थी। अभी हाल ही में खबर आई थी कि बीआरटी कॉरीडॉर पर इस कम्पनी ने पिछले वर्ष ही फुटपाथ बनवाया वो नगर निगम ने इसी माह में पाईपलाईन डालने के लिये तुड़वा दिया। यानि एक एजेंसी काम करवाती है दूसरी बिगाड़ती है। इतने विभाग हैं तो तालमेल कैसे बैठाया जाये। हर कोई चाहेगा कि काम कम किया जाये और वाह-वाही अधिक हो।

अब आप समझ ही गये होंगे कि राष्ट्रकुल खेलों का काम समय पर खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है। जब कुछ काम समय पर पूरा होता है तो ये सरकारी विभाग श्रेय लेने के लिये आगे आ जाते हैं। विकास के नाम पर नगर निगम और राज्य सरकार दोनों अपना अपना "विकास" कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि दिल्ली फ़्लाईऑवरों व पुलों के जाल में ही फ़ँसी रह गई है जबकि बुनियादी सुविधायें पीछे छूट गईं हैं। लगभग सभी अंडरपास में बारिश के दिनों में जलभराव की शिकायतें आती हैं। क्या निकासी का कोई प्रावधान नहीं किया गया? इतने पुल बनाये गये पर यातायात की परेशानी अभी तक है।
किसी राज्य के लिये निगम और सरकार दोनों को अलग करने की क्या आवश्यकता है? क्या मात्र सरकार के रहते ही यह काम नहीं हो सकता? दिक्कत तब बढ़ जाती है जब नगर निगम और सरकार में दो अलग पार्टियों का कब्जा हो, जैसा कि दिल्ली में है। यहाँ सरकार है कांग्रेस की और नगर निगम में भाजपा काबिज है। इस परिस्थिति में दिल्ली का उत्थान कैसे हो सकता है? कांग्रेस १२ सालों से पैसा खा रही है तो भाजपा सरकार में न होने की भरपाई कर रही है।

कोई सड़क मेट्रो की, कोई पीडब्ल्यू.डी, कोई RITES तो कोई नगर निगम की और कोई एन.डी.एम.सी। किसको शिकायत करें? निगम पार्षद के पास जायें या विधायक के पास इसी में उलझा रहता है आम आदमी। जनता आस लगाये बैठी रहती है कि उसका दिया हुआ टैक्स शायद किसी काम आ सके लेकिन उन पैसों की बरबादी करने में अव्वल हैं ये सरकारी विभाग व एजेंसियाँ।

खेल आयेंगे और १० दिन में चले भी जायेंगे पीछे रह जायेंगी परियोजनायें, जनता की इच्छायें, बुनियादी सुविधायें, हर विभाग व नेता ठोकेंगे के अपनी पीठ कि उन्होंने भारत व दिल्ली को दुनिया में रोशन किया। पर अँधेरे में खो जायेंगी गरीब आदमी की आस। इतनी बढ़ती महँगाई में शायद ये खेल उन्हें रहने को घर, पहनने को कपड़ा और खाने को रोटी दे जायें....

तपन शर्मा

Thursday, September 03, 2009

ये दिल्ली है मेरे यार...


हाल ही में एक घटना घटी जब कुछ लोग एक लड़की को छेड़ रहे थे तब एक बुजुर्ग ने बीच-बचाव का प्रयास किया। नतीजा..जान से हाथ धोना पड़ा। हमलावर फ़रार।
बस इश्क मोहब्बत प्यार...
दिल्ली की रिंग रोड। कोई ऐसा समय नहीं जब वाहन सरपट न दौड़ रहे हों। चौबीसों घंटे जाम। एक स्कॉर्पियो आती है, महिला को टक्कर मारकर निकल जाती है। उसके बाद एक के बाद एक, दो-तीन नहीं बल्कि १५ से अधिक गाड़ियाँ उस महिला के ऊपर से गुजरती हैं। रौंगटे खड़े हो जाते हैं लेकिन वीडियो बनाने वाले बनाते रहते हैं और फिर एक चौबीसों घंटे वाले न्यूज़ चैनल की एक घंटे की खबर बनती है। एक कहावत थी-दिल्ली दिल वालों की। थी इसलिये कहा क्योंकि ऐसा कहीं लगता नहीं। हर रो़ज़ बुजुर्ग दम्पत्तियों व महिलाओं पर हमले इस कहावत को निरर्थक साबित करते हैं। ये दुर्घटनायें बताती हैं कि दिल्ली-६ के का गाना दिल्ली की "झूठी" तस्वीर दिखाता है।

अगले वर्ष दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। हर ओर इसकी तैयारियाँ चल रही हैं। अभी पिछले दिनों दिल्ली में बारिश हुई। एक तो ये मौसम विभाग कमाल का है-जब बारिश नहीं होनी होती तब कहता है मानसून आ गया है। खैर विभाग की बात बाद में। पहले बारिश की। मूसलाधार बारिश हुई। ऐसा नहीं कि पिछले वर्षों में ऐसी बारिश न हुई हो। पर पता नहीं क्यों आठ बजे नोएडा से निकला हुआ मैं जब रात को १२ बजे पीतमपुरा आता हूँ तो अपने आपको खुशनसीब समझता हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं था जो बारिश होने पर दो घंटे का सफ़र छह घंटे में पूरा करते हैं। दिल्ली की सड़कों व ट्रैफ़िक की ऐसी बुरी हालत मैंने कभी नहीं देखी। ये दिल्ली है। जो दिल्लीवासियों को सम्भाल नहीं पा रही, वो अगले साल अक्टूबर में १.५ से दो लाख पर्यटकों को कैसे सम्भालेगी? लगता है घर से ही काम करना पड़ेगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री कहती हैं कि यातायात में सुधार नहीं हो सकता,जाम तो लगेंगे ही। मतलब उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिये। गौरतलब है कि दिल्ली में हर वर्ष औसतन पाँच लाख लोग नये आते हैं। पर शायद ये हाल कमोबेश हर मेट्रो शहरों का होगा। कुछ वर्ष पहले शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली में बाहरी लोग आते रहते हैं और जाते नहीं जिससे व्यवस्था पर असर होता। उनका इशारा यू.पी व बिहार से था। शीला जी ने यह कहते हुए कतई नहीं सोचा कि वे खुद "बाहरी" हैं। तथ्य यही है कि दिल्ली में रहने वाला हर परिवार बाहर से ही आया है। जब से दिल्ली राजधानी बनी है शायद तभी से लोगों ने इसे घर बनाना शुरु किया। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी कोई हरियाणा, यूपी से आया, कोई पाकिस्तान से तो कोई बिहार से काम खोजने आया।

दिल्ली के न लोग अपने और नही यहाँ के साधन। मसलन न पूरी बिजली यहाँ बनती न ही पानी यहाँ का। बिजली के लिये कभी पंजाब से गिड़गिड़ाते हैं तो कभी पानी के लिये यूपी व हरियाणा से। बिजली पानी की ऐसी कमी है कि दिल्ली अब अधिक बोझ नहीं उठा सकती। पानी की किल्लत से हारकर शीला जी कहती हैं कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक पानी नहीं मिल सकता। और बारिश होती है तो लोगों को मिलता है सिर्फ़ जाम। जाम से याद आया एक और "जाम"। शीला सरकार हर पेट्रोल पम्प व मॉल में "जाम" उपलब्ध करवाने जा रही है। कॉमनवेल्थ खेल आने वाले हैं। पर्यटकों के लिये सुविधा हो जायेगी और कमाई अलग से। मतलब दिल्ली वासियों को हमेशा "जाम" मिल सकेगा। पानी न सही "जाम" ही सही। पर फिलहाल तो ट्रैफ़िक का जाम ही मिल पा रहा है। ऐसा नहीं कि पानी की कमी अभी हुई है। दक्षिणी दिल्ली-दिल्ली का सबसे पॉश इलाका। यहाँ न बिजली है न ही पानी। महरौली का प्रसिद्ध है कुतुब मीनार। पर पिछले दिनों दिल्ली में बातें हो रहीं थीं कि महरौली में आठ दिनों में एक बार पानी आता है। ये है दिल्ली का हाल। बिजली की कटौती कईं घंटों तक होती है। और ये तब भी हुआ करती थी जब मॉनसून सामान्य रहा करता था। अब तो मौसम भी दिल्ली का नहीं रहा।

आखिर दिल्ली का है कौन? न लोग, न मौसम, न यहाँ बिजली है, न पानी है..फिर भी इस देश की राजधानी है। जिसके पास कोई साधन नहीं, कोई संसाधन नहीं। ट्रैफ़िक झेल पायें ऐसी सड़कें नहीं। क्या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ राष्ट्रपति का निवास है। या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ से देश चलाया जाता है। आप बतायें.. क्या लाश पर पंद्रह बार गाड़ियाँ चलाने वाली "दिल वालों" की दिल्ली को देश की राजधानी कहलाये जाने का हक़ है?

तपन शर्मा