Showing posts with label raghavendra singh. Show all posts
Showing posts with label raghavendra singh. Show all posts

Tuesday, October 26, 2010

चीन के द्वारा भारत की घेराबंदी

वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्‍तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती-जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्ष 2009 के प्रारम्‍भ में लगभग 100 के निकट इसी प्रकार की घटनायें हुई इसके बाद भारत सरकार ने हिमालयी रिपोर्टिंग, भारतीय प्रेस पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया। आज देश के समाचार पत्रों एवं इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया को सूचनायें मिलना बन्‍द हैं। क्‍या उक्‍त प्रतिबन्‍ध से घुसपैठ समाप्‍त हो गयी या कोई कमी आयी। इस प्रतिबन्‍ध से चीन के ही हित सुरक्षित हुये तथा उनके मनमाफिक हुआ। जरा हम चीन के भारत के प्रति माँगों की सूची पर गौर करें - वह चाहता है अरुणाचल प्रदेश उसे सौंप दिया जाये तथा दलाईलामा को चीन वापस भेज दिया जाये। वह लद्‌दाख में जबरन कब्‍जा किये गये भू-भाग को अपने पास रखना चाहता है तथा वह चाहता है। भारत अमेरिका से कोई सम्‍बन्‍ध न रखे इसके साथ-साथ चीन 1990 के पूरे दशक अपनी सरकारी पत्रिका ‘‘पेइचिंग रिव्‍यू'' में जम्‍मू कश्‍मीर को हमेशा भारत के नक्‍शे के बाहर दर्शाता रहा तथा पाक अधिकृत कश्‍मीर में सड़क तथा रेलवे लाइन बिछाता रहा। बात यही समाप्‍त नहीं होती कुछ दिनों पहले एक बेवसाइट में चीन के एक थिंक टैंक ने उन्‍हें सलाह दी थी कि भारत को तीस टुकड़ों में बाँट देना चाहिये। उसके अनुसार भारत कभी एक राष्‍ट्र रहा ही नहीं। इसके अतिरिक्‍त चीन भारत पर लगातार अनावश्‍यक दबाव बनाये रखना चाहता है। वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्‍थाई सदस्‍यता पाने की मुहिम का विरोध करता है तो विश्‍व बैंक और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष में अरुणाचल प्रदेश की विकास परियोजनाओं के लिये कर्ज लिये जाने में मुश्‍किलें खड़ी करता है। इसके साथ-साथ तिब्‍बत में सैन्‍य अड्‌डा बनाने सहित अनेक गतिविधियाँ उसके दूषित मंसूबे स्‍पष्‍ट दर्शाती हैं।

आज से लगभग 100 वर्षों पूर्व किसी को भी भास तक नहीं रहा होगा, वैश्‍विक मंच पर भारत तथा चीन इतनी बड़ी शक्‍ति बन कर उभरेंगे। उस समय ब्रिटिश साम्राज्‍य ढलान पर था तथा जापान, जर्मनी तथा अमेरिका अपनी ताकत बढ़ाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे थे। नये-नये ऐतिहासिक परिवर्तन जोरों पर थे। आज उन सबको पीछे छोड़ चीन अत्‍यधिक धनवान तथा ताकतवर राष्‍ट्र बनकर उभरा है। कुछ विद्वानों का मत है चीन अनुमानित समय से पहले अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। भारत भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ लोकतंत्र को सीढ़ी बना अपनी चहुमुखी प्रगति की ओर अग्रसर है। चीन अपने उत्‍पादन तथा भारत सेवा के क्षेत्र में विश्‍व पटल पर अपनी उपस्‍थिति अग्रणी भूमिका के रूप में बनाये हुए है। यह बात सत्‍य है कि चीन भारत के मुकाबले अपनी सैन्‍य क्षमता में लगभग दोगुना धन खर्च कर रहा है। अतः उसकी ताकत भी भारत के मुकाबले दोगुनी अधिक है। उसकी परमाणु क्षमता भी भारत से कहीं अधिक है। इन सबके साथ यह भी सत्‍य है कि चीन की सीमा अगल-अलग 14 देशों से घिरी है अतः वह अपनी पूरी ताकत का उपयोग भारत के खिलाफ आजमाने में कई बार सोचेगा। परन्‍तु चीन की उक्‍त बढ़ती हुई सैन्‍य एवं मारक शक्‍ति भारत के लिए चिन्‍तनीय अवश्‍य है।

एक तरफ चीन अपनी जी.डी.पी. से कई गुना रफ्‍तार से रक्षा बजट में खर्च कर रहा है वहीं वह अपने रेशम मार्ग जहाँ से सदियों पहले रेशम जाया करता था, पुनः चालू करना चाहता है। वह अफगानिस्‍तान, ईरान, ईराक और सउदी अरब तक अपनी छमता बढ़ाना चाहता है। निश्‍चित ही वह वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने हित में करना चाहता है। जिसके उक्‍त कार्य में निश्‍चित ही पाकिस्‍तान की भूमिका महत्‍वपूर्ण रहने वाली है। देखना यह है कि उसकी यह सोच कहाँ तक कारगर रहती है।
चीन महाशक्‍ति बनने की जुगत में है, जिससे भारत को चिन्‍तित होना लाजमी है, उसकी ताकत निश्‍चित ही भारत को हानि पहुँचाएगी। लगातार चीनी सेना नई शक्‍तियों से लैस हो रही है। पाकिस्‍तान तथा बांग्‍लादेश में समुद्र के अन्‍दर अपने अड्‌डे बनाकर वह अपनी भारत के प्रति दूषित मानसिकता दर्शा रहा हैं। वर्ष 2008 में चीन पाकिस्‍तान में दो परमाणु रिएक्‍टरों की स्‍थापना को सहमत हो गया था। जिसका क्रियान्‍वयन होने को है।

हमारे नीति निर्धारकों को उक्‍त विषय की पूरी जानकारी भी है। परन्‍तु फिर भी वे एकतरफा प्‍यार की पैंगे बढ़ाते हुए सोच रहे हैं। कि एक दिन चीन उनपर मोहित हो जाएगा, तथा अपनी भारत विरोधी गतिविधियाँ समाप्‍त कर देगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का वैश्‍विक मंच पर कहना अन्‍तर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार की दुनिया में चीन हमारा सबसे महत्‍वपूर्ण सहोदर है तथा भारतीय विदेशमंत्री का कहना तिब्‍बत चीन का अंग है। उचित प्रतीत नहीं होता। उक्‍त दोनों बयान भारत को विभिन्‍न आयामों पर हानि पहुँचाने वाले प्रतीत होते हैं। चाणक्‍य तथा विदुर के देश के राजनेता शायद यह भूल गये कि राष्‍ट्र की कोई भी नीति भावनाओं से नहीं चलती। अलग-अलग विषयों पर भिन्‍न-भिन्‍न योजनाएँ लागू होती हैं। परन्‍तु भावनाओं का स्‍थान किसी भी योजना का भाग नहीं है। आज भारत को चीन से चौकन्‍ना रहने की आवश्‍यकता है। उसे भी कूटनीति द्वारा अपनी आगामी योजना बनानी चाहिए। उसे चाहिए चीन की अराजकता से आजिज देश उसके विषय में क्‍या सोच रहे हैं। उसके नीतिगत विकल्‍प क्‍या हैं ? भारत को अमेरिका के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया के महत्‍वपूर्ण देशों के साथ खुली बात-चीत करनी चाहिए। चीन का स्‍पष्‍ट मानना है कि भारत में कई प्रकार के आंतरिक विवाद चल रहे हैं चाहे वह अंतर्कलह हो, आतंकवाद हो या साम्‍प्रदायिक खींच-तान। भारत क्षेत्रीय विषयों पर भी बुरी तरह बटा हुआ है। चीन उक्‍त नस्‍लीय विभाजन का लाभ देश को बाटने के लिए कर सकता है। वहाँ के दूषित योजनाकारों के अनुसार प्रांतीय स्‍तर पर अलग-अलग तरीके से क्षेत्रीय वैमनस्‍यता एवं विवादों को भड़का भारत का विभाजन आसानी से किया जा सकता है।
निश्‍चित रूप से आगे आने वाले वर्ष भारत के लिए काफी मुश्‍किलों भरे हो सकते हैं। वर्ष 2011 के बाद पश्‍चिमी सेना काबुल से निकल जाएगी। इसके बाद बीजिंग-इस्‍लामाबाद-काबुल का गठबंधन भारत के लिए मुश्‍किलें खड़ी करेगा। चीन नेपाल के माओवादियों को लगातार खुली मदद कर रहा है। वहाँ की सरकार बनवाने के प्रयासों में उसकी दखलंदाजी जग जाहिर है। पाकिस्‍तान भारत में नकली नोट, मादक पदार्थ, हथियार आदि भेज भारत को अंदर से नुक्‍सान पहुँचाने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसकी आतंकी गतिविधियाँ लगातार जारी हैं। भारत चीन के साथ व्‍यापार कर चीन को ही अधिक लाभ पहुँचा रहा है। वहाँ के सामानों ने भारतीय निर्माण उद्योग को बुरी तरह कुचल डाला है। यदि आगे आनेवाले समय में भारत सरकार चीनी उत्‍पादनों पर पर्याप्‍त सेल्‍स ड्‌यूटी या इसी प्रकार की अन्‍य व्‍यवस्‍था नहीं करती है तो भारत का निर्माण उद्योग पूरी तरह टूट कर समाप्‍त हो जाएगा। इसे भी चीन का भारत को हानि पहुँचाने का भाग माना जा सकता है।

भारत को चाहिए 4,054 किलोमीटर सरहदीय सीमा की ऐसी चाक-चौबन्‍द व्‍यवस्‍था करें कि परिंदा भी पर न मार सके। इसके साथ-साथ देश के राज्‍यीय राजनैतिक शक्‍तियों को अपने-अपने प्रान्‍तों को व्‍यवस्‍थित करने की अति आवश्‍यकता है। जिससे वह किसी भी सूरत में भारत की आंतरिक कमजोरी का लाभ न ले सके। देश की सरकार को जल, थल तथा वायु सैन्‍य व्‍यवस्‍थाओं को और अधिक ताकतवर बनाना चाहिए। जिससे चीन भारत पर सीधे आक्रमण करने के बारे में सौ बार विचार करे। 1954 के हिन्‍दी-चीनी भाई-भाई तथा वर्तमान चिन्‍डिया के लुभावने नारों के मध्‍य चीन ने 1962 के साथ-साथ कई दंश भारत को दिये हैं। भारत को आज सुई की नोक भर उस पर विश्‍वास नहीं करना चाहिए। चीन जैसे छली राष्‍ट्र के साथ विश्‍वास करना निश्‍चित ही आत्‍मघाती होगा। हमें अपनी पूरी ऊर्जा राष्‍ट्र को मजबूत एवं सैन्‍य शक्‍ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

लेखक- राघवेन्‍द्र सिंह

Saturday, June 05, 2010

तलाश एक सच्चे राजनैतिक दल की

राष्‍ट्र की मुख्‍य भूमिका वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी दूसरी पारी की प्रथम वर्षगाँठ मनाई। इस प्रकार डॉ0 मनमोहन सिंह जी लगातार प्रधानमंत्री पद पर सातवें वर्ष में प्रवेश कर पिछले 25 वर्षों में इस पद पर सबसे लम्‍बे समय तक रहने वाले प्रथम प्रधानमंत्री बन गये। जो व्‍यक्‍ति कांग्रेस में नेहरू गाँधी परिवार में पैदा न हुआ हो और उक्‍त पार्टी की मुख्‍य भूमिका के द्वारा इतने लम्‍बे समय तक देश के प्रधानमंत्री पद का निर्वाह किया हो, यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्‍धि है। यदि हम यूपीए भाग-2 के प्रथम वर्ष का सिंहावलोकन करें तो पाएँगे 207 सांसदों के साथ कांग्रेस पार्टी के सत्‍ता संभालने के बावजूद यह गठबंधन लंगड़ा का लंगड़ा ही रहा। आत्‍मविश्‍वास से कमजोर यह सरकार संसद के हर सत्र में किसी न किसी विषय पर फंस जाती रही। सामाजिक क्षेत्र में सिर्फ गरीबी उन्‍मूलन के लिए सरकार का खर्च 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। परन्‍तु नतीजों का कुछ अता-पता नहीं। खाद्यान्‍न सुरक्षा विधेयक भी लगभग पिछले 9 महीनों से राजनैतिक झंझावात में उलझा हुआ है, देश की 70 प्रतिशत आबादी की आजीविका अभी भी कृषि आधारित है। जिसके कारण देश में बहुत बड़ी आर्थिक असमानता है। लगभग 200 जिलों में नक्‍सलवाद इसी का नतीजा है। अफजल गुरू जैसे कुख्‍यात आतंकी को सहेज कर रख मुस्‍लिम तुष्‍टिीकरण का विभत्‍स स्‍वरूप दिखाया है, इस सरकार ने। इसके अतिरिक्‍त जलवायु परिवर्तन, बी. टी. बैगन से लेकर माओवादियों से निपटने के तरीके पर आपस में एक दूसरे की टाँग खिंचाई की गई। फिर भी मनमोहन सिंह जी के पास उन्‍हें झेलने के अलावा दूसरा रास्‍ता नहीं था। क्‍योंकि छाया ग्रह की तरह कार्य करने वाले प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह जी के हाथ एक निश्‍चित सीमा तक ही खुले हैं। यदि हम यूपीए द्वितीय भाग का आकलन करें तो पायेंगे इस पंचवर्षीय में उनका लक्ष्‍य मुख्‍य रूप से उत्तर प्रदेश रहने वाला है। कांग्रेस सुप्रीमो के गृह प्रदेश तथा देश की सबसे ज्‍यादा लोकसभा सीटों वाला प्रदेश होने के कारण वे उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाना चाहते हैं। परन्‍तु जिस प्रकार टोटकों के सहारे युवराज राहुल गाँधी अपना कद बढ़ाना चाहते हैं, असम्‍भव सा दिखता है। दलितों के घर भोजन कर, उनके बच्‍चों को पुचकारना, उनके यहाँ रात व्‍यतीत करना सिर्फ उनके द्वारा समर्थन हासिल करने का हल्‍का प्रयास मात्र है।
राहुल गाँधी की स्‍पष्‍टवादिता या आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने को मिलते हैं। समाज का सामान्‍य वर्ग अन्‍जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्‍यम बनता जा रहा है। उक्‍त राजकुमार की छोटी-छोटी राजनैतिक स्‍पष्‍टवादिता समाज का भावनात्‍मक शोषण करती है। वे इतने ही आदर्शवादी हैं तो बताएँ आज देश विभिन्‍न ज्‍वलंत समस्‍याओं से गुजर रहा है आतंकवाद, मंहगाई सरीखे विषय मनुष्‍य को सशरीर निगल जाने पर आमादा हैं। देश का शायद ही कोई भाग हो जहाँ अमन-चैन कायम हो। परन्‍तु जिस प्रकार कहा जाता है, रोम जल रहा था और नीरो उक्‍त तबाही से बेपरवाह बाँसुरी बजा रहा था। ठीक उसी प्रकार सम्‍पूर्ण भारतवर्ष उन्‍हीं की सत्‍ता रहते हुए बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है। परन्‍तु उक्‍त युवराज सभी समस्‍याओं को नजरंदाज कर अपने हल्‍के राजनैतिक हथकंडे अपनाने पर आमादा है।
राष्‍ट्रीय राजनीति, समर का युद्ध क्षेत्र हमेशा से उत्‍तर प्रदेश रहा है। चूँकि यहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं अतः राष्‍ट्रीय राजनीति के योद्धा इस क्षेत्र में अपनी-अपनी पूरी ऊर्जा लगाते हैं। वर्तमान में कांग्रेस तथा भाजपा दो ऐसी राजनैतिक ताकतें हैं जो उत्‍तर प्रदेश में अपनी जोर आजमाइश का पूरा मन बनाए हुए हैं। जिसमें एक की केन्‍द में सरकार तथा दूसरा मुख्‍य विपक्षी दल की भूमिका में है। जनाधार के हिसाब से भी दोनों की स्‍थितियाँ लगभग प्रदेश में समान हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी अपने समय का अधिक भाग उत्‍तर प्रदेश में देते हैं तो वहीं उनकी बड़ी बहन प्रियंका सहित उनकी माँ सोनिया गाँधी भी उत्‍तर प्रदेश में अपना दखल बनाए हुए हैं। केन्‍द्र की योजनाओं के दुरुपयोग रोकने के बहाने प्रदेश सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति उनकी राजनैतिक योजना का हिस्‍सा है। कांग्रेस किसी भी सूरत में उत्‍तर प्रदेश में अपना आधार बढ़ाने पर आमादा है। वहीं राष्‍ट्रीय राजनीति का दूसरा महत्‍वपूर्ण किरदार भारतीय जनता पार्टी भी उत्‍तर प्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। इसी लिए इस प्रदेश के सभी निर्णय भाजपा राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व बड़ी सूझ-बूझ से कर रहा है। उक्‍त पार्टी के शीर्ष राजनेताओं ने नेहरू - गांधी परिवार के सामने प्रदेश अध्‍यक्ष के रूप में सूर्य प्रताप शाही जी को लाये हैं। श्री शाही जी अपने निर्णायक व्‍यक्‍तित्‍व के रूप में जाने जाते हैं। वाह्य, आंतरिक व्‍यक्‍तित्‍व तथा विश्‍वास से लबरेज प्रदेश अध्‍यक्ष बनने के बाद वे सड़क मार्ग से पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश से दौरा कर लखनऊ पहुँचे रास्‍ते भर उनका अभूतपूर्व स्‍वागत उनकी लोकप्रियता एवं समाज में उनकी विश्‍वसनीयता दर्शाता है। उत्‍तर प्रदेश इकाई के वे पहले अध्‍यक्ष हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रमुख का दायित्‍व निभा रही है। इसके पहले इनके चाचा श्री रवीन्‍द्र किशोर शाही जनसंघ (वर्तमान भाजपा) के उत्‍तर प्रदेश के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। अब तक श्री शाही जी की राजनैतिक यात्रा विद्यार्थी परिषद से लेकर वर्तमान भाजपा तक बिना किसी समझौते के पूरी हुई है। एक साफ-सुथरी एवं संघर्षशील छवि के सहारे वे प्रदेश भाजपा के सारथी के तौर पर 15वीं लोकसभा के सेमी फाइनल उत्‍तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2012 के लिए तैयार है। वहीं कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी सपरिवार उत्‍तर प्रदेश में अपना दखल बनाए हुए हैं। इस प्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती जिसने प्रथम बार अपने बूते सरकार बनाई वे तथा यहां के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव दोनों अपने जातिवादी समीकरणों के साथ हाजिर हैं। केन्‍द्र की कांग्रेस पार्टी को 13वीं लोकसभा चुनाव की तुलना में 14वीं लोकसभा में लगभग 2 प्रतिशत वोट बढ़कर मिला, जिसके कारण उन्‍हें सीधे 61 सीटों का फायदा हुआ तथा जातीय राजनीति के आधार पर मलाई खानेवाले मुलायम सिंह, लालू प्रसाद तथा मायावती सरीखे राजनेताओं को भारी नुकसान झेलना पड़ा। बिहार में जिस मुस्‍लिम यादव समीकरण के सहारे लालू प्रसाद यादव पिछले दो दशकों से बिहार पर निष्‍कंटक राज किये हुए थे नितिश कुमार के विकास के जादू के आगे उक्‍त जातीय गठबंधन टूटा। बिहार के लोगों ने पहली बार अपने यहां विकास देखा, तो वे इतने खुश हुए कि उन्‍होंने विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव के सीमित अंतराल में ही नितिश कुमार को विकास पुरुष का दर्जा दे डाला। इसी प्रकार तामिलनाडु में भी जाति आधारित राजनैतिक दलों में उदासीनता देखने को मिली। पिछले 15 वर्षों से वन्‍नियार समुदाय की राजनीति करने वाले दल पररलि मक्‍कल काच्‍चि (पीएमके) का सभी 7 सीटों पर सफाया हो गया।
देश की जनता जाति आधारित राजनीति से आजिज आ चुकी है। क्षेत्रीय दलों ने पूरे देश का सत्‍यानाश कर रखा है। उन्‍हें तलाश है उस नेतृत्‍व की जो उन्‍हें तथा उनके बच्‍चों को उचित शिक्षा, साधन तथा सुरक्षा उपलब्‍ध करा सके। वर्ष 2009 की चौदहवीं लोकसभा चुनाव में जिसकी एक झलक देखने को मिली। बड़ी-बड़ी क्षेत्रीय जातिवादी राजनैतिक ताकतें धूलधूसरित हो गईं। जातिवाद के आधार पर बने राजनैतिक तिलस्‍म चटक कर बिखर गये। जहां राष्‍ट्रीय राजनीति का महत्‍वपूर्ण राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी को लगभग 3.5 प्रतिशत मतों का नुकसान अपनी कुछ गलतियों की वजह से उठाना पड़ा वहीं केंद्र में काबिज कांग्रस पार्टी विभिन्‍न राष्‍ट्रीय समस्‍याओं जैसे बेरोजगारी, आतंकवाद तथा मंहगाई पर बुरी तरह फेल हुई तथा नरेगा, ग्राम विद्युतीकरण योजना सरीखी विकासवादी योजनाओं के सहारे केन्‍द्रीय सत्‍ता पर काबिज हो गई। आज देश की जनता समझ चुकी है कि किस प्रकार मुलायम, लालू तथा मायावती सरीखे राजनेता अपनी जातिवादी समीकरण तथा राजनीति के तहत उनका लाभ सत्‍ता में आने के लिए किया तथा उसके बाद उन्‍हें निरीह छोड़ सत्‍तासुख का मदिरापान करने में व्‍यस्‍त हो गये। आज तलाश है देश की जनता को ऐसे राजनैतिक दल की जो उन्‍हें विकास की किरण तथा देश को सही मार्ग पर ला सके।

*राघवेन्द्र सिंह

Sunday, May 02, 2010

उच्च शिक्षा विधेयक यानी उधार का सिंदूर

भारत के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार की कैबिनेट ने देश में विदेशी शिक्षणसंस्थानों को प्रवेश कराने संबंधी विधेयक नेशनल कमीशन फार हायर एजूकेशन एण्ड रिसर्च (एन.सी.एच.ई.आर.) को मंजूरी दे दी। जिसे संसद के सत्र में पेश किया जाना है। मानव संसाधन मंत्री श्री कपिल सिब्बल सहित केन्द्र की सरकार उक्त विधेयक के संदर्भ में अति उत्साह में नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो विदेशी शिक्षण संस्थान अपने साथ कोई जादू की छड़ी लेकर भारत आएँगे और एक ही झटके में सम्पूर्ण राष्ट्रीय उच्च शिक्षा के क्षेत्र का कायाकल्प कर देंगे। गौर करने की बात यह है कि पिछले 20 वर्षों से सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 4 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च हो रहा था। लेकिन इसे घटाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया गया। हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि देश की सरकार के सामने मौजूदा हालात में करीब 18 हजार कालेज तथा 500 विश्वविद्यालयों की स्थिति सुधारने का कोई विशेष एजेन्डा सामने नहीं है। जो उनकी उच्च शिक्षा सुधार विषय की गम्भीरता को दर्शाता है।

अभी लगभग दो वर्षों पहले हमारी सरकार द्वारा एक विशेषज्ञ समिति के माध्यम से ‘‘ज्ञान आयोग रिपोर्ट’’ नाम का एक दस्तावेज जारी हुआ था। जिसके अनुसार अगर भारत में सही शिक्षा प्रबंधन करना तथा वैश्विक दौड़ में रहना है तो उसे अगले 10 वर्षों में 500 विश्वविद्यालयों को बढ़ाकर 1000 करना होगा तथा उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर भी खरा उतरना होगा। हमारे देश की सरकार सिर्फ 20 नई आई.आई.टी. तथा आई.आई.एम. खोलने में पसीने छोड़ रही है। उक्त विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने तथा उनकी शैक्षिक गुणवत्ता को सुधारना उनके बूते की बात नहीं। सो उधार के सिंदूर से सुहागिन बनने का मन बना लिया हमारी सरकार ने तथा अपनी जिम्मेदारी से बचने का खूबसूरत माध्यम भी ढूँढ़ लिया, विदेशी संस्थानों के लिए भारत के दरवाजे खोलकर। एक तरफ शिक्षा के क्षेत्र में कम धन आवंटन तथा दूसरी तरफ अपने संसाधनों की कमी का रोना रोकर हमारी सरकार हर क्षेत्र को धीरे-धीरे निजी तथा विदेशी व्यवस्था के हवाले करती जा रही है। अन्य क्षेत्रों में इसका परिणाम क्या होगा यह शोध का विषय है। परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में इसके परिणाम अशुभ ही रहने वाले हैं।

विदेशी विश्वविद्यालयों हेतु प्रावधान किया जा रहा है कि वे भारत के अपने शिक्षण संस्थानों के लाभांश को अपने देश नहीं ले जा सकेंगे। उसे भारत में ही निवेश करना होगा। कोई विदेशी संस्था भारत में सिर्फ सेवा के उद्देश्य से इतनी बड़ी पूँजी लगायेगी बात कुछ समझ में नहीं आती। वैसे तो सरकार का मानना है कि देश के पब्लिक स्कूल कोई लाभांश नहीं कमाते अतः उन्हें टैक्स देने की आवश्यकता भी नहीं। सरकार का मानना या न मानना यह उनका अलग विषय है। परन्तु वास्तविकता सभी जानते हैं। देश के सभी पब्लिक स्कूल एक दुधारू गाय की भूमिका में हैं। यह बात सत्य है कि विदेशी शिक्षण संस्थान हमारे देश में शिक्षा व्यापार के लिए आएँगे तथा किस प्रकार उस संस्थान के माध्यम से अधिक से अधिक लाभ लिया जाय। इस पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।
हमारे देश का सामान्य वर्ग अभी भी विदेश तथा उनकी शिक्षा को श्रेष्ठ मानता है। उनका विदेशी व्यवस्था, उनके सामाजिक एवं व्यापारिक माहौल तथा उनकी संस्कृति को अपनाने की व्याकुलता प्रायः उनमें देखी जा सकती है। एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग जिसने अपनी राष्ट्रीय भावना तथा कठिन परिस्थितियों में कार्य कर देश में अपना अलग मुकाम हासिल किया। दूसरी तरफ सिर्फ धन एवं विदेशी सुविधा तथा सम्पन्नता प्राप्त करने गये व्यक्ति के लिये ब्रेन-गेन या ऐसे अति योग्यता युक्त शब्दों का बेहिचक प्रयोग किया जाता है। जो प्रथम देशी व्यक्तियों के लिए अपमानजनक सा लगता है।

माननीय कपिल सिब्बल जी बार-बार गुणवत्ता की बात करते हैं। वे विदेशी शिक्षण संस्थानों की कौन सी गुणवत्ता की बात बताना चाहते हैं। जिसे विकसित देश अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक हुसैन ओबामा भी समझ नहीं सके। उल्टे वे भारत के बच्चों की योग्यता व गुणवत्ता की बात विभिन्न प्रचार माध्यमों द्वारा बेहिचक कई बार कर चुके हैं। हमारे मंत्री महोदय को पता होना चाहिए कि शिक्षण संस्थानों से कहीं अधिक आवश्यकता है बच्चों की गुणवत्ता की जिसमें वैश्विक स्तर पर भारत कहीं अधिक आगे है।

बाजारीकरण की अंधी दौड़ का अंत कहां जाकर होगा अनुमान लगाना कठिन है। परन्तु कुछ नतीजे सामने हैं। जिस भारत की कल्पना हमारे नीति निर्धारकों ने की थी वह कब का पीछे छूट गया। हाथ आया धन की लिप्सा पाले आधुनिक समाज जो सिर्फ शिक्षा के लिए धन तथा धन के लिए शिक्षा की व्यवस्था करते-करते अपने जीवन का अधिकांश भाग जी रहा है। उसके जीवन में मानवीय संवेदनाओं तथा नैतिक मूल्यों की कीमत समाप्त हो चुकी है। उसका लक्ष्य सिर्फ धन से धनार्जन तक ही सीमित रह गया है। देश का प्रबुद्ध वर्ग यह भी कहता है कि उक्त विदेशी शिक्षण संस्थानों के भारत आगमन के बाद देश में शिक्षण प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तथा हमारे देशी संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार आयेगा। हो सकता है ऐसा हो परन्तु बड़ी संभावना यह है कि क्या वे गुणवत्ता युक्त शिक्षा लेकर ही आयेंगे। यदि लेकर आयेंगे तो क्या उससे हमारे देश में प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनेगा। क्या आज हमारे देश में सभी गैर स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं। देश में आई.आई.टी. तथा आई.आई.आई.एम. हल्के स्तर के संस्थान हैं। यदि नहीं तो उनसे ऐसा माहौल क्यों नहीं बना इसी प्रकार के अनेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर ईमानदारी से तलाशना है। उक्त कुछ प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट है। कुछ भारतीय उक्त संस्थान गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं तथा अन्य धनार्जन पर। दोनों को अपने-अपने लक्ष्यों की प्राप्ति होती है। हो सकता है कुछ एक विदेशी संस्थान अपनी गुणवत्ता के साथ भारत आएँ पर यह बात निश्चित है अधिकांश का लक्ष्य भारत के शिक्षा बाजार का आर्थिक दोहन ही होगा, न कि यहां के छात्र वर्ग को ईमानदारी से शिक्षा देना। इसी व्यवसायीकरण के युग ने देश के किसी समय एक जाने-माने शोध संस्थान ‘‘एम्स’’ की हालत खराब कर दी। यहां के बड़े-बड़े शोधकर्ताओं को निजी अस्पतालों ने ऊँची कीमत दे अपने यहाँ ले लिया। क्या इसी प्रकार का कुछ हमारे देश में आई. आई. टी. या आईआई. एम. आदि के साथ नहीं होगा ? क्या वे विदेशी संस्थान उनको आर्थिक प्रलोभन द्वारा खरीदने का प्रयास नहीं करेंगे ? ऐसे में हमारे स्तरीय शिक्षण संस्थानों की हालत क्या होगी, सोचने का विषय है। एक तरफ हमारी केन्द्र सरकार शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत 6 से 12 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की बात कह रही है। दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के लिए वह अपनी जिम्मेदारी से मुँह फेर रही है। शिक्षा को बिकाऊ माल की तरह वैश्विक बाजार में बेचने की तैयारी की जा रही है। समाज का अंग होने के कारण गरीब को भी शिक्षा प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना धनाड्य को। आजादी के बाद आज तक देश की जनता इंतजार कर रही थी कि कब सार्वजनिक धन पर टिकी समान शिक्षा व्यवस्था की स्थापना की जाय। जिससे हमारे बच्चों को कम धन में प्राथमिक विद्यालय से लेकर हर स्तर की उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके। आज गरीब भारत तथा अमीर इण्डिया का अन्तर स्पष्ट देखने को मिल रहा है। जो खाई निश्चित ही दिनो दिन चौड़ी होती जायेगी। वर्तमान में हमारी उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या गुणवत्ताहीन संस्थान हैं। जिसे निजी क्षेत्र ने तो अपने व्यापार का साधन बना ही लिया है। विदेशी संस्थान आने से स्थिति और भी भयावह होने की आशंका है। सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी दरवाजे खोलने से पहले उनपर नियंत्रण हेतु कड़े कानून बनाने चाहिए। जिससे वे भारत में अपनी मनमानी न कर सकें।

एन.सी.एच.ई.आर. के अध्यक्ष प्रो0 यशपाल ने पिछले वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपनी कमेटी की रिपोर्ट सौंपी। जिसके अनुसार विदेशी संस्थानों को भारत आने की अनुमति देते वक्त यह बात खासकर ध्यान देनी होगी कि कहीं अपने देश में गुमनाम तथा भारत में पैसा कमाने के उद्देश्य से वे यहाँ तो नहीं आना चाहते। उक्त रिपोर्ट के अनुसार विश्व के बेहतर 200 विश्वविद्यालयों को ही यहां शाखा खोलने की अनुमति देनी चाहिए। इसी तरह की कई ईमानदार शिफारिशें की गई हैं उक्त रिपोर्ट में। जिसका कड़ाई से पालन होना चाहिए। अन्यथा उक्त विदेशी संस्थान भारत में एक उद्योग के रूप में कार्य करेंगे। जिनका मुख्य उद्देश्य धनार्जन ही होगा।?

हमारे देश में शिक्षा के निजीकरण के द्वारा स्तरहीन उच्च शिक्षा की जो खरपतवार फैली उससे सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा जगत प्रभावित हुआ। यदि इसी प्रकार का कुछ विदेशी संस्थानों के आने के बाद हुआ तो भारतीय शिक्षा की स्थिति और चिंताजनक होना स्वाभाविक है। अतः प्रो0 यशपाल की रिपोर्ट एवं अन्य व्यवस्थाओं के अनुसार आने वाली विदेशी शिक्षण संस्थाओं पर लगाम लगाना अति आवश्क होगा। अन्यथा सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा जगत को विभिन्न आयामों में प्रदूषित होने से रोकना असम्भव ही रहेगा। (समाप्त)


लेखक

(राघवेन्द्र सिंह)
117/के/145 अम्बेदकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
मोबाइल नं0 09415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)

Wednesday, April 14, 2010

भारतीय समाचार जगत तथा आतंकवाद



लगभग दो दशक पहले आतंकी गतिविधियों का केन्द्र कश्मीर तक ही सीमित था। लेकिन धीर-धीरे उसने सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपनी गिरफ्त में ले लिया। देश के होटल, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, विद्यालय तथा धार्मिक परिसर सहित सभी क्षेत्र उसकी परिधि में आ गये। वर्तमान में हमारा देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व इसकी हिंसक गतिविधियों की चपेट में आ गया है। वह घटना ही नहीं अपितु एक सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो चुका है। आतंकी भारत को अपनी प्रयोगशाला बनाना चाहते है। आतंक के सूत्रधार यह भलीभॉति जानते है कि भारत की वोट बैंक की राजनीति के चलते धर्मनिपेक्षता तथा मानवधिकार के सन्दर्भ में जितना भ्रम उत्पन्न होगा उतना ही उन्हें लाभ मिलेगा। आज कशमीर में उनका समर्थन कम हुआ है अतः वहॉ उनकी गतिविधियों में भी कमी आयी है। आतंकी बिना देश में आंतरिक समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वे समय-समय पर अपनी गतिविधियों तथा कार्यवाहियों को मीडिया के द्वारा उछालने का प्रयत्न भी करते हैं। उनका उद्देश्य अपने समानधर्मियों को उकसाकर तथा बहकाकर अपनी तरफ आकर्षित करना होता है। आतंकी क्या यह सब अपने आर्थिक लाभ के लिये करते है? या किसी खास उद्देश्य के लिये? क्या उद्देश्य की प्राप्ति के बाद उनकी हिंसक कार्यवाहियां बन्द हो जायेगी? विचारणीय प्रश्न है। जब तक इस विषय की खुली विवेचन नहीं की जाती, तब तक इसका हल खोजने में कठिनाई होगी। आतंकवाद के सिद्धान्त, उसके स्रोत, उनकी आर्थिक एवं बौद्धिक ऊर्जा तथा उनकी अपील जैसे पहलुओं पर मीडिया सही विवेचना करने से बचती रहेगी तो विषय की सही जानकारी समाज को प्राप्त होने में कठिनाई होगी। पिछले बीस वर्षों में देश के विभिन्न आंचलो में सैकड़ों जिहादी आतंकी हिंसक घटनायें हुई। समाचार पत्रों सहित अन्य माध्यमों ने क्या दृष्टिकोण अपनाया शोध का विषय है। वर्तमान में इलेक्ट्रानिक मीडिया जिसके सिर्फ भारत में लगभग 125 माध्यम है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा तथा टी0आर0पी0 बढ़ाने के उद्देश्य से वे अपने मूल कर्त्तव्यों से विमुख हो जाते है। आतंकी घटनाओं, उनके साक्षात्कार, आतंकियों के भेजे संदेशों का प्रसारण सनसनीखेज तरीकों से कर वे अन्जाने में जिहादी आतंकियों के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल हो जाते है। जिसके माध्यम से उनका स्वधर्मी तथा काल्पनिक समाज में स्थापित होने का प्रयास होता हैं वर्तमान मे मीडिया के चहुमुखी विकास का लाभ वे बड़ी चतुराई से अपने मिशन में लोगों को आकर्षित करने के लिये करते हैं।
यह बात सत्य है अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी भाषी समाचार पत्र जन भावनाओं तथा वास्तविकता से अधिक नजदीक रहते हैं। भारतीय अंग्रेजी समाचार पत्र लगभग हर विषय पर अपनी वैश्विक सोच रखते हैं, आतंकवाद भी जिससे अछूता नहीं है। इसलिए उस पर अति विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगता रहता है। अतः हिन्दी तथा अंग्रेजी माध्यमों में प्रतिस्पर्धात्मक विवाद बना रहता है। भले ही आतंकवाद जैसे विषय पर अंग्रेजी भाषा माध्यम वैश्विक सोच रखता हो परन्तु देश के अन्दर हुई आतंकी वारदातों पर हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार पत्र दोनों की काफी हद तक एक राय रही है। दोनों ने ही आतंकवाद पर अंतरर्राष्ट्रीय सहयोग को आवश्यक माना, दोनों ने ही उक्त विषय पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोपों को गलत बताया, दोनों ने पोटा जैसे कानून को सिरे से खारिज नहीं किया, दोनों ने ही मुम्बई के आंतकी हमले को आंतरिक राजनीति से जोड़ने के प्रयास को कोई स्थान नहीं दिया तथा दोनों ने ही आतंकी संगठनों की गतिविधियों को उजागर करने का काम किया। हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों प्रकार के समाचार माध्यमों ने आतंकवाद का सही चित्र समाज के सामने रखा। दोनों भाषायी माध्यमों के बीच देश की आतंकवादी घटनाओं पर लगभग समानता दिखी।
चर्चा में प्रायः समाज हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार माध्यम पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता है। अन्जाने में उससे उर्दू समाचार पत्र छूट जाते है। यह बात सत्य है उसका पाठक वर्ग काफी कम है, परन्तु है जरूर। उर्दू समाचार पत्र समाज में एक खास वर्ग में पढ़ा जाता है। शायद ही कोई अन्य वर्ग का व्यक्ति उस पर ध्यान भी देता हो। इसलिए उक्त भाषायी समाचार पत्र स्वेच्छाचारी बन गये है। जिससे सम्पूर्ण समाचार जगत की निष्पक्षता सन्देह के घेरे में आ जाना स्वाभाविक है। समाचार के माध्यम तथा उसकी विश्वसनियता लोकतंत्र का मेरूदण्ड होती है। उसकी संदिग्धता राष्ट्र के उक्त स्वरूप को विकृति कर देती है। अतः उक्त माध्यम ईमानदर तथा निष्पक्ष होना ही चाहिए। आतंकवाद के साथ-साथ मीडिया का मुख कार्य उसके मूल में जाकर उनके सिद्धान्तों को उजागर करना, राज्य तथा उसकी विभिन्न एजेंसियों की भूमिका एवं पुलिस की जांच प्रक्रिया को समाचारों के माध्यम से समाज में पहुँचाना हैं जिससे उनकी भूमिका जिम्मेदारीपूर्ण के साथ-साथ संवेदनशील भी हो जाती है। मीडिया की एक छोटी से चूक उसकी विश्वसनीयता को राख में मिला सकती है। हमारे एक मुस्लिम मित्र के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय का नेतृत्व मदरसों में शिक्षित उन मजहवी मौलवियों के हाथों में रह गया है। जिसकी मानसिकता इन उर्दू समाचार पत्रों के माध्यम से तैयार होती हैं उर्दू समाचार पत्र सिर्फ आतंकी घटना ही नहीं मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति पर आरोप भी लगता हैं तो उसका रूख हमेशा एक पक्षीय-सा होता है। उस घटना के आधार पर वे ऐसा माहौल बानाने का प्रयास करते हे। मानो देश में उनके समाज के लोगों का उत्पीड़न ही हो रहा हो। यदि हम हाल की कुछ आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करें चाहे वह मुम्बई का आतंकी हमला हो या अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान का प्रकरण, बटाला हाउस मुठभेड़ की घटना हो या अन्य कोई। उनका झुकाव एक पक्षीय सा ही रहता है। उर्दू समाचार पत्रों ने कभी तो मुम्बई के आतंकी हमले का रूख दूसरी तरफ मोड़ने का प्रयास किया, तो कभी बटला हाउस मुठभेड़ तथा उसमें शहीद मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर प्रश्न चिन्ह लगाये, कभी अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान पर अपनी सहमति दर्ज कर अपने पाठक वर्ग को भ्रमित करने का प्रयास किया।
उर्दू समाचारों पत्रों का आपना एक पाठक वर्ग है, जो राष्ट्रभक्त भी है। देश में उर्दू सहित अनेक समाचार स्रोतों के माध्यम से उन्हे विभिन्न तरीकों से जानकारी उपलब्ध होती हे। उन्हें अपनी ज्ञान की कसौटी पर कस वास्तविकता की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसलिए उर्दू समाचार पत्रों द्वारा प्राप्त हुई जानकारी का उनके जेहन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। इसी कारण वे समचार पत्र अपनी विश्वसनियता खोते चले जा रह है। तथा हासिये पर हैं।
अभी कुछ दिनों पूर्व बटला हाउस मुठभेड़ की जाँच के लिये आजमगढ़ से करीब दो हजार मुसलमानों की उलेमा परिषद द्वारा दिल्ली में एक रैली आयोजित की गई। जिसमें उक्त मुठभेड़ को शक के दायरे में ला शहीद एम0सी0 शर्मा को मरणोपरान्त दिये गये अशोक चक्र को वापस लेने की मांग रखी गई, हालाँकि उक्त दो हजार मुसलमानों के अलावा एक भी स्थानीय मुसलमान ने उसमें भाग नहीं लिया। उक्त घटना मुसलमानों की जागरूकता एवं स्पष्ट सोच को दर्शाता है। परन्तु उर्दू समाचार पत्रों ने विभिन्न तरीकों से उक्त मुठभेड़ को विवादित करने का पूरा प्रयास किया। 26/11 की घटना का अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों ने इस्लाम को बदनाम करने की साजिश तथा अमेरिकी खुफिया एजेन्सी सी0आई0ए0 तथा इजराइल खुफिया एजेंसी मौसाद का षड़यन्त्र बताया जिसे भी अधिकांश इस्लामी समाज ने हवा में उड़ा दिया, मुम्बई तथा मालेगाँव घटना में भी अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों मे जबरन सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। जिसे भी उनके पाठक वर्ग ने गम्भीरता से नहीं लिया। कुछ उर्दू समाचार पत्रों ने तो अजमल आमिर कसाब की स्वीकारोक्ति पर भी अविश्वास कर डाला। अधिकांश उर्दू समाचार पत्र प्रायः आतंकवाद को रोकने के लिये कठोर कानून का विरोध करते हैं उनकी दलील होती है, इसका दुरूपयोग अल्पसंख्यकों के विरूद्ध होगा।
कोई समाचार माध्यम चाहे किसी भी भाषा को हो घटनाओं तथा उसकी सही वस्तुस्थिति को समाज में पहुँचाना उसका प्रथम कर्त्तव्य होता है। समय-समय पर चर्चा होती है। किस प्रकार मीडिया को आतंकियों के हाथों से इस्तेमाल होने से बचाया जाये क्या इसे सेंसरशिप के दायरे में लाया जाये या नहीं चिन्तन तथा शोध का विषय है। समाचार पत्रों के अलग-अलग विचार होना स्वाभाविक है। किसी एक भाषायी समाचार पत्रों के द्वारा खास विचारधारा या मजहब का प्रतिनिधित्व करना लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता दोनों के लिये नुकसानदायक है। आज देश को महती आवश्यकता हैं आतंकवाद जैसे घृणित एवं राष्ट्रविरोधी विषय पर ईमानदारी से अध्ययन तथा सम्बन्धित विषय एवं घटनाओं के सत्य को समाज में पहुँचाने की तथा जागरूक करने की जिससे राष्ट्र की राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रह सके। समाचार जगत चाहे अपनी वैचारिक शक्ति से राष्ट्र को एक अभेद दुर्ग बना दे या समाज में विघटन का ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें सॉस लेना भी कठिन हो जाये।

Saturday, March 13, 2010

तलाश-भारत के महानायक की

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसने देश की आजादी में सराहनीय योगदान किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके नेताओं की भूमिका को राष्ट्र नकार नहीं सकता। आज कांग्रेस पार्टी अपना 125 वॉ जन्म वर्ष मना रही है। 1885 में कांग्रेस का जन्म हुआ, जिसके संस्थापक ए0ओ0 ह्यूम जो एक रिटायर्ड अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी थे तथा प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष डब्लू0सी0 बनर्जी हुए। ए0ओ0 ह्यूम, डब्लू सी0 बनर्जी से लेकर सोनियां गॉधी तक कांग्रेस पार्टी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 1885 से लेकर 1905 तक लगातार 20 वर्षों तक कांग्रेस में उदारवादी गुट का प्रभाव रहा, जिसके प्रमुख नेता दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, फिरोज शाह मेहता, गोविन्द राना डे, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय थे। 1905 से 1919 के मध्य नव राष्ट्रवाद तथा गरम पंथियों का उदय हुआ जिसके प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) तथा अरविन्द घोष प्रमुख थे। लाल-बाल-पाल तथा अरविन्द्र घोष के प्रयासों के कारण प्रथम बार 1905 में कांग्रेस के बनारस राष्ट्रीय अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में स्वदेश तथा 1906 के कलकत्ता राष्ट्रीय अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में पहली बार स्वराज की मांग रखी गयी।
स्वतन्त्र भारत पर सबसे अधिक शासन करने वाले उक्त राजनैतिक दल का चारित्रिक पतन देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रारम्भ हुआ। किसी समय
लेखक
राघवेन्द्र सिंह
117/के/145 अम्बेडकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
फोन नं- 9415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)
email: raghvendrasingh36@yahoo.com
ईमानदारी से कार्य एवं सभी को साथ ले चलने वाली कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद अचानक एक परिवार की पार्टी होती चली गयी। उनके साथ काम करने वाले राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थों के चलते एक परिवार के आधीन होते चले गये। जाने-अन्जाने पूरी पार्टी जो किसी समय स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य किरदार थी स्वयं परातन्त्र हो गयी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस विषय पर आपत्तियॉ भी की, परन्तु उनके स्वर नक्कार खाने में तूते की आवाज बनकर रह गये। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी सोनियॉ गांधी की इतालवी अंदाज के हिन्दी भाषणों एवं राहुल गांधी के टोटकों की पार्टी बनकर रह गयी। उक्त राज कुमार कभी दलित के घर में भोजन करते है तो कभी उनके बच्चे को गोंद में उठाकर पुचकारते, कभी उनके यहॉ रात बिताते है तो कभी ए0टी0एम0 से लाइन में लगकर पैसे निकालने से लेकर मैट्रो ट्रेन में सफर कर व्यवहारिक जनसमर्थन हासिल करने का प्रयास करते है। क्या उक्त सभी सामाजिक पैतरेबाजी एवं उनकी कारगुजारियां राजनैतिक जनसमर्थन की तरफ किंचित मात्र भी इंगित नहीं करती? क्या कभी किसी ने उनसे यह पूछने का प्रयास किया है, कि केन्द्र में आपकी ही सरकार है देश में आतंकवादी व्यक्तियों का जीवन छीन रहे है, बढ़ी हुयी प्रयोजित महंगाई सभी पायदान लांघ गरीब के मुह से निवाले हडपने पर आमादा है, अफजल गुरू जैसा कुख्यात आतंकी को आपकी पार्टी ने जिन्दा रख छोड़ा है तथा भारत की नेपाल, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सीमाए पूरी तरह असुरक्षित है। नकली नोट एवं हथियारों के साथ आतंकी उक्त सीमाओं से भारत में प्रवेश कर आतंकी गतिविधियों में संलग्न हैं क्या कभी किसी ने उनसे प्रश्न किया महाराष्ट्र में आपकी सरकार है आप वहॉ की मुख्य भूमिका में है आपकी सहयोगी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उत्तर भारतीयों के साथ गैर मानवीय हरकते क्यों कर रही है। उन्हे महाराष्ट्र प्रदेश छोड़ने को क्यों मजबूर किया जा रहा है। क्या किसी पत्रकार मित्र ने राहुल गॉधी से यह जानने का प्रयास किया वर्ष 2007-08 में आपकी सरकार में गेंहू का समर्थन मूल्य 8.50 पैसे था, उसी समय विदेशों से 14.82 पैसे की दर से गेंहू क्यों आयात किया गया, वर्ष 2009-10 जब हमारे देश में आटा रू0 20/- प्रति किलों की दर से बिक रहा था तो सरकार ने 12.51 पैसे की दर से गेंहू क्यों विदशों में बेचा। वर्ष 2008-09 में गन्ने की सामान्य पैदावार के बावजूद सरकार ने 48 लाख टन चीनी विदेशों में रू0 12.50 प्रति किलो की दर से पहले बेची उसके बाद उक्त निर्यात से आयी किल्लत के कारण रू0 42.00 प्रति किलों की दर से चीनी आयात की। क्या उक्त कुछ आयात-निर्यात के आर्थिक खेल देश की बढ़ी हुयी महंगाई का कारण नहीं प्रतीत होते। क्या किसी ने उनसे यह पूछने की हिम्मत की देश मंे मजहब के आधार पर सर्वेक्षण कराने का कार्य आपकी पार्टी ने क्यों किया। क्या सच्चर कमेटी से रिपोर्ट बनवा ऐसा नही किया गया जैसा लगभग 90 वर्षो पहले अंग्रेजो ने मुस्लिम लीग को शह देकर करवाया था। रंगनाथ मिश्र आयोग बनवा अलग आरक्षण की मांग क्यांे उठवायी गयी। क्या मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग किसी जिम्मेदार मुस्लिम नेता या संगठन ने की थी। देश का प्रधान मंत्री बनने को बेताब उक्त राजकुमार अपनी एयर कंडीशन्ड गाड़ी से घूम, फाइव स्टार होटलों का भोजन गरीब को झोपडी में कर यह जताने का प्रयास कर रहे है कि वे समाज से घुले मिले है। दुर्भाग्य की बात है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्तम्भ पत्रकार बन्धु भी उनके अंदाजों को महिमा मंडित कहने में नही चूकते हैं।
राहुल गॉधी की स्पष्ट एवं आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने एवं देखने को मिलते हैं। समाज का व्यक्ति अन्जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्यम बनता जा रहा है, राजकुमार की छोटे-छोटे विषयों की स्पष्टवादिता समाज का भावनात्मक शोषण कर रही है। वे इतने ही आदर्शवादी है तो बताये आज देश विभिन्न ज्वलन्त समस्याओं से गुजर रहा है। आतंकवादी, महंगाई सरीखे विषय मानव को सशरीर निगल जाने को आमादा है। देश का शायद ही ऐसा कोई भाग हो जहॉ अमन चैन कायम हो। इसके अतिरिक्त देश में और भी कई ऐसे विषय है जिनकी जवाब देही से वे बच नहीं सकते। कहने को तो वे कह सकते है मैं प्रधानमंत्री नहीं हूँ आदि-आदि परन्तु पूरा देश जनता है मनमोहन राज किसके सामने दण्डवत है।
सिर्फ अभी मैं प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हूँ ! या इसी प्रकार के कुछ जुमलों से व्यक्ति स्पष्टवादी दिखने लगे तो यह न्यायोचित नहीं लगता। वे भली प्रकार जानते है उनके पास जो उपनाम की ताकत है, वही उन्हें अनिवार्य एवं अपरिहार्य बनाए हुए है जो कभी जाने वाली नहीं, अतः कांग्रेस पार्टी में उनका सर्वोच्च आसन सुरक्षित हैं वे कुछ भी बोले उससे उनकी विशिष्टता कम होने वाली नही। अतः वे भावनात्म्क कृत्यों एवं बयानो की खुली बाजीगरी कर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास कर रहे है। राहुल जी का यदि आप परिवारवाद विरोध देखें जो सिर्फ उनके बयानों तक ही सीमित हैं उनकी कथनी एवं करनी में जमीन आसमान का अन्तर है। राहुल के खास सिपहसालारों में मिलिंद देवडा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, कनिष्क इधर है क्या वे वंशवाद की श्रेणी में नहीं है, गरीबों के घर में गरीबी देखने वाले राहुल बाबा बयान देते है अगर 1992 में गॉधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न टूटती इस वक्तव्य से सीधे तौर पर यह कहने का प्रयास करते है कांग्रेस पार्टी की हिफाजत एवं देश पर शासन करने की माद्दा शिर्फ गांधी परिवार के पास ही है। क्या उक्त बयान उनके शातिर दिमाग एवं परिवारवाद की तरफ इंगित नहीं करता। एक तरफ वे स्वयं सहित परिवारवाद के विरोधी एवं दूसरी तरफ स्वयं, मित्रों एवं बयानों के आधार पर परिवारवाद के पोषक दोनों ही भूमिका बाखूबी नहीं निभा रहे है वे। यदि उनकी 1992 वाली घटना मान भी ली जाये कि यदि उनके परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो विवादित स्थल न टूटता तो 1984 के सिक्खों के कत्ले-आम के विषय में वे क्या कहेगें उस समय तो उनके परिवार का ही प्रधानमंत्री था। हमारे देश के युवराज राहुल गॉधी योग्य एवं सफल राजनेताओं की बात करते है। तो वे यह भूल जाते है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही इनके रक्त सम्बन्धियों के अलावा भी योग्य एवे राष्ट्र भक्त राजनेता हुए है। लेकिन इनकी वैचारिक शक्ति शिर्फ अपने पिता श्री राजीव गांधी, माता श्रीमती सोनिया गांधी, दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा पर नाना श्री जवाहर लाल नेहरू ही देख सकती है। अन्य के चर्चें वे भूल कर के भी नहीं करते। फिर भी स्वयं को परिवारवाद के विरोधी के रूप में स्थापित करने पर आमदा है राहुल बाबा।
वास्तविकता तो यह है देश की गरीब एवं भावनाप्रधान जनता के साथ राहुल गांधी भावात्मक खेल बाखूबी खेल रहे हैं, वे राष्ट्रीय हित के विषयों पर न जाकर अपनी हल्की फुल्की गतिविधियों से भोली भाली जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे है। उनके रास्ते पूर्व कांग्रेसी नेताओं से भिन्न हो सकते है परन्तु मंजिल एक है। देश का प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले वे यह भूल गये देश को एक ऐसे लौह पुरूष की तलाश है जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरो सके, उनके हितो की रक्षा कर सके, अमेरिका जैसी ताकत को जवाब दे सके, चीन जैसे रंग बदलने वाले गिरगिट को दुरूस्त रख सके तथा पाकिस्तान जैसे बिगडैल को सबक सिखा सके। देश का नहीं चाहिए जो उपनाम की ताकत के माध्यम से देश के सर्वोच्च राजनैतिक आसन पर आसीन होना चाहता हो, उसे तालाश है ऐसे महानायक की जो सही मायने में देश को गति दे सके, साम्प्रदायिक सद्भावना रख सकें, महंगाई पर काबू, आतंकवाद पर लगाम तथा आतंकियो को दण्डित कर सके।

--राघवेन्द्र सिंह

Wednesday, February 24, 2010

नकली नोटों की असली तबाही

संख्या की दृष्टि से वर्ष 2001-02 से लेकर 2007-08 तक देश में 1141892 जाली करेंसी पकड़ी गयी। इस बात के सरकारी आकडें उपलब्ध नहीं है कि वर्तमान में कितने जाली नोट चलन में है। लेकिन फिर भी अनुमानिक तौर पर उपरोक्त पकड़ी गयी जाली करेंसी से लगभग 20 से 25 गुना अधिक चलन में उपलब्ध है। नकली मुद्रा से देश की अर्थव्यवस्था के नुकसान को समझने के लिए उसकी पात्रता को समझना होगा। यदि हम बाजार कुछ खरीदने जाते है, अनुपातिक रूप से हमारे पास उससे कहीं ज्यादा धन होगा तो निश्चित ही मॅहगाई आयेगी। मौद्रिक नीति का एक उद्देश्य होता है। सेवाओ, वस्तुओं तथा मुद्रा के बहाव में एक अनुपात बना रहे। यदि बाजार में मुद्रा अधिक होगी उसकी तुलना में वस्तुएँ तथा सेवाएँ कम होगी तो स्वाभाविक तौर पर मॅहगाई बढ़ेगी। यह बात बिल्कुल सत्य है जाली करेंसी असली के साथ ऐसा व्यवहार करती है जैसा बम धमाके में होता है। मुद्रा की अपनी कोई कीमत नहीं होती उसकी भूमिका आती है उस वादे से जो मुद्रा में स्पष्ट रूप से लिखा होता है ‘‘मैं धारक को इतने रूपये अदा करने का वचन देता हूँ।’’
जाली नोटों के चलन में व्यक्ति, बैकों सहित आर0बी0आई0 की विश्वसनीयता पर शक होने लगता है। साथ-साथ बेरोजगार व्यक्ति को लगता है कुछ गलत कर आसानी से धन पैदा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पूरी सरकारी मुद्रा शक के दायरे में खड़ी हो जाती है। यहां तक कि लोग 500 या 1000 के नकली नोटो के भय में असली भी लेने से मना करने लगते है। यदि लेते भी है तो हस्ताक्षर या इस प्रकार के चिन्ह लगाकर लेते है कि फर्जी होने पर वापस किया जा सके। नकली मुद्रा से समाज को प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनो रूप से अत्यधिक नुकसान पहुँचता है तथा समाज में अविश्वसनीयता का माहौल बनता है। मानवीय दृष्टिकोण से यदि हम विचार करे, 500 रूपये का एक नकली नोट किसी गरीब व्यक्ति के पल्ले पड़ जाता है, तो उसकी महीने भर की आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ा जाती है उसके बाद उसे अपमानित अलग से होना पड़ता है। देश में कई घटनाए हुयी है जिससे बैंक द्वारा लगायी गयी ए0टी0एम0 मशीनों से नकली मुद्रायें प्राप्त हुई है। और तो और देश की संसद भवन की लाइब्रेरी बिल्ड़िग में लगी ए0टी0एम0 मशीन से भी नकली नोट निकला जिसका भुक्तभोगी उ0प्र0 का एक सांसद हुआ।
वर्तमान में पाकिस्तान अरबो रूपये की नकली करेंसी विभिन्न माध्यमों द्वारा भारत भेजने में जुटा हुआ है जिससे देश की आर्थिक मेरूदण्ड तो प्रभावित होती ही है साथ-साथ उस धन का आतंकवादी इस्तेमाल अपनी आतंकी गतिविधियां पूरी करने के लिए करते है। एवं उन्हे देश में भारतीय मुद्रा के लिए भटकना भी नहीं पड़ता है। जिसे वे अपने साथ ही लाते है। जिससे वे बम तथा बमबाज दोनो खरीद कर भारत में तबाही को अंजाम देते है। नकली मुद्रा का सीधा सम्बन्ध काले धन से भी है अर्थात जिसका कोई हिसाब किताब नही होता अतः उक्त करेंसी में काले धन के भी सारे दोष विद्यमान होते है। अर्थात नकली करेंसी देश को चारो तरफ से तबाह करती है। अर्थव्यवस्था, मंहगाई, आतंकी गतिविधियां, काला धन आदि के रूप में फर्जी मुद्रा देश को तबाही के कगार पर पहुँचाती है।
आज हमारा देश पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आर्थिक आतंकवाद की चपेट में आ चुका है। पाक समझता है कि भारत का सामाजिक एवं आर्थिक ताना-बाना ध्वस्त करने के लिए आर्थिक रूप से उसकी कमर तोड़नी होगी। बिना आर्थिक नुकसान पहुचाए भारत को कमजोर करना उसके बूते की बात नहीं अतः इसी विषय को ध्यान में रखते हुए आतंकवादियो के साथ भी वह नकली करेंसी का भण्डार भारत भेजता है। जिससे एक तरफ आतंकियो को आर्थिक सुविधा तथा दूसरी तरफ नकली मुद्रा का भण्डार भारत पहुच जाता है। पाकिस्तानी सरकार अपनी गुप्तचर एजेंसी आई0एस0आई0 के माध्यम से पाक वायु सेना की पाकिस्तान इन्टरनेशनल एयर लाइंस के विमानों के माध्यम से नेपाल, बांग्लादेश तथा श्रीलंका में नकली नोटो की खेप भेजने का कार्य करती है। इसके बाद वहां घुसपैठियों के माध्यम से भारत में फर्जी नोटो को फैलाया जाता है। जाली मुद्रा के व्यवस्थित वितरण करने वाले को एक निर्धारित प्रतिशत भी दिया जाता है। पाकिस्तान भली भॉति जानता है कि हिंसक गतिविधियों के अतिरिक्त भारतीय अर्थव्यवस्था पर चोट पहुचायी जाये तो विकासशील भारत के पांव में बेडियॉ पड जायेगी जिससे उसका विकास रथ की गति का सत्यानाश सुनिश्चित है अतः हमारा पड़ोसी मुल्क अपनी पूरी ऊर्जा इस अनैतिक कार्य में लगाये हुए है।
लेखक
राघवेन्द्र सिंह
117/के/145 अम्बेडकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
फोन नं- 9415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)
email: raghvendrasingh36@yahoo.com
सी0बी0आई0 द्वारा पकड़े गये राजेन्द्र कुमार अनादकर ने खुलासा किया जिसके अनुसार आई0एस0आई0 के इशारे पर फर्जी मुद्रा की छपायी क्वेटा आदि जगह पर होती है। उसके बाद वह जाली करेंसी डान दाउद को सौप दी जाती है जिसे वह अपने नेटवर्क के माध्यम से म्यूजिक सिस्टम, क्राकरी, वाशिंग मशीन आदि में डाल हवाई जहाज द्वारा भेज देता है। कम पढ़े, बेरोजगार महिलाओ तथा मुसलमानों को इस काम में लगाया जाता है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में नकली नोट, उसका असली के रूप में इस्तेमाल, नकली नोट रखना या नकली नोट बनाना या उसका उपकरण रखने या नकली नोट बनाने के सामान या बैंक नोट से मिलते जुलते दस्तावेज का इस्तेमाल करना भारतीय दंड संहिता की धारा-489-अ से 489-इ के तहत दंडनीय अपराध है। इन मामलो में देश की अदालते जुर्माना या सात साल की कैद से लेकर आजीवन कारावास या संगीन जुर्म को देखते हुए दोनो सजाए एक साथ दे सकती है। वर्ष 2003 के सरकारी आकड़े के अनुसार देश के विभिन्न भागो में फर्जी करेंसी पकडने के कुल 1523 मामले पंजीकृत हुए तथा 2 करोड़ 80 हजार से ज्यादा नकली नोट बरामद हुए। खुफिया सूत्रो के अनुसार दिल्ली नकली नोटो का केन्द्र है, यहां से देश के अन्य भागो में उक्त करंेसी भेजी जाती है। वर्ष 2000 में रिजर्व बैंक द्वारा गठित नाइक कमेटी ने कहा था देश में करीब 1 लाख 69 हजार करोड फर्जी नोट बाजार में है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के हालात काफी चिन्तनीय है।
26/11 के मुम्बई हमले की जॉच से यह बात सामने आयी आतंकी अपने साथ भारी मात्रा में भारतीय जाली करेंसी लाये थे। वर्ष 2005 में बेगलूर के भारतीय विज्ञान संस्थान पर हुए हमले भी 50 लाख में से 30 लाख नकली नोट खर्च किए गये थे। उक्त घटनाए प्रमाणित करती हैं, किस प्रकार नकली करेंसी आतंकी गतिविधियों में प्रवेश की हुई है। आज भारत उक्त विषय में बहुत विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है नकली नोटो का विषय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सीधे-सीधे आतंकी हिंसक गतिविधियों से जुड़ा है। जिसका इलाज समय रहते न किया गया तो आने वाला समय भारत के लिए मुश्किलो भरा होगा। आज से 63 वर्षों पहले पाकिस्तान भारत के हाथ काट कर अस्तित्व में आया था। आज पुनः हाथ काटने पर आमादा है। स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो चुका है पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आई0एस0आई0 भारत को नकली नोटो के माध्यम से आतंकवाद एवं अर्थव्यवस्था सहित अनेक कोनों पर तबाह करना चाहती है लेकिन हम अभी तक इसकी व्यवस्थित सुरक्षा कर पाने में पूरी तरह असमर्थ रहे है। हमारे देश तथा नेपाल सीमा पर वीजा प्रावधान न होने के कारण जाली करेंसी रोक की समुचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है। बाग्लादेश सीमा पर एक दूसरे की जमीन होने के कारण भी सुरक्षा व्यवस्था में असुविधा होती है। हालांकि जाली नोटों के प्रसार को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ प्रयास किये है। जिसके अन्तर्गत जाली नोट धारको को रसीद जारी करना है, जिसके तहत जाली नोट पाये जाने पर धारक से नोट जब्त कर एक रसीद जारी होगी। नोटो की पहचान के लिए बैक के सभी कर्मचारियों का प्रशिक्षण, पकडे़ गये जाली नोटो की एफ0आई0आर0 तथा सभी बैंक में करेंसी रीडर उपकरणों को स्थापित करने की योजना सहित विभिन्न बिन्दुओं पर कार्य योजना तैयार की गयी है। परन्तु उपरोक्त सभी व्यवस्थाए अधकचरी सी प्रतीत होती है। जो जाली करेंसी रोक से ज्यादा रक्षात्मक है। बेहतर हो सरकार जल्द से जल्द भारतीय मुद्रा की डिजाइन एवं आकार परिवर्तित करती रहे तथा साथ-साथ वैश्विक स्तर पर ऐसी नयी तकनीके आ गयी है जिससे करेंसी का प्रतिरूप बनाना मुश्किल है। यदि बन भी जाती है तो आसानी से पकड़ में आ जाती है। प्लास्टिक की मुद्रा जो विश्व के कई देशों में व्यवस्थित रूप से चलन में है भारत में भी लागू हो सकती है। इसी प्रकार के कुछ प्रयास कर जाली करेंसी को चलन में आने से पहले ही रोका जाये तो बेहतर होगा अन्यथा उपयोग में आने के बाद पकड़े जाने पर वह अपना लगभग पूरा नुकसान कर चुकी होती है।