Saturday, October 31, 2009

अलाद्दीन : मजेदार मनोरंजन मैजिक

फिल्म समीक्षा

"हैरी पॉटर" और "पायरेट्स ऑफ़ कैरिबियन" जैसी हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्में जब हिंदी फिल्मों को टक्कर देती है तो ऐसी कोई भी हिंदी फिल्म नहीं होती जो उन्हें मुह तोड़ जवाब दे पाए। हालाँकि कोई कहानी अच्छे से प्रस्तुत की जाये तो बच्चे-बूढ़े और जवान सभी को रास आता है, पर हिंदी फिल्मों में कभी ऐसे चमत्कारपूर्ण या परी कथाओं पर परिश्रमपूर्वक काम नहीं हुआ है।

पर इसी संकीर्ण रास्तों पे चलते हुए सुजोय घोष की नयी फिल्म सिनेमा घरों में आई है। क्या ये फिल्म विश्वस्तरीय फिल्मों के मुकाबले खरी उतरती है? करते है इस फिल्म के गुणवगुणों की चर्चा.

कथा सारांश:

कथा सीधी साधी है। "ख्वाइश" नामक एक काल्पनिक गाँव में एक अनाथ बच्चा, अलाद्दीन (रितेश देशमुख) रहता है। अलाद्दीन के माँ बाप असली अलाद्दीन के चिराग के खोज के समय ही भगवन को प्यारे हो गए। उसके बाद अपने दादा के साथ रहने वाला अलाद्दीन कुछी दिनों बाद दादा का भी साथ खो के अनाथ हो जाता है। स्कूल में बच्चे उसे उसके नाम से चिढ़ाते है और चिराग घिस के जिन्न को बाहर लाने को कहते हैं और जब वह ऐसा करने में असफल होता है तो उसे मारते है। इसी वजह से अलाद्दीन चिराग से नफ़रत करता है।

बड़ा होने के बाद भी अलाद्दीन एक कम आत्मविश्वास वाला लड़का बन जाता है। पर एकदिन कॉलेज में आई नयी लड़की, जास्मिन (जैकलिन फ़र्नान्डिस) पे वह मर मिटता है। अलाद्दीन के जन्मदिन पर जास्मिन जो चिराग उसे तोहफे के स्वरुप देती है, उसी चिराग से असली जिन्न निकलता है।

अलाद्दीन और वह जिनी मिल के क्या गुल खिलाते हैं, इसी कहानी पर बनी है यह फिल्म।

पटकथा:

बहुत सारे हॉलीवुड और हिंदी फिल्मों का अभ्यास कर के सुजोय घोष ने इस फिल्म की पटकथा को सँवारने की कोशिश की है और कुछ बेहतर होशियार तरीकों के बावजूद पटकथा कहीं-कहीं पटरी से फिसल जाती है। पर इसके बावजूद फिल्म ज्यादातर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाने में कामयाब होती है।

दिग्दर्शन:

सुजॉय घोष की दिग्दर्शीय प्रतिभा के लिए यह फिल्म एक शिव धनुष को उठाने के सामान बड़ी चुनौती थी, और वह उसमे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। पर सुजोय घोष के लेखन प्रतिभा ने उन्हें कई जगह पे कमजोर कर दिया है। पर सुजोय ने जिस ऊँचाई पर इसे सोचा है वह काबील-ए-तारीफ है। और उससे भी कबीलेतारीफ है अपने सपने को सच करने उनकी मेहनत, जो साफ दिखाई देती है। उन्हें इसके लिए दाद देने की जरूरत है। अगर तगड़ी पटकथा का आधार मिले तो वे सच में विश्वस्तरीय फिल्मों की टक्कर की फिल्म बना सकते है।

पर फिल्म के पहले भाग में बहुत सारे गाने और कहानी के खिंचने की वजह से बोरियत महसूस होती है उसपे उन्होंने और थोड़ा काम करना चाहिए था।

अभिनय:

ये फिल्म पूरी तरह अमिताभ के काबिल कंधों पे सवार है। वे पूरी तरह अपने भूमिका को न्याय देते हैं और जब स्क्रीन पे आते हैं, तब से स्क्रीन पे छा जाते हैं। रितेश भी दर्शकों से तालियाँ और हँसी बटोरने में सफल हुए हैं। संजय दत्त को थोड़ा और मेहनत करने की ज़रूरत थी। नयी नायिका जैकलिन परी जैसी दिखती है और अपना पात्र ठीक से निभाती है। बाकि सब कलाकारों ने अच्छा साथ निभाया है।

चित्रांकन और स्पेशल एफ्फेक्ट्स:

अतिउच्च दर्जे के स्पेशल एफ्फेक्ट्स इस फिल्म के उन चुनिन्दा पहलूओं में से एक हैं जिनके लिए ये फिल्म देखना बहुत जरूरी है। रियल लाइफ एक्शन जिसे लाइव एक्शन भी कहते हैं उसके साथ कम्प्यूटर से बनी मायावी दुनिया और जादू का मिश्रण बहुत ही सटीक तरीके से फिल्माया गया है। हिंदी फिल्म के कम बजट में भी विश्वस्तरीय काम करने के लिए इस टीम को जितनी दाद दी जा सके, कम है। तालियाँ !

संगीत और पार्श्वसंगीत:

विशाल शेखर का संगीत अच्छा है। जिनी रैप और जास्मिन को प्रपोस करने वाले गाने अच्छे हैं। बाकि गानों में से कम से कम 2 गाने फिल्म से निकल देने चाहिए।

संकलन:

संकलक ने ड्रामा, एक्शन और स्पेशल इफेक्ट वाले दृश्यों में दर्शकों की तालियाँ हासिल करने में सफलता प्राप्त की है। पर फिल्म के लम्बाई को कम करने के लिए उन्हें निर्देशक को मनाना चाहिए था।

निर्माण की गुणवत्ता:

सुजोय घोष और सुनील लुल्ला को दाद देनी चाहिए कि उन्होंने इस तरीके के फिल्म को डिज्नी के लेवल का सोचा और बनाया है। निर्माण मूल्य अतिउत्तम है और फिल्म पहले दृश्य से ही अचम्भित कर देती है। दर्शकों को सोचने पे मजबूर करती है कि क्या ऐसी फिल्म भी भारत में बन सकती है! बहुत अच्छे।

लेखा-जोखा:

*** (3 तारे)
एक तारा विश्वस्तरीय स्पेशल एफ्फेक्ट्स और टेकिंग को, दूसरा तारा अमिताभ को, तीसरा तारा फिल्म के दिलचस्प भाग को।

बच्चों को जरूर ये फिल्म दिखाने ले जायें। और हैरी पॉटर और उस जैसी फिल्म पसंद करने वाले जवान और व्यस्क लोग भी ये फिल्म जरूर देखें। निर्माण की ऐसी गुणवत्ता और स्पेशल इफेक्ट वाली फिल्में हिंदी में बार-बार नहीं बनतीं। पर कही पे थोड़ी बच्चों को और कही पे थोडी बड़ों को बोरियत हो सकती है।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Thursday, October 29, 2009

जंगल में फंसी राजधानी

जंगल में ट्रेन रोकी गई, ख़बर मिली, टीवी स्क्रीन रौशन हुए, 800 सौ यात्री बंधक, ड्राइवर का अपहरण, अब क्या होगा? क्या देश में एक नया देश बन गया है? कुछ दिन पहले छूटे पुलिस ऑफिसर के सीने पर ‘प्रिज़नर ऑफ वार’ का पट्टी लिखा ये संकेत फिर से उभर आया। कुल मिलाकर जो कुछ सुनाई और दिखाई पड़ रहा था वो शाम तक इस सुकून के साथ खत्म हुआ कि ड्राइवर को छोड़ दिया गया, यात्रियों को जाने दिया गया पांच घंटे बाद ट्रेन फिर से अपने गंतव्य को चल पड़ी। लेकिन ये संदेश लेकर कि जंगलों में भी एक आबादी रहती है जो मूलभूत सुविधाओं के लिये पिछले तीन दशकों से राजधानी की राह देख रही है। इस बीच माओवादियों की एक मांग भी देश की सरकार के सामने रखी गयी ‘छत्रधर महतो, कबाड़ और जेल में बंद उनके एक और समर्थक/ हिमायती को रिहा कर दिया जाए’। शाम तक टीवी चैनलों का रुख थोड़ा नरम हुआ और हजारों यात्रियों समेत ट्रेन के अपहरण की खबर माओवादी समर्थित पीसीपीए की अगुवाई में सैकड़ों गांव वालों द्वारा किये गये चक्का जाम में बदल गयी। मीडिया के कैमरे लोगों के बयान दर्ज कर रहे थे लेकिन यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, वो तो भला हो एक बच्चे का जिसने बताया कि उसने गाड़ी रोकने वाले लोगों को सबके साथ, अपने साथ अच्छा सुलूक करते हुए पाया, “वो हम सबको पानी भी पिला रहे थे”।

जिस तरह से ट्रेन पर बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी में उनके द्वारा लिखा दिख रहा था वो साफ़ इशारा करता है कि ये सब इसलिये किया गया ताकि देश की सरकार के साथ-साथ (उसके साथ तो वार्तालाप का सिलसिला दशकों से जारी है) देश की जनता के सामने भी नक्सली / माओवादी / जिंदा रहने की लगभग अंतिम लड़ाई लड़ रहे हजारों लोग, अपना एजेंडा पहुँचाएँ। इन इलाकों के विकास को लोकर जो जमीनी कार्यकर्ताओं की मांग है और जिस विकास कार्य का प्रयत्न सरकार के द्वारा किया जा रहा है उसमें ज़मीन आसमान का अंतर है। सवाल ये नहीं है कि उन्हें किया मिल रहा है, उनके सवाल वो हैं जो उन्हें चाहिये।

इस घटना से जुड़ा एक पहलू ये भी है कि आंदोलन ज़रूर जंगल में रहने वालों का है लेकिन उनके हक़ के लिये लड़ने वाले अकेले जंगल के नहीं हैं बल्कि देश और दुनिया में रहने वाले समाज चिंतक और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग भी हैं (सरकार ऐसे लोगों से माओ वादियों और नक्सलियों का बौद्धिक समर्थन न करने की अपील भी कर रही है)। उधर जंगल में सड़कें, अस्पताल, स्कूल और बिजली-पानी भले न हों, सूचना तंत्र बहुत विकसित है। कुछ दिन पहले ही 20 गांववासियों को छुड़वाकर जो नया रक्त संचार आंदोलन की रगों में हुआ है उसके जोर पर कुछ ऐसा करने की चाहत बलवती हो गई जो मामले को गरम रखे। इंफोटेनमेंट के सहारे 24 घंटे दर्शक सेवा में मशगूल खबरिया चैनल ऐसी घटनाओं को हाथों हाथ लेंगे, राजधानी पर हमले के पीछे ये सोच भी जरूर रही होगी। ऐसे में जंगल को ये सुनहरा मौक़ा लगा अपने एजेंडे की लोकप्रियता हासिल करने का।

अब सारा दारोमदार सरकार के कंधों पर है कि वो देश को इस चुनौती से कैसे निकाले। गृहमंत्री जितने सभ्य दिखते हैं अगर वो उसी चश्में से समस्या को देखेंगे तो शायद आने वाले दिनों में ये हो कि सरकार और माओवादी चिंतक बैठकर कुछ ऐसा करते दिखें जिसे जंगल के लोग अपनी तरफ़ बढ़ा एक क़दम मानें। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ये कहते नहीं थकते कि सोनिया जी ने पिछली कई चुनौतियों में देश को संकट से निकालने का रास्ता हमवार करवाया है, देखना है कि इस समस्या से वो कैसे निपटती हैं। वो इस समय ताक़त के उस शिखर पर हैं कि मुख़ालिफ़ हवाओं का भी सामना बख़ूबी कर सकती हैं।

अगर ऐसा न हुआ तो सारा बोझ बंगाल की वाम सरकार पर आ जायेगा और वो इसके समर्थन में वही दर्दमंदी दिखायेगी जो उसने पिछले दिनों बीस जंगल निवासियों को रिहा करते हुए दिखाई थी कि “हमारे देश के संविधान और इज़्राइल के संविधान में फर्क है, दूसरे ये कि जब कंधार और रुबया सईद की रिहाई के लिये विदेशी आतंकियों को छोड़ा जा सकता है तो एक पुलिस अधिकारी जो देश वासी है और देश की कानून व्यवस्था की रक्षा करने का काम करता है, उसके लिये 20 गरीब जंगल वासियों को, जिनपर कोई इल्ज़ाम अभी साबित भी नहीं हुआ है, बेल पर क्यों नहीं छोड़ा जा सकता?”। इसके बाद जो बातें इस घटनाक्रम के मद्देनजर सामने हैं वो खिचड़ी जैसी हैं, मसलन घटना की जिम्मेदार पीसीपीए, वही है जिसका समर्थन ममता बैनर्जी एंड पार्टी करती है, तृणमूल का मानना है कि ये सब कुछ वाम सरकार वोट के लिये कर रही है। वाम मंथी इसे ममता की सियायत मानते हैं, “इसे कैसे ढूँढ़ लिया, जो दो साल से लापता हैं वो कहां हैं?”, “आपकी गल्ती ये है कि आपने कभी पीसीपीए जैसे संगठनों की सोच को खारिज नहीं किया, वो आपके पार्टी सहयोगी हैं” वगैरह वगैरह।

इसी बीच ये भी संयोग ही है कि पिछले सप्ताह नक्सली हकों के लिए काफी मुखर अरूंधति राय अचानक टीवी चैनल पर ये कहती हुई दिखाई पड़ी हैं कि छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर पिछले 30 साल से नक्सली रह रहे हैं लेकिन अभी ही क्यों युद्ध जैसे हालात बनाये जा रहे हैं? वो मानती हैं कि सरकार युद्ध चाहती है ताकि छत्तीसगढ़ और झारखंड के उन इलाकों को खाली कराया जा सके जिन्हें एमओयू के जरिये बंधित किया जा चुका है लेकिन वहां बसने वालों के आंदोलन/विरोध की वजह से उसपर खनन का काम नहीं शुरू किया जा सका है।” यानी सरकार को कभी न कभी इस इल्जाम का जवाब देना ही पड़ेगा कि क्या वो खनन माफियाओं के लिये सरकारी संगीने मुहय्या कर रही है? सूचना तंत्र और आर टीआई जैसे साधन जनता के पास मौजूद हैं इसलिए उसे सरकार के जवाब का इंतेजार रहेगा।

26/11 को छोड़ दें तो देश ने एक अर्से से अपने अंदरूनी हालात पर कोई बड़ी बहस नहीं की है। उससे ज़्यादा तो हम पाकिस्तान के अंदरूनी हालात पर बहस कर डालते हैं। और हमारी अंदरूनी हालत ये है कि हमारी चिंता आतंक, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्री लंका, गोते खाते शेयर मार्केट और दुनिया की अर्थव्यवस्था, सस्ते चीनी सामान की घुसपैठ से बच बचा कर जब घर लौटती है तो म्यूनिस्पिल कार्पोरेशन से लेकर अरुणाचल प्रदेश के रंगहीन चुनावी माहौल में रंग भरने में जुट जाती है, कुछ बहाने बनाकर देश-विदेश घूमने की व्यस्तताओं में ख़ुद को फंसा लेते हैं। विपक्ष के अपने मुद्दे इतने टर्मिनल स्टेज पर हैं कि सर्जरी और कीमियोथ्रेपी की सलाहें दी जा रही हैं। ऐसे में या तो राजधानी को जंगल में रोका जायेगा या फिर वीराने में बैठकर निदा फाजली के ये ताजातरीन शेर (ये भी एक तरीका है) गुनगुनाएगा-
तीन चौथाई से ज़ायद हैं जो आबादी में
उनके ही वास्ते हर भूख है, मंहगाई है
कोई हिंदू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सबने इंसान न बनने की कसम खाई है
सिंर्फ मंसूबों में मौसम के बदलते हैं मिजाज
सिर्फ तकरीरें बताती हैं बहार आई है

--नाज़िम नक़वी
बी-1/924 टॉवर न. 16
सिल्वर सिटी अपार्टमेंट
सेक्टर 93ए
नोएडा, गौतम बुद्ध नगर

Wednesday, October 28, 2009

सीता से भी ज्यादा अग्नि परीक्षाएँ देती है आज की नारी

लंदन में रहने वालीं शन्नो अग्रवाल नारियों की वर्तमान हालत को ध्यान में रखते हुए कुछ मासूम सवाल कर रही हैं-

गौर करिये कि सीता को दो बार अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी थी वह भी रामराज्य में पर आज की कितनी ही नारियों को आये दिन तरह-तरह की अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। अग्नि केवल धधकती हुई लपटों वाली ही नहीं होती बल्कि जहाँ यातनाएँ बढ़ती जाती हैं अंतरात्मा झुलसने लगती है और नारी को उस यातना की अग्नि से गुजरना पड़ता है जो असहनीय होती है और मरते दम तक जलाती रहती है, वह भी एक अग्नि ही है। यहाँ पर सीता मैया और आज की नारी के बीच कुछ मोटे-मोटे से तथ्य हैं जिनपर भी नज़र डालना ज़रूरी है। कुछ में समानता है और कुछ में नहीं।
1. उस समय के हिसाब से सतयुग की सीता का जीवन बहुत सीधा-सादा व सरल सा था। घर गृहस्थी के मामले में भी और उम्मीदों की तुलनात्मक दृष्टि से भी। क्योंकि आज की नारी कलियुग की होते हुये भी उस युग की नारी से मानसिक विकास में अधिक बड़ी हैं, साथ में मानसिक परेशानियाँ भी झेलती है। उसे ना जाने कितनी उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है और उससे न जाने कितनी उम्मीदें बढ़ती ही रहती हैं.....जिनका अंत ही नहीं होता। मानसिक और शारीरिक रूप से कामों में व्यस्त व सजग रहती है। उसके बाद भी कितनी ही अंतर्मन को झुलसा देने वाली अग्नि-परीक्षाओं से वह गुजरती है। लेकिन सीता को आज की नारी की तरह इतना कुछ नहीं सहना पड़ा था......फिर भी उनके नाम का ही उदाहरण दिया जाता है।
2. सीता के साथ हुये अन्याय के लिये राम ही जिम्मेदार थे जिन्होंने अपनी पत्नी को दूसरों के शक करने पर उनकी अग्नि परीक्षा ली पर उन्होंने कभी अपनी पत्नी का अपमान नहीं किया। लेकिन आज के तमाम राम (पति परमेश्वर) समाज के लिये नहीं बल्कि समाज से छिपा कर स्त्री में दोष ढूंढकर उसका अपमान करते हैं। कभी-कभी घरवालों के संग मिलकर भी ज्यादतियां और अत्याचार करते जाते हैं। (औरत इसमें दहकती है)।
3. राम सीता के कहने पर केवल मृग के पीछे इसलिए भागे थे ताकि सीता को वह हिरन पकड़ कर दे सकें। किन्तु आज के राम की बुद्धि के कपाट कब बंद हो जाएँ पता ही नहीं चलता और कब वह किसी मायाविनी के पीछे पड़कर अपनी सीता जैसी पत्नी को तज दे उस छलना के लिये.....कहना मुश्किल है। (औरत इसमें दहकती है)।
4. कलियुग में भी घर के बाहर बहुत से रावण मिलेंगें जो स्त्री पर बुरी दृष्टी रखते हैं। किन्तु जिस रावण ने सीता मैया का अपहरण किया था उसने पवित्रता की मर्यादा नहीं लांघी और सीता पवित्र रहीं। वह रावण एक विद्वान व धार्मिक व्यक्ति था किन्तु उसने केवल अपनी बहन की जिद के आगे झुककर बदले की भावना से ही अपहरण के बारे में सोचा था। फिर भी सीता की पवित्रता पर शक किया गया। आजकल के युग में भी बाहरी रावणों से स्त्री बचती रहती है पर फिर भी शक किया जाता है, और ताने सुनती है। (औरत फिर दहकती है)।
5. लक्ष्मण ने तो केवल कुटिया के बाहर ही रेखा खींची थी और सीता ने किसी बुरे इरादे से उसे नहीं लांघा था किन्तु उनका धोखे से अपहरण हो गया। और बाद में शक का शिकार बनीं, और आज की नारी वैसे तो निकलती है घर के बाहर लेकिन उसके लिये आज भी कुछ सामाजिक दायरों का बंधन है जिसका कभी धोखे से भी उल्लंघन हो गया तो पुरुष के शक की कटारी आ गिरती है उसपर। किसी पुरुष के संग निर्दोषता से भी हँसने-बोलने या बाहर जाने पर उसे सबकी निगाहों व बातों का शिकार बनकर ताने सुनने पड़ते हैं। लेकिन पुरुष अपनी मनमानी करते रहते हैं और कितने लोग अनदेखी कर जाते हैं। (औरत फिर दहकती है)।
6. चलो मानते हैं कि उस समय रामराज्य था और उस समय की विचारधारा और थी। और एक राजा ने प्रजा को प्रभावित करने के लिए अपनी पत्नी को अग्नि परीक्षा देने को मजबूर कर दिया। उस प्रभावशाली व्यक्ति या देवता ने इस अक्षम्य अपराध को किया। पर आज के युग में..... ऐसा क्यों? क्या पुरुष भी ऐसी ही अग्नि परीक्षा देकर अपने को साबित कर सकते थे/ हैं? क्या कहा....नहीं।
इसका मतलब है कि रामराज्य और कलियुग की नारी में एक बात की समानता अब भी है....और वह है उसपर शक किया जाना और परीक्षाओं से गुजरना।
आज का युग कलियुग कहा जाता है, नारी हर दिशा में सतयुग की नारी से बढ़-चढ़ कर है और हर क्षेत्र में पुरुष की बराबरी करने की इच्छा व क्षमता रखती है और सिद्ध कर चुकी है...पर आज के कितने पुरुषों की विचारधारा नारी को लेकर बदली है? कोई बतायेगा? आज की नारी मानसिक रूप से समर्थ होते हुये भी पुरुष से तरह-तरह की मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना सहती है। देश-विदेश में हर जगह देखो पुरुष का अहम् ही नारी का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। नारी की साधना, उसका आत्म विश्वास, उसका खिलखिलाना जब पुरुष तोड़ता है तो सब मुरझाकर भस्म हो जाता है। जीते जी कितनी ही नारियाँ सुलग रही हैं समाज में चारों तरफ। मिलने-जुलने वाले लोग आते हैं और अपनेपन की बातें करते हैं दिखावे को व मन बहलाने के लिए किन्तु जैसे ही वहां पर किसी नारी पर अत्याचार होने का आभास पाते हैं तो तुंरत ही वह सब अपने को एक किनारे कर लेते है, सोचते हुये कि ' हम क्यों किसी की बुराई-भलाई व झगडे में पड़ें'... उस समय उस लाचार औरत को कितने अकेलेपन का अहसास होता होगा क्या कभी किसी ने सोचा है? सभी अपने उस समय पराये हो जाते हैं उसके लिये। सबको अपनी-अपनी पड़ी रहती है इस दुनिया में। इसीलिए शायद कहा गया है कि 'यह दुनिया केवल मुंह देखे की है', जहाँ किसी को सुख में देखा तो जलन और किसी को परेशानी में देखा तो मुँह छिपा कर खिसक लेते हैं लोग। एक टूटता हुआ इंसान सहारा न पाकर बिलकुल ही टूट जाता है। ऐसी स्थिति में एक इंसान की नहीं बल्कि कइयों के संबल की आवश्यकता होती है मुसीबत की मारी किसी नारी को। एक नहीं बल्कि तमाम आवाजों से किसी अत्याचार की दीवारें हिलाई जा सकती हैं। वरना जब तक हम यह चाहेंगे और होने देंगें तब तक यह सब होता रहेगा.... क्योंकि नारी वसन लज्जा कहा जाता है और उस लज्जा से वह अपनी असलियत को नंगा नहीं करती क्योंकि अत्याचार के विरुद्ध बोलने से उसकी बदनामी होती है....और मुंह बंद रखकर कष्ट झेलती रहती है घर भर का सम्मान बचाने को। घर की मान-मर्यादा बचाकर सबके सामने अपनी तकलीफों को छिपाने का ढोंग करती रहती है जाने-पहचाने लोगों में.....लेकिन फिर अन्दर ही अन्दर मन में घुटकर किसी के जाने बिना ही वह सबकी निगाहों से बचकर अपनी अग्नि में एक दिन वास्तव में मर जाती है...स्वाहा कर देती है अपने को अत्याचार की आग में....कितना दुखद और अजीब है यह क्रम!! सोचती हूँ कि सीता में तो दैविक शक्ति थी जो आज की नारी में नहीं है. और वह दूसरी बार अग्नि परीक्षा से गुजरते हुये अपमान को न झेल पायीं थीं और पृथ्वी में समा गयीं हमेशा के लिये. किन्तु आज की नारी तिल-तिल कर जलती है सोचते हुये कि वह भी धरती में समा जाये ताकि और अपमान ना सहना पड़े।

माँ, बहन, बेटी का रूप और पुरुष की सहचरी
जो सृष्टि की रचना करती वह तो केवल नारी है
दया-धरम, प्यार-ममता की मूरत का प्रतिरूप
इतना होने पर भी नारी इस धरती पर भारी है।

--शन्नो अग्रवाल

चित्र-साभार- राधिकिता

Tuesday, October 27, 2009

मुहल्ले वालो, मुबारकां!!

वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्ले में एंट्री मारी तो हम मुहल्ले वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। लगा सरकार के कान पर जूं रेंग गई है। हम तो मान बैठे थे कि कि सरकार के पास और तो सबकुछ होता है पर कान नहीं होते। छः महीने से मुहल्ले की इकलौती स्ट्रीट लाइट खराब है। पचास बार शिकायत दर्ज करवा चुके थे। कुछ नहीं हुआ। चार महीने से मेन सिवरेज पाइप टूटी हुई है। जो भी कोई मुहल्ले से बाजार जाता कमेटी के दफ्तर जा शिकायत कर आता। कुछ न हुआ। वैसे तो मुहल्ले के हर घर में ही सरकार ने नल लगवाया हुआ था पर पानी सार्वजनिक नल में ही आता था। पंद्रह दिन से वह नल भी बच्चे की शू शू की धार पर उतर आया था। बारीनुसार कमेटी में शिकायत करने गया तो वहां पर कुर्सी तोड़ते बंदे ने डांटते कहा,‘ यार! तुम लोगों को कोई और काम भी है या नहीं!’
‘क्या मतलब?’
‘ माडल मुहल्ले से ही हो न?’
‘हां जी!’
‘मैं तो देखते ही पहचान गया था।’ कुछ देर हँसने के बाद वह आगे बोला, 'कहो किस चीज की शिकायत दर्ज करवानी है बिजली की?’
‘ नहीं, वह तो चार महीने पहले करवाई थी। अब शिकायत लिखवा लिखवा कर थक गए।’
‘तो गंदगी की?’
‘थक हार कर अब हम खुद ही मुहल्ले को साफ करने लग गए हैं।’
‘वैरी गुड यार! लगता है समझदार हो रहे हो। अगर व्यवस्था को इसी तरह सहयोग दो तो न कठिनाई तुम्हें हो और न हमें। तो सीवरेज की.....!’
‘नहीं साहब! अब हमने अपने मुहल्ले में शौच करना बंद कर दिया है।’
‘ अरे वाह! तुम तो हद से ज्यादा समझदार हो रहे हो। अब देखना! तुम भी चैन से रहोगे और हम भी। जीना इसी का नाम है मित्र।’ कह उसने मुझे शादीशुदा प्रेमिका की तरह गले लगा लिया। मैं उसके गले लगते ही उसके कान में फुसुसाया,‘पानी की शिकायत करने आया हूं।‘ मेरे कहते ही एकदम मुझसे दूर हटते बोला, ' बस यार! कर दी न फिर वही बात! आप लोग हो ही ऐसे। नाक में दम करके रखते हो। एक शिकायत निपटती नहीं कि दूसरी लेकर आ धमकते हो। तुम्हें शिकायत करने के सिवाय कोई और काम भी हैं क्या? मालूम है, हमें तो आप लोग दम लेने नहीं दोगे पर कम से शिकायत को तो दम लेने दिया करो। जीना हो तो कुछ और भी करो दोस्त! शिकायत करने से पेट नहीं भरा करते। रजिस्टर ही भरा करते हैं। लो, दर्ज कर दी शिकायत! अब खुश??’
उन बंदों में से एक मेरे पास आया, बोला, ‘दरी होगी?’
‘हां है।’
‘ तो दीजिए।‘ मैं भीतर गया और उसका मुँह देखते हुए दरी उसे पकड़ा दी। उसने दरी ली और मुहल्ले के चबूतरे पर बिछा ताश खेलने जम गए। ग्यारह बजे....बारह बजे ...एक बज गया... दो भी बज गए... वे ताश में ही मस्त रहे। हिम्मत कर मुहल्ले के प्रधान ने उनसे पूछा, ‘माफ कीजिए कहां से आए हो?’
‘कमेटी से।’ उनके कहते ही यह खबर मुहल्ले में आग की तरह फैल गई।
‘नलका ठीक करने आए हो?’
‘नहीं।’ एक ने बालों में उंगलियां देते कहा।
‘बिजली ठीक करने आए हो?’
‘नहीं, चाय बनेगी क्या?’ दूसरे ने अलसाते हुए कहा।
‘तो फिर सीवरेज ठीक करने आए होंगे?’
‘ एक बात बताना? इस मुहल्ले में शिकायतें रहती हैं या बंदे?’ तीसरे ने गुस्साए कहा। शायद ताश खेलकर कुछ ज्यादा ही थक गया था।
‘तो आप किसलिए आए हैं?’ काका में पता नहीं हिम्मत कहाँ से आ गई थी।
‘मुहल्ले के लिए बुत सेंक्शन हुआ है। लड्डू शड्डू खिलाओ यार! बड़ी भूख लगी है। मंत्री जी के आदेश हैं कि मुहल्ले में जगह देखो कि कहां लगाना है। अगले हफ्ते वे बुत का शिलान्यास करेंगे। इस नल की जगह लगा दें बुत? वैसे भी इसमें पानी तो आ नहीं रहा। कि ये बिजली का पोल हटा दें यहां से? लाइट है इसमें?’
‘जी नहीं।’
‘बेकार की चीजें ही भरी हैं क्या यार इस मुहल्ले में?’
‘ साहब! सीवरेज भी बंद है।’
‘इस मुहल्ले के लोगों को खाने और हगने के सिवाय और भी कोई काम है क्या?? चलो यार! चलते हैं अब चार बज गए, बाकी कल देख लेंगे।’
‘ड्यूटी तो पांच बजे तक होती है न सरकार??’
‘चार के बाद पांच ही बजते हैं न? तीन तो नहीं बजते?’ चारों ने बड़बड़ाते हुए एक साथ कहा और ये गए कि वो गए। जाते-जाते मुए झाड़ कर दरी भी नहीं दे गए।

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र.

Monday, October 26, 2009

बाल गणेश 2 : बचकानी और बोरियत भरी

फिल्म समीक्षा

एनीमेशन फिल्में एक बहुत बड़ा मार्केट है दुनिया में, पर उसपे पूरा कब्जा है अमेरिका और यूरोपियन देशों का। भारत में कई हॉलीवुड फिल्मों का एनीमेशन का काम होता है, पर भारत में एनीमेशन का मार्केट समझिए नहीं के बराबर है। हनुमान नामक एक फिल्म ने जो अच्छा बिज़नेस किया था उसके चलते बाकि लोगो में भी पौराणिक पात्र और कथा का आधार ले कर एनीमेशन फिल्म्स बनाने की होड़ सी लग गयी। इसी बहती धरा में एक और फिल्म हाथ धोने आई है जिसका नाम है "बाल गणेश 2"। चलिए देखते हैं कि इस फिल्म में कितना दम है-


कथा सारांश:

फिल्म का प्रथम भाग भगवान गणेश के बचपन की बहुत सारी कथाओ में से कुछ कथाओं की माला लेकर आता है। इनमें पहली कहानी है भगवान गणेश और एक बिल्ली की। इस कहानी में अपने वाहक मूषकराज को डराने वाली बिल्ली को सबक सिखाते-सिखाते खुद बाल गणेश को ही पार्वती माता से एक सबक मिलता है कि हमेशा प्राणिमात्र की सहायता करनी चाहिए।

दूसरी कहानी में महर्षि व्यास के लेखक बने बाल गणेश की बुद्धिमानी, एकाग्रता और कार्य के प्रति समर्पण के गुण उजागर किये गए हैं। और बच्चों को ये भी पता चलता है कि बाल गणेश को लेखन का काम सौंप कर महर्षि व्यास ने महाभारत जैसे महान काव्यग्रंथ की रचना की थी।

तीसरी कहानी इस बात की जानकारी देती है कि गणेश के वाहक मूषक वस्तुतः एक भयानक राक्षस थे जिसने भोलेशंकर से मिले वरदान का दुरुपयोग कर के तीनो लोक में त्राहि मचा दी थी। तो उस राक्षस को पराभूत कर के बाल गणेश ने उसे मूषक बना के अपना वाहन बना दिया।

पटकथा:

कहानियों में विस्तृत दृश्यों की कमी के वजह से पटकथा में आज के ज़माने के चूहों की मंडली को सूत्रधार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। पर उनको बेवजह "मुम्बैया" भाषा दी गयी है जो बच्चों के लिए अच्छी सबक नहीं पेश करता। क्या मुम्बैया भाषा में वार्तालाप करना इंसान को जादा स्टाइलिश और मजेदार बना देता है? मुझे तो वह निचली दर्जे का लगा। और संवाद भी नीरस रहने के कारण फिल्म के कथन में सूत्रधार के ये दृश्य रुकावट जैसे लगते है। बाकि बाल गणेश की कहानियों की जान छोटी सी होने के वजह से उन्हें बढाने के लिए बचकाना पैतरेबाजी का इस्तेमाल किया गया है जो बच्चों को तो हँसाता है पर उनके साथ मजबूरन जाने वाले बड़ों को उबासिया लेने पे मजबूर करता है। गुदगुदी करने से हँसी जरुर आती है पर क्या वही उत्तम मनोरंजन का प्रतिक है? नहीं ना? इसीलिए मुझे लगता है एनीमेशन फिल्म के लेखन के बारें में बाल गणेश 2 के लेखक पंकज शर्मा ने हॉलीवुड एनीमेशन फिल्मों का और अभ्यास करना चाहिए।

निर्देशन:

जब लेखन ही कमजोर हो तो दिग्दर्शक को फिल्म की नैया किनारे पार लगाने में तकलीफ तो होगी ही। पंकज शर्मा के लेखन ने पंकज शर्मा के ही दिग्दर्शन को कमजोर कर दिया है। मुम्बैया सूत्रधारों को मजेदार समाज पे फिल्म का बड़ा भाग उनपे चित्रित करने से अच्छा उन्होंने कुछ और सोचना चाहिए था। शायद उतने ही समय में एक और गणेश कथा दर्शकों को दिखाई जा सकती थी।

एनीमेशन :

फिल्म के बजट को ध्यान में रख कर दिग्दर्शक ने मुख्य किरदारों के एनीमेशन पर ज्यादा जोर दे कर सह किरदारों का एनीमेशन थोड़ा कम अच्छा किया है। जैसे कि बाल गणेश के एनिमेटेड किरदार का अभिनय बहुत ही सुन्दर बन आया है। चेहरे के हावभाव और शारीरिक हालचाल को नैसर्गिक तरीके से उभारा गया है। उसके लिए एनिमेटरों को दाद देनी चाहिए। पर फिर भी फेब्रिक एनीमेशन यानी कपडे का एनीमेशन, हेयर एनीमेशन यानी के बालों का एनीमेशन नैसर्गिक नहीं है। और सह किरदारों के एनीमेशन पे ज्यादा तवज्जो न देने के कारण मिला-जुला जो प्रभाव है वह कम हो जाता है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

फिल्म में एक मजेदार गाना है जो बच्चों को नाचने पे मजबूर कर देता है। और पार्श्व संगीत भी कहानी को न्याय देता है। शमीर टंडन और संजय ढकन का काम अच्छा है।

संकलन:

फिल्म सिर्फ़ 1 घंटे की है फिर भी बोरियत लाने में कामयाब होती है। इसमें संकलक से ज्यादा लेखन और निर्देशन की असफलता है।

चित्रांकन (रेंडरिंग):

एनीमेशन फिल्मे पूरी तरह से संगणक पे ही बनायीं जाती है इसलिए चित्रांकन की जगह उसमे हम रेंडरिंग की समीक्षा कर सकते है। जिस प्रकार का रेंडरिंग किया गया है वह किरदारों को प्लास्टिकी रूप देता है जहा हॉलीवुड की फिल्में पूरी तरह से नैसर्गिक रेंडरिंग कर पाती हैं। तो इस लिहाज से ये फिल्म बनावटी सी लगती है जैसे कि प्लास्टिक के खिलौने।

निर्माण की गुणवत्ता:

शेमारू ने निर्माण में एनीमेशन मार्केट को ध्यान में रख के जितना मुनाफा हो सकता है उसके हिसाब से ही लगत लगायी है इसलिए मुख्य किरदारों के एनीमेशन पे जादा वक्त यानी अन्त में पैसा लगाया है और बाकि बारीकियों को नजरंदाज किया है। बिज़नेस के हिसाब से ये सही चाल है पर फिल्म मेकिंग में यह है लो क्वालिटी वर्क ही माना जायेगा। फिल्म का सिनेमास्कोप भी नहीं है। पर लगातार एनीमेशन फिल्म्स बना के ये मार्केट को जिन्दा रखने के लिए शेमारू को बधाइयाँ।

लेखा-जोखा:

** (2 तारे)
बाल गणेश के मनमोहक हावभाव और शारीरिक हालचाल को अच्छी तरह से एनिमेट करने के लिए एक तारा। और दूसरा तारा किसी तरह भी हो पर भारतीय एनीमेशन मार्केट में नए प्रोडक्ट लाते रहने के लिए निर्माता शेमारू के लिए।
यह चित्रपट जल्द ही डीवीडी में आएगा, तो सिनेमाघरो में सैकडो रुपये बर्बाद करने से अच्छा रहेगा के आप डीवीडी लें और बच्चों को बार-बार बाल गणेश की लीलाओं का आनंद लेने दें।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Saturday, October 24, 2009

शोधपत्र- कहाँ तक पहुँची है हिन्दी-ब्लॉगिंग

गये सितम्बर शिमला में भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान द्वारा आयोजित हिंदी अध्‍ययन सप्‍ताह के दौरान आखिरी दिन के सत्र में ब्लॉगर राकेश कुमार सिंह ने 'हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा' पर एक पर्चा पेश किया गया था। राकेश ने इस पर्चा को तैयार करने में एक महीना की मेहनत लगाई। काफी-कुछ समेटा है। कम से कम यह उन पाठकों के लिए हिन्दी-ब्लॉगिंग को कम शब्दों में पूरा जान लेने का आसान चैप्टर ज़रूर हैं जो हिन्दी ब्लॉगिंग में डेब्यू कर रहे हैं......................


हिन्‍दी चिट्ठाकारी: एक और नई चाल?

राकेश कुमार सिंह


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

क्‍या है चिट्ठाकरी

राकेश कुमार सिंह

उत्तर बिहार के तरियानी छपरा की पैदाइश। 15 बरस पहले मैनेजमेंट का ख़्वाब लिए दिल्ली टपके। दूसरे साल छात्र-आंदोलन की संगत में आ गये। बृहत्तर सामाजिक सवालों से रू-ब-रू हुये। लिखने-उखने में दिलचस्‍पी थी। कुछ समय तक फ्रीलांसिंग, अनुवाद, इत्‍यादि के रास्‍ते शोध की दुनिया में उतरे। मीडिया, बाजार, शहर और श्रम पर माथापच्ची कर रहे है। तीन 'मीडियानगर' का संपादन कर चुके हैं। सराय और सफ़र के बीच डोलते हुए सामुदायिक मीडिया में दिलचस्पी जगी। प्रयोग जारी है और सहयोगियों की तलाश भी। फ़ोन- +91 9811 972 872
लेखक का चिट्ठा- हफ्तावार
21 अप्रैल 2003 हिंदी चिट्ठाकारी के लिए ऐतिहासिक दिन था. लगभग एक दर्जन से अधिक सक्रिय ब्लॉग्स और वेबसाइट्स इस बात की पुष्टि करते हैं और आलोक कुमार के 9-2-11 को हिंदी का सबसे पहला चिट्ठा का दर्जा देते हैं. 21 अप्रैल 2003 को अपने पहले ब्‍लॉग-पोस्ट में आलोक लिखते हैं:

चलिये अब ब्लॉग बना लिया है तो कुछ लिखा भी जाए इसमें। वैसे ब्लॉग की हिन्दी क्या होगी? पता नहीं। पर जब तक पता नहीं है तब तक ब्लॉग ही रखते हैं, पैदा होने के कुछ समय बाद ही नामकरण होता है न। पिछले ३ दिनों से इंस्क्रिप्ट में लिख रहा हूँ, अच्छी खासी हालत हो गई है उँगलियों की और उससे भी ज़्यादा दिमाग की। अपने बच्चों को तो पैदा होते ही इंस्क्रिप्ट पर लगा दूँगा, वैसे पता नहीं उस समय किस चीज़ का चलन होगा...1



आलोक के इस पोस्‍ट पर ग़ौर करें तो ब्लॉग के नामकरण और फॉण्‍ट को लेकर उनकी परेशानी साफ़ झलकती है. आज छह साल बाद न केवल आलोक की दोनों परेशानियों का हल ढूंढ लिया गया है बल्कि हिंदी ब्‍लॉग अन्‍य भारतीय भाषाओं, और कहें तो अंग्रेज़ी को भी पछाड़ने की स्थिति में आ चुका है. भारत में इंटरनेट उपयोक्‍ताओं पर ‘जक्‍स्‍ट कंसल्‍ट’ नामक एक कंपनी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार

कुल इंटरनेट इस्‍तेमालकर्ताओं में से 44 प्रतिशत ने हिंदी वेवसाइटों के प्रति उत्‍साह जताया जबकि 25 प्रतिशत उपयोक्‍ता अन्‍य भारतीय भाषाओं में इंटरनेट पर काम-काज़ के प्रति उत्‍सुक दिखे. अंग्रेज़ी को विश्‍वव्‍यापीजाल का पर्याय मान चुके लोगों के लिए सचमुच यह आंख खोलने वाला अध्‍ययन है ...2



वाकई आज क़रीब साढ़े छह साल बाद हिंदी में लगभग 12 हज़ार से ज़्यादा ब्‍लॉग्‍स, 1 हज़ार से ज़्यादा वेबसाइटें तथा 50 हज़ार से ज़्यादा वि‍किपृष्‍ठ3 हैं, और 12 लाख से ज़्यादा पन्‍ने इंटरनेट पर लिखे जा चुके हैं. हो सकता है कि इन आंकड़ों में सौ, दो सौ का अंतर आ जाए पर ये हक़ीक़त है कि आज अंतर्जाल पर हिन्‍दी फ़र्राटे से दौड़ रही है. ऐसे में ज़रूरी है कि इंटरनेट पर हिंदी के इस्‍तेमाल, उसके स्‍वरूप और अन्‍तर्वस्‍तु पर थोड़ा विचार किया जाए. निश्चित तौर पर चिट्ठा इसके लिए एक मुकम्‍मल ज़रिया है क्‍योंकि यह इंटरनेट पर हिंदी बरतने का एक वृहद मंच बन चुका है.

यूं देखा जाए तो अब तक ब्‍लॉग की कोई औपचारिक परिभाषा गढ़ी नहीं गयी है. हालांकि हर ब्‍लॉगर के पास ब्‍लॉगिंग की कोई न कोई परिभाषा ज़रूर है. किसी के लिए यह एक ऐसी डायरी है जिसका पन्‍ना कोई फ़ाड़ नहीं सकता और इस प्रकार इसमें एक ऑनलाइन अभिलेखागार बनने की पर्याप्‍त संभावना दिखती है. कुछ के लिए यह पत्रकारिता का अद्भुद माध्‍यम है: एक ऐसा माध्‍यम जो अब तक उपलब्‍ध तमाम माध्‍यमों से ज़्यादा अवसरयुक्‍त है, जहां अब तक की तमाम मानक लेखन शैलियों और भाषा से इतर मनचाहा ईज़ाद और इस्‍तेमाल करने की बेइंतहां आज़ादी है: लेखक, रिपोर्टर और संपादक सब ब्‍लॉगर ख़ुद होता है. कुछ लोगों के हिसाब से यह स्‍वांत: सुखाय लिखा जाता है, और ऐसा लिखकर लोग अपने मन की भड़ास निकालते हैं. ‘भड़ास’ का तो टैगलाइन ही है:

अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जाएगा...4



हालांकि अपनी समृद्ध मौखिक परंपरा के बरअक्‍स ब्‍लॉग के बारे में जो छिटपुट लिखा गया है उनमें सुश्री नीलिमा चौहान का शोधपत्र ‘अंतर्जाल पर हिंदी की नई चाल: चन्‍द सिरफिरों के खतूत’ प्रमुख है. ब्‍लॉग को परिभाषित करते हुए नीलिमा लिखती हैं :

... चिट्ठे या ब्‍लॉग, इंटरनेट पर चिट्ठाकार का वह स्‍पेस है जिसमें वह अपनी सुविधा व रुचि के अनुसार सामग्री को प्रकाशित कर सार्वजनिक करता है. इस चिट्ठे का तथा इसकी हर प्रविष्टि का जिसे पोस्‍ट कहते हैं एक स्‍वतंत्र वेब – पता होता है. सामान्‍यत: पाठकों को इन पोस्‍टों पर टिप्‍पणी करने की सुविधा होती है! यदि चिट्ठाकार स्‍वयं इस पते को मिटा न दे तो यह सामग्री इस वेबपते पर सदा – सर्वदा के लिए अंकित हो जाती है. अंतर्जाल के सूचना प्रधान हैवी ट्रैफिक – जोन से परे व्‍यक्तिगत स्‍पेस में व्‍यक्तिगत विचारों और भावों की निर्द्वंद्व सार्वजनिक अभिव्‍यक्ति को ब्‍लॉगिंग कहा जा सकता है.5




अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

तमाम मौखिक और लिखित परिभाषाओं के मद्देनज़र मेरा ये मानना है कि ब्‍लॉग स्‍वांत: सुखाय कदापि नहीं हो सकता. ब्‍लॉग पर प्रकाशित हो जाने के बाद उस लिखे हुए के साथ लेखक और प्रकाशक के अलावा पाठक भी जुड़ जाता है. यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह उस लिखे पर सहमति-असहमति, ख़ुशी-नाख़ुशी, तारीफ़ या खिंचाई में से, जो चाहे करे. मेरा यह मानना है कि किसी भी प्रकार की अभिव्‍यक्ति के सार्वजनिक हो जाने के बाद उसका एक असर होता है. हर ब्‍लॉगलिखी किसी न किसी सामाजिक पहलू, प्रक्रिया, प्रवृत्ति, परिस्थिति या परिघटना पर उंगली रख रही होती है, कुछ उकेर रही होती है, कहीं उकसा रही होती है, या फिर कुछ उलझा या सुलझा रही होती है. मिसाल के तौर पर 12 सितंबर 09 को कसबा पर रवीश कुमार की इस अभिव्‍यक्ति पर ग़ौर कीजिए:

आज हिंदी डे है। कई सरकारी दफ्तरों में बाहर भगवती जागरण की बजाय पखवाड़ा वाला बैनर लगा है। पखवाड़ा। फोर्टनाइट का फखवाड़ा। इस फटीचर कांसेप्ट की आलोचना बड़े बड़े ज्ञानीध्यानी बिना बताये कह गए हैं कि पेटीकोट कैसे पुलिंग है और मूंछ कैसे स्त्रीलिंग है। हर भाषा इस तरह की दुविधाओं के साथ बनी होती है। अब हिंदी के साथ डेटिंग किया जाना चाहिए। डेट विद हिंदी।नवरतन तेल,विको वज्रदंती,डॉलर अंडरवियर और बाक्सर बाइक का उपभोग करने वाला हिंदी का बाज़ार। एक अखबार ने विज्ञापन दिया कि इस दीवाली पर हमारे पाठक पांच लाख वाशिंग मशीन खरीदेंगे। आप विज्ञापन देंगे न। हद है। यही ताकत है हिंदी की। और भाषा की ताकत क्यों हो। भाषा को कातर ही होना चाहिए। रघुवीर सहाय ने क्यों लिखा कि ये दुहाजू(स्पेलिंग सही हो तो) की बीबी है। मुझे तो ये दुहाई हुई गाय लगती है। जिसका अब दिवस नहीं मनना चाहिए। जिसके साथ अब डेटिंग करना चाहिए। चैट करनी चाहिए। चैट स्त्रीलिंग है या पुलिंग। किसने बताया कि क्या है।6



रवीश की इस अभिव्‍यक्ति को आप ये कहेंगे कि उन्‍होंने उपर्युक्‍त बातें यूं ही ख़ुद को ख़ुश करने के लिए लिखा है? मुझे तो इसमें साल में एक दिन हिंदी को धो-पोछ कर सजाने की दृष्टि से फ्रेम में जड़ कर दीवार पर टांगने जैसी औपचारिकता का प्रतिरोध झलकता है. ज़रा रवीश की पोस्‍ट पर सतीश पंचम की टिप्‍पणी पर ग़ौर करते हैं:

वैसे ये बात तो सच है कि हाशिये, चिंतन, संगोष्ठी जैसे शब्द सुनते ही जहन में बूढे पोपले चेहरे, श्वेत बालों वाले लोगों की तस्वीर उभरती है।
एक गीत सुना था जिसमें 'दिल' शब्द की जगह 'हृदय' शब्द का इस्तेमाल हुआ था - वह गाना था... कोई जब तुम्हारा 'हृदय' तोड दे....। खोज बीन करने पर एक औऱ गीत का पता चला - अनामिका फिल्म का जिसमें पूरा तो याद नहीं पर कहीं अंतरे में शब्द है कि ...तुझे 'हृदय' से लगाया...जले मन तेरा भी...तू भी तडपे.....
इन दो गीतों के बाद मैंने थोडा सोचना शुरू किया कि आखिर क्यों फिल्म लाईन में 'दिल' शब्द को 'हृदय' शब्द के मुकाबले तरजीह दी जाती है।
जो जबान पर चढे है....वही भाषा बढे है...कम से कम फिल्म लाईन में तो यही चलन है। ...



उपर्युक्‍त दोनों उद्धरणों से ये स्‍पष्‍ट हो जाता है कि ब्‍लॉग महज़ दिल को ख़ुश रखने के लिए तो नहीं लिखा जाता है, और यह भी कि कि पोस्‍ट के साथ-साथ टिप्‍पणी/प्रतिक्रिया भी ब्‍लॉगिंग का एक अहम पहलु है. यह ब्‍लॉ‍गिंग को इंटरैक्टिव बनाती है और ये इसकी बहुत बड़ी ताक़त है. अख़बारों की तरह नहीं कि संपादकीय पृष्‍ट पर कोई लेख छप गया और फिर ख़ुद उसका कतरन लिए यार-दोस्‍तों के सामने लहराते फिर रहे हैं (माफ़ कीजिएगा, मेरे साथ ऐसा लंबे समय से होता आ रहा है), किसी ने अपनी राय दे दी तो ठीक वर्ना ... आप समझ ही सकते हैं कि लेखक की क्‍या हालत होती है! और अगर किसी संवेदनशील पाठक की राय छपी भी तो कौन-से संपादक महोदय फ़ोन करके बताते हैं कि ‘बंधुवर, आपके लेख पर किसी पाठक ने सज्‍जनपुर से चिट्ठी भेजी है, देख लीजिएगा’. इधर ब्‍लॉगिंग में माल प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी हाजिर. मन माफिक प्रतिक्रिया मिल गयी तो बल्‍ले-बल्ले वर्ना बहस खड़ा करने वाली मुद्रा में आने से कौन रोक लेगा. यानी यहां एक तो टिप्‍पणी झट से मिल जाती है, और ऐसी मिलती है कि पट आने पर भी जी खट्टा नहीं होता.

रिश्ते गढ़े पहचान दिलाए

मुझे ब्‍लॉग के बारे में एक बात और लगती है, वो ये कि किसी मसले को एक व्‍यापक ऑडिएंस तक ले जाने और एक नये दायरे से रू-ब-रू होने व रिश्‍ता बनाने का यह एक ज़बर्दस्‍त ज़रिया है. यहां अकसर ऐसा होता है कि कोई शख्‍़स आपसे कभी साक्षात न मिला हो पर आभासी दुनिया में आपकी उपस्थिति से वो वाकिफ़ हो, और अपने मन में उसने आपकी कोई छवि तैयार कर ली हो. यानी आप व्‍यापक ऑडिएंस तक तो जाते ही हैं पर उससे भी आगे बढ़कर लोग आपसे जुड़ते हैं और आपकी एक पहचान गढ़ते है. यानी यहां ब्‍लॉगबाज़ों को एक पहचान मिलती है जो नितांत उनकी आभासी उपस्थिति के आधार पर निर्मित होती है. मिसाल के तौर पर, आपसी बातचीत में साथी ब्‍लॉगर विनीत कुमार अकसर बताते हैं कि जब तक वे मीडिया की नौकरी करते थे तो सहकर्मी भी भाव नहीं देते थे. और अब उनके पोस्‍ट पढ़-पढ़ कर मीडिया से बाबाओं के फ़ोन उनके पास आते हैं और घर आने का न्‍यौता भी.

कहां तक पहुंचा ब्‍लॉग

अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- रामब्लिंग विद् वेलूर
अप्रैल 2004 में जब आलोक ने 9-2-117 की शुरुआत की थी, तब महत्त्वपूर्ण सवाल ये था कि पाठक कौन होगा. हालांकि आलोक और उनके टेकमित्रों ने मिलकर उस समस्‍या को एक हद तक सुलझा लिया. कुछ ग़ैर-तकनीकी पृष्‍ठभूमि के लोगों को भी ऑनलाइन और फ़ोन प्रशिक्षण के मार्फ़त इस बात के लिए राज़ी किया कि वे भी ब्‍लॉगिंग में आएं. लोग आए भी. अगर साल 2004-2005 में आरंभ हुए ब्‍लॉगों पर विचरण करें तो आपको दो बातों का अहसास होगा: पहला ज़्यादातर आरंभिक ब्‍लॉगर टेकविशारद थे और दूसरा सब एक-दूसरे से जुड़े थे. यानी उन ब्‍लॉगरों का एक समुदाय था. वे आपस में पढ़ते-पढ़ाते थे और विशेषकर तकनीकी पक्ष को लेकर अनुसंधान किया करते थे. नुक्‍ताचीनी8, देवनागरी9, रचनाकार10, ई स्‍वामी11, फुरसतिया12 तथा प्रतिभास13 जैसे चिट्ठे और आलोक कुमार, देवाशीष चक्रवर्ती, रवि रतलामी, अनुनाद सिंह, जीतू14, जैसे चिट्ठाकारों ने ब्‍लॉग को लोकप्रिय बनाने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की. मज़ेदार बात ये है कि इनमें से कोई भी खांटी हिंदीवाला नहीं है या यों कहें कि वे हिंदी कर-धर कर नहीं कमाते-खाते हैं. हां, वे हिन्‍दी-प्रेमी और हिंदी के प्रति समर्पित हैं, और प्रकारांतर में उनमें से ज़्यादातर ने शुरू-शुरू में शौकिया लिखना शुरू किया और आज कुछेक को छोड़कर सारे धांसू लिखाड़ बन चुके हैं.

2007 के शुरुआती महीनों में हिंदी चिट्ठों की संख्‍या तक़रीबन 700 थी और नीलिमा के मुताबिक़ उसमें तेज़ी से वृद्धि हो रही थी15. पाठकों की संख्या में भी थोड़ा-‍बहुत इज़ाफ़ा होने लगा था और लोग टेक्‍नॉल्‍जी में दिलचस्‍पी भी लेने लगे थे. 2007 तक आते-आते कुछ मुद्दे आधारित ब्‍लॉग भी अस्तित्‍व में आने लगे थे. कविताओं, कहानियों, संस्‍मरणों से आगे बढ़ कर ताज़ा ज्‍वलंत मुद्दों पर चर्चाएं होने लगी थीं. उसी साल शुरू हुए मोहल्‍ला16, कबाड़खाना17 और भड़ास जैसे सामुदायिक ब्‍लॉगों की मौज़ूदगी से बहस-मुबाहिसों को सह मिलने लगा था. तभी दिसंबर 2007 की 13 तारीख को अगले साल, 2008 की ब्लॉगकारिता कैसी हो – के बारे में वरिष्‍ठ पत्रकार और संवेदनशील ब्‍लॉगर श्री दिलीप मंडल ने अपनी राय कुछ इस तरह ज़ाहिर की:

एक रोमांचक-एक्शनपैक्ड साल का इंतजार है। हिंदी ब्लॉग नाम का शिशु अगले साल तक घुटनों के बल चलने लगेगा। अगले साल जब हम बीते साल में ब्लॉगकारिता का लेखा जोखा लेने बैठें, तो तस्वीर कुछ ऐसी हो। आप इसमें अपनी ओर से जोड़ने-घटाने के लिए स्वतंत्र हैं.18



और फिर उन्‍होंने निम्‍नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया:

हिन्दी ब्लॉग्स की संख्या कम से कम 10,000 हो ...
हिंदी ब्‍लॉग के पाठकों की संख्या लाखों में हो ...
विषय और मुद्दा आधारित ब्लॉगकारिता पैर जमाए ...
ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो ...
टिप्पणी के नाम पर चारण राग बंद हो ...
ब्ल़ॉग के लोकतंत्र में माफिया राज की आशंका का अंत हो ...
ब्लॉगर्स मीट का सिलसिला बंद हो ...
नेट सर्फिंग सस्ती हो और 10,000 रु में मिले लैपटॉप और एलसीडी मॉनिटर की कीमत हो 3000 रु ...
हैपी ब्लॉगिंग!19



जिस ऑर्डर में दिलीपजी ने शुभकामनाएं व्‍यक्‍त की थी, थोड़े-बहुत उलट-फेर के साथ भी यदि उनकी पूर्ति हो जाती तो हिंदी ब्‍लॉगिंग की सेहत में सुधार आता. बेशक 12 हज़ार से ज़्यादा ब्‍लॉग बन गए हों, मुद्दा आ‍धारित ब्‍लॉगों के पैर जमने लगे हों, असहमतियों और झगड़ों से गली-नुक्‍कड़ भी झेंपने लगे हों किंतु मठाधीशी, चारण-वंदन, मिलन समारोहों और वार्षिकियों जैसे छापे की दुनिया के रोगों से चिट्ठाकारी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो पायी है. इंटरनेट के व्‍यापकीकरण तथा कंप्‍युटर की उपलब्‍धता में अवरोध से तो हम वाकिफ़ हैं ही.

ब्लॉग कैसे–कैसे


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- वीब्लॉगकार्टून

पिछले पांच-छह सालों में ब्‍लॉग ने तमाम किस्‍म की अभिव्‍यक्तियों को प्रबल और मुखर बनाया है. व्‍यक्तिगत तौर पर लोग ब्‍लॉगबाज़ी कर रहे हैं, अपने ब्‍लॉग पर लिख रहे हैं; मित्रों के ब्‍लॉग के लिए लिख रहे हैं, सामुदायिक ब्‍लॉगों पर लिख रहे हैं. कई दफ़े ये लेखन असरदार भी साबित हो रहे हैं. इससे पहले कि ब्‍लॉग के अन्‍य पहलुओं पर बातचीत की जाए थोड़ी चर्चा ब्‍लॉग के स्‍वरूप पर.

अंतर्जाल पर ज़्यादातर चिट्ठे साहित्‍य-साधना में लीन नज़र आते हैं. उनमें भी भांति-भांति की कविताई करते ब्‍लॉगों की संख्‍या ख़ास तौर से ज़्यादा है. सामुदायिक ब्‍लॉगों को छोड़ भी दिया जाए तो पिछले दो-ढ़ाई सालों से व्‍यक्तिगत ब्‍लॉगों पर भी सरोकार और चिंताएं दिख रही हैं. मिसाल के तौर पर गिरीन्‍द्र के ब्लॉग अनुभव पर 10 अप्रैल 2006 को प्रकाशित उनकी पहली पोस्‍ट के इस अंश पर ग़ौर करते हैं:

... दिल्ली से नज़दीकी रिस्ता रख्नने वाले प्रदेश इस बात को भली-भाती ज़ानते है. उतर प्रदेश, हरियाणा के ज़्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग रोज़ी-रोटी के लिए दिल्ली से सम्बध बनाए रखे है.
हरियाणा का होड्ल ग्राम आश्रय के इसी फार्मुले पर विश्वास रखता है... कृषि बहुल भुमि वाले इस गाव मे एक अज़ीब किस्म का व्यवसाय प्रचलन मे है,ज़िसे हम छोटे -बडे शहरो के सिनेमा हालो या फैक्ट्री आदि ज़गहो पर देखते है.वह है-साइकल्-मोटरसाइकल स्टैड्.दिल्ली मे काम करने वाले लोग रोज़ यहा आपना वाहन रख कर दिल्ली ट्रैन से ज़ाते है. एवज़ मे मासिक किराया देते है.
ज़ब मै होड्ल के स्थानिय स्टेशन से पैदल गुजर रहा था तो मैने एक ८० साल की एक् औरत को एक विशाल परती ज़मीन पर साईकिलो के लम्बे कतारो के बीच बैठा पाया...उस इक पल तो मै उसकी उम्र और विरान जगह को देखकर चकित ही हो गया पर जब वस्तुस्थिती का पता चला तो होडल गाव के आश्रयवादी नज़रिया से वाकिफ हुआ.जब मैने उस औरत से बात करनी चाही तो वह तैयार हो गयी और अपने आचलिक भाषा मे बहुत कुछ बताने लगी.उसने कहा कि खेती से अच्छा कमाई इस धधा मे है ...20



इस अध्‍ययन के सिलसिले में उपर्युक्‍त पोस्‍ट के बरअक्‍स 2006 के अप्रैल-मई महीने में कुछ और तलाशने के लिए मैंने तक़रीबन 80-90 ब्‍लॉगों का भ्रमण किया. ज़्यादातर पर कविताएं मिलीं. यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि तब या अब ही, जितनी प्रतिक्रियाएं कविताओं को मिलती हैं उतनी मुद्दे आधारित पोस्टों को नहीं. मिसाल के तौर पर उपर्युक्‍त पोस्‍ट पर आज तक एक प्रतिक्रिया भी नही आयी है. यानी इसे इस बात का संकेत माना जा सकता है कि मुद्दों पर लिखना कितना इकहरा काम होता है. मुझे ऐसा लगता है कि हिंदी चिट्ठाकारी से चारण-राग ख़त्‍म न होने की एक वजह ये भी है. वैसे भी कविताई या अन्‍य विशुद्ध साहित्यिक विधाओं में चारण-राग चलता आया है.

जहां तक सामुदायिक ब्‍लॉगों का प्रश्‍न है तो उनका उदय ही किसी न किसी मुद्दे, विषय या प्रसंग विशेष के कारण होता है. मिसाल के तौर पर अविनाश के ब्‍लॉग ‘मोहल्‍ला’, जो कि बाद में सामुदायिक घोषित कर दिया गया – के इस पहले पोस्‍ट पर ग़ौर करते हैं:

साथियो, नेट पर बहुत सारे पन्ने हैं, फिर इस पन्ने की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन हसरतों का क्या किया जाए? हम सब मोहल्ले-कस्बे के लोग हैं. पढ-लिख कर जीने-खाने की जरूरत भर शहर में रहने आते हैं और रहते चले जाते हैं. शायद हम उम्र भर शहरों में रहना सीखते हैं. हर ऊंची इमारत को फटी आंखों से देखते हैं, और ये देखने की कोशिश करते हैं कि कब इसकी फर्श पर हमारे पांव जमेंगे. लेकिन जडों से उखडना क्या इतना आसान है? आइए, हम अपनी उन गलियों को याद करें, जहां हमारी शक्ल ढंग से उभर कर आयी थी... अविनाश21



अब ‘भड़ास’ पर उसके मॉडरेटर यशवंत सिंह ने लोगों को अपने ब्‍लॉग से जोड़ने के लिए जो न्‍यौता प्रकाशित किया था, ज़रा उस पर ग़ौर फ़रमाते हैं:

भई, जीना तो है ही, सो भड़ास जो भरी पड़ी है, उसे निकालना भी है। और, इसीलिए है यह ब्लाग भड़ास। जब दिल टूट जाए, दिमाग भन्ना जाए, आंखें शून्य में गड़ जाएं, हंसी खो जाए, सब व्यर्थ नज़र आए, दोस्त दगाबाज हो जाएं, बास शैतान समझ आए, शहर अजनबियों का मेला लगे .....तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए।22



अशोक पांडे ने जब ‘कबाड़खाना’ आरंभ किया तो लोगों को अपना हमसफ़र बनाने के लिए उन्‍होंने विरेन डंगवाल की इन पंक्तियों का सहारा लिया:

पेप्पोर रद्दी पेप्पोर
पहर अभी बीता ही है
पर चौंधा मार रही है धूप
खड़े खड़े कुम्हला रहे हैं सजीले अशोक के पेड़
उरूज पर आ पहुंचा है बैसाख
सुन पड़ती है सड़क से
किसी बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार
गोया एक फ़रियाद है अज़ान सी
एक फ़रियाद है एक फ़रियाद
कुछ थोड़ा और भरती मुझे
अवसाद और अकेलेपन से



सामुदायिक ब्‍लॉग काफ़ी हद तक अपने मिशन में सफल भी रहे. अनेक सामाजिक सरोकार के मसलों पर वहां बहसें हुई. कुछ लोगों ने बहस में प्रत्‍यक्ष यानी लेखों या विचारों के ज़रिए शिरकत की और कुछ ने टिप्‍पणी के मार्फ़त. आज इन सामुदायिक ब्‍लॉगों में से कोई ख़बर छानने में व्‍यस्‍त है तो कोई मीडिया की ख़बर ले रहा है, कुछ विचारधाराओं की रेहड़ी लगाए बैठे हैं तो कुछ पामिस्‍ट्री किए जा रहे हैं, कहीं बेटियों के बारे में आदान-प्रदान हो रहा है तो कहीं बेटों के बारे में. जिन सामुदायिक ब्‍लॉगों का अभी हवाला दिया गया उनके अलावा दर्जनों अन्‍य सामुदायिक ब्‍लॉग हैं. यह सच है कि सामुदायिक चिट्ठों से इस माध्‍यम को और ज़्यादा लोकप्रियता मिली. हालांकि, यह भी सच है कि साल 2009 के अपराह्न तक आते-आते सामुदायिक ब्‍लॉगों की धार और रफ़्तार मंद पड़नी शुरू हो गयी है. कुछ चिट्ठे तो तक़रीबन बंद हो चुके हैं, बस औपचारिक घोषणा होना बाक़ी है. मॉडरेटरों की व्‍यक्तिगत प्राथमिकताओं में आया बदलाव इसकी सर्वप्रमुख वजह लगती है. कल तक जो सामुदायिक ब्‍लॉग चला रहे थे आज डॉटकॉम चलाने लगे हैं, या यूं कहें कि कल तक जो सामुदायिक ब्‍लॉग थे आज डॉटकॉम में तब्‍दील हो रहे हैं.

बहरहाल, इतना तो तय है कि हिंदी में हर वैसे विषय, प्रश्‍न या मुद्दे पर ब्‍लॉगिंग हो रही है जो इस वक़्त आपके कल्‍पनालोक में घुमड़ रहे हैं. ये ज़रूर है कि यहां साहित्‍य का बोलबाला है. 12 हज़ार में से लगभग 10 हज़ार ब्‍लॉगों पर साहित्‍य साधना हो रही है, और उनमें भी कविताई करने वालों की तादाद ज़्यादा है. साहित्‍यकुंज, अनुभूति, बुनो कहानी, मातील्‍दा, तोत्तोचान, अंतर्मन, उनींदरा, अवनीश गौतम वग़ैरह हिंदी ब्‍लॉगिंग में प्रमुख साहित्‍य-साधना-स्‍थली हैं. उदय प्रकाश, हिंदी ब्लॉगिंग में सक्रिय बड़े साहित्‍यारों में से एक हैं. फिल्‍म और सिनेमा को समर्पित ब्‍लॉगों में इंडियन बाइस्‍कोप, आवारा हूं और चवन्‍नी चैप का स्‍थान अग्रणी है. गीतायन और रेडियोवाणी पर तमाम तरह के हिंदी गीतों का भंडारण हो रहा है. गाहे-बगाहे और टीवी प्‍लस टेलीविज़न की दुनिया में हो रहे हलचलों पर निगाह टिकाए हुए है. ज्ञान-विज्ञान, रवि-रतलामी का हिंदी ब्‍लॉग, प्रतिभास, मे आइ हेल्‍प यू, क्रमश:, देवनागरी, इत्‍यादि विज्ञान और तकनीकी से मुताल्लिक़ नए-नए अनुसंधानों की जानकारी प्रदान करने के साथ-साथ ब्‍लॉगरों को तकनीकी परेशानियों से निजात भी दिलाता है. अनुनाद सिंह इतिहास पर महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक लेखों को संकलित कर रहे हैं. रिजेक्‍ट माल, अनुभव और हाशिया जनपक्षधर पत्रकारिता और वैचारिकी के विलक्षण उदाहरण हैं, कस्‍बा, अनामदास का चिट्ठा, कानपुरनामा और फुरसतिया, उड़न-तश्‍तरी, मसिजीवी संस्‍मरणों और वैचारिकी के कुछ चुने हुए ठीहे हैं, खेती-बाड़ी अपने नाम को चरितार्थ करता इससे संबंधित जानकारियों का स्रोत है, दाल रोटी चावल पर लज़ीज़ व्‍यंजनों की जानकारी बनाने की विधि समेत एकत्रित की जा रही है, मस्‍तराम मुसाफिर अंतर्जाल पर प्रिंट वाले ‘मस्‍तराम’ की नुमाइंदगी करता है, हालांकि, साल 2005 के बाद इस पर कुछ नया माल नहीं चढ़ाया गया है.

अंग्रेज़ी ब्‍लॉगिंग के विपरीत हिंदी ब्लॉगिंग में आंदोलनों, अभियानों, संघर्षों, संगठनों या मुद्दों पर आधारित ब्‍लॉगों की संख्‍या नगण्‍य है. अंग्रेज़ी में इराक़ तथा अफ़गानिस्‍तान में अमरीकी गुण्‍डागर्दी, पाकिस्‍तान की आंतरिक हालत, जाति और जेंडर भेद, बचपन, वृद्धावस्‍था जैसे मसलों, पर्यावरण या ग्‍लोबल वार्मिंग पर चलने वाले अभियानों, तथा मानवाधिकार और पशुअधिकार आंदोलनों के बारे में समर्पित ब्‍लॉगिंग हो रही है. हिंदी में फिलहाल ये ट्रेंड नहीं बन पाया है. हालांकि, ये ज़रूर है कि अब इस माध्‍यम के प्रति आंदोलनों और संगठनों में संजीदगी दिखने लगी है और कुछेक ब्‍लॉगों की शुरुआत हुई भी है. मिसाल के तौर पर सफ़र, जहां संगठन से जुड़े कार्यक्रमों और गतिविधियों पर यदा-कदा कुछ लिखा-पढ़ा जाता है या फिर सूचना का अधिकार, जहां नियमित रूप से इस मुद्दे और इससे संबधित अभियानों की ख़बरें शेयर की जाती हैं. इस कड़ी में स्त्री प्रश्नों पर फ़ोकस्‍ड हिन्दी के पहले सामुदायिक ब्लॉग चोखेरबाली का काम सराहनीय रहा है. हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसकी तरक्‍कती के लिए समर्पित हिंदयुग्‍म के अनूठे प्रयासों का यहां उल्‍लेख किया जाना ज़रूरी है. हिंदयुग्‍म पर तमाम विधाओं में साहित्‍य रचना के अलावा कला, संस्‍कृति और आम जन-जीवन से जुड़े प्रश्‍नों पर भी संजीदगी से चर्चा होती है.

चिट्ठाकारी को सरल और लोकप्रिय बनाने में एग्रीगेटरों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है. प्रकाशन के चंद मिनटों के अंदर चिट्ठों को व्‍यापक चिट्ठाजगत तक पहुंचाने तथा चिट्ठा संबंधी आवश्‍यक जानकारियां उपलब्‍ध कराने में एग्रीगेटरों का बड़ा योगदान है. साल 2005-06 में ही जीतू ने ‘अक्षरग्राम’ नामक हिंदी का पहला एग्रीगेटर आरंभ किया था. उसके बाद ‘नारद’ नामक एग्रीगेटर भी जीतू और उनके कुछ मित्रों के सामुहिक प्रयास से ही अस्तित्‍व में आया. साल 2007 में ‘ब्‍लागवाणी’ और ‘चिट्ठाजगत’ नामक दो और एग्रीगेटर्स अस्तित्‍व में आए और उन्‍होंने हिंदी ब्लॉगिंग को काफ़ी सहूलियतें मुहैया कीं.

कितनी सक्रिय है ये चिट्ठाकारी

18 सितंबर 2009 को दोपहर साढे चार बजे के आसपास चिट्ठाजगत के मुताबिक़ कुल 10 हज़ार 259 चिट्ठों में से कुल सक्रिय चिट्ठों की संख्‍या 40 थी. निश्चित रूप से ऐसी कोई भी सूचि स्‍थाई नहीं होती, क्‍योंकि रियल समय में सूचि में बदलाव होते रहते हैं. कभी कोई दसवें नंबर पर होता है तो चंद मिनटों या घंटे बाद वही 38वें नंबर पर या पहले नंबर पर हो सकता है या फिर सूचि में दिखे ही नहीं. बहरहाल, मैं उन ब्‍लॉगों को सक्रिय मानता हूं जिन पर हफ़्ते में दो नहीं तो कम से कम एक पोस्‍ट ज़रूर प्रकाशित होते हैं, यानी पोस्टिंग की निरंतरता बनी रहती है, और उस लिहाज़ा से देखा जाए तो हिंदी में सक्रिय ब्‍लॉगों की संख्‍या 200 के आसपास है. उड़न तश्‍तरी, गाहे-बगाहे, हिंदयुग्‍म, रचनाकार, अगड़म-बगड़म, फुरसतिया, रेडियोवाणी, कसबा, महाजाल, निर्मल-आनंद, मसिजीवी, मोहल्‍ला, कबाड़खाना, चोखेरबाली, इत्‍यादि अग्रिम पंक्ति के सक्रिय चिट्ठे हैं. लगे हाथ हिंदी चिट्टाकारी में सक्रिय लोगों की पृष्‍ठभूमि पर भी एक नज़र डाल ली जाए. दरअसल, हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में आए इस रेवल्‍यूशन के पीछे तीन अलग-अलग पृष्‍ठभूमि के लोगों का योगदान है: पेशेवर टेकीज़ (तकनीकीविशारद) जो हिंदी के प्रति कमिटेड हैं और प्रकारांतर में जिनमें लेखन एक ज़बर्दस्‍त हॉबी की तरह विकसित हुआ, पत्रकार (नियमित या अनियमित दोनों तरह के) जिन्‍हें अपने माध्‍यमों में स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का मुनासिब मौक़ा नहीं मिल पाता है, या जो यहां लिखकर लोगों का फ़ीडबैक हासिल करते हैं तथा उससे अपने पेशे में पैनापन लाने की कोशिश करते हैं (ऐसे लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों का भी फ़ायदा उठाते हैं) और वैसे लोग जिन्‍हें पत्रकारीय कर्म में दिलचस्‍पी है; तथा अंतिम श्रेणी में वैसे साहित्‍य-साधक शामिल हैं जिन्‍हें आम तौर पर छापे में मन माफिक मौक़ा नहीं मिल पाता है या फिर जो इस माध्‍यम की उपयोगिता देखते हुए यहां भी अपनी मौज़ूदगी बनाए रखना चाहते हैं या फिर वैसे लोग जिन्‍होंने ये ठान लिया है कि वे ब्‍लॉग के ज़रिए ही साहित्‍य सृजन करेंगे.

ब्‍लॉगिंग की सतरंगी भाषा

ज़ाहिर है जहां इतने विविध पृष्‍ठभूमियों वाले लोग ब्‍लॉगिंग कर रहे हैं वहां भाषाई विविधता तो होगी ही. मैं इस विविधता को हिंदी ब्‍लॉगिंग की पूंजी मानता हूं. यही इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है. दरअसल, भाषाई प्रयोग और इस्‍तेमाल के मामले में अंतर्जाल पर मौज़ूद यह स्‍पेस घरों की उन दीवारों की तरह है जहां बच्‍चों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चित्र उकेरने की आज़ादी होती है. दुहराने की ज़रूरत नहीं है कि किस हद तक यहां भाषाई प्रयोग हो रहे हैं; हां, ये ज़रूर उल्लेखनीय है कि फ़ॉर्म और एक हद तक कंटेन्‍ट को लेकर जो आज़ादी है यहां, उससे भाषा के स्‍तर पर प्रयोग करने में काफ़ी सहुलियत मिलती है. इस पर्चे में मैंने पहले कुछ चिट्ठों के नाम गिनाए थे, उन पर एक बार विचरण कर लें तो पता चल जाएगा कि सामग्री कैसे भाषा तय कर रही है या फिर क्‍या लिखने के लिए कैसी भाषा का इस्‍तेमाल किया जा रहा है.

यह सच है कि अख़बारों के लिए रिपोर्टिंग या स्‍पेशल एडिट लिखने अलावा ज़्यादातर ऑफ़लाइन लेखन (चाहे किसी भी तरह का हो) किस्‍तों में होता रहा है. जबकि ब्‍लॉग में ऐसा बहुत कम होता है. यहां तो कई बार बैठते हैं प्रतिक्रिया लिखने, बन जाता है लेख. ब्‍लॉगिंग में अकसर एक ही बैठक में लोग हज़ार-डेढ़ हज़ार शब्‍द ठेल देते हैं.

यह भी सच है कि कुछ बलॉगों, विशेषकर सामुदायिक ब्‍लॉगों ने अपनी एक शैली विकसित कर ली है और भाषा को लेकर भी वे चौकन्‍ने हैं. उनकी पोस्‍टों से गुज़रते हुए इस बात का अंदाज़ा लग जाता कि मॉडरेटर महोदय, क़ायदे से जिनका काम मॉडरेट करना भर होना चाहिए – चिट्ठों को अपनी स्‍टाइल में फिट करने के लिए किसी तरह अच्‍छा-खासा समय लगा रहे हैं. यहां इस तथ्‍य की ओर भी इशारा करना चाहूंगा कि मीडिया, विशेषकर इलेक्‍टॉनिक मीडिया वाली सनसनी और टीआरपी वाला गेम यहां भी ख़ूब प्‍ले किया जाता है. मूल पाठ से लेकर शीर्षक तक में यह ट्रेंड झलकता है.

अकसर हम देखते आए हैं कि बोलचाल में धड़ल्‍ले से प्रयोग होने वाले शब्‍दों का लेखन में बहुत कम इस्‍तेमाल होता है. पर अंतर्जाल पर स्थिति काफ़ी बदली-बदली सी दिखती है. और-तो-और यहां, क्षेत्रीय भाषाओं के शब्‍दों का भी धड़ल्‍ले से प्रयोग हो रहा है. हिंदी के कुछ ब्‍लॉग अपनी विशिष्‍ट क्षेत्रीय शैली की वजह से पॉप्‍युलर भी हुए हैं. मिसाल के तौर पर ज़रा ‘ताउ रामपुरिया’ की भाषा पर ग़ौर कीजिए:

इब राज भाटिया जी और योगिन्द्र मोदगिल जी ने गांव के चोधरी को कहा कि इस बटेऊ से सवाल पूछने का मौका ताऊ को भी दिया जाना चाहिये ! आखिर गांव की इज्जत का सवाल है ! चोधरी ने उनका एतराज मंजूर कर लिया !

बटेऊ की तो कुछ समझ नही आया कि आखिर तमाशा क्या है ? बटेऊ को यही समझ मे नही आया कि वो कैसे हार गया और ये ५ वीं फ़ेल छोरा कैसे जीत गया ! ले बेटा..और उलझ ताऊओं से !

गाम आलों का चौधरी बोला- भाई बटेऊ, तन्नै तो आज सवाल पूछ लिया ! और म्हारै गाम के छोरे ताऊ नै बिल्कुल सही जवाब भी दे दिया ! इब उसको भी तेरे तैं सवाल बुझनै का मौका देणा पडैगा ! कल दोपहर म्ह इसी चौपाल म्ह म्हारा छोरा ( ताऊ ) तेरे तैं सवाल बुजैगा अंग्रेजी म्ह और तन्नै जवाब देना पडैगा!23



दरअसल, ‘ताउ रामपुरिया’ की लेखन शैली ने हरियाणवी हिंदी को एक तरह से अंतर्जाल पर इस्‍टैब्लिश कर दिया है. उनके चिट्ठों पर मिलने वाली टिप्‍पणियां इस बात का प्रमाण हैं. इधर संजीव तिवारी जब अपने ब्‍लॉग पर अपनी भाषा के प्रति छत्तीसगढियों से अपील करते हैं तो उन्‍हें भी ठीक-ठाक समर्थन मिलता है. ज़रा देखिए उनके इस चिट्ठांश को:

छत्‍तीसगढ हा राज बनगे अउ हमर भाखा ला घलव मान मिलगे संगे संग हमर राज सरकार ह हमर भाखा के बढोतरी खातिर राज भाखा आयोग बना के बइठा दिस अउ हमर भाखा के उन्‍नति बर नवां रद्दा खोल दिस । अब आघू हमर भाखा हा विकास करही, येखर खातिर हम सब मन ला जुर मिल के प्रयास करे ल परही । भाखा के विकास से हमर छत्‍तीसगढी साहित्‍य, संस्‍कृति अउ लोककला के गियान ह बढही अउ सबे के मन म ‘अपन चेतना’ के जागरन होही । हमला ये बारे म गुने ला परही, काबर कि हम अपन भाखा के परयोग बर सुरू ले हीन भावना ला गठरी कस धरे हावन।24



कमोबेश यही स्थिति भोजपुरी और मैथिली के साथ भी है.

प्रयोग और इस्तेमाल की आज़ादी का ही नतीज़ा है कि इंटरनेट पर मस्‍तराम मार्का भाषा भी फल-फूल रही है. मिसाल के तौर पर किसी पोस्‍ट पर डॉ. सुभाष भदौरिया द्वारा की गयी इस प्रतिक्रिया पर ग़ौर करें:

यार यशवंतजी एक जमाना हो गया, न हमने किसी को गाली दी, न किसी ने हमें दी, पर इस डिंडोरची ने वही मिसाल कर दी गांड में गू नहीं नौ सौ सुअर नौत दिये. यार हम तो आप सब में शामिल सुअर राज हैं.गू क्या गांड भी खा जायेंगे साले की, तब पता पता चलेगा. नेट पर बेनामी छिनरे कई हैं, अदब साहित्य से इन्हें कोई लेना देना नहीं हैं, सबसे बड़ा सवाल इनकी नस्ल का है, न इधर के न उधर के.

भाई हम सीधा कहते हैं, भड़ासी पहुँचे हुए संत है, शिगरेट शराब जुआ और तमाम फैले के बावजूद उन पर भरोसा किया जा सकता है. इन तिलकधारियों का भरोसा नहीं किया जा सकता.कुल्हड़ी में गुड़ फोड़ते हैं चुपके चुपके.इन का नाम लेकर इन्हें क्यों महान बना रहे हैं आप. देखो हम ने कैसे इस कमजर्फ को अमर कर दिया.25



आम तौर पर हिंदी ब्‍लॉगिंग में प्रतिक्रिया देते हुए या किसी मसले पर चर्चा करते वक़्त शब्‍दकोश सिकुड़ने लगते हैं और भाषा हांफने लगती है. हिंदी ब्‍लॉगजगत ऐसी मिसालों से भरी पड़ी है. पिछली जुलाई में शीर्षस्‍थ साहित्‍यकार उदयप्रकाश से जुड़े एक प्रकरण को लेकर उठे बवंडर, इसी साल जनवरी में नया ज्ञानोदय की संपादकीय पर मचे अंतर्जालीय घमासान, या मार्च-अप्रैल में रविवार डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव के एक साक्षात्‍कार, या फिर हाल ही में रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव के साक्षात्‍कार से उपजे विवाद पर ग़ौर करें तो भाषा के इस पक्ष से रू-ब-रू हुआ जा सकता है. मिसाल के तौर पर, उदयप्रकाश प्रकरण पर रंगनाथ सिंह ने हिंदी साहित्‍य में विष्‍ठावाद : अप्‍पा रे मुंह है कि जांघिया के मार्फ़त कुछ इस तरह अपनी राय ज़ाहिर की:

एक कवि हैं। सुना है उनके दोस्त उनके बारे में एक ही सवाल बार-बार पूछते रहतें हैं कि वो नासपीटा तो जब भी मुंह खोलता है, मल, मूत्र या उनके निकास द्वारों के लोक-नामों से अपनी बात का श्री गणेश करता है।

उनके मित्र आपस में अक्सर यही पूछते हैं कि अप्पा रे, उसका मुंह है कि जंघिया…??

हिंदी साहित्य के दिग्गजों (इसमें उदय प्रकाश भी शामिल हैं) ने और उनके चेलों ने उदय प्रकाश प्रकरण में हुए विवाद में बार-बार उस कवि की और उनके मित्रों को जंघिया वाले यक्ष प्रश्न की याद दिलायी।

जिस किसी ने जिस किसी के भी पक्ष या विपक्ष में लिखा, उसके खिलाफ़ दूसरे पक्ष के तीरंदाज-गोलंदाज आलोचना या भर्त्सना लिखने के बजाय गाली-गलौज पर उतर आये। या उस कवि के मित्रों की भाषा में कहें, तो इन सब के नाड़े ढीले थे।

इन सभी स्वनामधन्य कवि-लेखकों-पत्रकारों को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने अपनी आस्तीन से अपना असल शब्दकोश निकाला और उसका खुल कर प्रयोग किया। निस्संदेह उन्होंने इंटरनेशनल लेवल का सुलभ भाषा-कौशल दिखाया है।26



मेरा ये मानना है कि किसी भी माध्‍यम मे भाषा के विकास के लिए ज़रूरी है भरपूर लेखन और संवाद. जितना अधिक लेखन होगा उतने ही अधिक प्रयोग होंगे और भाषा में निखार आएगा. विगत पांच-छह सालों की हिंदी ब्‍लॉगिंग में निश्चित रूप से लेखन में उत्तरोत्तर इज़ाफ़ा हुआ है और ये इज़ाफ़ा क्‍वान्टिटी और क्‍वालिटी दोनों ही स्‍तरों पर हुआ है. पर इतना नहीं कि उसके आधार पर किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा जाए. संवाद भी हो रहे हैं, पर संवाद के स्‍तर पर ज़्यादातर छींटाकसी या खींचातानी ही दिखती है. कुछ-कुछ प्रिंट जैसी. वैसे बेहतर होगा कि भाषाविज्ञानी इस बात की पड़ताल करें और रोशनी डालें कि हिंदी चिट्ठाकरी में बरती जाने वाली भाषा क्‍या है. तब तक मैं यही कहूंगा कि काफ़ी कुछ नया है, पहले से अलग है, हट के है, सतरंगी है.

कुछ फुटकर विचार

अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद। स्रोत- डियर किट्टी
अंत में अंतर्जाल पर हिंदी के वर्तमान और भविष्‍य के बारे में अपनी कुछ राय साझा करना चाहूंगा. अब तक की चिट्ठाकारी को देखकर ये लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी बमबम कर रही है, हिंदी की तरक्‍की हो रही है. पर यहां मैं कुछ वैसे तथ्‍यों की ओर इशारा करना चाहूंगा जो आम तौर पर सतह पर नहीं दिखते. ग़ौरतलब है कि अंतर्जाल पर हिंदी चाहे जितनी ज़्यादा बरती जा रही हो, पर उसके पीछे हैं कुछ गिने-चुने लोग ही. ज़रा और खुलकर कहा जाए तो ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है जो एक साथ कई ब्‍लॉग चला रहे हैं, वेबसाइट चला रहे हैं, डॉट कॉम चला रहे हैं. आप अगर सक्रिय ब्‍लॉगरों की प्रोफ़ाइल पर क्लिक करेंगे तो इस बात का साक्ष्‍य आपको मिल जाएगा. दूसरी बात ये कि ब्‍लॉग, डॉटकॉम, इत्‍यादि पर चाहे जितना कुछ लिखा जा रहा हो, पाठकों की संख्‍या सीमित ही है. सीमित का मतलब ये कि वैसे लोग, आम तौर पर जिन्‍हें अंतर्जाल से कुछ लेना-देना नहीं है, उन्‍हें अब तक पाठक नहीं बनाया जा सका है. मोटे तौर पर अंतर्जाल पर पाठक वे ही हैं जो लेखक भी हैं.

यह साफ़ है कि बीते 5-6 सालों में अंतर्जाल पर, ख़ास तौर से चिट्ठाकारी के मार्फ़त हिंदी के प्रयोग और रफ़्तार में तेज़ी आयी है. ग़ौर करने वाली बात ये है कि इसने साहित्‍य, संस्‍कृति और पत्रकारिता के बहुत सारे अवयवों, मूल्‍य मान्‍यताओं, परिपाटियों तथा मानकों से ख़ुद को आज़ाद कर लिया है जिन्‍हें आधुनिकता ने अपने लिए निर्धारित किए थे. सेंसरशिप, कॉपीराइट, नियंत्रण और निगरानी जैसी आधुनिक अवधारणाएं फिलहाल दरकिनार हैं. ब्‍लॉगर्स तो जैसे दायें-बाएं, आगे-पीछे देखे बिना सरपट दौड़े चले जा रहे हैं.


संदर्भ-
1. http://9211.blogspot.com
2. http://techtree/techtee/jsp
3. http://hindyugm.com
4. http://bhadas.blogspot.com
5. http://linkitman.blogspot.com
6. http://naisadak.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html
7. http://9211.blogspot.com
8. http://nuktachini.blogspot.com
9. http://devnaagrii.net
10. http://rachnakar.blogspot.com
11. http://hindini.com/eswami
12. http://hindini.com/fursatiya
13. http://pratibhaas.blogspot.com
14. http://www.jitu.info
15. http://linkitman.blogspot.com
16. http://mohalla.blogspot.com

Saturday, October 17, 2009

ब्लू : प्लास्टिकी किरदार और कहानी

फिल्म समीक्षा

ऐसा क्यूँ होता है के जिस मूवी से हम इतनी उम्मीदें लगाते हैं और सालभर उसके आने की राह तकते हैं वही फिल्म हमें बोरियत से दाँतों से नाखून कतरने पर मजबूर कर देती है? ऐसा क्यूँ होता है के फिल्मकारों की टीवी पर बातें सुन कर, पत्रिकाओं में लेख पढ़ कर हम ये समझ बैठते हैं कि हम इस फिल्म को सिने से लगा रखेंगे, पर वही फिल्म स्वाइन फ्लू के विषाणू जैसे हमें दूर रहने के लिए मजबूर करती है?

ब्लू ..... ऐसी ही एक फिल्म है जो समंदर के अंदर की रंगीन दुनिया दिखाने के साथ-साथ 2 घंटे के रोमांचक सफ़र का वादा करती है। विश्वस्तरीय तंत्र और बेशुमार लागत से बनी ये फिल्म जिसे प्रचारित करने में सभी मुख्य कलाकारों ने जान लगा दी थी, क्या वह अपने वादों पे खरी उतरती है?

आइए देखते है "ब्लू"-

कथा सारांश:
आरव (अक्षय कुमार) और सागर (संजय दत्त) दोस्त हैं जो बहामा में रहते हैं। सागर सुलझा हुआ इंसान है जो फिशिंग कंपनी में काम करता है और पैसे कमा कर अपनी प्रियसी मोना (लारा दत्ता) के साथ शादी कर के साधारण पर सुखी जिंदगी जीना चाहता है। आरव एक अमिर लड़का है जो ज्यादातर वक़्त सागर के साथ बीतता है। मछली पकड़ने में, बॉक्सिंग करने में, पब में मस्ती करने मे। पर वो बार-बार सागर को एक खजाने की खोज के लिए मनाने की कोशिश करता है क्यूंकि उसे लगता है कि सागर के पिता ने वो खजाना पहले ही ढूँढ़ निकाला था। पर सागर इस बात को झूठ बताकर खोज पर चलने की बात को बार-बार ठुकरा देता है।

इसी बीच सागर का भाई समीर (ज़ायेद ख़ान) जो घर छोड़ के चला गया था वह वापिस आता है। पर वो एक मुसीबत में फँसा हुआ होता है और उसे एक गैंग्स्टर के 50 मिलियन लौटाने होते हैं। उनसे छिपने के लिए समीर सागर के पास बहामा आता है। लेकिन वह लोग उसे वहा भी ढूँढ़ लेते है और समीर पे गोलीबारी करते है। आरव उसे बचाता है। तब समीर आरव को सब बता देता है। आरव और समीर मिल के सागर को मना लेते है खजाने की खोज पर निकलने के लिए।

फिर क्या होता है.... क्या वो खजाना ढूँढ़ के समीर को उसके तकलीफ़ से बचा पाते हैं? यही सब सवालों का जवाब मनोरंजक तरीके से देने की कोशिश करती है ब्लू की कहानी। पर क्या पटकथा उसे न्याय दे पाती है?

पटकथा:
कथा तो साधारण लगती है जो हम कुमार कथाओं में और अंग्रेज़ी खोज कथाओं में कई बार मिलती है। पर यहाँ नयी बात ये थी कि ये खजाना समंदर के अंदर है और समुद्रतल का चित्रण अभी तक हिन्दी चलचित्रों में आया नहीं है। पटकथा लेखन इस तरीके के कहानी में तगड़ा होना चाहिए जो यहाँ नहीं है। सरल सपाट कथा-कथन, जिसकी घटनाओं में ज़रा भी नयापन नहीं है, वह इस असाधारण प्रयत्न को एक साधारण फिल्म बना देता है। ब्रयान स्यूलिवन जिन्होंने ये पटकथा लिखीं है उन्हें फिर से पटकथा लेखन का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए।

दिग्दर्शन:
एंथॉनी डीसौजा जिनकी ये पहली फिल्म है उनके हिम्मत और प्रयत्न की दाद देना चाहिए पर दुर्भाग्यवश वो कथा कथन में परिपक्व नहीं हैं। पानी के गहराइयों के दृश्य उन्होंने अच्छी तरीके से चित्रित किए है पर भावुक दृश्य और ऐसे दृश्य जो फिल्म को एक दर्शकों को किरदारों के साथ बाँधने में सफल रहे वो चित्रित करने में उनकी प्रतिभा कम पड़ जाती है। शायद वो अपने कलाकारों से खुद को छोटा मानते हुए उनसे और मेहनत करने में हिचकिचा रहे थे। इसलिए सबका अभिनय पास्टिक अभिनय लगता है। अपना प्रॉजेक्ट प्रमोटे कर के उसके लिए सामग्री इकठ्ठा करना उन्हें भले ही आता हो पर दृश्य कथा कथन की कला में उन्हें अभी और बहुत दूर तक जाना है।

अभिनय:
अभिनय के मामले में सब साधारण-सा है। इसका जिम्मा पूरी तरह से अभिनेता और अभिनेत्रियों पर नहीं जाता, जब लेखन में ही दम न हो और आपका दिगदर्शक भी आपसे डर-डर के काम करा रहा हो तो और क्या परिणाम निकल सकता है? संजय दत्त, अक्षय कुमार, लारा दत्ता, कटरीना कैफ़, ज़ायेद ख़ान और राहुल देव सबने उतना ही दिया है जितना उनसे लिया गया है। लारा दत्ता ने बहुत सुंदर तरीके से अपनी बदन की खूबसूरती को दर्शाया है। कबीर बेदी सिर्फ़ कुछ क्षण के लिए पर्दे पर आते हैं।

संगीत और पार्श्वसंगीत:
फिल्म के गाने पहले ही लोकप्रिय हो चुके है। कुछ गानों में असाधारण और अप्रतिम संगीत दे कर ऑस्कर विजेता प्राप्त ए आर रहमान ने अपनी प्रतिभा का लोहा फिर से मनवाया है। पर बाकी गाने साधारण से हैं। सबसे बढ़िया जो वीडियो जो ब्लू थीम है वो मूवी में कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ है। अहमद ख़ान के नृत्य निर्देशन में फिल्माये उस गाने में अप्रतिम उर्जा दिखती है (टीवी पर)। "आज दिल गुस्ताख है" पर्दे पर अतिसुंदर नज़र आता है। पार्श्वसंगीत भी अच्छा है।

संकलन:
फिल्म सिर्फ़ 2 घंटे की है। संकलक के अच्छी तरीके से काम करने के बावजूद भी कहानी में रोचक घटनाओं की कमी के कारण फिल्म प्रभावपूर्ण नहीं हो पाई। अब कथा को दृश्यों मे गुंफने की प्रक्रिया में दिग्दर्शक और संकलक को इनकी कितनी साझेदारी थी यह तो पता नहीं। पर अगर संकलक को ये जिम्मा सौंपा गया हो तो वो अपने कार्य में ज़रूर असफल रहे हैं। पर सिर्फ़ तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने जैसा बताया वैसे खुद का काम किया है।

एक्शन दृश्य:
रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांचक दृश्य तभी प्रभावित कर सकते है जब किरदार और कहानी दर्शकों के हृदय छू ले। यहाँ भी वही तकलीफ़ है। मेहनत और खर्चा दिखता है पर किरदारों के साथ भावुक संपर्क नहीं रहने के कारण परिणाम पूरी तरह से नहीं उभर के आता है। पर जिन्हें सिर्फ़ ऐसे दृश्य देखने में मज़ा आता है उन्हें ये फिल्म पसंद आ सकती है।

चित्रांकन:
फिल्म मे चित्रांकन विश्वस्तरीय और अव्वल दर्जे का है। समुद्रतल की सुदंरता आँखों को चकाचौंध कर देने वाली है। इस तरीके का चित्रण सही में इसके पहले कभी भी भारतीय फ़िल्मों में नज़र नहीं आया। जो भी लोग इसके पीछे हैं उनका प्रयत्न सफल और काबीले-तारीफ है। पीटर झूरिणिक जिन्होंने "पायरेट्स ऑफ दी करीबियन" की है, उनकी प्रतिभा और अनुभव इस बेहतरीन अनुभव के लिए ज़िम्मेदार है।

निर्माण की गुणवत्ता:
श्री अष्टविनायक चित्रपट संस्था और उसके संचालक ढीलिन मेहता की जितनी तारीफ की जा सके कम है। ये इसलिए के उन्होंने खर्चे में सच में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पर एक थकी कहानी और अपरिपक्व दिग्दर्शन ने उन्हें धोखा दे दिया। सिर्फ़ हम इतनी ही दुआ कर सकते हैं कि उनका खर्चा निकल जाए और दीवाली के दिनों में उनका दीवाला ना निकले। हम तहे दिल से चाहते हैं कि फिल्म अपनी कीमत वसूलने में सफल रहे।

लेखा-जोखा:
** (२ तारे)
प्लास्टिक से बने सुंदर थीम पार्क्स और अतिसुंदर झाँकिया कितना भी हों, रहते अंत में वही है: प्लास्टिकी ! वैसे ही भाव-भावनाओं से परे कहानी और किरदार कितने भी सुंदर हों, दिखते प्लिस्टिक के ही हैं। पर हम बेहतरीन तकनीक और अभूतपूर्व समुद्रतल दृश्यांकन के लिए इस फिल्म को एक तारा और एक्शन दृश्यों के चित्रीकरण के लिए और एक तारा दे ही सकते है।

अगर आप ये अभूतपूर्व दृश्य बड़े पर्दे पर देखना चाहते है (और वो बड़े पर्दे पर ही मज़ा देते है) तो कहानी से कुछ भी आशा ना रखते हुए ज़रूर जाएँ।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Friday, October 16, 2009

ऑल द बेस्ट : संजू "बाबा" का चमत्कार

फिल्म समीक्षा
जब "गोलमाल" और "गोलमाल रिटर्न्स" के टीम के तरफ से फिल्म आती है, तो स्वाभाविक है के दर्शकों की अपेक्षायें आसमान छूने लगे. मिडिया में जबरदस्त क्रेज निर्माण कर के दिवाली के छुट्टियों कारण फिल्म के प्रोमोटर्स दर्शकों को सिनेमाघरों में खीचने के लिए सफल तो जरुर हुए है. पर क्या ये फिल्म दर्शको को पसंद आएगी? चलो करते है इस चलचित्र की समीक्षा.

कथा-सारांश :
इस तरह के मूवी में कथा का अतापता साधारणतः नहीं होता है. पर फिर भी एक कथा सूत्र है जो मै आपको बता सकता हूँ.

वीर (फरदीन खान) एक अमीर एन. आर. आई. भाई, धरम (संजय दत्त) का सौतेला बेटा है जिसका बड़ा भाई उसे बहुत प्यार से पौक्केट मनी भेजता है. परअपनी पौकेट मनी दुगनी करने के लिए वीर, अपने दोस्त प्रेम चोपडा (अजय देवगन) की सलाह पर, धरम से जूठ बोलता है की वोह शादी शुदा है. ये जूठ को सच करने के लिए वीर की प्रियसी विद्या (मुग्धा गोडसे) उसे मदत कराती है. हर महीने के पहली तारीख को जब धरम का मेनेजर पैसे देने आता है तब वीर विद्या को उसकी धरमपत्नी की तरह मिलाता है.

पैसे आते ही वीर वो पैसे अपने और अपने दोस्त प्रेम के सपने को पूरा करने में लगा देता है. वीर का सपना है की उसका म्यूजिक बैंड एक मशहूर बैंड बने. दूसरी और प्रेम का सपना है के वोह उसके दिमाग की उपज से ऐसी कार बनाये जो दुनिया को चकाचौन्द कर दे. इन्ही सपनों के पीछे दौड़ते दौड़ते वह दोनों एक भाई टोबू (जोनी लीवर) से पैसे उधर लेते है. पर जब वोह पैसे चुकाना मुश्किल हो जाता है तो प्रेम के सलाह पे वीर भाई का बंगलो भाड़े पे देता है और अडवांस के तौर पर रघु (संजय मिश्रा) ५ लाख का सौदा करता है और २.५ लाख ले भी लेता है.

लेकिन तभी धरम के गोवा आने की खबर से सब परेशां हो जाते है. फिर धरम से सच छुपाने के चक्कर में जो प्रेम और वीर मिल के जो गोलमाल करते है वाही कहानी है "ऑल दी बेस्ट" की.

कथा वही पुराने ढंग की है जैसे हर कॉमेडी फिल्म में होती है. इस तरह के फिल्म्स में पटकथा और निर्देशन की कलाकारी ही इन चलचित्र को सफल या असफल बनाने में महत्वपूर्ण होती है.

पटकथा:
रोबिन भट और युनुस सजावाला की पटकथा शुरुवात के चालीस मिनट तक दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में असफल होती है. वीर और प्रेम के उटपटांग हरकतों को मजेदार तरीके से कथन करने में लेखक कामयाब नहीं हो पाए है. ऐसा लगता है के जबरदस्ती से हँसा ने की कोशिश हो रही है.

पर जैसे ही धरम याने अपने संजूबाबा का आगमन कहानी में होता है, कहानी जोर पकड़ लेती है और दर्शकों को हसी से सराबोर कर देती है. कहानी में बहुत सरे किरदार है और उपकहानिया है जो मजेदार है और हँसाने में कामयाब होती है.

वैसे भी इस प्रकार के चलचित्र को देखने के लिए आपने अपना दिमाग घर में फ्रीज में ही रख के जाना जरुरी है. तभी आप इस प्रकार के विनोद का आनंद ले सकते हो.

दिग्दर्शन:
रोहित शेट्टी निर्देशन पे तो अब सबको ही पूरा भरोसा. और इसबार शुरुवाती कुछ वक़्त छोड़ दिया तो वोह अपने कार्य में पूरी तरह से सफल हुए है. हालाँकि वो अपने पुराने फिल्मो की तरह एक अमिट छाप नहीं छोड़ पाए है. कुछ ऐसे विनोदी दृश्य जिसे हम दिग्दर्शक की प्रतिभा का अविष्कार कह सकते है, वैसे दृश्य इसबार रोहित नहीं दे सके है इस कारण यह एक माध्यम दर्जे की मनोरंजक फिल्म है जो पूरी फॅमिली और दोस्त एकसाथ मिल के देख सकते है.

अभिनय:
अभिनय के मापदंड पे संजय दत्त फिर से साबित कर देते है के वोह कॉमेडी के बादशाह है (याद है ना मुन्ना भाई?). जब भी वोह परदे पे आते है तो चित्रपटगृह हसी से भर जाता है. इसलिए मैंने शीर्षक में संजू "बाबा" का चमत्कार ऐसे लिखा है. "बाबा" शब्द क्यूँ वापरा है ये आपको फिल्म देख के समझ आएगा. फरदीन और अजय का अभिनय ठीक ठाक है. बिपाशा ने अच्छी तरह से सहयोग दिया है. मुग्धा गोडसे को जादा रोल नहीं है और उनके सजोसज्जा पे उन्हें जादा ध्यान देना चाहिए. कॉमेडी में वो इतना असरदार अभिनय नहीं कर पाई है. जोनी लीवर पुरे फिल्म के गूंगे रहने के कारण म़जा थोडा किरकिरा हो जाता है. संजय मिश्रा (जो गोलमाल में खलनायक रहते है) वोह इस बार भी हमें हसी से लोटपोट होने पे मजबूर कर देते है. विजय पाटकर और अतुल परचुरे जैसे अदाकारों ने भी अपना काम बखूबी निभाया है.

संगीत:
चलचित्र का संगीत मनोरंजक है. प्रीतम एक बार फिर अपने कार्य में सफल हुए है.

चलचित्रंकन और एक्शन:
चलचित्रंकन उत्तम है और ऊँचे दर्जे के निर्मिती मूल्य चलचित्र को दर्जेदार बनता है.

संकलन:
चलचित्र का संकलन शुरुवात के चिलीस मिनिट में बेहतर हो सकता था. शुरुवात में ही दो गाने ड़ाल के कथा कथन में रुकावट होती है. वोह कही और भी डाले जा सकते थे.

लेखाजोखा:
दिवाली के अवसर पर ख़ुशी और हसी से भरपूर वक़्त गुजरने के लिए ये फिल्म ठीक है अगर आप शुरुवाती शिथिलता और कुच्छ दृश्य जो जबरदस्ती से हँसाने की कोशिश करते है, उन्हें नजर अंदाज करने के लिए टायर है तो. बाकी आपकी मर्जी.

हमारे तरफ से तो आपको दिवाली के लिए "ऑल दी बेस्ट"!

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Thursday, October 15, 2009

रोशनी के पीछे का अंधेरा

एक आत्म विश्लेषणः आलोक भट्टाचार्य

दीपावली का माहौल है। चारों ओर रोशनी जगमगा रही है। खुशी और उत्साह का प्रकाश झिलमिला रहा है। नये कपड़े, मिठाइयां, मेल-मिलाप, बधाइयां, नये वर्ष की शुभकामनाएं। वैसे परंपरा यही कहती है, संस्कारों का यही तकाज़ा है कि पर्व-त्यौहार के समय सब कुछ अच्छा-अच्छा कहो। अच्छा सोचो। सद्भावना की बात करो। खुद खुश रहो और लोगों को खुश रखो। कमियों-कमजोरियों की बात फिर कभी करना। कमियां किसमें नहीं होतीं?

लेकिन यह भी तो है कि ‘सुख में करे न कोय।‘ और ‘जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे का होय।‘ यदि पर्व-त्योहार के मौके पर थोड़ा आत्मविश्‍लेषण कर ही लिया जाये, तो बुरा क्या है? खुद को जानने-पहचानने का, खुद अपनी खोट निकालकर स्वयं को सुधारने का मौका आखिर कब निकालें? और यह कोशिश जब ‘स्व‘ की सीमा से ऊपर उठकर समाज के स्तर तक पहुंचती है, तब देश-समाज के हित में शायद बहुत महत्वपूर्ण भी साबित होती है। ऐसी ही विनम्र कोशिश यह मेरा लेख है।
कबीर ने कहा है-

‘पंडित और मसालची दोनों सूझै नाहिं
औरन को कर चांदनी आप अंधेरे माहिं।‘


मशालची दूसरों को रोशनी दिखाता है, खुद अंधेरे में रह जाता है। पंडित अपना ज्ञान दूसरों में बांटता है, लेकिन स्वयं उस ज्ञान पर अमल नहीं का पता। दीपावली की जगर-मगर में कहीं ऐसा न हो कि हम अपने खुद के अंधेरों को देख ही न पायें। हमारे साथ जो हुआ, जो हो रहा है, वह सब आगामी पीढ़ियों के साथ न हो, इसी भावना से यह आत्मविश्लेषण।

लिखता मैं रोज हूं। अच्छा-बुरा दिन नहीं देखता। निदा फाज़ली ने कहा भी है- ‘सातों दिन भगवान के,मंगल हो या पीर।‘ चूंकि लिखने से ही मुझे दोनों प्रकार की तुष्टियां मिलती हैं-पेट की भी, दिमाग की भी, और दोनों की ही आंच इतनी ज्यादा तेज है कि शुभ-अशुभ मुहूर्त की फिक्र किये बिना ही लिखने बैठ जाता हूं, आलस्य नहीं करता, क्योंकि- ‘जिस दिन सोया देर तक, भूखा रहा फकीर।‘ वैसे भी मैं भाग्य, शगुन, मुहूर्त वगैरह मानता नहीं।

लेकिन उस दिन जब लिखने की तैयारी करने लगा, तो पाया कि दिन वाकई बड़ा ही खराब निकला। सुबह-सुबह खबर आयी कि प्रसिद्ध नाट्यकर्मी हबीब तनवीर साहब नहीं रहे। मन शोक में डूब गया। इसी जनवरी 2009 में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पांच दिवसीय ‘हिंदी समय‘ विचार गोष्ठियों के दौरान उनसे मुलाकात हुई थी। 86 वर्ष की उम्र और रोग के बावजूद उनकी कौंध में, चमक में धार में कोई कमी नहीं थी। सिर्फ छह माह बाद ही उस दिन की सुबह वह चले गये। दिन की शुरुआत वाकई बहुत खराब हुई।

लेकिन अभी तो उस दिन की खराब शुरुआत की कुछ और भी खराबियां बाकी ही थी। खबर आयी कि जिस भोपाल में हबीब तनवीर साहब ने आखिरी सांस ली, उसी भोपाल के सूखी सेवनिया क्षेत्र में उसी दिन 8 जून 2009 को सड़क दुर्घटना में हिंदी के तीन कवियों का निधन हो गया। दिग्गज हास्यकवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्जर। चौथे कवि ओम व्यास भी गंभीर रूप से घायल। कोमा में। अत्यंत चिंताजनक स्थिति में। जब यह लेख लिख रहा था, तब तक की यह स्थिति थी।

चूंकि मैं पिछले 25-30 वर्षों से कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ करता रहा हूं, इन सभी कवियों से मेरे बड़े ही आत्मीय संबध रहे हैं। ओमप्रकाश आदित्य के घर दिल्ली में कई बार ठहरा। नीरज पुरी के साथ छिंदवाड़ा, सिवनी, रायपुर आदि कवि सम्मेलनों की बड़ी प्यारी यादें हैं। नीरज पुरी के साथ मेरा एक चित्र मेरे अलबम में है। और ओम व्यास तो मुंबई के ही हैं। अक्सर मुलाकातें होती ही रही हैं। समझा जा सकता है कि दुर्घटना और मौतों की खबर से मैं कितना हिल गया। शोक का कैसा शूल दिल की अतल गहराइयों में उतर गया। वाकई, मेरा वह दिन बहुत बुरा निकला।

निदा साहब कहते हैं चूंकि सातों दिन, तीन सौ पैसठों दिन भगवान के हैं, सो सबके सब अच्छे। भगवान अच्छे सो उनके दिन भी अच्छे। तो फिर 8 जून 2009 का दिन इतना बुरा क्यों? ‘अच्छे भगवान के दिन भी अच्छे‘-इस सिद्धांत को लागू करता हुआ आगे सोचा तो पाया-‘बुरे देश के दिन भी बुरे।‘

लेखक परिचय-आलोक भट्टाचार्य

हिन्दी के सुपरिचित कवि एवं पत्राकार, मातृभाषा-बंगाली, हिन्दी में मौलिक लेखन।
प्रकाशित पुस्तकें-
1-भाषा नहीं है बैसाखी शब्दों की ( कविता संकलन)
2-सात समंदर आग (कविता संकलन)
3-अपना ही चेहरा (उपन्यास)
4-आंधी के आस पास (आत्म कथात्मक कहानियां)
5-पथ के दीप (संस्मरण)
6-अधार्मिक (वैचारिक लेख संग्रह)
इसके अलावा प्रभूत साहित्यिक एवं पत्राकारीय लेखन। हिन्दी की सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। अमेरिका में कविता पाठ के लिए आमंत्रित।
पुरस्कार एवं सम्मानः
1-महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का ‘सन्त नामदेव‘ पुरस्कार
2- महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का ‘जैनेन्द्र कुमार‘ पुरस्कार
3- निराला पुरस्कार
4- नागरी भूषण पुरस्कार
5- साहित्य भूषण पुरस्कार
6- अखिल भारतीय श्रेष्ठ हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार
7- साम्प्रदायिक सौहार्द्र पुरस्कार
8-श्रेष्ठ मंच संचालक पुरस्कार
बंगला के रवीन्द्रनाथ ठाकुर, काज़ी नजरुल इस्लाम, सुकान्त भट्टाचार्य,सुभाष मुखोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय आदि की कुछ रचनाओं के हिन्दी अनुवाद। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम के काव्य संग्रह ‘माई जर्नी‘ का हिन्दी अनुवाद ‘मेरी यात्रा‘।
जी हाँ। दिन इसलिए बुरे, कि खुद देश बुरा है। एक बुरे देश में आखिर अच्छे दिन हो भी कैसे सकते हैं? दीपावली के पावन मौके पर कह रहा हूं और कहते हुए मुझे बहुत क्षोभ है कि मैं, आप, इस देश की सवा अरब जनता, हम सब एक बुरे देश में पैदा हुए। जैसा कि हम सब को पढ़ाया-बताया जाता है, रहा होगा कभी यह देश विश्व का सिरमौर-तब हम नहीं थे। आज तो इस देश की गिनती संसार के सबसे बुरे देशों में होती है। बहुत ही दुख की बात है यह। इस बात को मानने का जी ही नहीं करता। लिखते हुए भी कलेजा टूक-टूक हो रहा है। लेकिन आज का सच यही है कि भारत एक बुरा देश है। बहुत ही बुरा।

मौत तो सभी को आती है, लेकिन यदि आपने भारत में जन्म पाया है, तो भारत की अयोग्यता, भारत की लापरवाही की वजह से आप असमय ही काल के गाल में समाने को मजबूर हो सकते हैं, जैसे कि 8 जून 2009 को ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्जर को समय से पहले मरना पड़ा। इसलिए मरना पड़ा कि अपना भारत वह देश है, जहां विश्व में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जबकि विश्व में सबसे कम गति में वाहन यहां दौड़ते हैं। 135 कि.मी. प्रति घंटा की स्पीड से अमेरिका की गाड़ियां वहां दौड़ती हैं, दुर्घटनाएं नहीं होतीं, कम होती हैं, यहां भारत में 55-60-65 कि.मी. प्रति घंटे से ज्यादा स्पीड में गाड़ियां दौड़ नहीं पातीं, वैसी सड़कें ही नहीं हमारे पास, फिर भी विश्व में सबसे ज्यादा दुर्घनाओं का ‘वर्ल्ड रेकॉड‘ भारत के ही नाम है। इस मामले में वाकई हम दुनिया के सिरमौर हैं। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार भारत में प्रतिदिन हर घंटे 13 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है।

अपनी एक कविता में मैंने कहा है-‘दुर्घटनाएं आकस्मिक तो होती हैं, अकारण कभी नहीं होतीं।‘ अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं के क्या कारण हो सकते हैं? सड़कें खराब, यानी सार्वजनिक निर्माण विभाग खराब, सड़क-परिवहन विभाग खराब, आर.टी.ओ. खराब। रिश्वत लेकर अयोग्य आदमी को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया, चुकी हुई पुरानी गाड़ियों को रिश्वत लेकर ‘पास‘ दे दिया, ड्राइवर खुद खराब कि शराब पीकर ड्राइव कर रहे हैं, घमंडी कि दूसरी गाड़ियों को पीछे छोड़ने के अहंकार में गाड़ी तेज चला रहे हैं, ओवरटेक कर रहे हैं, यातायात-नियम तोड़ रहे हैं। किसी की जान चली जाये तो बला से। पुलिस तथा प्रशासन के परेशान करने वाले निहायत ही असंवेदनशील रवैये के कारण कोर्ट-कचहरी के चक्करों के डर से राह चलते साधारण लोग दुर्घटनाग्रस्त घायलों की मदद के लिए जल्दी आगे भी नहीं आना चाहते। कैसी विडम्बना है कि असंवेदनशील पुलिस-प्रशासन के रूखे रवैये ने जन-साधारण को भी असंवेदनशील बना दिया है।

सिर्फ सड़क दुर्घटना में ही हम सिरमौर नहीं हैं। अभी हाल के ही केपीएमजी नाम की विश्वविख्यात सर्वे कन्सलटेंसी फर्म द्वारा विश्वव्यापी सर्वेक्षण के बाद जारी की गयी रिर्पोट में कहा गया है कि भारत दुनिया के सर्वाधिक दस भ्रष्टतम देशों में एक है। भारत के लिए यह अत्यंत शर्म की बात है कि सूची में शामिल बाकी के जो नौ देश हैं, उनमें भारत की तरह बड़ा, विकासोन्मुख, प्राचीन, कला-संस्कृति-शिक्षा-ज्ञान से समृद्ध ऐतिहासिक तौर पर प्रतिष्ठित दूसरा कोई भी देश नहीं। बाकी नौ जो देश हैं, वे गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा के मारे छोटे-छोटे देश हैं, इथियोपिया, नाइजीरिया, नामीबिया, यूगांडा जैसे देश, जहां इतनी भयंकर गरीबी है कि भ्रष्टाचार को माफ किया जा सकता है। आदमी आखिर भूखा ही मर जाये ? प्राकृतिक संपदा और ज्ञान संपदा में भारत उन नौ देशों से इतना ज्यादा आगे और समृध्द है कि कोई मुकाबला ही नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार में उनके कान काट रहा है। राम, महावीर, बुध्द और गांधी उन नौ देशों में पैदा नहीं हुए। गंगा-जमुना-कावेरी-कृष्णा-कावेरी-गोदावरी वहां नहीं बहतीं। उन भूखों-नंगों-अनपढ़-अज्ञानियों को तो चोरी-चकारी की माफी मिल सकती है, लेकिन भारत ? इस हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा भ्रष्ट, बेईमान, झूठा, ढोंगी और पाखंडी देश है भारत। इस शर्म को छिपाने तक की कोई जगह नहीं।

मुझे मालूम है, मेरी यह बात कुछ लोगों को बहुत बुरी लगेगी। उन्हें आडवाणियों-अटलों-नरेंद्रों-तोगड़ियाओं ने बता जो रखा है कि अपना देश महान, अपना धर्म महान। इन झूठों के इस झूठे को लोगों ने मान भी लिया, क्योंकि मानना अच्छा लगता है। आखिर किसको भला यह मानना अच्छा नहीं लगता है कि अपना देश दुनिया का सबसे अच्छा, सबसे महान देश है। यह सत्य है कि कभी था। लेकिन आज जो कुछ यह देश है, वह इस देश की जनता के लिए सिर्फ और सिर्फ शर्म तथा अपमान का ही कारक है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पाखंड में डूबे इन झूठे नेताओं, ज्ञानपापियों, आंख के अंधों या फिर भोले-भ्रमियों के सूचनार्थ कुछ तथ्य यहां मैं अत्यंत क्षोभ और दुख के साथ दे रहा हूं।

इस वक्त हमारे इस महान देश में काले धन के तौर पर कुल 10 लाख करोड़ रुपये प्रचलित हैं। ये रुपये काले इसलिए हैं कि इनके मालिकों ने आयकर चोरियां कीं। आयकर की चोरी से बचाया-छिपाया गया यह धन है- 10 लाख करोड़ रुपये! इसके अलावा अपने इस महान देश के महान लोगों ने स्विस बैंकों में जो कुल रुपया जमा रखा है, वह है 1 अरब करोड़ रुपये। इस रकम से हम आज हम पर जो कुछ विदेशी कर्ज है, उसे 13 बार चुका सकते हैं! गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर जो 45 करोड़ अभागे हैं इस देश में, उनमें यदि स्विस बैंकों में जमा बेईमान भारतीयों के ये 1 अरब करोड़ रुपये बराबर-बराबर बांट दिये जायें, तो हर व्यक्ति लखपति हो जाये।

अभी हाल ही एक और रिर्पोट आयी है। यह एक बिजनेस सर्वे की रिर्पोट है। उसमें 12 देशों को शामिल किया गया- सिंगापुर, हांगकांग, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, जापान, मलेशिया, ताइवान, वियतनाम, चीन, फिलीपिन्स, इंडोनेशिया और अपना यह भारत महान! पाया गया कि इन बारह देशों की अफसरशाही, यानी नौकरशाही, यानी प्रशासन में भ्रष्टतम है भारत की अफसरशाही। भारत के नौकरशाह (चपरासी से लेकर,क्लर्क, हेडक्लर्क, मैनेजर, कैशियर, डाइरेक्टर, कलक्टर, कमिश्नर, सचिव आदि) काम ही नहीं करते। हाजिरी बजाते हैं, हाजिर नहीं रहते। आलसी होते हैं। रिश्वतखोर हैं और रिश्वत लेकर भी काम नहीं करते।‘ट्रान्सपरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़‘ के वर्ष 2007 के प्रतिवेदन में (जो 2008 को पेश किया गया) कहा गया है कि ‘देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों को एक साल में मूलभूत, अनिवार्य तथा जनकल्याणकारी सरकारी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए लगभग नौ सौ करोड़ रुपयों की रिश्वत देनी पड़ती है। ज़ाहिर है, नौ सौ करोड़ की यह सारी रिश्वत भारत के नौकरशाहों की बेईमान-बेशर्म जेबों में जाती है। यहां एक बात पर गौर करना होगा। वह यह कि नौ सौ करोड़ की यह रिश्वत भारत की ‘गरीबी रेखा के नीचे का जीवनयापन करने वाले लोग‘ ही देते हैं, जो कुल आबादी में 45 करोड़ ही है। बाकी के 90 करोड़ लोग जो रिश्वत देते हैं, वे आर्थिक क्षमता में उन गरीबों से बहुत ज्यादा आगे हैं। जाहिर है, इनके भी सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों के काम बिना रिश्वत के बनते नहीं। उन गरीबों की तुलना में 90 करोड़ लोग ज्यादा ही रिश्वत देते होंगे। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल रिश्वत के तौर पर कुल 3200 करोड़ रुपये दिये जाते हैं।

सिर्फ रिश्वतखोरी और कामचोरी में ही नहीं, गबन में भी अपना भारत महान है। ताजा मामला तो ‘सत्यम‘ का है ही। ‘इंडिया फ्रॉड सर्वे‘ की वर्ष 2008 की रिर्पोट में कहा गया है कि गबन की वजह से देश की 5 % कंपनियों को प्रति कंपनी 10 करोड़ रुपयों से अधिक का नुकसान हुआ, और 10 % कंपनियों को 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपयों तक का नुकसान। वर्ष 2009 की तुलना में भारत में गबन के शिकारों में 54 % बढ़ोतरी हुई है। यानी अपना देश तरक्की कर रहा है। बधाई!

सिर्फ अफसरशाह ही क्यों, उनके आकाओं को लीजिये। सुखरामों की कोई कमी तो नहीं इस देश में। लेकिन एक सुखराम ही को यदि आप लें- जिन्हें हाल ही अदालत ने आय से अधिक साढ़े चार करोड़ रुपयों की संपति रखने के अपराध में दोषी मानकर सजा दी है, तो भी आपका सर शर्म से झुक जायेगा, आश्चर्य से चकरा जायेगा। मज़ा यह है कि सुखराम की जिन संपत्तियों की कीमत साढ़े चार करोड़ आंकी गयी, उनकी मौजूदा कीमत सौ करोड़ रुपये की है। पिछले साल मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य संचालक योगीराज शर्मा से भी करोड़ों की राशि और जमीन-जायदाद के कागज़ात मिले। सुखराम जैसे नेताओं और योगीराज जैसे अफसरों की कोई कमी नहीं यहां, लेकिन मज़ा यह है कि अपनी न्याय-व्यवस्था भी इतनी मज़ेदार कि दोनों में से किसी को एक दिन के लिए भी जेल नहीं जाना पड़ा। गिरफ्तारी-जमानत-सजा की घोषणा के बाद ऊपरी अदालतों को अपील करने तक बेल की व्यवस्था-इस बात को तो अपने स्वदेशी-सांस्कृतिक राष्ट्रीयवादी, ‘गर्व से कहो‘ वादी धुरंदर देशप्रेमी-धर्मप्रेमी लोग भी मानेंगे ही कि भारत जननी की जो सबसे भ्रष्ट और बेईमान संतानें हैं, वे हैं वकील और पुलिस। झूठे, मक्कार, बेईमान। कू्रर। इधर कुछ जजों के किस्से उजागर हुए हैं। मुंबई की एक अदालत के एक माननीय जज पिछले पांच-छह साल से फरार हैं। मुंबई की (देश की सबसे काबिल) पुलिस उन्हें ढूंढ ही नहीं पा रही ! भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एंटी करप्शन ब्यूरो) की ताजा रिर्पोट बताती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में देशभर की पुलिस में महाराष्ट्र पुलिस अव्वल है। बधाई! महाराष्ट्र पुलिस के खिलाफ 81 मामले साल भर में दर्ज हुए। साल भर में 103 पुलिसकर्मी घूसखोरी में पकड़े गये। जो पकड़े नहीं गये, उनका हिसाब कौन बताये! और तो और, महाराष्ट्र के एंटी करप्शन ब्यूरो का भी एक अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। ‘ट्रान्सपरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया‘ की रिर्पोट से पता चलता है कि अपने इस महान देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय रोजगार गारंटी, पाठशालाओं के बच्चों के लिए मघ्याह्न भोजन, पोलियो उन्मूलन आदि विभागों में किस कदर भ्रष्टचार का बोलबाला है।

राजनीति और नेताओं की बात करें क्या? मेरी ही एक ग़ज़ल का एक शेर इस संदर्भ में-

‘कुछ और भी कहें क्या, अल्लाह रे, तौबा
आदाब कहां जायें अपनी जुबान के !‘


सच है, देश के नेताओं के बारे में कुछ कहना खुद अपनी जबान गंदी करना है, भाषा को बेअदब बनाना है। इस बार के लोकसभा चुनाव में पिछली बार (वर्ष 2004) की तुलना अपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या में 30.9 % की वृद्धि हुई है। बधाई! इस बार 150 ऐसे उम्मीदवार संसद में पहुंचे हैं, जिनके खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज हैं। 73 सांसदों के खिलाफ संगीन अपराधों के 412 मामले चल रहे हैं। पिछली बार 128 ऐसे सांसद थे, इस बार 150-वाकई, तरक्की कर रहा है देश, ‘शाइनिंग इंडिया !‘ सांसदों पर जो आरोप लगे हुए हैं, उनके एवज में उन्हें आजीवन कारावास या फांसी तक की सज़ाएं हो सकती हैं। ऐसे सांसदों की सबसे ज्यादा संख्या इस देश की सबसे चरित्रावान, पवित्रा, राष्ट्रभक्त पार्टी भाजपा में है ! ‘हिंदू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता‘ का गर्वपूर्ण उद्घोष करने वाली इस पार्टी के 23 सांसद बाहुबली अपराधी हैं। यह भी तब, जबकि इस बार बहुत से बाहुबली हारे हैं।

विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के तीन पाये हमने देख लिये- विधायिका यानी नेता, संसद आदि, कार्यपालिका यानी प्रशासन, अफसर वगैरह, और न्यायपालिका (जहां बेईमान पुलिस, झूठे वकीलों, फर्जी गवाहों का दुष्चक्र तो है ही, जजों के रवैयों की वजह से 10-15-20 वर्षों तक लटके हुए लाखों मामले हैं, जवान आदमी बूढ़ा हो जाता है, मर जाता है, न्याय नहीं मिलता और देर से मिला भी, तो न्याय नहीं रह जाता अंततः), अब आइये, लोकतंत्र के हमारे चौथे पाये को भी जरा देख लें कि वह कितना सच्चा माई का लाल है। यह पाया है मीडिया। अदालत से ज्यादा भरोसा जिस पर जनता को है। जिस मीडिया को हम समाज का सजग प्रहरी कहते नहीं अघाते। जिस मीडिया के पास जनता के विचारों को मोड़ने की ताकत है। दुख है कि इस महान देश का महान मीडिया, लोकतंत्रा का चैथा खंभा, जनता की आवाज- वह भी इस महान देश के महान बेईमान चरित्रा के उसी महान अंधकूप में पड़ा हुआ है। देश या जनता की सेवा नहीं, मीडिया का उद्देश्य आज सिर्फ ग्लैमर और पैसा कमाना रह गया है। वह बेईमान नेता और लोभी उद्योगपति के हाथों बिक गया है। वह यह तो बहुत गाजे-बाजे के साथ बताता है कि भारत का सुनील मित्तल विश्व का स्टील किंग बन गया है, या टाटा ने कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिग्रहण करके भारत की साख दुनिया में बढ़ायी, लेकिन वह इस बात का जिक्र तक नहीं करता कि कृषिप्रधान इस देश के ढाई हज़ार किसानों ने आत्महत्या कर ली, और आत्महत्याओं का सिलसिला थम ही नहीं रहा। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की वार्षिक रिर्पोट की वह बात भी मीडिया नहीं बताता, जिसमें आंकड़ों के सहारे यह बताया गया है कि गरीबी और भुखमरी से निपटने की भारत की स्थिति इथियोपिया और पाकिस्तान से भी गयी-गुजरी है। अखबारों और टीवी चैनलों को इस बात का भी होश नहीं कि भारत में प्रतिदिन 20 करोड़ लोग रात का भोजन नहीं कर पाते, भूखे ही सो जाते हैं। पत्रकार यह नहीं बताते कि देश के 80 % लोगों की दैनिक आय 20 रुपये से भी कम है। वे नहीं बताते कि पिछले साल भर में मध्यप्रदेश के कोरकू आदिवासियों के 62 बच्चों की मौत भूख से हो गयी। नहीं बताते कि महाराष्ट्र के जव्हार-मोखाड़ा और चिखलदरा के आदिवासी बच्चे पिछले 12-12 वर्षों से हर वर्ष 25-30-40 की संख्या में कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं।

मंदी के दौर के बहाने चैनलों ने यह बात तो बहुत बढ़-चढ़कर बतायी कि कितनी बड़ी कंपनियों को कितने लाखों-करोड़ों का भारी नुकसान हुआ, लेकिन यह नहीं बताया कि उन कंपनियों में पिछले दस-पंद्रह वर्षों में भारी पूंजी निवेश भी हुआ। उसका करोड़ों का जो लाभ हुआ, वह किसकी जेब में गया? यह नहीं बताया कि मुक्त बाजार के नाम पर जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपना व्यापार फैलाया, उन्होंने भारत की सरकारी बैंकों, बीमा कंपनियों से करोड़ो-अरबों का लोन लिया, उसका कितना लौटाया? किसी चैनल ने नहीं बताया कि अगर वामपंथी पार्टियों ने रोक-टोक नहीं लगायी होती, तो मनमोहन सरकार बेलगाम होकर बैंकिग व्यवस्था में परिवर्तन, बीमा सेक्टर और रेल्वे का निजीकरण और श्रमिक सुधार के नाम पर देश को बेच ही देती।

स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर भी मीडिया झूठ कितना खतरनाक है, और कितना ज्यादा गैर जिम्मेदाराना, यह तब पता चला जब एक चैनल फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के जरिये दिल्ली की एक अध्यापिका को अपने स्कूल की छात्राओं द्वारा देह-व्यवसाय कराने के लिए फुसलाते दिखाया गया। बाद में किस्सा सिरे से सफेद झूठ निकला। ऐसे ही एक और चैनल ने ‘स्टिंग ऑपरेशन‘ के नाम पर तत्कालीन गृहराज्यमंत्री माणिकराव गावित को जेल में कैद एक कुख्यात माफिया सरगना से मोबाइल पर बातचीत करते दिखाया कि गावित कह रहे हैं कि जेलर बदल दिया जायेगा, बदले में सरगना छूटने के बाद गावित के दामाद को किसी भूमि-विवाद से मुक्त करा देगा। दोनों स्टिंग ऑरपेशन झूठ के पुलिंदे साबित हुए।

दरअसल इस बेईमान देश के बेईमान पत्राकार भी पूरी तरह धंधेबाज हो गये हैं। चैनलों ने शेयर बाजार में पैसा लगा रखा है। पब्लिक ईशू के जरिये धन बटोरा है। जाहिर है इनके हित शेयर बाजार में हैं। ये सच्ची पत्राकारिता कैसे करेंगे? ये धंधेबाज पत्राकार तो इस हद तक चले गये हैं कि अपने ही कर्मचारियों के पेंशन और प्रोविडेंड फंड का पैसा भी शेयर बाजार में लगाने की तैयारी में हैं।

इन सब का परिणाम जो होना था, वह होकर रहा। आज हमारे देश के राष्ट्रीय चरित्रा की ही तरह देश की जनता का भी ‘सामाजिक-सार्वजनिक चरित्र‘ निहायत ही बेईमान है। देश की जनता परम स्वार्थी, संकीर्णहृदय और पाखंडी है। गांवों के स्कूल टीचर रोज स्कूल नहीं जाते। किसी तरह एक दिन जाकर छह दिनों की हाजिरी लगा देते हैं। कॉलेज के लेक्चरर-प्रोफेसर कॉलेज में क्लास नहीं लेते, प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग क्लास से लाखों कमाते हैं। मिड डे मील का पैसा डकार जाते हैं। डॉक्टरों ने तो मानों लूटने की दुकान ही लगा रखी है। गांवों की पंचायतराज की व्यवस्था भ्रष्टाचार में डूबी है। गांवों की जो महिलाएं अपने खेत में काम करना अपनी शान के खिलाफ समझती हैं, वे स्वयं को कागजों पर मजदूर बताकर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पैसा उड़ा रही हैं। गांव में जो तालाब है ही नहीं, उसी की खुदाई हो रही है चार-चार साल से। जो परिवार किसी एनजीओ को बता रहा है कि बच्चे भूखे मर रहे हैं, पता कीजिये तो पाइयेगा कि उस परिवार ने अपने बेटे की शादी में 5,000 रुपयों की कारतूस दागीं।

गांव बेईमान, शहर बेईमान, नेता बेईमान, जनता बेईमान-इस बुरे देश में पैदा होकर इतने सारे बुरे लागों के बीच रहकर कोई व्यक्ति भला अच्छा कैसे बन सकता है? यहां तो सच बोलने तक का अधिकार नहीं। आज जो मैं महान भारत, विश्वगुरू भारत, ज्ञान का प्रथम प्रकाश भारत, विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म हिंदुत्व आदि-आदि के बारे में थोड़ा-बहुत सच बोल-लिख गया, तुरंत बाल ठाकरे, उध्दव ठाकरे, आडवाणी-जोशी-मोदी जैसे सत्य के पुतले दूध के धुले आर्य, हिंदू, भारतीय वीर मुझ पर टूट पड़ेंगे। कहेंगे ‘हिंदू कभी आतंकवादी नहीं होता‘ और ठाकरे पत्रकारों को पीटेंगे, दूकानें लूटेंगे, अखबार जलायेंगे, राज ठाकरे परप्रांतियों की हत्या करवायेंगे, नरेंद्र मोदी अपनी सरकारी मशीनरी के माध्यम से खुले आम गणहत्या करवायेंगे। पाखंड, झूठ और बेईमानी की हद है।

सड़क दुर्घटना हो, एनकाउंटर हो, दंगा हो, मिलावटी दवा हो-मरना इस देश की जनता को बेमौत ही है-

‘अब तो अपनी भी मौत मरना नहीं नसीब
हत्या से बचोगे, तभी तो अपनी मौत मर पाओगे!‘


हबीब तनवीर को भोपाल के अस्पताल में सही इलाज मिला ही होगा, गलत-लापरवाह चिकित्सा और मिलावटी दवा भी मिलती, तो अजब क्या था। इस देश के अस्पताल भी तो इसी देश के हैं आखिर! जिस देश में पैकेट का दूध भी सिर्फ मिलावटी ही नहीं, नकली भी हो, उस देश में क्या नहीं हो सकता! सो सड़क दुर्घटना में मारे गये ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी, लाड़सिंह गुर्जर-तुम अच्छे लोग, अच्छे और सच्चे कवि जो इस देश में पैदा हुए, तो तुम्हें तो यूं ही मरना था। अब तुम इस देश की हद से बाहर चले गये हो, तुम्हारी आत्माओं को अब शांति तो जरूर ही मिल रही होगी। तुम्हें श्रद्धाँजलि देते हुए मैं आज के इस बुरे दिन में यही कामना करता हूं कि तुम्हारी संतानों, तुम्हारे नातियों-पोतों को, हमारे बाद आने वाली पीढ़ियों के नन्हें-मुन्नों को अच्छे दिन नसीब हों। मेरी तरह उन्हें अपने ही देश को कोसने के बुरे दिन कभी नसीब न हों। दीपावली के मौके पर आत्मविश्लेषण करने की उन्हें जरूरत न पड़े।

आमीन!

(आलोक भट्टाचार्य)
18, अंबिका निवास, (मॉडेल इंग्लिश स्कूल के पीछे)
पांडुरंगवाड़ी, डोंबिवली (पूर्व) 421201
फोन- (0251) 2883621, मो॰- 09869680798

Wednesday, October 14, 2009

लक्ष्मी के चक्कर में

.........रात के ग्यारह बज चुके थे। पत्नी द्वारा बार बार पड़ोसियों के द्वार दौड़ाए जाने के बाद अब मैं पूरी तरह थक चुका था। जब भी पत्नी को लगता कि बगल के फलां पड़ोसी के घर से कोई आवाज नहीं आ रही है तो वह झट से चार लड्डुओं के डिब्बे को मेरे हाथ में पकड़ा उस पड़ोसी के घर यह जासूसी करने यह आदेश दे भेज देती कि हे रा के एजेंट! जाकर पता लगाओ कि उनके घर लक्ष्मी तो नहीं आ गई! मैं सहमा हुआ सा दबे पांव पड़ोसी के घर बहाने से घुसता वहां, सूंघता और उस घर में लक्ष्मी की खुशबू न पा मुस्कुराता लौट आता। जब तक मैं अपने घर न आता पत्नी की जान उसके गले में अटकी रहती और ज्यों ही वह मेरे मुस्कुराते चेहरे को देखती तो खुशी के मारे उछल पड़ती।
पड़ोसियों के घर जासूसी करने के लिए स्पेशल आर्डर पर बनवाए चार चार लड्डुओं के तमाम जब डिब्बे खत्म हो गए तो पत्नी ने निराश होते पूछा,‘ अब ??’
‘ अब क्या??’
‘ डिब्बे तो खत्म हो गए। अब?? अच्छा ऐसा करो ...’ कह उसने जिम्हाई ली।
‘क्या करूं अब?? अब बचा ही क्या है करने को??’
‘ लगता है मुहल्ले में किसीके घर भी अभी तक लक्ष्मी नहीं आई है...’
‘ तो???’
‘तुम मुहल्ले के नाके पर चले जाओ और जैसे ही वह आए उसे जैसे भी हो अपने घर ले आना।’
‘ इतनी रात को? अब तो कुत्ते भी सो गए हैं!’
‘ तो क्या हुआ! इसी रात की तो बात है। बस एक बार अबके हमारे घर में लक्ष्मी आ गई तो पूरे जन्म की कंगाली गई पानी में।’
‘पर पानी में तो भैंस जाती है।’ मैंने मुहावरा ठीक किया तो वह झल्लाई। पता नहीं क्यों?
‘ क्या तुम नहीं चाहते कि लाला रोज हमारे घर पर उधार दिया मांगने न आए? क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे पास भी कबाड़ी के बदले ब्रांडेड सूट हो? क्या तुम नहीं चाहते कि तुम भी अपने बेटे को डोनेशन देकर एमबीए कराओ? क्या तुम कबाड़ी से खरीदे कोट में प्रसन्न हो? मेरा क्या! मैं तो जैसे कैसे जी लूंगी। पर मैं नहीं चाहती कि मेरा मर्द.......’ पता नहीं क्यों आदर्श पत्नी के ये कथन सुन मेरा कलेजा पसीज गया और मैं बिन टार्च, डंडे के घुप्प अंधेरी रात में कुत्तों की परवाह किए बिना मुहल्ले के नाके की ओर कूच कर गया।
बड़ी देर तक मुहल्ले के नाके पर दुबक कर बैठा रहा हनुमान चालीसा पढ़ता। पर कहीं से भी किसीके आने की कोई आहट नहीं।
ठंड भी लगने लगी थी कि अचानक किसीके आने की आहट सुनाई दी। मैं चैकन्ना हुआ। आंखों की नींद को लात मार परे भगाया तो देखा कि सामने लक्ष्मी। हाय रे मेरे भाग! सरी ठंड हवा होती रही। सब्र का फल पहली बार चखा।
‘प्रणाम देवि!!’ कह मैं पूरा का पूरा जुड़ गया।
‘कौन???’
‘ मैं, लच्छमी नंद।’
‘यहां क्या करे हो इतनी अंधेरी रात में?पी के गिरे हो?’
‘नहीं,तुम्हारा इंतजार कर रहा था देवि! बड़ी देर कर दी अबके आने में। पड़ोसी तो सो भी गए होंगे। अबके इतनी लेट कैसे हो गईं आप?’
‘मेरा वाहन दिल्ली में मेट्रो साइट हादसे में घायल हो गया था, पैदल आने में देरी हो गई।’ कह देवि ने माथे से पसीना पोंछा।
‘ तो मुझे बुला लेते। मैं आपको ले आता।’ अब पता चला विश्व में मंदी का दौर क्यों चला है?
‘ नहीं वत्स! तुम तो ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ कृति हो। कहां तुम और कहां मेरा वाहन उल्लूक!’
‘नहीं देवि नहीं। मैं देखने में ही लच्छमी नंद हूं। इसलिए मुझे अपने वाहन के रूप में सहर्ष सवीकार कर कृतार्थ करो।’ कह मैं घोड़ा बन गया।
‘ पर तुम मेरे वाहन से कैसे?’
‘देखो देवि! यह जानते हुए भी की लोकतंत्र में मत अमूल्य है और मैं हर चुनाव में चंद लोभों में बिक उल्लू बनता रहा हूं। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बदले अन्याय को चुपचाप सहता रहा हूं। ऐसा उल्लू ही कर सकता है न! घरवाली कहती मर गई कि अब तो बच्चे बड़े हो गए। महंगाई दम ले रही है,। भगवान ने भी रिश्वत लेनी शुरू कर दी है। तुम भी रिश्वत लेना ‘ाुरू कर दो,पर नहीं ले पा रहा हूं। ऐसा उल्लू ही कर सकता है न? न मुझे अपने अधिकारों का पता है और न अपने कत्र्वयों का। अपना दिमाग मेरे पास है ही नहीं। बस, जो घरवाली कहती है उसे ही संसार का अंतिम सत्य मानता रहा हूं। घर में बिजली नहीं होती मैं बिजली वालों से शिकायत नहीं करता। नलके में पानी नहीं आता मैं पानी वालों से शिकायत नहीं करता। लाला कम तोलता है । मैं सरकार के बार बार जगाने के बाद भी सोया खड़ा रहता हूं। सोया ग्राहक हूं न!......... अब अपने उल्लूपने के और कितने प्रमाण तुम्हें दूं देवि??’
‘तो ऐसे उल्लू के घर जाकर मैं करूंगी क्या वत्स??’
‘ तो जाओगी किसके घर देवि!!’
‘ पूंजीपति के। वह मुझे संभालना जानता है।’
उस रात को जो ठंड लगी थी आज भी बीमार चल रहा हूं मित्रो! हजार रूपये की दवा खा चुका हूं। पर ठंड है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही।

अशोक गौतम
गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212
हि.प्र.,