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Saturday, October 31, 2009

अलाद्दीन : मजेदार मनोरंजन मैजिक

फिल्म समीक्षा

"हैरी पॉटर" और "पायरेट्स ऑफ़ कैरिबियन" जैसी हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्में जब हिंदी फिल्मों को टक्कर देती है तो ऐसी कोई भी हिंदी फिल्म नहीं होती जो उन्हें मुह तोड़ जवाब दे पाए। हालाँकि कोई कहानी अच्छे से प्रस्तुत की जाये तो बच्चे-बूढ़े और जवान सभी को रास आता है, पर हिंदी फिल्मों में कभी ऐसे चमत्कारपूर्ण या परी कथाओं पर परिश्रमपूर्वक काम नहीं हुआ है।

पर इसी संकीर्ण रास्तों पे चलते हुए सुजोय घोष की नयी फिल्म सिनेमा घरों में आई है। क्या ये फिल्म विश्वस्तरीय फिल्मों के मुकाबले खरी उतरती है? करते है इस फिल्म के गुणवगुणों की चर्चा.

कथा सारांश:

कथा सीधी साधी है। "ख्वाइश" नामक एक काल्पनिक गाँव में एक अनाथ बच्चा, अलाद्दीन (रितेश देशमुख) रहता है। अलाद्दीन के माँ बाप असली अलाद्दीन के चिराग के खोज के समय ही भगवन को प्यारे हो गए। उसके बाद अपने दादा के साथ रहने वाला अलाद्दीन कुछी दिनों बाद दादा का भी साथ खो के अनाथ हो जाता है। स्कूल में बच्चे उसे उसके नाम से चिढ़ाते है और चिराग घिस के जिन्न को बाहर लाने को कहते हैं और जब वह ऐसा करने में असफल होता है तो उसे मारते है। इसी वजह से अलाद्दीन चिराग से नफ़रत करता है।

बड़ा होने के बाद भी अलाद्दीन एक कम आत्मविश्वास वाला लड़का बन जाता है। पर एकदिन कॉलेज में आई नयी लड़की, जास्मिन (जैकलिन फ़र्नान्डिस) पे वह मर मिटता है। अलाद्दीन के जन्मदिन पर जास्मिन जो चिराग उसे तोहफे के स्वरुप देती है, उसी चिराग से असली जिन्न निकलता है।

अलाद्दीन और वह जिनी मिल के क्या गुल खिलाते हैं, इसी कहानी पर बनी है यह फिल्म।

पटकथा:

बहुत सारे हॉलीवुड और हिंदी फिल्मों का अभ्यास कर के सुजोय घोष ने इस फिल्म की पटकथा को सँवारने की कोशिश की है और कुछ बेहतर होशियार तरीकों के बावजूद पटकथा कहीं-कहीं पटरी से फिसल जाती है। पर इसके बावजूद फिल्म ज्यादातर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाने में कामयाब होती है।

दिग्दर्शन:

सुजॉय घोष की दिग्दर्शीय प्रतिभा के लिए यह फिल्म एक शिव धनुष को उठाने के सामान बड़ी चुनौती थी, और वह उसमे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। पर सुजोय घोष के लेखन प्रतिभा ने उन्हें कई जगह पे कमजोर कर दिया है। पर सुजोय ने जिस ऊँचाई पर इसे सोचा है वह काबील-ए-तारीफ है। और उससे भी कबीलेतारीफ है अपने सपने को सच करने उनकी मेहनत, जो साफ दिखाई देती है। उन्हें इसके लिए दाद देने की जरूरत है। अगर तगड़ी पटकथा का आधार मिले तो वे सच में विश्वस्तरीय फिल्मों की टक्कर की फिल्म बना सकते है।

पर फिल्म के पहले भाग में बहुत सारे गाने और कहानी के खिंचने की वजह से बोरियत महसूस होती है उसपे उन्होंने और थोड़ा काम करना चाहिए था।

अभिनय:

ये फिल्म पूरी तरह अमिताभ के काबिल कंधों पे सवार है। वे पूरी तरह अपने भूमिका को न्याय देते हैं और जब स्क्रीन पे आते हैं, तब से स्क्रीन पे छा जाते हैं। रितेश भी दर्शकों से तालियाँ और हँसी बटोरने में सफल हुए हैं। संजय दत्त को थोड़ा और मेहनत करने की ज़रूरत थी। नयी नायिका जैकलिन परी जैसी दिखती है और अपना पात्र ठीक से निभाती है। बाकि सब कलाकारों ने अच्छा साथ निभाया है।

चित्रांकन और स्पेशल एफ्फेक्ट्स:

अतिउच्च दर्जे के स्पेशल एफ्फेक्ट्स इस फिल्म के उन चुनिन्दा पहलूओं में से एक हैं जिनके लिए ये फिल्म देखना बहुत जरूरी है। रियल लाइफ एक्शन जिसे लाइव एक्शन भी कहते हैं उसके साथ कम्प्यूटर से बनी मायावी दुनिया और जादू का मिश्रण बहुत ही सटीक तरीके से फिल्माया गया है। हिंदी फिल्म के कम बजट में भी विश्वस्तरीय काम करने के लिए इस टीम को जितनी दाद दी जा सके, कम है। तालियाँ !

संगीत और पार्श्वसंगीत:

विशाल शेखर का संगीत अच्छा है। जिनी रैप और जास्मिन को प्रपोस करने वाले गाने अच्छे हैं। बाकि गानों में से कम से कम 2 गाने फिल्म से निकल देने चाहिए।

संकलन:

संकलक ने ड्रामा, एक्शन और स्पेशल इफेक्ट वाले दृश्यों में दर्शकों की तालियाँ हासिल करने में सफलता प्राप्त की है। पर फिल्म के लम्बाई को कम करने के लिए उन्हें निर्देशक को मनाना चाहिए था।

निर्माण की गुणवत्ता:

सुजोय घोष और सुनील लुल्ला को दाद देनी चाहिए कि उन्होंने इस तरीके के फिल्म को डिज्नी के लेवल का सोचा और बनाया है। निर्माण मूल्य अतिउत्तम है और फिल्म पहले दृश्य से ही अचम्भित कर देती है। दर्शकों को सोचने पे मजबूर करती है कि क्या ऐसी फिल्म भी भारत में बन सकती है! बहुत अच्छे।

लेखा-जोखा:

*** (3 तारे)
एक तारा विश्वस्तरीय स्पेशल एफ्फेक्ट्स और टेकिंग को, दूसरा तारा अमिताभ को, तीसरा तारा फिल्म के दिलचस्प भाग को।

बच्चों को जरूर ये फिल्म दिखाने ले जायें। और हैरी पॉटर और उस जैसी फिल्म पसंद करने वाले जवान और व्यस्क लोग भी ये फिल्म जरूर देखें। निर्माण की ऐसी गुणवत्ता और स्पेशल इफेक्ट वाली फिल्में हिंदी में बार-बार नहीं बनतीं। पर कही पे थोड़ी बच्चों को और कही पे थोडी बड़ों को बोरियत हो सकती है।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल