Saturday, October 17, 2009

ब्लू : प्लास्टिकी किरदार और कहानी

फिल्म समीक्षा

ऐसा क्यूँ होता है के जिस मूवी से हम इतनी उम्मीदें लगाते हैं और सालभर उसके आने की राह तकते हैं वही फिल्म हमें बोरियत से दाँतों से नाखून कतरने पर मजबूर कर देती है? ऐसा क्यूँ होता है के फिल्मकारों की टीवी पर बातें सुन कर, पत्रिकाओं में लेख पढ़ कर हम ये समझ बैठते हैं कि हम इस फिल्म को सिने से लगा रखेंगे, पर वही फिल्म स्वाइन फ्लू के विषाणू जैसे हमें दूर रहने के लिए मजबूर करती है?

ब्लू ..... ऐसी ही एक फिल्म है जो समंदर के अंदर की रंगीन दुनिया दिखाने के साथ-साथ 2 घंटे के रोमांचक सफ़र का वादा करती है। विश्वस्तरीय तंत्र और बेशुमार लागत से बनी ये फिल्म जिसे प्रचारित करने में सभी मुख्य कलाकारों ने जान लगा दी थी, क्या वह अपने वादों पे खरी उतरती है?

आइए देखते है "ब्लू"-

कथा सारांश:
आरव (अक्षय कुमार) और सागर (संजय दत्त) दोस्त हैं जो बहामा में रहते हैं। सागर सुलझा हुआ इंसान है जो फिशिंग कंपनी में काम करता है और पैसे कमा कर अपनी प्रियसी मोना (लारा दत्ता) के साथ शादी कर के साधारण पर सुखी जिंदगी जीना चाहता है। आरव एक अमिर लड़का है जो ज्यादातर वक़्त सागर के साथ बीतता है। मछली पकड़ने में, बॉक्सिंग करने में, पब में मस्ती करने मे। पर वो बार-बार सागर को एक खजाने की खोज के लिए मनाने की कोशिश करता है क्यूंकि उसे लगता है कि सागर के पिता ने वो खजाना पहले ही ढूँढ़ निकाला था। पर सागर इस बात को झूठ बताकर खोज पर चलने की बात को बार-बार ठुकरा देता है।

इसी बीच सागर का भाई समीर (ज़ायेद ख़ान) जो घर छोड़ के चला गया था वह वापिस आता है। पर वो एक मुसीबत में फँसा हुआ होता है और उसे एक गैंग्स्टर के 50 मिलियन लौटाने होते हैं। उनसे छिपने के लिए समीर सागर के पास बहामा आता है। लेकिन वह लोग उसे वहा भी ढूँढ़ लेते है और समीर पे गोलीबारी करते है। आरव उसे बचाता है। तब समीर आरव को सब बता देता है। आरव और समीर मिल के सागर को मना लेते है खजाने की खोज पर निकलने के लिए।

फिर क्या होता है.... क्या वो खजाना ढूँढ़ के समीर को उसके तकलीफ़ से बचा पाते हैं? यही सब सवालों का जवाब मनोरंजक तरीके से देने की कोशिश करती है ब्लू की कहानी। पर क्या पटकथा उसे न्याय दे पाती है?

पटकथा:
कथा तो साधारण लगती है जो हम कुमार कथाओं में और अंग्रेज़ी खोज कथाओं में कई बार मिलती है। पर यहाँ नयी बात ये थी कि ये खजाना समंदर के अंदर है और समुद्रतल का चित्रण अभी तक हिन्दी चलचित्रों में आया नहीं है। पटकथा लेखन इस तरीके के कहानी में तगड़ा होना चाहिए जो यहाँ नहीं है। सरल सपाट कथा-कथन, जिसकी घटनाओं में ज़रा भी नयापन नहीं है, वह इस असाधारण प्रयत्न को एक साधारण फिल्म बना देता है। ब्रयान स्यूलिवन जिन्होंने ये पटकथा लिखीं है उन्हें फिर से पटकथा लेखन का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए।

दिग्दर्शन:
एंथॉनी डीसौजा जिनकी ये पहली फिल्म है उनके हिम्मत और प्रयत्न की दाद देना चाहिए पर दुर्भाग्यवश वो कथा कथन में परिपक्व नहीं हैं। पानी के गहराइयों के दृश्य उन्होंने अच्छी तरीके से चित्रित किए है पर भावुक दृश्य और ऐसे दृश्य जो फिल्म को एक दर्शकों को किरदारों के साथ बाँधने में सफल रहे वो चित्रित करने में उनकी प्रतिभा कम पड़ जाती है। शायद वो अपने कलाकारों से खुद को छोटा मानते हुए उनसे और मेहनत करने में हिचकिचा रहे थे। इसलिए सबका अभिनय पास्टिक अभिनय लगता है। अपना प्रॉजेक्ट प्रमोटे कर के उसके लिए सामग्री इकठ्ठा करना उन्हें भले ही आता हो पर दृश्य कथा कथन की कला में उन्हें अभी और बहुत दूर तक जाना है।

अभिनय:
अभिनय के मामले में सब साधारण-सा है। इसका जिम्मा पूरी तरह से अभिनेता और अभिनेत्रियों पर नहीं जाता, जब लेखन में ही दम न हो और आपका दिगदर्शक भी आपसे डर-डर के काम करा रहा हो तो और क्या परिणाम निकल सकता है? संजय दत्त, अक्षय कुमार, लारा दत्ता, कटरीना कैफ़, ज़ायेद ख़ान और राहुल देव सबने उतना ही दिया है जितना उनसे लिया गया है। लारा दत्ता ने बहुत सुंदर तरीके से अपनी बदन की खूबसूरती को दर्शाया है। कबीर बेदी सिर्फ़ कुछ क्षण के लिए पर्दे पर आते हैं।

संगीत और पार्श्वसंगीत:
फिल्म के गाने पहले ही लोकप्रिय हो चुके है। कुछ गानों में असाधारण और अप्रतिम संगीत दे कर ऑस्कर विजेता प्राप्त ए आर रहमान ने अपनी प्रतिभा का लोहा फिर से मनवाया है। पर बाकी गाने साधारण से हैं। सबसे बढ़िया जो वीडियो जो ब्लू थीम है वो मूवी में कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ है। अहमद ख़ान के नृत्य निर्देशन में फिल्माये उस गाने में अप्रतिम उर्जा दिखती है (टीवी पर)। "आज दिल गुस्ताख है" पर्दे पर अतिसुंदर नज़र आता है। पार्श्वसंगीत भी अच्छा है।

संकलन:
फिल्म सिर्फ़ 2 घंटे की है। संकलक के अच्छी तरीके से काम करने के बावजूद भी कहानी में रोचक घटनाओं की कमी के कारण फिल्म प्रभावपूर्ण नहीं हो पाई। अब कथा को दृश्यों मे गुंफने की प्रक्रिया में दिग्दर्शक और संकलक को इनकी कितनी साझेदारी थी यह तो पता नहीं। पर अगर संकलक को ये जिम्मा सौंपा गया हो तो वो अपने कार्य में ज़रूर असफल रहे हैं। पर सिर्फ़ तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने जैसा बताया वैसे खुद का काम किया है।

एक्शन दृश्य:
रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांचक दृश्य तभी प्रभावित कर सकते है जब किरदार और कहानी दर्शकों के हृदय छू ले। यहाँ भी वही तकलीफ़ है। मेहनत और खर्चा दिखता है पर किरदारों के साथ भावुक संपर्क नहीं रहने के कारण परिणाम पूरी तरह से नहीं उभर के आता है। पर जिन्हें सिर्फ़ ऐसे दृश्य देखने में मज़ा आता है उन्हें ये फिल्म पसंद आ सकती है।

चित्रांकन:
फिल्म मे चित्रांकन विश्वस्तरीय और अव्वल दर्जे का है। समुद्रतल की सुदंरता आँखों को चकाचौंध कर देने वाली है। इस तरीके का चित्रण सही में इसके पहले कभी भी भारतीय फ़िल्मों में नज़र नहीं आया। जो भी लोग इसके पीछे हैं उनका प्रयत्न सफल और काबीले-तारीफ है। पीटर झूरिणिक जिन्होंने "पायरेट्स ऑफ दी करीबियन" की है, उनकी प्रतिभा और अनुभव इस बेहतरीन अनुभव के लिए ज़िम्मेदार है।

निर्माण की गुणवत्ता:
श्री अष्टविनायक चित्रपट संस्था और उसके संचालक ढीलिन मेहता की जितनी तारीफ की जा सके कम है। ये इसलिए के उन्होंने खर्चे में सच में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पर एक थकी कहानी और अपरिपक्व दिग्दर्शन ने उन्हें धोखा दे दिया। सिर्फ़ हम इतनी ही दुआ कर सकते हैं कि उनका खर्चा निकल जाए और दीवाली के दिनों में उनका दीवाला ना निकले। हम तहे दिल से चाहते हैं कि फिल्म अपनी कीमत वसूलने में सफल रहे।

लेखा-जोखा:
** (२ तारे)
प्लास्टिक से बने सुंदर थीम पार्क्स और अतिसुंदर झाँकिया कितना भी हों, रहते अंत में वही है: प्लास्टिकी ! वैसे ही भाव-भावनाओं से परे कहानी और किरदार कितने भी सुंदर हों, दिखते प्लिस्टिक के ही हैं। पर हम बेहतरीन तकनीक और अभूतपूर्व समुद्रतल दृश्यांकन के लिए इस फिल्म को एक तारा और एक्शन दृश्यों के चित्रीकरण के लिए और एक तारा दे ही सकते है।

अगर आप ये अभूतपूर्व दृश्य बड़े पर्दे पर देखना चाहते है (और वो बड़े पर्दे पर ही मज़ा देते है) तो कहानी से कुछ भी आशा ना रखते हुए ज़रूर जाएँ।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

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4 बैठकबाजों का कहना है :

manu का कहना है कि -

इतना तसल्ली बख्श लेख लिखा है के बिन देखे पता लग रहा है के फिल्म कैसी होगी...
एक पुरानी फिल्म देखि थी..धरमेंदर और जीतेंदर की..शायद ''सम्राट'' थी..
कुछ कुछ वैसी ही लगी..

अगर बहुत अच्छी कही गयी होती तो भी कहाँ वक्त था देखने को...?

:)

Shamikh Faraz का कहना है कि -

बहुत ही अच्छी समीक्षा ब्लू की. हालाँकि मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी है. लेकिन यह सुना है की यह किसी होलीवुड फिल्म की नकल है.

shanno का कहना है कि -

'BLUE' mere khayal se hollywood film 'THE DEEP'ki nakal hai jo 1977 mein release hui thee. Fir kuch aur apni taraf se scene jod kar kuch badlav karke hindi men film bana di gai. lekin original idea hollywood filmon se hi liye jaate hain tamam filmon ko banane ke vaaste.jaisa ki sabhi log aajkal jaante hain.

सजीव सारथी का कहना है कि -

blue dekhi, quite good man, not that bad, special effect, action, story everything is good, music is siperb, chigy viggy is outstanding, aur aapne likha ki theme song nahi hai film men, its there, and very well picturised also....

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