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Saturday, January 16, 2010

चांस पे डांस : नाच ना जाने, आँगन टेढ़ा

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

जब किसी स्टार की लगातार तीन फिल्में सुपर हिट होती हैं, तो ये लाजमी है कि उसके नए फिल्म से लिए लोगों की अपेक्षाए बढेंगी ही। उस पर अगर वह फिल्म नाम से डांस फिल्म लगती हो और वह स्टार शाहीद कपूर जैसा अतुलनीय डांसिंग स्टार की हो तो कुछ जलवे की उम्मीद रखना कोई गलत बात भी नहीं है।

क्या केन घोष अपनी तीसरी फिल्म में इतनी सारी उम्मीदों पर खरे उतर पाये हैं?

कथा सारांश :

कहानी है समीर बहल (शाहीद कपूर) की जो एक बड़ा ब्रेक मिलने के लिए संघर्ष कर रहा है। दिन में कोरियर ऑफिस में काम करते-करते वह बहुत सारी जगह काम पाने की कोशिश करते रहता है। नाकारा भी जाता है तो उसे दिल पे न लेते हुए और कोशिश करते रहता है।

एक दिन एक म्यूजिक वीडियो के टेस्ट में वह चुना जाता है पर किसी और सिफारिश वाले बन्दे के कारण वह काम भी उसे नहीं मिलता। पर वहीं उसकी पहचान एक नृत्यनिर्देशिका सोनिया (जेनिलिया डिसौज़ा) से होती है। फिर से एक जगह काम पाने के लिए गए समीर को हीरो के लिए डायरेक्टर (मोहनीश बहल) चुन लेता है। और वहाँ फिर से समीर की मुलाकात सोनिया से होती है जो उस फिल्म की डांस डायरेक्टर है। दोनों दोस्त हो जाते है।

इस ख़ुशी के दिन ही समीर का मकानमालिक उसे घर से निकल देता है। ऐसी कठिनाइयों का सामना कर के क्या समीर अंत में जीत पाता है?

पटकथा:

कथा जब ख़ास नहीं होती है (बार-बार सुनी सी नहीं लगती क्या?) तो भी उसे पटकथाकार उभार कर एक अलग ऊँचाई पर ले जा सकता है। पर यहाँ ऐसा नहीं हो पाया है। पटकथाकार बार-बार कहानी को वहीं-वहीं घुमाता रहा है और कहानी जैसे एक ही जगह रुकी सी लगती है। फिल्म का प्रॉब्लम पटकथा में है क्योंकि इसी तरह की एक कहानी को "लक बाय चांस' फिल्म में अच्छी तरीके से पेश किया गया है.

दिग्दर्शन:

कमजोर कहानी को सशक्त पटकथा संभाल सकती है पर कमजोर पटकथा को अच्छा दिग्दर्शक भी संभाल नहीं सकता। और यहाँ तो केन घोस जी ने भी नहीं किया है। वे हर दृश्य को और ज्यादा धीमा कर के फिल्म को और बोरिंग बनाते हैं। अगर फिल्म की गति को तेज रखा होता तो शायद फिल्म कुछ हद तक ठीक हो सकती थी। पर यहाँ केन घोष ऐसा करने में नाकामयाब रहे है।

अभिनय:

अभिनय के मामले में शाहीद और जेनेलिया ने इमानदारी से मेहनत की है। शाहीद ने अच्छी एक्टिंग, डांसिंग एंड बॉडी सबका प्रदर्शन किया है पर जहाँ लेखन में ही कमजोरी है वे भी क्या कर सकते है। खून अगर कम हो तो शरीर तो पीला पड़ता ही है। बाकी सभी किरदारों ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। पर फिल्म में किसी भी किरदार को निखारा नहीं गया है।

चित्रांकन :

चित्रांकन आज के ज़माने में ज्यादातर फिल्मों में अच्छा ही होता है। इस मामलेमें बॉलीवुड का तकनीकी स्तर ऊँचा हो ही गया है। यह फिल्म भी चकाचक है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

जहाँ शहीद हीरो है और फिल्म के नाम में ही डांस है तो लोग खूब मजेदार डांस की अपेक्षा करेगे ही। पर यहाँ ये डिपार्टमेंट भी कुछ ज्यादा असरदार नहीं हो पाया है। इस तरह के डांस तो हमलोग आजकल टीवी शो में भी देखते हैं। कई बार इससे ज्यादा अच्छे भी।

संकलन:

पटकथा में कंटेंट नहीं है, दिग्दर्शक ने शूटिंग के वक्त कुछ खांस किया नहीं है, तो निर्देशक ने सब जैसे के तैसे लगा दिया है। अगर फिल्म और छोटी की गयी होती और गतिमान रखी गयी होती तो शायद देखने लायक हो सकती थी।

निर्माण की गुणवत्ता:

निर्माण की गुणवत्ता अच्छी है। यू टीवी की फिल्म होने के कारण इस डिपार्टमेंट में कोई कमी नहीं है।

लेखा-जोखा:

*१/२ (१.५ तारे)

फिल्म में कुछ दृश्य मजेदार हैं पर उतने फिल्म को असरदार बनाने में काफी नहीं हैं। फिल्म एक ही जगह अटकी रहती है और किसी भी किरदार से दर्शक खुद को जोड़ नहीं पाते हैं। यह फिल्म देखने की सलाह मैं किसी को भी नहीं दे सकता-इसका मुझे खेद है।


चित्रपट समीक्षक:--- प्रशेन ह.क्यावल

Friday, December 25, 2009

3 इडियट्स : गांधीगीरी से इडियटगीरी तक ... आल इज वेल

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

राजकुमार हिरानी अपने मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मों के द्वारा दर्शकों को सकारात्मक सोच के साथ दिल जज्बा लेकर जिंदगी के मुश्किल चुनौतियों का सामना करने की सीख देते आये हैं। मुन्नाभाई सीरिज से हटकर इस बार वह लेकर आये हैं 3 इडियट्स जो चेतन भगत के सफल उपन्यास पर आधारित है।

क्या राजकुमार हिरानी तीसरी बार भी छक्का लगा पाए है... ?

कथा सारांश:

चेतन भगत की प्रसिद्ध उपन्यास से राजूने सिर्फ आधार बनाया है और उसकी जमीन पर अपनी कथा की नीव रखी है। तो कथा कुछ इस तरह है कि रांचो (आमिर खान) एक ऐसे छात्र हैं जो कॉलेज सिर्फ रटने के लिए नहीं, ज्ञान बटोरने के लिए आते हैं। इंजीनियरिंग उनका जूनून है। इसि बात को वह सब दोस्त और शिक्षकों को समझाना चाहते हैं। पर उनके दो रूममेट्स राजू रस्तोगी (शरमन जोशी) और फरहान कुरैशी (माधवन) के अलावा कोई और समझ नहीं पाता। इन तीनों में गहरी दोस्तीं हो जाती है और रांचो की सोच से दोनों में बहुत से सकारात्मक बदलाव आते हैं जो उनके जीवन को एक ठोस लक्ष्य देते हैं।

पर कॉलेज के आखरी दिन रांचो बिना बताये गायब हो जाता है। कहा जाता है रांचो.. क्या उसके 2 दोस्त उसे ढूंढ़ पाते हैं? पर इस तरह जाता ही क्यूँ है वह?

पटकथा:

उपन्यास की सशक्त जमीन पर कहानी की ठोस नीव रखकर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने पटकथा का ऐसा महल खड़ा किया है, जिसकी सुन्दरता और असाधारणता के गुण कई साल गाये जायेंगे। विधु विनोद चोपड़ा ने भी सहायक के तौर पर अपने सुझाव पटकथा में दिए हैं। मुन्नाभाई जैसे 3 इडियट्स की पटकथा से भी फिल्मों के छात्र अभ्यास करेंगे।

दिग्दर्शन:

सशक्त जमीन और ठोस नीव पर खड़े अपने ताजमहल को राजूने अपने दिग्दर्शन से कुछ इस तरह निखारते हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। सकारात्मक वातावरण बरकरार रखते हुए संजीदा करने वाला उनका हुनर तो आज के पीढ़ी में सिर्फ उन्हीं के पास है। जिस तरीके से कहानी के प्रस्तुतीकरण पे उनकी पकड़ है वह सच में काबिलेतारीफ है। राजू ऐसे ही ऊँचे दर्जे की फिल्मे बनाते रहे और हमें अपनी फिल्मों की कहानी और किरदारों के जगत में समा जाने दें। हमारी हार्दिक शुभेच्छाएँ हमेशा उनके साथ हैं।

अभिनय:

आमिर जिस फिल्म में होते हैं उस फिल्म में सभी को अपना सबसे बेस्ट देना पड़ता है। और आमिर ही ऐसे कलाकार हैं जो पूरी फिल्म के परिणाम स्वरुप हरेक को अपने किरदार को पूरी तरह से प्रस्तुत करने में मदद करते हैं। ये फिल्म जितनी आमिर की है उतनी ही बाकी सबकी भी है। आमिर ने तो अपने जिंदगी में और एक ऊँचाई को छू ही लिया है पर शरमन जोशी और माधवन ने भी अपने किरदार को पूरी इमानदारी से निभाया है। ओमकर के जो नए कलाकार हैं उन्होंने चतुर के किरदार में अमिट छाप छोड़ी है। उनका भाषण सबको हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देता है।

करीना कपूर और बोमेन इरानी ने बेहतरीन अदाकारी का प्रदर्शन किया है। मोना सिंह और जावेद जाफरी भी अपने छोटे रोले में छा गए हैं।

चित्रांकन:

मनाली से शिमला तक और फिर लद्दाख तक बेहेतरीन सिनेमाटोग्राफी भी इस फिल्म की एक जोरदार पेशकश है। फ्लैशबैक में ब्लैक एंड व्हाइट का अच्छे से इस्तेमाल किया गया है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

स्वानंद किरकिरे द्वारा लिखित और शांतनु मोइत्रा द्वारा संगीतबद्ध किये गए गीत आज ऊपरी पायदान पर हैं। मजेदार गीत और सुहाना संगीत 3 गानों को तो लोगों के होंठों पर रखने में कामयाब है।

संकलन:

चुस्त संकलन के कारण इतनी बड़ी होने के बावजूद फिल्म में एक में बार भी दर्शकों की नजर परदे से नहीं हटतीं। ये जितना श्रेय दिग्दर्शक को जाता है उतना ही असरदार संकलन को भी जाता है।

निर्माण की गुणवत्ता:

विधु विनोद चोपड़ा ने निर्माण की गुणवत्ता में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्हें सराहा जाना चाहिए इतने सारे जिनिअस लोगों को साथ लेकर ये प्रोजेक्ट खड़ा कर के प्रस्तुत करने के लिए। ये कोई शिव धनुष उठाने से कम बड़ा काम नहीं था। और उन्होंने ये काम बखूबी निभाया है।

लेखा-जोखा:

*** (4.5 तारे)

हिंदी चित्रपट जगत में जिन फिल्मों के नाम आदर से लिए जायेंगे उनमें राजकुमार हिरानी की ये फिल्म भी जरूर रहेगी। अपनी संजीदा सोच को सर्वसामान्य दर्शकों की पसंद को मद्देनजर रखकर पेश करना उन्हें खूब आता है। तो आप किस चीज की राह देख रहे है? उठिए, दौड़िए, पूरे मोहल्ले के साथ ये फिल्म देखने जाइये। जनाब! ऐसी फिल्में बार-बार नहीं बनती हैं।

चित्रपट समीक्षक:- प्रशेन ह.क्यावल

Saturday, December 12, 2009

रॉकेट सिंह : आकाश की उंचाईयों में

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

हृषिकेश मुखर्जी एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्हें कभी भी डिजायनर ड्रेसेस और चमकते सेट्स की जरूरत नहीं पड़ी। फिर भी उनकी फिल्में आज क्लासिक्स कहलाती हैं। मैं ऐसे ही सोच रहा था कि आजकल की फिल्में इसलिए बेअसर होने लगी हैं क्योंकि उनमें सब कुछ डिजायनर हो गया है। सेट्स, कपड़े (हीरो कहानी में फटीचर हो तो भी डिजायनर जींस पहनेगा) और बुरी बात तो ये है कि एक्टिंग और भावनाएँ भी डिजायनर। तो होता ये है कि दर्शक किरदारों से जुड़ ही नहीं पाता तो उनके दुःख दर्द में कैसे घुल मिल सकेगा? और जब तक किरदार दर्शकों को नहीं लुभायेंगे, फिल्म कैसे लुभा पायेगी?

पर जैसे ही मैंने रॉकेट सिंह : द सेल्समैन ऑफ द यीअर देखी, मुझे उम्मीदें दिखने लगी कि आज भी भावनाओं और किरदारों पर काम कर के बिना चका-चौंध के फिल्में बनाने वाले हैं।

कथा सारांश :

कथा सारांश कुछ इस प्रकार है कि हरप्रीत (रणबीर कपूर) एक सीधा-साधा नौजवान है जो अपने दादाजी के प्यार और संस्कारों के साथ बड़ा हुआ है। वो पढ़ाई में अच्छा नहीं है पर आपसी रिश्तों में और लोगों से काम निकलवाने में उस्ताद है। इसलिए वह सोचता है कि वह सबसे अच्छा सेल्समन बन सकता है। हरप्रीत को जॉब भी मिल जाती है। पर कंपनी के तौर तरीकों से जब वह वाकिफ़ होता है तो उसे पता चलता है कि यह जगह उसके लिए नहीं है। फिर एक समय पे वह उसके इमानदारी के वजह से कंपनी में जलील होता है तो वह कंपनी में रहते खुद का काम चालू कर देता है। अपनी इस छोटी कंपनी को वह नाम देता है "रोकेट सेल्स"। देखते ही देखते ये कंपनी उसके मालिक के कंपनी को कारोबार में चुनौती देने लगती है। आगे क्या होता है यही कहानी है इस फिल्म की।

पटकथा:

जयदीप साहनी द्वारा लिखित इस फिल्म की कहानी और पटकथा को आनेवाली पीढियां फ़िल्मी अभ्यास का एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ मानकर पढेंगी। इनके भरोसे और हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि एक मामूली से सेल्समन की कहानी इतने रोचक तरीके से सुनहरे पर्दे पर लाने की कोशिश इन्होने की... और क्या असरदार कोशिश है ... माशाल्लाह ! आगे बढ़ते रहिये जयदीप सहनी !

दिग्दर्शन:

शिमित अमिन ने अपनी पिछली दोनों फिल्मों में अपने हुनर का लोहा मनवाया है। इस बार भी वह चूके नहीं हैं। ये फिल्म दिखने में जितनी सिम्पल है उतनी ही ज्यादा कठिन फिल्माने में है। सहजता और सादगी से भरी इस फिल्म की कहानी, पटकथा और किरदारों को बखूबी इन्साफ दिया है शिमित ने अपने सफल दिग्दर्शन से।

अभिनय:

अभिनय की बात करें तो फिल्म में गिने-चुने ही जाने-पहचाने चेहरे हैं और बाकी सब कलाकार नए हैं। पर शिमित ने जिस तरह से उनसे काम निकलवाया है उसे जितनी दाद दी जाय कम होगी। सभी के नाम नेट पर उपलब्ध नहीं है वरना सभी एक विशेष उल्लेख के हक़दार हैं। रणबीर कपूर हर फिल्म में साबित करते जा रहे है के वह किस मिट्टी से बने हैं। लगातार तीसरी दमदार अदाकारी वाली फिल्म देकर उन्होंने जल्द ही नंबर वन का मुकाम पाने की और दौड़ लगाना शुरू कर दिया है। इनका उतने ही अच्छे तरीके से साथ दिया है गौहर खान, डी. संतोष, प्रेम चोपड़ा ने। नयी लड़की शहनाज़ पदमसी ठीक है पर उसका रोले ही छोटा है। विशेष नाम लेना जरूरी है उन कलाकारों का जिन्होंने हरप्रीत के बॉस और कंपनी मालिक का रोल निभाया है।

चित्रांकन :

बिना किसी चमक-धमक और ऊँचे सेट्स के सिनेमेटोग्राफ्रर नौलखा ने फिल्म को प्रदर्शनीय रूप दिया है। ये अपने आप में बड़ी सफलता है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

कहानी और पटकथा में गानों के लिए कोई जगह नहीं है पर पार्श्वसंगीत में सलीम सुलेमान ने अच्छा काम किया है।

संकलन:

अरिंदम घटक का संकलन उत्तम है पर मुझे लगता है पटकथा और दिग्दर्शन इतना परिणामकारक है कि उन्हें विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी होगी।

निर्माण की गुणवत्ता:

जिस तरीके के माहौल की पटकथा को जरूरत है, उसे निर्माण करने में ज्यादा लागत नहीं लगी होगी पर पटकथा के तौर पर इमानदारी बरतकर निर्माता ने जो रिस्क लिया है वह काबिले तारीफ है। ये फिल्म चलेगी कि नहीं, ये तो आप दर्शक ही बताएंगे पर मेरे हिसाब से ये इस साल की कुछ अच्छी फिल्मों में से एक जरूर है।

लेखा-जोखा:

*** (4 तारे)

ये लगातार दूसरे सप्ताह मुझे 4 तारे देने का मौका मिला है। जब अच्छी फिल्म आती हैं तो मुझे खूब खुशियाँ मिलती हैं। आप भी ये खुशियाँ अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ समेट लें। जिन्हें हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में पसंद हैं (न कि सिर्फ उनकी कॉमेडी) उन्हें ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

चित्रपट समीक्षक:--- प्रशेन ह.क्यावल

Wednesday, December 09, 2009

पा : एक चमत्कार, एक जादू !

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

कुछ ऐसे कलाकार हर सदी में होते है जो दर्शकों की सोच से परे कुछ ऐसा पेश करते है की सारी दुनिया उनके सामने झुकने के लिए बेबस हो जाये. और ये झुकना इतना सम्मान सहित होता है जोकि शायद किसी सम्राट को भी न नसीब हो. पर एक सम्राट ऐसे है जिन्होंने बार-बार दुनिया को उसी तरह के सम्मान से अपने आगे झुकने के लिए मजबूर किया अपने हुनर से, अपनी अदाकारी से! और वे हैं... इस सदी के महानायक ....अमिताभ बच्चन. जहाँ उनके उम्र के कई अभिनेता इतिहास के पन्नों में गुम हो गए या लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड लेके रिटायर हो चुके है, वही बिग बी आज भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के श्रेणी में नए-पुराने कलाकारों को चुनौती देते है.

इसबार उन्होंने कुछ ऐसा किया है जो हॉलीवुड में भी शायद ही किसी ने किया हो. पा .... अमित जी के अभिनय कार्यकाल के चमचमाते तारामंडल में ध्रुव तारे सा अटल और जगमगाता सितारा है ... पा !

कथा सारांश :

ये कथा है विद्या (विद्या बालन) और अमोल आर्ते (अभिषेक बच्चन) की जो कॉलेज के वक्त एक-दूसरे से टकराते हैं और वहीं से उनमें प्यार बढ़ता है. एक क्षण की गलती से विद्या प्रेग्नेंट होती है पर अमोल जो एक सफल राजनेता का बेटा है, इंडिया को सुधारने का जिसका सपना है, वो विद्या को इस परिस्थिति से छुटकारा पाने को कहता है. विद्या उसे छुटकारा दिलाती है पर उसके जिंदगी से दूर जा कर.

विद्या अपनी माँ की मदद से अपने बेटे को पाल-पोस कर बड़ा करती है पर उसे तकदीर एकबार फिर से एक झटका देती है. विद्या का बेटा प्रोगेरिया नमक एक अनोखी बीमारी से पीड़ित है जिसमें बच्चे का शरीर उसकी असली उम्र से ४-५ गुना ज्यादा दीखता और बढ़ता है। माने 10 साल का लड़का ५० साल का दीखता और शरीर उसका वैसे रहता है. पर डॉक्टर होने के कारण विद्या उसे सम्हाल सकती है और एक नॉर्मल लड़के की तरह उसकी परवरिश करती है. उसका नाम रहता है औरो.

औरो को स्कूल के इंडिया व्हिजन स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार मिलता है एक खासदार के हाथों. वह खासदार होता है अमोल आर्ते. अमोल एक आशावादी, आदर्शवादी और प्रगतिशील राजनेता है जो औरो के व्हिजन से प्रभावित होकर उसके तरफ आकर्षित होता है. आगे क्या होता है. कैसे औरो को पता चलता है कि अमोल ही उसके पिता है और कैसे उनकी फेमिली फिर से मिलती है... ये कहानी है फिल्म की.

पटकथा:

अगर औरो की अनोखी बीमारी को फिल्म से निकाल दें तो फिल्म की कहानी किसी और साधारण फिल्म जैसी ही है. पर यही एक अलग चीज ... औरो और उसकी अजीब बीमारी ... इस फिल्म को अलग लेवल पर लेकर जाती है और एक अलग तरीके की ट्रीटमेंट मांगती है. और आर. बालाकृष्णन ने सही तरीके से इस डिमांड को पूरा किया है. उनका किरदारों और घटनाओं की तरफ देखने का एक अपना ही पॉजिटीव तरीका है जो पूरे स्क्रीनप्ले और फिल्म पे छाया है. इसी कारण इतने बुरे बीमारी के गिर्द घुमती कथा एक अल्हड़ और आनंदमयी कहानी के रूप में उजागर हो पाई है.

इस तरीके से सोचने और लिखने के लिए आर. बालाकृष्णन का हार्दिक अभिनन्दन. हिंदी फिल्म जगत को उनके जैसे लेखकों की सख्त आवश्यकता है.

दिग्दर्शन:

आर. बाल्की एक सुलझे हुए लेखक और एक उम्दा निर्देशक हैं. उनकी फिल्में अनोखी होती हैं और कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी सहज तरीके से प्रस्तुत करती हैं. इनका ये नजरिया अगर असल जिंदगी में भी हम उतार पाए तो जिंदगी स्वर्ग बन जाएगी.

इसी नजरिये से जब बाल्की फिल्म को प्रस्तुत करते हैं तो फिल्म एक मजेदार अनुभव बन जाती है. उनकी लेखनी और दिग्दर्शन दोनों माध्यमों पर जबरदस्त पकड़ है. जिस तरीके की सादगी और संजीदगी उनके काम में है वैसा किसी और निर्देशक के काम में नहीं दिखाई देता. उनका काम वाकई काबिले तारीफ है.

अभिनय:

अभिनय .... अभिनय का क्या कहना... ये तो एक जादू है... चमत्कार है. अमिताभ बच्चन इस फिल्म में है ऐसा जयाजी स्टार्ट में बोलती है पर मुझे तो वो दिखाई ही नहीं दिए पूरे फिल्म में... दिखाई दिया तो 12-13 साल का एक बच्चा जो प्रोगेरिया से पीड़ित है. दर्शकों को झंझोड़ कर रख दिया है अमितजी ने. उनके लिए ऐसे कई सारे दर्शक सिनेमाघर में दीखते है जो सालों से कभी सिनेमाघर में नहीं गए. उन सब संजीदा और उच्च शिक्षित लोगों को सिनेमाघर खिंच के लाये हैं बिग बी.

विद्या बालन सुंदर दिखी हैं और बहुत ही सटीक अभिनय है उनका. परेश रावल पूरी तरह से अभिषेक के किरदार को सहारा देते हैं. विद्या की माँ बनी अभिनेत्री एक बेहतरीन और सहज अभिनय का प्रदर्शन कराती हैं.

चित्रांकन :

पी. सी. श्रीराम की सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है और फिल्म की ऊँची लेवल को और ऊँचा बनाती है.

संगीत और पार्श्वसंगीत:

संगीत जगत के पुराने सितारे श्री इल्लायाराजा ने इस फिल्म को अपने साजों संगीत से सँवारा है. फिल्म में दो ही गाने है और तीसरा आखरी में है. पहला गाना "उड़ी उड़ी" एक बेहेतरीन सुरीला गाना है. फिल्म का पार्श्वसंगीत फिल्म के साथ पूरी तरह से न्याय करता है.

संकलन:

अनिल नायडू का संकलन फिल्म की गति को बहता हुआ रखता है और दर्शकों को कहानी और किरदारों से बंधे हुए रखने में सफल होता है.

निर्माण की गुणवत्ता:

उच्चतम गुणवत्ता इस फिल्म के हर भाग में दिखाई देती है हालाँकि फिल्म कम लागत से बनी है. कम लागत और ऊँची गुणवत्ता के चलते ये फिल्म रिलीज़ के पहले ही प्रॉफिट में होगी. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को अच्छा रेस्पोंस है. बाकी सभी अधिकारों की बिक्री से बहुत सारी कमाई एबीसीएल को दे पायेगी.

लेखा-जोखा:

****(4 तारे)

इस फिल्म की जितनी भी तारीफ की जा सके कम है. फिल्म में प्रोगेरिया के परेशानियों से नहीं डील करती बल्कि एक लाइट फिल्म है जो सभी उम्र के दर्शकों को पसंद आएगी. आप पूरी फेमिली और दोस्तों के साथ ये फिल्म देखने जरुर जाइए.

चित्रपट समीक्षक:
--- प्रशेन ह.क्यावल

Saturday, December 05, 2009

रेडियो : फटा हुआ ट्रांजिस्टर

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

भगवान् जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है ये मुहावरा जिन कुछ ही लोगो के साथ सत्य होता है उनमे से एक है हिमेश रेशमिया!

कम उम्र में अपनी टीवी सेरिअल्स से धूम मचानेवाले हिमेश म्यूजिक की दुनिया में इस कदर छा गए के सबसे जादा फिल्मे उनके ही पास थी. उसके बाद हिमेश ने खुद गाना शुरू किया और ऐसा तहलका मचा दिया के एक के बाद एक ऐसे २८ हिट सोंग्स देने के बाद भी पब्लिक में उनका डिमांड बढती ही गयी.

इसी माहौल का फायदा उठाकर हिमेश ने एक्टर बनाने की सोची और उनके नसीब और म्यूजिक के चलते "आपका सुरूर" सुपर हिट फिल्म हो गयी. हिमेश को लगा के उनका सिक्का चल पड़ा और उन्होंने ५ फिल्मे साईन कर ली. सुभाष घी की "कर्ज" का रिमेक कर के उन्होंने कुछ और शेड उसमें लगा के पेश की पर नहीं चल पाई.

हिमेश की किस्मत अब टिकी है इस हफ्ते रिलीज़ फिल्म "रेडियो" की तकदीर पर. देखते है कैसे है रेडियो की तकदीर.

कथा सारांश :

कथा है आज के "confused" जेनेरेशन की जिनका relationship status "complicated" है. विवान शाह (हिमेश रेशमिया) एक रेडियो जोकी है जिनकी शादी तलाक के बुरे वक्त से गुजर रही है. तलाक तो हो जाता है. पर विवान की बीवी पूजा (सोनल सहगल) उसे भुला नहीं पाती है और विवान के लाइफ में आते जाते रहती है. इसी कारण विवान अपने जिंदगी में प्यार के संबंधों में आगे नहीं बढ़ पाता है. इसी वक्त उसकी जिंदगी में शनाया (शहनाज़ ट्रेजरीवाला) आती है जो उसके साथ को-जोकि कर के काम करती है. शनाया विवान से प्यार करने लगती है पर विवान confused है. आगे उनके संबंधो का क्या होता है यही कहानी है फिल्म की.

पटकथा:

कथा आज के पीढ़ी के हिसाब से ठीक है और वो उससे जुड़ पायेगे. पर पटकथा मार खाती है नकलीपन में. यहाँ सब नकली लगता है. भावनाए नकली, अभिनय नकली, कहानी नकली. कही कही पर फिल्म दर्शंकों के दिलों को छूती जरुर है पर बहुत ज्यादा जगह पर वोह प्रभावपूर्ण नहीं हो पाई है. केवल अच्छे म्यूजिक के कारण दर्शक फिल्म में टिके रहते है. लेखक इशान त्रिवेदी ने निर्देशक इशान त्रिवेदी के लिए बहुत ही कमजोर नींव बना के दी है. देखते है निर्देशक इशान त्रिवेदी इस कमजोर नीव पे किस तरह अपनी फिल्म की ईमारत बना पाए है.

दिग्दर्शन:

जब पटकथा ही कमजोर हो तो भगवान भी अगर दिग्दर्शक रहे तो फिल्म को असरदार नहीं कर पाएंगे. ऐसा ही कुछ है रेडियो के साथ. कमजोर नींव पे चमकधमक भरी सजावट कर के भी फिल्म खोखली लगती है. किरदार ऐसे है के जैसे जबरदस्ती एक टाइप में प्रस्तुत किये गए हो. सब कुछ गृहीत किया गया है. बार बार ये शब्द आ रहा है पर सब कुछ नकली सा लगता है. दूसरा कोई शब्द ही नहीं है. फिर भी फिल्म में एक फ्रेशनेस है और समय समय पर फिल्म अच्छी लगती है और बहुत जादा जगह पर बुरी. मुझे लगता है अनुभवों का डेप्थ काम रहने के कारण आज के नए निर्देशक दर्शकों के दिलों को छूने में असफल है क्योंकि उनकी भावनाए simulated है.

मैंने कभी भी किसी रेडियो स्टेशन में ८-१० लोगो को रेडियो जोकि को मोनिटर करते हुए नहीं देखा है. वोह तो बेचारा एक बंद कमरे में अकेला बकते रहता है. पर फिल्म में वोह सेट एक डबिंग या रेकॉर्डिंग स्टूडियो जैसा दिखाया है जहा ८-१० स्टाफ शो को मोनिटर करते रहते है. ये क्या मजाक है?

अभिनय:

माशाअल्लाह! ये डिपार्टमेंट में तो हर जगह नकलीपन का भंडार है. हिमेश जब संजीदा दृश्यों में ठीक लगते है पर लाइट मूड में उनका अभिनय बहुत ही ठोसा हुवा लगता है. शहनाज़ और सोनल ठीक ठाक है. हिमेश के ससुरजी के किरदार में जाकिर हुसैन misplaced लगते है. वही अजीबो गरीब पहनावे में व्हील चैर पे बैठे हुए राजेश खट्टर एक बहुत बड़ा मजाक लगते है.

चित्रांकन :

इस डिपार्टमेंट में फिल्म एकदम जबरदस्त है. सब कुछ चकाचक और आँखों को लुभाने वाला है.

संगीत और पार्श्वसंगीत:

फिल्म की सबसे तगड़ी चीज इसका म्यूजिक है. इतना मेलोडी भरा म्यूजिक बार बार नहीं आता है. पर फिल्म में हर गाना टुकड़ो टुकड़ो में आता है और दर्शकों को गाने सुनाने का मजा तक नहीं मिलता है. हिमेश के गाने ही है जो इस फिल्म में बंधे रखते है वरना ये फिल्म को तो एक स्टार भी न मिले.

संकलन:

संकलन अच्छा है और फिल्म छोटी है पर पठकथा और निर्देशन में मात खाती है.

निर्माण की गुणवत्ता:

काम बजट पर बनी ये फिल्म कही पे भी ऐसा नहीं दिखाती के निर्माण की गुणवत्ता में कही कमी है. और हिमेश के दावा करते है के फिल्म का पूरा खर्च उनके म्यूजिक के कमाई से ही निकल गया है. फिल्म निर्माता के लिए घाटे में न हो पर दर्शकों का क्या ? उनके लिए तो ये एक घाटे का ही सौदा है.

लेखा-जोखा:

जहा तक अंदाजा है ये फिल्म तुरंत टीवी पे आ जाएगी. आप इंतज़ार कीजिये और टीवी पे देखिये. टीवी पे देखने के लिए ये एक ठीक मूवी है. बस हिमेश के लिए इतनी सलाह है कि हरेक को अपना काम कर लेने दो. आपको जादा पैसे कमाने है तो आप निर्माता बन जाईये.... अभिनय में ही क्या रखा है ? आप तो फिल्म किये बिना भी एक स्टार है. अभी जो आपने ५ फिल्मे की है वोह ख़तम हो जाएगी तो निर्माता और म्यूजिक निर्देशक ही बन के रहिये ... ये दर्शको पर महेरबानी होगी जो आपसे इतना प्यार करते है. यार फिर ऐसे रोले कीजिये जो आपके अभिनय क्षमता के दायरे में हो. मै ये इसलिए बोल रहा हूँ के मै आपके म्यूजिक का बहुत बड़ा फैन हूँ.

**(२ तारे)

Sunday, November 15, 2009

तुम मिले : पर गुल नहीं खिले

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

जन्नत और राज़ के बाद इमरान हाशमी की फिल्म "तुम मिले" भारी भीड़ के साथ सिनेमागृहों में आई है। इससे ये तो साबित होता है के भट्ट, उनका संगीत और इमरान बॉक्स ऑफिस पर भीड़ ज़रूर इकट्ठा कर सकते हैं। पर क्या यह फिल्म दर्शकों की भीड़ लगातार जुटाने में सफल हो पायेगी?

कथा सारांश:

अक्षय (इमरान) एक उभरते हुए पेंटर (नहीं आर्टिस्ट) हैं जो केप टाऊन में अपनी पेंटिंग का कोर्स करते-करते एक रेस्तरां में वेटर की नौकरी करते हैं। एक बार आर्टिस्ट कार्नर पे पैंट करते समय वे एक ग्रुप को भाषण देती हुयी संजना (सोहा अली खान) को देखते ही उसके दीवाने हो जाते हैं, पर शर्मीले अक्षय कुछ नहीं कह पाते हैं।

फिर से जब बार-बार उनकी मुलाकात होती है तो उनमें दोस्ती हो जाती है और धीरे धीरे प्यार। संजना एक सुलझी हुयी और बेहद अमीर लड़की है। वो खुद भी अपने जिंदगी में दिन ब दिन तरक्की कर रही है। पर अक्षय एक मूडी आर्टिस्ट है जो अपने मन के मर्जी जो चाहे वो करते है। फिर भी वे दोनों एक दूसरे में खो जाते है और लिव-इन रिलेशन रखते हैं।

पर अक्षय की जिंदगी में कुछ ख़ास नहीं हो पाता है और वह दिन ब दिन मायूस होता जाता है। इसी वजह से उन दोनों के रिश्तों में दरारें आने लगती हैं और एक दिन वे अपने अपने अलग रास्तें चले जाते हैं।

पर किस्मत से वे फिर से मुंबई में मिलते हैं। वह भी 26 जुलाई 2005 के दिन। दोनों हवाई जहाज में मिलते है और बाद में मुंबई में। उस दिन की खौफनाक बारिश की न्यूज़ सुन कर अक्षय संजना के बारे में सोचता है ... और आगे क्या होता है? यही कहानी है 'तुम मिले' की।

पटकथा:

26 जुलाई के वाकये के अलावा कहानी में कुछ नयापन नहीं है... पर किरदार और संवाद कहानी को दिलचस्प बनाते हैं। किरदारों को बारीकी से तराशा गया है पर कथा छोटी सी होने के कारण अंकुर तिवारी की पटकथा एक ही जगह पर ही घुमती रहती है। और फ्लैशबैक और वर्तमान का जो आगे पीछे होना है वह सामान्य दर्शक के सर के ऊपर से जाता है और कहानी के बहाव को उसी तरह तोड़ता है जैसे 25 जुलाई के पानी ने कई दीवारें ढह गयीं।

दिग्दर्शन:

जन्नत जैसी सफल फिल्म देने वाले कुणाल देशमुख इस बार कमजोर पटकथा के हाथ मात खा गए। किरदारों को बहुत खूबी से प्रस्तुत किया है दिग्दर्शक ने। फिल्म में जो भी जान है वह किरदारों के चित्रण से ही बची है। पर फिर भी फिल्म बहुत जगह पर सवाल करने पर मजबूर करती है। अक्षय का किरदार इतना मन मौजी है और एक जगह टिक नहीं पता.... इस सच्चाई को बार बार बता कर हाई लाइट करने वाले कुणाल ये बताना भूल जाते हैं कि ऐसा क्या हुआ था कि जिसकी वजह से संजना को छोड़ने के बाद अक्षय लाइफ में एक दम सेट हो गए?

फिल्म कई जगह पर सच्चाई से जुडी लगती है और कई जगह सच्चाई से एकदम जुदा... बनावटी! अक्षय के मित्र की जब जान जाती है तो वह बिलकुल बनावटी-सा लगता है और ना ही उन्हें कुछ खास त्याग कर के मरते हुए दिखाया गया है जिससे दर्शक उसकी मौत से जुड़ पाए।

अभिनय:

अभिनय के विभाग में सब लोग खरे उतरे हैं। इमरान अपने किरदार में जान डाल देते हैं। सोहा भी किरदार को परदे पर जीवित करने में कामयाब होती हैं। पर उन्हें अपने चेहरे और गालों का कुछ करना चाहिए। बहुत सारी जगहों पे वे इमरान से बड़ी लगती हैं। इमरान के मित्र बने कलाकार भी छाप छोड़ जाते हैं।

चित्रांकन और स्पेशल एफ्फेक्ट्स :

केप टाऊन की सुन्दरता और मुंबई की बदहाली दोनों सक्षम रूप से दिखाते है छायाकार प्रकाश कुट्टी। मुंबई के बाढ़ के स्पेशल इफेक्ट बहुत ही कम है और टीवी पे आने वाले प्रोमो छोड़ कर बाकि फिल्म में कुछ ज्यादा नहीं हैं। और वहीं दर्शक ठगा हुआ महसूस करता है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

प्रीतम का संगीत जबरदस्त है और हिट है। पार्श्वसंगीत दृश्यानुरूप है।

संकलन:

कहानी का फ्लो कमज़ोर पटकथा के कारण बिगाडा हुआ है, इसलिए संकलन भी कमजोर लगता है। फिल्म के दूसरे भाग में जहाँ कहानी को जोर पकड़ना था, वहीं कहानी दम तोड़ देती है। पर मुझे लगता है, फ्लैशबैक को टुकडों में ना दिखाते हुए एक सटीक तरीके से प्रर्दशित किया जाता तो फ्लो बना रहता, और दुसरे भाग में बाढ़ की कहानी को सच्चाई से पेश किया गया रहता तो फिल्म अच्छी हो सकती थी।

निर्माण की गुणवत्ता:

विशेष फिल्म्स की निर्माण गुणवत्ता हर फिल्म के साथ बढ़ती जा रही है और ये अच्छे संकेत हैं। कम लागत में अच्छी फिल्में बनाने वाला भट्ट परिवार हर बार अच्छी कहानी बयान करता हुआ नजर आता है। पर इसबार वे पटकथा के चयन में कहीं चुक गए हैं। और बजट के कमी के कारण बाढ़ की कहानी में कई जगह समझौता हुआ है। और यहीं पर दर्शक नाराज हो जाते हैं।

लेखा-जोखा:

*** (3.5 तारे)
26 जुलाई को सिर्फ एक चाल की तरह दर्शकों को सिनेमाघरों में लाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। इसी वजह से इंसानी रिश्तों और भावनाओं को सफलता पूर्वक चित्रित करने वाली फिल्म दूसरे भाग में बाढ़ की कहानी को एक उचे स्तर पर ले जाने में असमर्थ होती है। और ये फिल्म २०१२ जैसे फिल्म के सामने रिलीज़ कर के भट्ट परिवार ने बहुत बड़ी गलती की है। अगर फिल्म अकेली आती तो काश प्रचार और प्रसिद्धि के भरोसे चल गयी होती। पिछली बार भी हैरी पॉटर के सामने जश्न रिलीज़ कर के एक गलती कर चुका था भट्ट परिवार। अगली बार बड़ी हिंदी फिल्मों के साथ-साथ हॉलीवुड फिल्मों को भी रिलीज़ डेट फायनल करते समय ध्यान में रखने की ज़रूरत है।

प्रोमोस, संगीत, इमरान और भट्ट परिवार का ट्रैक रिकॉर्ड के चलते फिल्म को ओपनिंग तो अच्छी मिली है लेकिन दर्शक इसमें 26 जुलाई की कहानी अधिक देखना चाहते थे ना कि केप टाऊन की।

ये फिल्म सिनेमाघरों में जाके देखने की सलाह तो मै आपको नहीं दे सकता पर टीवी और डीवीडी पे आप घर में ये फिल्म ज़रूर देख सकते हैं।

चित्रपट समीक्षक:--- प्रशेन ह.क्यावल

Sunday, November 08, 2009

जेल- सच ज्यादा नाटकीय

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

मधुर भंडारकर आज एक ब्रांड है जो मेनस्ट्रीम सिनेमा में सच्चाई से भरपूर कहानी को बखूबी पेश करते हैं और फिल्म को कॉमर्शियल प्रसिद्धि भी दिलाते हैं। आर्ट फिल्म और मेनस्ट्रीम कॉमर्शियल फिल्मों का ये मेल उनके बाएं हाथ का खेल है, इसीलिए उन्हें और उनके कलाकारों को बार-बार नेशनल अवार्ड से नवाजा गया है।

'चांदनी बार' में बार बाला, 'सत्ता' में सत्ता की गलियारों में फँसे नेता, 'कारपोरेट' में कारपोरेट जगत के स्पर्धापूर्ण जगत में घिरी बिपाशा, 'पेज-3' में मीडिया और सोसाइटी का पर्दाफाश करने वाली कोंकणा और 'फैशन' में प्रियंका चोपड़ा की मादक अदाएं पेश करने वाली मधुर की फिल्में इन्हीं फिल्मों के स्त्री पात्रों के लिए भी जानी जाती हैं। पर पहली बार वे पुरुष किरदार को मुख्य विषय बना कर फिल्म पेश कर रहे हैं।

देखते है मधुर का ये प्रयत्न क्या रंग लता है।

कथा सारांश:

पराग दीक्षित (नील नितिन मुकेश) एक कामयाब इन्सान है जिसकी जिंदगी पूरी तरह से सेट है। अभी-अभी पराग को प्रमोशन की खुशखबरी मिली है और उसकी गर्लफ्रेंड, मानसी (मुग्धा गोडसे) के साथ उसका भविष्य उज्ज्वल है। ऐसी सुख-शांति पूर्वक ऐश-ओ-आराम से भरी पूरी जिंदगी बिताने वाले पराग अपने रूम मेट, केशव राठोड़ (जिग्नेश जोशी) के साथ फ्लैट शेयर करता है। उसके रूम मेट की हरकतें मानसी को हरदम खटकती हैं। पर लड़कों में ये सब चलता है ऐसे बोल के पराग उन्हें नजर अंदाज कर देता है।

पर एक दिन जब पराग ऑफिस से निकलते वक्त अपनी आलिशान कार में जिग्नेश को लिफ्ट देके घर की ओर जा रहा होता है तभी पुलिस उनके कार का पीछा करती है। केशव पराग को कार भगाने बोलता है पर पराग रुक जाता है और कार से बाहर उतरते वक्त पुलिस उसे दबोच लेती है। केशव कार से दौड़ने लगता है और पुलिस पे फायरिंग करता है। पुलिस के जवाबी फायरिंग में केशव घायल हो के बेहोश हो जाता है। पुलिस को पराग के कार के पिछले सीट पे केशव की बैग मिलती है जिसमे 3.5 करोड़ का ड्रग्स मिलता है। पुलिस पराग को थाने ले जाती है।

सभी सबूत पराग के खिलाफ होने के कारण पराग को बेल नहीं मिलती और उसपे चार्जशीट फाइल होके केस कोर्ट में आने तक 2 साल बीत जाते हैं। उस दौरान जेल का माहौल और अनुभव पराग को पूरी तरह से तोड़ देते हैं, पर मानसी की माँ (नवनी परिहार) से मुलाकात और जेल के नए दोस्तों से मिलने वाले सहारे के भरोसे पराग कोर्ट के फैसले तक खुद को संभाल कर दिन बिताता है।

पर कोर्ट का फैसला क्या होता है? उसके बाद पराग के साथ क्या होता है... यही कहानी है जेल की।

पटकथा:

मधुर भंडारकर ने अनुराधा तिवारी और मनोज त्यागी के साथ मिल कर एक सशक्त पटकथा लिखी है। मधुर की बाकी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी समाज के हर तबके से आये कैदियों के रूप में अनगिनत किरदार और उनकी कहानियाँ हैं। इनके जरिये भारतीय जेलों का हदय-विदारक चित्र स्क्रीन पे उतरा गया है।

दिग्दर्शन:

एक के बाद एक सफल और अवार्ड विनिंग फिल्में दे कर मधुर खुद को बार-बार एक सशक्त निर्देशक के तौर पे पेश करने में सफल हुए है। ये फिल्म भी उसी बात पर मुहर लगाती है। मधुर व्यावसायिक सफलता और फिल्म के बिज़नस को ध्यान में न रखते हुए, उन्हें जो विषय भाते हैं, उन्हीं पे कहानी बनाते हैं और उस विषय से पूरी ईमानदारी रखते है। यही एक कारण है जिसके कारण हम उन्हें मास्टर स्टोरी टेलर बोल सकते हैं। विषय के साथ प्रामाणिक रह कर उन्होंने एक जबदस्त प्रभावी फिल्म बनायी है जो दर्शकों को अन्दर से हिला देती है।

अभिनय:

मधुर की फिल्में कहानी के विषय के साथ-साथ उसके कलाकारों के अभिनय के लिए भी जानी जाती है। इसीलिए तो उनके मुख्य कलाकार को बार-बार नेशनल अवार्ड मिलता है। पहली बार मधुर ने पुरुष पात्र को मुख्य भूमिका दे कर फिल्म बनायी है और उसके लिए नील नितिन मुकेश को लिया है। ये नील के लिए अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है। और नील ने मधुर के विश्वास पर खरे उतरे हैं। पराग दीक्षित की सभी भावनाएँ उन्होंने अपने अभिनय से परदे पर जिन्दा कर दी है। जेल में जो उनके दोस्त बनते हैं, वेह नवाब (मनोज बाजपेई), कबीर (आर्य बब्बर) इतने सारे कलाकारों में विशेष रूप से उभर कर आते हैं।

मुग्धा गोडसे का ज्यादा रोल ना होने के कारण वह कुछ खास नहीं कर पाई हैं। पर बाकी सभी कलाकारों के सामान उन्होंने भी पूरी ईमानदारी से अपने किरदार को निभाया है।

चित्रांकन:

कल्पेश भंडारकर ने जेल के बंधे हुए वातावरण को जीवित किया है। लाइट और कलर टोन का उपयोग करते हुए उन्होंने जले का भयंकर मंज़र दर्शकों तक पहुँचाया है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

संगीत के लिए बहुत सारे संगीतकारों से गाने बनवाने के बावजूद संगीत में दम नहीं है पर वह कहानी में ऐसी जगह आते हैं कि ज्यादा बाधा नहीं डालते हैं।

संकलन:

पटकथा और निर्देशक की मेहनत का सम्मान करते हुए देवेन्द्र मुर्देश्वरे ने अप्रतिम संकलन कौशल का प्रदर्शन किया है।

निर्माण की गुणवत्ता:

शैलेन्द्र सिंह द्वारा निर्मित इस फिल्म में निर्माण की गुणवत्ता अच्छी है। प्रसिद्ध कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई ने बड़ा सा जेल का सेट बनाया है जो सच्चाई से मिलता जुलता है। 90% फिल्म उसी सेट में चित्रित है।

लेखा-जोखा:

***(3 तारे)
यह फिल्म पूरी तौर से एक आर्ट फिल्म है। मधुर ने कहानी के साथ ईमानदारी रखते हुए जैसी है वैसी सच्चाई बयां की है। पर यह सच्चाई दर्शको को घुटन महसूस कराती है। दर्शको को खुद जेल में होने की सी भावना आती है। जो दिल से सख्त है उन्हें ये फिल्म बोरियत भरी भी लग सकती है। जिन्हें ऐसे डार्क और घुटन भरी फिल्में पसंद हैं, वे ज़रूर इस मूवी को देखें। आर्ट फिल्म की तौर पे इस मूवी को अवार्ड तो ज़रूर मिलेंगे पर सामान्य दर्शक जो मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते हैं, उन्हें ये फिल्म देखनी की सलाह नहीं दे सकता।

चित्रपट समीक्षक--- प्रशेन ह.क्यावल

Friday, November 06, 2009

अजब प्रेम की गजब कहानी : हँसी के गुब्बारे

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

"अंदाज अपना अपना" जैसी क्लासिक कॉमेडी फिल्म देने वाले राजकुमार संतोषी कई सालों से इस कथा प्रकार से दूर थे। उनकी बहुत सारी फिल्में भी बीच में फ्लॉप हुईं। इसी बीच ऐसे देखा गया कि एक संजीदा फिल्म से भी ज्यादा बिज़नेस एक औसत दर्जे की कॉमेडी फिल्म कर लेती है। शायद यही सोचकर एक हिट फिल्म देने की आस में राजकुमार संतोषी लेकर आये है, रणबीर कपूर और कैटरिना कैफ की "अजब प्रेम की गजब कहानी"।

शीर्षक से ही मजेदार लगने वाली ये फिल्म क्या दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब हो पाई है? क्या इस फिल्म में वह बात है जो दर्शकों को राजकुमार संतोषी के निर्देशन का लोहा मनवा सके?

कथा सारांश:

प्रेम (रणबीर कपूर) नामक एक मस्तमौला जवान अपने कलंदर दोस्तों के साथ ऊटी में एक "हैप्पी क्लब" नाम का ग्रुप चलाता है। प्रेम इस क्लब का स्वघोषित प्रेसिडेंट है और सदा ही वह टैग अपने शर्ट पे लगा कर घूमता है। इस क्लब का काम है मुसीबत में फँसे प्रेमियों की मदद करके उन्हें मिलाना। इसी चक्कर में वह अपने दोस्त के लिए एक लड़की को उठा कर के उनकी शादी करा देता है।

ये सब देख के जेनी (कैटरिना कैफ) नामक एक सुंदरी प्रेम और उसके दोस्तों को अगवा करने वाली टोली समझ बैठती है। जेनी के पिता प्रेम के ही दिलाये हुए फ्लैट को रेंट पे लेते है। प्रेम जेनी से मन ही मन में मुहब्बत कर बैठता है पर कुछ कह नहीं पता। लेकिन वह उसकी हर बात मानता है और उसके लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहता है। इसी चक्कर में वह जो उट-पटांग हरकतें करता है, वही इस फिल्म की कहानी है।

पटकथा:

कहानी तो छोटी और सीधी-साधी लगती है पर राजकुमार संतोषी ने पटकथा को कुछ इस तरह निखारा है कि फिल्म दर्शकों को पकड़े रखती है और हँसाने पे मजबूर भी करती है। पर कुछ कुछ गिग्स याने कॉमेडी दृश्य कामयाब होते हैं तो कुछ फीके पड़ते हैं।

कथा में नायक नायिका के पास आने और दूर जाने के सिलसिले बार-बार होने के कारण कभी-कभी कम असरदार लगते हैं। और विलन का ट्रैक बीच में ही घुसेड़ा हुआ सा लगता है।

आर. डी. तेलंग लिखित संवाद मजेदार है जो सीधे-साधे दृश्यों में भी जान डालते हैं।

दिग्दर्शन:

राजकुमार संतोष का संजीदा फिल्मों के साथ-साथ कॉमेडी में भी कोई हाथ नहीं पकड़ सकता, यह उन्होंने फिर से साबित कर दिया है। कैरिकेचर तरीके से शूट की गयी ये फिल्म बच्चों और बूढों सहित सभी को भर पेट हँसाएगी। राजकुमार संतोषी फिर से ये दिखा देते हैं कि उट-पटांग हरकतें और अश्लील हावभाव और संवादों के बिना भी कॉमेडी फिल्म बनायीं जा सकती है। एकदम साफ़ सुथरी और हँसी से भरपूर फिल्म बनाने के लिए राजकुमार संतोषी का हार्दिक अभिनन्दन।

पर ये बात ज़रूर है के वे फिल्म को और क्रिस्प बना सकते थे। एक दो गाने कम कर सकते थे और कुछ कम असरदार कॉमेडी को हटा सकते थे। फिल्म की लम्बाई कम भी होती तो चलता, मगर असर कम नहीं होना चाहिए। दर्शकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं मिलना चाहिए।

अभिनय:

ये फिल्म पूरी की पूरी रणबीर कपूर के अभिनय गुणों को उजागर करती है। रणबीर ने जिस फुर्ती और समझदारी से इस किरदार को निभाया है कि उनके जेनरेशन का कोई भी अभिनेता उनके सामने फीका पड़ जाए। रणबीर स्क्रीन पर अपने प्रभाव से चमका देते हैं। उन्होंने एक पार्टी में डांस वाले दृश्य को आने वाले कई सालों के लिए यादगार बना दिया है। यह ऐसा दृश्य है जिसमें लोगों की हँसते-हँसते कुर्सी से नीचे गिरने की संभावना है। रणबीर वाकई अगले सुपर स्टार हैं।

उनके अलावा कैटरिना ने भी पहली बार कॉमेडी करते हुए भी अच्छी अदाकारी दिखाई है। वे दिखती भी ऐसी हैं कि किसी को भी दीवाना कर दें। बाकि सभी चरित्र कलाकारों ने भी पूरी ईमानदारी और लगन से अपना काम निभा कर फिल्म में पूरी तरह से योगदान दिया है। दर्शन जरीवाला, स्मिता जयकर, गोविन्द नामदेव आदि ने अच्छा अभिनय किया है। साजीद डॉन के किरदार में जाकिर हुसैन फिट नहीं बैठते। उनकी जगह किसी और को ये मौका देना चाहिए था। उपेन पटेल ठीक-ठाक हैं।

रणबीर के हैप्पी क्लब के मेम्बेर्स का किरदार करने वाले अभिनेताओं का अभिनन्दन। उन्हें अच्छे-खासे दृश्य और संवाद मिले हैं और उन्होंने उसमे चार-चाँद लगा दिए हैं।

चित्रांकन और स्पेशल एफ्फेक्ट्स:

चित्रांकन उत्तम दर्जे का है और निर्माण की गुणवत्ता को दर्शाता है. कैरिकेचर स्टाइल रहने के कारण राजकुमार संतोषी ने स्पेशल एफ्फेक्ट्स का खुले दिल से कॉमेडी करने में उपयोग किया है, और ५ मिनिट का वह दृश्य जहाँ प्रेम ऑफिस जाता है, वह दर्शकों को हँसा-हँसा के लोटपोट कर देता है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

प्रीतम का संगीत जबरदस्त है और हिट है. पर्श्वसंगीत दृश्यानुरूप है।

संकलन:

संगणकीय संकलन (कम्प्यूटराइज्ड एडीटिंग) सॉफ्टवेर के अच्छे गुणों का उपयोग करते हुए संकलक ने जो स्टाइल उसे किया है, वह फिल्म को और ज्यादा मोशन देता है और कहानी का फ्लो सही रखता है। पर वही.. अनावश्यक और गति में बाधा डालने वाले दृश्यों और गानों को उन्हें कम करना चाहिए था।

निर्माण की गुणवत्ता:

टिप्स के तौरानी भाइयों द्वारा निर्मित ये फिल्म कम लागत में ऊँचे दर्जे की गुणवत्ता और असरदार मनोरंजन का एक अच्छा उदाहरण है। फिल्म की बजट कण्ट्रोल में रख कर फिल्म के कंटेंट की ओर ज्यादा ध्यान देकर उन्होंने एक मिसाल कायम की है। और इसी कारण फिल्म सभी को मुनाफा देगी।

लेखा-जोखा:

*** 1/2 (3.5 तारे)
एक तारा साफ़ सुथरी मनोरंजक पेशकश के लिए जो पूरी फॅमिली एक साथ देख सकते हैं। एक तारा करिकेचर स्टाइल के दिग्दर्शन के लिए राजकुमार संतोषी को। एक तारा खास रणबीर कपूर के अदाकारी को। और आधा तारा सभी के अभिनय और फिल्म के संगीत को।

आप सभी घरवालों और दोस्तों के साथ ये फिल्म ज़रूर देखिये। आपका वीक-एंड हँसी के गुब्बारों से खेलते हुए बीतेगा।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Saturday, October 31, 2009

अलाद्दीन : मजेदार मनोरंजन मैजिक

फिल्म समीक्षा

"हैरी पॉटर" और "पायरेट्स ऑफ़ कैरिबियन" जैसी हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्में जब हिंदी फिल्मों को टक्कर देती है तो ऐसी कोई भी हिंदी फिल्म नहीं होती जो उन्हें मुह तोड़ जवाब दे पाए। हालाँकि कोई कहानी अच्छे से प्रस्तुत की जाये तो बच्चे-बूढ़े और जवान सभी को रास आता है, पर हिंदी फिल्मों में कभी ऐसे चमत्कारपूर्ण या परी कथाओं पर परिश्रमपूर्वक काम नहीं हुआ है।

पर इसी संकीर्ण रास्तों पे चलते हुए सुजोय घोष की नयी फिल्म सिनेमा घरों में आई है। क्या ये फिल्म विश्वस्तरीय फिल्मों के मुकाबले खरी उतरती है? करते है इस फिल्म के गुणवगुणों की चर्चा.

कथा सारांश:

कथा सीधी साधी है। "ख्वाइश" नामक एक काल्पनिक गाँव में एक अनाथ बच्चा, अलाद्दीन (रितेश देशमुख) रहता है। अलाद्दीन के माँ बाप असली अलाद्दीन के चिराग के खोज के समय ही भगवन को प्यारे हो गए। उसके बाद अपने दादा के साथ रहने वाला अलाद्दीन कुछी दिनों बाद दादा का भी साथ खो के अनाथ हो जाता है। स्कूल में बच्चे उसे उसके नाम से चिढ़ाते है और चिराग घिस के जिन्न को बाहर लाने को कहते हैं और जब वह ऐसा करने में असफल होता है तो उसे मारते है। इसी वजह से अलाद्दीन चिराग से नफ़रत करता है।

बड़ा होने के बाद भी अलाद्दीन एक कम आत्मविश्वास वाला लड़का बन जाता है। पर एकदिन कॉलेज में आई नयी लड़की, जास्मिन (जैकलिन फ़र्नान्डिस) पे वह मर मिटता है। अलाद्दीन के जन्मदिन पर जास्मिन जो चिराग उसे तोहफे के स्वरुप देती है, उसी चिराग से असली जिन्न निकलता है।

अलाद्दीन और वह जिनी मिल के क्या गुल खिलाते हैं, इसी कहानी पर बनी है यह फिल्म।

पटकथा:

बहुत सारे हॉलीवुड और हिंदी फिल्मों का अभ्यास कर के सुजोय घोष ने इस फिल्म की पटकथा को सँवारने की कोशिश की है और कुछ बेहतर होशियार तरीकों के बावजूद पटकथा कहीं-कहीं पटरी से फिसल जाती है। पर इसके बावजूद फिल्म ज्यादातर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाने में कामयाब होती है।

दिग्दर्शन:

सुजॉय घोष की दिग्दर्शीय प्रतिभा के लिए यह फिल्म एक शिव धनुष को उठाने के सामान बड़ी चुनौती थी, और वह उसमे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। पर सुजोय घोष के लेखन प्रतिभा ने उन्हें कई जगह पे कमजोर कर दिया है। पर सुजोय ने जिस ऊँचाई पर इसे सोचा है वह काबील-ए-तारीफ है। और उससे भी कबीलेतारीफ है अपने सपने को सच करने उनकी मेहनत, जो साफ दिखाई देती है। उन्हें इसके लिए दाद देने की जरूरत है। अगर तगड़ी पटकथा का आधार मिले तो वे सच में विश्वस्तरीय फिल्मों की टक्कर की फिल्म बना सकते है।

पर फिल्म के पहले भाग में बहुत सारे गाने और कहानी के खिंचने की वजह से बोरियत महसूस होती है उसपे उन्होंने और थोड़ा काम करना चाहिए था।

अभिनय:

ये फिल्म पूरी तरह अमिताभ के काबिल कंधों पे सवार है। वे पूरी तरह अपने भूमिका को न्याय देते हैं और जब स्क्रीन पे आते हैं, तब से स्क्रीन पे छा जाते हैं। रितेश भी दर्शकों से तालियाँ और हँसी बटोरने में सफल हुए हैं। संजय दत्त को थोड़ा और मेहनत करने की ज़रूरत थी। नयी नायिका जैकलिन परी जैसी दिखती है और अपना पात्र ठीक से निभाती है। बाकि सब कलाकारों ने अच्छा साथ निभाया है।

चित्रांकन और स्पेशल एफ्फेक्ट्स:

अतिउच्च दर्जे के स्पेशल एफ्फेक्ट्स इस फिल्म के उन चुनिन्दा पहलूओं में से एक हैं जिनके लिए ये फिल्म देखना बहुत जरूरी है। रियल लाइफ एक्शन जिसे लाइव एक्शन भी कहते हैं उसके साथ कम्प्यूटर से बनी मायावी दुनिया और जादू का मिश्रण बहुत ही सटीक तरीके से फिल्माया गया है। हिंदी फिल्म के कम बजट में भी विश्वस्तरीय काम करने के लिए इस टीम को जितनी दाद दी जा सके, कम है। तालियाँ !

संगीत और पार्श्वसंगीत:

विशाल शेखर का संगीत अच्छा है। जिनी रैप और जास्मिन को प्रपोस करने वाले गाने अच्छे हैं। बाकि गानों में से कम से कम 2 गाने फिल्म से निकल देने चाहिए।

संकलन:

संकलक ने ड्रामा, एक्शन और स्पेशल इफेक्ट वाले दृश्यों में दर्शकों की तालियाँ हासिल करने में सफलता प्राप्त की है। पर फिल्म के लम्बाई को कम करने के लिए उन्हें निर्देशक को मनाना चाहिए था।

निर्माण की गुणवत्ता:

सुजोय घोष और सुनील लुल्ला को दाद देनी चाहिए कि उन्होंने इस तरीके के फिल्म को डिज्नी के लेवल का सोचा और बनाया है। निर्माण मूल्य अतिउत्तम है और फिल्म पहले दृश्य से ही अचम्भित कर देती है। दर्शकों को सोचने पे मजबूर करती है कि क्या ऐसी फिल्म भी भारत में बन सकती है! बहुत अच्छे।

लेखा-जोखा:

*** (3 तारे)
एक तारा विश्वस्तरीय स्पेशल एफ्फेक्ट्स और टेकिंग को, दूसरा तारा अमिताभ को, तीसरा तारा फिल्म के दिलचस्प भाग को।

बच्चों को जरूर ये फिल्म दिखाने ले जायें। और हैरी पॉटर और उस जैसी फिल्म पसंद करने वाले जवान और व्यस्क लोग भी ये फिल्म जरूर देखें। निर्माण की ऐसी गुणवत्ता और स्पेशल इफेक्ट वाली फिल्में हिंदी में बार-बार नहीं बनतीं। पर कही पे थोड़ी बच्चों को और कही पे थोडी बड़ों को बोरियत हो सकती है।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Monday, October 26, 2009

बाल गणेश 2 : बचकानी और बोरियत भरी

फिल्म समीक्षा

एनीमेशन फिल्में एक बहुत बड़ा मार्केट है दुनिया में, पर उसपे पूरा कब्जा है अमेरिका और यूरोपियन देशों का। भारत में कई हॉलीवुड फिल्मों का एनीमेशन का काम होता है, पर भारत में एनीमेशन का मार्केट समझिए नहीं के बराबर है। हनुमान नामक एक फिल्म ने जो अच्छा बिज़नेस किया था उसके चलते बाकि लोगो में भी पौराणिक पात्र और कथा का आधार ले कर एनीमेशन फिल्म्स बनाने की होड़ सी लग गयी। इसी बहती धरा में एक और फिल्म हाथ धोने आई है जिसका नाम है "बाल गणेश 2"। चलिए देखते हैं कि इस फिल्म में कितना दम है-


कथा सारांश:

फिल्म का प्रथम भाग भगवान गणेश के बचपन की बहुत सारी कथाओ में से कुछ कथाओं की माला लेकर आता है। इनमें पहली कहानी है भगवान गणेश और एक बिल्ली की। इस कहानी में अपने वाहक मूषकराज को डराने वाली बिल्ली को सबक सिखाते-सिखाते खुद बाल गणेश को ही पार्वती माता से एक सबक मिलता है कि हमेशा प्राणिमात्र की सहायता करनी चाहिए।

दूसरी कहानी में महर्षि व्यास के लेखक बने बाल गणेश की बुद्धिमानी, एकाग्रता और कार्य के प्रति समर्पण के गुण उजागर किये गए हैं। और बच्चों को ये भी पता चलता है कि बाल गणेश को लेखन का काम सौंप कर महर्षि व्यास ने महाभारत जैसे महान काव्यग्रंथ की रचना की थी।

तीसरी कहानी इस बात की जानकारी देती है कि गणेश के वाहक मूषक वस्तुतः एक भयानक राक्षस थे जिसने भोलेशंकर से मिले वरदान का दुरुपयोग कर के तीनो लोक में त्राहि मचा दी थी। तो उस राक्षस को पराभूत कर के बाल गणेश ने उसे मूषक बना के अपना वाहन बना दिया।

पटकथा:

कहानियों में विस्तृत दृश्यों की कमी के वजह से पटकथा में आज के ज़माने के चूहों की मंडली को सूत्रधार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। पर उनको बेवजह "मुम्बैया" भाषा दी गयी है जो बच्चों के लिए अच्छी सबक नहीं पेश करता। क्या मुम्बैया भाषा में वार्तालाप करना इंसान को जादा स्टाइलिश और मजेदार बना देता है? मुझे तो वह निचली दर्जे का लगा। और संवाद भी नीरस रहने के कारण फिल्म के कथन में सूत्रधार के ये दृश्य रुकावट जैसे लगते है। बाकि बाल गणेश की कहानियों की जान छोटी सी होने के वजह से उन्हें बढाने के लिए बचकाना पैतरेबाजी का इस्तेमाल किया गया है जो बच्चों को तो हँसाता है पर उनके साथ मजबूरन जाने वाले बड़ों को उबासिया लेने पे मजबूर करता है। गुदगुदी करने से हँसी जरुर आती है पर क्या वही उत्तम मनोरंजन का प्रतिक है? नहीं ना? इसीलिए मुझे लगता है एनीमेशन फिल्म के लेखन के बारें में बाल गणेश 2 के लेखक पंकज शर्मा ने हॉलीवुड एनीमेशन फिल्मों का और अभ्यास करना चाहिए।

निर्देशन:

जब लेखन ही कमजोर हो तो दिग्दर्शक को फिल्म की नैया किनारे पार लगाने में तकलीफ तो होगी ही। पंकज शर्मा के लेखन ने पंकज शर्मा के ही दिग्दर्शन को कमजोर कर दिया है। मुम्बैया सूत्रधारों को मजेदार समाज पे फिल्म का बड़ा भाग उनपे चित्रित करने से अच्छा उन्होंने कुछ और सोचना चाहिए था। शायद उतने ही समय में एक और गणेश कथा दर्शकों को दिखाई जा सकती थी।

एनीमेशन :

फिल्म के बजट को ध्यान में रख कर दिग्दर्शक ने मुख्य किरदारों के एनीमेशन पर ज्यादा जोर दे कर सह किरदारों का एनीमेशन थोड़ा कम अच्छा किया है। जैसे कि बाल गणेश के एनिमेटेड किरदार का अभिनय बहुत ही सुन्दर बन आया है। चेहरे के हावभाव और शारीरिक हालचाल को नैसर्गिक तरीके से उभारा गया है। उसके लिए एनिमेटरों को दाद देनी चाहिए। पर फिर भी फेब्रिक एनीमेशन यानी कपडे का एनीमेशन, हेयर एनीमेशन यानी के बालों का एनीमेशन नैसर्गिक नहीं है। और सह किरदारों के एनीमेशन पे ज्यादा तवज्जो न देने के कारण मिला-जुला जो प्रभाव है वह कम हो जाता है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

फिल्म में एक मजेदार गाना है जो बच्चों को नाचने पे मजबूर कर देता है। और पार्श्व संगीत भी कहानी को न्याय देता है। शमीर टंडन और संजय ढकन का काम अच्छा है।

संकलन:

फिल्म सिर्फ़ 1 घंटे की है फिर भी बोरियत लाने में कामयाब होती है। इसमें संकलक से ज्यादा लेखन और निर्देशन की असफलता है।

चित्रांकन (रेंडरिंग):

एनीमेशन फिल्मे पूरी तरह से संगणक पे ही बनायीं जाती है इसलिए चित्रांकन की जगह उसमे हम रेंडरिंग की समीक्षा कर सकते है। जिस प्रकार का रेंडरिंग किया गया है वह किरदारों को प्लास्टिकी रूप देता है जहा हॉलीवुड की फिल्में पूरी तरह से नैसर्गिक रेंडरिंग कर पाती हैं। तो इस लिहाज से ये फिल्म बनावटी सी लगती है जैसे कि प्लास्टिक के खिलौने।

निर्माण की गुणवत्ता:

शेमारू ने निर्माण में एनीमेशन मार्केट को ध्यान में रख के जितना मुनाफा हो सकता है उसके हिसाब से ही लगत लगायी है इसलिए मुख्य किरदारों के एनीमेशन पे जादा वक्त यानी अन्त में पैसा लगाया है और बाकि बारीकियों को नजरंदाज किया है। बिज़नेस के हिसाब से ये सही चाल है पर फिल्म मेकिंग में यह है लो क्वालिटी वर्क ही माना जायेगा। फिल्म का सिनेमास्कोप भी नहीं है। पर लगातार एनीमेशन फिल्म्स बना के ये मार्केट को जिन्दा रखने के लिए शेमारू को बधाइयाँ।

लेखा-जोखा:

** (2 तारे)
बाल गणेश के मनमोहक हावभाव और शारीरिक हालचाल को अच्छी तरह से एनिमेट करने के लिए एक तारा। और दूसरा तारा किसी तरह भी हो पर भारतीय एनीमेशन मार्केट में नए प्रोडक्ट लाते रहने के लिए निर्माता शेमारू के लिए।
यह चित्रपट जल्द ही डीवीडी में आएगा, तो सिनेमाघरो में सैकडो रुपये बर्बाद करने से अच्छा रहेगा के आप डीवीडी लें और बच्चों को बार-बार बाल गणेश की लीलाओं का आनंद लेने दें।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Saturday, October 17, 2009

ब्लू : प्लास्टिकी किरदार और कहानी

फिल्म समीक्षा

ऐसा क्यूँ होता है के जिस मूवी से हम इतनी उम्मीदें लगाते हैं और सालभर उसके आने की राह तकते हैं वही फिल्म हमें बोरियत से दाँतों से नाखून कतरने पर मजबूर कर देती है? ऐसा क्यूँ होता है के फिल्मकारों की टीवी पर बातें सुन कर, पत्रिकाओं में लेख पढ़ कर हम ये समझ बैठते हैं कि हम इस फिल्म को सिने से लगा रखेंगे, पर वही फिल्म स्वाइन फ्लू के विषाणू जैसे हमें दूर रहने के लिए मजबूर करती है?

ब्लू ..... ऐसी ही एक फिल्म है जो समंदर के अंदर की रंगीन दुनिया दिखाने के साथ-साथ 2 घंटे के रोमांचक सफ़र का वादा करती है। विश्वस्तरीय तंत्र और बेशुमार लागत से बनी ये फिल्म जिसे प्रचारित करने में सभी मुख्य कलाकारों ने जान लगा दी थी, क्या वह अपने वादों पे खरी उतरती है?

आइए देखते है "ब्लू"-

कथा सारांश:
आरव (अक्षय कुमार) और सागर (संजय दत्त) दोस्त हैं जो बहामा में रहते हैं। सागर सुलझा हुआ इंसान है जो फिशिंग कंपनी में काम करता है और पैसे कमा कर अपनी प्रियसी मोना (लारा दत्ता) के साथ शादी कर के साधारण पर सुखी जिंदगी जीना चाहता है। आरव एक अमिर लड़का है जो ज्यादातर वक़्त सागर के साथ बीतता है। मछली पकड़ने में, बॉक्सिंग करने में, पब में मस्ती करने मे। पर वो बार-बार सागर को एक खजाने की खोज के लिए मनाने की कोशिश करता है क्यूंकि उसे लगता है कि सागर के पिता ने वो खजाना पहले ही ढूँढ़ निकाला था। पर सागर इस बात को झूठ बताकर खोज पर चलने की बात को बार-बार ठुकरा देता है।

इसी बीच सागर का भाई समीर (ज़ायेद ख़ान) जो घर छोड़ के चला गया था वह वापिस आता है। पर वो एक मुसीबत में फँसा हुआ होता है और उसे एक गैंग्स्टर के 50 मिलियन लौटाने होते हैं। उनसे छिपने के लिए समीर सागर के पास बहामा आता है। लेकिन वह लोग उसे वहा भी ढूँढ़ लेते है और समीर पे गोलीबारी करते है। आरव उसे बचाता है। तब समीर आरव को सब बता देता है। आरव और समीर मिल के सागर को मना लेते है खजाने की खोज पर निकलने के लिए।

फिर क्या होता है.... क्या वो खजाना ढूँढ़ के समीर को उसके तकलीफ़ से बचा पाते हैं? यही सब सवालों का जवाब मनोरंजक तरीके से देने की कोशिश करती है ब्लू की कहानी। पर क्या पटकथा उसे न्याय दे पाती है?

पटकथा:
कथा तो साधारण लगती है जो हम कुमार कथाओं में और अंग्रेज़ी खोज कथाओं में कई बार मिलती है। पर यहाँ नयी बात ये थी कि ये खजाना समंदर के अंदर है और समुद्रतल का चित्रण अभी तक हिन्दी चलचित्रों में आया नहीं है। पटकथा लेखन इस तरीके के कहानी में तगड़ा होना चाहिए जो यहाँ नहीं है। सरल सपाट कथा-कथन, जिसकी घटनाओं में ज़रा भी नयापन नहीं है, वह इस असाधारण प्रयत्न को एक साधारण फिल्म बना देता है। ब्रयान स्यूलिवन जिन्होंने ये पटकथा लिखीं है उन्हें फिर से पटकथा लेखन का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए।

दिग्दर्शन:
एंथॉनी डीसौजा जिनकी ये पहली फिल्म है उनके हिम्मत और प्रयत्न की दाद देना चाहिए पर दुर्भाग्यवश वो कथा कथन में परिपक्व नहीं हैं। पानी के गहराइयों के दृश्य उन्होंने अच्छी तरीके से चित्रित किए है पर भावुक दृश्य और ऐसे दृश्य जो फिल्म को एक दर्शकों को किरदारों के साथ बाँधने में सफल रहे वो चित्रित करने में उनकी प्रतिभा कम पड़ जाती है। शायद वो अपने कलाकारों से खुद को छोटा मानते हुए उनसे और मेहनत करने में हिचकिचा रहे थे। इसलिए सबका अभिनय पास्टिक अभिनय लगता है। अपना प्रॉजेक्ट प्रमोटे कर के उसके लिए सामग्री इकठ्ठा करना उन्हें भले ही आता हो पर दृश्य कथा कथन की कला में उन्हें अभी और बहुत दूर तक जाना है।

अभिनय:
अभिनय के मामले में सब साधारण-सा है। इसका जिम्मा पूरी तरह से अभिनेता और अभिनेत्रियों पर नहीं जाता, जब लेखन में ही दम न हो और आपका दिगदर्शक भी आपसे डर-डर के काम करा रहा हो तो और क्या परिणाम निकल सकता है? संजय दत्त, अक्षय कुमार, लारा दत्ता, कटरीना कैफ़, ज़ायेद ख़ान और राहुल देव सबने उतना ही दिया है जितना उनसे लिया गया है। लारा दत्ता ने बहुत सुंदर तरीके से अपनी बदन की खूबसूरती को दर्शाया है। कबीर बेदी सिर्फ़ कुछ क्षण के लिए पर्दे पर आते हैं।

संगीत और पार्श्वसंगीत:
फिल्म के गाने पहले ही लोकप्रिय हो चुके है। कुछ गानों में असाधारण और अप्रतिम संगीत दे कर ऑस्कर विजेता प्राप्त ए आर रहमान ने अपनी प्रतिभा का लोहा फिर से मनवाया है। पर बाकी गाने साधारण से हैं। सबसे बढ़िया जो वीडियो जो ब्लू थीम है वो मूवी में कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ है। अहमद ख़ान के नृत्य निर्देशन में फिल्माये उस गाने में अप्रतिम उर्जा दिखती है (टीवी पर)। "आज दिल गुस्ताख है" पर्दे पर अतिसुंदर नज़र आता है। पार्श्वसंगीत भी अच्छा है।

संकलन:
फिल्म सिर्फ़ 2 घंटे की है। संकलक के अच्छी तरीके से काम करने के बावजूद भी कहानी में रोचक घटनाओं की कमी के कारण फिल्म प्रभावपूर्ण नहीं हो पाई। अब कथा को दृश्यों मे गुंफने की प्रक्रिया में दिग्दर्शक और संकलक को इनकी कितनी साझेदारी थी यह तो पता नहीं। पर अगर संकलक को ये जिम्मा सौंपा गया हो तो वो अपने कार्य में ज़रूर असफल रहे हैं। पर सिर्फ़ तकनीकी दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने जैसा बताया वैसे खुद का काम किया है।

एक्शन दृश्य:
रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांचक दृश्य तभी प्रभावित कर सकते है जब किरदार और कहानी दर्शकों के हृदय छू ले। यहाँ भी वही तकलीफ़ है। मेहनत और खर्चा दिखता है पर किरदारों के साथ भावुक संपर्क नहीं रहने के कारण परिणाम पूरी तरह से नहीं उभर के आता है। पर जिन्हें सिर्फ़ ऐसे दृश्य देखने में मज़ा आता है उन्हें ये फिल्म पसंद आ सकती है।

चित्रांकन:
फिल्म मे चित्रांकन विश्वस्तरीय और अव्वल दर्जे का है। समुद्रतल की सुदंरता आँखों को चकाचौंध कर देने वाली है। इस तरीके का चित्रण सही में इसके पहले कभी भी भारतीय फ़िल्मों में नज़र नहीं आया। जो भी लोग इसके पीछे हैं उनका प्रयत्न सफल और काबीले-तारीफ है। पीटर झूरिणिक जिन्होंने "पायरेट्स ऑफ दी करीबियन" की है, उनकी प्रतिभा और अनुभव इस बेहतरीन अनुभव के लिए ज़िम्मेदार है।

निर्माण की गुणवत्ता:
श्री अष्टविनायक चित्रपट संस्था और उसके संचालक ढीलिन मेहता की जितनी तारीफ की जा सके कम है। ये इसलिए के उन्होंने खर्चे में सच में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पर एक थकी कहानी और अपरिपक्व दिग्दर्शन ने उन्हें धोखा दे दिया। सिर्फ़ हम इतनी ही दुआ कर सकते हैं कि उनका खर्चा निकल जाए और दीवाली के दिनों में उनका दीवाला ना निकले। हम तहे दिल से चाहते हैं कि फिल्म अपनी कीमत वसूलने में सफल रहे।

लेखा-जोखा:
** (२ तारे)
प्लास्टिक से बने सुंदर थीम पार्क्स और अतिसुंदर झाँकिया कितना भी हों, रहते अंत में वही है: प्लास्टिकी ! वैसे ही भाव-भावनाओं से परे कहानी और किरदार कितने भी सुंदर हों, दिखते प्लिस्टिक के ही हैं। पर हम बेहतरीन तकनीक और अभूतपूर्व समुद्रतल दृश्यांकन के लिए इस फिल्म को एक तारा और एक्शन दृश्यों के चित्रीकरण के लिए और एक तारा दे ही सकते है।

अगर आप ये अभूतपूर्व दृश्य बड़े पर्दे पर देखना चाहते है (और वो बड़े पर्दे पर ही मज़ा देते है) तो कहानी से कुछ भी आशा ना रखते हुए ज़रूर जाएँ।

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Friday, October 16, 2009

ऑल द बेस्ट : संजू "बाबा" का चमत्कार

फिल्म समीक्षा
जब "गोलमाल" और "गोलमाल रिटर्न्स" के टीम के तरफ से फिल्म आती है, तो स्वाभाविक है के दर्शकों की अपेक्षायें आसमान छूने लगे. मिडिया में जबरदस्त क्रेज निर्माण कर के दिवाली के छुट्टियों कारण फिल्म के प्रोमोटर्स दर्शकों को सिनेमाघरों में खीचने के लिए सफल तो जरुर हुए है. पर क्या ये फिल्म दर्शको को पसंद आएगी? चलो करते है इस चलचित्र की समीक्षा.

कथा-सारांश :
इस तरह के मूवी में कथा का अतापता साधारणतः नहीं होता है. पर फिर भी एक कथा सूत्र है जो मै आपको बता सकता हूँ.

वीर (फरदीन खान) एक अमीर एन. आर. आई. भाई, धरम (संजय दत्त) का सौतेला बेटा है जिसका बड़ा भाई उसे बहुत प्यार से पौक्केट मनी भेजता है. परअपनी पौकेट मनी दुगनी करने के लिए वीर, अपने दोस्त प्रेम चोपडा (अजय देवगन) की सलाह पर, धरम से जूठ बोलता है की वोह शादी शुदा है. ये जूठ को सच करने के लिए वीर की प्रियसी विद्या (मुग्धा गोडसे) उसे मदत कराती है. हर महीने के पहली तारीख को जब धरम का मेनेजर पैसे देने आता है तब वीर विद्या को उसकी धरमपत्नी की तरह मिलाता है.

पैसे आते ही वीर वो पैसे अपने और अपने दोस्त प्रेम के सपने को पूरा करने में लगा देता है. वीर का सपना है की उसका म्यूजिक बैंड एक मशहूर बैंड बने. दूसरी और प्रेम का सपना है के वोह उसके दिमाग की उपज से ऐसी कार बनाये जो दुनिया को चकाचौन्द कर दे. इन्ही सपनों के पीछे दौड़ते दौड़ते वह दोनों एक भाई टोबू (जोनी लीवर) से पैसे उधर लेते है. पर जब वोह पैसे चुकाना मुश्किल हो जाता है तो प्रेम के सलाह पे वीर भाई का बंगलो भाड़े पे देता है और अडवांस के तौर पर रघु (संजय मिश्रा) ५ लाख का सौदा करता है और २.५ लाख ले भी लेता है.

लेकिन तभी धरम के गोवा आने की खबर से सब परेशां हो जाते है. फिर धरम से सच छुपाने के चक्कर में जो प्रेम और वीर मिल के जो गोलमाल करते है वाही कहानी है "ऑल दी बेस्ट" की.

कथा वही पुराने ढंग की है जैसे हर कॉमेडी फिल्म में होती है. इस तरह के फिल्म्स में पटकथा और निर्देशन की कलाकारी ही इन चलचित्र को सफल या असफल बनाने में महत्वपूर्ण होती है.

पटकथा:
रोबिन भट और युनुस सजावाला की पटकथा शुरुवात के चालीस मिनट तक दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में असफल होती है. वीर और प्रेम के उटपटांग हरकतों को मजेदार तरीके से कथन करने में लेखक कामयाब नहीं हो पाए है. ऐसा लगता है के जबरदस्ती से हँसा ने की कोशिश हो रही है.

पर जैसे ही धरम याने अपने संजूबाबा का आगमन कहानी में होता है, कहानी जोर पकड़ लेती है और दर्शकों को हसी से सराबोर कर देती है. कहानी में बहुत सरे किरदार है और उपकहानिया है जो मजेदार है और हँसाने में कामयाब होती है.

वैसे भी इस प्रकार के चलचित्र को देखने के लिए आपने अपना दिमाग घर में फ्रीज में ही रख के जाना जरुरी है. तभी आप इस प्रकार के विनोद का आनंद ले सकते हो.

दिग्दर्शन:
रोहित शेट्टी निर्देशन पे तो अब सबको ही पूरा भरोसा. और इसबार शुरुवाती कुछ वक़्त छोड़ दिया तो वोह अपने कार्य में पूरी तरह से सफल हुए है. हालाँकि वो अपने पुराने फिल्मो की तरह एक अमिट छाप नहीं छोड़ पाए है. कुछ ऐसे विनोदी दृश्य जिसे हम दिग्दर्शक की प्रतिभा का अविष्कार कह सकते है, वैसे दृश्य इसबार रोहित नहीं दे सके है इस कारण यह एक माध्यम दर्जे की मनोरंजक फिल्म है जो पूरी फॅमिली और दोस्त एकसाथ मिल के देख सकते है.

अभिनय:
अभिनय के मापदंड पे संजय दत्त फिर से साबित कर देते है के वोह कॉमेडी के बादशाह है (याद है ना मुन्ना भाई?). जब भी वोह परदे पे आते है तो चित्रपटगृह हसी से भर जाता है. इसलिए मैंने शीर्षक में संजू "बाबा" का चमत्कार ऐसे लिखा है. "बाबा" शब्द क्यूँ वापरा है ये आपको फिल्म देख के समझ आएगा. फरदीन और अजय का अभिनय ठीक ठाक है. बिपाशा ने अच्छी तरह से सहयोग दिया है. मुग्धा गोडसे को जादा रोल नहीं है और उनके सजोसज्जा पे उन्हें जादा ध्यान देना चाहिए. कॉमेडी में वो इतना असरदार अभिनय नहीं कर पाई है. जोनी लीवर पुरे फिल्म के गूंगे रहने के कारण म़जा थोडा किरकिरा हो जाता है. संजय मिश्रा (जो गोलमाल में खलनायक रहते है) वोह इस बार भी हमें हसी से लोटपोट होने पे मजबूर कर देते है. विजय पाटकर और अतुल परचुरे जैसे अदाकारों ने भी अपना काम बखूबी निभाया है.

संगीत:
चलचित्र का संगीत मनोरंजक है. प्रीतम एक बार फिर अपने कार्य में सफल हुए है.

चलचित्रंकन और एक्शन:
चलचित्रंकन उत्तम है और ऊँचे दर्जे के निर्मिती मूल्य चलचित्र को दर्जेदार बनता है.

संकलन:
चलचित्र का संकलन शुरुवात के चिलीस मिनिट में बेहतर हो सकता था. शुरुवात में ही दो गाने ड़ाल के कथा कथन में रुकावट होती है. वोह कही और भी डाले जा सकते थे.

लेखाजोखा:
दिवाली के अवसर पर ख़ुशी और हसी से भरपूर वक़्त गुजरने के लिए ये फिल्म ठीक है अगर आप शुरुवाती शिथिलता और कुच्छ दृश्य जो जबरदस्ती से हँसाने की कोशिश करते है, उन्हें नजर अंदाज करने के लिए टायर है तो. बाकी आपकी मर्जी.

हमारे तरफ से तो आपको दिवाली के लिए "ऑल दी बेस्ट"!

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

Friday, October 09, 2009

"आसिड फॅक्टरी": एक मिला जुला अनुभव

फिल्म समीक्षा

इस हफ्ते हमारे आसपास के सिनेमगृह मे आई है "आसिड फॅक्टरी". जबरदस्त हैरतअंगेज़ कारनामो से भरपूर ये चलचित्र साथ मे ही एक रहस्यमयी कथा प्रस्तुत करने का दावा करता है.

क्या वो अपना वादा पूरा करने मे सफल होते है? और ऐसे करते समय क्या वो दार्शको के पसंद आ पाती है? तो चलिए शुरू करते है इस चलचित्र की समीक्षा.

कथा सारांश :
ये कहानी है मे ६ किरदारों की जो एक दूसरे को एक आसिड फॅक्टरी मे फ़सा पाते है. बल्कि इतना ही नही वो खुद को ही अपने शरीर के अंदर फसा पाते है.... नही ये कोई भूत-प्रेत की फिल्म नही.... पर मे ये ऐसा इसलिए कर रहा हूँ क्यूंकी सभी लोगों की याददाश्त जा चुकी है और वो खुद को अपने जिस्म के क़ैद पाते है (इसीलिए वो गाना है "ये जिस्म जो है ये किसका है?"). सबसे पहले उठते है फ़रदीन ख़ान जो खुद आसपास पड़े हुए और बेहोश लोगो को पाते है. वो कुछ लोगो को उठाते है. बाकी दो लोग बँधे पड़े होते है. सबको पता चलता है के सबकी याददाश्त जा चुकी है. इसी बीच एक फोन आता है जिससे उन्हे इतना तो पता चलता है यहा किसिका कत्ल होने वाला है. पर वो किसका होनेवाला है और कौन करने वाला है? और भी बाकी क्या क्या सवाल उन्हे पारेशान करते है ? अब ये लोग खुद को किस तरह बचा पाते है कातिल से... यही कहानी है इस चलचित्र की. कागज़ पे ये कथा बहुत ही दिलचस्प लगती है. अब देखते है के पर्दे पर ये कितनी खरी उतरी है.

पटकथा:
सुपर्ण वेर्मा , सौरभ शुक्ला , संजय गुप्ता ने मिल के ये पटकथा लिखी है जो और अच्छी हो सकती थी. पटकथा मे जब भी आसिड फॅक्टरी के अंदर की याने चलचित्र के वर्तमान की कहानी चल रही होती है तो बहुत ही दिलचस्प होती है. पर जैसे ही फ़्लैश बैक के दृश्य बीच बीच मे आते है दर्शको का ध्यान विचलित हो जाता है. सो कहानी का कथन अगर किसी और तरीके से होता, अगर लेखक और दिग्दर्शक फ्लैश बैक के कड़ियोंको किसी और तरीके से पिरोते तो चार चाँद लग जाते (४ स्टार मिल जाते!). शुरूवाती आधे घंटे मे फ्लैश बॅक ना होता तो मज़ा आता ताकि फॅक्टरी मे की कहानी टूटती नही. पर उसके बाद कहानी गतिमान हो जाती है और मज़ा आने लगता है.

दिग्दर्शन:
सुपर्ण वर्मा का दिग्दर्शन और कथा कथन रोचक है. चलचित्र मे सबका अभिनय बेहेतर हुवा है इसका श्रेय विशेषता सुपर्ण को देना चाहिये. किसी जहाज़ के मुखिया की तरह उन्होने सभी कर्मीदल से अच्छा काम करा लिया है. उनकी दृश्यात्मकता उत्कृष्ट है.

अभिनय:
ये चलचित्र मे फ़रदीन ख़ान का अब तक का सबसे अच्छा अभिनय है. दिया मिर्ज़ा, दीनो मोरिओ और आफताब शिवदसानी ने भी अच्छी अदाकारी की है. डैनी और मनोज बाजपेई की अदाकारी दर्शकों से तालिया बटोरति है. इरफ़ान ख़ान भी अपने छोटे पर मह्त्त्व्पुर्ण किरदार मे छा जाते है. गुलशन ग्रोवर् का काम बहुत ही कम है और उन्होने वो बखूबी निभाया है. उनके हिसाब से ये रोल ठीक नही था. और कोई भी उसे निभा सकता था.

संगीत:
इस प्रकार के चलचित्रा मे गानो का होना कहानी के कथा रुकावट सा लगता है. "ये जिस्म जो है वो किसका है" ये छोड़ दिया तो सभी गीत साधारण से है और दिगदर्शक ने उन्हे अच्छे से इस्तेमाल किया है. "जब अंधेरा छाता है" ये पुराना गीत रेमिक्स कर के आखरी नामांकन मे दिखाया गया है.

चलचित्रंकन और एक्शन:
सिनेमाटोग्राफी एकदम बढ़िया है. विश्वस्तरीय गुणवत्ता की कसौटी पे खरी उतरती है. एक्शन दृश्य अच्छे बन पड़े है. उसके लिए टीनू वर्मा की सराहना की जानी चाहिए.

चलचित्रंकन:
सिनेमाटोग्राफी एकदम बढ़िया है. एक्शन दृश्य अच्छे बन पड़े है.

लेखाजोखा:
तो आख़िर मे सब मिला के आसिड फॅक्टरी का लेखाजोखा ये कहता है के "सब तो है पर कुछ कमी है". इसलिए अगर इस हफ्ते मूवी जाना ही है (और पुराने हफ्ते के मीवीस देख लिए हो) तो ये एक अच्छा विकल्प है. आपका पैसा बरबाद नही होगा. पर अगर आप राह देख सकते है तो इसके DVD का इंतेजार करे क्यूंके ये एक अच्छा DVD WATCH hai.

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल