जब किसी स्टार की लगातार तीन फिल्में सुपर हिट होती हैं, तो ये लाजमी है कि उसके नए फिल्म से लिए लोगों की अपेक्षाए बढेंगी ही। उस पर अगर वह फिल्म नाम से डांस फिल्म लगती हो और वह स्टार शाहीद कपूर जैसा अतुलनीय डांसिंग स्टार की हो तो कुछ जलवे की उम्मीद रखना कोई गलत बात भी नहीं है।क्या केन घोष अपनी तीसरी फिल्म में इतनी सारी उम्मीदों पर खरे उतर पाये हैं?
कथा सारांश :
कहानी है समीर बहल (शाहीद कपूर) की जो एक बड़ा ब्रेक मिलने के लिए संघर्ष कर रहा है। दिन में कोरियर ऑफिस में काम करते-करते वह बहुत सारी जगह काम पाने की कोशिश करते रहता है। नाकारा भी जाता है तो उसे दिल पे न लेते हुए और कोशिश करते रहता है।
एक दिन एक म्यूजिक वीडियो के टेस्ट में वह चुना जाता है पर किसी और सिफारिश वाले बन्दे के कारण वह काम भी उसे नहीं मिलता। पर वहीं उसकी पहचान एक नृत्यनिर्देशिका सोनिया (जेनिलिया डिसौज़ा) से होती है। फिर से एक जगह काम पाने के लिए गए समीर को हीरो के लिए डायरेक्टर (मोहनीश बहल) चुन लेता है। और वहाँ फिर से समीर की मुलाकात सोनिया से होती है जो उस फिल्म की डांस डायरेक्टर है। दोनों दोस्त हो जाते है।
इस ख़ुशी के दिन ही समीर का मकानमालिक उसे घर से निकल देता है। ऐसी कठिनाइयों का सामना कर के क्या समीर अंत में जीत पाता है?
पटकथा:
कथा जब ख़ास नहीं होती है (बार-बार सुनी सी नहीं लगती क्या?) तो भी उसे पटकथाकार उभार कर एक अलग ऊँचाई पर ले जा सकता है। पर यहाँ ऐसा नहीं हो पाया है। पटकथाकार बार-बार कहानी को वहीं-वहीं घुमाता रहा है और कहानी जैसे एक ही जगह रुकी सी लगती है। फिल्म का प्रॉब्लम पटकथा में है क्योंकि इसी तरह की एक कहानी को "लक बाय चांस' फिल्म में अच्छी तरीके से पेश किया गया है.
दिग्दर्शन:
कमजोर कहानी को सशक्त पटकथा संभाल सकती है पर कमजोर पटकथा को अच्छा दिग्दर्शक भी संभाल नहीं सकता। और यहाँ तो केन घोस जी ने भी नहीं किया है। वे हर दृश्य को और ज्यादा धीमा कर के फिल्म को और बोरिंग बनाते हैं। अगर फिल्म की गति को तेज रखा होता तो शायद फिल्म कुछ हद तक ठीक हो सकती थी। पर यहाँ केन घोष ऐसा करने में नाकामयाब रहे है।
अभिनय:
अभिनय के मामले में शाहीद और जेनेलिया ने इमानदारी से मेहनत की है। शाहीद ने अच्छी एक्टिंग, डांसिंग एंड बॉडी सबका प्रदर्शन किया है पर जहाँ लेखन में ही कमजोरी है वे भी क्या कर सकते है। खून अगर कम हो तो शरीर तो पीला पड़ता ही है। बाकी सभी किरदारों ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। पर फिल्म में किसी भी किरदार को निखारा नहीं गया है।
चित्रांकन :
चित्रांकन आज के ज़माने में ज्यादातर फिल्मों में अच्छा ही होता है। इस मामलेमें बॉलीवुड का तकनीकी स्तर ऊँचा हो ही गया है। यह फिल्म भी चकाचक है।
संगीत और पार्श्वसंगीत:
जहाँ शहीद हीरो है और फिल्म के नाम में ही डांस है तो लोग खूब मजेदार डांस की अपेक्षा करेगे ही। पर यहाँ ये डिपार्टमेंट भी कुछ ज्यादा असरदार नहीं हो पाया है। इस तरह के डांस तो हमलोग आजकल टीवी शो में भी देखते हैं। कई बार इससे ज्यादा अच्छे भी।
संकलन:
पटकथा में कंटेंट नहीं है, दिग्दर्शक ने शूटिंग के वक्त कुछ खांस किया नहीं है, तो निर्देशक ने सब जैसे के तैसे लगा दिया है। अगर फिल्म और छोटी की गयी होती और गतिमान रखी गयी होती तो शायद देखने लायक हो सकती थी।
निर्माण की गुणवत्ता:
निर्माण की गुणवत्ता अच्छी है। यू टीवी की फिल्म होने के कारण इस डिपार्टमेंट में कोई कमी नहीं है।
लेखा-जोखा:
*१/२ (१.५ तारे)
फिल्म में कुछ दृश्य मजेदार हैं पर उतने फिल्म को असरदार बनाने में काफी नहीं हैं। फिल्म एक ही जगह अटकी रहती है और किसी भी किरदार से दर्शक खुद को जोड़ नहीं पाते हैं। यह फिल्म देखने की सलाह मैं किसी को भी नहीं दे सकता-इसका मुझे खेद है।
चित्रपट समीक्षक:--- प्रशेन ह.क्यावल

राजकुमार हिरानी अपने मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मों के द्वारा दर्शकों को सकारात्मक सोच के साथ दिल जज्बा लेकर जिंदगी के मुश्किल चुनौतियों का सामना करने की सीख देते आये हैं। मुन्नाभाई सीरिज से हटकर इस बार वह लेकर आये हैं 3 इडियट्स जो चेतन भगत के सफल उपन्यास पर आधारित है।
हृषिकेश मुखर्जी एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्हें कभी भी डिजायनर ड्रेसेस और चमकते सेट्स की जरूरत नहीं पड़ी। फिर भी उनकी फिल्में आज क्लासिक्स कहलाती हैं। मैं ऐसे ही सोच रहा था कि आजकल की फिल्में इसलिए बेअसर होने लगी हैं क्योंकि उनमें सब कुछ डिजायनर हो गया है। सेट्स, कपड़े (हीरो कहानी में फटीचर हो तो भी डिजायनर जींस पहनेगा) और बुरी बात तो ये है कि एक्टिंग और भावनाएँ भी डिजायनर। तो होता ये है कि दर्शक किरदारों से जुड़ ही नहीं पाता तो उनके दुःख दर्द में कैसे घुल मिल सकेगा? और जब तक किरदार दर्शकों को नहीं लुभायेंगे, फिल्म कैसे लुभा पायेगी?
कुछ ऐसे कलाकार हर सदी में होते है जो दर्शकों की सोच से परे कुछ ऐसा पेश करते है की सारी दुनिया उनके सामने झुकने के लिए बेबस हो जाये. और ये झुकना इतना सम्मान सहित होता है जोकि शायद किसी सम्राट को भी न नसीब हो. पर एक सम्राट ऐसे है जिन्होंने बार-बार दुनिया को उसी तरह के सम्मान से अपने आगे झुकने के लिए मजबूर किया अपने हुनर से, अपनी अदाकारी से! और वे हैं... इस सदी के महानायक ....अमिताभ बच्चन. जहाँ उनके उम्र के कई अभिनेता इतिहास के पन्नों में गुम हो गए या लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड लेके रिटायर हो चुके है, वही बिग बी आज भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के श्रेणी में नए-पुराने कलाकारों को चुनौती देते है.
जन्नत और राज़ के बाद इमरान हाशमी की फिल्म "तुम मिले" भारी भीड़ के साथ सिनेमागृहों में आई है। इससे ये तो साबित होता है के भट्ट, उनका संगीत और इमरान बॉक्स ऑफिस पर भीड़ ज़रूर इकट्ठा कर सकते हैं। पर क्या यह फिल्म दर्शकों की भीड़ लगातार जुटाने में सफल हो पायेगी?
मधुर भंडारकर आज एक ब्रांड है जो मेनस्ट्रीम सिनेमा में सच्चाई से भरपूर कहानी को बखूबी पेश करते हैं और फिल्म को कॉमर्शियल प्रसिद्धि भी दिलाते हैं। आर्ट फिल्म और मेनस्ट्रीम कॉमर्शियल फिल्मों का ये मेल उनके बाएं हाथ का खेल है, इसीलिए उन्हें और उनके कलाकारों को बार-बार नेशनल अवार्ड से नवाजा गया है।
"अंदाज अपना अपना" जैसी क्लासिक कॉमेडी फिल्म देने वाले राजकुमार संतोषी कई सालों से इस कथा प्रकार से दूर थे। उनकी बहुत सारी फिल्में भी बीच में फ्लॉप हुईं। इसी बीच ऐसे देखा गया कि एक संजीदा फिल्म से भी ज्यादा बिज़नेस एक औसत दर्जे की कॉमेडी फिल्म कर लेती है। शायद यही सोचकर एक हिट फिल्म देने की आस में राजकुमार संतोषी लेकर आये है, रणबीर कपूर और कैटरिना कैफ की "अजब प्रेम की गजब कहानी"।
"हैरी पॉटर" और "पायरेट्स ऑफ़ कैरिबियन" जैसी हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्में जब हिंदी फिल्मों को टक्कर देती है तो ऐसी कोई भी हिंदी फिल्म नहीं होती जो उन्हें मुह तोड़ जवाब दे पाए। हालाँकि कोई कहानी अच्छे से प्रस्तुत की जाये तो बच्चे-बूढ़े और जवान सभी को रास आता है, पर हिंदी फिल्मों में कभी ऐसे चमत्कारपूर्ण या परी कथाओं पर परिश्रमपूर्वक काम नहीं हुआ है।
एनीमेशन फिल्में एक बहुत बड़ा मार्केट है दुनिया में, पर उसपे पूरा कब्जा है अमेरिका और यूरोपियन देशों का। भारत में कई हॉलीवुड फिल्मों का एनीमेशन का काम होता है, पर भारत में एनीमेशन का मार्केट समझिए नहीं के बराबर है। हनुमान नामक एक फिल्म ने जो अच्छा बिज़नेस किया था उसके चलते बाकि लोगो में भी पौराणिक पात्र और कथा का आधार ले कर एनीमेशन फिल्म्स बनाने की होड़ सी लग गयी। इसी बहती धरा में एक और फिल्म हाथ धोने आई है जिसका नाम है "बाल गणेश 2"। चलिए देखते हैं कि इस फिल्म में कितना दम है-
ऐसा क्यूँ होता है के जिस मूवी से हम इतनी उम्मीदें लगाते हैं और सालभर उसके आने की राह तकते हैं वही फिल्म हमें बोरियत से दाँतों से नाखून कतरने पर मजबूर कर देती है? ऐसा क्यूँ होता है के फिल्मकारों की टीवी पर बातें सुन कर, पत्रिकाओं में लेख पढ़ कर हम ये समझ बैठते हैं कि हम इस फिल्म को सिने से लगा रखेंगे, पर वही फिल्म स्वाइन फ्लू के विषाणू जैसे हमें दूर रहने के लिए मजबूर करती है?
जब "गोलमाल" और "गोलमाल रिटर्न्स" के टीम के तरफ से फिल्म आती है, तो स्वाभाविक है के दर्शकों की अपेक्षायें आसमान छूने लगे. मिडिया में जबरदस्त क्रेज निर्माण कर के दिवाली के छुट्टियों कारण फिल्म के प्रोमोटर्स दर्शकों को सिनेमाघरों में खीचने के लिए सफल तो जरुर हुए है. पर क्या ये फिल्म दर्शको को पसंद आएगी? चलो करते है इस चलचित्र की समीक्षा.
इस हफ्ते हमारे आसपास के सिनेमगृह मे आई है "आसिड फॅक्टरी". जबरदस्त हैरतअंगेज़ कारनामो से भरपूर ये चलचित्र साथ मे ही एक रहस्यमयी कथा प्रस्तुत करने का दावा करता है.
मार्कण्डेय