Friday, October 16, 2009

ऑल द बेस्ट : संजू "बाबा" का चमत्कार

फिल्म समीक्षा
जब "गोलमाल" और "गोलमाल रिटर्न्स" के टीम के तरफ से फिल्म आती है, तो स्वाभाविक है के दर्शकों की अपेक्षायें आसमान छूने लगे. मिडिया में जबरदस्त क्रेज निर्माण कर के दिवाली के छुट्टियों कारण फिल्म के प्रोमोटर्स दर्शकों को सिनेमाघरों में खीचने के लिए सफल तो जरुर हुए है. पर क्या ये फिल्म दर्शको को पसंद आएगी? चलो करते है इस चलचित्र की समीक्षा.

कथा-सारांश :
इस तरह के मूवी में कथा का अतापता साधारणतः नहीं होता है. पर फिर भी एक कथा सूत्र है जो मै आपको बता सकता हूँ.

वीर (फरदीन खान) एक अमीर एन. आर. आई. भाई, धरम (संजय दत्त) का सौतेला बेटा है जिसका बड़ा भाई उसे बहुत प्यार से पौक्केट मनी भेजता है. परअपनी पौकेट मनी दुगनी करने के लिए वीर, अपने दोस्त प्रेम चोपडा (अजय देवगन) की सलाह पर, धरम से जूठ बोलता है की वोह शादी शुदा है. ये जूठ को सच करने के लिए वीर की प्रियसी विद्या (मुग्धा गोडसे) उसे मदत कराती है. हर महीने के पहली तारीख को जब धरम का मेनेजर पैसे देने आता है तब वीर विद्या को उसकी धरमपत्नी की तरह मिलाता है.

पैसे आते ही वीर वो पैसे अपने और अपने दोस्त प्रेम के सपने को पूरा करने में लगा देता है. वीर का सपना है की उसका म्यूजिक बैंड एक मशहूर बैंड बने. दूसरी और प्रेम का सपना है के वोह उसके दिमाग की उपज से ऐसी कार बनाये जो दुनिया को चकाचौन्द कर दे. इन्ही सपनों के पीछे दौड़ते दौड़ते वह दोनों एक भाई टोबू (जोनी लीवर) से पैसे उधर लेते है. पर जब वोह पैसे चुकाना मुश्किल हो जाता है तो प्रेम के सलाह पे वीर भाई का बंगलो भाड़े पे देता है और अडवांस के तौर पर रघु (संजय मिश्रा) ५ लाख का सौदा करता है और २.५ लाख ले भी लेता है.

लेकिन तभी धरम के गोवा आने की खबर से सब परेशां हो जाते है. फिर धरम से सच छुपाने के चक्कर में जो प्रेम और वीर मिल के जो गोलमाल करते है वाही कहानी है "ऑल दी बेस्ट" की.

कथा वही पुराने ढंग की है जैसे हर कॉमेडी फिल्म में होती है. इस तरह के फिल्म्स में पटकथा और निर्देशन की कलाकारी ही इन चलचित्र को सफल या असफल बनाने में महत्वपूर्ण होती है.

पटकथा:
रोबिन भट और युनुस सजावाला की पटकथा शुरुवात के चालीस मिनट तक दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में असफल होती है. वीर और प्रेम के उटपटांग हरकतों को मजेदार तरीके से कथन करने में लेखक कामयाब नहीं हो पाए है. ऐसा लगता है के जबरदस्ती से हँसा ने की कोशिश हो रही है.

पर जैसे ही धरम याने अपने संजूबाबा का आगमन कहानी में होता है, कहानी जोर पकड़ लेती है और दर्शकों को हसी से सराबोर कर देती है. कहानी में बहुत सरे किरदार है और उपकहानिया है जो मजेदार है और हँसाने में कामयाब होती है.

वैसे भी इस प्रकार के चलचित्र को देखने के लिए आपने अपना दिमाग घर में फ्रीज में ही रख के जाना जरुरी है. तभी आप इस प्रकार के विनोद का आनंद ले सकते हो.

दिग्दर्शन:
रोहित शेट्टी निर्देशन पे तो अब सबको ही पूरा भरोसा. और इसबार शुरुवाती कुछ वक़्त छोड़ दिया तो वोह अपने कार्य में पूरी तरह से सफल हुए है. हालाँकि वो अपने पुराने फिल्मो की तरह एक अमिट छाप नहीं छोड़ पाए है. कुछ ऐसे विनोदी दृश्य जिसे हम दिग्दर्शक की प्रतिभा का अविष्कार कह सकते है, वैसे दृश्य इसबार रोहित नहीं दे सके है इस कारण यह एक माध्यम दर्जे की मनोरंजक फिल्म है जो पूरी फॅमिली और दोस्त एकसाथ मिल के देख सकते है.

अभिनय:
अभिनय के मापदंड पे संजय दत्त फिर से साबित कर देते है के वोह कॉमेडी के बादशाह है (याद है ना मुन्ना भाई?). जब भी वोह परदे पे आते है तो चित्रपटगृह हसी से भर जाता है. इसलिए मैंने शीर्षक में संजू "बाबा" का चमत्कार ऐसे लिखा है. "बाबा" शब्द क्यूँ वापरा है ये आपको फिल्म देख के समझ आएगा. फरदीन और अजय का अभिनय ठीक ठाक है. बिपाशा ने अच्छी तरह से सहयोग दिया है. मुग्धा गोडसे को जादा रोल नहीं है और उनके सजोसज्जा पे उन्हें जादा ध्यान देना चाहिए. कॉमेडी में वो इतना असरदार अभिनय नहीं कर पाई है. जोनी लीवर पुरे फिल्म के गूंगे रहने के कारण म़जा थोडा किरकिरा हो जाता है. संजय मिश्रा (जो गोलमाल में खलनायक रहते है) वोह इस बार भी हमें हसी से लोटपोट होने पे मजबूर कर देते है. विजय पाटकर और अतुल परचुरे जैसे अदाकारों ने भी अपना काम बखूबी निभाया है.

संगीत:
चलचित्र का संगीत मनोरंजक है. प्रीतम एक बार फिर अपने कार्य में सफल हुए है.

चलचित्रंकन और एक्शन:
चलचित्रंकन उत्तम है और ऊँचे दर्जे के निर्मिती मूल्य चलचित्र को दर्जेदार बनता है.

संकलन:
चलचित्र का संकलन शुरुवात के चिलीस मिनिट में बेहतर हो सकता था. शुरुवात में ही दो गाने ड़ाल के कथा कथन में रुकावट होती है. वोह कही और भी डाले जा सकते थे.

लेखाजोखा:
दिवाली के अवसर पर ख़ुशी और हसी से भरपूर वक़्त गुजरने के लिए ये फिल्म ठीक है अगर आप शुरुवाती शिथिलता और कुच्छ दृश्य जो जबरदस्ती से हँसाने की कोशिश करते है, उन्हें नजर अंदाज करने के लिए टायर है तो. बाकी आपकी मर्जी.

हमारे तरफ से तो आपको दिवाली के लिए "ऑल दी बेस्ट"!

चित्रपट समीक्षक: --- प्रशेन ह.क्यावल

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2 बैठकबाजों का कहना है :

Shamikh Faraz का कहना है कि -

बहुत ही अच्छी समीक्षा की है आपने. हर चीज़ को खुलकर बयां किया है चाहे वह संगीत हो या एक्शन. साथ ही फिल्म की स्टोरी सुनवाने के लिए धन्यवाद.

सजीव सारथी का कहना है कि -

all the best dekhi...khoob badhiya lagi hamen to....2 ghante ka full to entertainment hai masti hai, sab kuch bhool kar enjoy kijiye....good diwali gift from rohit shetty

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