Wednesday, February 11, 2009

हमारे आधुनिक जंगल मुंबई में आपका "हार्दिक" स्वागत है....

डिस्कवरी चैनल पर बेहद चर्चित कार्यक्रम है “MAN Vs WILD”….बियर ग्रिल्स इस शो को प्रस्तुत करते हैं....बियर इस शो में कई हैरतअंगेज़ कारनामे करते हैं......चैनल के हर एपिसोड में वो कभी बीहड़ जंगल में, किसी टापू पर, उजा़ड़ रेगिस्तान, पहाड़ों, समंदर या किसी भी ऐसी ही सुनसान जगह पर पाये जाते हैं....और फिर, उस पूरे एपिसोड के दौरान वो ऐसी कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की अजीब तरक़ीब दिखाते हैं.....कभी किसी जंतु का कच्चा मांस खाते हैं तो कभी मल-मूत्र तक ही पी जाते हैं..फिर बताते भी हैं कि इन पदार्थों में कई तरह के प्रोटीन व पोषक तत्व पाये जाते हैं जो बहुत ही लाभप्रद हैं.....अब जबकि जंगल, पहाड़, रेगिस्तान आदि घटते जा रहे हैं (ये भी मंदी का असर कहा जा सकता है) तो बियर भाई के पास भी ऐसे बीहड़ प्रदेशों के लाले पड़ जायेंगे.....तो हार्दिक मेहता ने सोचा कि डिस्कवरी का थोड़ा भला किया जाए और उन्हें इस शो को जारी रखने के नये तरीके सुझाए जाए....बियर भाई को मिली ये मुफ्त की सलाह बैठक पर हाज़िर है....

प्रिय बियर,
अगर आपको लगता है कि सुनसान रेगिस्तान और बीहड़ जंगल सिर्फ़ प्रकृति की गोद में ही उपलब्ध हैं, तो दोबारा सोचिए....हम भी एक जंगल में रहते हैं जिसका नाम है मुंबई.....यहां हर तरह की प्रजातियां उपलब्ध हैं....अगर आप यहां अकेले छोड़ दिये गये तो मैं शर्तिया कहता हूं कि कई एपिसोड तक आप मुंबई छोड़ नहीं पायेंगे....न शारीरिक तौर पर और न दिमाग़ी तौर पर....दरअसल, ये शहर आपसे कभी बाहर नहीं आ पायेगा.....आप जैसे विदेशी भाई इसे मायाजाल कहते हैं...हम अंग्रेज़ी सीखकर इसे “मैट्रिक्स” कहते हैं....ख़ैर, मुद्दे से भटक रहा हूं....मैं आपको दस चुनौती भरी परिस्थितियां देता हूं, आप कैसे इनसे निबटते हैं, आपका सिरदर्द है....लेकिन, इतना ज़रूर है कि अगर ये दस उलझनें आपने दूर कर दीं तो समझिए ये मुंबई की मिडिल क्लास के लिए वरदान साबित होगा....ये भी बता दूं कि हमारी मिडिल क्लास इतनी बड़ी है कि आप जिस शहर में रहते हैं, वैसे कई शहर इनके लिए कम पड़ जायेंगे.....तो, दस करोड़ (लोगों) के लिए ये रहे दस सवाल....आपका समय शुरू होता है अब.....

1) मान लें कि आप उत्तरी मुंबई में रहते हैं.... अगर आप ठीक 6 बजे सुबह नहीं उठते हैं तो मुंबई के दक्षिणी कोने में ठीक 9:30 बजे अपने ऑफिस कैसे पहुंच पायेंगे ???.....(नहले पे दहला : 6:10 मिनट पर भी उठकर ये सोचना आपकी सबसे बड़ी भूल होगी..)
2) अगर आज संडे नहीं है तो चर्चगेट की एक फास्ट लोकल ट्रेन में सुबह के आठ से 11 बजे और शाम पौने सात से साढे दस के बीच औप कैसे घुसेंगे?? (सोचिए, सोचिए..... ट्रेन पर छत तो तो है मगर ये ट्रेन बिहार नहीं जाती !!!.....)
3) सड़क के दोनों तरफ़ वन-वे ट्रैफ़िक है.....दिन के चौबीसों घंटे में कभी भी चकाला पेट्रोल पंप से आप ट्रैफिक से बच कर कैसे निकल सकते हैं.....?? (आप चाहें तो अपनी लोकेशन 7 बंग्ले से अंधेरी जाने वाले रास्ते को भी चुन सकते हैं...)
4) मान लें कि मुंबई के किसी भी स्थान पर आप पहुंचे हैं और किसी मुंबई वाले से बात कर रहे हैं या किसी दीवार से सटकर खड़े हैं.........लाख चाहकर भी उस “चमत्कारी पीक/थूक” से बचकर दिखाएं जो उनके मुंह से स्वाभाविक निकलती है या फिर दीवारों पर पायी जाती है.....
5) बियर भाई, ये बताएं कि मुंबई में कहीं भी किसी डर्टी इंडियन की कमीज़ से आ रही निरंतर दुर्गंध से बचने का कोई उपाय है आपके पास ?? (चाहें आप दो सेकेंड के लिए ही क्यों न खड़े हो जायें....)
6) अगर मुंबई के ऑटोचालक हड़ताल पर हों तो घर से बाहर कैसे निकल पायेंगे...(बताइए, बताइए...)
7) मान लें कि आप हिंदी सीख जाते हैं या फ़िर मराठी.....फिर, एक अधेड़ उम्र के मराठी से हिंदी में बात कर के देख लें, फिर बताएं कि “सेना” की कार्रवाई से कैसे बच पायेंगे....
8) हफ्ते के किसी भी दिन मुंबई में छुट्टियां मनाने के लिए एक “एकांत” स्थल ढूंढकर दिखा दीजिए ?? (आप मुंबई के आस-पास की 100 मील तक मगजमारी कर सकते हैं...)
9) मंदी के इस दौर में एक नौकरी ढूंढ कर दिखाएं.....(डिस्कवरी चैनल में सैलेरी तो टाइम से मिल रही है ना.....)
10) आप अलग-अलग जगहों पर घूमते हैं, बिल्कुल अकेले......ज़रा मुंबई के किसी इलाके में, खासकर किसी ऐसे रेलवे स्टेशन पर जाकर दिखाएं जहां कोई लावारिस लाश न पड़ी हो.....

बियर भाई....ये स्लमडॉग के फिल्मी सवाल नहीं है...ये हमारा सबसे आधुनिक जंगल है.....अद्भुत, अद्वितीय....आपका स्वागत है यहां....यहां हर किसी के लिए जगह है, कभी भी, कहीं भी.......

हार्दिक मेहता

हिंदी में अनुवाद : निखिल आनंद गिरि

Tuesday, February 10, 2009

आतंकवाद का गांधीवादी जवाब

बहुत-से लोग पूछते हैं कि आतंकवाद की समस्या का समाधान करने के लिए क्या गांधीवाद के पास कोई कार्यक्रम है? काश, इस प्रश्न के पीछे किसी प्रकार की जिज्ञासा होती! समाधान वहीं निकलता है जहां जिज्ञासा होती है। जब मजाक उड़ाने के लिए कोई सवाल किया जाता है, तो समाधान होता भी है तो वह छिप जाता है। यह ट्रेजेडी गांधीवाद के साथ अकसर होती है। ज्ञात गांधीवादियों ने भी ऐसी कोशिश नहीं की है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गांधीवाद की झोली में हर समस्या का कुछ न कुछ इलाज जरूर है। दरअसल, वही विचारधारा व्यापक तौर पर स्वीकार्य हो सकती है जिसमें जीवन के अधिकांश प्रश्नों का हल निकालने की संभावना हो। लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जीवन कभी भी समस्यारहित हो सकता है। कोई भी विचारधारा यह जादू कर दिखाने का दावा नहीं कर सकती। इसलिए गांधीवादी भी अपने को सत्य का अन्वेषक ही मानता है -- सत्य का गोदाम नहीं।

जब सामना प्रत्यक्ष हिंसा -- चाहे व्यक्ति द्वारा चाहे हिंसक समूह द्वारा -- से हो, उस वक्त क्या करना चाहिए, इसका कोई तसल्लीबख्श जवाब किसी के भी पास नहीं है। तनी हुई बंदूक के सामने दिमाग फेल हो जाता है। उस वक्त मैदान संवेग के हाथ में आ जाता है। संवेगों को भी प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है। अन्यथा वे अपने आदिम, अराजक रूप में प्रकट होते हैं और कई लाख वर्ष पुराना हुक्म दुहराते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर है। क्या यह सुझाव सफलता का आश्वासन देता है? संवेग को इससे कोई मतलब नहीं। वह तो उबल रहे खून की आवाज होती है, जिसे भविष्य की कोई फिक्र नहीं होती। अगर हर मामले में र्इंट का जवाब पत्थर से देने की थोड़ी भी संभावना होती, तो र्इंट उठाने का चलन ही मिट जाता। गांधी का रास्ता अहिंसक प्रतिरोध का है, जिसमें आक्रमणकारी के प्रति भी प्रेम रहता है। अगर मानवता का अधिकांश हिस्सा इस जीवन प्रणाली को स्वीकार कर लें, तो हिंसा को मिलनेवाली सफलता का अनुपात बहुत नीचे चला जा सकता है।

जब लोग आतंकवाद के गांधीवादी समाधान के बारे में पूछते हैं, तो उनका आशय यह होता है कि सारी वर्तमान व्यवस्था यूं ही चलती रहे और तब बताओ कि गांधीवादी रास्ता आतंकवाद को खत्म करने का क्या तरीका सुझाता है। यह कुछ इसी तरह का पूछना है कि मैं यही सब खाता-पीता रहूं, मेरी जीवन चर्या में कोई परिवर्तन न आए और मेरी बीमारी ठीक हो जाए। यह कैसे हो सकता है? जिन परिस्थितियों के चलते आतंकवाद पनपा है, उन परिस्थितियों के बरकरार रहते आतंकवाद से संघर्ष कैसे किया जा सकता है? गांधीवाद तो क्या, किसी भी वाद के पास ऐसी गोली या कैप्सूल नहीं हो सकता जिसे खाते ही हिंसा के दानव को परास्त किया जा सके। जब ऐसी कोशिशें नाकाम हो जाती है, तो यह सलाह दी जाती है कि हमें आतंकवाद के साथ जीना सीखना होगा।

आतंकवाद के दो प्रमुख उत्स माने जा सकते हैं। एक, किसी समूह के साथ अन्याय और उसके जवाब में हिंसा की सफलता में विश्वास। दो, आबादी की सघनता, जिसका लाभ उठा कर विस्फोट के द्वारा जानमाल की क्षति की जा सके और लोगों में डर फैलाया जा सके कि उनका जीवन कहीं भी सुरक्षित नहीं है। गांधीवादी मॉडल में जीवन की व्यवस्था इस तरह की होगी कि भारी-भारी जमावड़ेवाली जगहें ही नहीं रह जाएंगी। महानगर तो खत्म ही हो जाएंगे, क्योंकि उनकी कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। लोग छोटे-छोटे आधुनिक गांवों में रहेंगे जहां सब सभी को जानते होंगे। स्थानीय उत्पादन पर निर्भरता ज्यादा होगी। इसलिए बड़े-बड़े कारखाने, बाजार, व्यापार केंद्र वगैरह अप्रासंगिक हो जाएंगे। रेल, वायुयान आदि का चलन भी बहुत कम हो जाएगा, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोग हर समय परिवहन के तहत रहे, यह पागलपन के सिवाय और कुछ नहीं है। वर्ष में एक-दो बार लाखों लोग अगर एक जगह जमा होते भी हैं जैसे कुंभ के अवसर पर या कोई राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए, तो ऐसी व्यवस्था करना संभव होगा कि निरंकुशता और अराजकता न पैदा हो। इस तरह भीड़भाड़ और आबादी के संकेंद्रण से निजात मिल जाएगी, तो आतंकवादियों को प्रहार करने के ठिकाने बड़ी मुश्किल से मिलेंगे।

लेकिन ऐसी व्यवस्था में आतंकवाद पैदा ही क्योंकर होगा? बेशक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन संगठित हिंसा की जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि किसी भी समूह के साथ कोई अन्याय होने की गुंजाइश न्यूनतम हो जाएगी। राज्य न्यूनतम शासन करेगा। अधिकतर नीतियां स्थानीय स्तर पर बनाई जाएंगी, जिनका आधार सामाजिक हित या सर्वोदय होगा। मुनाफा, शोषण, दमन आदि क्रमश: इतिहास की वस्तुएं बनती जाएंगी। जाहिर है, सत्य और अहिंसा पर आधारित इस व्यवस्था में सांप्रदायिक, नस्ली या जातिगत विद्वेष या प्रतिद्वंद्विता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाएगा। हिंसा को घृणा की निगाह से देखा जाएगा। कोई किसी के साथ अन्याय करने के बारे में नहीं सोचेगा। अभी तक के अनुभवों को देखते हुए यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इस तरह का समाज कभी बन सकेगा या नहीं। शायद नहीं ही बन सकेगा। लेकिन हमें इसकी आशा भी नहीं करनी चाहिए। पूर्णता की कामना ही मनुष्य की किस्मत में है, पूर्णता नहीं। लेकिन इतिहास की गति अगर हिंसा से अहिंसा की ओर, अन्याय से न्याय की ओर तथा एकतंत्र या बहुतंत्र से लोकतंत्र की ओर है, जो वह है, तो कोई कारण नहीं कि ऐसा समाज बनाने में बड़े पैमाने पर सफलता न मिले जो संगठित मुनाफे, संगठित अन्याय और संगठित दमन पर आधारित न हो। केंद्रीकरण -- सत्ता का, उत्पादन का और बसावट का -- अपने आपमें एक तरह का आतंकवाद है, जिसमें तरह-तरह का आतंकवाद पैदा होता है। आतंकवाद सिर्फ वह नहीं है जो आतंकवादी समूहों द्वारा फैलाया जाता है। आतंकवाद वह भी है जो सेना, पुलिस, कारपोरेट जगत तथा माफिया समूहों के द्वारा पैदा किया जाता है, जिसके कारण व्यक्ति अपने को अलग-थलग, असहाय और समुदायविहीन महसूस करता है।

ऐसा नहीं मानना चाहिए कि जिन समाजों में आतंकवाद की समस्या हमारे देश की तरह नहीं है, वे कोई सुखी समाज हैं। एक बड़े स्तर पर आतंकवाद उनके लिए भी एक भारी समस्या है, नहीं तो संयुक्त राज्य अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध विश्वयुद्ध नहीं चला रहा होता। लेकिन जिस जीवन व्यवस्था से आतंकवाद नाम की समस्या पैदा होती है, उससे और भी तरह-तरह की समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें पारिवारिक तथा सामुदायिक जीवन का विघटन एवं प्रतिद्वंद्विता का निरंतर तनाव प्रमुख हैं। इसलिए हमें सिर्फ आतंकवाद का ही समाधान नहीं खोजना चाहिए, बल्कि उन समस्याओं का भी समाधान खोजना चाहिए जिनके परिवार का एक सदस्य आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। इस खोज में गांधीवाद सर्वाधिक सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा अटल विश्वास है।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

Monday, February 09, 2009

22 फरवरी को राँची में जमा होंगे कलकतिया और झारखण्डी ब्लॉगर

कल मुझे एक ईमेल-निमंत्रण मिला, जिसमें लिखा था कि १० फरवरी २००९ को मेरठ विश्वविद्यालय में रवि पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक 'एटूजेड ब्लॉगिंग' का विमोचन होना है। किसी भी तरह की जानकारी और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में पॉकेट बुक्स ने अहम भूमिका निभाई है। याद कीजिए 'कौन सी ऐसी मछली है जो हवा में उड़ती है, पानी में तैरती है और जमीन पर चलती है?, कौन सा पेड़ है जो लोगों को खा जाता है? कौन सा ऐसा पहाड़ है जो रोज़ रंग बदलता है?' जैसे रसदार सवालों का पुलिंदा बस से लेकर ट्रेन में बिकता है। हर आम-खास इससे परिचित हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग जो कि २००२ में शुरू हुई, २००९ के शुरू में ही पॉकेट बुक्स में घुस गई, तो निश्चित रूप से सफलता का स्वाद इसने बहुत जल्दी चख लिया। एक पॉकेट बुक्स से इस तरह की पुस्तक आने का फायदा यह होगा कि इसे लगभग हर पॉकेट बुक्स वाला प्रकाशित करेगा। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले २-३ महीनों में आप दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगर घूमने आये तों बसों-ट्रेनों में देखें कि ब्लॉगिंग की यह किताब रु १० में बिक रही है और साथ में चुटकुलों और देवर-भाभी की शायरियों की २-३ किताबें मुफ्त हैं।

अभी २८ दिसम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। हिन्द-युग्म ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर है, भाषा को लेकर गंभीर है, इसका उद्घोष तो यह २००८ के विश्व पुस्तक मेले में अपना स्टैंड लगाकर ही दे चुका था। लेकिन २८ दिसम्बर के कार्यक्रम में साहित्यशिखर राजेन्द्र यादव आये तो लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ। हम इसके जो सकारात्मक परिणाम आँक रहे थे, वह हुए।

चोखेरबालियों ने ६ फरवरी २००९ को अपना सालाना जलसा मनाया। राजकिशोर, अनामिका जैसे विद्वजन आये और ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों का जज्बा देखा और महसूस किया। इसी तरह से जमीनी और वर्चुयल दुनिया में बराबर दखल रखने वाली एनजीओ 'सफ़र' ने भी राजेन्द्र यादव द्वारा उन्हीं की लघुकथाओं के पाठ के माध्यम से इंटरनीय दुनिया की सजीव उपस्थिति को मुखरित किया।

हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा जुड़ाव ३२ महीना पुराना है। इस दौरान इस माध्यम के झंडारोपण के लिए मैं शहरो-कस्बों तक गया हूँ। लेकिन कभी झारखण्ड-बिहार जाने का मौका नहीं मिला। दिसम्बर में कोलकाता के ब्लॉगर अमिताभ मीत से जब मुलाक़ात हुई, उन्होंने मुझे कोसा कि यार कोलकाता और हजारीबाग के बीच सैकड़ों ब्लॉगर रहते हैं, हिन्दी-प्रेमियों का इलाका है, कभी उधर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम करो तो बात बने।

मैंने गूगल किया तो पाया कि बात सही है। कुछ को पहले से जानता था, कुछ को नहीं। कुछ को फोन सेतो कुछ को ईमेले से पकड़ा और आखिरकार कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डॉ॰ भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया। साथ में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखण्डी ने संयोजन की बागडौर सम्हाली।

यह कार्यक्रम में रविवार २२ फरवरी २००९ को राँची में सुबह ११ बजे से आयोजित होने जा रहा है, जिसमें ब्लॉगर साथी तो एक-दूसरे से मिलेंगे ही साथ में दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, आई-नेक्सट के प्रधान सम्पादकों (जैसे संत शरण अवस्थी, हरिनारायाण, हरिवंश॰॰॰॰) के इस विधा पर विचार आयेंगे, मैं ब्लॉगिंग से कम परिचित या न परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराऊँगा, पारूल चाँद पुखराज गायेंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार की अपने अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। अभी यह अंतिम रूपरेखा नहीं है, कुछ और ब्लॉगर-वक्ता भी जुड़ेंगे।

झारखण्ड के ब्लॉगरों की यह शिकायत रही है कि वहाँ ब्लॉगिंग-स्लॉगिंग की फालतू की चीज माना जाता है। शायद यह पहल इसे ज़रूरी मानने का बीज रोप दे।

बहुत से ब्लॉगरों ने अभी तक ईमेल का जवाब भी नहीं दिया है। अब पोस्ट पढ़कर सम्मिलित होने का कंफर्मेशन तो दे दें। जिन ब्लॉगरों ने आने की पुष्टि की है, वे हैं-

अमिताभ मीत (कोलकाता)
शिव कुमार मिश्रा (कोलकाता)
बालकिशन (कोलकाता)
शम्भू चौधरी (कोलकाता)
रंजना सिंह (जमशेदपुर)
श्यामल सुमन (जमशेदपुर)
पारूल चाँद पुखराज (बोकारो)
संगीता पुरी (बोकारो)
मनीष कुमार (राँची)
नदीम अख्तर (राँची)
घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखंडी (राँची)
डॉ॰ भारती कश्यप (राँची)
निराला तिवारी (राँची)
संध्या गुप्ता (दुमका)
सुशील कुमार (चाईंबासा)
शैलेश भारतवासी (दिल्ली)
लवली कुमारी (धनबाद)
अभिषेक मिश्र (वाराणसी)

अब न कहना इसे अंट-शंट, न कहना आलतू-फालतू।

Sunday, February 08, 2009

जीरा : तड़का होगा अब फीका

इस वर्ष दाल और सब्जी में जीरे का तड़का फीका रहने का अनुमान है क्योंकि प्रतिकूल मौसम के कारण देश में इसका उत्पादन कम होने की आशंका है। उत्पादन कम होने की आशंका से बाजार में स्टॉकिस्ट सक्रिय हो गए हैं और पिछले एक महीने के दौरान जीरे के भाव में थोक बाजार में लगभग 400 रुपए प्रति क्विंटल की तेज़ी आ चुकी है। उत्पादन, स्टॉक, घरेलू खपत और निर्यात को देखते हुए आगामी महीनों में इसके भाव में और तेजी के अनुमान हैं।
इस वर्ष देश में जीरे का उत्पादन 25 लाख बोरी होने का अनुमान है जो गत वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम होगा। उत्पादन में कमी का कारण गुजरात और राजस्थान में मौसम खराब होना है। देश में जीरे का उत्पादन केवल इन दो ही राज्यों में होता है।
जहां इस वर्ष जीरे का उत्पादन कम है वहीं इसका पुराना स्टॉक भी कम है। एक अनुमान के अनुसार बकाया स्टॉक लगभग 6 लाख बोरी ही है जबकि गत वर्ष यह लगभग 10 लाख बोरी था। इस प्रकार कुल उपलब्ध्ता लगभग 35 लाख बोरी होगी।
विश्व बाजार में कमी को देखते देश से जीरे के निर्यात में भी वृद्वि हो रही है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से दिसंबर तक कुल 28,500 टन जीरे का निर्यात किया जा चुका है जबकि गत वर्ष की इसी अवधि में निर्यात 18,855 टन ही था।
विश्व बाजार की स्थिति को देखते हुए आगामी वर्ष भी जीरे के निर्यात में बढ़ोतरी का अनुमान है। विश्व में जीरे का उत्पादन भारत के अलावा तुर्की, सीरिया, इराक, चीन आदि में होता है। भारत में कुल जीरा उत्पादन का केवल 10 प्रतिशत के आसपास ही निर्यात किया जाता है जबकि अन्य देश अपने कुल उत्पादन का 90 प्रतिशत निर्यात करते हैं।
प्रतिकूल मौसम के कारण इस वर्ष लगभग हर उत्पादक देश में जीरे का उत्पादन कम है। इससे निसंदेह भारत से अधिक मात्रा में इसका निर्यात किया जाएगा।
एक ओर निर्यात में वृद्वि का अनुमान है तो दूसरी ओर कुल उपलब्धता कम हो रही है। इससे आने वाले महीनों में जीरा का तड़का फीका हो सकता है।
राजेश शर्मा

Saturday, February 07, 2009

सोने का पिंजर (4)

चौथा अध्याय

"बेटा कमाता है डॉलर और मां-बाप रुपैया..."

ख़ैर, हम भी लाखों माँ-बापों की तरह दौबारा भी असफल हो गए। कहते हैं भारत में व्यक्ति के पास पैसा हो या न हो लेकिन स्वाभिमान पूरा होता है। ग़रीब आदमी के पास तो कुछ ज्यादा ही होता है। धनवान तो स्वाभिमान बेचकर ही धनवान बना है तब उसके पास तो यह नहीं होता लेकिन बेचारा ग़रीब तो ग़रीब ही इसलिए है कि उसने कभी अपने लिए किसी से नहीं माँगा। जो भी मिला उसे भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार किया। अतः हमारे स्वाभिमान ने भी हमें प्रताड़ित किया और कहा कि बस अब बहुत हो गया, अमेरिका जाने का चाव। बार-बार जाकर अपना अपमान कराने से तो अच्छा है कि अपनी ममता का ही गला घोंट लो। बच्चों से कह दो कि यदि तुम्हें भारत की और वहाँ बसे माता-पिता की याद आ जाए तब तुम्हीं आ जाना। लेकिन परिस्थितियां कब किसके रोके रुकी हैं? वे तो कभी भी एक-दूसरे की आवश्यकता अनुभव करा ही देती है। किसका मन नहीं होता कि बेटे की गृहस्थी जाकर देखें या बेटी का सुख। लेकिन जब रिश्तों पर पहरे बिठा दिए गए हों तब तो आदमी मन मसोसकर ही रहेगा न? बेचारा इंसान कर भी क्या सकता है।
मुझे बचपन में माँ के द्वारा सुनी कहानी याद आती है। जब बहन की शादी दूर-दराज के गाँव में हो जाती थी और भाई उससे मिलने जाता था तब कितने पापड़ बेलने पड़ते थे? लेकिन वो दूरी तो दस-बीस कोस की ही थी अतः सारे संघर्षों के बाद भी मिलना सम्भव हो ही जाता था। लेकिन सात समुन्दर पार ऐसे ही तो नहीं पहुँचा जा सकता? फिर कोलम्बस वाला जमाना भी गया कि स्वयं का जहाज लेकर निकल पड़े दुनिया नापने, या खोजने। अब तो सारी व्यवस्था ही चाक-चौबंद हैं।
हमारे एक मित्र ने एक ताना मारा, बोले कि अरे अमेरिका नहीं गए? फिर स्वतः ही बोले कि अरे अभी तुम्हारा वहाँ क्या काम? जब बाल-बच्चा होता है तब जाते हैं भारतीय माता-पिता तो। हम जानते हैं कि तुम्हारे यहाँ तब भी जरूरत नहीं होती हमारी। हमारे जैसे नहीं कि घर में जापा होने वाला है तो कम से कम दो-तीन औरते तो चाहिए हीं। एक अस्पताल जाएगी, एक घर देखेगी और एक बारी-बारी से उनका सहयोग करेगी। हमारे यहाँ कितनी निकटता आ जाती है, सास-बहू के रिश्तों में। जब बहू दर्द से छटपटा रही होती है तब सास उसके सर पर हाथ फिराती है, भगवान से प्रार्थना करती है। जापे में कैसे तो खुशी-खुशी सारे ही काम करती है। तभी तो प्यार बढ़ता है। लेकिन तुमने इन सारे सुखों को भी छीन लिया है। हमारे यहाँ से बहुत सी सास और बहुत सी माँ वहाँ जाती हैं लेकिन फिर कहती हैं कि अरे मेरा तो यहाँ कोई काम ही नहीं है। लेबर रूम तक में पति ही जाता है, बेचारी महिला तो बाहर ही बैठी रहती है। पोतड़े धोने और सुखाने का सुख भी नहीं। सब कुछ डिस्पोज़ेबल है, पति ही सबकुछ कर देता है। लेकिन फिर भी लगता है कि कोई न कोई तो पास रहना ही चाहिए। भारतीय मन मानता ही नहीं। कैसे अकेला छोड़ दे? हमारे यहाँ तो कहा जाता है कि औरत का दूसरा जन्म होता है। सचमुच में होता भी है, उस एक मिनट में एक नवीन जीव जन्म लेता है तो दूसरा अपना अस्तित्व बचाता है। ऐसे में कैसे छोड़ दें अकेला?
तुमने परिवार की जरूरतों को समाप्त किया है, लेकिन हमने नहीं किया। हमें तो आज भी लगता है कि हमारी जरूरत है। मेरे साथ तो कैसा संयोग था कि जब पोता आने वाला था तब वह स्वयं ही आकर मुझे न्यौता दे गया था कि दादी मैं आ रहा हूँ। बहू भारत आयी थी, जैसे ही उसने भारत की धरती पर कदम रखा, पोते के आने के संकेत मिलने लगे। मेरा खून सबसे पहले मुझे बताने चला आया कि मैं आ रहा हूँ। अब हमारी चिन्ताएं बढ़ गयी। तुम्हारे पहरे को कैसे तोड़ेंगे? मैंने पहले गुस्से में भगवान से कह दिया था कि अब मैं मेरे स्वाभिमान को नहीं गिरवी रखूँगी। अब तू ही मुझे ससम्मान अमेरिका भेजेगा तभी वहाँ जाऊँगी। अब मेरा धर्म-संकट पैदा हो गया। एक तरफ पोता खुद न्यौत गया था तो दूसरी तरफ मेरी प्रतिज्ञा। क्या करूँ और क्या न करूँ? लोग कहते हैं कि भगवान नहीं होता, मैं कहती हूँ कि होता है। मैंने प्रतिज्ञा की, भगवान ने सुनी और मुझे मौका दे दिया। तभी मेरे पास सूचना आयी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन इस बार अमेरिका में हो रहा है। मेरे लिए भगवान ने पुल बना दिया था, जैसे राम ने रामसेतु बनाया था। लेकिन फिर कठिनाई वीज़ा की ही थी। भगवान ने फिर मदद की। एक दिन संदेशा आया कि भारत सरकार तुम्हें सम्मानित कर रही है। मुझे वीज़ा की कार्यवाही नहीं करनी पड़ी। बस भारत सरकार का कागज़ लिया और चले गये तुम्हारे चित्रगुप्त के कार्यालय। साथ में पति भी थे, जिनकी डॉक्टरी के कारण हमारे पर प्रतिबंध लगा हुआ था। अब वे बोले कि मुझे तुम्हारे साथ जाने देंगे? मैंने कहा कि जब भगवान ने इतना किया है तो यह भी करेंगे। जीत गया हमारा भगवान और हार गए तुम। जीत गया हमारे खून का प्यार और धरे रह गए तुम्हारे पहरे। कृष्ण ने जब जन्म लिया था तब सारे पहरे तोड़कर वह यशोदा मैया की गोद में चले ही गए थे। कंस देखता ही रह गया था। ऐसे ही आखिर में ससम्मान तुम्हें हमें बुलाना ही पड़ा।
हम तुम्हारी धरती पर आ रहे थे, इसलिए नहीं कि तुम्हारी धरती को छूने में कोई गर्व था। बस हमारा रक्त हमें पुकार रहा था, सारा प्रयोजन बस यही था। मेरे स्वाभिमान की जीत हुई थी, मेरे प्रेम की जीत हुई थी। मैं जान गयी थी कि प्रेम में कितनी ताकत होती है? तुम हमारे रक्त को कितना ही हमसे दूर कर दो लेकिन संसार की कोई ताकत नहीं जो तुम्हारे मंसूबों को पूरा कर दे। हम भारतीय प्रेम को सबसे बड़ा मानते हैं, हम परिवार को अपने दिल में बसाकर चलते हैं, हम से परिवार छूट नहीं सकता। तुम एक पीढ़ी को हमसे दूर ले जा सकते हो, लेकिन दूसरी पीढ़ी स्वतः ही हमारी ओर खिंची चले आती है। मेरे इस उदाहरण से तो तुम भी मानने पर मजबूर हो जाओगे। तुम्हारा भौतिक सुख केवल चार दिनों की चाँदनी हैं, बस तुम देखते रहो, कुछ दिनों में ही हमारे भारतीय प्रेम की जीत होगी।
लेकिन जो कुछ भगवान ने किया, इसलिए नहीं कि मुझे साहित्यकारों के मध्य सम्मानित करवाना था अपितु इसलिए कि इस माध्यम से मुझे ससम्मान अमेरिका भेजना था। मेरे साथ राजस्थान का दल भी था। मैं उस दल की नेत्री भी थी, लेकिन भगवान चाहता था कि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो, मैं सम्मान सहित वहाँ जाऊँ। तुमने मेरे अंदर जो हीनता लाने का सकंल्प किया था उसे मेरे भगवान ने समाप्त कर दिया।
तुमने सिद्ध करने का प्रयास किया था कि तुम मेरे वैभव के समक्ष कुछ भी नहीं हो। मैं तुम जैसे नाचीज़ों को अपनी धरती पर पैर भी नहीं रखने दूँगा। तुमने हमारी संतानों में भी यही भाव भरने का प्रयास किया कि तुम्हारे माँ-बाप तुच्छ हैं, तुम डॉलर में कमाते हो और तुम्हारे माँ-बाप रूपयों में?
कहाँ तुम्हारा वैभव और कहाँ उनका?
तुम्हारे यहाँ बसे भारतीय हमें कहते हैं कि तुम डर्टी फैलो हो, तुम्हारे यहाँ क्या है? आओ हमारा वैभव देखो। हमारे घरों में गलीचे बिछे हैं, और तुम्हारे घरों में?
हमारी सड़कें काँच-सी चमकती हैं और तुम्हारी?
हम कहते कि वो तुम्हारा कैसे हो गया और यह केवल हमारा कैसे हो गया? चलो अच्छा है कि तुम्हारा वैभव बड़ा है तो थोड़ा हमें भी सुख दे दो।
वहाँ से गुर्राहट आती है कि यह सुख हमने अर्जित किया है, भला तुम्हें कैसे दे दें? तुम्हारा और हमारा स्टेटस बराबर कैसे हो सकता है? भले ही तुम हमारे माँ-बाप हो लेकिन अन्तर दिखायी देना चाहिए दो पीढ़ियों में।
बेचारा भारतीय पूछता है कि तुम जब छोटे थे तब हमने तो अन्तर नहीं रखा था, हमने सारे ही अपने सुख त्याग दिए थे जिससे तुम्हारा भविष्य सुखी हो सके। फिर आज क्या हुआ? हम भारतीय मानते हैं कि पच्चीस वर्ष हम संतान के लिए सुख तलाशते हैं और आने वाले पच्चीस वर्ष संतान तलाशे सुख माँ-बापों के लिए।
लेकिन तुमने ऐसी पट्टी आँखों पर बाँधी है कि उन्हें अब माता-पिता दिखायी ही नहीं देते। बेचारे वे भी क्या करें, यहाँ भारतीयों को लगता है कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन जब वहाँ देखते हैं कि अरे इनकी स्थिति तो हम से बहुत ही खराब है। भला दो-तीन हजार डॉलर में होता ही क्या है? हमारे यहाँ जिसे पाँच हजार रूपया मिलता है, वह भी पेट ही भरता है और वार-त्योहार मिठाई खा लेता है, मेले में जा आता है। तुम्हारे यहाँ भी पाँच हजार डॉलर वाला इंसान यही कर पाता है। कैसे बताए वह अपने माँ-बापों को कि केवल मुँह पर चिकनाई लगाकर घी खाना दिखा रहा हूँ।
खैर हमें भी अब अपने आप पर गर्व होने लगा। हमें भी लगा कि हम भी इंसानों की बिरादरी में शामिल हो गए हैं। शायद अब हमें भी हमारी संतानें इज्ज़त के साथ देख लें? मैंने देखे हैं भारत में ऐसे-ऐसे बागबां कि अमिताभ बच्चन जो अपने आप में सेलेब्रिटी थे, उनकी संताने तुम्हारे यहाँ चली गयीं और वे बेचारे रातो-रात बौने हो गए। उनका अस्तित्व नगण्य हो गया। सारी दुनिया उन्हें सम्मान से बात करती है लेकिन उनकी संताने उन्हें दो कौड़ी का समझती हैं। यह है तुम्हारा प्रभाव। क्या कोई सुंदर पिंजरे में रहने से श्रेष्ठ हो जाता है? हम भारत में पढ़ाते हैं कि जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे वो श्रेष्ठ होता है। हमारे यहाँ माता-पिता भगवान सदृश्य होते हैं। उनकी सेवा करना ही सबसे बड़ा पुण्य होता है। लेकिन तुमने सभी कुछ तो छीन लिया है। जो कभी भगवान थे आज वे तुम्हारे दर पर भिखारियों की तरह तुम्हारे रहमो-करम पर पड़े हैं। हमारे गाँव का व्यक्ति पूरे गाँव का चाचा, ताऊ बनकर राज करता है लेकिन तुम्हारे यहाँ ममता के लिए, दो रोटी खाकर वक्त बिताता है।
कितने हैं जो ममता को परास्त कर पाते हैं? कितने हैं जो दूसरों में अपनी ममता तलाशते हैं? शायद मुट्ठीभर होंगे हम जैसे स्वाभिमानी लोग जो दुनिया को अपना परिवार मानते हैं और भारत के प्रत्येक बच्चे को अपना बच्चा। हम ममता का विस्तार करते हैं इसलिए तुम्हारे द्वारा दिए हीनबोध को स्वीकार नहीं करते। हमारा भगवान भी नहीं करता, हमें वह भी कहता है कि मत स्वीकार करो हीनबोध, अपने स्वाभिमान से रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।
आखिर 12 जुलाई 2007 को मेरे हाथ में टिकट था। मैं तुम्हारी धरती पर आ रही थी। मेरा खून मुझे पुकार रहा था। उसे तुम्हारा नागरिक बने पाँच माह हो चुके थे और मैंने उसे अभी तक केवल कम्प्यूटर के सहारे ही देखा था। मेरे सामने केवल उसकी सूरत थी, और था एक काँच का पर्दा। मैं उसे देख सकती थी, बात कर सकती थी लेकिन उसे छू नहीं सकती थी। मेरी ममता कसमसा रही थी। मैंने उसे संसार में आते हुए नहीं देखा था, उस पारिवारिक अनुभव से मैं दूर रह गयी थी लेकिन अब मुझे उसके पास जाने से कोई नहीं रोक सकता था, तुम भी नहीं। मेरा मन कह रहा था कि मैं ज़ोर से चिल्लाऊँ और कहूँ कि ‘मैं आ रही हूँ अमेरिका’। तेरा सुख देखने, तेरा वजूद देखने, तेरा अभिमान देखने। मैं भी तो देखूँ कि तू कितना बड़ा है? ऐसा तेरा वैभव कितना बड़ा है? जो तू ममता को ही विस्मृत करा देता है? ऐसा क्या है तुझमें, जो मेरे भारत में नहीं है? मैंने तुझ पर विश्वास किया और अपने सारे दुखों को, अभावों को भारत में ही छोड़ दिया, केवल अब तो मुझे सुख ही सुख जो देखना था। मेरा तन और मन यहाँ तक की आत्मा भी आप्लावित होने वाली थी तेरे सुख से। देखूँ कितना सुख है तेरी धरती पर?

डॉ अजित गुप्ता