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Wednesday, March 04, 2009

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या यूँ ही बढ़ती रहेगी

२२ फरवरी २००९ की ब्लॉगर-मीट का निष्कर्ष

वैसे जब कहीं भी और कभी भी २-४ ब्लॉगर मिलते हैं, हम उसे ब्लॉगर-मीट की ही संज्ञा देते रहे हैं। इस तरह से तो कम से कम १० ब्लॉगर मीट रोज़ाना होती होंगी। ज़रा सोचिए जिस परिवार का १ से अधिक सदस्य ब्लॉगर हों, वहाँ क्या हालत होती होगी। लेकिन २२ फरवरी २००९ को राँची में हुआ हिन्दी चिट्ठाकारों का सम्मेलन कई मायनों में एक औपचारिक और बड़ा आयोजन था।

बहुत सी रपटों में आपने पढ़ा कि इस आयोजन को लेकर जो-जो योजनाएँ बनाई गई थीं, वो सभी पूरी नहीं हो पाईं, फिर भी हिन्दी का इंटरनेट पर मिजाज समझने का अवसर ज़रूर मिल गया। अमिताभ मीत के साथ मिलकर जब मैं इस आयोजन की रूपरेखा खींच रहा था तब मैंने मात्र कोलकाता से हजारीबाग की भौगोलिक सीमाओं में रहने वाले ब्लॉगरों को पकड़ने का निश्चय किया था। हमें यह डर था कि दूरी अधिक होने से शायद लोग कम रुचि लेंगे। ईमेल/फोन से संपर्क स्थापित करने के तुरंत बाद कम से कम हमारा अंदाज़ा ठीक ही सिद्ध हो रहा था। लेकिन जब कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, राँची की निदेशक भारती कश्यप ने आयोजन के खर्च का भार उठाने की बात की और इसे ब्लॉगरों ने सुना तब रेस्पॉन्स अच्छे मिलने लगे।

मनीष कुमार ने फोन पर कहा भी कि हमें वाराणसी (यह शहर भी राँची के क़रीब है) और बिहार के भी ब्लॉगरों को बुलाना चाहिए। जैसे लवली कुमारी के माध्यम से वाराणसी से अभिषेक मिश्र कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ सकते हैं, उसी तरह से वहाँ के अन्य ब्लॉगर भी आ सकते हैं। जब कोलकाता तक से कुछ ब्लॉगर (शिवकुमार मिश्रा और अमिताभ मीत) राँची आने की बात सोच सकते हैं, फिर पटना, दरभंगा से क्यों नहीं। आखिर यह भी वन नाइट जर्नी ही तो है। फिर मुझे भी ऐसा लगा कि इस पर पहले से काम किया गया होता तो यह जमावाड़ा और विराट हो सकता था।

जुलाई २००७ से मैंने टेलीफोन के द्वारा कम्प्यूटर पर 'यूनिकोड (हिन्दी) का इस्तेमाल और ब्लॉग बनाने की विधि' के संदर्भ में लोगों की मदद करनी शुरू की थी (यूनिप्रशिक्षण)। बाद में सार्वजनिक रूप से क्लॉसरूमों में पहुँचा। उस समय से लेकर अब तक इतनी ही कोशिश रही कि सामने वाला हिन्दी और ब्लॉगिंग से जुड़ जाये, आगे वह अपने रास्ते और ब्लॉग का चरित्र खुद बना लेगा। मैंने भी यही मानकर किसी भी सामान्य मुलाक़ात में ब्लॉग के अनुप्रयोग के बड़े फलक की बात नहीं की।

लेकिन हाँ, जहाँ-जहाँ मैंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इसके बारे में बताया, वहाँ खूब बताया। इसका जितना और जिस तरह का इस्तेमाल मैंने किया, वह भी और बाकी दुनिया में जहाँ-जहाँ जितने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल हो रहा है, वह भी। और मुझे खुशी है सबसे अधिक उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ भी मुझे झारखण्ड से ही मिलीं। १४ फरवरी २००९ को करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर के पत्रकारिता के बच्चों की ब्लॉगिंग पर कक्षा लेने का अवसर मिला। एक तो वैलेन्टाइन डे का दिन, फिर भी शत-प्रतिशत उपस्थिति ने मुझे गदगद किया और कक्षा के दौरान उनकी प्रतिक्रियाओं ने भी।

पर इससे उलट प्रतिक्रिया पत्रकार बन चुके ब्लॉगरों में देखने को मिली। २२ फरवरी की मुलाकात में अधिकतम पत्रकार और पत्रकार-ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग मात्र आलेख जमा करने का बक्सा नज़र आई। इस सम्मेलन में भी सेंट जेवियर्स कॉलेज के पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने इस विधा को अच्छे तरह से समझने की इच्छा जताई और व्यक्तिगत रूप से मुझे मिला और कहा कि सर हमारे यहाँ भी कक्षा लीजिए। वहीं मुझे एक HRD के इंजीनियर अरूण चक्रवर्ती भी मिलें जिन्होंने अपने ज्योतिष ज्ञान सम्बंधी कार्य को ब्लॉगिंग से कैसे प्रचारित-प्रसारित कर पायें?-इसपर मेरे विचार जानना चाहे। मुझे अगले दिन भी राँची में रुकना था। ज्योतिषी-इंजीनियर अरूण को ब्लॉगिंग ने इतना प्रभावित किया कि अगले दिन उन्होंने फोन करके मुझसे समय माँगा, मुझे अपने घर ले गये और ब्लॉग बनवाया, बहुत से सवाल किये।

ब्लॉगिंग से कमाई की बात टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार संजीव शेखर ने जाननी चाही। मैंने यही कहा कि हिन्दी के ९९% से अधिक ब्लॉग अभी इसपर न ही सोंचे क्योंकि उनके ब्लॉग का ट्रैफिक इतना भी नहीं है कि भारतीय विज्ञापन नेटवर्कों के विज्ञापन से रु १००० प्रतिवर्ष भी कमा पायें (क्योंकि गूगल हिन्दी कंटेंट को विज्ञापन नहीं दे रहा)। मैंने उनसे ज़रूर कहा कि हिन्दी के कमाने वाले ब्लॉगों की संख्या एक आदमी के हाथों की उँगलियों से भी कम हैं। मैंने हिन्द-युग्म की विज्ञापन की कुल कमाई का लेखा-जोखा भी उन्हें दिया।

यह बात ग़ौर करने वाली है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरूआत से (यानी की अक्टूबर २००२ से) लेकर अब तक प्रत्येक ब्लॉगर अपने ब्लॉग में मात्र निवेश कर रहा है, वह चाहे धन के रूप में हो या समय के रूप में या फिर दोनों रूपों में। यह स्थिति चिंताजनक है और जैसाकि वरिष्ठ ब्लॉगर देबाशीष चक्रवर्ती ने अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि आने वाले पाँच वर्षों में हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई की गुँजाइश नहीं है, वैसे में हिन्दी में प्रोफैशनल ब्लॉगरों की संख्या खूब बढ़ेगी यह कहना मुश्किल है। हाँ यह ज़रूर कहा जा सकता है कि जिस तरह से ब्लॉगों की संख्या पिछले २ वर्षों में बढ़ी है, उसकी वृद्धि दर में लगातार वृद्धि होगी।

मैं आने वाले समय में छोटे और बड़े शहरों में ब्लॉगिंग पर ऐसे आयोजन करने के बारे में विचार कर रहा हूँ जिसमें ब्लॉगर के साथ-साथ नॉन-ब्लॉगर की संख्या भी अच्छी खासी हो।

Monday, February 09, 2009

22 फरवरी को राँची में जमा होंगे कलकतिया और झारखण्डी ब्लॉगर

कल मुझे एक ईमेल-निमंत्रण मिला, जिसमें लिखा था कि १० फरवरी २००९ को मेरठ विश्वविद्यालय में रवि पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक 'एटूजेड ब्लॉगिंग' का विमोचन होना है। किसी भी तरह की जानकारी और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में पॉकेट बुक्स ने अहम भूमिका निभाई है। याद कीजिए 'कौन सी ऐसी मछली है जो हवा में उड़ती है, पानी में तैरती है और जमीन पर चलती है?, कौन सा पेड़ है जो लोगों को खा जाता है? कौन सा ऐसा पहाड़ है जो रोज़ रंग बदलता है?' जैसे रसदार सवालों का पुलिंदा बस से लेकर ट्रेन में बिकता है। हर आम-खास इससे परिचित हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग जो कि २००२ में शुरू हुई, २००९ के शुरू में ही पॉकेट बुक्स में घुस गई, तो निश्चित रूप से सफलता का स्वाद इसने बहुत जल्दी चख लिया। एक पॉकेट बुक्स से इस तरह की पुस्तक आने का फायदा यह होगा कि इसे लगभग हर पॉकेट बुक्स वाला प्रकाशित करेगा। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले २-३ महीनों में आप दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगर घूमने आये तों बसों-ट्रेनों में देखें कि ब्लॉगिंग की यह किताब रु १० में बिक रही है और साथ में चुटकुलों और देवर-भाभी की शायरियों की २-३ किताबें मुफ्त हैं।

अभी २८ दिसम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। हिन्द-युग्म ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर है, भाषा को लेकर गंभीर है, इसका उद्घोष तो यह २००८ के विश्व पुस्तक मेले में अपना स्टैंड लगाकर ही दे चुका था। लेकिन २८ दिसम्बर के कार्यक्रम में साहित्यशिखर राजेन्द्र यादव आये तो लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ। हम इसके जो सकारात्मक परिणाम आँक रहे थे, वह हुए।

चोखेरबालियों ने ६ फरवरी २००९ को अपना सालाना जलसा मनाया। राजकिशोर, अनामिका जैसे विद्वजन आये और ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों का जज्बा देखा और महसूस किया। इसी तरह से जमीनी और वर्चुयल दुनिया में बराबर दखल रखने वाली एनजीओ 'सफ़र' ने भी राजेन्द्र यादव द्वारा उन्हीं की लघुकथाओं के पाठ के माध्यम से इंटरनीय दुनिया की सजीव उपस्थिति को मुखरित किया।

हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा जुड़ाव ३२ महीना पुराना है। इस दौरान इस माध्यम के झंडारोपण के लिए मैं शहरो-कस्बों तक गया हूँ। लेकिन कभी झारखण्ड-बिहार जाने का मौका नहीं मिला। दिसम्बर में कोलकाता के ब्लॉगर अमिताभ मीत से जब मुलाक़ात हुई, उन्होंने मुझे कोसा कि यार कोलकाता और हजारीबाग के बीच सैकड़ों ब्लॉगर रहते हैं, हिन्दी-प्रेमियों का इलाका है, कभी उधर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम करो तो बात बने।

मैंने गूगल किया तो पाया कि बात सही है। कुछ को पहले से जानता था, कुछ को नहीं। कुछ को फोन सेतो कुछ को ईमेले से पकड़ा और आखिरकार कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डॉ॰ भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया। साथ में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखण्डी ने संयोजन की बागडौर सम्हाली।

यह कार्यक्रम में रविवार २२ फरवरी २००९ को राँची में सुबह ११ बजे से आयोजित होने जा रहा है, जिसमें ब्लॉगर साथी तो एक-दूसरे से मिलेंगे ही साथ में दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, आई-नेक्सट के प्रधान सम्पादकों (जैसे संत शरण अवस्थी, हरिनारायाण, हरिवंश॰॰॰॰) के इस विधा पर विचार आयेंगे, मैं ब्लॉगिंग से कम परिचित या न परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराऊँगा, पारूल चाँद पुखराज गायेंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार की अपने अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। अभी यह अंतिम रूपरेखा नहीं है, कुछ और ब्लॉगर-वक्ता भी जुड़ेंगे।

झारखण्ड के ब्लॉगरों की यह शिकायत रही है कि वहाँ ब्लॉगिंग-स्लॉगिंग की फालतू की चीज माना जाता है। शायद यह पहल इसे ज़रूरी मानने का बीज रोप दे।

बहुत से ब्लॉगरों ने अभी तक ईमेल का जवाब भी नहीं दिया है। अब पोस्ट पढ़कर सम्मिलित होने का कंफर्मेशन तो दे दें। जिन ब्लॉगरों ने आने की पुष्टि की है, वे हैं-

अमिताभ मीत (कोलकाता)
शिव कुमार मिश्रा (कोलकाता)
बालकिशन (कोलकाता)
शम्भू चौधरी (कोलकाता)
रंजना सिंह (जमशेदपुर)
श्यामल सुमन (जमशेदपुर)
पारूल चाँद पुखराज (बोकारो)
संगीता पुरी (बोकारो)
मनीष कुमार (राँची)
नदीम अख्तर (राँची)
घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखंडी (राँची)
डॉ॰ भारती कश्यप (राँची)
निराला तिवारी (राँची)
संध्या गुप्ता (दुमका)
सुशील कुमार (चाईंबासा)
शैलेश भारतवासी (दिल्ली)
लवली कुमारी (धनबाद)
अभिषेक मिश्र (वाराणसी)

अब न कहना इसे अंट-शंट, न कहना आलतू-फालतू।