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Wednesday, June 16, 2010

दो रुपये में घर-घर पहुंचेगा आंदोलन...

झारखंड का सबसे चर्चित अखबार है प्रभात खबर....अखबार का नारा है ' अखबार नहीं आंदोलन ' ...पत्रकारिता के हर स्वरूप में प्रभात खबर का नाम अदब से लिया जाता है....इसके प्रधान संपादक हरिवंश जी के साथ काम करने का मौका मुझे भी कुछ सालों पहले मिला है...अब टीवी के हाईफाई संपादकों के बीच हरिवंश जी की सादगी याद आती है....तब अखबार की कीमत तीन-साढ़े तीन रुपये थी और हाल के दिनों मे चार रुपये ...अचानक इस खबर पर नज़र पड़ी कि अखबार अब दो रुपये में मिलेगा, उसी पुरानी गुणवत्ता के साथ....झारखंड में दैनिक भास्कर जल्द ही आने वाला है, जिसकी कीमत कम ही होती है...हिंदुस्तान और दैनिक जागरण पहले ही वहां चार रुपये में बिककर होड़ में बने हैं...  ऐसे में एक अखबार की कीमत आधी हो जाना सुखद भी है और चुनौती भी कि कहीं एक अच्छा अखबार बाज़ार की बेरहमी से बंद न हो जाए....प्रभात खबर के मुताबिक कीमत कम करने की वजह बस इतनी है कि पूरे झारखंड को दो रुपये में अखबार मिलेगा, तो आंदोलन का सपना सच हो सकेगा....काश ! यही सच हो....प्रभात खबर ने कीमत कम करने को लेकर संपादकीय में जो कहा, वो आपके सामने हैं...वैसे, आप क्या कहते हैं....


पाठकों को दो रुपये में प्रभात खबर


'पढ़ेगा पूरा झारखंड’ अभियान के तहत आज (15 जून, 2010) से प्रभात खबर पाठकों के लिए दो रुपये में उपलब्ध है. चार रुपये में नहीं. एक अखबार की लागत कीमत लगभग नौ रुपये है. पर पाठकों को दो रुपये में क्यों? झारखंड बने 10 वर्ष होने को हैं. सात मुख्यमंत्री जा चुके हैं. अब आठवें की तलाश जारी है. न सरकार स्थिर है, न विधानसभा. इस तरह न विकास हो रहा है. न राज्य आगे जा रहा है. दुनिया को 21वीं शताब्दी में ज्ञान का युग (नॉलेज ऐरा) कहा गया है.

सूचना क्रांति का दौर. यानी सूचनाएं ही लोगों को या समाज को जागरूक या संपन्न बनाती हैं. सूचनाएं अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, तो झारखंड में एक नयी चेतना पैदा होगी. आंदोलन और बदलाव की नयी भूख और बेचैनी होगी. राज्य में जन-जन तक राज्य की सूचनाएं पहुंचे, बदलती दुनिया की खबरें पहुंचे, देश के कोने-कोने में आ रहे बदलावों की सूचना पहुंचे, तो सही अर्थो में एक नया आंदोलन पैदा होगा. आंदोलन सृजन का. आंदोलन प्रगति का.

आंदोलन विकास का. इसलिए जन-जन तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए ही प्रभात खबर ने पाठकों को दो रुपये में अखबार उपलब्ध कराने का ऐतिहासिक निर्णय किया है, ताकि घर-घर अखबार खरीद और पढ़ सके. अब आप पाठकों से गुजारिश है कि आप ‘पढ़ें अखबार’ आंदोलन चलायें. अखबार को पास, पड़ोस, समाज हर जगह फ़ैलायें. यह सूचना युग है. इसमें शिक्षा और ज्ञान ही इंसान को आगे ले जा सकते हैं. प्रभात खबर ज्ञान का मंच बने. यह हमारी कोशिश होगी.

लंबे समय से झारखंड में यह चर्चा हो रही थी कि अखबारों की कीमत अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में लोग अखबार नहीं खरीद पाते. बीच-बीच में अखबार समूहों ने सर्वे कराये, उसमें भी यह बात सामने आयी. झारखंड की आबादी तीन करोड़ से ज्यादा है, लेकिन उस अनुपात में यहां अखबार नहीं बिकते.

इसका सबसे प्रमुख कारण है, अखबारों का दाम ज्यादा होना. समय-समय पर पाठकों के सुझाव आये, कीमत दो रुपये रखने का. लेकिन न्यूज प्रिंट और अन्य सामग्रियों के बढ़ते भाव से यह संभव नहीं हो सका था. प्रभात खबर प्रबंधन ने महसूस किया कि दाम घटाने से झारखंड का एक बड़ा तबका, जिसकी संख्या लाखों में हो सकती है, अखबार खरीद सकता है, अखबार पढ़ सकता है.

यह हर कोई जानता है कि प्रभात खबर ने झारखंड राज्य के निर्माण और उसके पुनर्निर्माण में अहम भूमिका अदा की है. झारखंड के प्रमुख सवालों पर अभियान चलाया. जब भी झारखंड के विकास की बात उठी, प्रभात खबर ने समझौता नहीं किया. लेकिन अखबार की कीमत के कारण यह आवाज झारखंड के जन-जन तक नहीं पहुंच सकी.

यह सूचना का युग है. जब तक हर व्यक्ति तक सूचना नहीं पहुंचेगी, कोई भी सामाजिक आंदोलन सफल नहीं होगा. प्रभात खबर चाहता है कि झारखंड के लोग जागरूक बनें, उनमें जनचेतना फ़ैले और यह आंदोलन का रूप ले. इसके लिए जरूरी है कि राज्य का हर व्यक्ति अखबार खरीद कर पढ़े. इसी प्रयास से नये झारखंड के उदय का रास्ता खुलेगा, नयी चेतना आयेगी. गांव-गांव, घर-घर अखबार चेतना के वाहक के रूप में फ़ैलेगा-पसरेगा. इस तरह अखबार एक सृजनात्मक आंदोलन को आकार देगा. पाठकों के सहयोग से. पाठकों के बूते. पाठकों की बदौलत.

प्रभात खबर प्रबंधन

Sunday, September 13, 2009

मुद्दे चीख रहे हैं, क्या सरकार बहरी है?


इस देश में मुद्दों की कमी नहीं। हर रोज़ एक नया मुद्दा सामने आता है। कभी व्यवस्था पर चर्चा, कभी सरकार तो कभी पुराने गढ़े मुर्दे उखाड़ने पर समय की बर्बादी। हम भी चर्चा करेंगे। हमारी सरकार ने सौ दिन भी तो पूरे किये हैं अभी। काफ़ी महीने पहले मैंने अपने एक लेख में लिखा था कि चीन भारत का नम्बर एक शत्रु है। कुछ साथी जन साथ भी हुए। अब मीडिया भी यही कह रहा है। सरकार का रवैया अभी भी चीन को लेकर सख्त नहीं। चीन लद्दाख में घुस आया है। तवांग पर तो वो अपना हक जता ही चुका है। चीन भारत को हर ओर से घेर चुका है। लेकिन हम खामोश हैं। हम खामोश हैं क्योंकि हम डरते हैं(?)। चीन ने भारत की सीमा के अंदर आकर अपने देश का नाम लिखा। चीन ने बंगाल की खाड़ी में अपनी सेना का अड्डा बना रखा है जो हर वक्त भारत की अंतरिक्ष गतिविधियों पर नजर गड़ाये हुए है। वही हिन्द महासागर में श्रीलंका के साथ मिलकर दक्षिणॊ श्रीलंका के हम्बन्तोता में एक बन्दरगाह का निर्माण चल रहा है। ये गौरतलब है कि प्रभाकरण को मारने के लिये धनराशि चीन द्वारा ही मुहैया कराई गई। लेकिन हमारी सरकार अभी भी खामोश। यही बंदरगाह चीनी नौसेना का अड्डा बनने जा रहा है। जैसे श्रीलंका के साथ समझौता हुआ उसी तरह पाकिस्तान के साथ भी एक बन्दरगाह के लिये काम चल रहा है। और पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने का काम भी तो चीन ने ही किया है। फिर सरकार द्वारा ऐसी अनदेखी। चारों ओर से घेर कर हमला करने का इरादा है चीन का। इसके लिये हमारी क्या तैयारी है? क्या १९६२ दोहराया जायेगा। कश्मीर के हिस्से के साथ साथ अरूणाचल, सिक्किम और लद्दाख भी जायेगा?

दूसरा किस्सा हुआ झारखंड में जिसको मीडिया ने तरजीह नहीं दी। बीजेपी के विधायकों का इस्तीफ़ा। और हो भी क्यों न। पिछले नौ-दस महीने से राज्य में राष्ट्रपति शासन। राष्ट्रपति तो बस "नाम" है, देखा जाये तो केंद्र सरकार का शासन। झामुमो के शिबू सोरेन के हार जाने के बाद राज्य में केंद्र सरकार का कब्जा। कांग्रेस को मालूम है कि झारखंड में जीत की उम्मीद कम है। जब हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव नवम्बर में करवाये जाने हैं तो झारखंड में अभी क्यों नहीं? कांग्रेस सरकार को किस बात का डर है कि संविधान को ही दरकिनार कर दिया। छह महीने से अधिक हो गये राष्ट्रपति शासन को और अभी तक चुनाव नहीं!!!

पिछले दिनों की एक और खबर, जो हमारी "सेक्युलर" मीडिया को नजर ही नहीं आई। वो था सांगली, महाराष्ट्र में गणेश विसर्जन के दौरान हमला किया जाना। अफ़जल खान का पेट फ़ाड़ते हुए शिवाजी दिखाये गये तो शायद कुछ लोगों से रहा नहीं गया। पंडाल पर हमला कर दिया। कहीं ये उल्टा हुआ होता, यानि अल्पसंख्यकों पर हमला हुआ होता तो मानवाधिकार वाले सामने आ चुके होते। वहाँ कर्फ़्यू लगाया गया। पुलिस पर दंगाइयों ने हमला किया पर प्रशासन व सेक्युलर मीडिया चुप रहा क्योंकि वो कुछ और "जरुरी" खबरें "बनाने" में लगे हुए थे। इसके बारे में समाचार पत्रों में भी नहीं आया और यदि आया तो कहीं थोड़ा सा कॉलम। पता नहीं ऐसा क्यों है? ये तो मेरे मीडिया मित्र ही बता सकते हैं कि मीडिया ने खबर को तवज्जो क्यों नहीं दी? एक उदाहरण देता हूँ। कोई कत्ल होता है तो लिखा जाता है कि "व्यक्ति का कत्ल हुआ"। और कहीं अल्पसंख्यक का कत्ल होता है तो... "मुस्लिम व्यक्ति का कत्ल हुआ".."ईसाई व्यक्ति का कत्ल हुआ"..या "सिख का कत्ल हुआ"... दोनों बातों में अंतर क्यों? क्या हर बार "व्यक्ति का कत्ल हुआ".. ऐसा नहीं लिखा जाता। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में फ़र्क क्यों? जवाब इस लेख को पढ़ने वाला हर मीडियाकर्मी दे।

बहरहाल अगला मुद्दा थोड़ा ताज़ा है और वो है आई.एस.आई चीफ़ का भारतीय उच्चायोग की इफ़्तार पार्टी में शामिल होना। पाकिस्तान में इफ़्तार पार्टी हुई और आई.एस.आई का मुखिया भी शामिल हुआ। कहा गया कि दोनों देशों में सम्बन्ध सुधारे जा रहे हैं। एक तरफ़ परमाणु मिसाइलों की तैयारी और मुम्बई में हुए हमले में ढुलमुल रवैया ऊपर से हमारी सरकार पाकिस्तान के साथ "सम्बन्ध" सुधारने लग रही है। ये क्या तरीका हुआ भई!! यहाँ तो पाकिस्तान का नहीं बल्कि हिन्दुस्तान का रवैया ढुलमुल लग रहा है। हमारा "महान" मीडिया और विपक्ष तो पड़ोसी के "गड़े मुर्दे" उखाड़ने में लगा हुआ है। इसीलिये हमें ही ये खबरें सामने लानी पड़ रही हैं।

तपन शर्मा

Monday, February 09, 2009

22 फरवरी को राँची में जमा होंगे कलकतिया और झारखण्डी ब्लॉगर

कल मुझे एक ईमेल-निमंत्रण मिला, जिसमें लिखा था कि १० फरवरी २००९ को मेरठ विश्वविद्यालय में रवि पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक 'एटूजेड ब्लॉगिंग' का विमोचन होना है। किसी भी तरह की जानकारी और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में पॉकेट बुक्स ने अहम भूमिका निभाई है। याद कीजिए 'कौन सी ऐसी मछली है जो हवा में उड़ती है, पानी में तैरती है और जमीन पर चलती है?, कौन सा पेड़ है जो लोगों को खा जाता है? कौन सा ऐसा पहाड़ है जो रोज़ रंग बदलता है?' जैसे रसदार सवालों का पुलिंदा बस से लेकर ट्रेन में बिकता है। हर आम-खास इससे परिचित हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग जो कि २००२ में शुरू हुई, २००९ के शुरू में ही पॉकेट बुक्स में घुस गई, तो निश्चित रूप से सफलता का स्वाद इसने बहुत जल्दी चख लिया। एक पॉकेट बुक्स से इस तरह की पुस्तक आने का फायदा यह होगा कि इसे लगभग हर पॉकेट बुक्स वाला प्रकाशित करेगा। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले २-३ महीनों में आप दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगर घूमने आये तों बसों-ट्रेनों में देखें कि ब्लॉगिंग की यह किताब रु १० में बिक रही है और साथ में चुटकुलों और देवर-भाभी की शायरियों की २-३ किताबें मुफ्त हैं।

अभी २८ दिसम्बर २००८ को हिन्द-युग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। हिन्द-युग्म ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर है, भाषा को लेकर गंभीर है, इसका उद्घोष तो यह २००८ के विश्व पुस्तक मेले में अपना स्टैंड लगाकर ही दे चुका था। लेकिन २८ दिसम्बर के कार्यक्रम में साहित्यशिखर राजेन्द्र यादव आये तो लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ। हम इसके जो सकारात्मक परिणाम आँक रहे थे, वह हुए।

चोखेरबालियों ने ६ फरवरी २००९ को अपना सालाना जलसा मनाया। राजकिशोर, अनामिका जैसे विद्वजन आये और ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों का जज्बा देखा और महसूस किया। इसी तरह से जमीनी और वर्चुयल दुनिया में बराबर दखल रखने वाली एनजीओ 'सफ़र' ने भी राजेन्द्र यादव द्वारा उन्हीं की लघुकथाओं के पाठ के माध्यम से इंटरनीय दुनिया की सजीव उपस्थिति को मुखरित किया।

हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा जुड़ाव ३२ महीना पुराना है। इस दौरान इस माध्यम के झंडारोपण के लिए मैं शहरो-कस्बों तक गया हूँ। लेकिन कभी झारखण्ड-बिहार जाने का मौका नहीं मिला। दिसम्बर में कोलकाता के ब्लॉगर अमिताभ मीत से जब मुलाक़ात हुई, उन्होंने मुझे कोसा कि यार कोलकाता और हजारीबाग के बीच सैकड़ों ब्लॉगर रहते हैं, हिन्दी-प्रेमियों का इलाका है, कभी उधर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम करो तो बात बने।

मैंने गूगल किया तो पाया कि बात सही है। कुछ को पहले से जानता था, कुछ को नहीं। कुछ को फोन सेतो कुछ को ईमेले से पकड़ा और आखिरकार कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डॉ॰ भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया। साथ में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखण्डी ने संयोजन की बागडौर सम्हाली।

यह कार्यक्रम में रविवार २२ फरवरी २००९ को राँची में सुबह ११ बजे से आयोजित होने जा रहा है, जिसमें ब्लॉगर साथी तो एक-दूसरे से मिलेंगे ही साथ में दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, आई-नेक्सट के प्रधान सम्पादकों (जैसे संत शरण अवस्थी, हरिनारायाण, हरिवंश॰॰॰॰) के इस विधा पर विचार आयेंगे, मैं ब्लॉगिंग से कम परिचित या न परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराऊँगा, पारूल चाँद पुखराज गायेंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार की अपने अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। अभी यह अंतिम रूपरेखा नहीं है, कुछ और ब्लॉगर-वक्ता भी जुड़ेंगे।

झारखण्ड के ब्लॉगरों की यह शिकायत रही है कि वहाँ ब्लॉगिंग-स्लॉगिंग की फालतू की चीज माना जाता है। शायद यह पहल इसे ज़रूरी मानने का बीज रोप दे।

बहुत से ब्लॉगरों ने अभी तक ईमेल का जवाब भी नहीं दिया है। अब पोस्ट पढ़कर सम्मिलित होने का कंफर्मेशन तो दे दें। जिन ब्लॉगरों ने आने की पुष्टि की है, वे हैं-

अमिताभ मीत (कोलकाता)
शिव कुमार मिश्रा (कोलकाता)
बालकिशन (कोलकाता)
शम्भू चौधरी (कोलकाता)
रंजना सिंह (जमशेदपुर)
श्यामल सुमन (जमशेदपुर)
पारूल चाँद पुखराज (बोकारो)
संगीता पुरी (बोकारो)
मनीष कुमार (राँची)
नदीम अख्तर (राँची)
घनश्याम श्रीवास्तव उर्फ घन्नू झारखंडी (राँची)
डॉ॰ भारती कश्यप (राँची)
निराला तिवारी (राँची)
संध्या गुप्ता (दुमका)
सुशील कुमार (चाईंबासा)
शैलेश भारतवासी (दिल्ली)
लवली कुमारी (धनबाद)
अभिषेक मिश्र (वाराणसी)

अब न कहना इसे अंट-शंट, न कहना आलतू-फालतू।