Tuesday, January 27, 2009

मीडिया को नियंत्रित कैसे करें

बैठक में अब लोग जुटने लगे हैं.....नए चेहरे भी हैं और जाने-पहचाने नाम भी....अलग-अलग विचारों के, अलग उम्र-मिज़ाज के...इसकी चर्चा भी होने लगी है....आज से बैठक में राजकिशोर भी आयेंगे....राजकिशोर इस दौर के सबसे चर्चित स्तंभकारों में से हैं....अमूमन हर अखबार में आप राजकिशोर को पढ सकते हैं...हिंद-युग्म के प्रयासों को खूब पसंद करते हैं और ब्लॉगिंग को भी अहम विधा मानते हैं...मार्क्सवादी राजनीति को गांधीवादी शैली में अमल करने के पक्षधर राजकिशोर हर मुद्दे पर लिखते हैं...बैठक में हम इनका स्वागत करते हैं और अक्सर इनसे विचारों की खुराक लेते रहेंगे...


महाकवि अकबर इलाहाबादी की शिकायत थी:
"रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा-जाके थाने में,
कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में।"
कहां अकबर और कहां यह नाचीज़। फिर भी मैं खुदा का नाम लेना चाहता हूं। साथ ही, यह उम्मीद भी करना चाहता हूं कि रक़ीब नाखुश नहीं होंगे, बल्कि समर्थन ही करेंगे।

मुद्दा मीडिया पर नियंत्रण का है। मीडिया की स्वतंत्रता वस्तुत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हिस्सा है। भारत में इसकी शुरूआत अंग्रेजी हुकूमत के दौर में हुई। वरना, एकाध अपवाद को छोड़ कर, इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने की बात किसी ने सोची तक नहीं। यह दुनिया का अकेला देश है, जहां शास्त्रार्थ (पब्लिक डिबेट) की लंबी परंपरा रही है। शास्त्रार्थ में भाग लेनेवाला विद्वान कुछ भी कह सकता था, किसी भी मत का प्रतिपादन कर सकता था और किसी भी सिद्धांत की आलोचना कर सकता था। वेदों के प्रति श्रद्धा भारत की चिंतन परंपरा का एक प्रमुख स्तंभ रहा है, पर वेद निंदकों को भी सहन किया जाता था और उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दिया जाता था। यहां तक कि ईश्वर का अस्तित्व भी सर्वमान्य नहीं रहा है। जो ईश्वर को मानते हैं, उनके बीच भी यह स्वीकार करने की उदारता रही है कि ईश्वर तक पहुंचने का कोई एक निश्चित पथ नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से सत्य तक पहुंचने का रास्ता और ज्यादा दुरूह तथा कंटकाकीर्ण हो जाता है, यह सभी चिंतकों को मालूम था।

मालूम तो यह बात तो ब्रिटिश शासकों को भी थी। लेकिन इस तरह की स्वतंत्रता उनके राजनीतिक-आर्थिक हितों के प्रतिकूल थी। इसीलिए जब ग्रेट ब्रिटेन के लेखक, पत्रकार और नागरिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब भारत में उनके साम्राज्यवादी प्रतिनिधि इस स्वतंत्रता को कुचलने के लिए तरह-तरह के तरीके अपना रहे थे। स्वाधीन भारत में बहुत समय तक इसकी जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि राज्य और मीडिया एकमएक हो चुके थे। जब राज्य से लोगों का मोहभंग शुरू हुआ, तब मीडिया को भी अपनी स्वाभाविक मुद्रा में आना पड़ा। ध्यान देने की बात है कि इमरजेंसी में विपक्ष और प्रेस, दोनों पर एक साथ हमला हुआ। बाद में भी प्रेस पर नियंत्रण रखने की कई कोशिशें हुर्इं। ऐसी हर कोशिश स्वयं बदनाम हो कर और कोशिशकर्ता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को बदनाम करके इतिहास की अंधेरी गलियों में बिला गई। मीडिया को नियंत्रित करने की इच्छा एक बार फिर देखने में आ रही है। मनमोहन सिंह के कूटनीतिक आश्वासन (कूटनीतिक इसलिए कि मीडिया पर नियंत्रण का विधेयक उन्हीं के मंत्रिमंडल ने बनवाया है) के बाद बाघ जंगल में लौट चुका है। पर यह आदमखोर बाघ है, यह हम कैसे भूल सकते हैं?

इस बार लेकिन मामला थोड़ा अलग भी है। मीडिया से शिकायत सिर्फ सरकार को नहीं है। जहां तक सरकार की शिकायत का सवाल है, देश के लोग अब यह मानने लगे हैं कि जिस बात से सरकार को शिकायत है, वह जरूर ठीक होगी। इसी आधार पर कुछ सिरफिरे बुद्धिजीवी आतंकवाद के विरुद्ध बोलना भी उचित नहीं मानते। परंतु जब शिकायत (गंभीर शिकायत) सामान्य जन को भी होने लगे, तब यह स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी है कि कारण वाजिब होंगे। आज मीडिया का आतंक बढ़ रहा है, पर उसका यश धूमिल हो रहा है। जनता की यह शिकायत वाजिब है, तभी मीडिया के प्रतिनिधि भी समय-समय पर आश्वासन देते रहते हैं कि हम आत्म-नियंत्रण के पक्ष में हैं, हमें बाहर से नियंत्रित करने की कोशिश न की जाए। ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि मीडिया के आत्म के साथ-साथ राष्ट्र का भी एक आत्म है और दोनों के बीच अंतर्विरोध पैदा हो जाए, तो पहला स्थान राष्ट्र के आत्म को ही मिलेगा। राष्ट्र से भी ऊंची चीज मानवता है। इसलिए सही क्रम यह होगा -- मीडिया से बड़ा देश और देश से बड़ी मानवता।

जहां तक मीडिया द्वारा आत्म-नियंत्रण का प्रश्न है, मैं इसे बोगस सिद्धांत मानता हूं। पहले बोगस नहीं था, पर अब बिलकुल बोगस है। पूरी दुनिया में कहीं भी मीडिया अभिव्यक्ति और विचार-विमर्श का निष्पक्ष माध्यम नहीं रह गया है। कुछ विचार पत्रों को छोड़ दिया जाए, तो मीडिया के सभी माध्यम ज्यादा से ज्यादा रुपया कमाने के लिए चलाए जा रहे है। बल्कि बहुत-से मीडियाकर्मी भी सार्वजनिक तौर पर यह दावा करते देखे जाते हैं कि मुनाफा करने में बुराई क्या है? अगर हम कमा कर कंपनी को मुनाफे में नहीं रख सकते, तो कल हमारा अखबार या चैनल ही बंद हो जाएगा। फिर हम क्या करेंगे? यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि सभी मीडिया संस्थान ज्वायंट स्टॉक कंपनी के रूप में रजिस्टर कराए जाते हैं -- कोई भी कंपनी ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में रजिस्टर नहीं कराई जाती। मीडिया कंपनियों के शेयर जब स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे-बेचे जा सकते हैं, तब उद्देश्य की वह पवित्रता कहां रही जिसका लोकतांत्रिक औजार के रूप में बखान किया जाता है? ऐसी हालत में सामाजिक नियंत्रण से कैसे बचा जा सकता है? आत्म-नियंत्रण के आश्वासन पर कितना भरोसा किया जा सकता है? अगर आत्म-नियंत्रण का सिद्धांत काम करता होता, तो मीडिया से किसी को शिकायत ही क्यों होती?

दरअसल, जब भी मीडिया को नियंत्रित या अनुशासित करने का मुद्दा सामने आता है, यह भुला दिया जाता है कि नियंत्रण का प्रावधान तो हमारे संविधान में ही है। संविधान में स्वतंत्रता की अन्य किस्मों की ही तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी निरंकुश नहीं छोड़ा गया है। उस पर लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, कदाचार, अपराध उद्दीपन, राज्य की सुरक्षा आदि के हित में अंकुश लगाने की व्यवस्था है। ये सभी शर्तें मीडिया पर भी लागू होती हैं। मीडिया के किसी भी प्रतिनिधि ने यह दावा नहीं किया है कि हम संविधान और कानून से ऊपर हैं। फिर मीडिया पर अलग से नियंत्रण लागू करने की बात सोची या कही ही क्यों जाती है?

इसलिए सोची या कही जाती है कि संविधान में विहित अंकुशों का अनुपालन हो रहा है या नहीं, यह देखने के लिए देश में कोई एजेंसी नहीं है। अपराधों को रोकने के लिए कानून हैं, आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए प्रकोष्ठ हैं, भ्रष्टाचार का निरोध करने के लिए एजेंसियां हैं, मानव अधिकारों की रक्षा करने के लिए मानवाधिकार आयोग हैं, परंतु इस पर निगाह रखने के लिए कोई संस्थागत प्रबंध नहीं है कि प्रेस और मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण तो नहीं कर रहे हैं। ऐसी संस्था का प्रबंध न होना संविधान की अवमानना है। जिस समाज में ऐसी संस्था नहीं है, वह मीडिया की तानाशाही झेलने के लिए अभिशप्त है।

कहने को हमारे यहां प्रेस परिषद नाम की कानून द्वारा गठित संस्था है। वह काफी पुरानी भी है। लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं है, न उससे कोई डरता है। इसलिए कि वह सिर्फ मीडिया के कदाचार की भत्र्सना कर सकता है, उसे दंडित नहीं कर सकता। प्रेस परिषद को और अधिक अधिकार देने की मांग समय-समय पर उठाई जाती है। यह मांग बेमानी है। बजाय इसके प्रेस परिषद को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए कि वह मीडिया की गतिविधियों पर निगरानी रखे तथा वह जब भी कानून तोड़े, परिषद उसे नोटिस जारी करे। अगर परिषद कानून तोड़क के स्पष्टीकरण से सहमत नहीं है, तो वह मामले को न्यायालय में ले जाए। मेरे खयाल से, यही एक जनतांत्रिक, आपत्तिमुक्त और कारगर व्यवस्था है जिसके जरिए मीडिया को नियंत्रित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया खर्चीली, लंबी और कुछ हद तक उबाऊ जरूर है। लेकिन जब मामले का संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बुनियादी चीज से हो, तो खर्च और परिश्रम की चिंता करना बेवकूफी है। एक किलो सर्फ से शहर भर के कपड़े नहीं धोए जा सकते।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)

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6 बैठकबाजों का कहना है :

रंजना का कहना है कि -

sashakt aur saarthak aalekh hai.

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

अरे सर जी,नमस्कार.....
आपको यहाँ देखकर क्या कहूँ,बहुत ही अशचर्यचकित हूँ,हमेशा आपको जनसत्ता और दैनिक भास्कर में पढ़ता रहता था,कहने मे कोई संकोच नहीं की मेरे प्रिय स्तंभकारों मे आप वरीय हैं....
स्वागत है सर........
बात करें मीडिया पर नियंत्रण की तो मैं हमेशा से ही इस पक्ष का विरोधी रहा हूँ कि सरकार कोई नियम क़ानून बनाए,क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार ही होगा,
बेहतर यही है कि मीडिया के लोग खुद ही आत्मनियंत्रण पर ध्यान दें.....
अपनी लक्ष्मण रेखा खुद ही तय करें.......अन्यथा मजबूर होकर सरकार ने कोई कदम उठा लिया तो....
आलोक सिंह "सहिल"

karan का कहना है कि -

राज जी से असहमत होने की कोई वजह नहीं दिखती

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

आज के प्रेस और मीडिया, खबरों को जन्म देते हैं | On Fly खबरों को एडिट कर बताते हैं |
अपना ही न्यायालय बना किसी भी मुद्दे पर निर्णय देते रहते हैं | भाषा की धज्जियाँ उडाते हैं और समाज हित से पहले अपने टी आर पी के रेटिंग को देखते हैं |

यह देश का दुर्भाग्य है , तिरंगा जलता है और मीडिया उसे निर्लज्जता पूर्वक दीखा जनता में भ्रम लाता है |
मैं आज भी नेशनल न्यूज़ देखता रहता हूँ क्योंकि उसने आज भी अपनी गुणवत्ता बनाये रखी है |

यह आरोप सभी प्राइवेट न्यूज़ चैनल पर नही लागू होती लेकिन ज्यादा तर यही हो रहा है |
सुधार होगा ऐसी मंगल कामना |

अवनीश तिवारी

Divya Prakash का कहना है कि -

बहुत बहुत धन्यवाद आपका राजकिशोर जी की अपने इस बैठक की दुनिया मैं आये
बहुत ही अच्छा आलेख लगा मुझे...
कभी कभी सही मैं खीज होने लगती है न्यूज़ चैनल देख कर की .. हम क्या देखने को मजबूर हैं ...
आज कल के बहुत सरे पेपर जैसे की टाईम्स ऑफ़ इंडिया और हिंदी के भी बहुत से पेपर ,,,, केवल आपनी मार्केटिंग की वजेह से ही चल रहे हैं ..मुझे बिलकुल सही अकडा तो नहीं पता लेकिन लगभग लगभग हर अख़बार पे प्रचार से टाईम्स ऑफ़ इंडिया को 70 रूपए मिलते हैं जो अख़बार हमें 2rupayमैं मिलता है, अगर हम प्रचार से मिलने वाले सारे पैसे जोड़ दें तो ...टाईम्स ऑफ़ इंडिया वाले चाहे तो हमें ये पेपर जन्म भर मुफ्त मैं दे सकते हैं ..उन्हें वैसे भी करीब करीब ७० रुपए मिल रहे होते हैं ..ये पूरा पैसा मुनाफा नहीं होता लेकिन इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की मुनाफा बहुत होता होगा...
यही हाल करीब करीब सारे न्यूज़ चैनल्स का है ... इसीलिए हम टी आर पी(TRP) के हाथों मजबूर हैं ... क्युकी मीडिया को खबरें और पत्रकारिता की बजाये ... ये मार्केटिंग के लोग चला रह हैं ... जिनको सिवाए पैसे के कुछ नहीं दिखता (अब इसे मेरा दुर्भाग्य कहिये या सौभाग्य की मैंने मार्केटिंग की पढाई की है ... इसीलिए इस सच की थोडी बहुत झलक है मुझको ...)
मुझे लगता है .. अभी भी मीडिया के पास अपनी Image makeover से लेकर चाल चलन तक सब कुछ बदलने का पूरा मौका है....
साभार
दिव्य प्रकाश

Dr. Smt. ajit gupta का कहना है कि -

आज मीडिया भी एक आतंकवादी गिरोह बनता जा रहा है। अत: देश का कोई भी कानून इन्‍हें नहीं रोक सकता। ये जब भी चाहे किसी की ईज्‍जत को बेपर्दा कर सकते हैं। आज सारे ही देश को भ्रमित करने में इनका सबसे बड़ा योगदान है। ये सरकारों की नीतियों पर नहीं लिखते या कहते है अपितु राजनेताओं के शब्‍दों को दिनभर सुनाते रहते हैं। यदि ये सरकारों की नीतियों का खुलासा करने लगे तब बहुत मेहनत होती है और मिलता भी कुछ नहीं है। राजनेताओं पर बोलो और मुफ्‍त में सबकुछ पाओ। इसलिए ये कानून से भी बड़े बन गए हैं। कानून सज्‍जनों के लिए बनते हैं, शैतानों के लिए नहीं।

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