Saturday, December 05, 2009

रेडियो : फटा हुआ ट्रांजिस्टर

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

भगवान् जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है ये मुहावरा जिन कुछ ही लोगो के साथ सत्य होता है उनमे से एक है हिमेश रेशमिया!

कम उम्र में अपनी टीवी सेरिअल्स से धूम मचानेवाले हिमेश म्यूजिक की दुनिया में इस कदर छा गए के सबसे जादा फिल्मे उनके ही पास थी. उसके बाद हिमेश ने खुद गाना शुरू किया और ऐसा तहलका मचा दिया के एक के बाद एक ऐसे २८ हिट सोंग्स देने के बाद भी पब्लिक में उनका डिमांड बढती ही गयी.

इसी माहौल का फायदा उठाकर हिमेश ने एक्टर बनाने की सोची और उनके नसीब और म्यूजिक के चलते "आपका सुरूर" सुपर हिट फिल्म हो गयी. हिमेश को लगा के उनका सिक्का चल पड़ा और उन्होंने ५ फिल्मे साईन कर ली. सुभाष घी की "कर्ज" का रिमेक कर के उन्होंने कुछ और शेड उसमें लगा के पेश की पर नहीं चल पाई.

हिमेश की किस्मत अब टिकी है इस हफ्ते रिलीज़ फिल्म "रेडियो" की तकदीर पर. देखते है कैसे है रेडियो की तकदीर.

कथा सारांश :

कथा है आज के "confused" जेनेरेशन की जिनका relationship status "complicated" है. विवान शाह (हिमेश रेशमिया) एक रेडियो जोकी है जिनकी शादी तलाक के बुरे वक्त से गुजर रही है. तलाक तो हो जाता है. पर विवान की बीवी पूजा (सोनल सहगल) उसे भुला नहीं पाती है और विवान के लाइफ में आते जाते रहती है. इसी कारण विवान अपने जिंदगी में प्यार के संबंधों में आगे नहीं बढ़ पाता है. इसी वक्त उसकी जिंदगी में शनाया (शहनाज़ ट्रेजरीवाला) आती है जो उसके साथ को-जोकि कर के काम करती है. शनाया विवान से प्यार करने लगती है पर विवान confused है. आगे उनके संबंधो का क्या होता है यही कहानी है फिल्म की.

पटकथा:

कथा आज के पीढ़ी के हिसाब से ठीक है और वो उससे जुड़ पायेगे. पर पटकथा मार खाती है नकलीपन में. यहाँ सब नकली लगता है. भावनाए नकली, अभिनय नकली, कहानी नकली. कही कही पर फिल्म दर्शंकों के दिलों को छूती जरुर है पर बहुत ज्यादा जगह पर वोह प्रभावपूर्ण नहीं हो पाई है. केवल अच्छे म्यूजिक के कारण दर्शक फिल्म में टिके रहते है. लेखक इशान त्रिवेदी ने निर्देशक इशान त्रिवेदी के लिए बहुत ही कमजोर नींव बना के दी है. देखते है निर्देशक इशान त्रिवेदी इस कमजोर नीव पे किस तरह अपनी फिल्म की ईमारत बना पाए है.

दिग्दर्शन:

जब पटकथा ही कमजोर हो तो भगवान भी अगर दिग्दर्शक रहे तो फिल्म को असरदार नहीं कर पाएंगे. ऐसा ही कुछ है रेडियो के साथ. कमजोर नींव पे चमकधमक भरी सजावट कर के भी फिल्म खोखली लगती है. किरदार ऐसे है के जैसे जबरदस्ती एक टाइप में प्रस्तुत किये गए हो. सब कुछ गृहीत किया गया है. बार बार ये शब्द आ रहा है पर सब कुछ नकली सा लगता है. दूसरा कोई शब्द ही नहीं है. फिर भी फिल्म में एक फ्रेशनेस है और समय समय पर फिल्म अच्छी लगती है और बहुत जादा जगह पर बुरी. मुझे लगता है अनुभवों का डेप्थ काम रहने के कारण आज के नए निर्देशक दर्शकों के दिलों को छूने में असफल है क्योंकि उनकी भावनाए simulated है.

मैंने कभी भी किसी रेडियो स्टेशन में ८-१० लोगो को रेडियो जोकि को मोनिटर करते हुए नहीं देखा है. वोह तो बेचारा एक बंद कमरे में अकेला बकते रहता है. पर फिल्म में वोह सेट एक डबिंग या रेकॉर्डिंग स्टूडियो जैसा दिखाया है जहा ८-१० स्टाफ शो को मोनिटर करते रहते है. ये क्या मजाक है?

अभिनय:

माशाअल्लाह! ये डिपार्टमेंट में तो हर जगह नकलीपन का भंडार है. हिमेश जब संजीदा दृश्यों में ठीक लगते है पर लाइट मूड में उनका अभिनय बहुत ही ठोसा हुवा लगता है. शहनाज़ और सोनल ठीक ठाक है. हिमेश के ससुरजी के किरदार में जाकिर हुसैन misplaced लगते है. वही अजीबो गरीब पहनावे में व्हील चैर पे बैठे हुए राजेश खट्टर एक बहुत बड़ा मजाक लगते है.

चित्रांकन :

इस डिपार्टमेंट में फिल्म एकदम जबरदस्त है. सब कुछ चकाचक और आँखों को लुभाने वाला है.

संगीत और पार्श्वसंगीत:

फिल्म की सबसे तगड़ी चीज इसका म्यूजिक है. इतना मेलोडी भरा म्यूजिक बार बार नहीं आता है. पर फिल्म में हर गाना टुकड़ो टुकड़ो में आता है और दर्शकों को गाने सुनाने का मजा तक नहीं मिलता है. हिमेश के गाने ही है जो इस फिल्म में बंधे रखते है वरना ये फिल्म को तो एक स्टार भी न मिले.

संकलन:

संकलन अच्छा है और फिल्म छोटी है पर पठकथा और निर्देशन में मात खाती है.

निर्माण की गुणवत्ता:

काम बजट पर बनी ये फिल्म कही पे भी ऐसा नहीं दिखाती के निर्माण की गुणवत्ता में कही कमी है. और हिमेश के दावा करते है के फिल्म का पूरा खर्च उनके म्यूजिक के कमाई से ही निकल गया है. फिल्म निर्माता के लिए घाटे में न हो पर दर्शकों का क्या ? उनके लिए तो ये एक घाटे का ही सौदा है.

लेखा-जोखा:

जहा तक अंदाजा है ये फिल्म तुरंत टीवी पे आ जाएगी. आप इंतज़ार कीजिये और टीवी पे देखिये. टीवी पे देखने के लिए ये एक ठीक मूवी है. बस हिमेश के लिए इतनी सलाह है कि हरेक को अपना काम कर लेने दो. आपको जादा पैसे कमाने है तो आप निर्माता बन जाईये.... अभिनय में ही क्या रखा है ? आप तो फिल्म किये बिना भी एक स्टार है. अभी जो आपने ५ फिल्मे की है वोह ख़तम हो जाएगी तो निर्माता और म्यूजिक निर्देशक ही बन के रहिये ... ये दर्शको पर महेरबानी होगी जो आपसे इतना प्यार करते है. यार फिर ऐसे रोले कीजिये जो आपके अभिनय क्षमता के दायरे में हो. मै ये इसलिए बोल रहा हूँ के मै आपके म्यूजिक का बहुत बड़ा फैन हूँ.

**(२ तारे)

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

बैठक जमाने वाले पहले पाठक बनें, अपनी प्रतिक्रिया दें॰॰॰॰

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)