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Saturday, May 15, 2010

पत्नियों के साथ रात बिताने का हक...

पाकिस्तान...जिसका नाम आते ही जेहन में बेहद दकियानुसी और फिल्मों एवं मीडिया की बदौलत बनी एक स्टीरियोटाइप तस्वीर सामने आने लगती है...लेकिन इसबार कुछ अलग और दिलचस्प मामला है...माजरा ऐसा कि सुनकर यकायक यकीन नहीं होगा कि यह ख़बर पाकिस्तान से आई है...जी हां, पाकिस्तान के सिंध प्रांत की सरकार ने क़ैदियों को उनकी पत्नियों से जेल के भीतर मिलने और रात गुजारने की सुविधा देने की घोषणा की है और बाकायदा इसकी व्यवस्था करने के लिए जेल अधिकारियों को आदेश भी दिया है.
पाकिस्तान की स्टेट होम मिनिस्ट्री ने इस संबंध में एक अधिसूचना जारी की है, जिसमें कहा गया है कि सिंध प्रांत की जेलों में क़ैद पुरूषों की पत्नियां अब उनके साथ हर 3 महीने के बाद जेल की भीतर एक रात बिता सकती हैं…
जेल अधिकारियों का आदेश दिया गया है कि जेल के भीतर क़ैदियों और उनकी पत्नियों के मिलने के लिए एक जगह की व्यवस्था की जाए...साथ ही उनकी गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाए.
अधिसूचना के अनुसार 5 साल या उससे अधिक की सज़ा वाले क़ैदी इस सरकारी राहत से लाभ उठा सकते हैं...जो क़ैदी इस सुविधा का लाभ लेना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले जेल के अधीक्षक के समक्ष अपना निकाहनामा प्रस्तुत करना होगा...
अधिसूचना में कहा गया है कि अगर किसी क़ैदी की 2 पत्नियाँ हैं तो उन्हें अलग अलग समय दिया जाएगा, जबकि महिलाएं अपने साथ 6 साल की उम्र तक के बच्चों को भी ला सकती हैं...ये तो बल्ले-बल्ले है जी.
लेकिन ऐसा नहीं कि सभी क़ैदियों को यह सुविधा मिलने वाली है...पहली बंदिश तो 5 साल से अधिक की क़ैद होना है, दूसरी यह है कि संबंधित क़ैदी आतंकवाद के मामले में लिप्त न हो...या उस पर इससे संबंधित कोई मुकदमा न चल रहा हो.
खैर, एक तरफ जहां इस सुविधा को वाज़िब और लोकहित में बताया जा रहा है, वहीं सिंध के जेल अधीक्षकों के कान खड़े हो गए हैं...सरकार का क्या है...घोषणा तो सरकार ने कर दी, लेकिन मूर्त रूप तो उन्हें ही देना...ग़ौरतलब है कि सिंध प्रांत की 20 जेलों में 14 हज़ार के करीब क़ैदी बंद हैं...जबकि इन जेलों में 10 हज़ार क़ैदियों के रखने की ही जगह है...यानी एक तो पहले से ही सुपर हाउसफुल है...ऊपर से जब बीवी और बच्चों वाली बात आएगी, तो उनकी व्यवस्था कैसे की जाएगी...वह भी निहायत ही पोशीदा तरीके से...और तुर्रा ये कि इनमें से 75 फीसदी क़ैदियों के मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं.
हाल ही में अदालत ने अपने एक फैसले में कहा था कि शादीशुदा क़ैदी को अपनी पत्नी से मिलना का पूरा अधिकार है और यह सुविधा उसे जेल के भीतर दी जानी चाहिए...अदालत का कहना था कि क़ैदी अपनी पत्नी से न मिलने की वजह से मानसिक बीमारी का भी शिकार होते हैं और अक्सर नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं...यहां एक बात गौर करने वाली है कि जब क़ैदी जेल के अंदर हैं, तो उन्हें नशीले पदार्थ कहां से उपलब्ध होते हैं...यानी प्रशासन और व्यवस्था...अनचाहे और अप्रत्यक्ष रूप से यह भी मानती है कि उनकी जेलों में हिंदुस्तान की जेलों की ही तरह सबकुछ दुरुस्त है (खासकर बेऊर जैसी जेलों की तरह, जहां उत्कृष्ट किस्म के साहित्य से लेकर गुब्बारे और भी जाने क्या-क्या उपलब्ध होते रहते हैं)
इससे पहले भी 2005 में, पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत की सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर क़ैदियों को जेल के भीतर साल में 3 दिन अपनी पत्नियों के साथ रहने की अनुमति दी थी, जिसका व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया था...यानी पश्चिमोत्तर प्रांत से चली ये बयार अभी दूर तलक जाएगी...अब तो भारत के क़ैदियों की भी यही तमन्ना है कि काश ! ये बयार भारतीय सरहद में दाखिल हो जाए.

आलोक सिंह साहिल

Sunday, November 08, 2009

जेल- सच ज्यादा नाटकीय

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

मधुर भंडारकर आज एक ब्रांड है जो मेनस्ट्रीम सिनेमा में सच्चाई से भरपूर कहानी को बखूबी पेश करते हैं और फिल्म को कॉमर्शियल प्रसिद्धि भी दिलाते हैं। आर्ट फिल्म और मेनस्ट्रीम कॉमर्शियल फिल्मों का ये मेल उनके बाएं हाथ का खेल है, इसीलिए उन्हें और उनके कलाकारों को बार-बार नेशनल अवार्ड से नवाजा गया है।

'चांदनी बार' में बार बाला, 'सत्ता' में सत्ता की गलियारों में फँसे नेता, 'कारपोरेट' में कारपोरेट जगत के स्पर्धापूर्ण जगत में घिरी बिपाशा, 'पेज-3' में मीडिया और सोसाइटी का पर्दाफाश करने वाली कोंकणा और 'फैशन' में प्रियंका चोपड़ा की मादक अदाएं पेश करने वाली मधुर की फिल्में इन्हीं फिल्मों के स्त्री पात्रों के लिए भी जानी जाती हैं। पर पहली बार वे पुरुष किरदार को मुख्य विषय बना कर फिल्म पेश कर रहे हैं।

देखते है मधुर का ये प्रयत्न क्या रंग लता है।

कथा सारांश:

पराग दीक्षित (नील नितिन मुकेश) एक कामयाब इन्सान है जिसकी जिंदगी पूरी तरह से सेट है। अभी-अभी पराग को प्रमोशन की खुशखबरी मिली है और उसकी गर्लफ्रेंड, मानसी (मुग्धा गोडसे) के साथ उसका भविष्य उज्ज्वल है। ऐसी सुख-शांति पूर्वक ऐश-ओ-आराम से भरी पूरी जिंदगी बिताने वाले पराग अपने रूम मेट, केशव राठोड़ (जिग्नेश जोशी) के साथ फ्लैट शेयर करता है। उसके रूम मेट की हरकतें मानसी को हरदम खटकती हैं। पर लड़कों में ये सब चलता है ऐसे बोल के पराग उन्हें नजर अंदाज कर देता है।

पर एक दिन जब पराग ऑफिस से निकलते वक्त अपनी आलिशान कार में जिग्नेश को लिफ्ट देके घर की ओर जा रहा होता है तभी पुलिस उनके कार का पीछा करती है। केशव पराग को कार भगाने बोलता है पर पराग रुक जाता है और कार से बाहर उतरते वक्त पुलिस उसे दबोच लेती है। केशव कार से दौड़ने लगता है और पुलिस पे फायरिंग करता है। पुलिस के जवाबी फायरिंग में केशव घायल हो के बेहोश हो जाता है। पुलिस को पराग के कार के पिछले सीट पे केशव की बैग मिलती है जिसमे 3.5 करोड़ का ड्रग्स मिलता है। पुलिस पराग को थाने ले जाती है।

सभी सबूत पराग के खिलाफ होने के कारण पराग को बेल नहीं मिलती और उसपे चार्जशीट फाइल होके केस कोर्ट में आने तक 2 साल बीत जाते हैं। उस दौरान जेल का माहौल और अनुभव पराग को पूरी तरह से तोड़ देते हैं, पर मानसी की माँ (नवनी परिहार) से मुलाकात और जेल के नए दोस्तों से मिलने वाले सहारे के भरोसे पराग कोर्ट के फैसले तक खुद को संभाल कर दिन बिताता है।

पर कोर्ट का फैसला क्या होता है? उसके बाद पराग के साथ क्या होता है... यही कहानी है जेल की।

पटकथा:

मधुर भंडारकर ने अनुराधा तिवारी और मनोज त्यागी के साथ मिल कर एक सशक्त पटकथा लिखी है। मधुर की बाकी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी समाज के हर तबके से आये कैदियों के रूप में अनगिनत किरदार और उनकी कहानियाँ हैं। इनके जरिये भारतीय जेलों का हदय-विदारक चित्र स्क्रीन पे उतरा गया है।

दिग्दर्शन:

एक के बाद एक सफल और अवार्ड विनिंग फिल्में दे कर मधुर खुद को बार-बार एक सशक्त निर्देशक के तौर पे पेश करने में सफल हुए है। ये फिल्म भी उसी बात पर मुहर लगाती है। मधुर व्यावसायिक सफलता और फिल्म के बिज़नस को ध्यान में न रखते हुए, उन्हें जो विषय भाते हैं, उन्हीं पे कहानी बनाते हैं और उस विषय से पूरी ईमानदारी रखते है। यही एक कारण है जिसके कारण हम उन्हें मास्टर स्टोरी टेलर बोल सकते हैं। विषय के साथ प्रामाणिक रह कर उन्होंने एक जबदस्त प्रभावी फिल्म बनायी है जो दर्शकों को अन्दर से हिला देती है।

अभिनय:

मधुर की फिल्में कहानी के विषय के साथ-साथ उसके कलाकारों के अभिनय के लिए भी जानी जाती है। इसीलिए तो उनके मुख्य कलाकार को बार-बार नेशनल अवार्ड मिलता है। पहली बार मधुर ने पुरुष पात्र को मुख्य भूमिका दे कर फिल्म बनायी है और उसके लिए नील नितिन मुकेश को लिया है। ये नील के लिए अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है। और नील ने मधुर के विश्वास पर खरे उतरे हैं। पराग दीक्षित की सभी भावनाएँ उन्होंने अपने अभिनय से परदे पर जिन्दा कर दी है। जेल में जो उनके दोस्त बनते हैं, वेह नवाब (मनोज बाजपेई), कबीर (आर्य बब्बर) इतने सारे कलाकारों में विशेष रूप से उभर कर आते हैं।

मुग्धा गोडसे का ज्यादा रोल ना होने के कारण वह कुछ खास नहीं कर पाई हैं। पर बाकी सभी कलाकारों के सामान उन्होंने भी पूरी ईमानदारी से अपने किरदार को निभाया है।

चित्रांकन:

कल्पेश भंडारकर ने जेल के बंधे हुए वातावरण को जीवित किया है। लाइट और कलर टोन का उपयोग करते हुए उन्होंने जले का भयंकर मंज़र दर्शकों तक पहुँचाया है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

संगीत के लिए बहुत सारे संगीतकारों से गाने बनवाने के बावजूद संगीत में दम नहीं है पर वह कहानी में ऐसी जगह आते हैं कि ज्यादा बाधा नहीं डालते हैं।

संकलन:

पटकथा और निर्देशक की मेहनत का सम्मान करते हुए देवेन्द्र मुर्देश्वरे ने अप्रतिम संकलन कौशल का प्रदर्शन किया है।

निर्माण की गुणवत्ता:

शैलेन्द्र सिंह द्वारा निर्मित इस फिल्म में निर्माण की गुणवत्ता अच्छी है। प्रसिद्ध कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई ने बड़ा सा जेल का सेट बनाया है जो सच्चाई से मिलता जुलता है। 90% फिल्म उसी सेट में चित्रित है।

लेखा-जोखा:

***(3 तारे)
यह फिल्म पूरी तौर से एक आर्ट फिल्म है। मधुर ने कहानी के साथ ईमानदारी रखते हुए जैसी है वैसी सच्चाई बयां की है। पर यह सच्चाई दर्शको को घुटन महसूस कराती है। दर्शको को खुद जेल में होने की सी भावना आती है। जो दिल से सख्त है उन्हें ये फिल्म बोरियत भरी भी लग सकती है। जिन्हें ऐसे डार्क और घुटन भरी फिल्में पसंद हैं, वे ज़रूर इस मूवी को देखें। आर्ट फिल्म की तौर पे इस मूवी को अवार्ड तो ज़रूर मिलेंगे पर सामान्य दर्शक जो मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते हैं, उन्हें ये फिल्म देखनी की सलाह नहीं दे सकता।

चित्रपट समीक्षक--- प्रशेन ह.क्यावल

Tuesday, January 06, 2009

अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

शहीद भगत सिंह की जीवनी पर बहुत सारे शोध हुए, बहुत से शोध-ग्रंध लिखे गये। प्रेमचंद सजवाला, जो एक वरिष्ठ साहित्यकार तथा विचारक हैं, ने इन सभी शोध पुस्तकों पर रिसर्च किया और शहीद-ए-आज़म की जीवनी को संक्षिप्त रूप में इंटरनेटीय पाठकों के लिए दुबारा लिखा। इस शृंखला की पिछली ९ कड़ियों का प्रकाशन हिन्द-युग्म की कविता पृष्ठ पर हो चुका है। पिछले महीने से हमने विचारों का एक नया मंच शुरू किया। अतः अब से यह शृंखला यहीं प्रकाशित हुआ करेगी---


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

दिनांक 5 जुलाई 1929 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस सचिव की हैसियत से प्रेस को एक वक्तव्य दिया- 'मैंने बहुत दुःख से भगत सिंह व दत्त की भूख हड़ताल का समाचार सुना है। पिछले 20 या अधिक दिनों से उन्होंने कुछ भी खाने से स्वयं को दूर रखा है। मुझे पता चला है कि ज़बरदस्ती भी खाना खिलाया जा रहा है... ऐसे, स्वेच्छा से अपनाए कष्ट के समय हम सब के हृदय उनकी तरफ़ उमड़ते हैं। वे अपने किसी स्वार्थ के लिए अनशन पर नहीं हैं, वरन राजनैतिक कैदियों की स्थिति सुधारने के लिए ऐसा कर रहे हैं। जैसे-जैसे दिन गुज़रते हैं, हम इस कठिन परीक्षा को बेहद उत्तेजना से देखते रहेंगे और मन में उत्कट इच्छा रखेंगे कि हमारे ये दोनों बहादुर भाई इस अग्नि-परीक्षा में सफल हों (The Trial of Bhagat Singh by AG Noorani pp 51-52)

भगत सिंह को लगभग 25 जून 1929 को मिआंवाली जेल से लाहौर सेंट्रल जेल भेजा गया था, जहाँ बटुकेश्वर दत्त पहले ही से थे. दत्त भी तुंरत भूख हड़ताल पर चले गए थे और एक वैसा ही पत्र ब्रिटिश को ठोक दिया था। दिनांक 10 जुलाई 1929 को विशेष मजिस्ट्रेट राय साहेब पंडित श्री किशन की अदालत में, लाहौर सेंट्रल जेल में ही भगत सिंह व साथियों पर सांडर्स हत्या का मुकदमा शुरू हुआ। इसे 'लाहौर षड्यंत्र केस' कहा गया। भगत सिंह व दत्त के अन्य साथी यथा सुखदेव, जतिंदर नाथ दास, अजय घोष, शिव वर्मा, गया प्रशाद, राजगुरु, बीके सिन्हा आदि लाहौर की बोर्स्टल जेल में थे. इन तमाम साथियों ने भी भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। इस कठिन संघर्ष में भगत सिंह समेत सब के वज़न कम होते गए। पर इन सभी जांबाज़ जवानों को तो अग्नि-परीक्षा में कदम दर कदम एक दूसरे के साथ रहना था। इन्हें मृत्यु तक नहीं डरा सकती थी, वज़न कम होना तो इनके लिए नगण्य सी बात थी। इन फौलादी पुरुषों पर तो बिस्मिल का यह शेर ही अक्षरशः लागू होता था:

अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मर मिटने की हसरत ही दिल-ए-बिस्मिल में है.


मुक़दमे में ब्रिटिश की तरफ़ से सरकारी प्रोसीकयूटर खान साहेब कलंदर अली खान के साथ महारानी के प्रतिनिधि सी एच कार्डन नोड थे, तथा अभियुक्त पक्ष में कई वकील थे, यथा लाला दुनीचंद, मलिक बरकत अली, मेहता अमीन चंद, मेहता पूरण चंद, लाला अमरनाथ, बशीर अहमद, बलजीत सिंह, लाला बिशन नाथ, अमोलक राम कपूर आदि।

विशेष मजिस्ट्रेट ने सब से पहले तो आदेश निकाला कि ये सब क्रांतिकारी अदालत में देश-भक्ति के नारे लगाते हुए न आएं। इस पर लाला दुनीचंद ने आपत्ति जतायी कि यह आदेश मजिस्ट्रेट को दरअसल सरकारी प्रोसीक्यूटर ने लिखवाया है। मजिस्ट्रेट इस बात से इनकार कर गए. पर लाला दुनीचंद ने फ़िर अदालत को यह आश्वासन दिया कि वे अभियुक्त नौजवानों से कह देंगे कि वे नारे न लगाएं। अदालत और लाला दुनीचंद के बीच एक और झड़प यह हुई कि यह मुकदमा जेल में चलाया जा रहा है, जहाँ कि कमरा बहुत छोटा है और अदालत में जनता के अन्य लोगों को आने में बहुत कठिन प्रक्रिया के बाद ही अनुमति मिलती है। अदालत ने गुस्से में पूछा कि क्या हम यहाँ सारे शहर को बुला लें? लाला दुनीचंद ने अदालत को ठंडा करते कहा कि यथा-सम्भव अधिक से अधिक लोग आ सकें तो अच्छा। अदालत ने इतना ही किया कि अनुमति के कायदे कानूनों में कुछ ढील दे दी। इधर सरकारी वकील ने अपनी मुश्किल पेश कर दी, कि कुछ लोग यहाँ अदालत में आ कर अभियुक्तों को पुष्प भेंट करने लगते हैं। अभियुक्त वकील मेहता अमीन चंद ने शिकायत की कि जेल के बाहर कार-पार्किंग में भी भेदभाव बरता जाता है। कुल मिला कर ब्रिटिश की व्यवस्था असुविधाजनक ही थी और ब्रिटिश तो केवल अभियुक्तों को सज़ा देने पर तुली हुई थी।

भूख हड़ताल को समाप्त करने के भी ब्रिटिश ने अजीब से हथकंडे अपनाए। इन बहादुर नौजवानों को पहलवानों की मदद से ज़मीन पर लिटा कर ट्यूब के ज़रिये ज़बरदस्ती खाना ठूँसा जाता था। जेलर ने एक और तरीका अपनाया। उसने पानी के सभी मटकों में दूध भरवा दिया कि इन ज़िद्दी लड़कों को जब प्यास लगे तो दूध पीना ही पड़े। पर ये फौलादी लड़के टस से मस न हुए। क्रांतिकारी अजय घोष ने अपनी पुस्तक 'Bhagat Singh and His Comrades' में लिखा है कि एक क्रांतिकारी किशोरी ने तो लाल मिर्ची निगल ली और उबलता पानी पी लिया ताकि गला सूझ जाए और कितनी भी ज़बरदस्ती से खाना ठूँसा जाए, तो वह फफोलों के कारण बाहर आ जाए। ब्रिटिश यह सब देखने को तैयार थी, पर इनकी मांगों को मानने को नहीं। यही इस फिरंगी कौम का चलन था, यही उसकी असलियत। भगत सिंह समेत सभी साथी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल हो चुके थे, पर उन्हें फिर भी अदालत तक हथकड़ियों में ले जाया जाता था। एक दिन भगत सिंह को स्ट्रेचर पर लिटा कर अदालत ले जाया जा रहा था। अदालत पहुँचते ही भगत सिंह हथकड़ियों में जकडे खड़े हो गए और मजिस्ट्रेट पर गरजने लगे - 'मजिस्ट्रेट साहेब, पुलिस वालों द्वारा हथकड़ियाँ पहनाया जाना हमारा अपमान है। आप को इन पुलिस वालों के हुक्म का गुलाम नहीं होना चाहिए... हमें आप पर कोई विश्वास नहीं है, क्योंकि आप पूरी तरह पुलिस के नियंत्रण में हैं। इस प्रकार हथकड़ियों में हम एक दूसरे से बातचीत कैसे करें, या कुछ नोट करना हो तो कैसे करें?...

पर भूख हड़ताल के इस पूरे प्रकरण का सब से दर्दनाक पन्ना है, क्रन्तिकारी जतीन्द्र नाथ दास की शहादत। इन सब नौजवानों के लिए देश के लिए जान देना मानो एक पर्व की तरह था।

दिनांक 15 जुलाई को जेल सुप्रिंटेन्डेंट ने आई.जी (कारावास) को एक रिपोर्ट भेजी कि 14 जुलाई को भगत सिंह व दत्त को विशेष भोजन प्रस्तुत किया गया था, क्यों कि आई.जी (कारावास) ने ऐसा आदेश टेलीफोन पर दिया था। पर भगत सिंह ने उन्हें बताया कि वे विशेष भोजन तब तक स्वीकार न करेंगे, जब तक विशेष डाइट का वह मानदंड सरकारी गज़ट में प्रकाशित न किया जाएगा कि यह मानदंड सभी कैदियों के लिए है।

इस भूख हड़ताल में जतिन दास की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। भगत सिंह साथियों से सलाह लेने के बहाने बोर्स्टल जेल जा कर सभी साथियों के स्वस्थ्य का समाचार पूछ लिया करते थे। उन्हें कभी नहीं लगता था कि वे अकेले हैं, बल्कि देश-भक्ति की एक ज्वाला थी, जो सब को सम्पूर्ण रूप से जोड़े रहती थी। इधर चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति बहुत चिंताजनक है। वे दवाई लेने तक से इनकार कर रहे हैं। एक डॉ. गोपीचंद ने दास से पूछा भी- आप दवाई तथा पानी क्यों नहीं ले रहे?

दास ने निर्भीक उत्तर दिया - मैं देश के लिए मरना चाहता हूँ... और कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए।

21 अगस्त को कांग्रेस के एक अन्य देशभक्त नेता बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन ने दास को बहुत मनाया- दवाई ले लो। सिर्फ़ जीवित रहने के लिए। भले ही भूख हड़ताल न तोड़ो। मेरे कहने पर सिर्फ़ एक बार प्रयोग के तौर पर दवा ले लो, और पन्द्रह दिन तक देखो। अगर तुम्हारी मांगें नहीं मानी जाती, तो दवाई छोड़ देना।

दास ने कहा - मुझे इस सरकार में कोई आस्था नहीं है। मैं अपनी इच्छा-शक्ति से जी सकता हूँ। भगत सिंह ने दबाव डालना जारी रखा। इस पर दास ने केवल दो शर्तों पर दवाई लेना स्वीकार किया, कि दवाई डॉ. गोपीचंद ही देंगे। और कि भगत सिंह दोबारा ऐसा आग्रह नहीं करेंगे। (Shaheed-e-Azam Sardar Bhagat Singh: The Man and His Ideology by GS Deol pp 67-68).

26 अगस्त को चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई है। वे शरीर के निचले अंगों को हिला डुला नहीं सकते। बातचीत नहीं कर सकते, केवल फुसफुसा रहे हैं। और 4 सितम्बर को उनकी नब्ज़ को कमज़ोर व अनियमित बताया गया, उल्टियाँ हुई। 9 को नब्ज़ बेहद तेज़ हो गई। 12 को उल्टी हुई, नब्ज़ अनियमित... 13 सितम्बर, अपने अनशन के ठीक चौंसठवें दिन, दोपहर एक बज कर दस मिनट पर इस बहादुर सपूत ने भारत माँ की शरण में अपने प्राणों की आहुति दे कर इतिहास के एक पन्ने को अपने बलिदान से लिख डाला।

इस युवा देव-पुरूष के अन्तिम शब्द थे - मैं बंगाली नहीं हूँ। मैं भारतवासी हूँ।

जी एस देओल ऊपर संदर्भित पुस्तक में जतिन दास की शहादत पर लिखते हैं -'ब्रिटिश के लिए ईसा मसीह भी शायद एक भूली-बिसरी कथा थे'।

जिस प्रकार यीशु सत्य की राह पर सूली चढ़ गए, जतिन दास सत्य के लिए युद्ध करते करते शहीद हो गए।

विशाल भारत की तरह आयरलैंड जैसे छोटे-छोटे देश भी ब्रिटिश की पराधीनता का अभिशाप सह चुके थे। आयरलैंड के ही एक क्रांतिकारी युवा पुरूष टेरेंस मैकस्विनी ने भी जतिन दास की तरह ही शहादत दी थी। जतिन दास के जाने की ख़बर विश्व के अखबारों में छपी थी। इसे पढ़ कर मैकस्विनी की बहादुर पत्नी ने एक तार भेज कर लिखा - टेरेंस मैकस्विनी का परिवार इस दुःख तथा गर्व की घड़ी में सभी बहादुर भारतवासियों के साथ है। आज़ादी आएगी।

जेल के बाहर कई कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में असंख्य भीड़ जमा थी।

जतिन दास जिंदाबाद ... इन्किलाब जिंदाबाद के नारों से आसमान गूँज उठा। सुभाष चन्द्र बोस ने देश के इस सपूत को अपना सलाम भेजा। जतिन दास को पूरा देश नमन कर रहा था। अख़बार श्रद्धांजलियों से भरे थे। जतिन दास के भाई के.सी दास ने अपने भाई का पार्थिव शरीर प्राप्त किया जिसे लाहौर में एक भारी जुलूस के बीच कई जगहों से होते हुए रेलवे स्टेशन तक लाया गया। लाखों लोगों की आंखों में आंसू थे। आसमान फिर उन्हीं देश-भक्ति से ओत-प्रोत नारों से गूंजा था।

जतिन दास जिंदाबाद ... इन्किलाब जिंदाबाद

लाहौर स्टेशन से जतिन दास के पार्थिव शरीर को एक रेलगाड़ी में हावड़ा भेजा गया।

ठीक अगले दिन असेम्बली में मोती लाल नेहरू ब्रिटिश पर गरज रहे थे। अपने भाषण में उन्होंने कैदियों के साथ हुए बुरे बर्ताव पर ब्रिटिश को खूब लताड़ा। उन्होंने सरकार के रवैय्ये को बेहद अमानवीय बताया। पंडित मदन मोहन मालवीय ने भी व्यंग्य बाणों से ब्रिटिश के निर्मम चेहरे को छलनी सा कर दिया। सभी क्रांतिकारियों के चरित्र की उन्होंने भरपूर प्रशंसा की और कुछ सदस्यों ने ब्रिटिश पर जतिन दास की हत्या का आरोप लगाया...

क्रमशः॰॰॰॰

प्रेमचंद सहजवाला