Thursday, March 18, 2010

मैंने अपने लिये सबसे सेफेस्ट खान को चुना हैः करीना कपूर

आज कल करीना कपूर फिल्मों की व्यस्तता को छोड कर अपने परिवार के साथ व्यस्त हैं। और हो भी क्यों नहीं , क्योंकि हाल ही में उन्हें दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हमने उन्हें इस दूसरी बार मासी बनने की खुशी में बधाई देते हुए उनके व्यक्तिगत जीवन फिल्मों के बारे में लंबी बातचीत कर ली।

कैसा लग रहा है जब आपको दूसरी बार मासी बनने का सौभाग्य मिला है?
- यह तो अच्छा ही लग रहा है। नया बच्चा ‘कियान’ वाकई बहुत ही ख़ूबसूरत है। सामरिया बहुत कुछ संजय कपूर पर लगती है परन्तु यह नया बच्चा बहुत कुछ करिश्मा पर गया है। यह हमारे परिवार के लिए एक उत्सव मनाने का समय आया है क्योंकि बहुत दिनों बाद इस परिवार में लड़‌के का आगमन हुआ है।

आपकी फिल्म 3 ईडियट ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं और आपने आमिर के साथ अपनी फिल्मी ज़मीन मजबूत कर ली है, कैसा लग रहा है आपको?
-मैं समझती हूँ कि यह सब इसलिए भी हुआ है क्योंकि यह राजू हिरानी की फिल्म थी तथा मैं और आमिर पहली बार साथ में आ रहे थे इसलिए लोगों को फिल्म से बहुत उम्मीद भी थी। मैं समझती हूँ कि हमारी जोड़ी को लोगों ने पसंद भी किया।

क्या आपने इस फिल्म को राजू और आमिर के होने के कारण किया?
-मेरी हर फिल्म में चाहे वो अच्छी हो या बुरी हो, मैंने दूसरे कलाकारों के सामने अपनी मौजूदगी को बनाए रखी है। मेरा ‘ एजन्ट विनोद ’ व ‘ गोलमाल 3 ’ में भी जबरदस्त रोल है। मैं अपनी हर फिल्म में बहुत मेहनत करती हूँ क्योंकि मैं अपने आपको एक स्टार के पहले एक अच्छे कलाकार के रूप में पेश करना चाहती हूँ। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई मुझसे कहे कि मैं अपनी फिल्म में अच्छी लग रही थी क्योंकि मैं जानती हूं कि कोई भी मुझे अपनी खूबसूरती के लिए नहीं अपने टेलेंट के लिए अपनी फिल्म में लेता है। मैं यहां अपना टेलेंट दिखाने के लिए हूं न की अपनी खूबसूरती और इसी कारण से मुझे लडकों की प्रमुखता वाली फिल्म 3 ईडियट में भी लिया गया। मुझे लगता है कि मेरा दर्शक वर्ग मुझे ‘ कम्बक्त इश्क ’ जैसी फिल्मों में देखना पसंद नहीं करता है और यह गलती मैं दोबारा दोहराना नहीं चाहती।

फिल्मकुर्बानका रिव्यू अच्छा है फिर आपने उसमें काम क्यों नहीं किया?
- जरूरी नहीं कि मैं हर फिल्म करूँ। जो वक्त के अनुसार सही लगे वही करना चाहिए। एक एक्टर को एक एक्टर की तरह रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि दो सुपरहिट देने के बाद कलाकार सुपर स्टार बन जाता है उसे अपनी फ्लाप फिल्मों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि दर्शकों कह निगाह में वह महत्वपूर्ण होता है।

आपकी फिल्म साइन करने के लिए एक लंबे प्रोसेस से गुजरना पड़ता है?
- कई बार ऐसा होता है और कई बार नहीं भी। हम एक्टर एक वैज्ञानिक की तरह होते है जो अलग-अलग प्रयोग करता रहता है। लोग जानते है कि करीना रिस्क ले सकती है और मैंने ‘चमेली’ जैसी फिल्म करना स्वीकार किया। मैं इस बात की परवाह नहीं करती कि लोग टशन के बारे में क्या कहते है। मैंने फिल्म में अपना किरदार को जीवंत करने के लिए अपनी बॉडी लेंगवेज को हर तरह से चेंज किया। कितनी एक्ट्रेसेस हैं जो इस प्रकार की चुनौती को स्वीकार कर पाती है वो भी इस पुरूष प्रधान इंडस्ट्री में। टशन मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उसी दौरान मैं सैफ से मिली थी। कभी-कभी फ्लाप फिल्म भी एक्टर के लिए एक बडी न्यूज बन जाती है।

आप सभी खान कलाकारों में चुनने में क्या ध्यान करती हैं?
- मैंने अपने निजी जीवन के लिए सबसे सेफेस्ट खान का चुनाव कर लिया है। बाकी सभी खानों में सभी एक दूसरे से अलग लगते हैं। सैफ और मैं एक दूसरे के करीबी दोस्त हैं और आमिर और शाहरूख हमारे परिवार जैसे हैं। मेरी बहन सलमान को पसंद करती है।

पर सबमें हो रही प्रतिस्पर्धा जग जाहिर है?
- यहां केवल बीकाऊ 3 या 4 है तो यह प्रतिस्पर्धा तो होनी ही है लोगों के पास कोई चाइस भी तो नहीं है।

आज कल फिल्म इंडस्ट्री में आपको सबसे महंगी एक्ट्रेस के रूप में आंका जा रहा है?
- मैं नहीं जानती । पर आप बताइये हर दिन यह रिपोर्ट आती है कि फलानी एक्ट्रेस इतना लेती है, फलानी इतना। यदि सबसे ज्यादा प्राइज लेने वाली एक्टेªसों की लिस्ट बने तो शायद मेरा उसमें आखरी दस में नाम आयेगा।

आपके और सैफ के संबंधों को लेकर बहुत सारी चर्चाए होती रहती हैं आप उनको किस प्रकार से लेती हैं?
- मेरे व सैफ के संबंध स्पष्ट हैं। हमारे बारे में बहुत कुछ छपता रहता है कि आज हमनें शादी करली, कल तलाक हो गया इन सब गौसिफ का हम मजा भी लेते है। पर हां , जब हम शादी करेंगे तब सारा जमाना जान जाएगा। ये सब कुछ जल्द होने वाला भी है।

आप अपने व्यस्त समय में से परिवार के लिए समय किस प्रकार निकाल पाती हैं?
-मैं बहुत सा समय निकाल लेती हूँ। एक एक्टर के लिए जो लगातार काम कर रहा हो समय निकालना जरूरी है। मैं साल में चार फिल्मों से ज्यादा नहीं करती । मैंने अपने सेक्रेट्री से भी कह रखा है कि हर तीन महीनों के बाद मुझे ब्रेक चाहिए। मैं सारा साल एक साथ काम नहीं कर सकती।

सुना गया था कि आप भी आई पी एल टीम खरीदने वाली थीं?
- हम इसके लिए गये भी थे व पेपर वर्क भी पूरा किया था पर ये सब केंसल हो गया। यदि दोबारा मौका मिला तो यह सब सैफ के समझ का काम है मैं तो केवल फिल्मों के बारे में जानती हूं।

तो क्या आप प्रोडक्शन हाउस खोलने में रूचि रखती है?
- मैं अपने लिए तो फिल्म बनाने से रही। अभी तो बाहर की फिल्मों से ही समय नहीं मिल पा रहा हैं। अभी एक फिल्म मधुर भंडारकर के साथ करने का प्लान चल रहा है। पटकथा लिखी जा रही है पर अभी सब कुछ तय नहीं हुआ है।

‘मिलेंगे-मिलेंगे’ के बारे में रोज सुना जा रहा है पर पता नहीं कब मिलेंगे?
- यह तय हो चुका है कि फिल्म जल्द रिलीज होने जा रही है । मैंनें अपनी ओर से निर्माता बोनी कपूर को कह दिया है कि मैं फिल्म के प्रमोशन के लिए तैयार हूं । बाकी जो कुछ मीडिया में छप रहा है मेरे व ‘ााहिद के बारे में उसके लिए हम आदि हो चुके है।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Tuesday, March 16, 2010

सुनिए राजेन्द्र यादव का 93 मिनट का इंटरव्यू

पिछले 6 दशकों से रचनाकर्म में सक्रिय राजेन्द्र यादव साहित्य में महानायक की हैसियत रखते हैं। साल 2006 में वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश और युवा कवि-लेखक रामजी यादव की टीम (पीपुल्स विजन प्रोडक्शन कम्पनी) ने राजेन्द्र यादव का लम्बा इंटरव्यू लिया। पीपुल्स विजन यादव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्म बना रहा है। यदि आप भी इस प्रोजेक्ट से किसी भी तरह से जुड़ना चाहें तो रामजी यादव से (yadav.ramji2@gmail.com या 9015634902 पर) संपर्क करें। इस साक्षात्कार में राजेन्द्र यादव ने कविता की विलुप्ति, कहानी-नई कहानी, दलित और महिला लेखन, मार्क्सवाद की भारत में असफलता, साहित्य और राजनीति के पारस्परिक संबंधों इत्यादि पर खुलकर बोला। हमें यह साक्षात्कार संग्रहणीय लगा और यह भी लगा कि शायद हिन्द-युग्म के बहुत-से पाठक भी इसे सुनकर ऐसा महसूस करेंगे कि बहुत कुछ जानने और समझने को मिला।



यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक कार्यक्रम "अनहद" में राजेन्द्र यादव का कथापाठ शुक्रवार, 19 मार्च 2010 की शाम 5‍ः30 बजे आयोजित होगा। अध्यक्षता निर्मला जैन करेंगी। जरूर पधारें।

Monday, March 15, 2010

महिला आरक्षण बिल - एक लंबे सफर की शुरूआत

0 प्रेमचंद सहजवाला

मंगलवार 9 मार्च 2010, ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ से एक दिन बाद का दिन भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक दिन है, जब विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के उच्च-सदन ने बाबा साहब के संविधान में रेखांकित ‘समानता’ शब्द की प्रगति के लिए एक बड़ी छलांग लगाई है. राज्य सभा ने संविधान का 108 वां संशोधन बिल पारित कर दिया है, जिसके अनुसार देश की लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई. यह एक लंबे सफर के लिए उठाया गया मात्र पहला कदम होते हुए भी एक बड़ी छलांग माना जा रहा है क्योंकि निम्न-सदन लोकसभा की तरह उच्च-सदन को भी इसे दो तिहाई बहुमत से पारित करना था और ऐसा करना टेढ़ी खीर ही माना जा रहा था. यू.पी.ए सरकार के विलंबित तिकड़मों, शरद यादव की जनता दल (यू) में दो फाड़ा जिसके अंतर्गत नितीश कुमार ने पार्टी के फैसले के विरुद्ध बगावत का झंडा गाड़ दिया तथा अन्य कारणों से बिल को 186:1 मतों से पारित होने में सफलता मिल गई.
दूरदर्शन चैनलों पर यह सब देख कर मुझे सहसा वह दिन याद आ गया जब बाबा साहेब आम्बेडकर देश के प्रथम क़ानून मंत्री की हैसियत से सदन में ‘हिंदू कोड बिल’ प्रस्तुत करते हुए कह रहे थे – ‘आखिर हमारे पास यह आज़ादी है किस लिए? हामारे पास आज़ादी अपने सामाजिक तंत्र में सुधार लाने के लिए है जो कि विषमताओं असमानताओं तथा अन्य बातों से भरा है और हमारे ‘मूल अधिकारों’ के प्रति कई विरोधाभास लिए मौजूद है (Dr. BR Ambedkar and untouchability by Chritoffe Jaffrelot p 115).
सदन में हिंदू कोड बिल के माध्यम से बाबा साहेब वास्तव में हिंदू नारी का सशक्तीकरण करना चाहते थे जिसमें बुद्ध, जैन तथा सिख धर्मं की नारियां भी सम्मिलित थी. बिल में कई प्रावधान थे जिन के माध्यम से वे नारी-पुरुष के बीच असमानता के प्रतीकों का उन्मूलन कर देना चाहते थे. उदाहरण के तौर पर बाबा साहेब ने तर्क दिया कि वर्त्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का देहांत होता है तो उस की विधवा को, उस के बेटे की विधवा को (यदि वह मर चुका है और विवाहित था) और यहाँ तक कि उस के पोते की विधवा को (यदि वह भी मर चुका है और विवाहित था) संपत्ति में हिस्सा मिलता है. फिर अपनी पेट-जायी सगी बेटी को क्यों भुला दिया जाए? बाबा साहेब ‘कोड बिल’ द्वारा नारी अधिकारों में धुआंधार परिवर्तन करना चाहते थे ताकि वह समाज में पुरुष के बराबर खड़ी होने का साहस कर सके. मसलन उस समय तक पति के देहांत के बाद कोई भी नारी पति की संपत्ति पर केवल ‘Limited Estate’ (सीमित स्तर) जितना अधिकार सकती थी. वह उस संपत्ति से आने वाली आय का फायदा तो उठा सकती थी पर केवल कुछ कानूनी मसलों के अलावा उस का मूल-संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था. लेकिन कोड बिल ने ‘Limited Estate’ को Absolute Estate (पूर्ण स्तर) में बदल कर नारी को पुरुष के बराबर ला कर खड़ा कर दिया ((The Essential Writings of BR Ambedkar p 498 and India After Gandhi by Ramchandra Guha pp 228-229). इसी प्रकार बिल ने गोद लेने के मसले पर भी नारी को सशक्तीकृत कर दिया, पुरुष पर यह बंधन डाल कर कि वह किसी भी बच्चे को गोद ले तो पत्नी की सहमति अनिवार्य रूप से ले ले तथा गोद लेने की इस क्रिया को वह असालत पंजीकृत ज़रूर करवा दे (Essential Writings… p 501). उस समय तक एक विवाहिता नारी की स्थिति यह थी कि यदि वह किसी कारण पति के साथ एक ही घर में नहीं रहती थी तो वह खुद को पति से एक पाई तक प्राप्त करने से वंचित कर देती थी. लेकिन इस बिल ने स्वीकारा कि निश्चय ही कुछ परिस्थितयां हैं जिन में यदि पत्नी पति से अलग रहती है तो वह कुछ ऐसे कारणों से ऐसा करती होगी जिन पर उस का वश नहीं है तथा उसे पति की ओर से कोई भी खर्चा न दिया जाना उस के साथ सरासर ना इंसाफी है (वही पुस्तक p 499). अतः इस बिल ने किसी विवाहिता को कुछ विशिष्ट परिस्थितयों यथा पति की कोई जघन्य बीमारी, उस के द्वारा किया जा रहा अत्याचार या वेश्या गमन या पत्नी के परित्यक्ता होने पर पति से खर्चे का अधिकार दिलाया. इस बिल ने तलाक का एक सर्वथा नया कदम भी उठा जिसका कि हिंदू समाज में इस से पहले कोई चलन था ही नहीं! बिल ने बहुनिष्ठता की जगह एकनिष्ठता को स्थापित किया क्यों कि हिंदू समाज में भी उस समय तक बहु-विवाह की प्रथा थी.
लेकिन दुर्भाग्य कि बाबा साहेब के इस बिल की पैदा होते ही हत्या करनी पड़ी क्योंकि इस बिल के विरोध में सहसा सदन के गणमान्य सदस्यों की एक सेना खड़ी हो गई और विरोध की ऐसी तेज़ आंधी आई कि बाबा साहेब का ह्रदय छलनी हो गया और उन्होंने कानून मंत्री के पद से ही इस्तीफ़ा दे दिया. पंडित नेहरु और बाबा साहेब के रास्ते अलग हो गए. जो महापुरुष इस बिल का विरोध कर रहे थे वे सब के सब Hindu Personal Law (हिंदू व्यक्तिगत क़ानून) के परम भक्त थे तथा जो महापुरुष इस बिल से सख्त नफरत करते थे उन के मुखिया कोई और नहीं, देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे ! कुछ वर्षों बाद जब तक पंडित नेहरु ने अनेक तिकडमों व संशोधनों से तथा बिल को कई हिस्सों में बाँटकर आखिर उसे पारित नहीं करवा कर छोड़ा तब तक नारी को शक्ति प्रदान करने वाला यह बिल देश के शास्त्र प्रेमी महापुरुषों की हठ की वेदी पर बालि चढ़ा रहा. पंडित नेहरु ने पहली बार विरोध की आंधी से घबरा कर सदन में यह बिल मतदान तक के लिए प्रस्तुत नहीं किया था क्योंकि विरोध के चक्रवात में उन की अपनी कुर्सी तक डूबने को आ गई थी. परन्तु इस बार उन्होंने सब को कड़ी चेतावनी भी दी और ‘व्हिप’ भी जारी किया. इस बिल का विरोध इतना प्रचंड रहा कि देश में एक जगह साधुओं ने एक महारैली कर डाली. साधुओं ने खोज बीन कर जिस हिंदू नारी को एक आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत किया, वह थी रामायण की सीता. रामायण की सीता ! जिस ने कुछ नहीं किया, फिर भी उसे महल से निकलना पड़ा, अग्नि से गुज़रना पड़ा और पृथ्वी में समा जाना पड़ा ! देश की ‘संविधान-सभा’ के उच्च-शिक्षित किन्तु शास्त्रांध कानून-निर्माता यह भी भूल गए कि हमारे पवित्र (!) शास्त्रों के नारियाँ तो हमेशा पुरुष की ज़ालिम तानाशाही की शिकार रही, चाहे वह अभागी द्रौपदी हो जिसे उस का सब से बड़ा पति युधिष्ठिर राजसी जुए में पापी दुर्योधन के हाथों हार गया, चाहे निर्दोष अहिल्या जिसे उस के पवित्र (!) ऋषि पति ने पत्थर बना दिया या सुलोचना ही क्यों न हो जिसे राम-रावण युद्ध में पति मेघनाथ के मरते ही समाज की पाप-मय ‘सती प्रथा’ के होते जल मरना पड़ा! बेचारी सावित्री ने तो खुद को बच्चे पैदा करने वाली एक मशीन ही समझा और एक दो नहीं पूरे सौ पुत्र मान डाले ताकि मृत्यु देवता यमराज उस के पति सत्यवान को जीवित लौटा दें! केवल कुछ बच्चों की मांग रखने पर भी यमराज उस के पति को जीवित वापस न करते क्या!...

(क्रमशः ... अगले अंक में सन 1891 में विवाहित लड़की संबंधी क़ानून की गत लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुषों ने क्या बना दी...)

Sunday, March 14, 2010

शापित से बहुत कुछ सीखने को मिलाः श्वेता अग्रवाल

श्वेता अग्रवाल फिल्म ‘शापित’ से पहले टर्की की एक फिल्म ‘मिरार’ में और ओलिवर पॉलिस की स्विस जर्मन फिल्म ‘तंदूरी लव’ में भी अभिनय कर चुकी हैं। ‘स्टार प्लस’ पर प्रसारित धारावाहिक ‘देखो मगर प्यार से’ में मोटी-सी लडकी के किरदार में नज़र आ चुकीं श्वेता अग्रवाल इन दिनों फिल्म सर्जक विक्रम भट्ट की खोज के रूप में उनकी आगामी फिल्म ‘शॉपित’ में अभिनय करके चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस फिल्म में उनके हीरो है मे मशहूर संगीतकार उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण हैं। देखा जाए तो यह फिल्म श्वेता के लिए डेब्यू होगी व अपनी बॉलीवुड की पहली ही फिल्म विक्रम भट्ट की हॉरर फिल्म 'शापित’ से कर रही है।

प्रश्न- कैसा लग रहा है अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म को करके ?
- पहले मैं बहुत ही डरी हुई थी कि बॉलीवुड में मेरी पहली फिल्म ही विक्रम भट्ट जैसे महान निर्देशक के साथ करने को मिल रही है । फिल्म 'शापित’ एक हॉरर फिल्म होने के साथ साथ प्रेम कहानी वाली भी फिल्म हैं। विक्रम भट्ट उन निर्देशकों में से हैं, जो अपने दर्शकों को अपनी फिल्म के द्वारा एक जगह पर बैठे रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। मुझे पूरा यकीन हैं कि उनकी फिल्म ‘शापित’ दर्शकों निराश नहीं करेगी। इन्ही सब कारणों से मुझे इस फिल्म को करने में मजा आ रहा हैं।

प्रश्न- इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताइए?
- इस फिल्म में मैंने काया का किरदार निभाया है जो कि एक रायल परिवार की कॉलेज में पढने वाली लडकी है । काया को इस बात की जानकारी नहीं है कि उसके परिवार को 300 साल पहले एक श्रॉप मिला था जिसकी वजह से इस परिवार की कोई लडकी जब भी शादी करना चाहेगी तो बुरी ताकत उसे खत्म कर देगी ।प्यार के सागर में डूबी काया अपने प्रेमी अमन से सगाई करके जैसे ही सगाई की अंगूठी पहनती हैं वैसे ही वह बुरी आत्मा उसके पीछे पड जाती हैं । तब काया के माता पिता काया को उसके शापित होने की बात बताते हैं। इसके बाद भी काया का प्रेमी अमन उससे रिश्ता नहीं तोडता क्योंकि काया और अमन ने तो पूरी जिन्दगी एक साथ रहने का इरादा पक्का किया हुआ हैं । फिर यह दोनों उस बुरी आत्मा से बचने के लिए क्या क्या नहीं करते हैं यह डरावना मंजर इस फिल्म में दिखाया गया है ।

प्रश्न- आपको नहीं लगता कि आपको अपना कैरियर हॉरर फिल्म से शुरू करना महंगा पड़ सकता हैं?
- मैं मानती हूं कि बॉलीवुड में हॉरर फिल्म के साथ कैरियर शुरू करना काफी रिस्की है। लेकिन मुझे इसमें कोई रिस्क नहीं लगता और न ही किसी से मेरी इस बारे में शिकायत है। मुझे विक्रम भट्ट की फिल्म होने से इस फिल्म पर पूरा भरोसा है। वैसे ‘शापित’ में पागलपन वाला हॉरर नहीं हैं। इसमें एक प्रेम कहानी है। काया और अमन एक दूसरे से बहुत ज्यादा प्यार करते हैं। वे एक दूसरे पर जान न्यौछावर करने वाला प्यार करते है। बुरी आत्मा से बचने के लिए वे क्या क्या नहीं करते हैं और बुरी आत्मा किस तरह उनका पीछा करता है और कई तरह के घटनाक्रम होते है। इस फिल्म की कहानी में रोचकता के साथ डरावनापन भी है।

प्रश्न- फिल्म की शूटिंग के दौरान क्या अनुभव रहा ?
- इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बडी चुनौती के रूप में था क्योंकि मैं भी एक जगह बैठकर हॉरर को नहीं देख सकती थी। इसी वजह से इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं खुद डरी हुई रहती थी। एक बार एक ऐसा दृश्य फिल्माया जा रहा था, जिसके लिए मुझे एक जगह बंद कर दिया जाता हैं। वहां मिट्टी थी, गंदगी थी और जगह इतनी सकरी थी कि मैं हिल डुल भी नहीं सकती थी। दीवार से चेहरा सटा हुआ था। मैं न बाहर वालों की आवाज सुन सकती थी, न बाहर वाले मेरी। कैमरा अपना काम कर रहा था। तभी अचानक एक मकड़ी वहां आ गयी। मकड़ी से तो मैं बहुत डरती हूं। मुझे लगा कि मेरी जिन्दगी खत्म हो गयी। मैं बुरी तरह डर व सहम गई थी। जैसे ही सीन ओ.के. हुआ व दरवाजा खुला, मैं जोर-जोर से रोने लगी। डरी सहमी मैं आधे घंटे तक रोती रही। विक्रम भट्ट वगैरह ने मुझे काफी समझाया। बडी मुश्किल से दो घंटे बाद मेरे अंदर का डर खत्म हुआ और मैं नॉर्मल हो सकी।

प्रश्न- निर्देशक विक्रम भट्ट के साथ काम करने का क्या अनुभव रहा?
-बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। हर फिल्मकार की काम करने की अपनी अलग स्टाइल होती है। विक्रम भट्ट की तो स्टाइल ही अलग हैं। वह तो हमारे गुरू की तरह हमें काम के बारे में बता रहे थे। उन्होंने हमारी बहुत मदद की । वह खुद सीन करके बताते थे कि हमें किस प्रकार करना है। इसके बावजूद जब समस्या हल नहीं होती थी तो वह दृश्य में कुछ बदलाव भी करते थे। विक्रम भट्ट जी खुल विचारों के है। उनके साथ काम करके बहुत ही मजा आया। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा।

प्रश्न- क्या कारण है कि ‘शापित’ बन कर तैयार है और आपने अभी तक कोई दूसरी फिल्म साइन नहीं की है?
-मैं पिछले डेढ साल से ‘शापित’ के साथ इस तरह जुडी हुई हूँ कि कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला। मेरे दिमाग में ही नहीं आया कि मुझे किसी नये प्रोजक्ट से भी जुडना चाहिए। अब जब आप लोग सवाल कर रहें हैं तो मुझे लगता हैं कि अब मुझे दूसरी तरफ भी ध्यान देना पडेगा। मुझे हर निर्माता-निर्देशक व कलाकार के साथ काम करना हैं बशर्ते अच्छी पटकथा व उसमें मेरा किरदार दमदार हो। मैं यहां तब तक रहूंगी जब तक मुझे काम मिलेगा और लोग मुझे परदे पर देखना पसंद करेंगे। मैं अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ परफार्मेंस देने का पूरा प्रयास करूंगी।

प्रश्न- आप अंतरराष्ट्रीय फिल्मों से पहले अपने कॉलेज के दिनों में ‘देखो मगर प्यार से’ एक धारावाहिक भी कर चुकी हैं तो क्या अब टी वी सीरियल भी करेंगी?
-फिलहाल तो मैं फिल्में ही करना चाहूँगी जो मेरी प्राथमिकता है पर भविष्य में कुछ अच्छा ऑफर मिला तो टी वी भी कर सकती हूँ।

प्रस्तुतिः अशोक भाटिया

Saturday, March 13, 2010

तलाश-भारत के महानायक की

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसने देश की आजादी में सराहनीय योगदान किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके नेताओं की भूमिका को राष्ट्र नकार नहीं सकता। आज कांग्रेस पार्टी अपना 125 वॉ जन्म वर्ष मना रही है। 1885 में कांग्रेस का जन्म हुआ, जिसके संस्थापक ए0ओ0 ह्यूम जो एक रिटायर्ड अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी थे तथा प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष डब्लू0सी0 बनर्जी हुए। ए0ओ0 ह्यूम, डब्लू सी0 बनर्जी से लेकर सोनियां गॉधी तक कांग्रेस पार्टी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 1885 से लेकर 1905 तक लगातार 20 वर्षों तक कांग्रेस में उदारवादी गुट का प्रभाव रहा, जिसके प्रमुख नेता दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, फिरोज शाह मेहता, गोविन्द राना डे, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय थे। 1905 से 1919 के मध्य नव राष्ट्रवाद तथा गरम पंथियों का उदय हुआ जिसके प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) तथा अरविन्द घोष प्रमुख थे। लाल-बाल-पाल तथा अरविन्द्र घोष के प्रयासों के कारण प्रथम बार 1905 में कांग्रेस के बनारस राष्ट्रीय अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में स्वदेश तथा 1906 के कलकत्ता राष्ट्रीय अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में पहली बार स्वराज की मांग रखी गयी।
स्वतन्त्र भारत पर सबसे अधिक शासन करने वाले उक्त राजनैतिक दल का चारित्रिक पतन देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रारम्भ हुआ। किसी समय
लेखक
राघवेन्द्र सिंह
117/के/145 अम्बेडकर नगर
गीता नगर, कानपुर - 25
फोन नं- 9415405284
उत्तर प्रदेश (भारत)
email: raghvendrasingh36@yahoo.com
ईमानदारी से कार्य एवं सभी को साथ ले चलने वाली कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद अचानक एक परिवार की पार्टी होती चली गयी। उनके साथ काम करने वाले राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थों के चलते एक परिवार के आधीन होते चले गये। जाने-अन्जाने पूरी पार्टी जो किसी समय स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य किरदार थी स्वयं परातन्त्र हो गयी। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस विषय पर आपत्तियॉ भी की, परन्तु उनके स्वर नक्कार खाने में तूते की आवाज बनकर रह गये। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी सोनियॉ गांधी की इतालवी अंदाज के हिन्दी भाषणों एवं राहुल गांधी के टोटकों की पार्टी बनकर रह गयी। उक्त राज कुमार कभी दलित के घर में भोजन करते है तो कभी उनके बच्चे को गोंद में उठाकर पुचकारते, कभी उनके यहॉ रात बिताते है तो कभी ए0टी0एम0 से लाइन में लगकर पैसे निकालने से लेकर मैट्रो ट्रेन में सफर कर व्यवहारिक जनसमर्थन हासिल करने का प्रयास करते है। क्या उक्त सभी सामाजिक पैतरेबाजी एवं उनकी कारगुजारियां राजनैतिक जनसमर्थन की तरफ किंचित मात्र भी इंगित नहीं करती? क्या कभी किसी ने उनसे यह पूछने का प्रयास किया है, कि केन्द्र में आपकी ही सरकार है देश में आतंकवादी व्यक्तियों का जीवन छीन रहे है, बढ़ी हुयी प्रयोजित महंगाई सभी पायदान लांघ गरीब के मुह से निवाले हडपने पर आमादा है, अफजल गुरू जैसा कुख्यात आतंकी को आपकी पार्टी ने जिन्दा रख छोड़ा है तथा भारत की नेपाल, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सीमाए पूरी तरह असुरक्षित है। नकली नोट एवं हथियारों के साथ आतंकी उक्त सीमाओं से भारत में प्रवेश कर आतंकी गतिविधियों में संलग्न हैं क्या कभी किसी ने उनसे प्रश्न किया महाराष्ट्र में आपकी सरकार है आप वहॉ की मुख्य भूमिका में है आपकी सहयोगी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उत्तर भारतीयों के साथ गैर मानवीय हरकते क्यों कर रही है। उन्हे महाराष्ट्र प्रदेश छोड़ने को क्यों मजबूर किया जा रहा है। क्या किसी पत्रकार मित्र ने राहुल गॉधी से यह जानने का प्रयास किया वर्ष 2007-08 में आपकी सरकार में गेंहू का समर्थन मूल्य 8.50 पैसे था, उसी समय विदेशों से 14.82 पैसे की दर से गेंहू क्यों आयात किया गया, वर्ष 2009-10 जब हमारे देश में आटा रू0 20/- प्रति किलों की दर से बिक रहा था तो सरकार ने 12.51 पैसे की दर से गेंहू क्यों विदशों में बेचा। वर्ष 2008-09 में गन्ने की सामान्य पैदावार के बावजूद सरकार ने 48 लाख टन चीनी विदेशों में रू0 12.50 प्रति किलो की दर से पहले बेची उसके बाद उक्त निर्यात से आयी किल्लत के कारण रू0 42.00 प्रति किलों की दर से चीनी आयात की। क्या उक्त कुछ आयात-निर्यात के आर्थिक खेल देश की बढ़ी हुयी महंगाई का कारण नहीं प्रतीत होते। क्या किसी ने उनसे यह पूछने की हिम्मत की देश मंे मजहब के आधार पर सर्वेक्षण कराने का कार्य आपकी पार्टी ने क्यों किया। क्या सच्चर कमेटी से रिपोर्ट बनवा ऐसा नही किया गया जैसा लगभग 90 वर्षो पहले अंग्रेजो ने मुस्लिम लीग को शह देकर करवाया था। रंगनाथ मिश्र आयोग बनवा अलग आरक्षण की मांग क्यांे उठवायी गयी। क्या मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग किसी जिम्मेदार मुस्लिम नेता या संगठन ने की थी। देश का प्रधान मंत्री बनने को बेताब उक्त राजकुमार अपनी एयर कंडीशन्ड गाड़ी से घूम, फाइव स्टार होटलों का भोजन गरीब को झोपडी में कर यह जताने का प्रयास कर रहे है कि वे समाज से घुले मिले है। दुर्भाग्य की बात है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्तम्भ पत्रकार बन्धु भी उनके अंदाजों को महिमा मंडित कहने में नही चूकते हैं।
राहुल गॉधी की स्पष्ट एवं आदर्शवादिता के चर्चे प्रायः पढ़ने एवं देखने को मिलते हैं। समाज का व्यक्ति अन्जाने में उनका मौखिक प्रचार माध्यम बनता जा रहा है, राजकुमार की छोटे-छोटे विषयों की स्पष्टवादिता समाज का भावनात्मक शोषण कर रही है। वे इतने ही आदर्शवादी है तो बताये आज देश विभिन्न ज्वलन्त समस्याओं से गुजर रहा है। आतंकवादी, महंगाई सरीखे विषय मानव को सशरीर निगल जाने को आमादा है। देश का शायद ही ऐसा कोई भाग हो जहॉ अमन चैन कायम हो। इसके अतिरिक्त देश में और भी कई ऐसे विषय है जिनकी जवाब देही से वे बच नहीं सकते। कहने को तो वे कह सकते है मैं प्रधानमंत्री नहीं हूँ आदि-आदि परन्तु पूरा देश जनता है मनमोहन राज किसके सामने दण्डवत है।
सिर्फ अभी मैं प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हूँ ! या इसी प्रकार के कुछ जुमलों से व्यक्ति स्पष्टवादी दिखने लगे तो यह न्यायोचित नहीं लगता। वे भली प्रकार जानते है उनके पास जो उपनाम की ताकत है, वही उन्हें अनिवार्य एवं अपरिहार्य बनाए हुए है जो कभी जाने वाली नहीं, अतः कांग्रेस पार्टी में उनका सर्वोच्च आसन सुरक्षित हैं वे कुछ भी बोले उससे उनकी विशिष्टता कम होने वाली नही। अतः वे भावनात्म्क कृत्यों एवं बयानो की खुली बाजीगरी कर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास कर रहे है। राहुल जी का यदि आप परिवारवाद विरोध देखें जो सिर्फ उनके बयानों तक ही सीमित हैं उनकी कथनी एवं करनी में जमीन आसमान का अन्तर है। राहुल के खास सिपहसालारों में मिलिंद देवडा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, कनिष्क इधर है क्या वे वंशवाद की श्रेणी में नहीं है, गरीबों के घर में गरीबी देखने वाले राहुल बाबा बयान देते है अगर 1992 में गॉधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न टूटती इस वक्तव्य से सीधे तौर पर यह कहने का प्रयास करते है कांग्रेस पार्टी की हिफाजत एवं देश पर शासन करने की माद्दा शिर्फ गांधी परिवार के पास ही है। क्या उक्त बयान उनके शातिर दिमाग एवं परिवारवाद की तरफ इंगित नहीं करता। एक तरफ वे स्वयं सहित परिवारवाद के विरोधी एवं दूसरी तरफ स्वयं, मित्रों एवं बयानों के आधार पर परिवारवाद के पोषक दोनों ही भूमिका बाखूबी नहीं निभा रहे है वे। यदि उनकी 1992 वाली घटना मान भी ली जाये कि यदि उनके परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो विवादित स्थल न टूटता तो 1984 के सिक्खों के कत्ले-आम के विषय में वे क्या कहेगें उस समय तो उनके परिवार का ही प्रधानमंत्री था। हमारे देश के युवराज राहुल गॉधी योग्य एवं सफल राजनेताओं की बात करते है। तो वे यह भूल जाते है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही इनके रक्त सम्बन्धियों के अलावा भी योग्य एवे राष्ट्र भक्त राजनेता हुए है। लेकिन इनकी वैचारिक शक्ति शिर्फ अपने पिता श्री राजीव गांधी, माता श्रीमती सोनिया गांधी, दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा पर नाना श्री जवाहर लाल नेहरू ही देख सकती है। अन्य के चर्चें वे भूल कर के भी नहीं करते। फिर भी स्वयं को परिवारवाद के विरोधी के रूप में स्थापित करने पर आमदा है राहुल बाबा।
वास्तविकता तो यह है देश की गरीब एवं भावनाप्रधान जनता के साथ राहुल गांधी भावात्मक खेल बाखूबी खेल रहे हैं, वे राष्ट्रीय हित के विषयों पर न जाकर अपनी हल्की फुल्की गतिविधियों से भोली भाली जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे है। उनके रास्ते पूर्व कांग्रेसी नेताओं से भिन्न हो सकते है परन्तु मंजिल एक है। देश का प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले वे यह भूल गये देश को एक ऐसे लौह पुरूष की तलाश है जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरो सके, उनके हितो की रक्षा कर सके, अमेरिका जैसी ताकत को जवाब दे सके, चीन जैसे रंग बदलने वाले गिरगिट को दुरूस्त रख सके तथा पाकिस्तान जैसे बिगडैल को सबक सिखा सके। देश का नहीं चाहिए जो उपनाम की ताकत के माध्यम से देश के सर्वोच्च राजनैतिक आसन पर आसीन होना चाहता हो, उसे तालाश है ऐसे महानायक की जो सही मायने में देश को गति दे सके, साम्प्रदायिक सद्भावना रख सकें, महंगाई पर काबू, आतंकवाद पर लगाम तथा आतंकियो को दण्डित कर सके।

--राघवेन्द्र सिंह