Monday, March 15, 2010

महिला आरक्षण बिल - एक लंबे सफर की शुरूआत

0 प्रेमचंद सहजवाला

मंगलवार 9 मार्च 2010, ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ से एक दिन बाद का दिन भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक दिन है, जब विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के उच्च-सदन ने बाबा साहब के संविधान में रेखांकित ‘समानता’ शब्द की प्रगति के लिए एक बड़ी छलांग लगाई है. राज्य सभा ने संविधान का 108 वां संशोधन बिल पारित कर दिया है, जिसके अनुसार देश की लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई. यह एक लंबे सफर के लिए उठाया गया मात्र पहला कदम होते हुए भी एक बड़ी छलांग माना जा रहा है क्योंकि निम्न-सदन लोकसभा की तरह उच्च-सदन को भी इसे दो तिहाई बहुमत से पारित करना था और ऐसा करना टेढ़ी खीर ही माना जा रहा था. यू.पी.ए सरकार के विलंबित तिकड़मों, शरद यादव की जनता दल (यू) में दो फाड़ा जिसके अंतर्गत नितीश कुमार ने पार्टी के फैसले के विरुद्ध बगावत का झंडा गाड़ दिया तथा अन्य कारणों से बिल को 186:1 मतों से पारित होने में सफलता मिल गई.
दूरदर्शन चैनलों पर यह सब देख कर मुझे सहसा वह दिन याद आ गया जब बाबा साहेब आम्बेडकर देश के प्रथम क़ानून मंत्री की हैसियत से सदन में ‘हिंदू कोड बिल’ प्रस्तुत करते हुए कह रहे थे – ‘आखिर हमारे पास यह आज़ादी है किस लिए? हामारे पास आज़ादी अपने सामाजिक तंत्र में सुधार लाने के लिए है जो कि विषमताओं असमानताओं तथा अन्य बातों से भरा है और हमारे ‘मूल अधिकारों’ के प्रति कई विरोधाभास लिए मौजूद है (Dr. BR Ambedkar and untouchability by Chritoffe Jaffrelot p 115).
सदन में हिंदू कोड बिल के माध्यम से बाबा साहेब वास्तव में हिंदू नारी का सशक्तीकरण करना चाहते थे जिसमें बुद्ध, जैन तथा सिख धर्मं की नारियां भी सम्मिलित थी. बिल में कई प्रावधान थे जिन के माध्यम से वे नारी-पुरुष के बीच असमानता के प्रतीकों का उन्मूलन कर देना चाहते थे. उदाहरण के तौर पर बाबा साहेब ने तर्क दिया कि वर्त्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का देहांत होता है तो उस की विधवा को, उस के बेटे की विधवा को (यदि वह मर चुका है और विवाहित था) और यहाँ तक कि उस के पोते की विधवा को (यदि वह भी मर चुका है और विवाहित था) संपत्ति में हिस्सा मिलता है. फिर अपनी पेट-जायी सगी बेटी को क्यों भुला दिया जाए? बाबा साहेब ‘कोड बिल’ द्वारा नारी अधिकारों में धुआंधार परिवर्तन करना चाहते थे ताकि वह समाज में पुरुष के बराबर खड़ी होने का साहस कर सके. मसलन उस समय तक पति के देहांत के बाद कोई भी नारी पति की संपत्ति पर केवल ‘Limited Estate’ (सीमित स्तर) जितना अधिकार सकती थी. वह उस संपत्ति से आने वाली आय का फायदा तो उठा सकती थी पर केवल कुछ कानूनी मसलों के अलावा उस का मूल-संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था. लेकिन कोड बिल ने ‘Limited Estate’ को Absolute Estate (पूर्ण स्तर) में बदल कर नारी को पुरुष के बराबर ला कर खड़ा कर दिया ((The Essential Writings of BR Ambedkar p 498 and India After Gandhi by Ramchandra Guha pp 228-229). इसी प्रकार बिल ने गोद लेने के मसले पर भी नारी को सशक्तीकृत कर दिया, पुरुष पर यह बंधन डाल कर कि वह किसी भी बच्चे को गोद ले तो पत्नी की सहमति अनिवार्य रूप से ले ले तथा गोद लेने की इस क्रिया को वह असालत पंजीकृत ज़रूर करवा दे (Essential Writings… p 501). उस समय तक एक विवाहिता नारी की स्थिति यह थी कि यदि वह किसी कारण पति के साथ एक ही घर में नहीं रहती थी तो वह खुद को पति से एक पाई तक प्राप्त करने से वंचित कर देती थी. लेकिन इस बिल ने स्वीकारा कि निश्चय ही कुछ परिस्थितयां हैं जिन में यदि पत्नी पति से अलग रहती है तो वह कुछ ऐसे कारणों से ऐसा करती होगी जिन पर उस का वश नहीं है तथा उसे पति की ओर से कोई भी खर्चा न दिया जाना उस के साथ सरासर ना इंसाफी है (वही पुस्तक p 499). अतः इस बिल ने किसी विवाहिता को कुछ विशिष्ट परिस्थितयों यथा पति की कोई जघन्य बीमारी, उस के द्वारा किया जा रहा अत्याचार या वेश्या गमन या पत्नी के परित्यक्ता होने पर पति से खर्चे का अधिकार दिलाया. इस बिल ने तलाक का एक सर्वथा नया कदम भी उठा जिसका कि हिंदू समाज में इस से पहले कोई चलन था ही नहीं! बिल ने बहुनिष्ठता की जगह एकनिष्ठता को स्थापित किया क्यों कि हिंदू समाज में भी उस समय तक बहु-विवाह की प्रथा थी.
लेकिन दुर्भाग्य कि बाबा साहेब के इस बिल की पैदा होते ही हत्या करनी पड़ी क्योंकि इस बिल के विरोध में सहसा सदन के गणमान्य सदस्यों की एक सेना खड़ी हो गई और विरोध की ऐसी तेज़ आंधी आई कि बाबा साहेब का ह्रदय छलनी हो गया और उन्होंने कानून मंत्री के पद से ही इस्तीफ़ा दे दिया. पंडित नेहरु और बाबा साहेब के रास्ते अलग हो गए. जो महापुरुष इस बिल का विरोध कर रहे थे वे सब के सब Hindu Personal Law (हिंदू व्यक्तिगत क़ानून) के परम भक्त थे तथा जो महापुरुष इस बिल से सख्त नफरत करते थे उन के मुखिया कोई और नहीं, देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे ! कुछ वर्षों बाद जब तक पंडित नेहरु ने अनेक तिकडमों व संशोधनों से तथा बिल को कई हिस्सों में बाँटकर आखिर उसे पारित नहीं करवा कर छोड़ा तब तक नारी को शक्ति प्रदान करने वाला यह बिल देश के शास्त्र प्रेमी महापुरुषों की हठ की वेदी पर बालि चढ़ा रहा. पंडित नेहरु ने पहली बार विरोध की आंधी से घबरा कर सदन में यह बिल मतदान तक के लिए प्रस्तुत नहीं किया था क्योंकि विरोध के चक्रवात में उन की अपनी कुर्सी तक डूबने को आ गई थी. परन्तु इस बार उन्होंने सब को कड़ी चेतावनी भी दी और ‘व्हिप’ भी जारी किया. इस बिल का विरोध इतना प्रचंड रहा कि देश में एक जगह साधुओं ने एक महारैली कर डाली. साधुओं ने खोज बीन कर जिस हिंदू नारी को एक आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत किया, वह थी रामायण की सीता. रामायण की सीता ! जिस ने कुछ नहीं किया, फिर भी उसे महल से निकलना पड़ा, अग्नि से गुज़रना पड़ा और पृथ्वी में समा जाना पड़ा ! देश की ‘संविधान-सभा’ के उच्च-शिक्षित किन्तु शास्त्रांध कानून-निर्माता यह भी भूल गए कि हमारे पवित्र (!) शास्त्रों के नारियाँ तो हमेशा पुरुष की ज़ालिम तानाशाही की शिकार रही, चाहे वह अभागी द्रौपदी हो जिसे उस का सब से बड़ा पति युधिष्ठिर राजसी जुए में पापी दुर्योधन के हाथों हार गया, चाहे निर्दोष अहिल्या जिसे उस के पवित्र (!) ऋषि पति ने पत्थर बना दिया या सुलोचना ही क्यों न हो जिसे राम-रावण युद्ध में पति मेघनाथ के मरते ही समाज की पाप-मय ‘सती प्रथा’ के होते जल मरना पड़ा! बेचारी सावित्री ने तो खुद को बच्चे पैदा करने वाली एक मशीन ही समझा और एक दो नहीं पूरे सौ पुत्र मान डाले ताकि मृत्यु देवता यमराज उस के पति सत्यवान को जीवित लौटा दें! केवल कुछ बच्चों की मांग रखने पर भी यमराज उस के पति को जीवित वापस न करते क्या!...

(क्रमशः ... अगले अंक में सन 1891 में विवाहित लड़की संबंधी क़ानून की गत लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुषों ने क्या बना दी...)

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3 बैठकबाजों का कहना है :

sumita का कहना है कि -

बहुत अच्छी जानकारी के लिए सहजवाल जी आभार! महिलाओं के आरक्षण के विरोध मे कुछ पुरुषों की मानसिकता यह दर्शाती है कि ये वे पुरुष हैं, जिन्हें स्वयं के ऊपर भरोसा नहीं वे महिलाओं की बुद्विमता से घबरा गए हैं. वरना नारी को अबला के नाम से संबोधित करने वाला तथाकथित समाज कब से महिलाओ के केवल ३३प्रतिशत आरक्षण से ही अपने को असहाय महसूस कर रहा है.महिलाओ का समाज मे क्या योगदान है यह भी जानना जरुरी है. इतिहास गवाह है कि वैदिक काल में अपाला,घोषा,माण्डवी आदि ऐसी नारियां थीं जिन्हें वेद आदि का प्रतीक माना जाता था.उपनिष्द काल में भी गार्गी,मैत्रयी आदि के योगदान को भुलाया नही जा सकता. अतीत की सभ्यता सिन्धु घाटी का मातृ प्रधान होना नारी के गौरव को सिध्द करता है.उसके बाद रामायण काल तथा महाभारत काल मे नारियों की दशा का हास होना शुरु हुआ.११वीं शताब्दी से लेकर १७वी शताब्दी तक के समय मे नारी का जो पतन होना शुरु हुआ उसका खामियाजा आज भी भुगतना पढ रहा है.महिलाओं को किसी भी चीज का अधिकारी बनाना रुढीवादी सोच का नतीजा है.एक अच्छे और जरुरी विष्य़ को उठाने के लिये प्रेम जी आपको बधाई !

sumita का कहना है कि -

महिलाओं को किसी भी चीज का अधिकारी न बनना....पढा जाय.

Harihar का कहना है कि -

बहुमूल्य जानकारी के लिये धन्यवाद !

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