Showing posts with label baap kev zamane. Show all posts
Showing posts with label baap kev zamane. Show all posts

Sunday, November 01, 2009

क्या आप भी 'बाप के ज़माने' के गाने सुनते हैं?

हाल ही में एक एफ़ एम चैनल पर कहते सुना कि वे बाप के जमाने के गाने नहीं सुनायेंगे। और यही बात ज़ोर-ज़ोर से बार बार दोहरा रहे थे। पर ये साबित क्या करना चाहते हैं? मेरी समझ में तो यह आया कि आज की पीढ़ी के सभी गाने अच्छे हैं और पिछली पीढ़ी के "गँवारों" वाले गाने "बेकार" थे (?)। जो वर्तमान पीढ़ी है वो "समझदार" है और पिछली पीढ़ी "मूर्ख" थी जो बेकार गाने बनाती व सुनती थी। यहाँ ये मेरे, आपके और "समझदार" पीढ़ी के सभी पिताओं व संगीत के महारथियों को गलत ठहराने पर तुले हुए हैं जिनके बूते ही आज की फ़िल्म इंडस्ट्री टिकी हुई है।

पुरानी पीढ़ी को "बोर" कहने वाला यह चैनल चाहे-अनचाहे कईं बातें कह जाता है। लता मंगेशकर ने जितने भी सदाबहार गाने गाये इनके हिसाब से सुनने लायक नहीं हैं। "समझदार" पीढ़ी जब प्रीतम व अनु मलिक के चुराये हुए "बेहतरीन" गानों पर नाचे व झूमे तो अच्छा होता है। पर आर.डी बर्मन, नौशाद आदि का संगीत हो तो सुना ही क्यों जाये? चैनल इस बात से खुश होता कि बाप के जमाने के गाने न बजा कर जो बदलाव आया है वो बहुत "अच्छा" है और हमारी पीढ़ी इससे खुश है (?)। ये चैनल किशोर व रफ़ी का मुकाबला आतिफ़ असलम व हिमेश रेशमिया से करता है और अपनी इस "कामयाबी" पर खुश भी होता है। जिन गानों को सदाबहार कहा जाता है उन्हीं गानों को यह चैनल नकार रहा है। क्या आज के गानों को सदाबहार गानों का दर्जा मिला है?

इन सबके बीच जो बात और भी ज्यादा चुभती है वो है उनका विज्ञापन के जरिये "बाप के जमाने" की खिल्ली उड़ाना। क्या यहाँ कोई सेंसर बोर्ड नहीं आता? इसी बात को अलग तरीके से कहा जा सकता था। जिस तरह से अपने फ़ूहड़ चुटकुलों से हँसाने की कोशिश ये करते हैं वो पूरा परिवार मिलकर तो नहीं सुन सकता। अपनी बात स्वतंत्रता से कहने का अधिकार हमारा कानून देता है पर भद्दा मजाक करने का नहीं। सनी देओल की आवाज़ में एक चैनल पर फ़ूहड़ चुटकुले सुनाये जाते थे जिस पर सनी देओल ने बाद में ऐतराज़ भी जताया था। है कोई रेडियो के इन चैनलों पर नकेल कसने वाला? "बाप के ज़माने" को दकियानूसी कहने वाला चैनल है ९३.५ रेड एफ़ एम।

खैर मीडिया को मैं हमेशा बुरा कहता आया हूँ और कहता रहूँगा क्योंकि जो कार्य ये मीडिया कर सकता है वो ये करते नहीं। राजू श्रीवास्तव के बिग बॉस में कपड़े उतरे वो ये चैनल बार-बार दिखाते हैं जिसे बच्चे भी देख रहे हैं। किस तरह का दायित्व ये लोग उठा रहे हैं मेरी समझ से बाहर है। जल्दबाजी के शिकार होते हैं और राम को द्वापर में पहुँचा देते हैं। बिना पड़ताल किये कुछ भी लिख देते हैं और कहते हैं "खबर हर कीमत पर"। काल कपाल व भूत पिशाच दिखाते हैं और फिर एक खबर में कहते हैं कि 21वीं सदी में भारत के लोग अँधविश्वास में जी रहे हैं। समाज को नुकसान पहुँचा रहा है मीडिया। दोहरे मापदंड अपनाता है मीडिया।

हिन्दी के चैनलों व समाचार पत्रों का हाल बुरा है। भारत ने दूसरा मैच जीता था, ठीक उसी दिन अम्पायर डेविड शैफ़र्ड का निधन भी हुआ। लेकिन मुझे अखबार व चैनलों से ये खबर नदारद थी। क्रिकेट के चाहने वाले सभी लोग ये जानते हैं कि डेविड शेफ़र्ड की शख्सियत क्या थी। वे लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय अम्पायरों में से रहे। लेकिन फिर भी खेल पृष्ठ पर उनकी मृत्यु की खबर न देख कर मुझे हैरानी हुई। हालाँकि अंग्रेजी के अखबारों में ये खबर छपी थी। इससे पता चलता है कि ये लोग युवराज व धोनी की शोपिंग देखने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं।

रेड एफ़. एम द्वारा शुरू किया गया ये "बेहतरीन" कार्य इसी गैर जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। जब छोटा बच्चा ये सुनेगा कि "बाप के जमाने" के गाने सुनने लायक नहीं (?) हैं तो आप समझ सकते हैं कि भविष्य में किस तरह के गाने सुनने को मिलेंगे। किशोर, रफ़ी, मुकेश, हेमंत, लता, आशा के गाने अब कूड़े में डाल दीजिये और सुनना शुरु कीजिये रेशेमिया व प्रीतम के "रेडियो" को जो एफ़ एम वाले "बजाते" रहेंगे।

---तपन शर्मा