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Saturday, April 11, 2009

जो खुद आवारा नहीं था, शायद मसीहा भी नहीं


सुबह-सुबह सोकर उठा तो राजेश चेतन का एसएमएस था- विष्णु प्रभाकर नहीं रहे। देह दान दोपहर २ बजे होगा। ऐसा लगा कि जैसे सुबह ने ठग लिया हो। अजीब संयोग है सितम्बर २००८ की ११ तारीख को ही साहित्यकारों का १५ सदस्यीय समूह विष्णु प्रभाकर की खैरियत लेने गया था। और अप्रैल महीने की ११ तारीख को उन्होंने इस लोक से विदा ले ली।

मैंने प्रेमचंद सहजवाला जी से बलदेव वंशी का नं॰ लिया और उनसे बात की। उन्होंने कहा कि -"विष्णु प्रभाकर सबसे बड़े साहित्यकार थे। बड़े ऐसे कि उन्होंने समाज की निम्नत्तम से निम्नत्तम वर्ग की पीड़ा को शब्द दिये और उच्च सामाजिक आदर्शों को स्थापित करने की कोशिश की। वे एक ऐसे साहित्यकार थे जो खेमेबाज़ी से बचते थे, सभी वरिष्ठ-कनिष्ठ लेखकों के वे घनिष्ठ थे। मेरे दोनों बेटों की शादियों में परिवार के सदस्य की भाँति आये। आज से २३ दिन पहले ४० वर्षीय मेरे छोटे बेटे का देहांत हो गया। मेरा दुःख दुगुना हो गया है। प्रभाकर ने आवारा मसीहा और अर्धनारीश्वर जैसी रचनाएँ कर खुद को अमर कर दिया। विष्णु ऐसे लेखक थे जिन्होंने दक्षिण-उत्तर भारत की मौसिक रेखा को पार किया था। वे दक्षिण में भी उतनी ही इज्जत पाते थे, जितनी की उत्तर में। विष्णु प्रभाकर प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन आदि की साहित्यिक परम्परा के अंतिम स्तम्भ थे। आज हम साहित्यप्रेमी खुद को बहुत निर्धन महसूस कर रहे हैं।"

बलदेव वंशी लगभग हर महीने विष्णु प्रभाकर के घर जाते रहे और उनके बेटे अतुल प्रभाकर से विष्णु जी के स्वास्थ्य-समाचार लेते रहे।

NCERT के लिए पहले ही मर चुके थे प्रभाकर

फिर पता चला कि वरिष्ठ साहित्यकार केदार सिंह की बेटी संध्या सिंह (जोकि NCERT में हिन्दी-रीडर हैं) ने विष्णु प्रभाकर पर हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर पढ़ने वालों NCERT के १०वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए एक पुस्तक (संवाद-२) पर काम किया है। मैंने उनका भी नं॰ जुगाड़ा और उनसे बात की। उन्होंने बताया- "मैं विष्णु प्रभाकर से अधिक नहीं मिली हूँ। शायद १ या दो बार मिलना हुआ है। लेकिन जितना जाना है, उससे यह कह सकती हूँ कि वे साहित्यिक राजनीति से सर्वथा दूर रहने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने साहित्य सेवा बहुत चुपचाप तरीके से और पूरी लगन से की।"

संध्या सिंह ने आगे बताया कि एक बार NCERT की किसी पुस्तक में यह प्रकाशित कर दिया गया था कि विष्णु प्रभाकर नहीं रहे (लोगों ने सोचा होगा कि शायद ९५ वर्ष के बाद कहाँ कोई जीवित रहता है)। इस पर विष्णु प्रभाकर जी ने NCERT को पत्र लिखा था कि आपलोगों को ऐसा नहीं प्रकाशित करना चाहिए।


विष्णु से प्रभाकर

विष्णु के नाम में प्रभाकर कैसे जुड़ा, उसकी एक बेहद रुचिपूर्ण कहानी है। अपने पैतृक गाँव मीरापुर के स्कूल में इनके पिता ने इनका नाम लिखवाया था विष्णु दयाल। जब आर्य समाज स्कूल में इनसे इनका वर्ण पूछा गया तो इन्होंने बताया-वैश्य। वहाँ के अध्यापन ने इनका नाम रख दिया विष्णु गुप्ता। जब इन्होंने सरकारी नौकरी ज्वाइन की तो इनके ऑफिसर ने इनका नाम विष्णु धर्मदत्त रख दिया क्योंकि उस दफ़्तर में कई गुप्ता थे और लोग कंफ्यूज्ड होते थे। वे 'विष्णु' नाम से लिखते रहे। एक बार इनके संपादक ने पूछा कि आप इतने छोटे नाम से क्यों लिखते हैं? तुमने कोई परीक्षा पास की है? इन्होंने कहा कि हाँ, इन्होंने हिन्दी में प्रभाकर की परीक्षा पास की है। उस संपादक इनका नाम बदलकर रख दिया विष्णु प्रभाकर।

विष्णु प्रभाकर- एक परिचय

चूँकि मैंने प्रभाकर को बहुत अधिक नहीं पढ़ा है, इसलिए इनके लेखन पर अपने विचार नहीं दे सकता। नये पाठकों के लिए इनका परिचय दे रहा हूँ।

२९ जनवरी १९१२ को उ॰प्र॰ के मुज़फ़्फरनगर जिले के एक छोटे से गाँव मीरापुर में जन्मे विष्णु प्रभाकर के पिता दुर्गा प्रसाद एक धार्मिक व्यक्ति थे और अपने बेटे आधुनिक दुनिया से लम्बे समय तक दूर रखे। इनकी माँ महादेवी इनके परिवार की पहली साक्षर महिला थी जिन्होंने हिन्दुओं में पर्दा प्रथा का विरोध किया। १२ वर्ष के बाद, अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, प्रभाकर आगे की पढ़ाई करने के लिए अपने मामा के पास हिसार (उस समय पंजाब का हिस्सा, अब हरियाणा का) चले गये, जहाँ इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। यह १९२९ की बात है। वे आगे भी पढ़ना चाहते थे, लेकिन आर्थिक हालत इसकी इजाजत नहीं देते थे, अतः इन्होंने एक दफ़्तर में चतुर्थ श्रेणी की एक नौकरी की और हिन्दी में प्रभाकर, विभूषण की डिग्री, संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बीए की डिग्री हासिल की।

चूँकि पढ़ाई के साथ-साथ इनकी साहित्य में भी रुचि थी, अतः इन्होंने हिसार की ही एक नाटक कम्पनी ज्वाइन कर ली और १९३९ में अपना पहला नाटक लिखा हत्या के बाद। कुछ समय के लिए इन्होंने लेखन को अपना फुलटाइम पेशा भी बनाया। २७ वर्ष की अवस्था तक ये अपने मामा के ही परिवार के साथ रहते रहे, वहीं इनका विवाह १९३८ में सुशीला प्रभाकर से हुआ।

आज़ादी के बाद १९५५-५७ के बीच इन्होंने आकाशवाणी, नई दिल्ली में नाट्य-निर्देशक के तौर पर काम किया। ये ख़बरों में तब छाये रहे, जब २००५ में इन्होंने राष्ट्रपति भवन में हुए दुर्व्यवहार के कारण पद्यभूषण का सम्मान लौटा दिया।

इनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियाँ

उपन्यास- छलती रात, स्वप्नमयी, अर्धनारीश्वर
ड्रामा- नव प्रभात, डॉक्टर
कहानी-संग्रह- संघर्ष के बाद
नाटक- प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक
जीवनी- आवारा मसीहा
अन्य- जाने-अनजाने
विशेष- आवार मसीहा के लिए पद्मभूषण और अर्धानारीश्चर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार ।

स्रोत- वीकिपीडिया

विष्णु प्रभाकर के अन्य चित्र और उनके वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।