Thursday, July 08, 2010

बॉलीवुड में नायिकाओं का दौर कब लौटेगा?

डॉ अरुणा कपूर पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं! डॉक्टरी के पेशे से फुरसत निकालकर लिखने का शौक ज़िंदा रखा है...हिंदी के अलावा मराठी और गुजराती में भी लेख, कविताएं और कहानियाँ प्रकाशित हुई है! हिंदयुग्म के सहयोग से जल्द ही एक उपन्यास भी प्रकाशित होने को है। बैठक पर इनका पहला लेख कोई आयुर्वेदिक नुस्खा नहीं बॉलीवुड की नायिकाओं पर है...आपका स्वागत है

एक ज़माना था जब स्त्री प्रधान भूमिकाओं वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब धूम मचाती थी। मीना कुमारी, नर्गिस, नूतन और वैजयन्तीमाला जैसी अभिनेत्रियाँ अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेती थी! मीना कुमारी की लगभग सभी फिल्मों की कहानियाँ नायिका प्रधान ही हुआ करती थी। दिल अपना और प्रीत पराई, भाभी की चूड़ियां, शारदा, पाकीज़ा...जैसी फिल्मों को कौन भूल सकता है? पाकीज़ा फिल्म आज भी जिस जगह पर दिखाई जाती है, दर्शक उमड़ पडते हैं! पाकिस्तान में तो इस फिल्म ने अलग ही धूम मचाई थी!
धर्मेन्द्र के साथ की हुई फिल्म 'फूल और पत्थर ' में मीना कुमारी ने ही धर्मेन्द्र को लोकप्रियक नायक का दर्जा दिलवाया था! लेकिन मीना कुमारी किसी एक नायक के साथ कभी भी जोड़ी बना कर आई नहीं थी! हाल यह था कि मीना कुमारी को मध्य में रखकर ही फिल्मों की कहानियां लिखी जाती थी! मीना कुमारी की खासियत थी की वो गंभीर भूमिकाओं की एक्सपर्ट मानी जाती थी! लेकिन 'कोहिनूर' और 'आजाद' फिल्म में मीना कुमारी ने दिखा दिया कि वह एक कलाकार है और हर तरह की भूमिका निभाने में माहिर हैं! हल्की-फुल्की और हास्य मिश्रित भूमिका निभाने वाले राज कपूर के साथ मीना कुमारी ने 'शारदा' फिल्म में अभिनय किया था, दर्शकों के दिल को द्रवित कर गया था। यह फिल्म खूब चली थी ।
यही हाल नर्गिस का भी था ! 'मदर इण्डिया' फिल्म के नाम से कौन परिचित नहीं है? भारत और विदेशों भी 'मदर इण्डिया' ने सफलता के झंडे गाड़े थे। इसी फिल्म ने सुनील दत्त और राज कुमार जैसे नायकों को अपनी पहचान दिलवाई थी.. फिल्म की कहानी नर्गिस के मज़बूत (या नाजुक?) कंधों पर टिकी हुई थी। नर्गिस ने महान निर्माता, अभिनेता, और निर्देशक राज कपूर के साथ जोड़ी बनाई थी। वैसे अन्य नायकों के साथ भी कई फिल्में की थी । राज कपूर जैसे दिग्गज के साथ नायिका प्रधान फिल्मों में अभिनय करने जैसा कठिन काम नर्गिस ने किया। राज कपूर के साथ 'चोरी-चोरी 'जैसी मनोरंजन से भरपूर फिल्म...यह भी नायिका प्रधान थी...और ऐसी फिल्म करना मानो नर्गिस ही के बस की बात थी! अधेड़ उम्र में नर्गिस ने बलराज सहानी जैसे संजीदा कलाकार के साथ फिल्में की... 'घर संसार' ऐसी ही एक फिल्म थी जो नायिका प्रधान थी। नर्गिस ने सस्पेंस फिल्म भी की थी ...जिसका नाम था...आधा दिन आधी रात.. जो प्रदीप कुमार के साथ की हुई नायिका प्रधान फिल्म थी!
नूतन भी नायिका प्रधान फिल्मों की नामचीन हस्ती थी! महानायक अमिताभ बच्चन के साथ की हुई फिल्म 'सौदागर' मुझे याद आ रही है... इस फिल्म में नूतन ही छाई हुई थी! अमिताभ बच्चन तो जैसे सह-नायक की भूमिका में थे... उन्हें इस फिल्म में नायक नहीं बल्कि खलनायक की भूमिका ही करनी पड़ी थी! नूतन की अशोक कुमार और धर्मेन्द्र के साथ की हुई फिल्म 'बंदिनी' भी नायिका प्रधान थी! नूतन की फिल्म 'सुजाता' खूब चली थी...यह भी नायिका प्रधान फिल्म थी...इसमें नायक सुनील दत्त थे!
वैजयंतीमाला अपने समय की बहुत अच्छी डांसर हुआ करती थी...इन्होंने भी साधना, कठपुतली और मधुमती जैसी नायिका प्रधान फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाई है! बाद में शर्मिला टैगोर, शबाना आजमी और स्मिता पाटील ने नायिका प्रधान फिल्मों की परिपाटी को बनाए रखा...इन नायिकाओं ने भी अपनी भूमिकाओं में नायिका के अस्तित्व को बनाए रखा!.. लेकिन अब आज नायिका प्रधान फिल्में कहाँ छिप गई है?
हां! इक्का दुक्का फिल्में सामने आ रही हैं.. काजोल और करिश्मा कपूर ने भरसक कोशिश इस दिशा में की है..लेकिन अब काजोल और करिश्मा की जगह लेने कौन-सी नायिका आगे आई है?.. शायद प्रियंका चोपड़ा का नाम लिया जा सकता है जो...'सात खून माफ़ ' में प्रधान नायिका के किरदार में है... फिल्म की कहानी ही बता सकती है की यह फिल्म नायिका प्रधान है या नहीं! मुझे लग रहा है कि अब दर्शक फिर से इस तरह की फिल्में पसंद करेंगे जिसमें कहानी नायिका के इर्दगिर्द घूमती हो! फिर वह फिल्म चाहे रोमांटिक हो, सस्पेंस हो, हॉरर हो, धार्मिक हो या हास्य-प्रधान हो!.. बदलाव की आवश्यकता तो हमेशा होती ही है।

डॉ अरुणा कपूर

Tuesday, July 06, 2010

धोनी संग साक्षी : DOGS & MEDIA NOT ALLOWED !

ज़रा सोचिए, अगर महेंद्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट में अपनी जगह नहीं बना पाते और झारखंड के ही मैदानों पर चौके-छक्के लगा रहे होते। फिर, उनकी उम्र 29 साल की होती और वो शादी कर रहे होते। तो एक कैमरामैन लड़केवालों की तरफ से और एक लड़कीवालों की तरफ से भाड़े पर मंगाया जाता। ये तो नहीं होता कि देश के सबसे अच्छे कैमरे और सबसे बुद्धिमान होने का भ्रम पाले मीडिया वाले मुफ्त में धोनी की शादी पर खर्च हो रहे होते। मगर, ऐसा हुआ और हमें ताज्जुब इसलिए नहीं हुआ कि मीडिया की ऐसी दीवानगी पहली बार नहीं थी....सानिया-शोएब की शादी भी मीडिया के लिए कूदने-फांदने का ऐतिहासिक दिन था...ऐसे जैसे भारत और पाकिस्तान दोस्ती के सात फेरे लेने जा रहे हों...इसी बीच दंतेवाड़ा में 76 जवान मारे गए, मगर सानिया-शोएब की खबर टीवी के पर्दों पर ज़्यादा ज़रूरी बनी रही....
खैर, धोनी की शादी पर लौटते हैं.... ज़ी न्यूज़(इसी के एक छोटे-से हिस्से में मैं भी नौकरी करता हूं...) भी बाक़ी चैनलों की तरह शादी के मंडप से कोसों दूर कैमरा टिकाए इंतज़ार में था कि कब क्या ब्रेकिंग न्यूज़ मिल जाए......देहरादून में हमारे रणबांकुरे साथी और नोएडा के न्यूज़रूम में हम....देहरादून से नोएडा सिग्नल पर मिल रहे वीडियो में कोई भी गाड़ी दिखती तो लगता ये साक्षी होगी, ये साक्षी की अम्मा होगी...और न जाने क्या-क्या....इतनी बारीकी से तो मैंने कभी किसी शादी में हिस्सा नहीं लिया....
खैर, हमारी एक रिपोर्टर ने तो उस घोड़ी का 'जायज़ा' ले लिया जिस पर धोनी सवार होने वाले थे....इतना उत्साह था रिपोर्टर में कि दर्शक अपने भोलेपन में ये तक समझ लें कि धोनी की शादी इसी घोड़ी से हो रही है! और तो और, हमारी एक एंकर ने शादी पर विशेष बुलेटिन के लिए खास तौर पर एक लाल रंग का लहंगा पहन लिया था ...ऐसा लग रहा था कि वहां देहरादून में बारात निकलेगी और यहां हम नाच उठेंगे...
सबसे मज़ेदार था पसीने से लथपथ घोड़ीवाले का 'एक्सक्लूज़िव' इंटरव्यू जो हर चैनल पर चल रहा था....घोड़ीवाला ही मीडियावालों के लिए सबसे विश्वस्त सूत्र था कि धोनी ने क्या पहना, भज्जी ने कितना नाचा और खाने में क्या-क्या था वगैरह-वगैरह....बेचारा घोड़ीवाला इतने सारे कैमरे एक साथ अपने मुंह पर देखकर राहत की सांस ज़रूर ले रहा होगा कि उसके सामने उससे भी 'बेचारे' कितने लोग हैं...
एनडीटीवी के रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर पहले ही लिख दिया है कि उन्हें आदर्शवादी होकर टीवी के गिरते स्तर पर मर्सिया पढ़ने वाला पत्रकार न समझा जाए....नहीं समझेंगे जी, बस कुछ सलाह और दे दें ताकि आने वाले समय में शादियों की कवरेज में पत्रकारों को टीवी पर मंडप बनाने में और आसानी हो जाए.... सलाह नंबर एक... हो सकता है कि मीडिया चैनल कुछ बड़ी हस्तियों के शादी के ऑर्डर अभी से ही बुक कर लें....जैसे, राहुल गांधी, युवराज सिंह, भज्जी और 'प्रिंस' (गड्ढे में गिरने वाला महान बालक)....फिर इन्हीं चैनलों के ज़िम्मे कैटरिंग का सारा ज़िम्मा हो...पत्तलें बांटने से लेकर पत्तले उठाने तक का...शॉट्स की दिक्कत ही नहीं आएगी साहब...बड़े-बड़े एंकर बड़े-बड़े लोगों की पत्तले उठाएं...वाह! देश की सबसे बड़ी शादी....सबसे बड़ी कवरेज.....सबसे बड़ा पंडाल....हम सबसे बड़े युग में जी रहे हैं....वाह!
सलाह नं दो... शादी के सारे छोटे-बड़े काम छोटे-बड़े चैनल्स आपस में बांट लें...मसलन, पंडित जी को लाने-ले जाने का ज़िम्मा किसी एक चैनल को.....जनवासे (जहां बारात ठहरती है) का इंतज़ाम किसी और चैनल को....न्योता (वो लिफाफा या तहफा जो शादी में आने वाले मेहमान लेकर आते हैं) लिखने का काम किसी और चैनल को...हां, मंगल गीत वगैरह गाने का काम किसी एफएम चैनल को भी सौंपा जा सकता है.....
मेरी बड़ी दीदी की शादी हुई थी तो दस-पंद्रह दिन बाद शादी की कैसेट बनकर आई थी...अलग-अलग फिल्मी गानों और पहाड़-समुंदर वाले लोकेशन्स पर उड़-उड़कर दीदी और जीजाजी की तस्वीरें आती थीं और हम रोमांचित होते थे....मैं दसवीं में पढ़ता था तब....अब एमए पास हूं...नौकरी भी करने लगा हूं...मगर, काम वही शादी के वीडियो बनाने का ही रहा...देहरादून से दूर जहां ये शादी हो रही थी, दूर-दूर तक मीडिया के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी....कैमरे पर भूख-प्यास से बेहाल रिपोर्टर ऐसे जंगल में खड़े लग रहे थे कि दंतेवाड़ा से कवरेज कर रहे हों...फिर भी कवरेज किए जा रहे थे...कोई चैनल बता रहा था कि धोनी ने गोल्डन शेरवानी पहनी थी, किसी ने कहा भूरी शेरवानी पहनी थी...सबको रतौंधी हो गई थी...जिसे जो दिखा, अपने-अपने चैनल को बता दिया...देश अलग-अलग शेरवानी में धोनी की शादी देख रहा था...जैसे धोनी धोनी न रहे हों, धोनी शिव का अवतार हो गए हों....देहरादून की पहाड़ियां कैलाश हों और साक्षी साक्षात पार्वती....मीडिया वाले भूत-बेताल बनकर नाच रहे थे और कोई खाने तक को नहीं पूछ रहा था....
खाने से एक और खबर याद आई जो इस दिन हल्के में कहीं-कहीं चल रही थी....हमारे प्रधानमंत्री 3 जुलाई को आईआईटी कानपुर गए थे तो उनके खाने में 26 व्यंजनों में मिलावट पाई गई थी ! ऐसे-ऐसे ज़हरीले केमिकल पाए गए कि मुझे नाम ही समझ नहीं आ रहे थे....मगर, प्रधानमंत्री की किसी को फिक्र नहीं थी.....अजी, इस देश में खाने में मिलावट कोई खबर है क्या....पीएम ने पहली बार खाया तो क्या हो गया...धोनी रोज़-रोज़ थोड़े ही शादी करेगा....मीडिया को नहीं बुलाया, न सही....जाना तो ज़रूरी है...बिन बुलाए पहुंचने का मजा ही कुछ और है...

निखिल आनंद गिरि
(फोटो : बीबीसी से साभार)

Sunday, July 04, 2010

जाति की राजनीति का फायदा सिर्फ कांग्रेस को होगा?

२०११ के लिये जनसंख्या की गिनती शुरु हो चुकी है। दुनिया के सबसे बड़े गण्तंत्र की अब तक की सबसे बड़ी गिनती है। पिछले तीन-चार वर्षों से आरक्षण की माँग जोर उठाती जा रही है। "भोपाल कांड" में फ़ँसी कांग्रेस और उनके अर्जुन सिंह ने आरक्षण का वो अस्त्र चलाया था जो किसी भी दल के लिये भेद पाना कठिन हो गया। उनके इस कदम का विरोध दबे शब्दों में किया गया लेकिन कोई भी दल सामने नहीं आया। वोट के लालच को दूर रख पाना हर दल के बस की बात नहीं है। राजनीति की पहली शर्त कुर्सी का लालच ही है। जाति के आधार पर आरक्षण की शुरुआत जो की गई वो अब हर दल की मजबूरी बन गई है।
भारत में जाति कोई नया विषय नहीं है। सहस्त्राब्दियों पहले भी जाति थी, आज भी जाति है। कहते हैं कि सब कुछ बदलता है पर यह देश ऐसा है जहाँ जाति कभी नहीं जाती। भारत में जाति-गत राजनीति कोई नई नहीं है। मंडल कमीशन की स्थापना १९७९ में की गई। मकसद था जाति की गणना करना ताकि सभी वर्गों को बराबर का "हक़" मिल सके। बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल ऐसी गिनी चुनी पार्टियों में से हैं जो "जाति" का दिया ही खाती हैं।
मंडल ने जो गणना उसके अनुसार हमारे देश में १६ फ़ीसदी अनुसूचित जाति, सात फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति व ५२ फ़ीसदी पिछड़ा वर्ग है। यानि कि कुल ७५ प्रतिशत जनता पिछड़ी मानी गई। हालांकि एक और सर्वे में ओ.बी.सी ३२ फ़ीसदी माने गये। १९८९ में वी.पी सिंह की सरकार ने मंडल पर मोहर लगाई और आरक्षण का मुद्दा उछाला।
मंडल के आकड़ों को ध्यान में रख कर ही सीटों को आरक्षित कोटे में रखा गया। १६, ७.५ व २७ प्रतिशत सीटें क्रमश: एस.सॊ, एस.टी व ओ.बी.सी को दी गईं। अनुसूचित जाति व जनजाति में अलग आरक्षण होता है। पिछड़ों को भी उनका हक मिलता है। पर अगर को "अन्य" हो यानि कि "जनरल" केटेगरी हो तो उसके लिये आरक्षण नहीं होता। इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्चा कोई गरीब नहीं उठा सकता। तो अमीर "अनुसूचित जाति वर्ग" के व्यक्ति को दाखिला मिलने से बेहतर है गरीब "सवर्ण" को मौका मिलना। ये गौर तलब है कि जब प्राइवेट कम्पनी किसी को नौकरी पर रखती है तब उसका धर्म या जाति नहीं देखती।
वर्ष २००६ में आरक्षण का मुद्द फिर गर्म था। इसके विरोध और समर्थन में खूब धरना व प्रदर्शन हुए। कभी कोई जाति ओ.बीसी में आने की बात करती तो कोई एस.सी में शामिल होने को कहती। एक ही जाति किसी प्रदेश में अल्पसंख्या में है तो किसी राज्य में उसको "वोटों" के आधार पर तरजीह दी जाती है। इसी आरक्षण के पेंच में फ़ँसी है इस बार की जनसंख्या भी। इस बार की जनसंख्या मे जाति भी पूछी जा रही है। यानि कि किस जाति के कितने लोग हैं, सब पता चल जायेगा। उसी के आधार पर फिर आरक्षण निर्धारित होगा। आज हर कोई "आरक्षित जाति" में आना चाहता है। पैसे के आधार पर सर्टिफ़िकेट बनाये जाते हैं। मेरे ९० प्रतिशत है और मुझे दाखिला नहीं, किसी के ५० प्रतिशत और वो इंजीनियर बन जाये उससे बेहतर है कि मैं भी नकली सर्टिफ़िकेट बनवा लूँ। अभी ५० प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। सोचिये अगर यह पता चले कि ये संख्या ६० प्र.श. हो गई है तो फ़ार्म भरते हुए आप "अन्यों"को कोटे के लिये लड़ते देखेंगे। और ज्यादा चक्का जाम होंगे और ज्यादा हड़तालें। हर ओर अफ़रा--तफ़री का माहौल होगा। हर जाति "गुर्जर" और "मीणा" होगी। हर तरफ़ मंडल कमीशनों का दौर चलेगा। हर दल अपना "वोट बैंक" बढाने में लगी रहेगी। कुल मिलाकर एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जायेगी जो इस देश की प्रगति की दिशा दुर्गति की ओर ले जा सकती है। वैसे भी इस देश का एक हिस्सा ही प्रगति कर रहा है। लेकिन कोई भी समाज सेवक या दल आगे नहीं आयेगा जो इसका विरोध करे।
ऐसे में ज्वलंत सवाल एक और भी है कि इस सर्वे में धर्म के आधार पर गिनती क्यों नहीं हो रही? कितने हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई हैं इसकी गिनती नहीं होगी। ऐसा क्यों हो रहा है इसके बारे में जरा सोचियेगा।
अगर कोई यह कहता है कि इससे हममें से किसी का भला होगा तो यह हास्यास्पद ही कहा जायेगा। कांग्रेस सरकार का यह दूसरा ब्रह्मास्त्र है जिससे उसने अपना वोट बैंक और मजबूत करने की ओर कदम बढ़ाया है।

तपन शर्मा
(लेखक हिंदयुग्म के बुनियादी सदस्यों में से एक हैं....हिंदयुग्म के सबसे सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं...फिलहाल शादी करके इंटरनेट से बाहर की दुनिया बसाने में जुटे हैं)

Saturday, July 03, 2010

शन्नो अग्रवाल को गुस्सा क्यों आता है?

मेरे शांत चित्त में एक चिंगारी सी भड़क पड़ती है जिसके बारे में पीड़ित महसूस करते हुए भी..अधिकतर नारियाँ चुप रहती हैं..मैं भी चारों तरफ का माहौल देख-भाल के सहम जाती हूँ कि कौन लोगों के मुँह लगे...लेकिन कुछ बातें जो नश्तर की तरह चुभ जाती हैं अन्दर ही अन्दर..जो समस्त नारी जाति पर लागू होती हैं..और जिन बातों को अब भी लोग जबरदस्ती करने/ कहने पर तुले हुए हैं..तो मेरा शांत चित्त कुछ समय के लिये भड़क पड़ता है... जिसकी बात से मन में ज्वाला धधकी उसे लिखने वाला एक पुरुष ही है.. स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन.... इस पंक्ति को पढ़ते ही मन बहुत ख़राब सा हो गया...चिंगारी पैदा हुयी और आग बन गयी...कोई इंसान नारी को स्वाहा करने की बात करता है ताकि वह एक शक्ति बन सके...तो पढ़ते ही मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि लोग क्यों हर समय नारी को आगे कर देते हैं स्वाहा होने को..ये रटी-रटाई पंक्तियाँ बिना इनकी विस्तृत समालोचना किये ही लोग कह देते हैं..जैसे कि वह कोई घास-फूस या समिधा-सामग्री हो..जिसे स्वाहा किया जा सकता है.
लोग उसे भस्म करके उससे शक्ति की अपेक्षा रखते हैं..अरे वो तो वैसे भी इतना कुछ करती और सहती आई है युग-युग से कई रूपों में..बिना किसी के कहे ही वह अपने कर्तव्यों को निभाती रही है. और फिर एक तरफ तो उसे अबला कहा जाता है..तो दूसरी तरफ उसे भस्म करके शक्ति की आशा करते हैं..तो भई, उसे किस तरह भस्म होना चाहिये और किस तरह की शक्ति मिलेगी उसे भस्म करके ? अपने मन में तो वह समाज के लोगों की किसी ज्यादती या रीतियों-कुरीतियों का शिकार बन कर भस्म होती ही रहती है...उसके बाद भी लोग पता नहीं क्या चाहते हैं..कभी तो उसे दुर्गा कहते हैं तो यह नहीं सोचते की उसमे वो दैविक शक्ति नहीं है जिससे सीता जी जल गयीं थी..और कभी जब औरत के बलिदानों की बात चलती है की '' आज की औरत सतयुग की सीता से भी अधिक अग्नि परीक्षाएं देती है '' तो तमाम गहन धार्मिक प्रवृति के लोग इसे सीता जी का अपमान समझते हैं..और भड़क पड़ते हैं कहते हुये कि सीता जी से आज की औरत की कोई समानता नहीं...और तरह-तरह के उदाहरण देते हुये पूरी रामायण ही उठा लाते हैं बहस करने के लिये..अगर ऐसा है तो फिर आज के पढ़े लिखे लोग ये क्यों कहते हैं बिना सोचे समझे कि '' स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन ''.
यह पढ़कर व सोचकर मेरे मन को लगा कि नारी को लोग कोसने से बाज नहीं आते..समय बदला है, और वह पढ़ी-लिखी व समझदार है फिर भी समय-समय पर उसकी अवहेलना की जाती है और जरा-जरा सी बातों में मखौल उड़ाया जाता है उसका..और अपने को बहादुर कहने वाली औरतें भी सहमी रहती हैं पुरुषों के मगरूर व्यवहार पर अपनी गलती न होने पर भी...औरत डर से व पुरुष अपने बचाव में कहते रहते हैं कि अब समय बदल गया है..अब वह हालत नहीं रही औरत की..वह मजबूत है समझदार है..आदि-आदि.. लेकिन यह बातें कितनी लागू होती हैं...और तुर्रा यह कि औरत को भस्म करके उससे शक्ति हासिल करने की भी बात की जाती है...अरे, उसे भी तो पुरुष की इन्ही खूबियों की जरूरत हो सकती है जीवन में कभी...तो कितने पुरुष हैं जो उसकी शक्ति बनते हैं..अधिकतर को तो जलन होने लगती है..और औरत की उपेक्षा करके उसे सताने लगते हैं..औरत कोई घास-फूस या लकड़ी तो है नहीं जो उसे आज्ञा दी जा रही है कि '' स्वाहा हो जा '' और फिर ऐसा होने पर तो वह राख बन जायेगी और किसी काम की ना रहेगी..तो उसे अपनी स्वाभाविक मौत ही क्यों नहीं मरने दिया जाता..क्यों उसके लिये जीते-जी चिता सुलगा कर झोंकने का प्रयास करते हैं लोग ऐसी बातें करके...औरत की इज्ज़त की बात करने वाले समाज के ठेकेदार खुद बुरी नज़र रखते हैं उसपर..और अपनापन दिखाने वाले लोग उसपर मुसीबत आने पर निगाहें बचाकर बगलें झाँकने लगते हैं...ऊपर से जुर्रत यह कि उसे जीते जी भस्म भी करना चाहते हैं..क्यों...आखिर क्या बिगाड़ा है उसने किसी का..क्या उसे दर्द नहीं होगा...क्या उसे अपने तरीके से जीने का अधिकार नहीं है..??????
वास्तव में लोगों की इस तरह की बातें पढ़कर या विचार जानकर मेरे मन को बहुत पीड़ा होती है और लगता है कि नारी को समाज में बस दिखावे के लिये ही ऊँचा दर्ज़ा दिया जाता है लेकिन '' भस्म '' , '' स्वाहा '' या अन्य तमाम शब्दों का इस्तेमाल करके उसे कोसा जाता है...कोई मुझे बताये कि यह शब्द कह कर लोग कोस नहीं रहे है तो क्या कर रहे हैं..? अगर वह भस्म हो गयी तो कहाँ से ताकत देगी ? ये शब्द मुझे नारियों के लिये एक गाली से लगते हैं....

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं और हिंदयुग्म पर इनकी आवाजाही बहुत पुरानी है। बैठक पर आप इन्हें पहले भी पढ़ चुके हैं...)

Thursday, July 01, 2010

गर्व से कहो हम वर्जिन (नहीं) हैं...

हाल ही में किसी अंग्रेज़ी अखबार में एक ख़बर पढी कि पाकिस्तान की आधुनिक सड़कों पर कुछ अलग किस्म के बैनर और होर्डिंग्स इन दिनों खूब दिखने लगे हैं । इन होर्डिंग्स के ज़रिए महिलाओं को लुभाने की कोशिश की जा रही है। ये विज्ञापन हैं चिकित्सा विज्ञान द्वारा वर्जिनिटी बचाए रखने के तरीकों के !  हाइमन सर्जरी या हाइमनोप्लास्टी तकनीक के ज़रिए उन महिलाओं का कौमार्य यानी वर्जिनिटी बरकरार रखने में मदद मिलती है जो शादी के पहले सेक्स संबंध बनाती हैं और चाहती हैं कि उनके संबंधों का पता उसके पति को न चले ताकि वैवाहिक जीवन में कोई बाधा न आए । ऐसे में हाइमन सर्जरी तकनीक 40-50 हज़ार रुपये में ' कुंवारेपन' की गारंटी देती है। एक तरह से रुढ़िवादी देशों में ये तकनीक महिलाओं के लिए हथियार की तरह है जो सेक्स की आज़ादी भी ले सकती हैं और फिर सामान्य वैवाहिक जीवन भी गुज़ार सकती हैं। बाद में जब कुछ साथियों से पूछा तो पाया कि भारत में भी ये तकनीक ठीकठाक लोकप्रिय है। मुझे इसके बारे में पता नहीं था। (और न ही इसका कोई आंकड़ा कहीं से मिल पाया है)
इसीलिए जानकर हैरत भी हुई और उत्सुकता भी। हैरत इसीलिए कि क्या सचमुच कट्टर, तालिबानी (या फिर भारत जैसे रुढिवादी)देशों की महिलाएं सेक्स को लेकर इतनी सजग हो गई हैं कि वो अपनी पसंद से संबंध भी बनाएं और फिर बाद में दकियानूसी सोच वाले समाज से बचाकर इस सच पर पर्दा डाल दें?  उत्सुकता इसीलिए कि क्या सेक्स सचमुच इतना 'आसान' और  'हल्का' विषय हो गया है कि  जब चाहा किया और फिर भुला  दिया ।  पता नहीं।
कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के शहडोल में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कन्यादान योजना के तहत एक सामूहिक विवाह का आयोजन किया था। शादी से ठीक पहले मंडप से दुल्हनों को उठाकर मेडिकल टेस्ट करा दिया गया । ये टेस्ट कौमार्य परीक्षण का था। मतलब, ये जांचने की कोशिश कि कौन-सी लड़की वर्जिन है और कौन नहीं ! मुझे नहीं मालूम उस टेस्ट के बाद उन जोड़ों का क्या हुआ। मुझे नहीं मालूम उनमें से कितनी लड़कियों ने इस कौमार्य परीक्षण को समझा भी होगा। और कितनों को हाइमनोप्लास्टी जैसी मेडिकल तकनीक के बारे में पता होगा जो इस परीक्षण से पहले वो करवा चुकी होंगी। मगर, इतना मालूम है कि उस परीक्षण के लिए सिर्फ दुल्हनें ही आई थीं, दूल्हे नहीं।

सवाल ये है कि वर्जिनिटी को लेकर सारी मुश्किलें लड़कियों से ही क्यों जुड़ी हैं। क्या लड़कों को वर्जिनिटी छिपाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्या उन्हें मालूम होता है कि वर्जिनिटी से जुड़ा सवाल भारत में अब भी लड़की (पत्नी) शायद ही लड़के (पति)  से पूछे। या फिर, उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लड़की उसके 'चरित्र' के बारे में क्या सोचती है। वैसे भी लड़कों की वर्जिनिटी मापने का कोई तरीका शायद है भी नहीं । तो उन्हें छिपाने की ज़रूरत भी क्या है।
दरअसल, भारत जैसे देश में समाज का दोहरापन शुरू से रहा है। लड़के और लड़की के लिए नैतिक मापदंड अलग-अलग हैं। देहरादून की एक दोस्त (महिला) से इस बारे में राय ली तो उसने कहा कि शहर में हर लड़का चाहता है कि एक लड़की का साथ उसे ज़रूर मिले। लड़की जो खुलकर बातें कर सके, सब कुछ शेयर कर सके, मतलब 'इज़ी-गोइंग गर्ल' (ये मेरी दोस्त का इजाद किया हुआ शब्द है)। मगर, जब शादी की बात आएगी तो कैसी भी लड़की चल जाएगी, सिवाय उस इज़ी-गोइंग  गर्ल के ! 
ये लड़कियों के लिए समाज का पैमाना है जो उसकी सब खूबियों को एक झटके में दरकिनार कर सकता है, अगर उसे ये पता चल जाए कि 'लड़की' ने शादी से पहले 'आज़ादी' का अपराध किया है।
फिर, ऐसे समाज में मेडिकल साइंस का सहारा बुरा विकल्प तो नहीं है। क्या आधुनिक समाज का रास्ता देह की आज़ादी से होकर नहीं जाता है?  आप क्या सोचते हैं?

निखिल आनंद गिरि