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Thursday, December 02, 2010

फेसबुक या फिर...फसबुक ( Fuss Book )?

- शन्नो अग्रवाल

हे भगवान ! फेसबुक पर झंझटों का जमघट..अब ये सब कुछ कहते भी नहीं बनता और सहते भी नहीं बनता.
जो कुछ मैं कहने जा रही हूँ फेसबुक के बारे में वो सभी फेसबुकियों के बारे में सही है या नहीं ये तो नहीं कह सकती पर कुछ फेसबुकियों को जरूर हजम नहीं हो रही हैं ये बातें. और इतना तो क्लियर है ही कि चाहें हर कोई मुँह से ना बताये कि कितना पेन होता है उन्हें ( इन्क्लूडिंग मी ) कुछ लोगों की टैक्टिक से कि अब फेसबुक एक फसबुक यानि झंझट, या कहो कि सरदर्द लगने लगा है. फेसबुक पर भ्रष्टाचार उपज रहा है...कहानियाँ सुनी जा रही हैं..घटनायें होती रहती हैं जिनका उपाय समझ में नहीं आता...ना ही निगलना हो पाता है ना ही उगलना...यानि उन बातों के बारे में साफ-साफ कहने में तकलीफ होती है सबको और पचाने में भी तकलीफ...ये सब फेसबुक देवता की मेहरबानी है...दिमाग में बड़ी उथल पुथल मचती है..कुछ फेसबुकियों को बहुत सरदर्द हो रहा है जो इसमें काफी फँस चुके हैं...अब कश्ती मँझदार में फंसी है और किनारा मिल नहीं रहा है...

फेसबुक पर आना शुरू-शुरू में तो बड़ा ट्रेंडी और खुशगवार लगता है..लेकिन नये-नये होने पर नर्वसनेस भी जरूर होती है..फिर हर इंसान धीरे-धीरे उसमे रमकर जम जाता है. और फिर जैसे-जैसे इसमें धंसते जाओ..मतलब ये कि लोगों से और उनकी रचनाओं से मुलाक़ात करते जाओ तो अक्सर क्या अधिकतर ही बहुत बोझ बढ़ जाता है जिससे एक तरह का प्रेशर भी जिंदगी पे पड़ने लगता है..कुछ लोग फ्रेंड बनते ही पेज पर आकर सबके साथ नहीं बल्कि केवल इनबाक्स में ही अलग-अलग आकर वही एक से पर्सनल लाइफ के बारे में सवाल पूछते हैं और समझाने पर बुरा मान जाते हैं..इनबाक्स में कभी-कभार जरूरत पड़ने पर ही बाते होती हैं..ये नहीं कि किसी को साँस लेने की फुर्सत ना दो..सवाल के बाद सवाल करते हैं व्यक्तिगत जीवन के बारे में उसी समय तुरंत ही मित्र बनने के बाद. कितनी अजीब सी बात है कि पेज पर आकर खुलकर सबके सामने बात नहीं करते..और दूसरी टाइप के वो हैं जो बहुत सारी वाल फोटो लगाकर दुखी करते रहते हैं..पहले बड़ा मजा आता था किन्तु अब उन वाल फोटो की संख्या बढ़ती जाती है..और अगर धोखे से भी ( या कभी-कभी जानबूझ कर भी अपनी सुविधा के लिये ) डिलीट हो जाती हैं तो फिर दुविधा में फँस जाने के चांसेज रहते हैं..वो टैगिंग करने वाला इंसान अपने तीसरे नेत्र से पूरा हाल लेता रहता है..और पूछने की हिम्मत भी रखता है कि...'' क्या आपने हमें अपनी फ्रेंड लिस्ट से निकाल दिया है '' या '' क्या आप मुझसे नाराज हैं '' या फिर अपने स्टेटस में कोई सज्जन लिखते हैं कि '' अगर कोई मेरी रचनाओं पर टैगिंग नहीं चाहता तो साफ-साफ क्यों नहीं बताता मुझे ताकि आगे से उनको टैग ना करें हम '' अब आप ये बताइये कि समझदार के लिये इशारा वाली कहावत का फिर क्या मतलब रह गया...अरे भाई, कभी तो हिंट भी लेना चाहिये ना, कि नहीं ? और साथ में धकाधक भजन के वीडियो भी एक इंसान की वाल पर आ रहे हैं कई-कई लोगों के एक ही दिन में और साथ में उन्हीं की दो-दो रचनायें भी..और बाकी अन्य लोग भी टैग कर रहे हैं तो पढ़ने वाले का दिमाग पगला जाता है सोचकर कि इतना समय कहाँ से लाये सबको खुश करने को..कुछ और अपने भी तो पर्सनल काम होते हैं आखिरकार. एक रचना कुछ दिन तो चलने दें ताकि आराम से सभी की रचनाओं को पढ़ा जा सके और अपना भी काम किया जा सके. पर इस अन्याय / अत्याचार के बारे में कैसे समझाया जाये किसी को. हर किसी को अपनी पड़ी है यहाँ...चाहें किसी के पास टाइम हो या न हो. और ऊपर से मजेदार बात ये कि वो इंसान तुरंत कमेन्ट लेना चाहता है. कुछ लोग तो लगान वसूल करने जैसा हिसाब रखते हैं कि एक भी इंसान छूट ना जाये कमेन्ट देने से. उस बेचारे की मजबूरियों का ध्यान नहीं रखा जाता...शेक्सपिअर के ' मर्चेंट आफ वेनिस ' जैसे उन्हें भी बदले में फ्लेश जैसी चीज चाहिये अगर जल्दी कमेन्ट ना दे पाओ तो पूछताछ चालू कर देते हैं...बस अपने से ही मतलब. और कुछ लोग बड़े-बड़े आलेख लगाते हैं और वो भी एक दिन में दो-दो जैसे कि लोगों को केवल उनका ही लेख पढ़ना है...ये नहीं सोचते कि अन्य लोगों ने भी किसी को अपनी रचनाओं में टैग कर रखा है...एक आफिस के काम से भी ज्यादा समय लग जाता है अब फेसबुक पर. मेल बाक्स के कमेन्ट पढ़ने, लिखने और मिटाने में ही कितना टाइम लग जाता है. खैर...

कुछ लोग कितने स्मार्ट होते हैं कमेन्ट लेने के बारे में इस पर जरा देखिये:

फ्रेंड: नमस्ते शन्नो जी, मुझसे कुछ नाराज हैं क्या ? मैं अपनी खता समझ नहीं पा रहा हूँ...

मैं: अरे आप ये कैसी बातें कर रहे हैं..मैं भला आपसे क्यों नाराज़ होने लगी. इधर काफी दिनों से मुझे समय अधिक नहीं मिल पाता है फेसबुक पर एक्टिव होने के लिये...इसीलिए शायद आपको ऐसा लगा होगा. मैं किसी से भी नाराज नहीं हूँ..बस समय और थकान से मात खा जाती हूँ. इसी वजह से कुछ अधिक लिख भी नहीं पाती हूँ इन दिनों.

फ्रेंड: मेरे कई फोटोग्राफ से बिना कोई प्रतिक्रिया के आपने अपने आप को अनटैग कर लिया. तभी मुझे ऐसा महसूस हुआ था.

मैं: जी, टैगिंग तो इसलिये हटानी पड़ी कि वहाँ पर कमेन्ट बाक्स नही सूझता था मुझे...शायद कोई फाल्ट होने से. और बहुत लोग अब वाल पिक्चर ही लगाते हैं तो बहुत इकट्ठी हो गयी थीं इसलिये एक फ्रेंड ने सलाह दी तो कुछ को छोड़कर बहुत सी हटानी पड़ीं.

( ये अपनी टैगिंग का ध्यान रखते हुये हर किसी से कमेन्ट ऐसे वसूल करते हैं जैसे कि कर वसूली कर रहे हों..किसी को भी छोड़ना नहीं चाहते खासतौर से उन लोगों को जो उनसे शिकायत करने में कमजोर हैं..या झिझकते हैं )

मैं: जब मैं आपको अपनी रचनाओं में टैग करती थी..तो आप कमेन्ट नहीं देते थे तो फिर मैंने आपको टैग करना बंद कर दिया...किन्तु कभी शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पायी फेसबुक पर किसी दोस्त से कि कोई बुरा न मान जाये इसलिये.

( इतना कहते ही मुझे लगा कि वो मेरी जुर्रत से खिसिया गये )

फ्रेंड: क्षमा कीजियेगा मेरे इन्टरनेट अकाउंट की लिमिट प्रतिमाह १ जी बी तक ही है और वह आमतौर पर महीने की २३-से २४ तारीख तक पूरी हो जाती है इसी लिए कमेन्ट कम कर पाता हूँ. यदि आपको कमेन्ट बॉक्स ना मिले तो मेरी फोटो के ऊपर मेरी Profile को क्लिक करियेगा जिससे मेरा पेज खुल जायेगा फिर पेज के साइड में ऊपर की ओर बने हुए "Like" बटन को क्लिक कर दीजियेगा तब कमेन्ट बॉक्स दिखने लगेगा.

मैं: हर किसी की अपनी मजबूरियाँ होती हैं...मैं समझती हूँ..औरतों को तो घर के भी काम करने पड़ते हैं..मैं तो कई बार सारे दिन के बाद फेसबुक पर आ पाती हूँ तो सबकी रचनाओं पर लोगों के कमेन्ट से मेलबाक्स भरा होता है और निपटाते हुये घंटों लग जाते हैं..बड़े-बड़े लेख पढ़ने का तो समय ही नहीं मिलता...इसलिये बहुत कुछ छूट जाता है. जब मैं टैगिंग करती हूँ तो बहुत से लोग जबाब नहीं देते तो मैं समझ जाती हूँ कि उनकी भी कुछ मजबूरियाँ होंगी. और कुछ लोग अपनी रचनायें एक के बाद एक लगाते हैं और तब मुश्किल हो जाती है एक ही दिन में कमेन्ट देने में..वो बस अपनी ही रचनाओं के कमेन्ट पर ध्यान देते हैं....फिर मेरी रचनाओं पर कमेन्ट के समय गायब हो जाते हैं..इस तरह के कई लोग हैं...

( अब उन्हें लगने लगा कि मेरे भी मुँह में जबान है तो...)

फ्रेंड: बिलकुल सही कहा आपने .......सबकी अपनी मजबूरियाँ....... आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ......शुभ रात्रि.

मैं: देखिये, मैंने आपको अपनी तरफ से हर बात शत-प्रतिशत ईमानदारी से सही-सही बताई हैं...पर आप बुरा ना मानियेगा...नो हार्ड फीलिंग्स..ओ के ?...शुभ रात्रि !

Tuesday, October 26, 2010

करवा चौथ..या कड़वा चौथ?

हाँ, अपने समाज का यह कड़वा सच है कि एक औरत ही पतिव्रता बन कर वफादार रहती है और पति से अगले सात जन्मों के बंधन के बारे में सोचती है. लेकिन पुरुष के मन में क्या है उसका पता उसे नहीं लग पाता है. और वो शायद जानना भी नहीं चाहती. तो ये तो एक तरह से पति पर ज्यादती हुई कि उसकी पत्नी अगले सात जन्मों में भी उसी पर अपने को थोपना चाहती है, है ना ? अपने पति की असली इच्छा जाने बिना ही अगले सात जन्मों में भी उसी से ही चिपकी रहना चाहती है. आँख-कान बंद करके औरत यही करती आयी है अपने समाज में पतिव्रता बनने की कोशिश में. क्या ये दिखावा है..ढोंग है लोगों को अपने पतिव्रतापन को इस तरह से जताकर ? इन बातों पर जब गंभीरता से गौर किया तो मुझे यह सब लिख कर कहने की प्रेरणा मिली.

मानती हूँ, हर तरह के बिचार व व्यवहार के लोग हर जगह होते हैं..और आज की आधुनिकता में तो लोगों के बिचार लगातार बदल रहे हैं. पहली बात तो ये कि अगले जनम का क्या पता कि कौन क्या होता है और मिलता भी है या नहीं. लेकिन जहाँ चाहत व असली प्यार हो वहाँ तो ऐसी बातें करना अच्छी लगती हैं..वरना औरत अपने को एक तरह से वेवकूफ ही बनाती है इन सब बातों को करके व कहके. चलो मानती हूँ कि जो औरतें पूजा-आराधना करती हैं पति की लंबी उम्र व भलाई के लिये वो सही है किसी हद तक. लेकिन अगला जनम उसी के नाम !!!! WHO KNOWS ABOUT THAT ? पता नहीं दुनिया में कितने शादी-शुदा पुरुष शायद सोचते होंगे कि '' VARIETY IS THE SPICE OF LIFE '' तो फिर वो क्यों अपनी उसी वीवी की अगले आने वाले जन्मों में तमन्ना करने लगे, बोलिये ?

सुनी हुई बातें भी हैं लोगों से कि कितने ही शराबी पति इस दिन भी देर से आकर अपनी पत्नियों को भूखा-प्यासा रखते हैं. और अगर किसी बीमार औरत ने इंतजार करते हुये पति के आने की उम्मीद छोड़कर कुछ मुँह में डाल लिया कमजोरी से चक्कर आने पर तो पति बाद में आकर गाली- गलौज करता है और मारता है उसे कि '' तूने मुझे खिलाये बिना कैसे खा लिया..तेरी हिम्मत कैसे और क्यों हुई ऐसा करने की ? ''

मुझे पता है कि मेरे बिचारों के बिरुद्ध तमाम लोग बोलने को तैयार होंगे. फिर भी कहना चाहती हूँ कि अपने समाज की बातों को देख और महसूस करके मन में जो बिचार उठ रहे थे उन पर मैंने गौर किया. पर उन्हें किसी से डिसकस करते हुये डर लग रहा था तो अपनी बात कहने का ये तरीका सोचा मैंने कि शायद औरतों का ध्यान मेरी कही बात की तरफ कुछ आकर्षित हो सके. और इतना भी बता दूँ कि मैं इस '' करवा चौथ '' की प्रथा के विपक्ष में नहीं हूँ. मुझे बगावत करने का दौरा नहीं पड़ा है. किन्तु क्या उन रिश्तों में ये उचित होगा कि वो औरतें जो खुश नहीं हैं अपनी जिंदगी में अपने पतियों के संग..वो आगे के जन्मों में भी उन्हीं को पति के रूप में अवतरित होने के लिये कहें. अपनी समझ के तो बाहर है ये बात. खैर, आखिर में इतना और कहना है कि इस बात पर हर औरत अपने आप गौर करे और समझे तो उचित होगा...मैंने तो सिर्फ अपने बिचार रखने की एक सफल या असफल कोशिश की है. और सोचने पर मजबूर होती हूँ कि ऐसे पतियों का साथ पत्नियाँ क्यों माँगती है अगले जन्मों में..वो भी सात जन्मों तक ? क्यों, आखिर क्यों..जब कि किसी भी जनम का कोई अता-पता तक नहीं किसी को ? और क्या फिर से यही अत्याचार सहने के लिये उन जन्मों का इंतजार ?????

- शन्नो अग्रवाल

Thursday, August 26, 2010

एक बीमारी, जो दोस्तों से भी प्यारी है...

कमाल की चीज़ है ये टेंशन..इसके जलवे हर जगह देखने में नजर आते हैं और इतनी पॉपुलर होती जा रही है ये..हाँ जी, ऐसा ही है..लेकिन गलतफहमी ना हो आपको तो इसलिये लाजिमी है बताना कि यह किसी चिड़िया का नाम नहीं है और ना ही कोई ऐक्ट्रेस, माडल या ब्यूटी प्रोडक्ट है..बल्कि एक खास तरह का सरदर्द है..या सोशल बीमारी..इसी तरह ही इसकी व्याख्या की जा सकती है..आजकल लोगों को जरा-जरा सी बात पर टेंशन हो जाती है...कोई जरा सी बात पूछो तो बिदक जाते हैं..टेंशन हो जाती है..तो सोचा कि आज टेंशन के बारे कुछ मेंशन किया जाये...लोग कहते तो रहते हैं कि '' यार कोई टेंशन नहीं देने का या लेने का '' तो सवाल उठता है कि लोग फिर क्यों टेंशन देते या लेते है...ये टेंशन एक लाइलाज बीमारी हो रही है..अब कुछ लोग नेट पर काम करते हुये नेट पर ही खाने का ऑर्डर देकर पेट भरते हैं..बीबी को टेंशन नहीं देने का...या फिर बीबी को घर पर रोज खाना बनाने की सोचकर टेंशन हो जाती है ..दोस्त अपने दोस्त का हाल पूछते हैं तो कहेंगे '' कैसे हो पाल..तुम्हें कोई टेंशन तो नहीं होगी एक बात के बारे में सलाह लेनी है ''


एक वह दिन था जब लोग चटर-पटर जब देखो अपने घरों के आँगन, वरामदे, दरवाजे पर खड़े, छत पर बैठे, या फिर किसी चौपाल में, दूकानों में या कहीं पिकनिक पर बातें करते हुए दिखते थे..खुलकर बातें करते थे और खुलकर हँसते थे. स्टेशन ट्रेन, बस, दुकानों, फुटपाथ जहाँ देखो मस्त होकर बातें करते थे और सहायता करने में भी कोई टेंशन नहीं होती थी उन्हें..लेकिन अब आजकल कमरे में बंद करके अपना काम करते हैं, नेट पर जोक पसंद करते हैं और अगर बीच में कोई दखल दे आकर तो टेंशन हो जाती है. फैमिली के संग बात करना या बोलना मुश्किल..सब अजनबी से हो गये..सब नेट पर बिजी...दोस्तों के लिये समय है लेकिन दुखियारी बीवी के लिये नहीं...लेकिन उसमे भी कब टेंशन घुस जाये कुछ पता नहीं..वेटर को सर्व करने में टेंशन, हसबैंड को बीबी के साथ में शापिंग जाने की बात सुनकर टेंशन..बच्चों को माँ-बाप से टेंशन..तो दुनिया क्या फिर गूँगी हो जाये..अरे भाई, कोई हद से ज्यादा बात करे या किसी बात की इन्तहां हो जाये तब टेंशन हो तो अलग बात है..कहीं जाते हुए घर के बाहर कोई पड़ोसी दिख गया तो हाय, हेलो कर ली लेकिन उसके बाद हाल पूछते ही जबाब सुनने से वक्त जाया न हो जाये ये सोचकर उनको टेंशन होने लगती है..किसी बात का सिलसिला चला तो लोग बहाने करके चलते बनते हैं. डाक्टर मरीजों की चिकित्सा करते हैं तो कुछ दिनों बाद उस मरीज की बीमारी में दिलचस्पी ख़तम हो जाती है और अपनी टेंशन का मेंशन करने लगते हैं...तो मरीज़ को भी अपनी समस्या को मेंशन करते हुये टेंशन होने लगती है..और अपना इलाज खुद करने लगता है..जिस डाक्टर को मरीज की बीमारी की कहानियाँ सुन कर टेंशन होती है वो क्या खाक सही इलाज करेगा...डाक्टर ऊबे-ऊबे से दिखते हैं सभी मरीजों से..उनका वक्त कटा, पैसे मिले..मरीज भाड़ में जाये..जॉब को सीरियसली नहीं लेते..क्योंकि मरीजों से उन्हें टेंशन मिलती है. मन काँप जाता है कि जैसे इंसान किसी और ग्रह के प्राणी की विचित्र हरकतें सीख गया हो..बच्चे को उसके कमरे से खाने को बुलाओ तो उसे नेट पर ईमेल भेजना पड़ता है ऐसा सुना है किसी से...'' जानी डिअर, कम डाउन योर डिनर इज वेटिंग फार यू..मील इज गेटिंग कोल्ड. योर डैडी एंड आई आर वेटिंग ''..उसे पुकार कर बुलाओ तो कहेगा कि टेंशन मत दो बार-बार कहकर..अब तो मित्रों से भी बोलते डर लगता है..चारों तरफ टेंशन ही टेंशन दिखती है..हवा भी खिड़की से आती है तो उसे भी शायद टेंशन हो जाती होगी..किसी भिखारी को अगर पैसे दो तो उसके चेहरे पर संतोष की जगह टेंशन दिखने लगती है..दुकानदार से किसी चीज़ के बारे में तोल-मोल करो तो उसे टेंशन हो जाती है..लोग टेंशन देने या लेने की तमीज और तहजीब के बारे में सिर्फ अपने ही लिये सोचते हैं ..किसी का समय लेने में टेंशन नहीं लेकिन अपना समय देने में टेंशन हो जाती है..आखिर क्यों सब लोग चाहते हैं कि उनकी बातों से दूसरों को टेंशन ना हो लेकिन उनको दूसरों की बातों से टेंशन हो जाती है..और तो और खुद के लिये भी कुछ करते हैं लोग तब भी टेंशन नाम की इस बला से पिंड नहीं छूटता. घर का काम हो या बाहर का, पैकिंग करो, यात्रा करो, कहीं किसी की शादी-ब्याह में जाओ..हर जगह ही टेंशन इंतज़ार करती रहती है आपका. किसी से हेलो करना भूल जाओ, तो बाद में आपको टेंशन..ये सोचकर कि ना जाने उस इन्सान ने आपकी तहजीब के बारे में क्या सोचा होगा..ये जालिम '' टेंशन '' शब्द बहुत कमाल दिखाता है..इस टेंशन का क्या कहीं कोई इलाज़ है ? नहीं..शायद नहीं...मेरे ख्याल से यह आधुनिक बीमारी लाइलाज है.

आज कल जिसे इसका अर्थ भी नहीं पता है वो भी अनजाने में इसका शिकार बन गया है...ये जमाना ही टेंशन का है...जो लोग इससे जरा सा मुक्त हैं या जिनके पास कोई अच्छी चीज़ है तो उनकी ख़ुशी देखकर औरों को टेंशन होने लगती है..किसी के बिन चाहे ही ये चिपक जाती है..इसलिये अब जानकर इतना विचित्र नहीं लगता..जहाँ देखो वहाँ एक फैशन सा हो गया है कहने का 'अरे यार आजकल मैं बहुत टेंशन में हूँ .' आप किसी को पता है कि नहीं पर अब इसका इलाज करने वाले लोग भी हैं ( लोग ठीक नहीं होते है वो अलग बात है ) ये लोग पैसा बनाने के चक्कर में हैं..और जिन्हें अंग्रेजी में सायकोलोजिस्ट बोलते हैं या अमेरिका में श्रिंक नाम से जाने जाते हैं..वहाँ पर तो ये धंधा खूब जोरों पर चल रहा है..पर क्या टेंशन दूर होती है उनके पास जाने से..मेरे ख्याल से नहीं..बल्कि शायद बढ़ जाती होगी जेब से मोटी फीस देने पर..पैसे वाले लोगों के लिये श्रिंक के पास जाना और मोटी फीस देकर डींग मारना एक फैशन सा बन रहा है वहाँ..अब तो हमें बनाने वाले उस ईश्वर को भी शायद टेंशन हो रही होगी.

और अब मुझको भी टेंशन हो रही है सोचकर कि कहीं आप में से किसी को इस लेख को पढ़कर टेंशन तो नहीं होने लगी है..तो चलती हूँ..बाईईईई...दोबारा फिर मिलेंगे कभी...

शन्नो अग्रवाल

Friday, August 13, 2010

लंदन में 15 अगस्त मनाना ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है...

भारत देश हमारा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा...

जब से अपने भारत देश ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाई है उसमे एक साल और बढ़ गया है..15 अगस्त के दिन भारत के हर शहर, गाँव, गली-कूचे..देशभक्ति से ओत-प्रोत लोगों की बातों से गुंजित होंगे...गाने-फ़िल्में, डांस आदि के कल्चरल प्रोग्राम होंगे, स्पीच होगी और सड़कों पर तरह-तरह की वेश-भूषा में परेड निकलेंगीं...और लोग भीड़ में धक्का खाते हुये, या घर की छतों से उन्हें देखने का आनंद उठायेंगे...... जिन्हें दिल्ली जाकर भीड़ में शामिल होकर लालकिले पर झंडा लहराते हुये देखने का व प्राइम मिनिस्टर की दी हुई स्पीच सुनने का और परेड देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा वह अपने घर या चौपाल में बैठे टीवी पर ही देखकर दिल्ली में हुये उत्सव का आनंद लेने की कोशिश करेंगे. स्कूलों के बच्चे लाइन में खड़े होकर ( जैसा मुझे अपना बचपन याद आता है ) '' 'जन-गण-मन' और '' वन्देमातरम '' जैसे देशभक्ति के गाने गायेंगे..आसमान में पतंगें उड़ रही होंगी..क्या सीन होगा...और हम यहाँ बैठे हुए ज़ी टीवी पर उनकी कुछ झलकियाँ देखकर अपने देश के बारे में सोचकर अपनी आँखे नम करेंगें..क्योंकि यहाँ इतनी दूर रहकर टीवी की झलकियाँ ही तिरंगे को दिखाकर दिल में तरंगें पैदाकर हलचल मचाकर अपना गुजरा हुआ जमाना याद दिला देती हैं...इन तरंगों का भी उठना बहुत जरूरी है...कितने ही देशभक्त पतंगों की तरह देश पर कुर्बान हो गये. गाँधी जी ने, साथ में और भी तमाम देश-भक्तों ने पता नहीं क्या-क्या झेला देश की आजादी को प्राप्त करने के लिये और साथ में न जाने कितने और लोगों ने भी कुर्बानियाँ दीं जिनके नाम भी नहीं पता सबको.

लेकिन इतना सब कुछ हुआ..क्यों हुआ..देश को आजाद कराने के पीछे उन महान आत्माओं के सपने थे अपने देश की सुन्दर तस्वीर के. लेकिन लोग कैसे रहेंगे आजादी के बाद...और उनके इस दुनिया से जाने के बाद और उस आजादी का भविष्य में किस तरह इस्तेमाल किया जायेगा इसका उन लोगों को कोई अनुमान नहीं रहा होगा. जो गाँधी जी के सिद्धांत थे उनपर कितना अमल हो रहा है ? अहिंसा की जगह हिंसा का प्रयोग, शांति की जगह अशांति, बेईमानी, रिश्बतबाजी, हर जगह फैला आतंक, भ्रष्टाचार, दरिद्रता, अनैतिकता, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव..और भी न जाने कितनी समस्यों से देश ग्रस्त हो चुका है...इनका निवारण करने की तरफ कौन से कदम उठे हैं ? गरीबी, अत्याचार, लोगों के प्रति अन्याय..किसी भी क्षेत्र में सुधार होता नजर नहीं आ रहा है...जनता टैक्स देती है लेकिन उसका सदुपयोग उनके इस्तेमाल के साधनों की तरफ नहीं बल्कि किसी और तरफ नाजायज रूप में खर्च होता है....

बिजली, सड़कें, गंदगी, पानी और महँगाई से सूखता लोगों का खून
लाचारी, मजबूरी, कानून का डर शांत कर देता है तब उनका जुनून.

इन सब बातों को लिखते हुए, जिनसे आप सब लोग मुझसे अधिक परिचित हैं, सोचती हूँ कि कुछ लोगों के दिल में ये ख्याल आ रहा होगा या जिज्ञासा हो रही होगी कि मैं आप लोगों को बताऊँ कि यहाँ यू. के. में 15 अगस्त का दिन कैसे मनाया जाता है..लेकिन आपको शायद ताज्जुब होगा कि इतने साल यहाँ रहने के वावजूद भी मैंने इस बात पर कभी गौर नहीं किया था..मैं इस तरह के समारोह के बारे में अनजान रही थी..इस बारे में कुछ विदित ही नहीं हो पाया था अब तक. एक तो अंग्रेज लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों मनाने लगे..ये तो वही बात होगी कि किसी के हाथ से सुई लेकर उसी की आँख में चुभो दो..मतलब ये कि उन पर ज़ोर दो कि तुम लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों नहीं मनाते इस देश में. अरे भाई, जो हमारा देश छोड़ने पर मजबूर हुये उनको याद दिलाकर जले में नमक छिडकने जैसा हुआ कि नहीं ये ? इस बारे में कोई जश्न यहाँ खुले आम नहीं होता. हमारे अपने आजादी-दिवस पर भारतीयों के लिये न कोई छुट्टी का दिन रखा गया है ( इनके अपने त्योहारों के दिन होते हैं जिन पर छुट्टी होती है ) न कोई झंडा लहराना, न परेड न स्कूलों में कुछ..और न ही लाइब्रेरी में हमारे स्वतंत्रता दिवस को इस देश में मनाने के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है. लेकिन यहाँ कुछ जगहों पर जहाँ अधिक भारतीय रहते हैं वहाँ भारतीय लोग मिलकर किसी हाल वगैरा में लोकल काउंसिल की मदद से इस दिवस को मनाने का आयोजन रखते हैं..और लन्दन में भारतीय विद्या-भवन में भी इस अवसर पर समारोह मनाया जाता है जिसमे भारतीय नृत्य-गाना, सितार और तबला-वादन आदि का प्रोग्राम होता है. और भारतीय हाई कमिशनर '' रायल केनजिंगटन पैलेस गार्डेन '' नाम की बिल्डिंग के बाहर अपने देश का तिरंगा फहराता है और वहाँ के सुन्दर गार्डेन या हाल में स्पीच देता है...उसके बाद वहाँ पर कुछ कल्चरल प्रोग्राम होता है नाच-गाना इत्यादि...और खाने आदि का कार्यक्रम होता है...इस बार का प्रोग्राम है: 15 अगस्त को 10.30-3.00 तक के प्रोग्राम में 11 बजे सुबह भारतीय हाई कमिशनर नलिन सूरी अपने देश का तिरंगा ऊँचा करेंगे उसके बाद '' इंडियन जिमखाना क्लब '' में खाने का प्रबंध होगा जहाँ भारत के सभी क्षेत्रों के खाने के स्वाद के स्टाल होंगे व भारतीय कल्चरल प्रोग्राम भी होंगे जिसमे शायद भरत-नाट्यम नृत्य और संगीत आदि है.

आप सभी पाठकों को व हिन्दयुग्म से जुड़े सभी सदस्यों को इस स्वतंत्रता दिवस पर बधाई व मेरी शुभकामनायें...जय हिंद ! वन्देमातरम !

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका ने लंदन से अपना अनुभव हमें भेजा है....तस्वीर लंदन के किसी पुराने समारोह की है, 15 अगस्त के मौके पर)

Friday, July 30, 2010

सावन न सही, सावन की बतिया ही सही...

सावन आया बरसने को आँगन नहीं रहा
घटाओं में बरसने का पागलपन नहीं रहा
आती है बारिश, लोगों के दिल भीगते नहीं
नीम और पीपल के पेड़ों पे झूला नहीं रहा.
यही अब सच है...शायद. किसी ने डूबे-डूबे मन से बताया कि भारत में सावन के समय अब उतना मजा नहीं आता जितना पहले आता था...वो बरसाती मौसम..पानी बरसने के पहले वो मस्त बहकी हवायें..जो बारिश आने के पहले आँधी की तरह आकर हर चीज़ अस्त-व्यस्त कर जाती थीं..कहाँ हैं ? होंगी कहीं...पागल हो जाते थे हम सब उनके लिये...अब भी उनके आने का सब इंतज़ार करते हैं....उनका सब लोग मजा लेना चाहते हैं...और वो बादल कहाँ हैं जो सावन में बरसने के लिये पागल रहते थे...सुना है कि अब उनके बहुत नखरे हो गये हैं..बहुत सोच समझकर आते हैं बरसने के लिये...साथ में बदलते हुये समय के रहन-सहन के साथ सावन मनाने की समस्या भी सोचनीय हो गयी है...उन हवाओं की मस्ती का आनंद लेने को अब हर जगह खुली छतें नहीं...खुले आँगन नहीं..कहीं-कहीं तो बरामदे भी नहीं..घरों के पिछवाड़े नहीं जहाँ कोई नीम या पीपल जैसे पेड़ हों जिनपर झूला डाला जा सके. जहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें हैं वहाँ शहरों में बच्चे पार्क में खेलते हैं तो वहाँ खुले में स्टील के फ्रेम पर झूले होते हैं जिन पर प्लास्टिक की सीटें होती हैं...आजकल कई जगह टायर आदि को भी सीट की जगह बाँध देते हैं...सबकी अपनी-अपनी किस्मत...आज के बच्चे पहले मनाये जाने वाले सावन का हाल सुनकर आश्चर्य प्रकट करते हैं...और उन बातों को एक दिलचस्प कहानी की तरह सुनते हैं.
लो अब बचपन की बातें करते हुये अपना बचपन भी सजीव हो गया जिसमें..आँगन, जीना, छत, झूला, आम के बौर, और पेड़ों पर पत्तों के बीच छिपी कुहुकती हुई कोयलिया, नीम और पपीते के पेड़ ..जंगल जलेबियों के सफ़ेद गुलाबी गुच्छे..दीवारों या पेड़ों पर चढ़ती हुई गुलपेंचे की बेल जो अब भी मेरी यादों की दीवार पर लिपटी हुई है...हरसिंगार के पेड़ से झरते हुये उसके नारंगी-सफ़ेद महकते कोमल फूल...सबह-सुबह की मदहोश हवा में उनींदी आँखों को मलते हुये सूरज के निकलने से पहले जम्हाई लेकर उठना और अपने दादा जी के साथ बागों की तरफ घूमने जाना...पड़ोस के कुछ और बच्चे को भी साथ बटोर लेते थे...और उन कच्ची धूल भरी सड़कों पर कभी-कभी चप्पलों को हाथ में पकड़ कर दौड़ते हुये चलना..आहा !! उस मिट्टी की शीतलता को याद करके मन रोमांचित हो उठता है...आँखों को ताज़ा कर देने वाली सुबह के समय की हरियाली व उन दृश्यों की बात ही निराली थी. जगह-जगह आम के पेड़ थे कभी जमीन पर गिरे हुये आम बटोरना और कभी आमों पर ढेला मारकर उन्हें गिराना...उसका आनंद ही अवर्णनीय है. अपने इस बचपन की कहानी में एक खुला आँगन भी था..बड़ी सी छत थी जहाँ बरसाती हवायें चलते ही उनका आनंद लेने को बच्चे एकत्र हो जाते थे. और बारिश होते ही उसमें भीगकर पानी में छपाछप करते हुए हाथों को फैलाकर घूमते हुए नाचते थे...एक दूसरे पर पानी उछालते थे...और उछलते-कूदते गाना गाते थे...बिजली चमकती थी या बादलों की गड़गड़ाहट होती थी तो भयभीत होकर अन्दर भागते थे और फिर कुछ देर में वापस बाहर भाग कर आ जाते थे...फिर भीगते थे कांपते हुये और पूरी तृप्ति होने पर ही या किसी से डांट खाने पर अपने को सुखाकर कपड़े बदलते थे...छाता लगाकर बड़े से आँगन में एक तरफ से दूसरी तरफ जाना...हवा की ठंडक से बदन का सिहर जाना....और मक्खियाँ भी बरसात की वजह से वरामदे व कमरों में ठिकाना ढूँढती फिरती थीं...अरे हाँ, भूल ही गयी बताना कि ऐसे मौसम में फिर गरम-गरम पकौड़ों का बनना जरूरी होता था...ये रिवाज़ भारत में हर जगह क्यों है...हा हा...क्या मजा आता था.
अब बच्चे उतना आनंद नहीं ले पाते..उनके तरीके बदल गये हैं, जगहें बदल गयी हैं ना घरों में वो बात रही और ना ही बच्चों में. ये भी सुना है कि सावन का तीज त्योहार भी उतने उत्साह से नहीं मनाया जाता जितना पहले होता था...लेकिन हम लोगों के पास मन लगाने को यही सिम्पल साधन थे मनोरंजन के..क्या आनंद था ! तीजों पर झूला पड़ता था तो उल्लास का ठिकाना नहीं रहता था...पेड़ की शीतल हवा में जमीन पर पड़ी कुचली निमकौरिओं की उड़ती गंध..वो पेड़ की फुनगी पर बैठ कर काँव-काँव करते कौये...और पास में कुआँ और पपीते का पेड़ जिस पर लगे हुये कच्चे-पक्के पपीते...काश मुझे वो सावन फिर से मिल जाये...नीम के पेड़ पर झूला झूलते हुये..ठंडी सर्र-सर्र चलती हवा में उँची-उँची पैंगे लेना..अपनी बारी का इंतजार करना..दूसरे को धक्का देना...गिर पड़ने पर झाड़-पूँछ कर फिर तैयार हो जाना झूलने को...आज भी सब लोग आनंद लेना चाहते इन सब बातों का पर अब वो बात कहाँ ..लोग बदले बातें बदलीं..रीति-रिवाजें बदलीं..बस बातों में ही सावन रह गया है.

शन्नो अग्रवाल

(तस्वीर बैठक के पुराने साथी अबयज़ खान ने भेजी है)

Monday, July 26, 2010

गोरों की रसोई में हिंदुस्तानी मसालों का राज

जहाँ तक भारतीय मसालों की खुशबू विदेशों में फैलने का सवाल या जिक्र है तो वो विदेशों में अभी से नहीं बल्कि पता नहीं कितने बरसों से फैली हुई है...सभी बड़े-बड़े फूड और ग्रॉसरी स्टोर भरे पड़े हैं भारतीय मसालों और आटा, दाल, चावल, घी, तेल से...सभी गोरे और काले लोग भारतीय खाने के क्रेजी यानी दीवाने हुए जा रहे हैं। 'करी' उन सबकी फेवरट डिश है..और चिकेन टिक्का मसाला तो सरताज बना है भारतीय '' करी '' में उन सबके लिये..मसालेदार चिकेन कोरमा भी चावल के साथ बहुत खाते हैं.. काफी समय पहले इटैलियन खाना टॉप पर समझा जाता था ब्रिटेन में फिर चाइनीज खाना हुआ टॉप पर लेकिन अब सालों से भारतीय खाना ही टॉप पर है और छा गया है उन सबके दिल-दिमाग और पेट पर. गोरे लोग तो हैं ही दीवाने भारतीय खाने के..जिसे वह जमकर खाते हैं..साथ में अफ्रीकन, चाइनीज, इटैलियन भी अब हमारे देसी खाने के शौक़ीन होते जा रहे हैं...और जर्मन लोगों की तो पूछो ही ना...हर जर्मन चाहें किसी उम्र का भी हो उसे भारतीय खाना बहुत पसंद है...यहाँ पर कुछ गोरों के कुत्ते भी करी पसंद करते हैं...उनके संग खाते-खाते उनकी भी आदत पड़ गयी....ये मजाक की बात नहीं बल्कि सही है...और '' करी '' शब्द से उनका मतलब होता है..भारतीय मसाले वाली डिश...यानी दाल या सब्जी..चाहें वह '' मीट करी '' हो '' वेजिटेबिल करी '' या '' लेंटिल करी '' ( दाल ). लस्सी भी बड़े शौक से पीते हैं ये लोग. अधिकतर गोरों को कहते सुना हैं कि उन्हें उनका खाना अब अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह फीका होता है...यानि कि स्वादरहित...यहाँ हर तरह के मूड का फूड मिलता है और लोग अपने मूड के हिसाब से फूड खाते हैं...मतलब कि अब तो फ्यूजन फूड का भी कबसे फैशन चल पड़ा है...फ्रेंच फ्राइज ( french fries: आलुओं की तली हुई लम्बी फांके ) इन्हें यहाँ पोटैटो चिप्स भी कहते हैं...हाँ, तो इनके साथ करी भी खाते हैं अब लोग...पैकेट में जो बिकते हैं उन्हें क्रिस्प बोलते हैं...तो अब कुछ क्रिस्प या चिप्स भी यहाँ ब्रिटिश स्टोर्स में मसाला पड़े बिकने लगे हैं..पिज्जा के साथ फ्रेंच फ्राइज और आग में या ओवेन में भुने हुये आलू में सोया मिंस और राजमा की सूखी मसाले वाली सब्जी भर कर खाते हैं..जिसे जैकेट पोटैटो के नाम से बोलते हैं.
यहाँ भारतीय लोग तो हैं ही अपने खाने के शौक़ीन..घर में भी बनाते हैं और बाहर भी खाते हैं रेस्टोरेंट में. जो लोग भारत के जिस ख़ास क्षेत्र से आये हैं और जिन मसालों का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में होता है भारत में वह सभी मसाले यहाँ भारतीय ग्रासरी या फूड स्टोर्स में उपलब्ध हैं. और कई सालों से यहाँ के अपने भी बड़े-बड़े नामी स्टोर्स जैसे कि: Asda,Tesco, Sainsbury, Waitrose, Marks & Spencer, Iceland, Co Op, Lidl (जर्मन) आदि ग्रासरी स्टोर्स या कहो फूड स्टोर भी तमाम भारतीय मसाले बेचने लगे हैं...कुछ मसाले तो जैसे काली मिर्च, तेजपत्ता, इलायची आदि और कुछ अन्य भी मसाले भारतीय दुकानों की तुलना में अब इन स्टोर्स में सस्ते मिलते हैं...साथ में इन स्टोर्स में स्वाद में बहुत ही उम्दा तरीके का दही मिलता है. जिन इलाकों में भारतीय लोगों की तादाद अधिक है वहाँ के ग्रासरी स्टोर्स में अब इंडियन कुल्फी जिसमे सभी तरह की जैसे केसर, बादाम, पिस्ता, आम से बनी हुई और साथ में गुलाबजामुन और गाजर का हलवा इत्यादि भी बिकने लगे हैं. उत्तर भारत, दक्षिण भारत, गुजरात और पंजाब सब तरह के खानों के रेस्टोरेंट हैं जहाँ मिठाइयाँ भी मिलती हैं...और ब्रिटिश लोग भी भारतीय मिठाइयों के शौक़ीन हो रहे हैं वह चाहें काले लोग हों अफ्रीका के या गोरे किसी भी देश के...समोसा और पकौड़े तो बड़े ही शौक से खाते हैं जैसे कि हम लोग...और उनमें अगर मिर्च कम लगे तो कहते हैं कि जितना अधिक चटपटा हो उतना मजा आता है खाने में.. हर बिदेशी के घर में यहाँ कई तरह के भारतीय मसाले मिलेंगे..ये बात और है कि सभी प्रकार के नहीं क्योंकि अब तक उन लोगों को सब तरह के मसालों का खाने में उपयोग करना नहीं आता..लेकिन उनका उपयोग जानने के लिये बहुत उत्सुक रहते हैं...मेक्सिकन और मोरक्कन लोग अपने खाने में जीरा का प्रयोग काफी करते हैं, मोरक्कन लोग हरीसा सौस बहुत खाते हैं अपने खाने में..जिसमे मुख्य रूप से सूखी लाल मिर्च होती हैं जिन्हें तेल, धनिया पाउडर व नीबू का रस डालकर पीस कर बनाते हैं और यह एक लाल रंग के पेस्ट की तरह दिखती है, ग्रीक लोग मसालों को अधिक इस्तेमाल नहीं करते बस जीरा, काली मिर्च पाउडर और मिर्च पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, चाइनीज लोग जब करी बनाते हैं तो उसमें फाइव स्पाइस यानि कि पंच पूरन पिसे मसाले का प्रयोग करते हैं जो मेथी, सौंफ, कालीमिर्च, दालचीनी, लौंग और सोंठ ( सूखी अदरक ) का मिश्रण होता है...और इटैलियन लोग जब tomato sauce बनाते हैं pizza या pasta के लिये तो कभी-कभी उसमे bayleaf यानि तेजपत्ता डालकर बनाते हैं उससे sauce का flavour कुछ बढ़ जाता है. और वह लोग लाल सूखी मिरचों का इस्तेमाल उसे पीसकर भी करते हैं और साबुत मिरचों का इस्तेमाल हर्ब और चिली आयल बनाने में भी करते हैं...मतलब साबुत सूखी मिरचें ओलिव आयल में कुछ दिन डालकर रखते हैं फिर उस चटपटे तेल को pizza पर छिड़क कर खाते हैं या उसे अन्य प्रकार से भी इस्तेमाल करते हैं अपने खाने में ( हर्ब कई प्रकार के होते हैं जो इटैलियन खानों में ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे हम लोग अगर धनिया या पोदीना का इस्तेमाल अपने खाने में डालकर करें ) और ब्रिटिश गोरे लोग कुछ मसाले जैसे हल्दी, मिर्च, धनिया और जीरा पाउडर, गरम मसाला, कालीमिर्च पाउडर का और जायफल पाउडर का इस्तमाल ही अधिक करना जानते हैं...मेथी व सौंफ का इस्तेमाल करना वह लोग नहीं जानते...जायफल के पाउडर को सेव की चटनी, कुछ ख़ास प्रकार के केक व पालक की सब्जी में बहुत इस्तेमाल करते हैं. अमरीकन लोग apple यानि सेब से और pumpkin यानि कद्दू से मीठी डिश pie जिसे आप पेस्ट्री भी कह सकते हैं खूब बनाते हैं और जिसमे दालचीनी पाउडर का खूब प्रयोग होता है.
कई बार ऐसा हुआ कि जब सुपरमार्केट में कुछ खरीदने गयी तो किसी गोरी या गोरा ने मुझसे पूछा कि मैं उस मसाले का इस्तेमाल कैसे और किस तरह के खाने में करूँगी और वह फिर मेरे बताने पर बड़े कौतूहल से सुनते हैं...और कई बार सब्जियाँ खरीदते हुये वो लोग पूछते हैं कि मैं उस सब्जी को किस मसाले से बनाउँगी...बैंगन का उपयोग करना यहाँ के बहुत लोग नहीं जानते और एक बार जब मैं बैंगन खरीद रही थी तो एक लेडी को जिज्ञासा हुई कि उसका कैसे इस्तेमाल होता है..तो मैंने उसे बैगन से बनने वाली तमाम तरह की चीजें बतायीं और उनमें पड़ने वाले मसालों के नाम भी..अक्सर इसी तरह ये लोग नये मसालों का इस्तेमाल करना भी जानते रहते हैं..और हाँ, ये लोग रोटी, पराठा, पूरी, और नान बगैरा बनाने को झंझट समझते हैं और बचते रहते हैं...उन चीजों को रेडीमेड ही खरीदते हैं...इन लोगों को इलायची, नारियल और केसर का उपयोग भी करना नहीं आता..क्यों कि इनके खाने में ये नहीं पड़ती और मिठाइयों में वैनिला व अन्य प्रकार के एसेन्स पड़ते हैं...लन्दन में न जाने कितने भारतीय रेस्टोरेंट हैं जहाँ खाने वाले गोरों की संख्या उतनी ही मिलेगी जितनी कि भारतीय लोगों की..बल्कि कई बार उनसे भी ज्यादा..कुछ भारतीय रेस्टोरेंट सारा दिन खुलते हैं..कुछ केवल दोपहर और शाम को यानि कि लंच व डिनर के लिये और कुछ शाम को ही जो Take Away फूड कहलाते हैं जहाँ लोग खाना खरीदकर घर ले जाकर खाते हैं..और ऐसी जगहों पर अधिकतर अंग्रेज ही खरीदते हुये देखे जाते हैं जो भारतीय खाने के शौक़ीन हैं. आम की भी इन दिनों भरमार है हालांकि इस साल अभी लंगड़ा आम नहीं आया है..लेकिन चौंसा आम आ रहा है..और भी प्रकार के आम जैसे हनी पाकिस्तान से आ रहा है...एक आम करीब ५० रूपए का मिलता है यहाँ.

स्ट्राबेरी, सेव, नाशपाती, प्लम, रास्पबेरी , ब्लैकबेरी, रेड करेंट और आड़ू यहाँ ब्रिटेन में खूब उगाये जाते हैं. यूरोप के अन्य देशों से व अफ्रीकन देशों से भी तमाम खाने की चीजें आती हैं...स्पेन से तरबूज, खरबूजा, कई प्रकार के संतरे, वेस्ट इंडीज से केले, साइप्रस से भी तरबूज और खरबूजा, इटली से अँगूर, पीचेज, टमाटर, संतरे और अफ्रीका से तमाम तरह की सब्जियाँ जिनमे जमीन के अन्दर उगने वाली भी होती हैं, कद्दू व कच्चे केले...भारत से तो तमाम फल और सब्जियाँ आती हैं...उनकी तारीफ में क्या और कितना कहूँ...कई सालों पहले न इतने स्टोर थे और ना ही इतनी विविध प्रकार के फल व सब्जियाँ..लेकिन अब अन्य सभी चीजों के साथ मसालों की भी हर जगह भरमार है...
मसालों ने बनाया हर देश में मुकाम, हिंदुस्तान का ऊँचा कर दिया नाम...है ना कमाल की बात..? जय हिंद !!!!!

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं)

Saturday, July 03, 2010

शन्नो अग्रवाल को गुस्सा क्यों आता है?

मेरे शांत चित्त में एक चिंगारी सी भड़क पड़ती है जिसके बारे में पीड़ित महसूस करते हुए भी..अधिकतर नारियाँ चुप रहती हैं..मैं भी चारों तरफ का माहौल देख-भाल के सहम जाती हूँ कि कौन लोगों के मुँह लगे...लेकिन कुछ बातें जो नश्तर की तरह चुभ जाती हैं अन्दर ही अन्दर..जो समस्त नारी जाति पर लागू होती हैं..और जिन बातों को अब भी लोग जबरदस्ती करने/ कहने पर तुले हुए हैं..तो मेरा शांत चित्त कुछ समय के लिये भड़क पड़ता है... जिसकी बात से मन में ज्वाला धधकी उसे लिखने वाला एक पुरुष ही है.. स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन.... इस पंक्ति को पढ़ते ही मन बहुत ख़राब सा हो गया...चिंगारी पैदा हुयी और आग बन गयी...कोई इंसान नारी को स्वाहा करने की बात करता है ताकि वह एक शक्ति बन सके...तो पढ़ते ही मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि लोग क्यों हर समय नारी को आगे कर देते हैं स्वाहा होने को..ये रटी-रटाई पंक्तियाँ बिना इनकी विस्तृत समालोचना किये ही लोग कह देते हैं..जैसे कि वह कोई घास-फूस या समिधा-सामग्री हो..जिसे स्वाहा किया जा सकता है.
लोग उसे भस्म करके उससे शक्ति की अपेक्षा रखते हैं..अरे वो तो वैसे भी इतना कुछ करती और सहती आई है युग-युग से कई रूपों में..बिना किसी के कहे ही वह अपने कर्तव्यों को निभाती रही है. और फिर एक तरफ तो उसे अबला कहा जाता है..तो दूसरी तरफ उसे भस्म करके शक्ति की आशा करते हैं..तो भई, उसे किस तरह भस्म होना चाहिये और किस तरह की शक्ति मिलेगी उसे भस्म करके ? अपने मन में तो वह समाज के लोगों की किसी ज्यादती या रीतियों-कुरीतियों का शिकार बन कर भस्म होती ही रहती है...उसके बाद भी लोग पता नहीं क्या चाहते हैं..कभी तो उसे दुर्गा कहते हैं तो यह नहीं सोचते की उसमे वो दैविक शक्ति नहीं है जिससे सीता जी जल गयीं थी..और कभी जब औरत के बलिदानों की बात चलती है की '' आज की औरत सतयुग की सीता से भी अधिक अग्नि परीक्षाएं देती है '' तो तमाम गहन धार्मिक प्रवृति के लोग इसे सीता जी का अपमान समझते हैं..और भड़क पड़ते हैं कहते हुये कि सीता जी से आज की औरत की कोई समानता नहीं...और तरह-तरह के उदाहरण देते हुये पूरी रामायण ही उठा लाते हैं बहस करने के लिये..अगर ऐसा है तो फिर आज के पढ़े लिखे लोग ये क्यों कहते हैं बिना सोचे समझे कि '' स्वयं को स्वाहा कर .....औरों के जीवन का प्रकाश बन ''.
यह पढ़कर व सोचकर मेरे मन को लगा कि नारी को लोग कोसने से बाज नहीं आते..समय बदला है, और वह पढ़ी-लिखी व समझदार है फिर भी समय-समय पर उसकी अवहेलना की जाती है और जरा-जरा सी बातों में मखौल उड़ाया जाता है उसका..और अपने को बहादुर कहने वाली औरतें भी सहमी रहती हैं पुरुषों के मगरूर व्यवहार पर अपनी गलती न होने पर भी...औरत डर से व पुरुष अपने बचाव में कहते रहते हैं कि अब समय बदल गया है..अब वह हालत नहीं रही औरत की..वह मजबूत है समझदार है..आदि-आदि.. लेकिन यह बातें कितनी लागू होती हैं...और तुर्रा यह कि औरत को भस्म करके उससे शक्ति हासिल करने की भी बात की जाती है...अरे, उसे भी तो पुरुष की इन्ही खूबियों की जरूरत हो सकती है जीवन में कभी...तो कितने पुरुष हैं जो उसकी शक्ति बनते हैं..अधिकतर को तो जलन होने लगती है..और औरत की उपेक्षा करके उसे सताने लगते हैं..औरत कोई घास-फूस या लकड़ी तो है नहीं जो उसे आज्ञा दी जा रही है कि '' स्वाहा हो जा '' और फिर ऐसा होने पर तो वह राख बन जायेगी और किसी काम की ना रहेगी..तो उसे अपनी स्वाभाविक मौत ही क्यों नहीं मरने दिया जाता..क्यों उसके लिये जीते-जी चिता सुलगा कर झोंकने का प्रयास करते हैं लोग ऐसी बातें करके...औरत की इज्ज़त की बात करने वाले समाज के ठेकेदार खुद बुरी नज़र रखते हैं उसपर..और अपनापन दिखाने वाले लोग उसपर मुसीबत आने पर निगाहें बचाकर बगलें झाँकने लगते हैं...ऊपर से जुर्रत यह कि उसे जीते जी भस्म भी करना चाहते हैं..क्यों...आखिर क्या बिगाड़ा है उसने किसी का..क्या उसे दर्द नहीं होगा...क्या उसे अपने तरीके से जीने का अधिकार नहीं है..??????
वास्तव में लोगों की इस तरह की बातें पढ़कर या विचार जानकर मेरे मन को बहुत पीड़ा होती है और लगता है कि नारी को समाज में बस दिखावे के लिये ही ऊँचा दर्ज़ा दिया जाता है लेकिन '' भस्म '' , '' स्वाहा '' या अन्य तमाम शब्दों का इस्तेमाल करके उसे कोसा जाता है...कोई मुझे बताये कि यह शब्द कह कर लोग कोस नहीं रहे है तो क्या कर रहे हैं..? अगर वह भस्म हो गयी तो कहाँ से ताकत देगी ? ये शब्द मुझे नारियों के लिये एक गाली से लगते हैं....

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं और हिंदयुग्म पर इनकी आवाजाही बहुत पुरानी है। बैठक पर आप इन्हें पहले भी पढ़ चुके हैं...)