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Thursday, August 26, 2010

एक बीमारी, जो दोस्तों से भी प्यारी है...

कमाल की चीज़ है ये टेंशन..इसके जलवे हर जगह देखने में नजर आते हैं और इतनी पॉपुलर होती जा रही है ये..हाँ जी, ऐसा ही है..लेकिन गलतफहमी ना हो आपको तो इसलिये लाजिमी है बताना कि यह किसी चिड़िया का नाम नहीं है और ना ही कोई ऐक्ट्रेस, माडल या ब्यूटी प्रोडक्ट है..बल्कि एक खास तरह का सरदर्द है..या सोशल बीमारी..इसी तरह ही इसकी व्याख्या की जा सकती है..आजकल लोगों को जरा-जरा सी बात पर टेंशन हो जाती है...कोई जरा सी बात पूछो तो बिदक जाते हैं..टेंशन हो जाती है..तो सोचा कि आज टेंशन के बारे कुछ मेंशन किया जाये...लोग कहते तो रहते हैं कि '' यार कोई टेंशन नहीं देने का या लेने का '' तो सवाल उठता है कि लोग फिर क्यों टेंशन देते या लेते है...ये टेंशन एक लाइलाज बीमारी हो रही है..अब कुछ लोग नेट पर काम करते हुये नेट पर ही खाने का ऑर्डर देकर पेट भरते हैं..बीबी को टेंशन नहीं देने का...या फिर बीबी को घर पर रोज खाना बनाने की सोचकर टेंशन हो जाती है ..दोस्त अपने दोस्त का हाल पूछते हैं तो कहेंगे '' कैसे हो पाल..तुम्हें कोई टेंशन तो नहीं होगी एक बात के बारे में सलाह लेनी है ''


एक वह दिन था जब लोग चटर-पटर जब देखो अपने घरों के आँगन, वरामदे, दरवाजे पर खड़े, छत पर बैठे, या फिर किसी चौपाल में, दूकानों में या कहीं पिकनिक पर बातें करते हुए दिखते थे..खुलकर बातें करते थे और खुलकर हँसते थे. स्टेशन ट्रेन, बस, दुकानों, फुटपाथ जहाँ देखो मस्त होकर बातें करते थे और सहायता करने में भी कोई टेंशन नहीं होती थी उन्हें..लेकिन अब आजकल कमरे में बंद करके अपना काम करते हैं, नेट पर जोक पसंद करते हैं और अगर बीच में कोई दखल दे आकर तो टेंशन हो जाती है. फैमिली के संग बात करना या बोलना मुश्किल..सब अजनबी से हो गये..सब नेट पर बिजी...दोस्तों के लिये समय है लेकिन दुखियारी बीवी के लिये नहीं...लेकिन उसमे भी कब टेंशन घुस जाये कुछ पता नहीं..वेटर को सर्व करने में टेंशन, हसबैंड को बीबी के साथ में शापिंग जाने की बात सुनकर टेंशन..बच्चों को माँ-बाप से टेंशन..तो दुनिया क्या फिर गूँगी हो जाये..अरे भाई, कोई हद से ज्यादा बात करे या किसी बात की इन्तहां हो जाये तब टेंशन हो तो अलग बात है..कहीं जाते हुए घर के बाहर कोई पड़ोसी दिख गया तो हाय, हेलो कर ली लेकिन उसके बाद हाल पूछते ही जबाब सुनने से वक्त जाया न हो जाये ये सोचकर उनको टेंशन होने लगती है..किसी बात का सिलसिला चला तो लोग बहाने करके चलते बनते हैं. डाक्टर मरीजों की चिकित्सा करते हैं तो कुछ दिनों बाद उस मरीज की बीमारी में दिलचस्पी ख़तम हो जाती है और अपनी टेंशन का मेंशन करने लगते हैं...तो मरीज़ को भी अपनी समस्या को मेंशन करते हुये टेंशन होने लगती है..और अपना इलाज खुद करने लगता है..जिस डाक्टर को मरीज की बीमारी की कहानियाँ सुन कर टेंशन होती है वो क्या खाक सही इलाज करेगा...डाक्टर ऊबे-ऊबे से दिखते हैं सभी मरीजों से..उनका वक्त कटा, पैसे मिले..मरीज भाड़ में जाये..जॉब को सीरियसली नहीं लेते..क्योंकि मरीजों से उन्हें टेंशन मिलती है. मन काँप जाता है कि जैसे इंसान किसी और ग्रह के प्राणी की विचित्र हरकतें सीख गया हो..बच्चे को उसके कमरे से खाने को बुलाओ तो उसे नेट पर ईमेल भेजना पड़ता है ऐसा सुना है किसी से...'' जानी डिअर, कम डाउन योर डिनर इज वेटिंग फार यू..मील इज गेटिंग कोल्ड. योर डैडी एंड आई आर वेटिंग ''..उसे पुकार कर बुलाओ तो कहेगा कि टेंशन मत दो बार-बार कहकर..अब तो मित्रों से भी बोलते डर लगता है..चारों तरफ टेंशन ही टेंशन दिखती है..हवा भी खिड़की से आती है तो उसे भी शायद टेंशन हो जाती होगी..किसी भिखारी को अगर पैसे दो तो उसके चेहरे पर संतोष की जगह टेंशन दिखने लगती है..दुकानदार से किसी चीज़ के बारे में तोल-मोल करो तो उसे टेंशन हो जाती है..लोग टेंशन देने या लेने की तमीज और तहजीब के बारे में सिर्फ अपने ही लिये सोचते हैं ..किसी का समय लेने में टेंशन नहीं लेकिन अपना समय देने में टेंशन हो जाती है..आखिर क्यों सब लोग चाहते हैं कि उनकी बातों से दूसरों को टेंशन ना हो लेकिन उनको दूसरों की बातों से टेंशन हो जाती है..और तो और खुद के लिये भी कुछ करते हैं लोग तब भी टेंशन नाम की इस बला से पिंड नहीं छूटता. घर का काम हो या बाहर का, पैकिंग करो, यात्रा करो, कहीं किसी की शादी-ब्याह में जाओ..हर जगह ही टेंशन इंतज़ार करती रहती है आपका. किसी से हेलो करना भूल जाओ, तो बाद में आपको टेंशन..ये सोचकर कि ना जाने उस इन्सान ने आपकी तहजीब के बारे में क्या सोचा होगा..ये जालिम '' टेंशन '' शब्द बहुत कमाल दिखाता है..इस टेंशन का क्या कहीं कोई इलाज़ है ? नहीं..शायद नहीं...मेरे ख्याल से यह आधुनिक बीमारी लाइलाज है.

आज कल जिसे इसका अर्थ भी नहीं पता है वो भी अनजाने में इसका शिकार बन गया है...ये जमाना ही टेंशन का है...जो लोग इससे जरा सा मुक्त हैं या जिनके पास कोई अच्छी चीज़ है तो उनकी ख़ुशी देखकर औरों को टेंशन होने लगती है..किसी के बिन चाहे ही ये चिपक जाती है..इसलिये अब जानकर इतना विचित्र नहीं लगता..जहाँ देखो वहाँ एक फैशन सा हो गया है कहने का 'अरे यार आजकल मैं बहुत टेंशन में हूँ .' आप किसी को पता है कि नहीं पर अब इसका इलाज करने वाले लोग भी हैं ( लोग ठीक नहीं होते है वो अलग बात है ) ये लोग पैसा बनाने के चक्कर में हैं..और जिन्हें अंग्रेजी में सायकोलोजिस्ट बोलते हैं या अमेरिका में श्रिंक नाम से जाने जाते हैं..वहाँ पर तो ये धंधा खूब जोरों पर चल रहा है..पर क्या टेंशन दूर होती है उनके पास जाने से..मेरे ख्याल से नहीं..बल्कि शायद बढ़ जाती होगी जेब से मोटी फीस देने पर..पैसे वाले लोगों के लिये श्रिंक के पास जाना और मोटी फीस देकर डींग मारना एक फैशन सा बन रहा है वहाँ..अब तो हमें बनाने वाले उस ईश्वर को भी शायद टेंशन हो रही होगी.

और अब मुझको भी टेंशन हो रही है सोचकर कि कहीं आप में से किसी को इस लेख को पढ़कर टेंशन तो नहीं होने लगी है..तो चलती हूँ..बाईईईई...दोबारा फिर मिलेंगे कभी...

शन्नो अग्रवाल

Friday, August 13, 2010

लंदन में 15 अगस्त मनाना ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है...

भारत देश हमारा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा...

जब से अपने भारत देश ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाई है उसमे एक साल और बढ़ गया है..15 अगस्त के दिन भारत के हर शहर, गाँव, गली-कूचे..देशभक्ति से ओत-प्रोत लोगों की बातों से गुंजित होंगे...गाने-फ़िल्में, डांस आदि के कल्चरल प्रोग्राम होंगे, स्पीच होगी और सड़कों पर तरह-तरह की वेश-भूषा में परेड निकलेंगीं...और लोग भीड़ में धक्का खाते हुये, या घर की छतों से उन्हें देखने का आनंद उठायेंगे...... जिन्हें दिल्ली जाकर भीड़ में शामिल होकर लालकिले पर झंडा लहराते हुये देखने का व प्राइम मिनिस्टर की दी हुई स्पीच सुनने का और परेड देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा वह अपने घर या चौपाल में बैठे टीवी पर ही देखकर दिल्ली में हुये उत्सव का आनंद लेने की कोशिश करेंगे. स्कूलों के बच्चे लाइन में खड़े होकर ( जैसा मुझे अपना बचपन याद आता है ) '' 'जन-गण-मन' और '' वन्देमातरम '' जैसे देशभक्ति के गाने गायेंगे..आसमान में पतंगें उड़ रही होंगी..क्या सीन होगा...और हम यहाँ बैठे हुए ज़ी टीवी पर उनकी कुछ झलकियाँ देखकर अपने देश के बारे में सोचकर अपनी आँखे नम करेंगें..क्योंकि यहाँ इतनी दूर रहकर टीवी की झलकियाँ ही तिरंगे को दिखाकर दिल में तरंगें पैदाकर हलचल मचाकर अपना गुजरा हुआ जमाना याद दिला देती हैं...इन तरंगों का भी उठना बहुत जरूरी है...कितने ही देशभक्त पतंगों की तरह देश पर कुर्बान हो गये. गाँधी जी ने, साथ में और भी तमाम देश-भक्तों ने पता नहीं क्या-क्या झेला देश की आजादी को प्राप्त करने के लिये और साथ में न जाने कितने और लोगों ने भी कुर्बानियाँ दीं जिनके नाम भी नहीं पता सबको.

लेकिन इतना सब कुछ हुआ..क्यों हुआ..देश को आजाद कराने के पीछे उन महान आत्माओं के सपने थे अपने देश की सुन्दर तस्वीर के. लेकिन लोग कैसे रहेंगे आजादी के बाद...और उनके इस दुनिया से जाने के बाद और उस आजादी का भविष्य में किस तरह इस्तेमाल किया जायेगा इसका उन लोगों को कोई अनुमान नहीं रहा होगा. जो गाँधी जी के सिद्धांत थे उनपर कितना अमल हो रहा है ? अहिंसा की जगह हिंसा का प्रयोग, शांति की जगह अशांति, बेईमानी, रिश्बतबाजी, हर जगह फैला आतंक, भ्रष्टाचार, दरिद्रता, अनैतिकता, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव..और भी न जाने कितनी समस्यों से देश ग्रस्त हो चुका है...इनका निवारण करने की तरफ कौन से कदम उठे हैं ? गरीबी, अत्याचार, लोगों के प्रति अन्याय..किसी भी क्षेत्र में सुधार होता नजर नहीं आ रहा है...जनता टैक्स देती है लेकिन उसका सदुपयोग उनके इस्तेमाल के साधनों की तरफ नहीं बल्कि किसी और तरफ नाजायज रूप में खर्च होता है....

बिजली, सड़कें, गंदगी, पानी और महँगाई से सूखता लोगों का खून
लाचारी, मजबूरी, कानून का डर शांत कर देता है तब उनका जुनून.

इन सब बातों को लिखते हुए, जिनसे आप सब लोग मुझसे अधिक परिचित हैं, सोचती हूँ कि कुछ लोगों के दिल में ये ख्याल आ रहा होगा या जिज्ञासा हो रही होगी कि मैं आप लोगों को बताऊँ कि यहाँ यू. के. में 15 अगस्त का दिन कैसे मनाया जाता है..लेकिन आपको शायद ताज्जुब होगा कि इतने साल यहाँ रहने के वावजूद भी मैंने इस बात पर कभी गौर नहीं किया था..मैं इस तरह के समारोह के बारे में अनजान रही थी..इस बारे में कुछ विदित ही नहीं हो पाया था अब तक. एक तो अंग्रेज लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों मनाने लगे..ये तो वही बात होगी कि किसी के हाथ से सुई लेकर उसी की आँख में चुभो दो..मतलब ये कि उन पर ज़ोर दो कि तुम लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों नहीं मनाते इस देश में. अरे भाई, जो हमारा देश छोड़ने पर मजबूर हुये उनको याद दिलाकर जले में नमक छिडकने जैसा हुआ कि नहीं ये ? इस बारे में कोई जश्न यहाँ खुले आम नहीं होता. हमारे अपने आजादी-दिवस पर भारतीयों के लिये न कोई छुट्टी का दिन रखा गया है ( इनके अपने त्योहारों के दिन होते हैं जिन पर छुट्टी होती है ) न कोई झंडा लहराना, न परेड न स्कूलों में कुछ..और न ही लाइब्रेरी में हमारे स्वतंत्रता दिवस को इस देश में मनाने के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है. लेकिन यहाँ कुछ जगहों पर जहाँ अधिक भारतीय रहते हैं वहाँ भारतीय लोग मिलकर किसी हाल वगैरा में लोकल काउंसिल की मदद से इस दिवस को मनाने का आयोजन रखते हैं..और लन्दन में भारतीय विद्या-भवन में भी इस अवसर पर समारोह मनाया जाता है जिसमे भारतीय नृत्य-गाना, सितार और तबला-वादन आदि का प्रोग्राम होता है. और भारतीय हाई कमिशनर '' रायल केनजिंगटन पैलेस गार्डेन '' नाम की बिल्डिंग के बाहर अपने देश का तिरंगा फहराता है और वहाँ के सुन्दर गार्डेन या हाल में स्पीच देता है...उसके बाद वहाँ पर कुछ कल्चरल प्रोग्राम होता है नाच-गाना इत्यादि...और खाने आदि का कार्यक्रम होता है...इस बार का प्रोग्राम है: 15 अगस्त को 10.30-3.00 तक के प्रोग्राम में 11 बजे सुबह भारतीय हाई कमिशनर नलिन सूरी अपने देश का तिरंगा ऊँचा करेंगे उसके बाद '' इंडियन जिमखाना क्लब '' में खाने का प्रबंध होगा जहाँ भारत के सभी क्षेत्रों के खाने के स्वाद के स्टाल होंगे व भारतीय कल्चरल प्रोग्राम भी होंगे जिसमे शायद भरत-नाट्यम नृत्य और संगीत आदि है.

आप सभी पाठकों को व हिन्दयुग्म से जुड़े सभी सदस्यों को इस स्वतंत्रता दिवस पर बधाई व मेरी शुभकामनायें...जय हिंद ! वन्देमातरम !

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका ने लंदन से अपना अनुभव हमें भेजा है....तस्वीर लंदन के किसी पुराने समारोह की है, 15 अगस्त के मौके पर)

Tuesday, September 15, 2009

शरीर का अंग बन गया है मोबाइल...

शन्नो अग्रवाल उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से ताल्लुक रखती हैं। 1969 में एम.ए. की पढ़ाई खत्म होते ही शादी हुई और सात समंदर पार लंदन जा बसीं। पति कंप्यूटर के क्षेत्र में नौकरीपेशा थे तो इन्होंने घर-गृहस्थी संभाल ली....बच्चों की परवरिश करने में शन्नो अपने सभी शौक भूल चुकी थीं...हिंदयुग्म से जुड़ने पर कविता-कहानी के इनके पुराने शौक वक्त मांगने लगे...अब चूंकि इनके बच्चे भी गृहस्थी बसा चुके हैं तो ब्लॉगिंग के ज़रिए इन्हें कहने-सुनने की फुर्सत मिल गई है...बैठक पर सात समंदर पार से इनका ये पहले लेख है...

मुझे भी बच्चों ने जिद करके खरीद कर दे ही दिया, हाँलाकि मुझे कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई किन्तु बच्चों की जिद के आगे सर झुका दिया क्योंकि यदि बाहर हुई और उन्हें नहीं पता कि कहाँ हूँ तो उनको बड़ी चिंता हो जाती थी. अब कम से कम पता लग जाता है कि मैं कहाँ हूँ. चलो कोई बात नहीं, मिस्ड काल मारो तो बिल बच्चे ही तो भरते है। ऐसी ही हिदायत दी गयी थी. खैर अपने को तो खुराफाती बातें करना नहीं आता सो कभी - कभी की बात रही.

जी हाँ, सारी दुनिया में ही जिसकी इतनी महिमा है और जिसके बिना अब किसी भी घर में चाहें वह देश हो या विदेश लोगों का काम ही नहीं चलता या बाहर जाओ तो खासतौर से बिना उसे साथ ले जाये हुए, मैं उसी मोबाइल की ही बात कर रही हूँ. और जिसके साथ के बिना जीवन में अब खालीपन सा लगता है. अगर घर पर भूल जाये उसे तो शायद पति अपनी पत्नी को उसकी अनुपस्थिति में इतना याद न करता होगा जितनी मोबाइल के साथ की कमी उसे खलती है अब. चाहे वह......चलिये, छोडिये भी पति-पत्नी की बात. तो फिर मैं जो बात कर रही हूँ वह है कि जिधर भी देखो उधर ही सब चटर-पटर बातों में उलझे होते हैं उसे कान से चिपकाये हुये. कुछ लोग उसे कहते हैं सेलफोन भी....सही कहा ना मैंने?

सोचती हूँ कि मोबाइल फोन न हुआ जैसे एक खिलौना हो गया. चाहे किसी और चीज की अकल हो या न हो लेकिन मोबाइल जरूर चाहिये. कितनी किसे जरूरत है उसकी परवाह करे बिना उसे पाने की हसरत सभी में फ़ैल चुकी है एक रोग की तरह. ना पूछिये अब.....बात करने की अकल हो या न हो पर उसे खरीद कर नक़ल जरूर करनी है. शॉपिंग को गयी हुई वापस आते हुए रिक्शे में बैठी सासू माँ को अचानक सूझती है मोबाइल निकाल कर अपनी बहू से बात करने की. कह रही हैं ' अरी सुन, जरा मुझे आज अपनी सहेली के यहाँ भी जाना है, तुझे बताना भूल गयी थी. और कहारिन आवे तो कहियो की माँ जी आज घर पर नहीं है इस समय, पैसे किसी और दिन ले जाये और यह भी सुन ......' अरे यह सब बेकार की बातें तो उनके घर में ना होने पर बहू भी बता सकती थी कहारिन को...लेकिन मोबाइल पर बात करने का मजा तो और ही है ना? किन्तु क्या इसकी वाकई में सभी को या अधिकतर लोगों को जरूरत है? सहेली के यहाँ जाकर भी तो फोन किया जा सकता था.

कुछ लोगों को इसकी जरूरत एक फैशन की तरह होती है. अगर कुछ भी नहीं है बात करने को फिर भी टुन्न-टुन्न बजता रहता है और फोन करने वाले को इतना भी ख्याल नहीं की जिसको फोन करके अपनी बोरियत के पलों को बांटना चाहता है वह इंसान अभी-अभी अपनी दाढ़ उखड़वा कर डेंटिस्ट के यहाँ से आया है और इंजेक्शन के असर से मुंह भी नहीं खोल सकता. हाँ, कभी-कभी यह बहुत ही लाभदायक साबित हो सकता है. एक बार मैक्सिको में आये हुये भूचाल से एक शहर तहस नहस हो गया और वहां जब मलबे में से लोगों की लाशें निकाली जा रही थीं तो किसी का मोबाइल बजने लगा ...... मलबा हटा कर पता लगा की उस आदमी ने लोगों की आहट सुनकर बटन दाब दिया था. वह किसी तरह भगवान् की कृपा से जिन्दा बचकर निकल आया.

लेकिन किसी और जगह आप देखें तो......पत्नी घर से फोन पर पति के लेट होने के बारे में चिंता करती है और पति महाशय उस समय अपने ऑफिस की किसी काम करने वाली लेडी के साथ कॉफी और समोसे खाते हुए कुछ सुनहरे पलों को जी रहे होते हैं तो पत्नी को बता कर उसकी चिंता दूर करते हैं ' डार्लिंग, मैं अभी उस काफी हाउस के बाहर जो बस स्टाप के पास है वहां भीड़ में इंतज़ार कर रहा हूँ. दो बसें ठसाठस भरी हुई सामने से निकल गयीं उनमें तो चढ़ना भी मुश्किल था...इसीलिए लेट हो रहा हूँ, तुम खाना खा लेना मैंने कुछ लेट लंच खाया था इसलिए भूख नहीं है.' यदि पत्नी भोली हुई तो अविश्वास की परछाईं को भी अपने पर पड़ने नहीं देगी. वरना.... उसका माथा कभी न कभी तो ठनकना चाहिये.

बिस्तर में हैं तो छुपकर, या कभी - कभी दरवाजे पर की गई खटखट किसी ने ना सुनी हो तो घर के फोन पर, आप घर की चाबी भूल गये हों और पत्नी सहेली के यहाँ हो तो उसे वहां पर, बाहर कहीं खाना खा रहे हों तो वहां से, या टॉयलेट की सीट पर बैठे हों तो वहां आराम से हर जगह से इसका उपयोग करके बातचीत कर सकते हैं.
गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के लिये तो और भी उपयोगी.....घर वालों की निगाहें बचाकर छत पर जाकर गुटरगूं कर सकतें हैं आपस में. तब कोई यह तो नहीं कहेगा की ' हाय-हाय देखो तो आजकल के बच्चों को, हमें पता भी न चला की कब हमारा बच्चा बड़ा हो गया और आज को यह दिन देखना पड़ रहा है हमें की इसने अपनी गर्लफ्रेंड भी ढूंढ ली. हमारे ज़माने में तो लड़के लोग लड़कों से और लड़कियां केवल लड़कियों से ही बातें करती थीं और लड़कियां तो रास्ते में निगाह झुका कर चलती थीं '. लेकिन कभी - कभी इसकी वजह से सब त्रस्त भी हो जाते हैं. बच्चे अब अधिकतर समय इसी पर दोस्तों से बात करने में गुजारते हैं और घर में बातचीत की उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती. बिना मतलब का बिल अलग से बढ़ता है. और हम अन्य चीजों के भाव ऊपर जाने की बातें करते रहते हैं. कभी-कभी इसपर फिजूल की करी बातों से और बकवास के टेक्स्ट भेज कर जो बिल बढ़ता है उसका क्या?

बूढे-बच्चे, जवान, अकल या बेअकल वाले, बाबू-अफसर, ठेले वाले, दुकानदार, चाट वाला या लोहार, कुल्फीवाला हो या सुनार. कोई फर्क नहीं किसी में. सबको इसका इस्तेमाल आता है और पता है आपको की यह खिलौना अकेले में बड़े काम का होता है. आप स्टेशन पर जब अकेले बैठे ऊब रहे हों तो चलो किसी से बात ही कर ली जाये वैसे तो फुर्सत नहीं मिलती है. या कहीं सुनसान जगह पर जा रहे हों और कोई खतरे वाली बात हो तो घर या पुलिस को फ़ोन करके सूचना तो दे सकते हैं, शॉपिंग पर गये हों तो पत्नी से उसकी पसंद का रंग पूछ सकते हैं (यदि उसे कभी अचानक से उपहार देकर खुश करने का मूड हो तो) आप क्या काम करते हैं, अधिक पढ़े - लिखे हैं या कम, कमजोर हैं या पहलवान, भिखारी हैं या कोचवान सभी को ही इसका चस्का लग गया है..... जिसे देखो वह इसपर बात करते हुये मस्त दिखता है.

आजकल तो लगता है की भिखारी भी इतने पैसे वाले और अक्लमंद हो गये हैं की सुना गया है कि कहीं कोई फोन पर रात में चाइनीज खाना आर्डर कर रहा था मोबाइल पर. अभी कुछ महीने पहले बरेली की स्टेशन पर बैठी ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी की एक भिखारी एक पर्चा हाथ में लिये हुये आया और बेंच पर बैठे सज्ज़न से बोला ' बाबू जी जरा अपना फ़ोन दे दीजिये एक फोन करना है.'

एक दिन मायके में ही बाहर जाते हुये देखा कि ठेले पर सब्जी बेचने वाला खाली खड़ा है फिर अपना मोबाइल निकाला और बात करने लगा ' अरे सुनौ खाना बनि गऔ होइ तौ अम्मा और बाबू जी और बच्चन को खवाइ देउ हम भी कुछ देर में ठेलुआ संग घर पहुँचत हैं.'

कोई हंस रहा है या गाली दे रहा है उस समय किसी पर ध्यान नहीं जाता यदि आप पूरी तरह से बातचीत में मगन हैं तो. . . सड़क पार कर रहे हैं, कार चला रहे हैं तब भी इस पर बात करने की इतनी तलब होती है जैसे एक शराबी को पीने की. दिन हो या रात हो, आंधी हो या बरसात हो या कैसी भी खुराफात हो मोबाइल से बात करो तो फिर कोई बात हो.

शन्नो अग्रवाल