Thursday, June 03, 2010

क्या इस देश में कोई वकील बनना चाहता है?

देश में करियर बनाने के विकल्पों पर बात हो तो शायद ही कोई युवा होगा जो ये कहेगा कि हमें तो वकील बनना है। ऐसी हालत तब है जब देश में कम से कम 900 विधि (यानी लॉ) कॉलेज हैं और 14 उच्चस्तरीय केंद्रीय विधि संस्थान हैं। अगर कुछ साल पहले (दस साल) तक की बात करें तो लॉ कॉलेजों का ये आंकड़ा देश में मौजूद कुल इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की संख्या पर भी बीस पड़ता था...(इन दो विभागों से तुलना इसीलिए क्योंकि देश में कैरियर के तौर पर इन्हीं दो विकल्पों को रामबाण माना जाता रहा है)। विडंबना ये है कि आज इंजीनियरिंग के पेशे में उम्र में बित्ते भर के छोकरे लाखों-करोड़ों में खेल रहे हैं और वकीलों की हालत ऐसी है कि ज़्यादातर दोधारी पतलून पहनकर दस-बीस रुपये की दिहाड़ी का जुगाड़ ढूंढते उम्र गुज़ार देते हैं ! ऐसा नहीं है कि देश में लॉ कॉलेज से निकलने वाले छात्रों को चमचमाता भविष्य नसीब ही नहीं होता, मगर उनकी संख्या बेहद कम है। ज़रा सोचिए, जिस देश में करोड़ों मामले तारीख के इंतज़ार में बरसों फाइलों में दबे रहते हैं, वहां इतने लॉ कॉलेज होने के बावजूद ऐसी दुर्दशा क्यों है ? अमूमन हर छोटे-बडे विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र का अलग विभाग होता ही है। मगर, उन विभागों की दुर्दशा प्राइमरी स्कूलों से भी बदतर होती है। ऐसे में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन संस्थानों से वकालत की डिग्री लेकर निकले विधि विशेषज्ञ ऐसी समझ रखते हों कि देश की सबसे विश्वसनीय संस्था न्यायपालिका को दुरुस्त बनाए रखने में अहम योगदान दे सकें।
दरअसल, हाल ही में विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में इन्हीं सब मुद्दों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि विधि की शिक्षा में हर इलाके के लोगों को समान अवसर नहीं मिले तो सिर्फ वरिष्ठ जजों या अधिकारियों के बेटे ही जज की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे और उन्होंने भी माना कि देश में विधि शिक्षा दोहरे तरीके से चल रही है और छोटे शहर-बड़े शहर, छोटे-संस्थानों-बड़े संस्थानों का फर्क वकीलों के स्तर पर साफ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि 50 साल पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि हमारे देश में विधि शिक्षा का स्तर दुनिया के मंच पर कहीं भी नहीं ठहरता और इसमें सुधार की ज़रूरत है। पचास साल बाद भी हालात और बदतर ही हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री या संबंधित मंत्री सिर्फ चिंता ज़ाहिर कर क्या बदलाव ला देंगे। आपके पास शक्तियां हैं, सोच है, लोग हैं, फिर आपको विधि शिक्षा की अहमियत क्यों नहीं समझ आती ? बहुतायत में पाए जाने वाले फटीचर वकीलों के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारें ज़िम्मेदार रही हैं।
मोइली कहते हैं कि देश भर में लॉ की पढ़ाई एक जैसी करने की कोशिश की जाएगी। एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किया जाएगा जिसमें देश भर के वकीलों और विधि से जुड़े छात्रों का ब्योरा होगा।
फिर, इसमें से प्रतिभावान लोगों की पहचान की जाएगी। क्या ऐसा संभव है ? और पहचान हो भी गई तो क्या करेंगे। देश में न्यायपालिका की जो वर्तमान स्थिति है उस पर गौर करें तो शायद ही कोई बड़ी अदालत हो जहां मामलों की सुनवाई क्षेत्रीय भाषाओं या फिर हिंदी में की जाती है। सुनवाई हो भी जाए तो पेचीदा कानूनी धाराएं और मामलों से जुड़ी कागज़ी कार्रवाई शत-प्रतिशत अंग्रेज़ी में होती है। अब देश की हालत देखें तो ठीक से अंग्रेज़ी बोलने-समझने वाले कितने लोग हैं ? जिन धाराओं में मुजरिम को सज़ा मिलती है, जिन अनुच्छेदों के तहत सुनवाई पूरी होती है, वो इतनी पेचीदा होती हैं कि गुनाह की सज़ा भुगतने वाले तक को पता नहीं होता कि न्यायपालिका की कार्रवाई किस दिशा में गई और उसे सज़ा किस-किस आधार पर मिली। हमारी न्यायिक शब्दावली किसी भी देशी भाषा से मेल नहीं खाती मगर देश के कई लॉ संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अब भी अंग्रेज़ी से अलग भाषाएं ही हैं। अब ऐसी पढाई कर निकलने वाला वकील न्यायिक पेंचों को कंठस्थ करने के बावजूद पहले ही ‘’हीन भावना’’ से ग्रसित हो जाता है क्योंकि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती ! ऐसे में उसका जज बनने का सपना सपना ही रह जाता है और बहुतेरे वकीलों की जमात में चंद ‘’ साफ-सुथरे’’ वकील ही जज बनने का सपना देख पाते हैं।(और उनमें से गिनती भर ही, जो या तो वकालत की आबोहवा में पले-बढ़े हैं या फिर किसी न्यायिक पदधारी की संतान हैं, इस कुर्सी तक पहुंच पाते हैं।)
क्या भारत देश में कई होनहार जज सिर्फ इसी आधार पर नहीं बन पाएं कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती, कहीं से भी उचित है ?
देश में विधि शिक्षा में एक जैसी प्रणाली लागू करने की बात कहना आसान है, कर पाना लगभग नामुमकिन। लॉ की पढ़ाई की स्थिति देश में एक ही ट्रेन के अलग-अलग श्रेणी के डिब्बों जैसी है। पहली श्रेणी के डिब्बों में बैंगगलोर, पुणे के बेहतरीन लॉ स्कूल आते हैं जिनके उत्पाद संस्थान से बाहर निकलते ही अक्सर देश से बाहर निकल जाते हैं और फिर किसी लॉ फर्म या विदेशी कंपनी के विधि विशेषज्ञ बन डॉलर कमाते हैं। दूसरी श्रेणी और तीसरी श्रेणी के स्कूलों से निकले वकील अलग-अलग अदीलतों में जज बनने की दौड़ में घिसते रहते हैं और देश में हर रोज़ मामलों का अंबार बढ़ता जाता है। मतलब, देश के सबसे अच्छे वकील देश की हालत सुधारने के काम बिल्कुल भी नहीं आ सके और व्यवस्था पंगु ही रह गई। दोयम दर्जे के लॉ स्कूलों में बड़ी तादाद उन छात्रों की होती है, जो या तो 60 साल की नौकरी के बाद रिटायर हो चुके होते हैं या फिर जिनके पास युवा उम्र में ही बेरोज़गारी के मुहाने पर पहुंचकर वकालत करने के सिवा कोई चारा नहीं बचता !
क्या विधि यानी लॉ के कैरियर को बाक़ी चमकदार विकल्पों के साथ खड़ा नहीं किया जा सकता ? किया जा सकता है, अगर सरकारें चाहें तो। कानून की समझ की ज़रूरत किसे नहीं पड़ती। लगभग हर किसी को। मगर, कानून की बेहतर समझ रखते कितने लोग हैं। शायद न के बराबर लोग । सबसे पहले तो ज़रूरी ये होगा कि विधि की पढ़ाई को ‘आयातित (इंपोर्टेड) शैली’ से निकालकर देशी अंदाज़ में सरलीकृत किया जाए ताकि पढ़ाई रुचिकर बने और ज़्यादा से ज़्यादा लोग (युवा छात्र) विकल्पहीन होने से पहले भी इस विकल्प के बारे में सोच सकें। ऐसा करने में वक्त तो लगेगा मगर करना ज़रूरी है। देश में अच्छे वकीलों और जजों की सख्त दरकार है जो मामलों की समझ रखते हों और पेंडिंग मामलों को निपटाने में अहम भूमिका निभा सकते हों। हमारे देश में कई बदनसीब ऐसे भी हैं जो मामले की सुनवाई के चक्कर में आधी ज़िंदगी जेल में गुज़ार देते हैं और जब मामले की सुनवाई हो पाती है, तो उनको मुकर्रर सज़ा उनकी कैद में गुज़ारी गई ज़िंदगी से बेहद कम होती है।
इसके अलावा देश में अच्छे विधि शिक्षकों की बेहद कमी है। जब अच्छे शिक्षक ही नहीं होंगे, तो विधि की समझ रखने वाले अच्छे छात्र कहां से आएंगे। ये ज़िम्मेदारी वर्तमान जजों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को उठानी होगी ताकि न्यायपालिका का हिस्सा बनने वाली अगली पीढ़ी बेहतर समझ रखने वाली हो और वो भी बेहतर शिक्षक बन सके।
वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल जैसे मंत्री अपने पूरे कार्यकाल में कई घोषणाएं करते दिखे हैं, मगर इन पर कितना अमल हो सका है, किसी से छिपा नहीं है। उनके बयान मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह आते हैं और गायब हो जाते हैं। मगर, विधि की पढ़ाई को लेकर सरकार का गंभीर होना ज़रूरी है क्योंकि न्यायपालिका बिना लाठी-डंडे के, सिर्फ विश्वास के ज़ोर पर चलने वाली संस्था है। इस संस्था से आम आदमी का विश्वास जुड़ा है। और, दयनीय शिक्षा प्रणाली से पास होकर वकील और जज बनने वालों पर कब तक हम विश्वास करेंगे, कहना मुश्किल है। पूरा लेख लिखने के बाद भी मेरा मन तो नहीं हुआ कि मैं वकील बन जाऊं। शायद इसीलिए कि वकालत की पढ़ाई से लेकर जज और न्यायपालिका का बाहरी-भीतरी ढांचा तक देशी नहीं लगता, समझ और पहुंच के लिहाज से बाहर की चीज़ लगता है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?

निखिल आनंद गिरि

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7 बैठकबाजों का कहना है :

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है कि -

गिरि जी, मैं मानता हूँ कि वकीलों और न्याय प्रणाली की दुर्दशा के लिए सरकारें और केवल सरकारें जिम्मेदार हैं। सब से बड़ा जो कारण है वह यह कि देश को 60000 अदालतों की जरूरत है और हैं केवल मात्र 16000 इन में भी दो हजार में जज नहीं हैं। 44000 वकीलों को तो जज बनाया जा सकता है। इस से अदालतों के काम में तेजी आएगी और पेपर जस्टिस रुकेगा। जब अदालतें अधिक होंगी तो शेष बचे बेकार वकीलों को भी काम मिलने लगेगा।

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

दिनेशराय जी,
सिर्फ वकालत ही क्यों...और भी कई पेशे हैं जिनकी अहमियत तो है, मगर गुणवत्ता के नाम पर सरकारें कुछ नहीं करतीं...

himani का कहना है कि -

अब वकीलों की अक्ल को परखने के लिए बार काउंसिल ने विशेष तरह की बहुविकल्पीय परीॐा की शुरुआत की है। इससे शायद हालात में सुधार आए और आनन फानन में वकालत पढ़ने वाले लोगों में से बेहतर वकील का चुनाव हो सके।

दिव्यप्रकाश दुबे का कहना है कि -

अच्छा मुद्दा उठाया है निखिल....मेरे पिताजी लॉ के इलाहाबाद के टॉपर रहे हैं, फिर भी वकालत नहीं कर पाए~!

rakesh tiwari का कहना है कि -

बिल्कुल लगता है निखिल जी,
सवाल इस बात का भी है कि मुद्दा उठाना तो आसान है, संस्थाओं और संबंधित लोगों को गाली देना भी अच्छा लगता है... लेकिन एक बात से आप भी इत्तेफ़ाक रखते होंगे कि विकल्प देना ज़्यादा मुफ़ीद होगा। हमारे यहां एक जुमला दोहराया जाता रहा है कि बेटा बिगड़े तो बस में.. और बेटी बिगड़े तो नर्स में... अर्थात बेटा बिगड़ा तो बस का ड्राइवर, कन्डक्टर या खलासी हो गया..जबकि बेटी बिगड़ी तो नर्स बन गई। पिछले दो-तीन दशकों से एक और जुमला बड़ा मशहूर रहा है कि कोई नौकरी नहीं मिलेगी तो वकील या पत्रकार तो बन ही जाएगा। निखिल भाई आपको नहीं लगता कि बुनियादी स्तर पर मानसिकता बदलने की ज़्यादा ज़रूरत है। सवाल ये भी है कि करेगा कौन, मैं समझता हूं हिन्दी पट्टी में इस सवाल का जवाब ज़्यादा चाहिए, क्योंकि पीढ़ियों से परंपरावाद पर चलना यहीं ज़्यादा देखी जाती है, शायद आप सहमत हों। मैं एक बात ज़रूर कहूंगा कि क़ानून पर क़ब्ज़ा करने वाले मठाधीशों का खतियान खोलकर सार्वजनिक करने की ज़रूरत है, क्योंकि कई बिगड़ैल नवाब भी आज जजों की कुर्सी पर बैठे हुए हैं, और देशी की लंगड़ी हो चुकी न्याय व्यवस्था को और भी पंगु कर रहे हैं।
लेख के अच्छे विषय के लिए साधुवाद।

LAXMAN KUMAR MALVIYA का कहना है कि -

आज जो स्थिति में हमारे देश की न्याय-व्यवस्था है वह अत्यंत ही दिनो-दिन लचर होते जा रही है,इस तरफ सरकार को गम्भीरता से विचार कर उचित कदम उठाना अश्यक है।
इतिहास साक्षी है कमजोर न्याय व्यवस्था से न केवल समाजिकता,संस्कृति वरन् सम्पूर्ण देश का पतन हुआ है,क्योंकि न्याय व्यवस्था मुल्क की रीढ़ की हड्डी होती है।

LAXMAN KUMAR MALVIYA का कहना है कि -

आज जो स्थिति में हमारे देश की न्याय-व्यवस्था है वह अत्यंत ही दिनो-दिन लचर होते जा रही है,इस तरफ सरकार को गम्भीरता से विचार कर उचित कदम उठाना अश्यक है।
इतिहास साक्षी है कमजोर न्याय व्यवस्था से न केवल समाजिकता,संस्कृति वरन् सम्पूर्ण देश का पतन हुआ है,क्योंकि न्याय व्यवस्था मुल्क की रीढ़ की हड्डी होती है।

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