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Thursday, September 24, 2009

भारत और चीनी कंपनियाँ सबसे भ्रष्ट

दुनियाभर में भ्रष्टाचार की नब्ज़ पर नज़र रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा है कि भारत और चीन दुनिया के बड़े बाज़ार तो हैं लेकिन विदेशों में कारोबार के मामले में इन देशों की कंपनियों को बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. भारत में जिन लोगों ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में भाग लिया उनमें से 30 प्रतिशत का कहना था कि भारतीय कंपनियाँ अपना काम जल्दी करवाने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को रिश्वत देना पसंद करती हैं.एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार की वजह से बहुत बड़ा नुक़सान हो रहा है.

भारत और चीन के बारे में कहा गया है कि दोनों ही देश बड़े-बड़े बाज़ार उपलब्ध कराते हैं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन इन दोनों देशोंकी कंपनियों को ख़ासतौर से अंतरराष्ट्रीय कारोबार करते हुए बहुत भ्रष्ट समझा जाता है. पाकिस्तान में इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले साठ प्रतिशत कंपनी अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों को रिश्वत दी थी. रिपोर्ट में भारत की यह कहते हुए प्रशंसा भी की गई है कि प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से निबटने के लिए ठोस क़दम उठा रहा है, कंपनियों को वित्तीय अपराधों के लिए जुर्माना अदा करने का विकल्प दिया जा रहा है.

अरबों का नुकसान
वर्ष 2009 की वैश्विक भ्रष्टाचार रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में फैले भ्रष्टाचार, घूसखोरी, फिक्सिंग और सार्वजनिक नीतियों को निजी स्वार्थों के लिए प्रभावित करने की वजह से अरबों का नुक़सान हो रहा है और इससे टिकाऊ आर्थिक प्रगति का रास्ता भी बाधित हो रहा है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि भ्रष्ट चाल-चलन से ऐसा माहौल बनता है जिसमें साफ़-सुथरी प्रतिस्पर्धा के लिए जगह नहीं बचती है, आर्थिक प्रगति अवरुद्ध होती है और अंततः भारी नुक़सान होता है.

पिछले सिर्फ़ दो वर्षों में ही बहुत की कंपनियों को भ्रष्ट चाल-चलन की वजह से अरबों का जुर्माना भी अदा करना पड़ा है. इतना ही नहीं, इस तरह की सज़ाएं मिलने से कर्मचारियों के मनोबल पर असर पड़ता है और ऐसी कंपनियों का विश्वास ग्राहकों में भी कम होता है और संभावित भागीदारों में भी उसकी साख गिरती है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशलन के अध्यक्ष ह्यूगेट लाबेले का कहना है, "निवेश की सुरक्षा बढ़ाने, व्यावसायिक सफलता सुनिश्चित करने और ग़रीब और धनी देशों द्वारा वांछित स्थायित्व लाने के लिए यह ज़रूरी है कि एक ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें व्यावसायिक साख को बढ़ावा दिया जाए. आर्थिक संकट से उबरने के लिए यह ख़ासतौर से बहुत आवश्यक है."
इस रिपोर्ट में बड़ी कंपनियों में बहुत से ऐसे प्रबंधकों, शेयरधारकों और अन्य महत्वपूर्ण अधिकारियों के मामलों का ज़िक्र किया गया है जिन्होंने अपने निजी फ़ायदों के लिए अपने पदों और अधिकारों का दुरुपयोग किया. इससे न सिर्फ़ कंपनी, ग्राहकों और शेयरधारकों को ही नुक़सान हुआ बल्कि व्यापक तौर पर पूरे समाज को नुक़सान हुआ.
रिपोर्ट कहती है कि विकासशील देशों में बहुत सी कंपनियों ने भ्रष्ट राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से एक वर्ष में लगभग 40 अरब डॉलर की घूसखोरी की है.

रिपोर्ट के लिए किए गए शोध में बताया गया है कि भ्रष्ट नीतियों की वजह से लागत में भी लगभग दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है और इसका ख़ामियाजा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है क्योंकि बढ़ी हुई लागत उन्हीं से तो वसूल की जाती है. रिपोर्ट में एक ख़ास बिंदू की तरफ़ ध्यान दिलाते हुए कहा गया है कि दुनिया भर में कुछ गिनी-चुनी कंपनियाँ हैं जिनकी ताक़त बहुत बढ़ चुकी है और वो इस ताक़त के ज़रिए विभिन्न देशों की सरकारों को अपने हित साधने के लिए प्रभावित करती हैं. इनमें अपने क़ानूनों को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करवाना भी शामिल है.

बीबीसी

Wednesday, June 24, 2009

विद्रोह में लोक साहित्य की अहम भूमिका


लोक परंपराओं और लोक गीतों में वर्ष 1857 के पहले से ही अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखी और गाई जाने लगी थीं. इनमें अंग्रेज़ों को काफ़ी ज़ालिम, बेईमान और नाइंसाफ़ बताया गया है.
ख़ासकर प्लासी की ज़ंग में जब सिराजुद्दौला अंग्रेज़ों से हारे तभी से काफ़ी लोगों ने शेर लिखे और इसमें उन्होंने विरोध भी किया है.
उर्दू के अलावा खड़ी बोली, भोजपुरी और मगही में तो बहुत कुछ लिखा और कहा गया.
दोनों तरह की बातें हुईं कुछ साहित्य लिखा हुआ मिलता है और लोकगीत कभी लिखित रूप में सामने नहीं आए बल्कि लोग इसे गाया करते थे.
रामग़रीब चौबे नाम के एक साहब थे जिन्होंने बहुत सामग्री जमा की थी.एक दिलचस्प लोककथा है जो इन्होंने रिकॉर्ड नहीं किया है.
विलियम फ़्रेज़र जो दिल्ली में रेज़िडेंट थे, हिंदू और मुसलमानों से काफ़ी घुल-मलकर रहता था. गाय और सूअर का माँस नहीं खाता थे.
लेकिन उसके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी था. वो काफ़ी अय्याश और ज़ालिम था. उसके जमाने में दिल्ली के आसपास को लोग गाँव छोड़कर जंगलों में चले गए थे. वह लड़कियों का उठवा लेता था.
एक बार फ़्रेजर ने मेवात की रहने वाली सृजन को उठवा लिया था. इस पर सृजन-फ़्रेजर के नाम से मशहूर लोकगीत है.
यह वाकया सन् 1834-35 का है. इससे पता चलता है कि लोकगायक उस दौर में भी कितना जागरूक थे.
ज़ुरैब के बारे में कहा जाता था कि वे सिर्फ़ प्रेम की शायरी किया करते थे लेकिन वर्ष1757 में सिराजुद्दौल की हार के बाद अंग्रेज़ों ने जब अपने पिठ्ठुओं को बंगाल का नवाब बनाया तो उन्होंने जिस तरह हालात को बयाँ किया है, वह गौर करने लायक है.
उनकी एक शायरी है-
समझे न अमीर इनको कोई, न वज़ीर


अंग्रेज़ के कफ़स में है असीर


जो कुछ वो पढ़ाएं सो ये मुंह से बोलें


बंगाले की मैना है ये पूरब के अमीर
यानी बंगाल के नवाब को अंग्रेज़ जो पढ़ाते हैं वो वही बोलते हैं. ये दिखाता है कि उस समय अंग्रेज़ों को लेकर कितनी कठोर प्रतिक्रिया थी.
सन् 1857 से बहुत पहले का बहादुर शाह ज़फ़र का एक शेर है तब वह बादशाह भी नहीं बने थे.
एतबारे सब्र-ए-ताकत हाथ में रखूँ ज़फ़र


फ़ौज-ए-हिंदुस्तान ने कब साथ टीपू को दिया.
इससे ज़ाहिर होता है कि ज़फ़र हिंदुस्तान के राजनीतिक हालात से पूरी तरह वाकिफ़ थे. नहीं तो वे ऐसी शायरी नहीं कर पाते क्योंकि टीपू सुल्तान 1799 में ही युद्ध में मारे गए थे.
लोकसाहित्य में अंग्रेज़ों के ज़ुल्मों की कहानी कही जाती थीं
फ़िरोज बख़्त जो कि शाह आलम के पोते थे अंग्रेज़ों से झगड़कर मुंबई चले गए थे. उन्होंने सन् 1857 में आज़मगढ़ में जो घोषणा पत्र जारी किया था उसमें अंग्रेजों के विरोध का कारण आर्थिक शोषण बताया है.
दरअसल 1857 की पूरी लड़ाई ही उर्दू मे लड़ी गई क्योंकि इसमें जो कुछ भी एलान हैं चाहे वह झाँसी की रानी की हों, नाना के हों, बहादुर शाह ज़फ़र के हों या बेगम हजरत महल के हैं वो सब उर्दू में हैं.
इसके अलावा जो भी कविताएं लिखी गईं वे सब उर्दू या खड़ी बोली में हैं.
अवधी, भोजपुरी और मगही में तो बहुत-सी कविताए हैं. बाबू कुंवर सिंह के बारे में भोजपुरी और मगही में बहुत कुछ कहा गया है लेकिन इसके समय के बारे में कुछ नहीं कहा जाता है.
जैसे कि मुसहफ़ी का देहांत वर्ष 1824 में हो गया था तो ज़ाहिर है कि उन्होंने इससे पहले ही यह लिखा होगा कि-
जोड़-तोड़ आवे हैं क्या ख़ूब नतारा केतईं


फौज़े दुश्मन को सेबूंहीं लेते हैं सरदार को तोड़


ज़ाहिर है कि यहाँ उनका मतलब सिराजुद्दौला के मीर ज़ाफर के बारे में भी है और टीपू सुल्तान के साज़िद के बारे में भी हैं.
इन चीज़ों से मालूम होता है कि हमारे यहाँ के जागरूक लेखक को इसका अहसास था कि हमारे ऊपर विदेश हुक्मरान आ गया है.


शमसुर रहमान फ़ारूक़ी, उपाध्यक्ष, काउंसिल फ़ॉर प्रमोशन ऑफ़ लैंग्वेज
(बीबीसी से साभार)