Wednesday, May 12, 2010

भ्रष्टाचार- रिस रहा है मवाद

हिमानी दीवान

आस पास से शुरू करे तो सब कुछ खूबसूरत लगता है। रोटी और सुकून के लिए जद्दोजहद करते चेहरों के बीच यह कहना बेहद मुश्किल हैं की कौन भ्रष्ट है। एक-एक चेहरे को परखने लगे तो सभी और सबके भीतर झाँके तो कोई भी नही। फिर भी क्यों हमारी छवि भ्रष्ट होती जा रही है। क्या हम अकेलेपन में बेहद इमानदार और समूह में बहुत लालची है। या फिर सारा कसूर इस व्यवस्था का है ...वही हमें भ्रष्ट बना रही है....दरअसल

किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है। ये सवाल आज की परिस्थितियों में बिलकुल बचकाना लगता है। वास्तविक सवाल यह है कि हम कब भ्रष्ट नहीं होते? रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया...यह महज एक मनोरंजन प्रधान फिल्म के गीत के बोल नहीं बल्कि समाज की हक़ीक़त है। अगर तुम क्लास में प्रथम आओगे तो हम तुम्हें साइकिल दिलायेंगे, बचपन में मिलने वाले इस प्रलोभन के साथ बड़प्पन आने तक कई दूसरे आयाम जुड़ जाते है। शोहरत और बुलंदियों तक पहुंचने का सपना, इस जैसा..उस जैसा बनने की तमन्ना में नैतिकता के नारों का शोर स्वहित को साधने वाले सन्नाटे में तब्दील हो जाता है। इससे स्वार्थ सिद्धी का ऐसा मकड़जाल तैयार होता है कि कोई अपनी मर्जी से और कोई न चाहते हुये भी उसमें फँसता ही जाता है। भ्रष्ट आचरण की शुरुआत घर से होती है और बाहर आकर बीज रूप में पनपा यह भ्रष्ट आचरण ऐसा पेड़ बन जाता है जिसकी सिंचाई के लिये रिश्वत, धोखा, धांधली और घोटालों की खाद तैयार की जाने लगती है। इस खाद का साइड एफ्फेक्ट गरीब और कमजोर भुगतते हैं। इससे एक तरफ गरीबी उनमूलन की योजनाओं का बंटाधार होता है, दूसरी तरफ कानून और न्याय की नींव हिलती है।

फलती फूलती फसल

लेखिका- हिमानी दीवान

अपनी मन की करते हुए दिल्ली विश्विधायालय से मीडिया की पढ़ाई और अब उस पढ़ाई को आजमाने की कोशिश में हैं। लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से और अब ये शौक ही जिंदगी बन गया लगता है।
बीज से पेड़ बनने के बाद भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का माहोल देती है हमारी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में निजी पूंजी को फैलने की बेलगाम आजादी दी जाती है। इस के लिये तमाम नियम-कानूनों को तोड़ कर, जिम्मेदार अफसरों को साझीदार बनाकर जरुरतमंद जनसंखया को किनारे कर दिया जाता है। मामूली से दफ्तर से लेकर बड़े प्रशासनिक कार्यलयों तक ऐसे कई बाबू है जो आप को इन शब्दों की बानगी दिखाने के लिये हमेशा तत्पर दिखाई देंगे। इसी लिए ही शायद कहा जाता है की भ्रष्टाचार का सबसे ताकतवर त्रिगुट राजनीटिक नौकरशाह और व्यापारी का है। तीनों अपनी पूंजी की बाल्टियां भरने के लिये पूंजीपतियों से लेकर आम इंसान का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं करते। अब अगर भ्रष्टाचार को ‘पूंजी का पूंजी के लिये पूंजी के पुजारियों द्वारा किया गया गलत इस्तेमाल कहें’ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आलम यह है कि भ्रष्टाचार की फसल को अनुकूलीत करने वाले ही आयोग बना कर जांच का आदेश देते है। यह आयोग महज खानापूर्ति भर होते है वर्षों तक जांच चलती रहती है और भ्रष्टाचार का मवाद नासूर बनकर गरीब, लाचार जनता का शोषण करता रहता है।

फसल को गिजा-पानी देती जनता

जिस व्यवस्था के अंदर ये फसल फल-फूल रही है उस का अहम अंग है हम यानी जनता। नौकरशाह बेशक कितने ही तानाशाह क्यों न हो जाये लेकिन इस फसल को पानी देने में जनता के योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता । इस पहलू की खास बात ये है की जनता भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं मानती। उनके बीच ये सोच विकसित होती जा रही है की ऐसा तो होता ही है। यह उदासीन आदत ही सबसे खतरनाक साबित हो रहा है। इसी का नतीजा है कि इस फसल से हर साल नए-नए फल मिल रहे है।

फिर चाहे वह बरसो पुराने कुछ घोटाले हों या कुछ एक साल पहले वाला सत्यम घोटाला या फिर ताजा ट्रेन खेल में खेला गया खेल यानी आई पी एल।

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7 बैठकबाजों का कहना है :

भारतीय नागरिक - Indian Citizen का कहना है कि -

जनता को दोष देकर क्या सिद्ध करना चाहती हैं आप? अभी और पढ़िये... आपकी जेब कटने पर जब पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं होती और मोबाइल खोने की रिपोर्ट लिखवाई के बदले मांग रखी जाती है तो इसके लिये जनता दोषी है? सही बात है कि हर कोई अपना काम दूसरे से पहले और आसानी से चाहता है. लेकिन व्यवस्था बनाने के लिये ही सरकारें और कर्मचारी हैं जब वही सिस्टम बिगाड़ते हैं तो आम जनता क्या कर लेगी...

himani का कहना है कि -

जैसा मैंने महसूस किया लिख दिया ..गलतिय स्वाभाविक है ....ये आपके ही विचार है ...आपकी आलोचना पर मैं भी यही शब्द दोहराना चाहूंगी ..लेकिन दूसरा पहलु ये भी है की जनता का शतुरमुर्ग वाला रवियाँ भी भ्रष्टाचार बढ़ने में महती भूमिका निभाता है

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

आपकी दुआ से सब ठीक ठाक है....

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

वाह, मजा आ गया...लेख पढ़कर जितना मज़ा आया..उससे कई गुना...भारतीय जी के वाद से आया...लेकिन यही आम जनता सरकारें बनाती है...और इन्हीं तथाकथित आम जनता में से निकलकर कोई कर्मचारी और अधिकारी भी बनता है...भारतीयजी आपका कन्सर्न और गुस्सा जायज है...लेकिन खुद पर गुस्सा किया भी तो क्या किया...

तपन शर्मा का कहना है कि -

ह्म्म्म भ्रष्टाचार पर बहस..
बड़े दिन हुए न बैठक पर लिख पाया न कमेंट कर पाया... आज मौका मिला है..फिर से शुरु करेंगे..जल्द लिखेंगे.. :-)

दो बातें कहना चाहूँगा..
अब्दुल कलाम साहब बच्चों से रूबरू थे तो किसी ने पूछा कि भ्रष्टाचार को कैसे रोकें?
उनका आसान सा जवाब था: Check your parents. अपने अभिभावकों को देखें (उन्हें रिश्वत लेने/देने से रोकें)। घर के बाहर जाने की जरूरत नहीं है।

दूसरा... जब आप ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते हैं तो जो स्कूल आप को सिखाता है अमूमन उसी को २०० रू देकर आप का लाइसेंस बन जाता है। लेकिन आपको बता दूँ कि पिछले ६ महीने में मेरे घर में तीन लाइसेंसे बनें ३०० रू में एक!!!
आप लाइसेंस बनवाने खुद जाइये..आपसे कोई पैसा नहीं लेगा.. यही रेट है.. आलस खुद करें और सोचें कि २००० रू लेगेंगे तो गलती आपकी है..जनता की है। जो स्कूल आप से १७०० फ़ालतू ले रहा है उसकी नहीं!!!

आप देंगे..लोग लेंगे... यही हाल कमोबेश इंजीनियर कालेजों का है जो दाखिले के २ लाख लेते हैं.. आप देते इसलिये हैं क्योंकि आपके बच्चे ने पेपर देकर किसी दूसरे कालेज में दाखिला नहीं लिया। उसका किसी में नहीं हुआ और इंजीनियर तो बनना है ही... तो २-३ लाख जायें भी तो क्या फ़रक पड़ता है!!

आपका चलान कट रहा होता है और आप ही "बात" आई-गई करने की कोशिश करते हैं। कटने दीजिये चलान!! मत खिलाइये घूस ट्रैफ़िक पुलिस को...

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

कहां-कहां रोकेंगे सिस्टम की लाचारी तपन बाबू...पैदा होने पर नर्स भी पेशगी मांगती है....मरने पर पुलिस मांगती है...बहुत मुश्किल है भाई...

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA का कहना है कि -

खुद्दार एवं देशभक्त लोगों का स्वागत है!


सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत और सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। इसलिये हम प्रत्येक सृजनात्कम कार्य करने वाले के प्रशंसक एवं समर्थक हैं, खोखले आदर्श कागजी या अन्तरजाल के घोडे दौडाने से न तो मंजिल मिलती हैं और न बदलाव लाया जा सकता है। बदलाव के लिये नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है।

अतः समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है। सरकार द्वारा जनता से टेक्स वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना प्रशासन ने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा व्यक्ति से पूछना चाहता हूँ कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट अफसरों के हाथ देश की सत्ता का होना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-"भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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