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Monday, July 19, 2010

हिमानी के हसीन सपने : जाति बिना समाज

जीने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है
पानी या शराब?
रोटी या कबाब?
पैसा या व्यापार?
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जाति या समाज
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नही जानती कि जाति के मामले में मेरी जानकारी का स्तर क्या है? मैंने वर्णव्यवस्था को कितना समझा है? मैं समाज के विभिन्न धर्मो और वर्गो के बारे में कितना जानती हूं? लेकिन इसके बावजूद भी ये सब कुछ ठीक से न समझने को कहीं न कहीं मैं अपना सौभाग्य मानती हूं। ये आधा-अधूरा ज्ञान मुझे पूरा हक देता है हर किसी से बात करने का, हर किसी के साथ खाना खाने का और वो सब कुछ करने का जो समाज में रहते हुए आम व्यवहार में हम एक दूसरे के साथ करते हैं। काश कि कोई भी न जानता होता इस वर्ण व्यवस्था के बारे में । इस बारे में कि फलाना इंसान दलित है और फलाना ऊंची जाति का है। ये एक निरी कल्पना है जिसका साकार होना निरा मुश्किल भी है। लेकिन जाति के नाम पर जो कुछ समाज में होता आया है और हो रहा है उसकी कल्पना करना भी तो निहायत कठिन है। हाल की ही खबर है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज में मिड डे मील में दलित महिला के खाना बनाने को लेकर वहां के लोगों ने हंगामा किया। और अब फिर वही सवाल कि जीने के लिए जाति ज्यादा जरुरी है या बराबरी का समाज। ये जात वो बिरादरी। इसके साथ खाना ,उसके साथ मत घूमना। इसका जूठा मत खाना, उसके बर्तन भी मत छूना। अपने आस-पास के लोगों से हर वक्त इस तरह की दूरियां बनाने में न जाने कितना दिमाग और वक्त खर्च कर देते हैं लोग। कहने को भारतीय संस्कृति बहुत कुछ है लेकिन दूसरा सच ये है कि आज हम सभ्यता के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां जाति गालियों में शुमार एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी परतें जब खुलती हैं तो इंसान का अस्तित्व ही मैला नजर आता है। अबे चमार कहीं के, अरे वो तो ब्राहम्ण कुल का है। जाति सूचक ये शब्द इस तरह इंसान का दर्जा तय कर देते हैं कि एक तबका तो जाति के बोझ तले ही दब जाता है और दूसरा जाति की छत्रछाया में अपने महल बना लेता है। छठवीं शताब्दी में उपजी समूह व्यवस्था ने जाति को सामाजिक संरचना से लेकर आर्थिक और राजनीतिक हर स्तर पर एक मुख्य पहचान और पुख्ता हथियार बना दिया। परिणाम हमारे सामने है- अनेकता में एकता वाला भारत टूट रहा है और बिखर रहा है। एक इमारत में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोगों से लेकर एक प्रदेश में जीवन-यापन करने वाले अलग-अलग जातियों के लोगों में आपस में दिली तौर पर इतनी दूरियां पैदा कर दी गई हैं कि लोग अपनी जाति पर आधारित एक अलग प्रदेश चाहते हैं। समाज में पैठी ये दूरियां सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी एक हथियार बन चुकी हैं। जाति बनाने वाले बनाकर चले गए शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि आने वाली पीढिय़ां इस बनावट को इतनी शिद्दत से निभाएंगी। लेकिन अब इस पीढ़ी को ये प्रथा तोडऩी होगी, बरसों पुरानी शिद्दत को तिलांजलि देनी होगी, छोडऩा होगा एक ऐसे बंधन को जो सिर्फ एक हथकड़ी है हमारे और आपके बीच में। छठवी शताब्दी की शुरूआत को भूलकर एक ऐसा प्रारंभ इक्कीसवी सदी में करना होगा जिससे ये सारे भेद मिट जाए। जाति का वो पिरामिड जिसमें सबसे ऊपर के माले पर ब्राहम्ण का सिंहासन है और दलित की झोपड़ी जमीन में धंसी हुई है, उस पिरामिड की व्यवस्था और विचारधारा को बदलना बहुत जरुरी है।
ये सब लिख्रते हुए मैं इस बात से भी पूरा सरोकार रखती हूं कि भारतीय समाज की व्यवस्था में जाति गहरे पैठी हुई है इसका त्याग करना इतना आसान नही होगा उन लोगों के लिए जिन्होंने तथाकथित नीच जाति के लोगों से कभी बात करना भी गंवारा नहीं किया लेकिन अगर वही लोग घर में भात की जगह मैगी को दे सकते हैं तो विचारधारा का ये बदलाव भी लाजंमी है जिससे जिंदगी की वास्तविक नफासत वापस आ सकती है।

हिमानी दीवान

Tuesday, June 22, 2010

आपने कितनी बार बिन कहे किसी को आई लव यू बोला है...


ये क्या कि चंद क़दमों पर ही थक कर बैठ गए, तुम्हे तो साथ मेरा दूर तक निभाना था....किसी अपने से बिछड़ने का गम चाहे कितना ही छुपाया जाये पर भीतर कहीं टीस तो होती है. बचपन में पक्की सहेली बनाने का वो शौक और उसके रूठ जाने पर घंटों घर जाकर माँ से उसकी बुराई करते हुए अन्दर ही अन्दर उससे सुलह के तरीके खोजना आज भी याद आता है. सोचती हूँ चंद पल जिसके साथ खेल-खिलौने खेलती थी, उसके कुछ दिन मुझसे गुस्सा हो जाने पर कितना परेशान हो जाया करती थी. अगर जीवन भर का कोई साथी रूठ जाये या अलग हो जाये इस दुख की तो कल्पना करना भी सिहरन पैदा कर देता है ...हम कितने भी तटस्थ क्यों न हो जाएं, भावों से ख़ाली तो नहीं हो सकते न. आज कल तलाक तलाक तलाक का शोर ज़ोरों पर है... गौरतलब है की कैबिनेट हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करके तलाक की राह को आसान बनाने की तयारी कर रही है...महिला सशक्तिकरण के पैरोकार खूब खुश हैं ...वकील भी होंगे जब तलाक के मुक़दमे भर जायेंगे तो ....लेकिन बैठक पर मेरा ये मुद्दा उठाने का कारण बाकी सारी वजहों से बिलकुल अलग है...ये बात कानून से मतलब नही रखती , ये बात समाज से तारुफ़ नही करती , चलिए परिवार को भी पीछे छोड़ देते है, और तमाम अन्याय अत्याचार की घटनाओ के बावजूद दो लोगों में छुपे उस अदृश्य प्यार को तलाशते हैं जो हर रोज नही सिर्फ किसी ख़ास पल में नजर आता है ...जिस एक पल से दो अजनबी दुनिया के हर जानने वाले से ज्यादा आशना से हो जाते हैं, वो पल जिसमे जिंदगी को उसके बिना सोचना भी बेमानी लगता है, आप सोचते होंगे ये मेरे अति सकारात्मक विचार हैं लेकिन मैं निराधार आशावाद में यकीं नही रखती हूँ...ये बातें उन लम्हों को देखकर लिख रही हूँ जो मैंने किन्ही अनजान से पलों में आहिस्ता से आँखों के सामने प्रकट हुए संजीव से चित्रों में देखे है. दिन भर एक-दूसरे से लड़ने वाले बूढ़ा-बूढी जब बस पर चढ़ रहे थे और अम्मा नही चढ़ पाई तो बूढ़े बाबा ने उन्हें हाथ पकड़कर बस में चढाया और फिर चढ़ने के बाद एक धीमी सी मुस्कान दोनों के चेहरों पर दिखाई दी उनकी हर रोज की लड़ाई कितनी छोटी पड़ गई थी मेरे लिए जब उन्हें यूँ बिना शब्दों के एक-दूसरे से आई लव यू कहते महसूस किया .....
पड़ोस में रहने वाले उड़ीसा के साहू साहब ज़रा-ज़रा सी बात पर अपनी बीवी पर चिल्लाते हैं ..गाहे बगाहे हाथ भी उठा देते है ..जवाब में पत्नी भी आक्रोश व्यक्त करती हैं खाना परोसती जाती हैं और कुछ ये बातें कहती है "पता नही कौन से बुरे कर्म किये थे मैंने जो तुम्हारे जैसा पति मिला",'मेरी सारी जिन्दगी ही ख़राब हो गई तुमसे शादी करके ' और फिर जब मैंने देखा कि माँ बनने के बाद डॉक्टर ने उन्हें आराम करने के लिए कहा है कोई काम करना मना है और परिवार का भी कोई सदस्य यहाँ उनकी सेवा करने नही आ सकता तो वही साहू साहब जो खुद मुझे भी बहुत बुरे लगते थे जब बीवी पर चिलाते थे और मैं भी सोचती थी कि इन्हें अलग हो जाना चाहिए वही शख्स अपनी नौकरी और घर के काम दोनों एक साथ कितनी सहजता से कर रहा है...हल्की दिक्कतों के बाद भी पत्नी को काम नही करने देता...पूरे तीन महीने तक लगातार सेवा की, तब जबकि कोई माता-पिता, भाई-बहिन .....कोई नही आया सब आये औए हाल-चाल पूछ कर चले गए ...सोच किसी भी हद तक जा सकती हैं लेकिन उस वक़्त का सच ये था की जिसके साथ जिंदगी बर्बाद-सी हो गई लगती थी, वही जिंदगी को सहेज रहा था .....आप भी देखेंगे तो ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे ...हालाँकि अपनी इन बातों से मैं ये नही कह रही कि किसी भी तरह से बदसलूकी और बदतमीजी सहते हुए, नाउमीदी की गर्त में गिरे हुए कुछ लम्हों का इन्तजार किया जाये लेकिन हाँ सुलह के रास्ते तलाशना लाज़मी है ....अगर मैंने लड़ते झगड़ते मियां-बीवी को बीच पनपते प्रेम को देखा है तो उस अकेलेपन को भी महसूस किया है जो मुझे शादी के एक साल बाद ही दहेज़ की वजह से अलग हुई मात्र २५ साल की एक लड़की के चेहरे पर हमेशा नजर आता है ...जो मुझसे कहती है पता है वो बुरे नही थे लेकिन उनके घर वालों को ही दहेज़ का लालच था उनकी वजह से हमें अलग होना पड़ा... आज मैंने अपने दम पर सब कुछ हासिल कर लिया है लेकिन न मेरे बच्चे के पास पापा है न मेरे पास कोई पार्टनर. मेट्रो शहरों का कल्चर बेशक हमें उन्मुक्त होने के लिए कहे लेकिन फिर यही महानगर भीड़ में उस तन्हा शख्स को बिलकुल अकेला छोड़ कर अलग हो लेता है ....और अकेलापन तो जो न करवाए वो अच्छा ....
जानती हूँ कि मेरी बात तथ्यों से परे लग रही होगी, आखिर आजादी अख्तियार करने के रस्ते में मैं कुछ भूले-बिसरे शब्द जो बिछा रही हूँ ......आप बताएं क्या मेरी बात बिलकुल बेमानी है .........

हिमानी दीवान

Thursday, May 20, 2010

मुखोटे लगा लो .....पैसा कमा लो

तू बेवकूफ है झूठ नहीं बोल सकती थी ...........?
तेरी शकल पर झलक जाता है तेरे मन का भाव ....ऐसे कैसे काम करेगी तू?

अच्छी बातें करने वाले सारे लोग ही अच्छे हो ऐसा जरूरी नहीं होता ...जितना दूर रह सको ऐसे लोगो से उतना दूर रहो ................

उसने पूछा और तूने बता दिया ......बेवकूफ कहीं की ........कुछ नहीं हो सकता तेरा .......

ज्यादा मेहनत और लगन से काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है ..काम कोई नहीं देखता .............


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यूँ ही अगर लिखती जाऊँ तो बात बहुत लम्बी हो जाएगी

ये तमाम वाक्य...अक्सर उस लड़की को कहे जाते रहे हैं जो इस दुनिया में रहकर भी उस जैसी नहीं बन पा रही है ....यहाँ मैं ये भी कहना चाहूँगी कि बात सिर्फ उस एक लड़की कि नहीं है ...न जाने कौन-कौन हो इस तरह के दो पाटो में शामिल ...........

बचपन की पढ़ाई-लिखाई और युवा मन के सपनों के साथ आप जब आगे की दुनिया में बढ़ते हैं तो दृश्य बदलने लगता है .......जो आँखे फाड़-फाड़ कर इस दृश्य का लुत्फ़ उठा लेते हैं, वो आगे की इस दुनिया में आगे बढ़ जाते है और जिनकी आँखे इस अजीब तरह के प्रकाश में चुंधिया जाती हैं, वो पहले आँखे मलते हैं और फिर हाथ मलते रह जाते हैं ............जो बातें मैं लिख रही हूँ , बिल्कुल भी नई नहीं हैं ..कहानी, उपन्यास और फिल्मों में कई बार संघर्ष के ऐसे किस्से कमाल किये गए है ........मगर हकीकत में भी जब एक ऐसे बॉक्स के ऑफिस पर आपको हिट होने के लिए मेहनत करनी पड़े जिसका कोई रिश्ता आपके काम से नहीं है .......तो सारी पढ़ाई-लिखाई और सपने कूड़ेदान में डाल देने का मन करता है ........वैसे इन निजी भावनाओं के आलावा भी कुछ तथ्य है जो इन हालातों के लिए जिम्मेदार है ................

प्रोफेशनल बनो
जब आप नौकरी करने निकलते हैं, तो आप के निश्छल और कभी मूर्खता भरे स्वभाव को देखते हुए कहा जाता है क़ि प्रोफेशनल बनो ..........सच मत बोलो .......सब कुछ छुपाओ ...काम आता हो तो भी मत करो.....बॉस के सामने न आता हो तो भी करने का दिखावा करो ........ये कुछ ऐसे टिप्स है जो तथाकथित प्रोफेशनल बनने में आपकी मदद करते हैं ........... कभी कभी मैं सोचती हूँ अगर ये पैमाना न होता तो देश कहीं आगे होता ..यहाँ हर जगह इंसान को नोचा जा रहा है ......जो काम करना चाहता है उसे करने नहीं देते जो नहीं करता उसे फलक पर बिठा देते हैं ...कौन क्यों कब कहाँ कैसे पहुँच गया .......आप सोचते रह जाइये लेकिन कुछ नहीं सूझेगा ...अगर सूझ भी गया तो उस रास्ते पर चलने के लिए आप शायद खुद को तैयार न कर पाए ..........आखिरी रास्ता कता बचा ...अलग अलग सूरते तय करती है ...कभी मुड़ जाना हुआ .......कभी लौटा आना ......कभी खुद को अलविदा करके एक मुखोटे को अपनाना .................फिर फराज के वो शब्द कि .......मंजिले दूर भी है ....मंजिले नजदीक भी ....अपने ही पाँव में कोई जंजीर पड़ी हो जैसे ........


हिमानी दीवान

Monday, May 17, 2010

कुछ सवाल - स्त्री ( मुक्ति या मौत )

कुछ दिन पहले मोबाइल पर एक एसएमएस आया ...
एक लड़की बस स्टॉप पर खड़ी थी
तभी वहां एक आदमी आया और बोला
ऐ चलती है क्या नौ से बारह
लड़की ने पलटकर देखा
और कहा
पापा
मैं
हूँ

मेरे छोटे भाई-बहिन जो इस सन्देश की गहराई को भांप नहीं सके उन्हें इस पर हंसी आ गई ..लेकिन मेरे सामने एक गंभीर दृश्य अंकित हो गया ..जिसने कई परतों को पलटना शुरू कर दिया.

उनमें से एक समसामयिक परत है निरुपमा की मौत का मामला ....ये मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी गुथ्थी हर मामले की तरह न जाने कब तक सुलझेगी लेकिन कुछ उलझाने वाले सवाल ये है कि अगर सचमुच में निरुपमा की हत्या की गई है तो उसकी मुख्य वजह क्या है ......एक दूसरी जाति के लड़के से सम्बन्ध या फिर उसका बिन ब्याहे माँ बनना .......इस सवाल का जवाब तो हत्या करने वाले को ही ठीक-ठीक मालूम होगा. लेकिन अगर ये हत्या है तो इसे सिर्फ निरुपमा की हत्या नहीं माना जाना चाहिए ...हर उस लड़की के लिए मौत का एक प्रस्ताव पेश करने वाली इस घटना पर अलोक धन्वा के ये शब्द काफी कुछ कह जाने में मदद करते है ................. सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है/तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत/घर से बाहर/ लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं/मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा/कि तुम अब/ उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो/वह कहीं भी हो सकती है/ गिर सकती है/बिखर सकती है/लेकिन वह खुद शमिल होगी सब में/ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी/सब कुछ देखेगी/शुरू से अन्त तक/अपना अन्त भी देखती हुई जायेगी/किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी।

मेरा ये सब लिखना लड़कियों के घर से भागने को सही ठहराने के लिए नहीं है ...बल्कि अभिभावकों के संकीर्ण और अड़ियल रवैये को गलत बताने के लिए है ....क्योंकि घर से भागने की वजह कहीं न कहीं घर से मिलने वाले प्यार और सहयोग की कमी भी है

दूसरी बात जो इस घटना से उठी है उसमे स्त्री मुक्ति से जुड़े कुछ सवाल उठ खड़े हुए है .....आधुनिक संसाधनों का भरपूर प्रयोग करने वाले प्रहरी निरुपमा के प्रेंगनेंट होने की खबर सुनकर ये प्रश्न उठा रहे है क़ि उसके जैसी पढ़ी-लिखी लड़की को क्या गर्भ निरोधक के बारे में जानकारी नहीं थी ....अगर वह उनका इस्तेमाल करती तो शायद उसकी ये नियति न होती ................जाने माने लेखक और विचारक राजकिशोर का ताजतारीन लेख अखबार में पढ़ा तो स्त्री मुक्ति का ये प्रश्न और भी गहरा गया ....जादुई गोली के पचास साल ...यहाँ वो जादुई गोली का इस्तेमाल गर्भनिरोधक गोली के लिए कर रहे है ....वे कहते हैं ...इस गोली ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है ..अगर ये गोली न होती तो यौन क्रांति भी न होती . यौन क्रांति न होती तो स्त्री स्वंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते ..इस गोली ने एक महतवपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है क़ि यौन समागम कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है ...यह वैसा ही है जैसा एक मानव व्यवहार है जैसे खाना, पीना या चलना-फिरना ........

अगर बिना कोई तर्क किये इन शब्दों पर सहमति की मोहर लगा दी जाती है तो स्त्री विमर्श के लिए उठने वाले सभी सवाल खुद ही ढेर हो जायेंगे .....................लेकिन क्या ये इतना आसान होगा भावनात्मक और प्रयोगात्मक दोनों सूरतों में क्या शब्दों की ये आजादी समाज में अकार ले सकती है ...................ये बेहद पेचीदा प्रश्न है। सम्भोग अगर आजादी है तो ये समाज उसे कब क्या नाम देगा इसकी आजादी वो हमेशा से लेता आया है ......यूँ तो पत्नी ...नहीं तो प्रेमिका ........और वर्ना वेश्या

हिमानी दीवान

Wednesday, May 12, 2010

भ्रष्टाचार- रिस रहा है मवाद

हिमानी दीवान

आस पास से शुरू करे तो सब कुछ खूबसूरत लगता है। रोटी और सुकून के लिए जद्दोजहद करते चेहरों के बीच यह कहना बेहद मुश्किल हैं की कौन भ्रष्ट है। एक-एक चेहरे को परखने लगे तो सभी और सबके भीतर झाँके तो कोई भी नही। फिर भी क्यों हमारी छवि भ्रष्ट होती जा रही है। क्या हम अकेलेपन में बेहद इमानदार और समूह में बहुत लालची है। या फिर सारा कसूर इस व्यवस्था का है ...वही हमें भ्रष्ट बना रही है....दरअसल

किसी व्यक्ति का व्यवहार कब भ्रष्ट होता है। ये सवाल आज की परिस्थितियों में बिलकुल बचकाना लगता है। वास्तविक सवाल यह है कि हम कब भ्रष्ट नहीं होते? रिश्वत देना तो खुद पापा ने सिखाया...यह महज एक मनोरंजन प्रधान फिल्म के गीत के बोल नहीं बल्कि समाज की हक़ीक़त है। अगर तुम क्लास में प्रथम आओगे तो हम तुम्हें साइकिल दिलायेंगे, बचपन में मिलने वाले इस प्रलोभन के साथ बड़प्पन आने तक कई दूसरे आयाम जुड़ जाते है। शोहरत और बुलंदियों तक पहुंचने का सपना, इस जैसा..उस जैसा बनने की तमन्ना में नैतिकता के नारों का शोर स्वहित को साधने वाले सन्नाटे में तब्दील हो जाता है। इससे स्वार्थ सिद्धी का ऐसा मकड़जाल तैयार होता है कि कोई अपनी मर्जी से और कोई न चाहते हुये भी उसमें फँसता ही जाता है। भ्रष्ट आचरण की शुरुआत घर से होती है और बाहर आकर बीज रूप में पनपा यह भ्रष्ट आचरण ऐसा पेड़ बन जाता है जिसकी सिंचाई के लिये रिश्वत, धोखा, धांधली और घोटालों की खाद तैयार की जाने लगती है। इस खाद का साइड एफ्फेक्ट गरीब और कमजोर भुगतते हैं। इससे एक तरफ गरीबी उनमूलन की योजनाओं का बंटाधार होता है, दूसरी तरफ कानून और न्याय की नींव हिलती है।

फलती फूलती फसल

लेखिका- हिमानी दीवान

अपनी मन की करते हुए दिल्ली विश्विधायालय से मीडिया की पढ़ाई और अब उस पढ़ाई को आजमाने की कोशिश में हैं। लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से और अब ये शौक ही जिंदगी बन गया लगता है।
बीज से पेड़ बनने के बाद भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का माहोल देती है हमारी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था। इस व्यवस्था में निजी पूंजी को फैलने की बेलगाम आजादी दी जाती है। इस के लिये तमाम नियम-कानूनों को तोड़ कर, जिम्मेदार अफसरों को साझीदार बनाकर जरुरतमंद जनसंखया को किनारे कर दिया जाता है। मामूली से दफ्तर से लेकर बड़े प्रशासनिक कार्यलयों तक ऐसे कई बाबू है जो आप को इन शब्दों की बानगी दिखाने के लिये हमेशा तत्पर दिखाई देंगे। इसी लिए ही शायद कहा जाता है की भ्रष्टाचार का सबसे ताकतवर त्रिगुट राजनीटिक नौकरशाह और व्यापारी का है। तीनों अपनी पूंजी की बाल्टियां भरने के लिये पूंजीपतियों से लेकर आम इंसान का इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं करते। अब अगर भ्रष्टाचार को ‘पूंजी का पूंजी के लिये पूंजी के पुजारियों द्वारा किया गया गलत इस्तेमाल कहें’ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आलम यह है कि भ्रष्टाचार की फसल को अनुकूलीत करने वाले ही आयोग बना कर जांच का आदेश देते है। यह आयोग महज खानापूर्ति भर होते है वर्षों तक जांच चलती रहती है और भ्रष्टाचार का मवाद नासूर बनकर गरीब, लाचार जनता का शोषण करता रहता है।

फसल को गिजा-पानी देती जनता

जिस व्यवस्था के अंदर ये फसल फल-फूल रही है उस का अहम अंग है हम यानी जनता। नौकरशाह बेशक कितने ही तानाशाह क्यों न हो जाये लेकिन इस फसल को पानी देने में जनता के योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता । इस पहलू की खास बात ये है की जनता भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं मानती। उनके बीच ये सोच विकसित होती जा रही है की ऐसा तो होता ही है। यह उदासीन आदत ही सबसे खतरनाक साबित हो रहा है। इसी का नतीजा है कि इस फसल से हर साल नए-नए फल मिल रहे है।

फिर चाहे वह बरसो पुराने कुछ घोटाले हों या कुछ एक साल पहले वाला सत्यम घोटाला या फिर ताजा ट्रेन खेल में खेला गया खेल यानी आई पी एल।