Showing posts with label bihar. Show all posts
Showing posts with label bihar. Show all posts

Tuesday, November 30, 2010

बिहार में भाजपा-जद(यू) गठबन्धन का चमत्मकार

डॉ. मनोज मिश्र

बिहार विधान सभा चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित नहीं बल्कि अपरिहार्य थे। लगभग 15 वर्षों तक लालू राबड़ी एण्ड कम्पनी की गिरफ्त में रहा बिहार विकास सुशासन तथा सुरक्षा के लिये छटपटाता रहा परन्तु जातियों के स्वाभिमान का नारा देकर लालू राबड़ी एण्ड कम्पनी अपना राजनैतिक सर्कस चलाते रहे। जे. पी. आन्दोलन से निकले तीन नेताओं लालू यादव, नितीश कुमार तथा सुशील मोदी में से लालू ने पिछड़ों में मण्डल कमीशन की आड़ लेकर एक सपना जगाया। जनता सपने की हकीकत का 15 वर्षों तक इंतजार करती रही और लालू की बातों पर भी। लालू राज के इन 15 वर्षों में बिहार में भाई-भतीजावाद खूब पनपा, जातिवाद ने हर गम्भीर मुद्दे को निगल लिया, बाहुबलियों की सर्वोच्च सत्ता स्थापित हुई तथा भ्रष्टाचार के आरोप में जातीय स्वाभिमान के सपनों का सौदागर चारा घोटाले में जेल गया। शुचिता की राजनीति को तिलांजलि देकर अपनी पत्नी को अन्य योग्य उम्मीदवारों के होते हुये भी मुख्यमंत्री बनाया तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को पारिवारिक तथा राजतांत्रिक व्यवस्था का बन्धक बनने को मजबूर किया। परिणामस्वरूप बिहार और बिहारी सारे देश में मजाक के पात्र बन गये। विकास के मामले में यह प्रदेश देश में सबसे निचले पायदान पर खड़ा हो गया। बिहार और विकास में छत्तीस का ऑकड़ा बन गया तथा प्रतिभावओं का पलायन एक परम्परा बना महिलाओं की अस्मत लालू राज में सुरक्षित नहीं थी, उद्योग विहीन बिहार में अपहरण को उद्योग का दर्जा मिला। इस प्रकार बिहार जे.पी. आन्दोलन से निकले एक नेता के वैचारिक, राजनैतिक एवं चारित्रिक पतन का गवाह बना।

जिस समय बिहार छटपटा रहा था उसी समय भाजपा-जद(यू) गठबन्धन प्रदेश में गम्भीर विकल्प की तैयारी कर रहे थे। बिहार तथा यहॉ के नागरिक जिस विकास के लिये छटपटा रहे थे उसी का एक मॉडल पिछले 5 वर्षों में भाजपा-जद(यू) ने जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। पहली बार सन् 2005 में जद (यू) 88 तथा भाजपा को 55 सीटें सौंपकर यह देखा कि देखें यह दल अपनी कहीं हुई बातों पर कहॉ तक खरे उतरते हैं। नितीश-सुशील मोदी की जोड़ी ने अपने शासन काल में प्रदेश का कायाकल्प कर दिया। प्रदेश में जितने पुल और सड़के पिछले 30 वर्षां में बने उससे ज्यादा सड़के और पुल बनवाये। प्रदेश को बाहुबलियों की गिरफ्त से मुक्त कराया, महिलाओं को सुरक्षा का अहसास कराया तथा वास्तव में सुशासन का राज कायम किया। सबसे बड़ा अन्तर जिस पर लोगों की नजर नहीं गई वह थी नितीश-सुशील मोदी की गम्भीरता एवं सादगी। लालू की जोकर की छवि के उलट इन दोनों नेताओं ने जिम्मेदारीपूर्वक सरकार को चलाया तथा जनता को विश्वास दिलाया कि विकास अब बिहार की हकीकत बन रहा है। इसके परिणाम स्वरूप प्रदेश की वृद्धि दर 11.03 प्रतिशत पहुँची जो गुजरात की वृद्धि दर से मात्र 00.02 प्रतिशत ही कम थी। अपहरण का ग्राफ गिरा, बाहुबलियों ने मैदान छोड़ दिया, भाई भतीजावाद समाप्त हुआ तथा लोगों का सुशासन पर विश्वास जगा।

भाजपा-जद(यू) सरकार की सफलता से देश के समक्ष राजनीति का सकारात्मक पक्ष उभरकर आया जिसकी भारत को आजादी के बाद से आवश्यकता थी। अब चुनाव परिणाम में सुशासन का ईनाम प्रदेश के सत्तारूढ़ दलों को मिलने लगा है तथा कुशासन का दण्ड भी भुगतना पड़ता है। सन् 2004 में भाजपा नीत राजग गठबन्धन बहुत अच्छा काम करने के बाद भी पुनः सत्ता में नहीं आ सका तो लोगों को लगा कि भारत में विकास पर वोट अभी दूर की कौड़ी है। उसके बाद समय ने करवट बदली तथा राज्यों में भाजपा की ज्यादातर सरकारें अच्छे काम के बल पर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात तथा बिहार में पुनः सत्ता में आई। अतः अब चुटीलें नारों, शोशेबाजी, चालबाजी, जातिवादी, सम्प्रदायवादी तथा परिवारवादी राजनीति के दिन लद गये। अब दलों को सकारात्मक राजनीति तथा भारत निष्ट नीति के सहारे ही सत्ता हासिल हो सकेगी।

बिहार चुनाव के परिणाम ऑकड़ों की निगाह से देखें तो हम पायेंगे कि भाजपा की विजय दर सर्वाधिक 89.27 प्रतिशत रहीं, उसके 1.2 उम्मीदवारों में से 91 विजयी रहे। जद(यू) के 141 उम्मीदवारों में से 115 ने जीत हासिल की तथा अच्छी विजय दर 81.50 प्रतिशत के ऑकड़ें को छुआ। राजद, लोजपा गठबन्धन की मिट्टी पलीद हो गई और कांग्रेस के लड़ाये गये 243 उम्मीदवारों में से मात्र 4 ने विजय दर्ज की जबकि पिछली विधान सभा में कांग्रेस के 9 विधायक थे। इस चुनाव में कांग्रेस की यह सबसे खस्ता हालात रहीं और वह मुँह दिखाने लायक मत प्रतिशत भी नहीं जुटा सकी। एक सबसे बड़ा भ्रम राहुल गाँधी का था जो टूट कर चकनाचूर हो गया तथा भविष्य में उत्तर प्रदेश में तथाकथित राहुल बबंडर की हवा निकल गई। राहुल 22 विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार करने गये जिसमें मात्र 1 सीट कांग्रेस की झोली में आई तथा लगभग सभी स्थानों में उसके प्रत्याशी तीसरे, चौथे और अन्तिम पायदान पर रहे। राहुल गाँधी की हवाई तथा दिखावे की राजनीति जब सबसे पिछड़े कहे जाने वाले प्रदेश में नहीं चली तो उत्तर प्रदेश की धरातल में उन्हें कौन पूछेगा। रामबिलास पासवान की लोजपा, सपा और बसपा का हाल इतना खराब रहा कि उनकी चर्चा तक नहीं हुई। दो विधान सभा चुनाव पूर्व बिहार की सरकार बनाने में रामबिलास पासवान किंग मेकर बन सकते थे तब स्वार्थवश मुस्लिम मुख्यमंत्री का नाम उछालने का दण्ड बिहार के मतदाताओं ने उन्हें जबर्दश्त तरीक से दिया। गौरतलब है कि भाजपा-जद(यू) गठबन्धन को प्रदेश की महिलओं तथा अल्संख्यकों का मत बड़े पैमाने पर मिला जिससे यह मिथ टूटा कि महिलाओं तथा अल्पसंख्यक भाजपा या उनके सहयोगी दलों को पसन्द नहीं करते। देश के विकास के साथ-साथ महिलायें तथा अल्पसंख्यक भी गम्भीर तथा विकासपरक राजनीति का हिस्सा बन गये हैं। कुल मिलाकार बिहार विधान सभा चुनाव ने कई जमे-जमाये मिथ तोड़े तथा कई सच्चाइयों से देश की जनता का सामना करवाया।

(लेखक डी.ए-वी. कालेज, कानपुर के भौतिक विज्ञान विभाग में एशोसिएट प्रोफेसर हैं।)

संपर्क-
डॉ. मनोज मिश्र
‘सृष्टि शिखर’
4. लखनपुर हाउसिंग सो.,
कानपुर - 24

Saturday, August 22, 2009

ये थाली बिहार से आई है...

ये सवाल कई लोग पूछ बैठते हैं कि क्या खाते है बिहार के लोग? इस सवाल को संदर्भों के शीशे से देखें तो कई तरह के अर्थ सामने आ जाते हैं। लेकिन आज सोचा कि क्यूं न लोगों को बताने की एक कोशिश की जाये कि क्या खाते हैं बिहार के लोग। यानी रोज-रोज और ख़ास मौकों पर क्या कुछ बनता है बिहार के घरों में। इससे पहले कि शुरू करूं, ये बताना ज़रूरी लगता हैं कि खान-पान की आदतें बिहार में दिनों और त्योहारों और व्रतों से तय होतीं हैं, और किसी भी बिहारी से पूछ लें, खाने के हर आईटम के साथ विविध स्मृतियाँ सुना देगा। तो चलिए ले चलते हैं आपको बिहार के किचन में और देखते हैं कि क्या-क्या है मेन्यू में। पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं कि हो सकता है कुछ आईटम छूट जायें।


लिट्टी-चोखा- ये नाम बिहार के बाहर रहने वाले भी जानते हैं। आटा गूँथ कर इसमें चने के सत्तू की स्टफिंग की जाती है। ख़ास बात ये है कि सत्तू को ख़ास तरीके से बनाया जाता हैं जिसमें कई चीज़ें मिलाई जाती हैं। मसलन मगरैल, अज्वाइन, लहसन, अदरख, प्याज, सरसों का तेल, नींबू, हरी धनिया, हरी मिर्च, गोलमिर्च और नमक स्वादानुसार। अब इसे पकाने के कई तरीक़े होते हैं। कोयले पर भी सेंका जाता है, तलते भी हैं, गोयठे यानी उपले में भी पकाया जाता है। काफी जतन से पकाना पड़ता है। बन जाये तो कपड़े में रख कर झाड़ते हैं और घी में लपेटते हैं एक-एक लिट्टी को। वाह क्या स्वाद होता हैं, अक्सर मेरे यहां यानी छपरा में छठ के समय शाम को घर के पुरूष मिल-जुल कर इसे पकाते थे, क्योंकि सभी महिलायें तो व्रत कर रहीं होती है। लिट्टी के साथ बेस्ट कॉबिनेशन होता है चोखा का। चोखा आलू का भी होता है, बैंगन का भी। इनको भी बनाने की अपनी तकनीक है। दोनों के कांबिनेश का स्वाद किसी भी बिहारी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए काफ़ी है।


ठेकुआ- ये ख़ास कर छठ में बनता है, प्रसाद के तौर पर। अरारोट का भाई है या फिर खजूर का रिश्तेदार। वैसे जब हम बिहारी लोग घर से बाहर जाते हैं तो मम्मियां इसे बनाकर कर ज़रूर देती हैं। काफ़ी दिनों तक चलता है। आटे या मैदे से बनाता है, जिसमें गरी यानी सूखे नारियल के चॉप किये टुकड़े, सौंफ और चीनी मिला कर गूंथते हैं। फिर इसे शेप देने के लिए लकड़ी का एक डिज़ाईनर होता है जो इसे अलग-अलग डिज़ाईन देता है। फिर इसे घी या वनस्पति में तलते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की पहचान भी है ठेकुआ।


पिरूकिया- सोच रहे होंगे कि ये क्या नाम है। भई भोजपुरी में तो यही कहते है। समझने के लिए थोड़ा आसान कर दूँ, कई जगह गुजिया कहते हैं। तो समझ में आ गया होगा। ये हमारे यहां तीज में ख़ास तौर पर बनता है। हर घर में काफ़ी संख्या में बनता है। बच्चे तो दिन-दिन भर खाते हैं। मै खुद ही खाता था। टेस्टी होता है।


लाई और तिलवा- ये समझ सकते हैं कि लड्डू हैं। लाई-चूड़ा या चावल को रेत मे भून कर उसे झाड़ कर साफ किया जाता है। फिर उसमें गर्म कर पिघलाया हुआ गुड़ मिला कर बड़े-बड़े गोले बनाये जाते है, दोनों पंजों में आने वाले। थोड़ा सूखने के बाद वो बिल्कुल क्रिस्पी हो जाता हैं। तिलवा यानी तिल के लड्डू भी लगभग वैसे ही होते हैं। सफेद या काला तिल, उसमें लोग बादाम या मूंगफली भी मिलाते हैं, लेकिन ख़ास बात ये है कि लाई और तिलवा साल में कभी भी दूसरे सीज़न में नहीं बनता। घर-घर में बनने वाला ये आईटम जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय ही बनता है। बच्चे लाई खाते हैं, पंतग उड़ाते-उड़ाते। पूजा में भी इसे चढ़ाते हैं खिचड़ी यानी मकर संक्रांति यानी 14 जनवरी के दिन।


खाजा और गाजा- ये क्या है? तो ये एक ऐसी मिठाई है जो शादियों में ज़रूरी तौर पर बनती है। घर के लोग नहीं बनाते। हलवाई बनाते हैं। मीठा होता है। मैदे से बनता है। चीनी की चासनी जिसको भोजपूरी में पाघ कहते है में डाल कर बनता है। जब लड़की या लड़के वालों की तरफ से गिफ्ट भेजा जाता है तो इन मिठाइयों की कई टोकरियां भी ज़रूर जाती हैं, जिसे अपने पड़ोसियों और रिश्तेतारों में बांटा जाता है। इसी में एक और आईटम है टिकरी-उसी तरह से बना हुआ। आकार ख़ास होता है गोल और चपटा। देखने और खाने पर ज्यादा समझ आयेगा। बिहार की लोक परंपरा का एक हिस्सा है-खाजा

पिट्ठा- पता नहीं कैसे समझांऊ इसे। हो सकता है बिहार की अलग अलग बोलियों में कुछ और नाम हो लेकिन भोजपुरी में यही कहते हैं। ये बस एक ही दिन बनता है भैया दूज या गोधन के दिन। दिवाली और छठ के बीच। कैसे बनता है। चावल का आटा भिगोये चने की दाल को पीस कर स्टफ तैयार करते हैं, भरते है फिर, बॉयल करते है। इडली का कुछ कुछ हमशक्ल, लेकिन हैवी होता है, टेस्टी भी। स्वाद नमकीन मसालेदार, साथ में कोई रसवाली सब्जी मज़े को दुगना कर देती है।


चने का सत्तु यानी बिहारी हॉर्लिक्स- ये तो गर्मियों का फेवरेट है। बिहार का आदमी गर्मियों में यही ढूंढ़ता नजर आ जायेगा। पानी में घोलकर, साथ में भूने जीरे का पाउडर, गोलमिर्च का हल्का पाउडर, कुछ कतरे हुए प्याज नमक और ऊपर से नींबू। बिहार के शहरों में जो भी सार्वजनिक जगह है वहां आप आसानी से पा सकते है इस बिहारी हार्लिक्स को। काफ़ी रिफ्रेशिंग होता है कम से कम यहां के लोगों के लिए।

भूंजा- ये भी बिहारी खान-पान का अहम हिस्सा है। शाम को तो अक्सर इसकी तलब होती है। ठेलों पर, खोमचों में हर नुक्कड़ पर आपको ये मिल जायेगा। इसमें कई चीज़े मिक्स करते है, मसलन, भूना हुआ चना, मक्का, मूंगफली, दालमोट, मूढ़ी या चूड़ा तला हुआ चना। ये सब मिक्स करते हैं। गांवों में लोग खुद ही घर में ये सब रखते हैं और शाम का उनका यही नाश्ता होता है। शहरों में लोग खरीद कर खाते है। काफी चटपटा और तीखा होता है।

जलेबी-पूड़ी- ये अमूमन सुबह का नाश्ता है। बिहारी लोग जलेबी, कचौडी और साथ में कोई रसवाली मसालेदार सब्जी पसंद करते हैं। मैं खुद घर जाता हूँ तो दोस्तों के साथ अगली ही सुबह पहुंच जाता हूँ इसका आनंद उठाने।

बजका- दरअसल ये एक प्रकार का पकौड़ा है, बल्कि पकौड़ा ही है। कई चीज़ो का हो सकता है- आलू, फूलगोभी, बैंगन, कच्चा केला और लौकी आदि।
चटनी- बजका की सहेली, इसके बिना इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। भोजपुरी में तो गाना भी है- फुलोरी बिना चटनी कइसे बनी। आमतौर पर खाने में भी इस्तेमाल होता है।


साग- ये भी काफ़ी अहम है। जाड़े के दिनों में चने की साग लोग शौक़ से खाते है। इसके अलावा पालक, सरसों, मूली, बथुआ इनके साग भी खाये जाते हैं। बाहर के लोगों के लिए बथुआ समझना थोड़ा मुश्किल है। मै समझा भी नहीं पाऊँगा।

रवि मिश्रा