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Saturday, August 22, 2009

ये थाली बिहार से आई है...

ये सवाल कई लोग पूछ बैठते हैं कि क्या खाते है बिहार के लोग? इस सवाल को संदर्भों के शीशे से देखें तो कई तरह के अर्थ सामने आ जाते हैं। लेकिन आज सोचा कि क्यूं न लोगों को बताने की एक कोशिश की जाये कि क्या खाते हैं बिहार के लोग। यानी रोज-रोज और ख़ास मौकों पर क्या कुछ बनता है बिहार के घरों में। इससे पहले कि शुरू करूं, ये बताना ज़रूरी लगता हैं कि खान-पान की आदतें बिहार में दिनों और त्योहारों और व्रतों से तय होतीं हैं, और किसी भी बिहारी से पूछ लें, खाने के हर आईटम के साथ विविध स्मृतियाँ सुना देगा। तो चलिए ले चलते हैं आपको बिहार के किचन में और देखते हैं कि क्या-क्या है मेन्यू में। पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं कि हो सकता है कुछ आईटम छूट जायें।


लिट्टी-चोखा- ये नाम बिहार के बाहर रहने वाले भी जानते हैं। आटा गूँथ कर इसमें चने के सत्तू की स्टफिंग की जाती है। ख़ास बात ये है कि सत्तू को ख़ास तरीके से बनाया जाता हैं जिसमें कई चीज़ें मिलाई जाती हैं। मसलन मगरैल, अज्वाइन, लहसन, अदरख, प्याज, सरसों का तेल, नींबू, हरी धनिया, हरी मिर्च, गोलमिर्च और नमक स्वादानुसार। अब इसे पकाने के कई तरीक़े होते हैं। कोयले पर भी सेंका जाता है, तलते भी हैं, गोयठे यानी उपले में भी पकाया जाता है। काफी जतन से पकाना पड़ता है। बन जाये तो कपड़े में रख कर झाड़ते हैं और घी में लपेटते हैं एक-एक लिट्टी को। वाह क्या स्वाद होता हैं, अक्सर मेरे यहां यानी छपरा में छठ के समय शाम को घर के पुरूष मिल-जुल कर इसे पकाते थे, क्योंकि सभी महिलायें तो व्रत कर रहीं होती है। लिट्टी के साथ बेस्ट कॉबिनेशन होता है चोखा का। चोखा आलू का भी होता है, बैंगन का भी। इनको भी बनाने की अपनी तकनीक है। दोनों के कांबिनेश का स्वाद किसी भी बिहारी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए काफ़ी है।


ठेकुआ- ये ख़ास कर छठ में बनता है, प्रसाद के तौर पर। अरारोट का भाई है या फिर खजूर का रिश्तेदार। वैसे जब हम बिहारी लोग घर से बाहर जाते हैं तो मम्मियां इसे बनाकर कर ज़रूर देती हैं। काफ़ी दिनों तक चलता है। आटे या मैदे से बनाता है, जिसमें गरी यानी सूखे नारियल के चॉप किये टुकड़े, सौंफ और चीनी मिला कर गूंथते हैं। फिर इसे शेप देने के लिए लकड़ी का एक डिज़ाईनर होता है जो इसे अलग-अलग डिज़ाईन देता है। फिर इसे घी या वनस्पति में तलते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की पहचान भी है ठेकुआ।


पिरूकिया- सोच रहे होंगे कि ये क्या नाम है। भई भोजपुरी में तो यही कहते है। समझने के लिए थोड़ा आसान कर दूँ, कई जगह गुजिया कहते हैं। तो समझ में आ गया होगा। ये हमारे यहां तीज में ख़ास तौर पर बनता है। हर घर में काफ़ी संख्या में बनता है। बच्चे तो दिन-दिन भर खाते हैं। मै खुद ही खाता था। टेस्टी होता है।


लाई और तिलवा- ये समझ सकते हैं कि लड्डू हैं। लाई-चूड़ा या चावल को रेत मे भून कर उसे झाड़ कर साफ किया जाता है। फिर उसमें गर्म कर पिघलाया हुआ गुड़ मिला कर बड़े-बड़े गोले बनाये जाते है, दोनों पंजों में आने वाले। थोड़ा सूखने के बाद वो बिल्कुल क्रिस्पी हो जाता हैं। तिलवा यानी तिल के लड्डू भी लगभग वैसे ही होते हैं। सफेद या काला तिल, उसमें लोग बादाम या मूंगफली भी मिलाते हैं, लेकिन ख़ास बात ये है कि लाई और तिलवा साल में कभी भी दूसरे सीज़न में नहीं बनता। घर-घर में बनने वाला ये आईटम जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय ही बनता है। बच्चे लाई खाते हैं, पंतग उड़ाते-उड़ाते। पूजा में भी इसे चढ़ाते हैं खिचड़ी यानी मकर संक्रांति यानी 14 जनवरी के दिन।


खाजा और गाजा- ये क्या है? तो ये एक ऐसी मिठाई है जो शादियों में ज़रूरी तौर पर बनती है। घर के लोग नहीं बनाते। हलवाई बनाते हैं। मीठा होता है। मैदे से बनता है। चीनी की चासनी जिसको भोजपूरी में पाघ कहते है में डाल कर बनता है। जब लड़की या लड़के वालों की तरफ से गिफ्ट भेजा जाता है तो इन मिठाइयों की कई टोकरियां भी ज़रूर जाती हैं, जिसे अपने पड़ोसियों और रिश्तेतारों में बांटा जाता है। इसी में एक और आईटम है टिकरी-उसी तरह से बना हुआ। आकार ख़ास होता है गोल और चपटा। देखने और खाने पर ज्यादा समझ आयेगा। बिहार की लोक परंपरा का एक हिस्सा है-खाजा

पिट्ठा- पता नहीं कैसे समझांऊ इसे। हो सकता है बिहार की अलग अलग बोलियों में कुछ और नाम हो लेकिन भोजपुरी में यही कहते हैं। ये बस एक ही दिन बनता है भैया दूज या गोधन के दिन। दिवाली और छठ के बीच। कैसे बनता है। चावल का आटा भिगोये चने की दाल को पीस कर स्टफ तैयार करते हैं, भरते है फिर, बॉयल करते है। इडली का कुछ कुछ हमशक्ल, लेकिन हैवी होता है, टेस्टी भी। स्वाद नमकीन मसालेदार, साथ में कोई रसवाली सब्जी मज़े को दुगना कर देती है।


चने का सत्तु यानी बिहारी हॉर्लिक्स- ये तो गर्मियों का फेवरेट है। बिहार का आदमी गर्मियों में यही ढूंढ़ता नजर आ जायेगा। पानी में घोलकर, साथ में भूने जीरे का पाउडर, गोलमिर्च का हल्का पाउडर, कुछ कतरे हुए प्याज नमक और ऊपर से नींबू। बिहार के शहरों में जो भी सार्वजनिक जगह है वहां आप आसानी से पा सकते है इस बिहारी हार्लिक्स को। काफ़ी रिफ्रेशिंग होता है कम से कम यहां के लोगों के लिए।

भूंजा- ये भी बिहारी खान-पान का अहम हिस्सा है। शाम को तो अक्सर इसकी तलब होती है। ठेलों पर, खोमचों में हर नुक्कड़ पर आपको ये मिल जायेगा। इसमें कई चीज़े मिक्स करते है, मसलन, भूना हुआ चना, मक्का, मूंगफली, दालमोट, मूढ़ी या चूड़ा तला हुआ चना। ये सब मिक्स करते हैं। गांवों में लोग खुद ही घर में ये सब रखते हैं और शाम का उनका यही नाश्ता होता है। शहरों में लोग खरीद कर खाते है। काफी चटपटा और तीखा होता है।

जलेबी-पूड़ी- ये अमूमन सुबह का नाश्ता है। बिहारी लोग जलेबी, कचौडी और साथ में कोई रसवाली मसालेदार सब्जी पसंद करते हैं। मैं खुद घर जाता हूँ तो दोस्तों के साथ अगली ही सुबह पहुंच जाता हूँ इसका आनंद उठाने।

बजका- दरअसल ये एक प्रकार का पकौड़ा है, बल्कि पकौड़ा ही है। कई चीज़ो का हो सकता है- आलू, फूलगोभी, बैंगन, कच्चा केला और लौकी आदि।
चटनी- बजका की सहेली, इसके बिना इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। भोजपुरी में तो गाना भी है- फुलोरी बिना चटनी कइसे बनी। आमतौर पर खाने में भी इस्तेमाल होता है।


साग- ये भी काफ़ी अहम है। जाड़े के दिनों में चने की साग लोग शौक़ से खाते है। इसके अलावा पालक, सरसों, मूली, बथुआ इनके साग भी खाये जाते हैं। बाहर के लोगों के लिए बथुआ समझना थोड़ा मुश्किल है। मै समझा भी नहीं पाऊँगा।

रवि मिश्रा