Sunday, August 09, 2009

खदेरन की दाल-रोटी का सवाल है माई-बाप


खदेरन के हाथ में 100 रूपया था ...घर पर बच्चे थे ..पत्नी थी..बीमार मां-बाप थे...खाने पीने का सामान लेते हुए जब वह घर पहुंचा तो सारे पैसे ख़त्म हो गये..कल के लिए कुछ बचा ही नहीं..दवा के लिए भी पैसे नहीं बचे ..क्या लेके आया ..लिस्ट बता दूं...दाल थोड़ी सी..चावल थोड़ा सा...तेल थोड़ा सा..और थोड़ी-सी सब्ज़ी..भूख तो बड़ी बीमारी है..सो बाक़ी बीमारियों के लिए कल दवा ले लेगा..भूख की दवा आज..यही सोचा था खदेरन ने...रात बीत गई..सुबह हो गई...दिन निकल गया..शाम को फिर खदेरन वापस घर की ओर..सवाल वही..क्या-क्या लेना है..रोज़ की तरह खाने-पीने का सामान..और दवा....दुकान पर पहुंचा...लेकिन नई मुसीबत सामने...दाल और चावल में उसे किसी एक को चुनना था..दोनों की क़ीमते बड़ी हो गई थीं, उसकी सौ टकिया छोटी पड़ गई..सो आज घर आया ..लेकिन दो सामान कम..दाल नहीं लाया...लेकिन प्रणब मुखर्जी और शरद पवार को नहीं पता कि खदेरन की फिक्स्ड कमाई..और अनफिक्स्ड महंगाई में क्या संबंध है..संसद में दोनों ने इस बात को ऐसे कहा मानो कोई बड़ी बात नहीं..और थोड़ी बहुत है भी तो अदृश्य अंतरराष्ट्रीय शक्तियां इसके लिए जिम्मेदार है...वो बेचारे क्या कर सकते हैं...खदेरन पहले से ही दाल-रोटी खा रहा था...सब अडजस्ट कर रहे हैं..वो भी अब केवल भात ही खायेगा और अपने परिवार को खिलायेगा...बाक़ी बीमार लोगों के लिए ..एक ही रास्ता है..सीधे उपर का ..भगवान भरोसे अगर ठीक हो गये तो अच्छी बात होगी...बिल्कुल सरकार के जैसा..मानसून बरस गया तो अच्छा नहीं तो ....देश भगवान भरोसे...जब ये दोनों सम्मानीय लोग संसद में प्रवचन दे रहे थे..तब ज़हिर है इनका पेट भरा होगा..पेट में क्या होगा नहीं बता सकते..लेकिन चुनाव के दौरान दोनों की संपत्ति का हिसाब देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है...कौन इनके घर में दवा-दारू की दिक्कत है...सब तो पब्लिक की कृपा से उपलब्ध है...और ये ग़रीबी तो आम लोगों की बीमारी है..फ्लू जैसी..डरावनी ..पर रोक नहीं सकते..दोनो पर सरकार चिंता जता सकती है..योजनायें बना सकती है..पर इलाज नहीं कर सकती ...सरकारी काग़जों में ही लिखा था कहीं कि इस देश में 24-25 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं..और कमाल की बात है....इस रेखा की रिसर्च पर सरकार काफ़ी होमवर्क कर चुकी है..लकड़वाला कमेटी आई गई..पर रेखा ज्यों की त्यों बनी हुई है..और सारा खेल रेखा के इस पार और उस पार का है..इस पार खदेरन है ..उस पार सरकार...सूखा आया..तो कईयों के चेहरों पर हरियाली छा गई..बुंदेलखंड की समस्या को सुलझाने के लिए राहुल बुंदेलखंड प्राधिकरण का चालीसा पढ़ने लगे..कांग्रेसी वानरसेना सेना की तरह माया के जाल को तोड़ने के नारे लगाने लगे...मैदान में एक ही नारा है ..आम आदमी..आम आदमी..पर दोगलापना कब दिखता है..जब वित्तमंत्री और कृषि मंत्री सदन के अंदर होते हैं..ऐसे बोल रहे है मानो कोई बड़ी बात नहीं..शरम नहीं आती इनको ..लोगों का विश्वास पाया है..और नतीजा ये दे रहे है कि ..दाल रोटी नही..दाल या रोटी खाये खदेरन...बंद कीजिये ये दोगलापना...नहीं कर सकते तो गद्दी छोड़िये ..कोई मंत्री कैसे कह सकता है ..कि हिंदुस्तान के ग़रीब को वो दाल-रोटी नहीं मुहैया करवा सकता..बंद कीजिये अपना ऐशो-आराम....खदेरन एसी में बैठे, पेट में फाईवस्टार होटलों का खाना ठूसे और महंगी गाड़ियों में बैठकर संसद में आने वाले नेताओं के मुंह से अपनी बेहाली पर ऐसी अकर्मण्यता वाली भाषा नहीं सुनना चाहता..दिल्ली में क्यूं 45 डिग्री का ताप सह कर, डीटीसी में बैठ कोई भी नेता ..संसद नहीं पहुंचता..नहीं है भाई साहब वो आदत नहीं है..ये जनता के नुमाइंदे है..बात सुरक्षा की करते हैं..ये बहाना है...एक और दोगलापना...इनको चुनने वाली जनता तो दिन रात अपने चीथड़े उड़ते देख रही है..कहीं सड़कों पर..कहीं बसों में..फिर किस मुंह से ये लोग अपनी सुरक्षा का हवाला देते है..एक नागरिक के तौर पर किस मायने में इनकी जान खदेरन से ज्यादा महंगी है... नेताओं की हिम्मत क्यों नहीं कि वो तमाम फ़िजूलखर्च बंद कर त्याग का परिचय दिखाये..उस खदेरन के लिए जिसके लिए आज दाल या रोटी ही विकल्प बच गये हैं.....क्या सच में कृषिप्रधान देश इतना लाचार है कि खदेरन और उसके जैसे लाखों करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नहीं मुहैया करवा सकता....क्या हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में इतनी रक़म नहीं जमा कि हम अपने लोगों का पेट भरने के लिए कुछ ज्यादा खर्च कर सकें..क्या सरकारी पंजा इतना कमज़ोर है कि जमाखोरो की गरदन पकड़ सके..क्या सच में इतनी तरक्की का दंभ भरने वाला देश ये गवारा करेगा कि खदेरन दिन ब दिन अपना पेट काटे..अपने बूढ़े मां बाप को इलाज के अभाव में मरने के लिए छोड़ दे...दिल्ली में दौड़ती मेट्रो ट्रेन शोषण की शोभायत्रा लगती है...ऊंची-ऊंची अट्टालिकायें..भूख और बेबसी से मरे लोगों की क़ब्रे लगती हैं..गांधी को मानने वाले नेताओं को याद नहीं शायद . बापू ने भी कहा था...किसी भी काम को लेकर जब तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो मेरा मंत्र इस्तेमाल करो..सबसे कमजोर आदमी को याद करो..और देखो कि तुम जो करने जा रहे हो..उससे उस आदमी के जीवन में क्या फर्क पड़ेगा....
हमारी क़िताबों के पिछले पन्ने पर ये लिखी बात हम तो पढ़ गये ..पर बापू का नाम रटने वाले लोगों ने शायद ये नहीं पढ़ा...मेरे हिसाब से संसद के अंदर अब उन लोगों की तस्वीरे चारों ओर लगा देनी चाहिए..जो भूख़ और ग़रीबी के ग्रास बन गये..फिर चाहे वो बुंदेलखंड का ग़रीब किसान हो..या विदर्भ में आत्महत्या करने वाला किसान. ..इन मरे हुए लोगों की तस्वीर देख शायद हमारे वित्तमंत्री और कृषि मंत्री को ये याद आ जाये ..कि ये जगह किस लिए है..वो किस लिए हैं..सारे नेता किस लिए हैं...साथ में खदेरन की भी एक फोटो हो....ताकि उसकी भी याद रहे उनको कि आज फिर वो दुकान पर जयेगा..लेकिन इसबार हमें उसे ये विकल्प नहीं देना है कि वो दाल या रोटी की सोचे...सोचे तो दोनो एक साथ..यानि जब शाम हो तो उसके घर की थाली में दाल रोटी दोनों हों....

रवि मिश्रा

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9 बैठकबाजों का कहना है :

Manju Gupta का कहना है कि -

आज की सरकार ,नेताओ पर खदेरन के द्वारा करारा व्यंग्य किया आज की दशा सोचनीय है .गाँधीवाद को सरकार जीवन में उतारे तो राजा हरिश्चंद्र हो जायेगी .बधाई .

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

महंगाई का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.

Manju Gupta का कहना है कि -

बैठक में मंदी के दोर में टी. वी . चेनल का पेज दिखाई नहीं दे रहा है

Disha का कहना है कि -

बहुत बढिया लेख
गरीबों की यही हालत है.
जब हम लोगों की हालत पतली हो रही है तो एक गरीब की तो औकात ही क्या?

Nikhil का कहना है कि -

बैठक के सबसे अच्छे लेखों में से एक........बधाई रवि....

Unknown का कहना है कि -

सरकार का आश्वासन और इनके द्वारा बनाई गई नीतियां.. इसके अलावा और मिलता ही क्या है खदेरन जैसे किसानों को मंदी के दौर की दुहाई देते इन नेताओं को तो ये भी नहीं पता कि भूख लगती है तो कैसा महसूस होता है...बहुत ही बढ़िया लेख है।

gazalkbahane का कहना है कि -

मन्दी हो या मंहगाई/मरता गरीब ही है,कभी भाजपा नारा जी सिर्फ़ नारा लगाती थी भारत और इन्डिया का.तो कभी कांग्रेस ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था
लेकिन गरीबी तो हटी नहीण यूं ही ग्लोबल विलेज बनता गया तो गरीब जरूर हट जाएंगे दुनिया के नक्शे से,लेकिन सत्ता व अमीर होते देश व लोग भूल जाते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है और आज स्वीटजरलैंड जैसे देश में अल्बानिया तथाअन्य पूर्वी यूरोप से आये लोगो के कारण आपराधिक ग्राफ़ जो कभी ०% था उपर उठ रहा है,सड़कों पर जवान लड़के लड़कियों के झुंड भीख मांगते दिख रहे हैं,यूरोपिय यूनियन बनने से पासपोर्ट हट गया आना जाना सरल हो गया और बेटिकट यात्रा जो यहां के बाशिण्दे सोचते भी नहीं थे होने से टिकट चेक करने वाले इन्सपेक्टरों की संख्या बढानी पड़ी
एक और तथ्य ज्यों जो आमदनी बढती है त्यों त्यों खाने पीने[ शराब नहीं]पर % खर्च कम होता है अत खान पान की मंहगाई का असर अमीरों पर कम गरीबों पर दुगना चौगुना हो जाता है
श्याम सखा श्याम

अबयज़ ख़ान का कहना है कि -

खदेरन भूख से मरता रहे, नेताजी को भला क्या फर्क पड़ता है। हां जब वोटों का मौसम आयेगा, नेताजी आयेंगे, खदेरन के परिवार के हर शख्स का ब्यौरा उनके लैपटॉप में होगा..उससे वोट लेने के बाद नेताजी हाथ झाड़कर निकल जायेंगे... फिर उसके बाद चाहे खदेरन भूख से तड़प-तड़पकर दम ही क्यों न तोड़ दे। मंत्री जी इतना करेंगे संसद में चीखकर बोलोंगे.. ये सदी का सबसे बड़ा सूखा है..। रवि को सानदार लेख के लिए बधाई...

Shamikh Faraz का कहना है कि -

आपका बहुत ही बढ़िया आलेख. इसे पढ़कर एक ग़ज़ल अपनी याद आ गई.

यह कैसा ग़म है यह कैसा ग़म है
लब खामोश दिल उदास और आँख नम है
हौंसला बीमार, उम्मीदें अधमरी, मरा जज्बा
मेरे जिस्म में मचा हुआ एक मातम है
बदन की झुर्रियों की गिनती तो
अब भी दिल के ग़मों से कम है
सूखे में सूख गई उम्मीदें सारी
और चटके हुए बदन में बाकी हम हैं.
खुशियाँ तो जैसे अगवा कर लीं किसी ने
अब बाकी, बाकी बचा तो बस ग़म है

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