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Wednesday, February 09, 2011

शमशेर सहज मित्र थे



अचानक जनसत्ता में यह खबर देखकर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि शमशेर जी नहीं रहे। 14 दिसंबर को उनसे बात हुयी थी तब उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य ख़राब है लेकिन मुझे न इतनी गम्भीर बीमारी की उम्मीद थी और न ही उन्होंने कोई संकेत दिया। वे मेरे परिचित और लगभग मित्र तभी हो गए थे जब मैं दिल्ली 1997 में आया। इसकी एक दिलचस्प कहानी यह है कि उन दिनों नफीस अफरीदी हिंद पॉकेट बुक्स में संपादक थे और उन्होंने मेरे और शमशेर सहित 3-4 और लोगों को एक पुस्तक श्रृंखला के लेखक के रूप में नामित किया था। लेकिन चूँकि वह योजना और सदिच्छा अफरीदी साहब की ही थी इसलिए उसे प्रकाशक दीनानाथ मल्होत्रा ने स्वीकृत नहीं किया। उनका कहना था कि यह योजना बनाने से पहले उनसे एक बार पूछ लेना चाहिए था। लेकिन अफरीदी साहब ने हमारी ख़ुशी का ज्यादा ख्याल किया और पहले हमें ही नियुक्त कर लिया। भले ही यह योजना सफल न रही हो लेकिन मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया कि अच्छा, चलो किसी ने तो मुझे योग्य समझा। यह देखकर मुझे और ख़ुशी हुयी कि मेरे ही साथ एक और सज्जन इस कदर फूले हुए हैं हैं कि बस छलक छलक पड़ रहे हैं। वे शमशेर अहमद खान थे।

धीरे-धीरे हमारा बात-विचार-व्यव्हार आगे बढ़ने लगा। शमशेर अत्यंत मिलनसार, सहज, महत्वाकांक्षी, योजनावीर लेकिन मेहनती व्यक्ति थे। वे अक्सर अपना समय और पैसा खर्च करके संस्कृति और साहित्य के लिए अनेक काम करते। अनेक पत्रिकाओं के लिए उन्होंने गृहमंत्रालय के केन्द्रीय हिंदी संसथान में खरीदे जाने की स्वीकृति दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वे अपने चित्रों और लेखों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाना चाहते थे।

जो सबसे महत्वपूर्ण बात गौर करने की है कि वे बच्चों के लिए वृत्तचित्र और फिल्मे बनाना चाहते थे और पर्यावरण पर उनकी कई पुस्तकें बच्चों के लिए ही छपीं। वे संभवतः एक सहज पाठक वर्ग तक पहुँचना चाहते थे और इसीलिए लगातार सक्रीय रहते थे।
उन्होंने एक मित्र से से मुझे मिलवाया जो इग्नू में हैं और चाहते थे कि जो वृत्तचित्र मैंने बनाया है वह वहाँ से प्रसारित हो। वह मित्र दलजीत सिंह सचदेवा यारबाश और सच्चा जाट जरूर है लेकिन फिल्मों के मामले में उसकी किसी से तुलना नहीं है। बिलकुल अपने ढंग का है। लिहाज़ा मेरी फ़िल्में क्या प्रसारित होतीं लेकिन वह साला दोस्त जरूर बढ़िया बन गया। शमशेर जब भी मिलते पूछते क्या उसने कोई काम कराया और उनके जीते जी जवाब नहीं ही था।

विगत दिनों अंदमान यात्रा से लौटकर शमशेर कुछ फूटेज लाये जिसपर वे एक डॉक्यूड्रामा बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मुझे घर बुलाया। हैंडी कैम से लिया गया वह फूटेज इतना ख़राब और नाकाफी था कि उसपर कुछ भी बनाना संभव नहीं था। इस बात से वे बहुत दुखी थे। वे किसी ऐसे काम के माध्यम से लोगों के सामने आना चाहते थे जिससे लोग उन्हें लम्बे समय तक याद रखें।
अचानक बीमार होना और इस तरह चले जाना मुझे इसलिए भी अखर रहा है क्योंकि वे अपने ऑर्थराइटिस से पीड़ित बेटे को स्वस्थ देखना चाहते थे। एक बार उसके बारे में बहुत भावुक होकर वे बोले- "यह भी एक ख़राब फूटेज है यादवजी, मैं इसे एक अच्छी फिल्म कि तरह शानदार देखना चाहता हूँ।"

---रामजी यादव

Tuesday, February 08, 2011

शमशेर अहमद खान एक साधारण लेखक से कहीं अधिक थे



अभी थोड़ी देर पहले ही मित्र रामजी यादव ने बताया कि जनसत्ता में खबर छपी है कि शमशेर अहमद खान नहीं रहे। मेरे लिए यह विश्वास करने वाली सूचना नहीं थी। रामजी ने बताया कि आज के जनसत्ता में खबर छपी है कि लम्बी बीमारी के बाद 7 फरवरी 2011 को उनका निधन हो गया। मुझे यक़ीन इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि नवम्बर तक उनसे लगातार बात हुई थी। उन्होंने अंतिम बार यह ज़रूर कहा था कि आजकल छुट्टी पर हूँ। चेहरा और शरीर के कई अन्य भाग बुरी तरह से फूल गये हैं। इस स्थिति में कहीं आ-जा नहीं सकता। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि उन्हें ब्लड-कैंसर हैं। अभी कुछ देर पहले ज़ाकिर भाई को फोन किया तब पता चला कि दिसम्बर में उन्हें पता चला कि ब्लड-कैंसर है और वे उसी का इलाज करवा रहे थे।

अंतिम बार मैं उनसे तब मिला था जब पीपुल्स विजन्स के साथ मिलकर हिन्द-युग्म ने वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का कहानीपाठ आयोजित किया था। (दर्भाग्य से यह कार्यक्रम प्रस्तावित रूप में नहीं हो पाया था)। हमलोग जब कभी भी कोई कार्यक्रम करते थे, चाहे वो बड़ा हो या छोटा, शमशेर जी को फोन करके यह निवेदन करते थे कि वे अपना कैमरा वगैरह लेकर आ जायें। शमशेर जी को साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग का बेहद शौक था। हिन्द-युग्म को उन्होंने पिछले 2 सालों में कम से कम 100 रिपोर्ट बनाकर दिये होंगे। खुद का संसाधन और समय लगाकर किसी कार्यक्रम की वीडियोग्राफी करना, फोटोग्राफी करना, उसकी रिपोर्ट बनाना और बहुत से प्रिंट और इंटरनेटीय पत्र-पत्रिकाओं को भेजना, एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन इसमें वे कभी थके नहीं। मुझे याद है कि जब वे दिल्ली के बाहर कहीं भी जाते, तो वहाँ की रिपोर्ट इंटरनेट के माध्यम से वहीं से भेज देतें। मैं उनकी रिपोर्टों को छापने में उतना तेज़ नहीं था, जितनी तीव्रता से वे उन्हें भेजते थे।

हिन्द-युग्म के स्थाई पाठक ज़रूर इस नाम से परिचित होंगे। लगभग 2 साल पहले ज़ाकिर अली रजनीश जब दिल्ली आये थे, तक उन्होंने शमशेर जी से मुझे मिलवाया था। उसके बाद महीने में कम से कम 15 दिन उनका फोन ज़रूर आता था। इंटरनेट पर हिन्दी की दुनिया की सजीव उपस्थिति देखकर वे बहुत उत्साहित थे। इंटरनेट विधा की त्वरितता और इसकी जन-पहुँचता उन्हें बहुत लुभाती थी। वे कम्प्यूटर के पक्षधर थे और बहुत जल्दी ही उन्होंने इसका इस्तेमाल सीख लिया था। वे इस बात के लिए हमेशा दुखी रहते थे कि उनके सहकर्मी कम्प्यूटर पर हिन्दी का इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाते। उन्होंने अपने प्रशिक्षण संस्थान में मुझे दो बार अपने सहकर्मियों को ब्लॉगिंग और यूनिकोड-प्रयोग का प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया था। लेकिन अभी तक वे अपने सहकर्मियों को यूनिकोड-फ्रेंडली नहीं बना पाये थे, इसका उन्हें बेहद अफसोस था।

उन्होंने मुझे सांसदों द्वारा राजभाषा हिन्दी के उत्थान के लिए किये जा रहे हास्यास्पद प्रयासों के बारे में बताया था और मुझे लगातार इस बार के लिए प्रोत्साहित करते थे कि जरा एक RTI डालकर देखिए कि कितनी चुटकुलेदार उक्तियाँ मिलेंगी। उन्होंने पिछले साल 'सूचना का अधिकार' कानून का इस्तेमाल कर यह जानकारी ली थी कि भारतीय नोटों पर सभी भारतीय भाषाओं में मुद्रा का मान क्यों नहीं लिखा जाता और यह भी कि इंडिया गेट पर शहीदों का नाम देवनागरी लिपि में क्यों नहीं है और क्या उन्हें कभी देवनागरी लिखे जाने की कोई योजना बनाई गई?

उन्हें पशु-पक्षियों से बेहद लगाव था। जब मैं पहली बार और इक मात्र बार उनके घर गया था तो उन्होंने अपने बागीचे के बहुत से छोटे-छोटे जीवों से मेरा परिचय करवाया था और अपने लैपटॉप पर उन्होंने उनके प्रेम करने की, प्रजनन, शिकार करने तथा खाने का वीडियो भी दिखाया, जिसको वे बहुत शांति से शूट कर लिया करते थे। पिछले ही साल उन्होंने एक सैकंड-हैंड वीडियो कैमरा लिया था, जिसकी मदद से वे लघुफिल्में बनाना चाहते थे। उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म बनाई भी थी, जिसे वे अपने हर परिचित को दिखाते भी थे।

खाना बनाने का भी शौक रखते थे। नवम्बर 2011 में ही उन्होंने कई बार कहा कि अगर आप किसी शाम खाली हो तो आइए मछली बनाता हूँ। बाकी वे एक वरिष्ठ लेखक और बालसाहित्यकार थे, यह तो सभी जानते हैं। लेकिन मैं तो उन्हें एक रिपोर्टर, फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर के तौर पर अधिक जानता था। हमदोनों एक साथ बाल साहित्य के कई कार्यक्रमों में गये, लेकिन मेरी हमेशा उनसे बातचीत हिन्दी और इससे जुड़ी तकनीक पर ही होती थी। मेरे विचार से शमशेर अहमद खान का जाना हिन्दी भाषा की क्षति है।




शमशेर जी का ब्लॉग
शमशेर जी द्वारा हिन्द-युग्म को भेजी गईं रिपोर्टें

Saturday, September 25, 2010

बिन बरसे मत जाना रे बादल- कन्हैया लाल नंदन को प्रेमचंद सहजवाला की श्रद्धाँजलि

हिन्दी के वरिष्ठ कवि व पत्रकार कन्हैया लाल नंदन का आज सुबह दिल्ली में निधन हो गया। वे 77 वर्ष के थे। कन्हैया लाल नंदन एक मंचीय कवि के रूप में बेहद चर्चित थे। हिन्द-युग्म परिवार इनके निधन पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। प्रेमचंद सहजवाला अपने व्यक्तिगत अनुभव बाँट रहे हैं-


इन दिनों कोई भी पत्रकार अगर खबरें पढ़ता सुनता है तो या तो अयोध्या की या कॉमनवेल्थ की. पर किसी किसी क्षण फोन बजता है तो कोई साथी दुखद खबर दे कर मन को संतप्त सा कर देता है. आज दूरदर्शन पर समाचार देखते-देखते शैलेश भारतवासी फोन आया और उसने सूचना दी कि कन्हैयालाल नंदन नहीं रहे! सचमुच, कोई प्रभावशाली शख्सियत यूँ अचानक चली जाए तो हृदय को धक्का सा पहुंचना स्वाभाविक ही है. उनके निधन पर मुझे इसलिए भी विशेष आघात पहुंचा कि इसी 27 सितम्बर के लिये ‘परिचय साहित्य परिषद’ की ओर से उन्हें विशेष आमंत्रण था. ‘परिचय साहित्य परिषद’ ने 27 सितम्बर को ‘सत्य सृजन सम्मान’ देने का विशेष कार्यक्रम रखा था और परिषद की अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने मुझे बताया कि उन्होंने नंदन जी को भी विशेष निमंत्रण दिया था कि वे इस कार्यक्रम में आएं व परिषद की ओर से ‘सत्यसृजन सम्मान’ स्वीकारें. नंदन जी पिछले दिनों कई बार Dyalisis पर रहे, हालांकि जब जब वे स्वस्थ होते तब वे अपनी कर्मशीलता की किसी आतंरिक प्रेरणाल शक्ति से कार्यक्रमों में निरंतर जाते रहते. जब उन्होंने उर्मिल सत्यभूषण से अपने अस्वस्थ होने के कारण असमर्थता ज़ाहिर की तब उर्मिल जी ने निर्णय लिया कि परिषद की ओर से उनके निवास स्थान पर ही कुछ ही दिनों बाद उन्हें सम्मान देने कुछ लोग जाएंगे. परन्तु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था और वे 25 सितम्बर प्रातः लगभग पौने चार बजे अपनी जीवन यात्रा संपन्न कर के प्रस्थान कर गए.


1 अक्टुबर 2009 को राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय, नई दिल्ली में 'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठि कार्यक्रम में बैठे कन्हैया लाल नंदन
पुस्तक-विमोचनों का कन्हैयाल लाल नंदन हिंदी पत्रकारिता में एक बेहद सशक्त हस्ताक्षर थे और उनसे जुड़ी मेरी चंद यादें भी मेरे लिये मूल्यवान धरोहर हैं. साहित्यकार के लिये साहित्य से जुड़े स्वनामधन्य हस्ताक्षरों का सामीप्य सचमुच किसी भी अन्य धरोहर से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है. पर मुझे पता नहीं चल रहा कि पहले कुछ ताज़ा प्रसंग बताऊँ कि तीन चार दशक पुराने. नंदन जी को मैंने बहुत अरसे बाद 1 अक्टूबर 2009 को ‘राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय’ में स्व. प्रभाष जोशी के साथ देखा था. उन दिनों महात्मा गाँधी की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (जो उन्होंने 1909 में लंदन से दक्षिण अफ़्रीका लौटते हुए ‘किल्दोनन’ नाम के जहाज़ में लिखी थी) की शताब्दी जगह जगह मनाई जा रही थी. ‘राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय’ में भी ‘हिंद स्वराज’ से जुडी किसी पुस्तक का लोकार्पण प्रभाष जी के करकमलों द्वारा हो रहा था. संग्रहालय की निदेशक डॉ. वर्षा दास के आमंत्रण पर जब वहाँ गया तो प्रभाष जी के साथ हुई अपनी संक्षिप्त भेंट की रिपोर्ट भी मैं पहले ही दे चुका हूँ. पर उस सभागार में प्रभाष जी के साथ नंदन जी को बतियाते देखा तो बेहद प्रसन्न हुआ. कई पुराने खूबसूरत लम्हे एक नॉस्टालज्या की तरह आ गए. उस दिन कार्यक्रम शुरू हुआ तो नंदन जी दर्शकगण में बैठे थे और मैंने जा कर उन्हें नमन किया. नंदन जी की बेहद आत्मीयता व प्रोत्साहन भरी आकर्षक मुस्कराहट तो मुझे ज़मानों से याद है. अधिक बोलने की गुंजाइश नहीं थी, सो मैं केवल अपना नाम ही बता पाया. वे मुस्करा कर बोले– ‘पहचानता हूँ’, बस इतना कहते ही मंच से कार्यक्रम शुरू होने की आवाज़ आई तो मुझे अपना कैमरा ले कर सक्रिय होना पड़ा. पर नंदन जी को इतने अरसे बाद इतना करीब देख मेरी स्मृति अचानक तीनेक दशक पूर्व की तरफ चली गई. ये वो दिन थे जब ‘टाईम्स ऑफ इण्डिया’ की कथा पत्रिका ‘सारिका’ मुंबई से शिफ्ट हो कर दिल्ली के 10, दरियागंज में आ गई थी. साहित्यप्रेमियों के बीच किम्वदंती यही थी कि कमलेश्वर की ‘टाईम्स ऑफ इण्डिया’ से भिड़ंत हो गई है सो टाईम्स ने ‘सारिका’ कार्यालय ही शिफ्ट कर दिया है. तब 10, दरियागंज में अच्छी रौनक सी लग गई थी. ‘पराग’ ‘दिनमान’ ‘सारिका’ व ‘वामा’ – इन चार पत्रिकाओं के कार्यालय एक ही जगह. कभी जाओ तो नंदन जी, अवधनारायण मुद्गल जी व मृणाल पांडे के दर्शन एक साथ हो जाते. नंदन जी उस से पूर्व ‘दिनमान’ के संपादक थे. अचानक ‘सारिका’ की बागडोर उन्हें सौंप दी गई तो मैं बेहद प्रसन्न था क्योंकि मैं उन दिनों कहानी लिखने पढ़ने में खूब सक्रिय था. नंदन जी की तीखी प्रखर लेखनी से मैं ‘दिनमान’ द्वारा ही परिचित था पर उनका ‘सारिका’ में आना मेरे लिये व्यक्तिगत प्रसन्नता की बात थी. मैं तब सोनीपत में था और वहाँ की ‘लिट्रेरी सोसायटी’ के प्रमुख लोगों में से था. हिंदी गीतकार शैलेन्द्र गोयल उस सोसायटी के कर्ता-धर्ता थे. सोसायटी केवल कविता पाठ या कहानी पाठ ही नहीं करती थी वरन् अनेक बड़े कार्यक्रम भी करती: जैसे विष्णु प्रभाकर के सम्मान में एक विशाल समारोह रखा गया जिसमें सोनीपत शहृ के असंख्य लोग सोनीपत के हिंदू कॉलेज प्रांगण में एक विशाल शामियाने में बड़ी उत्सुकता से एकत्रित हो गए थे. विष्णु जी के ‘आवारा मसीहा’ से संबंधित अनुभवों में साईकिलों के लिये प्रसिद्ध इस शहृ के लोगों ने खूब उत्सुकता दिखाई. उसी से अगले दिन उसी शामियाने में एक कवि सम्मलेन भी रखा गया और मेरे लिये उस क्षण प्रसन्नता की सीमा नहीं रही जब कर्ता-धर्ता शैलेन्द्र गोयल जी ने बताया कि इस कवि सम्मलेन में दिल्ली से आपके मनपसंद कन्हैयालाल नंदन भी आ रहे हैं. मुझे ऐसा लगा था जैसे उनका आगमन विशेष मेरी खुशी के लिये ही हो रहा है, हालांकि उस संस्था में ‘ऐटलस साईकिल फैक्ट्री’ से जुड़े कई युवा साहित्यप्रेमी थे जो उस कवि सम्मलेन में उतने ही उत्साह से काम कर रहे थे जितना कि मैं. शाम छः बजे हमें आदेश हुआ कि हुल्लड़ मुरादाबादी, शैल चतुर्वेदी व नंदन जी आदि कई कवि अलग अलग रेलगाड़ियों से स्टेशन पहुँच रहे हैं. मुझे स्वाभाविक रूप से कहा गया कि आप किसी को साथ ले कर नंदन जी को लेने जाइए. पर उनकी गाड़ी शैल चतुर्वेदी आदि कवियों की गाड़ी से पहले है और शायद भिन्न प्लेटफॉर्म पर हो. मैं उस कार का इंतज़ार करने लगा जिसमें मुझे नंदन जी को लेने जाना था, हालांकि हिंदू कॉलेज से स्टेशन ज़्यादा दूर नहीं था पर इतने गणमान्य कवियों को रिक्शे में या पैदल लाने का ‘आईडिया’ किसी को पसंद नहीं था. शैल चतुर्वेदी समूह को लेने जाने वाली कार के कार्यकर्ताओं को मैंने उत्साहवश कह दिया कि तुम लोग मेरी कार के भी दस मिनट बाद आना. पर वे हँसते खिलखिलाते पहले ही निकल गए और स्टेशन पर हुआ उल्टा ही. नंदन जी वाली ट्रेन ‘लेट’ हो गई और शैल चतुर्वेदी व हुल्लड़ मुरादाबादी आदि एकदम विरोधी प्लेटफोर्म पर उतरते नज़र आए. हमारे कार्यकर्ता उन्हें हार पहना कर स्वागत कर रहे थे. इस से चंद मिनटों बाद ही नंदन जी की गाड़ी आ गई और मैं लपक कर उनके सामने गया. बड़े बड़े साहित्यकारों को अपना नाम बताने का उत्साह हर नए लेखक में होता है. मैं हांफता हुआ बोला– ‘नंदन जी मैं प्रेमचंद सहजवाला. आप को लेने आया हूँ’. और ज्यों ही मैंने हाथों में पकड़ी फूलमाला उनके गले की ओर बढ़ाई, उन्होंने मुस्करा कर हाथ थाम लिया – ‘बस, आपका स्वागत करना बहुत है भाई’. उन दिनों मुझे यह भी बखूबी अहसास होता था कि नंदन जी की शक्लो- सूरत व उस पर विराजमान मुस्कराहट सचमुच बेहद आकर्षक हैं. पर इस से भी बड़ी बात कि उनकी आवाज़ बहुत सशक्त थी जिसमें गज़ब का असर रहता था. उन्होंने कहा – ‘मैं आप के नाम से तो परिचित हूँ. आप ‘सारिका’ में भी छपे हैं शायद’. मैंने उत्साह से कहा – ‘अभी लेखन में नया नया हूँ. कमलेश्वर ने ‘सारिका’ के ‘नवलेखन अंक’ में मेरी कहानी छापी थी. अप्रैल ‘76 में’. तब तो कमलेश्वर जिसे छाप दे समझो वह लेखक चर्चित हो गया. किसी नवोदित लेखक के लिये भला इस से ज़्यादा खुशी की क्या बात कि एक इतना बड़ा पत्रकार जिसे कई सम्मान व पुरस्कार मिल चुके हैं, उस के साथ कार में घुसते घुसते पूछ रहा है – ‘आप कैसी कहानियां लिखते हैं’?
मैंने कहा – ‘मैं मध्यवर्गीय परिवारों के संघर्षों को कहानियों में वर्णित करने के लिये कुछ चर्चित हुआ हूँ. श्रीपतराय ने एक प्रकार से मुझे कहानी विधा में जन्म दिया. एक संग्रह छपा है जिसकी भूमिका श्रीपतराय ने स्वयं लिखी है’.

सोनीपत के उस कवि सम्मलेन में नंदन जी की शख्सियत का यह पहलू भी उजागर हुआ कि कवि रूप में वे एक बेहद खुद्दार व्यक्ति थे और उन्हें लगता था कि साहित्यकार कहीं भी निवेदन कर के नहीं जाता, वरन साहित्यकार ज़रूरत समाज को होती है. वह प्रसंग तो छोटा सा था पर फिर भी यहाँ उसे अलग से देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा. उस कवि सम्मलेन में सोनीपत के डी.सी मुख्य अतिथि थे पर उन्हें किसी कारणवश कार्यक्रम शुरू होने के कुछ ही देर बाद जाना था जब कि अभी केवल एक दो स्थानीय कवि ही अपने कविता प्रस्तुत कर चुके थे. डी.सी. को इसीलिए निवेदन कर के मुख्या अतिथीय भाषण के लिये बुलाया गया. डी.सी ने बहुत रोचक भाषण दिया व कवियों के प्रति बेहद सम्मान भी व्यक्त किया. पर डी.सी ने अपने भाषण में प्रहसन के तौर पर यह कह दिया कि एक बार एक व्यक्ति दूसरे के पीछे भाग रहा था. पूछे जाने पर वह बोला कि वह व्यक्ति मुझे अपनी कविता सुना गया मेरी नहीं सुन रहा. इसे सभागार ने तो प्रहसन के तौर पर लिया पर डी.सी साहब के मंच छोड़ कर नीचे जाते ही नंदन जी मंच पर अपने स्थान से खड़े हो कर माईक तक आए. वे मुस्करा कर बोले कि माननीय मुख्य अतिथि से मैं कहना चाहता हूँ कि हम सब कवियों को यहाँ बुलाया गया है, और हम यहाँ ज़बरदस्ती कविता सुनाने नहीं आए. कुछ क्षण सब लोग हक्के बक्के रह गए कि अब हमें कैसा महसूस करना चाहिए. पर डी.सी साहब भी उतने ही दिलदार व्यक्ति थे. वे मुस्कराते हुए मंच पर आए और क्षमा मांगते हुए बोले कि मेरा उद्देश्य केवल एक रोचक बात कहना था. अपने समस्त भाषण और जीवन में मैंने कवियों का आदर करना ही सीखा है. पर नंदन जी ने भी तुरंत उनका मूड ठीक करते हुए मुस्करा कर यही कहा कि वे तो आम धारणा को ठीक कर रहे थे और कि उनका उद्देश्य व्यक्तिगत रूप से आपत्ति करना नहीं था .

-प्रेमचंद सहजवाला
नंदन जी मृदुभाषी व गूढ़ गंभीर साहित्यकार पत्रकार की तरह कार में मेरे साथ बैठे रहे पर उन्होंने प्रोत्साहनवश अपनी नज़रें मुझ पर फोकस सी रखी थी व उनके चेहरे पर वही सौम्य मुस्कराहट ज्यों की त्यों स्थापित थी जैसे छोटों के लिये वह सुरक्षित हो. हिंदू कॉलेज जल्दी आ गया और शैलेन्द्र गोयल अन्य कई कवियों के बीच खड़े नंदन जी का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ उत्साही बालिकाओं ने बढ़ कर स्वागत करते हुए उनके माथे पर तिलक लगाया. एक के हाथ में आरती थी. जब सब लोग एक स्वागत कक्ष में पहुंचे तो मैं शेष कवियों से भी मिल लिया. शैल चतुर्वेदी इतने गंभीर क्यों बैठे हैं भला? कहकहा क्यों नहीं लगा रहे? पर सोचा कहकहा तो वे मंच पर लगाएंगे. अभी कार्यकर्ताओं के बीच तो वे सौम्य से बैठे शैलेन्द्र जी को यात्रा-वात्रा की तकलीफें बता रहे थे. शैलेन्द्र जी एक एक का परिचय करवा रहे थे. मेरे विषय में सब से बोले – ‘इन्होने हिंदी साहित्य को ‘सदमा’ दिया है (यानी मेरे पहले संग्रह का नाम ‘सदमा’ है). इस पर सब लोग खूब हंस पड़े और नंदन जी बोले – ‘साहित्यकार का का काम ही होता है ‘शॉक’ देना, यानी सदमा देना. इस के कुछ देर बाद नंदन जी से सब की एक गंभीर बातचीत आनन् फानन शुरू हो गई. मैं ने पूछा – ‘साहित्यकार व्यवस्था का विरोधी माना जाता है, पर इतने सारे साहित्य के बाद व्यवस्था तो ज्यों की त्यों है, ऐसा क्यों भला’?
नंदन जी ने कहा – ‘इस का कारण सिर्फ यही है कि आप के पास चिंता है पर समाधान नहीं और जिन के पास समाधान है उनके पास चिंता नहीं है.’ नंदन जी के इस उत्तर पर आसपास के पूरे मौऔल को एक रोशनी सी मिल गई मानो, जैसे देश के एक विख्यात पत्रकार ने सब को दो टूक सच्चाई बता दी.

व्यक्तित्व के तौर पर यह श्रद्धांजलि लेख लिखते लिखते मुझे कवयित्री अर्चना त्रिपाठी की बात याद आ रही है जिन्होंने फोन पर बताया कि नंदन जी की आत्मकथा ‘गुज़रा कहाँ कहाँ’ से वे बेहद प्रभावित हुई. अपने इलाहाबाद से ले कर मुंबई तक के बहुत सुन्दर संस्मरण व धर्मवीर भारती की प्रशंसा और आलोचना एक साथ लिखी उनहोंने. इसलिए कुछ बातें विवादस्पद हो गई. कुछ लोगों ने नंदन जी की ही आलोचना की कि डॉ. धर्मवीर भारती के जीते जी अगर वे उनके विषय में यह सब लिखते तो बेहतर था. पर कुछ अन्य लोगों का मत रहा कि कई बार शालीनतावश व्यक्ति सामने कुछ नहीं कह पाता, इसलिए धर्मवीर भारती के साथ अपने खट्टे मीठे अनुभव उन्होंने उनके के जाने के बाद कहे. अर्चना त्रिपाठी को इस बात की भी प्रसन्नता थी कि उनके पिता श्री ब्रजकिशोर त्रिपाठी कानपुर में कन्हैयालाल नंदन के अध्यापकों में से रहे तथा एक बार त्रिपाठी जी स्टेशन पर खड़े थे तो एक नौजवान ने आ कर उन्हें सैल्यूट किया. त्रिपाठी जी के पूछने पर उस नौजवान ने अपना परिचय दे कर कहा कि ‘मैं कन्हैयालाल नंदन हूँ. मैं आप का ही एक विद्यार्थी हूँ’.

साहित्यकार पत्रकार के रूप में उनकी लेखनी बेबाक रही हमेशा. मुझे याद है कि उनका एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने बहुत तीखे स्वर में लिखा था कि साहित्य में कुछ लोग ऐसे भी आ गए हैं जो सोचते हैं कि साहित्य केवल उनकी बदौलत है. हमें चाहिए कि ऐसे दादागीर लोगों को साहित्य से निकाल बाहर करें. उनके विषय में सुप्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने बताया कि वे पत्रकारिता के महान स्तंभ थे. मुक्तछंद कविता के कवि होते हुए भी वे मंचों पर जाते रहे छंदबद्ध कविता को भी सम्मान देते रहे. देश के अनेक प्रतिष्ठित रचनाकार उनके ऋणी रहेंगे क्योंकि नंदन जी ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई’. लक्ष्मीशंकर बाजपाई जी की बात पर मेरी एक हाल ही की स्मृति भी ताज़ा हो गई. दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में ‘श्रीराम मिल्स द्वारा आयोजित एक कवि सम्मलेन में मैंने 2009 में ही नंदन जी से बहुत प्यारी आवाज़ में एक गीत व एक छंदमुक्त कविता सुनी थी. मंच पर गोपालदास नीरज जैसी हस्तियाँ भी उपस्थित थी.

उन्हें ले कर हाल ही की एक ताज़ा स्मृति यह भी कि दिल्ली के प्रसिद्ध ‘हिंदी भवन’ में एक कविता पुस्तक ‘बूमरैंग’ का लोकार्पण हो रहा था जिसमें ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कुछ भारतीय कवियों की कविताएं संकलित थी और संकलन का संपादन ऑस्ट्रेलिया की ही रेखा राजवंश ने किया था. प्रायः लोकार्पण में संबंधित पुस्तक के रचनाकारों को बधाई दी जाती है तथा पुस्तक की भी भरपूर प्रशंसा की जाती है. लेकिन मंच पर उपस्थित नंदन जी को यह गवारा नहीं था कि रचनाकारों को उनकी सीमाएं बताए बिना ही लोकार्पण कार्यक्रम समाप्त किया जाए. उन्होंने अपने भाषण में बेहद दृढ़ तरीके से कहा कि इस संकलन में जो भारतीय ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं, उन्हें अपना वतन हिंदुस्तान बहुत याद आता है, सो उन्होंने ये तमाम कविताएं लिखी हैं. पर मैं पूछता हूँ क्या अपने वतन की याद आना भर काफी है, क्या केवल याद आने भर से ही कविता हो गई? क्या कविता में शिल्प नाम की कोई चीज़ नहीं होती. क्या उदगारों को मांजना संवारना ज़रूरी नहीं है?’ उस सभागार में उपस्थित होते हुए मुझे लगा कि आज का रचनाकार केवल अपनी प्रशंसा सुनने का लोलुप है. कई तो चलते फिरते चेखव या मोपांसा वोपंसा भी यहाँ मिल जाते हैं. ज़रा सी भी आलोचना करने वालों की खैर नहीं. संबंधित लेखक आपका नाम सहज ही अनाड़ियों में शामिल कर देगा. लेकिन नंदन जी की दो टूक कटु बातों ने स्पष्ट कर दिया कि रचनाकार को प्रोत्साहित करने का एक तरीका यः भी है कि उसके प्रति सच्ची सद्भावना रखते हुए उसे उसकी सीमाओं से परिचित करवाया जाए. इतनी बेबाकी केवल नंदन जैसों में ही सम्भव है.

साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र सक्सेना ने बताया कि दिल्ली में रह कर हर कोई उनके संपर्क में रहता था तथा किसी दुर्घटना के बाद छड़ी ले कर चलने के बावजूद और यहाँ तक कि बेहद अस्वस्थ होने के बावजूद वे कई कार्यक्रमों में देखे गए थे जो उनकी कर्मठता का ही प्रतीक है. लेकिन नंदन जी के विषय में जो कुछ चित्रा मुद्गल ने फोन पर कहा, वही इस कर्मठ साहित्यकार का असली परिचय है. चित्रा जी ने कहा कि वे अभी अभी दिल्ली से बाहर से लौटी तो उन्हें यह दुखद समाचार मिला. उन्होंने कहा कि ‘नंदन जी अपने जीवन का एक एक पल (उन्होंने ‘एक एक पल’ खूब ज़ोर दिया) पूरी सक्रियता से जीते रहे. ऐसा प्रेरणास्पद व्यक्ति हमें भी अपने जीवन का ‘एक एक पल’ सार्थक तरीके से जीने की प्रेरणा दे गया है. चित्रा ने कहा कि ऐसा व्यक्ति जीते जी तो प्रेरणा देता ही रहता है पर वह स्वर्गीय होते हुए भी स्वर्गीय नहीं रहता, क्यों कि जा कर भी हमें वह उसी सक्रियता व सार्थकता की प्रेरणा देता रहता है.

साहित्य व पत्रकारिता जगत के इस प्रेरणा स्रोत को मेरा शत शत प्रणाम.


मॉडर्न स्कूल, नई दिल्ली के कार्यक्रम में काव्यपाठ करते कन्हैया लाल नंदन






(जब मैंने उन्हें आखिरी बार काव्यपाठ करते हुए देखा)।

--प्रेमचंद सहजवाला

Thursday, March 18, 2010

प्रयोगी रचनाशीलता का अप्रतिम हस्ताक्षर- मार्कण्डेय

अभी-अभी हमें एक दुःखद समाचार मिला कि प्रयोगी रचनाशीलता के अप्रतिम हस्ताक्षर मार्कण्डेय नहीं रहे। 80 का वय पार कर चुके मार्कण्डेय पिछले 3-4 सालों से केंसर से पीड़ित थे। लम्बे समय से हृदय रोग से जूझते रहे। 2 साल पहले उन्हें खाने की नली का केंसर हुआ, लेकिन इनकी जीवटता देखिए कि उन्होंने अपनी मज़बूत इच्छाशक्ति की बदौलत केंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी ठेंगा दिखा दिया। लेकिन 1-1॰5 महीने पहले इन्हें फेफड़े का केंसर हो गया। लेकिन इस बार दुर्भाग्य कि समय से इन्हें इस रोग की जानकारी नहीं मिली, लेकिन फिर भी इनकी बेटी डॉ॰ स्वस्ति जो खुद भी पेशे से एक डॉक्टर हैं, ने इन्हें दिल्ली के राजीव गाँधी केंसर संस्थान में एडमिट कराया। लेकिन इस केंसर ने आखिरकार हमसे साहित्य-जगत का एक और सितारा छीन ही लिया। 18 मार्च की शाम 5 बजे के आसपास मार्कण्डेय ने शरीर त्याग दिया। मार्कण्डेय शुरू से ही इलाहाबाद में रहे। इनकी दो बेटियाँ और 1 बेटा है। इलाहाबाद में यदि आप जायें तो पायेंगे कि उस शहर का कोई चाहे वह साहित्य का विद्यार्थी हो या पिर विज्ञान का, साहित्य से जब उसका नाता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किसी भी रूप से जुड़ता है तो शुरू में ही वह मार्कण्डेय का कालजयी उपन्यास अग्निबीज पढ़ जाता है। आज हम वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश के एक आलेख से मार्कण्डेय को श्रद्धासुमन अर्पित कर हैं॰॰॰॰ संपादक


प्रयोगी रचनाशीलता के अप्रतिम हस्ताक्षर मार्कण्डेय

आनंद प्रकाश

हिंदी कथाकार और चिंतक मार्कण्डेय का जीवट देखते बनता था। अस्सी बरस की आयु के मार्कण्डेय जो लंबे समय से बीमार चल रहे थे और पिछले पंद्रह बरसों से हृदय रोग और बाद में हुई केंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे, इन दिनों फिर से दिल्ली में थे। उनका राजीव गांधी केंसर हस्पताल में इलाज हो रहा था और हस्पताल से निकटता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अस्थायी आवास की व्यवस्था रोहिणी के सैक्टर छह में की थी। इस आवास में उन्होंने लगभग एक महीना गुजारा। प्रबंध और चिकित्सा संयोजन की जिम्मेदारी मार्कण्डेय की बड़ी बिटिया डाक्टर स्वस्ति ने ली जो अपने लेखक पिता की सेवा में जी जान से जुटी थीं। ये मात्र सूचनाएं नहीं हैं, बल्कि उस सांस्कृतिक वातावरण की संकेतक हैं जिसका निर्माण अपनी जीवन शैली और व्यवहार के आधार पर स्वयं लेखक मार्कण्डेय ने किया था।

हिंदी में एक खास तरह की लेखन परंपरा उन्नीस सौ पचास के दशक में शुरू हुई। मार्कण्डेय उसके सिरमौर कहे जा सकते हैं, जो नई कहानी आंदोलन के पुरोधा थे और इस हैसियत से नई कहानी को लगातार जीवंत और सार्थक बनाने में जुटे थे। यह मार्कण्डेय के कारण ही संभव हो पाया कि मध्यवर्गीय कही जाने वाली और प्रायः नगरीय परिवेश को समर्पित नई कहानी गांव, जमीन और कृषि संबंधों पर केंद्रित हुई। आजादी के बाद सक्रिय हिंदी लेखकों में बिरले ही होंगे जिन्होंने मसलन भूदान जैसा मुद्दा उठाया और तथाकथित अशिक्षित समाज के सार्थक नायकत्व को प्रधानता दी। यह सिलसिला मार्कण्डेय की अनेकानेक कथा रचनाओं में देखने को मिला। पचास के दशक में एक समय तो ऐसा था जब मार्कण्डेय सप्ताह नहीं तो महीने के स्तर पर कहानी लिखते थे और उनकी बारह कहानियाँ तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिका ‘कल्पना’ में लगातार प्रकाशित हुई थीं। यही नहीं, उनकी एक भरीपूरी लेखमाला ‘कल्पना’ में ही उन दिनों छद्मनाम से छप रही थी। इस लेखमाला ने पचास और साठ के दशकों में विचारधारात्मक संचार का नया प्रतिमान कायम किया था और हिंदी कथा का बड़ा पाठक वर्ग साहित्य के कई अनछुए पहलुओं पर सोचने को बाध्य हुआ था। यह तब था जब मार्कण्डेय केवल अपने तर्कों के बल पर संस्कृति और कला के पक्षों का सूक्ष्म जायजा ले रहे थे। जब इस पूरे किस्से को मार्कण्डेय अपने अनोखे ढंग से बयान करते थे तो श्रोता अनायास आज से पांच-छह दशक पूर्व के काल में लौट जाता था। वह अलग वक्त था, उन दिनों बहसों की गंभीरता प्रासंगिक होती थी और साहित्य के हजारों-हजार पाठक वक्ती मसलों में दिलचस्पी लेते थे। मार्कण्डेय उस दौर के प्रेरणादायी हस्ताक्षर रहे हैं।

मार्कण्डेय के साथ आनंद प्रकाश

ग्रामीण जीवन की स्थितियों पर समस्यामूलक कहानियाँ लिखने के साथ साथ मार्कण्डेय ने कृषि संबंधी माहौल के जीवंत पात्रों को भी पहचाना और उन्हें इतिहास की गतिशील मूल्य व्यवस्था का वाहक बना कर पेश किया। कई प्रसंगों में उन्होंने उस भौगोलिक परिवेश को भी उकेरा जहां सांस्कृतिक मिथकों और प्रतीकों का असर देखने को मिलता है। इन सब चीजों के बीच उनकी भाषा का अलग ढंग भी नजर आया। इसके तहत मार्कण्डेय ने देशज शब्दों में अर्थ संकेतों की उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहानियों को बहुआयामी बनाया। यह प्रेमचंद से हट कर था। प्रेमचंद में लोक कथा का ताना बाना दिखाई देता था, जबकि मार्कण्डेय में संभावित विचार की विभिन्न तहों पर बल था। जब मार्कण्डेय के पात्र अपने संवाद बोलते थे तो वे अपनी स्थिति के प्रति पूरी तरह सावधान नजर आते थे। इस आयाम को संभव बनाने के लिए मार्कण्डेय अनुभव की प्रस्तुति का रेखांकन करते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि पात्र अपने व्यक्तित्व की संपूर्णता में उपस्थित हों। इस प्रक्रिया में लेखकीय रवैया और वैचारिक आग्रह पीछे छूट जाता था और पात्रों के अनुभव का निखार उजागर हो उठता था। मार्कण्डेय ने इसे अपनी कहानियों की विशिष्टता कहा और उन्हें नई कहानी आंदोलन की वैचारिक पहचान बतला कर पेश किया। यह सचेत रणनीति थी और मार्कण्डेय ने इसे पचास और साठ के दशकों के सांस्कृतिक माहौल से जोड़ कर देखा।

इस कथाकार ने कुछ दूसरी सूक्ष्म स्थितियों को भी अपनी रचना में स्थान दिया। बल्कि कहा जा सकता है कि मार्कण्डेय के नारी पात्रों में भावना की प्रबलता और साहसिकता पर अतिरिक्त जोर मिलता है। नारी पात्रों को उनकी कहानियों में जो प्रेरक तत्व हासिल है उसके सामने अनेक पुरुष पात्र फीके जान पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि कई बार लेखक अपने नारी पात्र को कलात्मक सूक्ष्मता और सांकेतिकता से समृद्ध करता है। उनकी ‘माही’ शीर्षक कहानी को इसकी मिसाल कहा जा सकता है। इसी तरह उनकी अन्य कहानी ‘सूर्या’’ में यौन भावना का उद्वेग सामाजिक आचरण के नियमों को चुनौती देता प्रतीत होता है। इसी श्रेणी की अन्यतम कहानी ‘प्रिया सैनी’ है जहां एक कलाकार नारी-पात्र के नजरिये से मध्यवर्गीय मानसिकता और वैचारिक सीमा को गहरे ढंग से परिभाषित किया गया है।

फिर भी, ग्रामीण जीवन की कथा ही इस लेखक के सरोकारों का केंद्र रही है। उनकी चर्चित कहानी ‘बीच के लोग’ में पुरानी पीढ़ी और युवा पीढ़ी के बीच का अंतराल स्पष्ट देखा जा सकता है। क्या गांव में विद्यमान अंतर्विरोधों का हल सर्वस्वीकृत आम सहमति और सुधारवाद है, मसलन गांधीवाद जिसके तहत शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं, या फिर उस प्रसंग में शोषण से लड़ने के लिए नया संघर्षशील नजरिया अख्तियार करना आवश्यक है? ‘बीच के लोग’ कहानी का यह कथ्य सहसा सत्तर के दशक का प्रतिनिधि सच बन कर उभरता है। इसी आयाम को बाद में मार्कण्डेय ने अपने महत्वपूर्ण उपन्यास ‘अग्निबीज’ में भी विस्तृत फलक पर उभारने का गंभीर प्रयास किया।

मार्कण्डेय की कथा आलोचना से संबंधित पुस्तक ‘कहानी की बात’ का अलग से जिक्र करना जरूरी है। इसके अधिकतर निबंध भैरव प्रसाद गुप्त द्वारा संपादित पत्रिका ‘नई कहानियां’ में प्रकाशित हुए थे। यद्यपि इन निबंधों का चयन स्वयं मार्कण्डेय करते थे, लेकिन कई अवसरों पर भैरव के सुझावों से लाभ मिलने पर मार्कण्डेय के तर्कों का महत्व बढ़ जाता था। संभवतः यह भैरव के व्यक्तित्व का प्रभाव था कि मार्कण्डेय ने निजी प्रकरणों को बहस के दायरे से बाहर रखा और इस तरह विचार पक्षों और तर्कों को वस्तुपरक दिशा में बढ़ाया। यह निश्चित योजना के अधीन होता था और पत्रिका में व्यक्तिवादी मूल्यों तथा जीवनगत बूज्र्वा प्राथमिकताओं को अनावश्यक स्थान न मिलता था। भैरव का संपादकीय अनुशासन रचनाशीलता और आलोचना को बिखरने से बचाता था। इस संपादकीय व्यवहार की मूल्यवत्ता तब स्पष्ट हुई जब क्षुद्र हितों से परिचालित कुछ लेखकों ने भैरव को ‘नई कहानियां’ के संपादकत्व से हटाने की छद्म मुहिम चलाई। नये माहौल में ‘हमदमों’ और ‘दोस्तों’ की एकाएक बन आई और परिणामतः एक जीवंत पत्रिका धीरे धीरे अपनी विचार समर्थक नीति से स्खलित हो गई। द्रष्टव्य है कि भैरव के पत्रिका से हटने पर अचानक मार्कण्डेय का लेखन कम हो गया और उनकी विचार सामग्री पर तो जैसे रोक ही लग गई। फिर भी मार्कण्डेय का कहानी लेखन अभियान जारी रहा और संकलनों तथा छिटपुट पत्रिकाओं के माध्यम से उनकी रचनाएं पाठकों को कुछ अंतराल से ही सही, लेकिन उपलब्ध होती रहीं।

सत्तर का दशक आया तो मार्कण्डेय को स्वतंत्र पत्रिका निकालने की जरूरत महसूस हुई। इस बड़े साइज़ के पन्नों में छपी पत्रिका को मार्कण्डेय ने ‘कथा’ के नाम से निकाला। इसका रूप भी पहले की अधिकतर पत्रिकाओं से भिन्न था। कथा में रचनाएं अवश्य छपती थीं, लेकिन वह मुख्यतः विचार की पत्रिका थी। फिर, इन विचारों का दायरा सांस्कृतिक मसलों तक सीमित न था, बल्कि वहां राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर भी भरपूर सामग्री दी जाती थी। ‘कथा’ के कुछ अंकों में बी0 टी0 रणदिवे जैसे राजनीतिक नेताओं-विचारकों के लेख ही नहीं प्रकाशित हुए बल्कि वैचारिक टकराहट के नजरिये से मसलन गुरु गोलवलकर के विचार भी दिये गए। इसी तरह नव लेखन पर विभिन्न आलोचकों से अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने को कहा गया। ‘कथा’ के सामग्री चयन में मार्कण्डेय ने किसी संकुचित राजनीतिक आग्रह को स्थान न देकर विमर्श को तरजीह दी। अब भी किंचित बदले आकार में ‘कथा’ के अंक प्रकाशित होते हैं और इस पत्रिका का हर अंक हिंदी समाज के सामने उपलब्धि की भांति स्वीकार किया जाता है। पिछले ही दिनों ‘कथा’ का नया अंक आया है और उसे पाठक वर्ग की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। इसी तरह पत्रिका के कुछ समय पहले छपे अंक में मार्कण्डेय ने हिंदी लेखकों से आग्रहपूर्वक माक्र्सवादी आलोचक ओम प्रकाश ग्रेवाल पर लिखने को कहा, ताकि पाठक को साहित्य चिंतन के वैकल्पिक परिप्रेक्ष्य से अवगत कराया जा सके। ऐसा संपादकीय विवेक समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता में दुर्लभ है।

मार्कण्डेय के आयोजकीय योगदान पर प्रायः ध्यान नहीं दिया गया है। कम लोग परिचित हैं कि कई महत्वपूर्ण साहित्यिक सम्मेलनों का आयोजन मार्कण्डेय ने किया। इनमें प्रमुख सन 1974 का इलाहाबाद लेखक सम्मेलन है जिसमें लगभग दो सौ लेखकों ने शिरकत की थी। इस सम्मेलन में महादेवी वर्मा, यशपाल, सुमित्रानंदन पंत, हरिशंकर परसाई के साथ साथ भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत, शेखर जोशी, विजयदेव नारायण साही, जगदीश गुप्त, गिरिराज किशोर के साथ साथ इसराइल, चंद्रभूषण तिवारी, सतीश जमाली, दूधनाथ सिंह, श्रीराम तिवारी और अनेक युवा लेखकों ने हिस्सा लिया था। इन लेखकों की सक्रियता और भागीदारी से उस समय जो माहौल बना उससे तत्कालीन रचना में उत्साह और आवेग का अनोखा संचार हुआ। ‘जनवादी लेखक संघ’ की स्थापना में भी मार्कण्डेय की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

मार्कण्डेय योजनाओं के मास्टर कहे जाते हैं। उनके पास हर समय कोई न कोई नया विचार होता है जिसे अंजाम देने में उनका मस्तिष्क सदा सक्रिय रहता था। इस बार उनसे मिलने पर पता चला कि दूसरी भाषाओं में हिंदी रचनाओं का अनुवाद किया जाना कितना जरूरी है। यह कुछ समय पहले सोचे गए कार्यक्रम की अगली कड़ी थी जब उन्होंने एक प्रकाशक को लगभग तैयार कर लिया था कि हिंदी ग्रंथों की एक बड़ी सीरीज हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी में भी प्रकाशित की जाएगी। इन दिनों वह ‘कथा’ के अगले अंक की तैयारी में जुटे हैं और पूरी तरह आश्वस्त हैं कि जल्द ही सुनिश्चित-सुनियोजित सामग्री के साथ पत्रिका का नया अंक पाठकों को मिलेगा।


आनंद प्रकाश, बी-4@ 3079, वसंत कुंज, नयी दिल्ली - 110 070 दूरभाषः 26896203

Thursday, December 31, 2009

राजेन्द्र अवस्थी – एक जाँबाज़ साहित्यकार


मध्य प्रदेश के गढा जबलपुर में 25 जनवरी, 1930 को जन्मे श्री राजेन्द्र अवस्थी नवभारत, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के संपादक रहे। उन्होंने कई चर्चित उपन्यासों, कहानियों एवं कविताओं की रचना की। वह ऑथर गिल्ड आफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी ने उन्हें 1997-98 में साहित्यिक कृति से सम्मानित किया था। 30 दिसम्बर की सुबह लगभग 9:30 बजे दिल्ली के एस्कार्ट हॉस्पिटल में राजेन्द्र अवस्थी का देहांत हो गया।

उनके उपन्यासों में सूरज किरण की छांव, जंगल के फूल, जाने कितनी आंखें, बीमार शहर, अकेली आवाज और मछलीबाजार शामिल हैं। मकड़ी के जाले, दो जोड़ी आंखें, मेरी प्रिय कहानियां और उतरते ज्वार की सीपियां, एक औरत से इंटरव्यू और दोस्तों की दुनिया उनके कविता संग्रह हैं जबकि उन्होंने ‘जंगल से शहर तक’ नाम से यात्रा वृतांत भी लिखा है।
घर में कम्बल ओढ़ कर दूरदर्शन पर पूरे उत्तरी भारत में शीत लहर के दृश्य देखते देखते और खबरें सुनते सुनते अचानक पर्दे पर नीचे कहीं लिखित समाचारों में एक दुखद समाचार. मन एक सदमे की चपेट में आ जाता है. राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे. सारिका, नंदन, कादम्बिनी और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं के लोकप्रिय संपादक राजेंद्र अवस्थी के जाने की खबर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था. स्मृति बहुत पीछे, सन 87 के आसपास चली जाती है. हिंदी के एक अन्य सशक्त हस्ताक्षर स्व. मणि मधुकर मेरे परम मित्र थे और वे अचानक फोन करते हैं कि तुम्हारी कहानी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी है. हमेशा की तरह मुझे प्रसन्नता तो होती है लेकिन मैं मधुकर जी से कहता हूँ कि राजेंद्र अवस्थी के संपादन काल में साप्ताहिक में छपी यह मेरी पहली कहानी है. मधुकर कहते हैं कि आज शाम को आना मेरे यहाँ, तुम्हें सीधे राजेंद्र अवस्थी के पास ले जाऊंगा. मैंने भी उन से यही कहा कि दिल्ली की सभी गण-मान्य साहित्यिक हस्तियों से मैं मिल चुका हूँ, पर राजेंद्र अवस्थी को कुछ कार्यक्रमों में देख कर भी बढ़ कर उन से परिचय लेने में संकोच सा हुआ है. मधुकर पूछते हैं – ‘ऐसा क्यों? आप तो उत्साही व्यक्ति हैं, सब से मिल लेते हैं’. मैं उन्हें दिल की बात बताता हूँ कि राजेंद्र जी देखने में मुझे कुछ आला शख्सियत से लगते हैं, सो यह संकोच. फिर मैंने उन्हें बताया कि शीला गुजराल की संस्था ‘लेखिका’ के एक कार्यक्रम में दिल्ली और बाहर के तमाम बड़े बड़े साहितयकर आए थे, उनमें अमृता प्रीतम भी थी, जैनेन्द्र भी. अमृता के भाषण के बाद मैंने देखा कि जो साहित्यकार माइक पर आए, वे हैं राजेंद्र अवस्थी. खासे handsome हैं. बहुत प्रभावशाली तरीके से बात करते हैं. बल्कि उनसे पहले अमृता प्रीतम ने महिलाओं के प्रति खासी सहानुभूति जताई थी कि महिलाऐं लेखक बनना चाहें तो समाज उस में रोड़े अटकाता है. उन्होंने जापान और अन्य देशों की कुछ उभरती लेखिकाओं की आत्महत्याओं का ज़िक्र किया. तब राजेंद्र अवस्थी ने बड़े हंसमुख और चुटीले तरीके से अमृता जी की बात पर चुटकी भी ली कि अमृता जी ने तो हमारे सामने आत्महत्याओं की एक अच्छी भली Directory भी रख दी. मुझे लगा कि बात को हंसमुख तरीके से कहना हो तो कोई उन से सीखे, क्यों कि अमृता जी द्वारा बताए दुखद प्रसंगों से जहाँ एक और वातावरण बोझिल सा हो उठा, वहीं राजेंद्र जी ने सब को हंसा कर मन को हल्का भी कर दिया. खूब handsome और प्रभावशाली हैं वे. मेरा संकोची मन आगे बढ़ कर उन्हें अपना परिचय नहीं दे पाता.

शाम को इसीलिए तैयार हो कर मधुकर जी के घर चला जाता हूँ, इसी उत्साह के साथ कि वे मुझे राजेंद्र जी से मिलवाएंगे. मैं उन्हें बताऊंगा कि मैंने आप का उपन्यास ‘सूरज किरण की छांव में पढ़ा है...’. मधुकर जी परिवार समेत अपनी कार में मुझे भी ले चलते हैं. चीनी दूतावास में एक पार्टी है. वो रहे राजेंद्र जी. एक सोफे पर बड़े हलके मन हो बैठे हैं. मधुकर जी मेरा हाथ खींच कर ठीक उनके सामने खड़ा कर देते हैं – ‘ये हैं आप के कहानीकार, प्रेमचंद सहजवाला. कहते हैं, सीधे बात करने में संकोच हो रहा है, वह भी आप से’! राजेंद्र जी मुस्कराते हैं. उन की मुस्कराहट में एक अजब प्रोत्साहन सा है. पर वे कहते हैं- ‘मैं ने आप की कहानियां ‘कहानी’ में भी पढ़ी हैं और ‘सारिका’ ‘धर्मयुग’ में भी. पर जो कहानी आपने मुझे भेजी और आज छपी है, वह उन दूसरी कहानियों की तुलना में पीछे लगी. और बेहतर लिख सकते थे’. मुझे अचरज भी है और अविश्वास भी कि इन्होने क्या मेरी कहानियां पढ़ी होंगी? पर अचरज इस बात पर भी कि ये झूठा प्रोत्साहन नहीं दे रहे. जैसा इन्हें लग रहा है, वैसे कह रहे हैं. मैं संकुचित सा उन्हें कहता हूँ – ‘संभवतः इस कहानी में मैं इतनी जान नहीं डाल सका, जितनी डालने चाहिए थी’. पर राजेंद्र जी कह रहे हैं – ‘आप की कहानी अगर कमज़ोर होती, तो क्या मैं उसे छापता? वह छापने योग्य थी. पर मुझे लगा कि उस पर आप और मेहनत कर सकते थे’. मैं प्रभावित था, इतना बेबाक मार्ग दर्शन, क्या कोई संपादक इतना ध्यान अपने कहानीकारों पर् दे सकता है?...

...और आज उनके निधन की खबर पर अचानक वही, बरसों पुराना चेहरा सामने आ गया. चंद श्रद्धांजलि भरे शब्द लिखने बैठा तो कई साहित्यकार मित्रों से फोन पर पूछने लगा- ‘उन के बारे में क्या कहना है आप को? ‘जंगल के फूल’ जैसे सशक्त उपन्यासकार के बारे में आप के क्या अनुभव हैं’? तब लक्ष्मीशंकर बाजपेयी अल्मोड़ा की किसी लेखिका दिवा भट्ट का सन्दर्भ देते हैं. वे कहते हैं कि एक बार जब वे अल्मोड़ा गए तो किसी प्राध्यापिका दिवा भट्ट ने उन्हें अपनी कहानी पढ़ कर सुनाई. बाजपेयी जी को कहानी अच्छी लगी. उन्होंने दिवा जी को सुझाव दिया कि वे वह कहानी राजेंद्र अवस्थी जी के पास, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशनार्थ भेज दें. दिवा जी भी संकुचित थी – ‘क्या ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ वाले मेरी कहानी छाप देंगे’? बाजपेयी साहस बढ़ाते हैं – ‘ अच्छी लगेगी तो क्यों नहीं छापेंगे? भेज कर देखो’. और दिवा जी वह कहानी छप जाती हैं. बाजपेयी जी का कहना है कि किसी भी नए से नए लेखक की कहानी में अगर दम है, तो अवस्थी जी उसे कभी उपेक्षित नहीं करते थे. राजेंद्र जी से लगभग दो दशक के परिचय के आधार पर बाजपेयी जी का कहना है कि वे बहुत ही सुलझे हुए और खुशहाल सी तबियत वाले व्यक्ति थे.

"वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे"
--अशोक चक्रधर
हिंदी के प्रसिद्ध कवि कथाकार डॉ. वीरेंद्र सक्सेना ने फोन पर बताया कि राजेंद्र जी के साथ उन्होंने कई यात्राएं की व कई कार्यक्रमों में उन के साथ गए. राजेंद्र जी मित्रों के प्रति सच्चा स्नेह रखते थे और खुद उन के निवास पर भी कई बार उनके जन्म दिवस या अन्य अवसरों पर गए . राहुल सांकृत्यायन की जन्मशताब्दी के अवसर पर भी वे देहरादून उनके साथ गए. जनवरी 1930 में मध्यप्रदेश में जन्मे राजेंद्र अवस्थी ने कई कहानियां, उपन्यास व यात्रा-वृतांत लिखे व अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त किये. इस के अतिरिक्त बहुत सशक्त बाल-साहित्य भी लिखा. वीरेंद्र सक्सेना ने कहा कि वे प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था Authors Guild of India के संस्थापक रहे तथा आजीवन महासचिव भी, इसी नाते देश की हर भाषा के साहित्यकारों से उनके निजी स्तर पर सामीप्य रहा.

वीरेंद्र सक्सेना के बाद मैंने फोन मिलाया अशोक चक्रधर का. अशोक चक्रधर प्रायः बेहद व्यस्त रहते हैं पर राजेंद्र अवस्थी के विषय में पूछे जाने उन्होंने बहुत सहजता से इस लोकप्रिय हिंदी-सेवी के विषय में काफी बातें कहीं. उन्होंने बताया कि राजेंद्र जी से उनका परिचय लगभग चार दशक का रहा. वे (राजेन्द्र जी) पत्रिकारिता के प्राध्यापक थे और दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कक्षाएं लेने आते थे. वहीं उनकी भेंट राजेंद्र जी से हुई. एक व्यक्ति के तौर पर वे बेहद जिंदादिल इंसान थे वे. कुछ भारी मन से अशोक जी ने कहा कि अब उन की कमी भला कौन पूरी कर सकेगा? मित्रों के साथ ‘कॉफी हाउस’ या ‘टी हाउस’ में बैठ कर ठहाके लगाना उनकी फितरत थी. उनका जीने का भी अपना अंदाज़ था और बात करने का भी. अशोक चक्रधर ‘कादम्बिनी’ में अक्सर उनके कालम ‘काल चिंतन’ पढ़ कर प्रभावित रहते थे. उनका कहना था कि वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे.

राजेंद्र जी के एक अन्य करीबी साहित्यकार गंगाप्रसाद विमल ने बताया कि राजेंद्र जी प्रभावशाली साहित्यकार, पत्रकार व चिन्तक थे. उनका कॉलम ‘काल चिंतन’ जो पुस्तक रूप में भी है, बेहद सशक्त माना जाता था. उन्होंने आदिवासियों के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘जंगल के फूल’ लिखा तथा इस के अलावा ‘मछली घर’, ‘भंगी दरवाज़ा’ व आदिवासियों के जीवन पर आधारित कहानी ‘लमसेना’ जैसी यादगार कृतियाँ लिखी. उनकी कई रचनाएं चेक, रूसी व अन्य विदेशी भाषाओँ में अनुवादित हुई.

‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ से जुड़ी हिंदी की साहित्यकार अर्चना त्रिपाठी ने बताया कि राजेंद्र जी से उनका संपर्क भी लगभग 25-30 वर्ष रहा. वे उन्हें सदा Authors Guild of India की सदस्या बनने को प्रेरित करते रहे. पर अर्चना जी ने बताया कि जीवन के अंतिम वर्षों तक आते आते उन्हें स्वस्थ्य के मोर्चे पर खूब संघर्ष करना पड़ा. दुर्भाग्य से उनकी स्मरण शक्ति भी कम हो गई.. वे अमरीका के दौरे पर उनके साथ गई थी पर जब उन्होंने किसी होटल से राजेंद्र जी को सूचित किया कि वे अमुक होटल में ठहरी हैं, तब राजेंद्र जी ने उनसे पूछा कि आप अमरीका कब से आ गई है. क्षण भर को वे भूल गए थे कि अर्चना जी भारत से ही उनके साथ ही इस दौरे पर गई हैं. स्वास्थ्य की चुनौतियां उन्हें सचमुच पराजित कर पाई, इस में मुझे संदेह है. मैंने लगभग दो वर्ष पहले, एक लंबे अरसे बाद उन्हें दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर प्रगति मैदान के एक सभागार में Authors Guild of India की एक विचार गोष्ठी में देखा तो यह भले ही महसूस हुआ कि उनका शरीर अब काफी दुर्बल हो चला है. पर मंच पर खड़े हो कर जिस तरीके से वे मुस्कराते नज़र आए, उस से वही, बहुत पहले वाला handsome सा चेहरा एक बार फिर मेरी कल्पना में आ गया. शायद सक्रिय और हंसमुख लोग बुज़ुर्ग होने पर तन से ही शिथिल लगते होंगे, मन से नहीं. उस विचार गोष्ठी के समापन पर भी शायद वे थके न थे, इसलिए अचानक घोषणा हुई कि थोड़े अंतराल के बाद कवि गोष्ठी भी होगी. राजेंद्र जी मुस्कराते हुए उतने ही तत्पर लगे, हालांकि अधिकतर लोगों के पुस्तक मेले में चले जाने के कारण उपस्थिति बहुत कम रही, सो कवि गोष्ठी नहीं हो पाई, पर उनके निधन से पूर्व इस जिंदादिल साहित्यकार से वह मेरी अंतिम भेंट थी. मैंने करीब जा कर उन्हें नमस्कार किया और अपना परिचय दिया तो उसी, पुरानी आत्मीयता से वे मुस्कराए और पूछा – ‘कहो कैसे हो? कहाँ हो आजकल? मैंने बताया कि मौसम विभाग वाली नौकरी से सेवानिवृत्त हो कर अब स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. मेरे चेहरे पर अभी तक सक्रियता और उत्साह के लक्षण देख कर उनके चेहरे पर जो उत्साह-वर्धक मुस्कराहट आई, वही उनका मुझे दिया हुआ अंतिम, अनमोल तोहफा था. इस जांबाज़ साहित्यकार को मेरा सलाम!

-प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, November 17, 2009

रामकृष्ण पाण्डेय- आंदोलनों में अपनी भूमिका तलाशने वाला पत्रकार

हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार और कवि रामकृष्ण पांडेय का सोमवार शाम निधन हो गया। न्यूज एजेंसी यूएनआई से रिटायर हुए रामकृष्ण पाण्डेय लम्बे समय से मधुमेह से पीड़ित थे। सोमवार, 16 नवम्बर को इनकी तबियत अचानक खराब हो गई जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनका देहान्त हो गया। आज शाम उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इनके परिवार में इनकी पत्नि के अलावा इनकी दो बेटियाँ भी हैं।

कम्यूनिस्ट आंदोलन से जुड़े रामकृष्ण पाण्डेय को इनके कुछ करीबी और जानकार कुछ यूँ करते हैं। हम इस माध्यम से हिन्द-युग्म की ओर से श्रद्धाँजलि दे रहे हैं।


वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे

सुबह रंजित वर्मा से रामकृष्ण पाण्डेय की मृत्यु का समाचार सुनकर एकबारगी यकीन नहीं हुआ की हर हफ्ते हँसते-मुस्कराते मिलाने वाले पाण्डेय जी इतनी जल्दी धोखा दे जायेंगे। वे हमारे बीच एक अपरिहार्य उपस्थिति थे। हाल में ही उन्होंने यूएनआई में अपनी दूसरी पारी शुरू की थी और अपनी कई किताबों के प्रकाशन की योजनाएँ बना रहे थे। पाण्डेय जी से मेरा परिचय दस साल पहले हुआ था। वे जल्दी ही आत्मीय हो गए। काफी दिनों बाद उन्होंने अपना संकलन भी दिया। मिलना-
एक प्रतिबद्ध पत्रकार थे

रामकृष्ण पाण्डेय एक वरिष्ठ पत्रकार थे, कवि भी थे। वे इतने सज्जन थे कि किसी भी बात के लिए मना नहीं करते थे। हमेशा जन के लिए प्रतिबद्ध पत्रकार की तरह लगे रहे। वे इस वय में भी लगातार काम करते रहे, अपनी अस्वस्थता की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हालाँकि मेरा कभी उनसे बहुत व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा, लेकिन प्रोफेशनल सम्बंध ज़रूर रहा। मैंने जब कभी भी उन्हें समयांतर के लिए लिखने के लिए कहा, उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावज़ूद लिखा। अक्टूबर 2009 अंक में भी उनकी लिखी एक समीक्षा छपी है। उन्होंने कभी भी अपनी पीड़ा, अपनी बीमारी का प्रचार नहीं किया। कल जब उनकी मृत्यु का समाचार मिला तो पता चला कि वे पिछले 1 सप्ताह से गंभीर रूप से बीमार थे। यूएनआई के अलावा उन्होंने लघुपत्रिकाओं में प्रतिबद्ध किस्म का लेखन किया। इनके लेखों और कविताओं में समाज की चिंताएँ रिफ्लैक्ट होती हैं। इनका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित है। एक और तैयार है। आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न नहीं थे, इसके बावज़ूद भी वे जन संघर्ष और मानवीय पीड़ा की कलम बनते रहे।

--पंकज बिष्ट, संपादक- समयांतर
जुलना बाद में कम हो गया था लेकिन समयांतर में लगातार अपनी टिप्पणियों और लेखों से उन्होंने न केवल ध्यान खिंचा बल्कि समकालीन प्रश्नों पर बेहद सादे ढंग से लिखा। पिछले साल रंजित, कुमार मुकुल, अजय प्रकाश, पाण्डेय जी आदि ने मंडी हाउस में नियमित मिलने और रचना पाठ का एक कार्यक्रम शुरू किया जिसमे मैं भी शामिल हो गया, हालाँकि कुछ मित्रों ने निहित स्वार्थों के लिए तोड़फोड़ करने और हूट करने की कोशिश की लेकिन यह आयोजन लगातार चलता रहा। पाण्डेय जी अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण गोष्ठी के अनिवार्य हिस्सा थे। सही मायने में वे साहित्य के गंभीर अध्येता थे और समकालीनता बोध से भरे पूरे थे। कविता के नए सौंदर्य,सवाल,भाषा और चुनौतियों के प्रति वे निरंतर सचेत थे और नए से नए कवियों को लगातार पढ़ते थे। आनंद प्रकाश जी की तरह पाण्डेय जी नयी पीढ़ी में अपने समकालीन धुन्ध्ते इ अपनी जगह थे। स्वयं पाण्डेय जी हिंदी साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा से पूरी तरह उपेक्षित थे लेकिन इसकी उन्हें परवाह ही कहाँ थी। वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे और लगातार अपनी टिप्पणियों से उसमें भागीदार भी होते। पांडेय जी इस मामले में बेहद संकोची थे कि कोई उन्हें साहित्यकार माने ही। इसी झोंक में वे अपनी जगह ब्रेख्त या किसी और कवी की कविता सुनाने लगते। यह आज के आत्ममुग्ध लोगों की दुनिया में दुर्लभ बात है। शायद यह खूबी अपने दौर में एक गंभीर सांस्कृतिक कर्म के प्रति इमानदार सरोकारों से ही पैदा होती होती है। उनका जाना हमारे एक जरूरी दोस्त का जाना है लेकिन वे हमारी भावनाओं और संवेदना में हमेशा मौजूद रहेंगे।

--रामजी यादव, युवा कवि, सहसंपादक- पुस्तक वार्ता


पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे

रामकृष्ण का बहुत लम्बा कैरियर रहा। पटना में जन्मे, वहीं से इनके कैरियर की शुरूआत हुई। पटना से जेएनयू आ गये।
बहुत अधिक परिचित नहीं था। हालाँकि उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व से लगातार प्रभावित ज़रूर रहा। उनके पत्रकारी कैरियर में कोई कंट्रोवर्सी नहीं रही, वे पूरी तरह बेदाग रहे। यही क्या कम बड़ी उपलब्धि है!

--विमल झा, फीचर संपादक, दैनिक भास्कर
कविताएँ लिखते रहे। पाण्डेय जी मूल रूप से कवि ही थे, लेकिन चूँकि बाद में पत्रकारिता से भी जुड़ गये,इसलिए एक लम्बा कैरियर पत्रकारीय भी रहा। पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे। उनकी कविताएँ प्रमुख रूप से नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित कविता संग्रह में प्रकाशित हुई, जिसमें इनके अलावा उदय प्रकाश और अरुण कमल की कविताएँ भी संकलित थीं। इनकी समझ बहुत ही अच्छी थी। मार्क्सवादी नज़रिया रखते थे। कविताओं की साफ समझ रखते थे। गोष्ठियों में जब किसी कविता पर अपने विचार देते थे तो कुछ न कुछ नया दृष्टिकोण लेकर उपस्तित होते थे। नई बात खोज ही लेते थे। युवा कवियों के बीच भी काफी लोकप्रिय थे। हालाँकि उनकी रचनाएँ समकालीनता से पूरी तरह लैश थीं, फिर भी उन्हें हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे। यह पूरे हिन्दी साहित्य के लिए चिंता की बात है।

--रंजीत वर्मा, कवि-लेखक

Friday, November 06, 2009

प्रभाष जोशी- एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया (श्रद्धाँजलि)

श्रद्धांजलि - प्रेमचंद सहजवाला

जीवनवृत्त
प्रभाष जोशी (जन्म- 15 जुलाई 1936, निधन- 05 नवम्बर 2009) हिन्दी पत्रकारिता के एक स्तंभ थे। ये हिंदी दैनिक 'जनसत्ता' के सम्पादक रह चुके हैं और सम्प्रति 'तहलका हिंदी' के लिये लिखते थे।

इंदौर (म॰प्र॰) में जन्मे प्रभाष जोशी ने 'नई दुनिया' के साथ अपने पत्रकारिता-कैरियर की शुरूआत की। नवंबर 1983 में वे जनसत्ता से जुड़े और इस अखबार के संस्थापक संपादक बने। नवंबर 1995 तक वे अखबार के प्रधान संपादक रहे लेकिन उसके बाद से अबतक वे जनसत्ता के सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े रहे। उन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीयता को लगातार पुष्ट किया। वैचारिक प्रतिबद्धता का जहाँ तक सवाल है तो उन्होंने सत्य को सबसे बड़ा विचार माना. इसलिए वे संघ और वामपंथ पर समय-समय पर प्रहार करते रहे।

प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबार बनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया. इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।

अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। अभी भी जनसत्ता में हर रविवार उनका कॉलम कागद-कारे छपता था। हाल में ही इन्होंने 'तहलका-हिन्दी' में 'औघट-घाट' नाम से स्तम्भ लिखना शुरू किया था।

ऊषा से प्रभाष जोशी का विवाह हुआ, जिससे इन्हें 2 बेट संदीप और सोपान तथा एक बेटी सोनल हुए। सोपान जोशी पर्यावरण की प्रसिद्ध पत्रिका 'डाऊन-टू-अर्थ' के प्रबंध संपादक हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान- हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल 2007-08 का शलाका सम्मान।
विकिपीडिया से साभार
आज की सुबह सचमुच मेरे लिए एक दुखद समाचार लाई. दिन बहुत सामान्य तरीक़े से शुरू हुआ कि मोबाइल पर एक सन्देश आया, जिसे पढ़ कर हृदय को बहुत गहरा धक्का पहुंचा. सन्देश सुनीता शानू ने भेजा था - 'प्रभास जोशी जी नहीं रहे. आज का दिन बहुत दुखद है'. मैं इस खबर पर विश्वास करने को तैयार नहीं हूँ, इस लिए दो चार फ़ोन खड़खड़ा देता हूँ, पर सब के सब दोस्त मुझ पर कितना अत्याचार कर रहे हैं, कह रहे हैं 'हाँ, प्रभास जोशी नहीं रहे'!

हिंदी पत्रकारिता के महास्तंभ, 73 वर्षीय प्रभास जोशी जैसे पावन हृदय व्यक्ति बहुत कम मिलेंगे. 'जनसत्ता' समाचार पत्र को अख़बार जगत में चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने वाली एक शख्सियत के रूप में मैं उन के नाम से पहले ही परिचित था. पर इस रूप में तो उनका परिचय जग-प्रसिद्ध रहा. इतना जान कर मैंने कौन से तीर मार लिए. पर क्या मैं खुद कभी उनके निकट खड़ा या बैठा भी था? ऐसा सौभाग्य भला मेरा कहाँ? पर हाँ, एक दिन वह शुभ घड़ी भी आ गई, जब दूरदर्शन के NDTV चैनल के स्टूडियो में मैं प्रभास जोशी के बहुत निकट बैठा था. यह पहली बार था कि ज्यों ही वे आए, मुझे उठ कर उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिला. NDTV स्टूडियो में शूटिंग थी साप्ताहिक कार्यक्रम 'हम लोग' की, और उस में प्रभास जी व्यस्तता के कारण कुछ देर से आए थे. उन के आते ही मैं उत्तेजित सा था कि जिस महान शख्सियत की पवित्र छवि मैं मन में कई वर्षों से समेटे हूँ, वह महान शख्सियत अब स्टूडियो की इन सीढ़ियों पर मेरे सामने, वहां, केवल तीन चार कदम ही दूर बैठेगी. कितनी बढ़िया जिंदगी है मेरी. मैं ने जब कैमरा की परवाह किये बिना उठ कर उन के चरण स्पर्श किये, तो जो सौम्यता व आर्शीवाद के भाव उन के चेहरे पर आए, उन का वर्णन सचमुच मुश्किल है. मैं एक कहानीकार भी हूँ, सो उस गहराई, विद्वता और बड़प्पन से भरे चेहरे का चरित्र-चित्रांकन करने की चेष्टा करने लगा. कुछ वर्ष सोचता रहा, कि आखिर क्या भिन्न था, अन्य बड़े लोगों में और प्रभास जी में? यह बात जा कर मुझे तब समझ आई, जब इस वर्ष मैं 'हिंदी अकादमी' के एक कार्यक्रम में गया. 'हिंदी अकादमी' ने महात्मा गाँधी की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' व 'सत्य के प्रयोग' को प्रकाशित कर के 18 अगस्त 2009 को दिल्ली की मुख्य-मंत्री शीला दीक्षित द्वारा उन के लोकार्पण का कार्यक्रम रखा था. दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में मैं अपना कैमरा ले कर प्रविष्ट होता हूँ. अभी शीला जी का तो इंतज़ार है, हाल भी अभी आधा भरा है, पर दर्शक-गण में सब से पहली पंक्ति में वो... अपने प्रभास जी ही तो बैठे हैं! मैं तेज़-तेज़ कदम बढ़ाता हुआ वहीं पहुँचता हूँ और एक मौका और, उन के चरण स्पर्श करने का! 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' की निदेशक डॉ. वर्षा दास के साथ बैठे प्रभास जी से मैं कहता हूँ - 'मैं NDTV में आप के साथ ही था'! और वे यह कह कर मुझे चकित कर देते हैं - 'याद आ गया!'. मैं उन्हें कहता हूँ - 'उस दिन NDTV के 'हम लोग' कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा थी कि दूरदर्शन ग्लैमर का शिकार होता जा रहा है. केवल अभिनेता, क्रिकेटर और नेता ही दूरदर्शन पर छाए रहते हैं'. प्रभास जी मुस्कराते हैं, बहुत ही आत्मीयता भरी और प्रोत्साहन भरी मुस्कराहट. अपनी साहित्य व पत्रकारिता यात्रा में मैं हर किस्म के लोगों से मिला हूँ. कुछ ऐसे भी, जो एक कहानी छपते ही रातों-रात ओ. हेनरी या तोल्स्तॉय हो जाते हैं और कुछ ऐसे, जैसे प्रभास जी, जो छोटों से बात करें तो लगे, साहित्य से जुडे सभी लोग एक ही परिवार के तो हैं. 'हम लोग' कार्यक्रम में प्रभास जी दूरदर्शन मीडिया को लताड़ रहे हैं. कह रहे हैं- 'देश में कितने लोग भूखों मरते हैं, यह कोई खबर नहीं. पर अभिनेता मंदिरों में घूम रहे हैं, यह बड़ी खबर है'. स्टूडियो में ठहाका बिखेरते हुए प्रभास जी कार्यक्रम संचालक पंकज पचौरी से कह रहे हैं - 'आप के लिए कैटरिना कैफ बड़ी खबर है, पर सूखे में मर रहे लोग खबर नहीं हैं... बस नेता... अभिनेता...खिलाड़ी, इन तीनों के बीच ही तो झूलता है दूरदर्शन'...

प्रेमचंद सहजवाला प्रभास जोशी के साथ
...पहले देश की जनता सुबह होने का इंतज़ार करती थी कि अख़बार आए तो खबरें पढ़ें. दिन आधा बीते तो 'सांध्य टाईम्स' या 'evening news ' आ जाता था. कुछ शौकीन लोग आकाशवाणी पर हर घंटे 'पिप पिप पिप...' की ध्वनि बजते ही अशोक वाजपेयी या देवकी नंदन पांडे की कठोर आवाज़ों में समाचार सुनने बैठ जाते थे. पर जब से 'पल पल की खबर' देने वाले, या 'सब से तेज़' जैसे चैनल आए हैं, देश की सूरत ही बदल गई. खबरें घटती बाद में हैं, अचानक दूरदर्शन पर आ पहले ही जाती हैं शायद, कभी कभी तो मुझे ऐसा ही लगता है. किसी खबर को कई गुना सनसनीखेज़ बनाने की कला में माहिर चैनलों ने देश के आम आदमी को बहुत उत्तेजित सा कर दिया. मुझे एक रोचक प्रसंग याद आ रहा है, जब दिल्ली के गंगाराम हस्पताल के कमरा नं. 214 में प्रियंका गाँधी दाखिल थी और इंतज़ार था उनके वैवाहिक जीवन की पहली ख़ुशी का यानी पहली डिलिवरी का. दूरदर्शन के पत्रकार बेचैन से हस्पताल का कॉरिडोर पर कब्ज़ा किये थे और चैनलों के स्टूडियो से बेताब से समाचार संपादक चिल्ला कर पूछ रहे थे - 'हेलो दिव्या (मालिक लहरी), क्या कोई ताज़ा बुलेटिन आई है'? दिव्या मालिक लहरी बुरी तरह हिलती-डुलती, उत्तेजना में अपना संतुलन बिगाड़ती सी चिल्ला रही हैं 'नहीं आशुतोष, अभी तो डॉक्टर अन्दर किसी को जाने ही नहीं दे रहे'!... एक और चैनल पर एक और समाचार रीडर चिल्ला रहा है - 'प्रियंका गाँधी को क्या लग रहा है, उन्हें बेटा होगा या बेटी'?... मैं चकित हूँ. दूरदर्शन वाले चाहते हैं कि खबर पहले ही घट जाए, अगर नहीं घटेगी तो हम उसे घटवा कर ही दम लेंगे... मैं ने इसीलिए एक व्यंग्य शेर लिखा था:

खबरनवीस वहां पर खबर से पहले गए,
अगर न जाते तो ये वारदात होती क्या!


देशी पत्रकारिता के मज़बूत स्तम्भ
प्रभाष जोशी केवल इस मायने में वरिष्ठ नहीं थे कि वे एक राष्ट्रीय अखबार के संस्थापक, संपादक या वयोवृद्ध पत्रकार थे, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता के लिए तय अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरोकारों को लगातार विकसित करने का काम किया। और इस मामले में उनकी भूमिका अग्रणी थी। वे अपने कई संपादकीयों और बयानों को लेकर विवादों में भी घिरे और उसे स्वीकारा भी, लेकिन प्रभाष जोशी दरअस्ल पत्रकारीय अस्मिता और कर्तव्य की एक भारतीय परम्परा बनाने और जनसाधारण से उसे जोड़ने का निरंतर प्रयत्न करते रहे। इस प्रक्रिया में अंग्रेजीयत में डूबी बहुराष्ट्रीय आधुनिकता को उन्होंने पर्याप्त रूप से कोसा और इसके ख‌़िलाफ़ लिखते रहे। 'सेज़-विरोध' तथा विस्थापन विरोधी आंदोलनों से उन्होंने अपना एक जीवंत रिश्ता बनाया और यथार्थ को जानने के लिए लगातार जगह-जगह की यात्राएँ करते रहे। इससे ज़ाहीर होता है कि वे महज़ सूचनाओं के आधार पर विचार बनाने और गुरु-गंभीर टिप्पणीकारिता के क़तई ख़िलाफ़ थे। प्रभाष जी पत्रकारिता की जिस मर्यादा और गौरवपूर्ण अतीत के हिस्से थे, उसमें बेशक जातिवादी व्यवस्था और पूँजीवाद के नये गठजोड़ों को समूल ध्वस्त करने की कुबत न रही हो, लेकिन उसके प्रति सच्चा आलोचनात्मक रूख लगातार बना रहा। लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यपद्धति और भारतीय जनता के साथ उनके संबंधों और कर्तव्यों को लेकर उन्होंने ताउम्र एक सचेतन पत्रकार की भूमिका निभाई। इसीलिए उनमें न केवल व्यक्तिगत ईमानदारी और कबीराना स्वभाव प्रचूर मात्रा में मौज़ूद रहा बल्कि आनेवाले समय में भी आदर्शवादी विचारशील और प्रतिबद्ध पत्रकारों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त चारित्रीक विशेषता रही है। वे अपने लेखन की वज़ह से समकालीन हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक जीवंत-सेतु बनाते रहे। भाषा के साथ इनका संबंध और सूचनाओं के प्रति सुचिंता उन्हें लगातार किसी विचार, नीति और कानून को भारतीय जनता की खुशहाली की कसौटी पर कसने को प्रेरित करती थी जो वस्तुतः उन्हें अंतिम आदमी के प्रति जवाबदेही की गाँधी के परिकल्पना के नज़दीक ले जाती रही है। उनके निधन से एक बड़ी और गौरवशाली परम्परा बाधित हो गई है।

-रामजी यादव
पर बात तो प्रभास जोशी की हो रही थी, मैं शायरी क्यों करने लगा! पर बात दरअसल उस संतुलन की है, जो प्रिंट मीडिया में था, पर दूरदर्शन के आते ही वह संतुलन जाता रहा, भले ही प्रिंट मीडिया पर भी खबर को चटपटी बनाने और सनसनीखेज़ बनाने के इल्जाम अक्सर लगते रहे. पर प्रभास जोशी जैसे पत्रकार जिन अख़बारों में रहे वहां नहीं. यह लेख लिखते-लिखते मैंने हिंदी कवियत्री ममता किरण को फ़ोन किया और कहा कि प्रभास जी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी. ममता जी ने कहा कि वे 'जनसत्ता' में प्रभास जी के नियमित कालम 'कागद कारे' को लगातार पढ़ती रही और बेहद प्रभावित थी. उनके अनुसार प्रभास जी चाहे क्रिकेट हो या फिल्म, या राजनीती-जगत, देश के हर विषय पर लिखने में अपना सानी नहीं रखते थे. साथ ही यह कि वे चाहते तो सत्ता के नैकट्य का भरपूर लाभ उठा सकते थे, पर वैसा करना उनकी फितरत का हिस्सा नहीं था. ममता जी का फ़ोन रखा तो आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने जो सन्देश भेजा वह इस प्रकार है - 'प्रभास जी ने अनेक बंधी-बंधाई लीकों को तोड़कर हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा, नई शैली, नया मुहावरा दिया. वे राष्ट्रीय जीवन में नैतिक मूल्यों के पहरेदार थे. इस नैतिक पतन के युग में उनका जाना नैतिकता की मशाल का बुझना है'. और ठीक उसी समय एक ओर सन्देश आया - 'पत्रकारिता जगत का एक और सितारा डूब गया. मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि'...

मैंने जब NDTV के उस कार्यक्रम में यह कहा कि दूरदर्शन चैनल तो अभिनेता को सर चढा देते हैं, अभिनेता संजय दत्त पर कितने भी संगीन इल्ज़ाम हों, पर दूरदर्शन उस की खबर देते समय बड़े प्यार से उसे 'संजू बाबा' या 'मुन्ना भाई' कहते हैं, तब स्टूडियो में तालियों की गड़गडाहट हुई सो अलग, पर जैसे छोटा बच्चा शाबासी के लिए अपनी बात कह कर किसी बड़े की तरफ देखता है, मेरी नज़र भी अपनी बात कहते ही प्रभास जोशी पर टिक गई. जो मुस्कराहट उन के चेहरे पर आई, वह भी मैं कई दिन तक सोचता रहा, कि कैसी थी वह मुस्कराहट?... क्या था उस में? स्टूडियो में बाद में उन्होंने मेरी पीठ भी थपथपाई, और मैंने उनको अपना पूरा परिचय दे डाला (शुक्र कि यह नहीं कहा कि मैं तो हिंदी का मोपांसा या चार्ल्स डिकेंस हूँ). शायद उसी को याद कर के वे यहाँ, त्रिवेणी सभागार में कह रहे थे - 'याद आ गया'. और उनके चेहरे पर मुस्कराहट भरी रेखाओं से मैं समझ गया, वे साहित्यकारों पत्रकारों से मिल कर उन्हें कभी भूलते नहीं. सब को अपना समझते हैं, सो उनकी मुस्कराहट में वह आत्मीयता का मोती, मैं अपनी अदना सी शख्सियत में पिरो कर फूला नहीं समा रहा था. आत्मीयता ऐसी, जैसे वे अभी, मित्रों की तरह बैठ कर मेरे साथ बहुत देर तक गप्पें मारने लगेंगे...

शीला जी आईं तो उनके साथ-साथ प्रभास जी भी मंच तक पहुँच गए और कुछ ही मिनटों में गाँधी की पुस्तकों का विमोचन हो गया. त्रिवेणी सभागार की वह रिपोर्ट मैंने हिन्दयुग्म में ही 'गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्वारा यादगार कार्यक्रम' शीर्षक से 24 अगस्त को दी थी. शीला जी अपना भाषण कर के व्यस्तता के कारण चली गई और मंच पर प्रभास जी छा गए. उन्होंने गाँधी पर अपने विचार जब प्रकट करने शुरू किये तब मेरी कई दिनों की गुत्थी सुलझी कि प्रभास जी को ही मैं एक दो मुलाकातों में अपना इतना करीबी क्यों समझने लगा हूँ. गाँधी मेरी भी स्तुत्य शख्सियत रहे, और प्रभास जी की बातों से लग रहा है, जैसे गाँधी की विरासत को मन में समेटे रखने वाले मुट्ठी भर भारतवासियों में से एक हैं प्रभास जी, जो समझा रहे हैं कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटते हुए 'हिंद स्वराज' 10 दिन में ही लिख डाली. जब उनका दाहिना हाथ थक गया तब उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना शुरू किया. और कि उन्होंने वर्षा दास से कह कर बाएँ हाथ से लिखते हुए गाँधी का एक चित्र भी बनवाया था'...

गाँधी की अहिंसा और सादगी जैसे मूल्यों को आत्मसात करने वाले कितने लोग हैं देश में? पता नहीं. पर एक प्रभास जी तो हैं न, सामने ही, मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानने जो लगा हूँ, और इस समय मैं जिन के भाषण का विडियो-क्लिप मैं अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करता जा रहा हूँ!...

और फिर गाँधी के सन्दर्भ में ही प्रभास जोशी के दर्शन एक बार फिर हो जाते हैं मुझे. कितनी खुशकिस्मत जिंदगी है मेरी. प्रभास जी तो वो आ रहे हैं... वो रहे... दि. 1 अक्रूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में आने का निमंत्रण मुझे स्वयं वर्षा दास जी ने ही कुछ दिन पहले दिया था और यह भी कहा था कि गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' पर उस दिन प्रभास जी बोलेंगे... बस.. मैं कार्यक्रम के निर्धारित समय से पहले ही पहुँच जाता हूँ. कौन-कौन लोग आ गए हैं, यह ध्यान नहीं, पर इतनी देर की प्रतीक्षा के बाद देखो, प्रभास जी वो तो आ रहे हैं...

...प्रभास जी कह रहे हैं कि गाँधी का स्वराज न तो राजनैतिक स्वराज था, न सामाजिक, न ही वह आर्थिक स्वराज था, वह तो अध्यात्मिक स्वराज था...



...मुझे गर्व हो रहा है कि आज मैं फिर उनके भाषण का वीडियो बना रहा हूँ और घर आते ही उनका भाषण लैपटॉप में उतार कर उसे यूट्यूब में डाल देता हूँ, ताकि जो उनके विचार सुनना चाहें वे सुनें. इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी मैं ने हिन्दयुग्म में 'हिंद स्वराज' के 100 वर्ष और विचार-गोष्ठियों पुस्तक-विमोचनों का गर्मागर्म-सिलसिला' शीर्षक से दि. 10 अक्टूबर को दी थी. हिन्दयुग्म पर प्रभास जी के भाषण की विडियो क्लिप देख कर मैं बहुत प्रसन्न था. इसलिए भी कि वह विडियो क्लिप प्रभास जी का था और इसलिए भी कि प्रभास जी का वह विडियो क्लिप मैंने बनाया था.

मैंने कार्यक्रम के लगभग अंत में उठ कर यह पूछा था कि गाँधी जी तो रेल के भी खिलाफ थे, भला रेल के बिना हम सब कैसे रह सकते हैं... तब तो प्रभास जी ने कहा था कि अब काफी समय हो चुका है, हम लोग बाद में चाय पीते पीते-पीते भी बात कर सकते हैं, पर मैं एक बार फिर उनके चेहरे पर वही सौम्य मुस्कराहट देख अभिभूत था, क्यों कि वे मुस्कराते हुए मुझे ही संबोधित कर रहे थे...

...और चाय के दौरान मुझ से भी अधिक बड़े बड़े जिज्ञासु मुझ से बाज़ी मर ले गए और प्रभास जी को घेर लिया. मैं चाय देने वाले 'गाँधी संग्रहालय' के सेवाधारी से अपनी चाय बटोरता ही रह गया कि लोग वहां पहले ही पहुँच गए. पर मैं चाय समेत उस घेरे के बाहर पहुँच हल्की सी धक्का-मुक्की करते प्रभास जी के पास पहुँच जाता हूँ. प्रभास जी सब की जिज्ञासाओं को दूर करते गाँधी के मूल्यों की शाश्वतता बता रहे हैं, बारीकी से समझा रहे हैं, कि गाँधी जी ने जब-जब जो जो बात कही, तब तब उस का तात्पर्य क्या था. यही वह क्षति थी, जो मुझे लगा कि देश को हुई है, प्रभास जी के अचानक चले जाने के बाद. देश अब न्यूयार्क और शांघाई से बराबरी के रास्ते पर है. आधुनिकता अपने चरम पर है. पैसा भगवान हो गया है. आज का आदमी नंगा हो कर अपनी मूल्यहीनता ओर दिवालियेपन का प्रदर्शन कर रहा है. गाँधी के मानवीय मूल्यों को एक पूंजी की तरह सीने में संभाले दूसरों के बीच बांटने वाला आज सुबह चला गया. एक प्रकाश-पुंज अस्त हो गया... क्या इस से अधिक दुखद कोई खबर हो सकती है? नहीं, प्रभास जी जैसी शख्सियत, अन्यत्र मिलनी असंभव है...

...और इतनी बड़ी हस्ती की आत्मीयता से अब वंचित हो जाने की क्षति तो मेरी व्यक्तिगत क्षति है, शुद्ध व्यक्तिगत...

Wednesday, September 23, 2009

दिनकर के काव्य में स्वच्छन्दतावाद

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के संपूर्ण वाड़्मय को देखकर यह सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है कि उनके काव्य में स्वच्छन्दतावादी तत्व सांगोपांग अनुस्यूत हैं। उनकी कविताओं में कहीं भावनाओं का उदग्र स्वर तो कहीं भावप्रवण, स्निग्ध और कोमलधारा को देखकर कुछ लोगों को दिनकर के छायावाद और प्रगतिवाद के बीच की कड़ी होने का भ्रम होता है। परन्तु सच्चाई यह है कि दिनकर किसी वाद-विशेष को लेकर कभी चले नहीं। आजीवन अपनी अनुभूति के प्रबल आवेग को स्वच्छन्द अभिव्यक्ति प्रदान करने का प्रयास किया। इसी कारण उन्हें किसी वाद-विशेष से सम्बद्ध नहीं किया जा सका और तत्कालीन काव्य-प्रभृतियाँ; छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद इत्यादि साहित्य के किसी बने-बनाये खाँचे में वे समा नहीं सके।
अनुभूति दिनकर के काव्य का केन्द्रीय तत्व है। अनुभूति की स्वच्छ अभिव्यक्ति के लिये वे कलाकारिता की भी उपेक्षा कर देते हैं। वास्तव में अनुभूति की तीव्रता और काव्य में उसके प्राथमिक महत्व को स्वच्छन्दतावादी काव्य में ही पुनर्प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। हिन्दी में छायावादी कवियों के काव्य में भी अनुभूति की यह विशिष्टता सन्निहित है किन्तु रहस्यमयता के घनावरण के कारण वहाँ अनुभूति को अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता नहीं मिल पायी।
वस्तुत: कवि की आंतरिक भावना ही उसके काव्य में अभिव्यक्ति को प्राप्त करती है। इस कवि के काव्य के सबंध में भी यही बात सत्य है। एक ओर तो इनकी कविताओं में प्रेम-जनित भावपूर्ण अनुभूतियों का गहरा वेग है जिसमें उनकी मधुर-कोमल भावनाओं ने अनायास ही कल्पनामय अभिव्यक्ति को प्राप्त किया है तो दूसरी ओर दासता से मुक्ति का विद्रोही स्वर और सामाजिक कुरीतियों-विषमताओं के विरोध का कड़ा तेवर जो उनके व्यक्तित्व में व्याप्त स्वातन्त्र्य-भावना की अदम्य लालसा की ओर इंगित करता है। स्वातन्त्र्य-भावना के अंतर्गत देश की पराधीनता से विक्षुब्ध हमारे कवि ने आग्नेय भावों से समन्वित जिन कविताओं की रचना की है, वे किसी भी पराधीन देश के युवकों के रक्त को आलोड़ित-विलोड़ित कर देने में समर्थ है।

वैसे तो सभी स्वच्छन्दतावादी कवियों के यहाँ स्वातन्त्र्य-भावना साहित्य का प्रमुख तत्व है किन्तु दिनकर के काव्य में इसका फैलाव राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, व्यैक्तिक, साहित्यिक यानी हर स्तर पर देखा-परखा जा सकता है। ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रसवंती’ से ‘कुरुक्षेत्र’,”सामधेनी’ ,”इतिहास के आँसू’ होते हुए ‘धूप और धुँआ’, ‘रश्मिरथी’, ‘नीम के पत्ते’, ‘नील कुसुम’ और फिर ‘नये सुभाषित’, ‘उर्वशी’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ तक - सभी काव्य-कृतियों में किसी -न- किसी रूप में स्वाधीनता की पुकार सुनायी देती है। यहाँ सिर्फ़ राजनीतिक जागरण की ही बातें हैं, स्वतन्त्रता की व्यापक अर्थ में अभिव्यक्ति हुई है। वर्ण-जाति के बंधनों की स्वतन्त्रता से लेकर सामान्य जनता के शोषण के विरुद्ध भी आवाज़ उठाते हुए उन्होंने आज़ादी का नगाड़ा बजाया है।

धार्मिक भाग्यवाद का तिरस्कार करते हुए कर्मवाद के महत्व की प्रतिष्ठा की है। धर्मस्थानों में पूँजी की बढ़ती हुई प्रभूता को देखकर उन्होंने इसकी तीव्र भर्त्सना की भी की है। कवि की यह स्वातंत्र्य-भावना साहित्य में भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर प्रतिफलित होती दिखाई देती है।

अनुभूति दिनकर के काव्य का केन्द्रीय तत्व है। अनुभूति की स्वच्छ अभिव्यक्ति के लिये वे कलाकारिता की भी उपेक्षा कर देते हैं। वास्तव में अनुभूति की तीव्रता और काव्य में उसके प्राथमिक महत्व को स्वच्छन्दतावादी काव्य में ही पुनर्प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। हिन्दी में छायावादी कवियों के काव्य में भी अनुभूति की यह विशिष्टता सन्निहित है किन्तु रहस्यमयता के घनावरण के कारण वहाँ अनुभूति को अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता नहीं मिल पायी। दुर्दिन से दु:खी होकर अधिकांश छायावादी कवि गहनता से अंतर्मुखी होकर रोमांसवाद की पलायनवादी प्रेरणाओं से एकात्म हो रहे थे। जबकि दिनकर के काव्य में ऐसे स्थल अपवादस्वरुप ही मिलेंगे जिनमें भावों की धूमिलता अथवा अस्पष्टता हो अन्यथा सर्वत्र ही उनके काव्य में अनुभूति की स्वच्छंद अभिव्यक्ति का ही गुण विद्यमान है। उनकी अनुभूति में स्वच्छन्दतावादी कवियों के समान ही अन्तर्मुखता. भावातिरेकपन और सहज अभिव्यक्ति अदि गुण विद्यमान हैं तथा अनुभूति की सीमा है - ओज, प्रेम, नारी,प्रकृति और ग्राम्य जीवन की सुरम्य एवं कोमल अनुभूतियों का वर्णन।

दिनकर की विशेषता इस बात में है कि वे परिवेश और समय की धड़कन को चक्षु:श्रवा के समान अनुभव करते हुए अपनी अनुभूतियों को सर्वजनीन और उसका सामाजिकीकरण कर देते हैं। यह सामाजिकीकरण यहाँ कोई सायास यत्न नहीं होता वरन इसके पीछे कवि की वह संवेदना है जो स्वानुभूति की व्यैक्तिक सीमा को लाँघकर उसे राष्ट्र की विशद अनुभूति में बदल देती है। ‘हुंकार’ ‘और ‘परशुराम’ की प्रतीक्षा’ जैसी ओजस्विनी कृतियाँ इसकी प्रमाण हैं, देखिये-

देवि, कितना कटु सेवा-धर्म।
न अनुचर को निज पर अधिकार।
न छिपकर भी कर पाता हाय,
तड़पते अरमानों का प्यार।

फेंकता हूँ, लो तोड़-मरोड़
अरी निष्ठूरे! बीन के तार,
उठा चाँदी का उज्ज्वल शंख
फूंकता हूँ भैरव-हुंकार।
[‘हुंकार’ से]

इस प्रकार कवि का समग्र व्यक्तित्व समाज के अधीन हो गया। उसने अपना हृदय सामाजिक और राष्ट्रीय भावनाओं को समर्पित कर दिया।

दिनकर के काव्य में अनुभूति को रमणीय रूप प्रदान करने में कल्पना का विशेष योग रहा है। वे कल्पना को किसी भी स्वच्छन्दवादी कवि से कुछ कदम आगे बढ़कर ही महत्व प्रदान करते हैं। स्पष्ट रूप से अपनी कल्पना विषयक धारणा को व्यक्त करते हुए उन्होंने इसे व्यक्ति-मात्र का अनिवार्य गुण बताया है। वे मानते हैं कि कल्पना की सहायता से विश्व को एक सूत्र में आबद्ध किया जा सकता है।

कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदों से नयी आयु प्राप्त होती है
कल्पना की संश्लेषणात्मक, अन्तर्वर्तनी और परिष्कारक आदि विभिन्न शक्तियों का उनके काव्य में अप्रतिम योग रहा है। कल्पना विषयक अपने विचारों में इन तीनों शक्तियों का नाम-भेद से महत्व भी स्वीकार किया है। कल्पना की इन शक्तियों ने स्मृति, मानवीकरण आदि का आधार ग्रहणकर उनके काव्य को संपुष्ट किया है तथा नारी, प्रकृति, राष्ट्र, मानव-महामानव एवं ईश्वर आदि विषयों को अपना संचरण-क्षेत्र बनाया है। नारी और प्रकृति को उनके काव्य में ओजस्वी भावों के समान ही कल्पनामय अभिव्यक्ति मिली है। दिनकर जी की कल्पना की समृद्धि की विशेषता यह है कि वह किसी भी प्रकार की संकीर्णता में आबद्ध नहीं रही है और उन्मुक्त रूप से ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, प्राकृतिक और साहित्यिक क्षेत्रों से विषयानुकूल तत्व प्राप्तकर उसने श्रेष्टता के चरम शिखर का स्पर्श किया है। यही कारण है कि उनके काव्य में अभिव्यक्त अनुभू्तियों में कहीं भी अस्पष्टता और धूमिलता नहीं आ पायी है बल्कि सहज-सम्प्रेषणीय ही बनी है। अतएव स्वच्छन्दतावादी कवियों में काव्य में कल्पना के महत्व की प्रतिष्ठा देने वालों में दिनकर अग्रगण्य हैं। यूँ कहें कि कल्पना ने दिनकर के काव्य को नव्यता और भव्यता प्रदान करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी!

यद्यपि दिनकर की ओजस्वी कविताओं की प्रसिद्धि साहित्य-जगत ही नहीं, बल्कि देश-भर में है और ‘उर्वशी’ के रचनाकार के रूप में भी उनके सुविज्ञ पाठक उनको जानते हैं, तथापि इन दोनों -ओज और शृंगारिक- भावधाराओं के साथ-साथ उनके काव्य की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता काव्य में प्रकृति के विविध सुरम्य रूपों की समाहिति है। विषय चाहे ओजस्वी भावनाओं का रहा हो अथवा शृंगार का, सर्वत्र ही प्रकृति किसी- न- किसी रूप में उनके काव्य की सहचरी बनकर आयी है। यदि यह कहा जाय कि प्रकृति उनके काव्य का एक प्रमुख अभिलक्षण है तो अत्युक्ति न होगी! इस कथन का प्रमाण उनकी प्रत्येक काव्य-कृति में मूर्तिमान है। उन्होंने प्रकृति को अपने से ही नहीं, मानव-मात्र से भी अभिन्न माना है।

जहाँ तक शिल्प का प्रश्न है, अपनी आंतरिक प्रकृति के अनुकूल शिल्प के परम्परागत बंधन को वे स्वीकार नहीं करते। सायास छंद-योजना की अपेक्षा भावानुकूल छंद-योजना दिनकर को प्रिय है। इसी कारण परम्परा-प्राप्त छंदोम के स्थान पर नये छंदों के निमार्ण की आवश्यकता पर बल देते हुए वे लिखते हैं कि-

“अब वे ही छंद कवियों के भीतर से नवीन अनुभूतियों को बाहर निकाल सकेंगे जिसमें संगीत कम, सुस्थिरता अधिक होगी,जो उड़ान की अपेक्षा चिन्तन के उपयुक्त होंगे।क्योंकि हमारी मनोदशाएँ परिवर्तित हो रही हैं और इन मनोदशाओं की अभिव्यक्ति वे छंद नहीं कर सकेंगे जो पहले से चले आ रहे हैं।”
क्योंकि वे मानते हैं कि-

“कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदों से नयी आयु प्राप्त होती है।”

भाषा और शब्द-चयन पर भी उनके यही विचार हैं। उन्होंने अपनी भाषा को समर्थ बनाने के लिये जहां एक ओर तत्सम, तद्भव, देशज और प्रान्तीय शब्दों का भावानुकूल चयन किया वहाँ दूसरी ओर प्रचलित विदेशी शब्दों का प्रयोग भी निर्बाध रूप में किया है। उनकी काव्य-भाषा में शब्द-शक्ति, उक्ति-वैचित्र्य तथा परम्परागत एवं नये मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से वह तीखापन आ गया है जो किसी श्रेष्ठ काव्य-भाषा का गुण हो सकता है।

शिल्प के सबंध में, इस तरह निश्चय ही दिनकर ने पूर्ण स्वच्छन्दता का प्रयोग किया है। बदलते युग-बोध और परिवर्तित काव्य-विषयों की सहज अभिव्यक्ति के लिये उन्होंने नये छंद का निर्माण भी किया जो ‘दिनकर-छंद’ के नाम से सुविख्यात है जैसे कि उनकी कविता ‘कस्मै देवाय’ में। अत: दिनकर को साहित्य के आभिजात्य से मुक्ति की परम्परा की एक प्रमुख कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिये। एक अर्थ में उन्होंने अपने समय को तो शब्द दिये ही, आने वाले समय की कविता के लिये व्यापक पृष्ठभूमि भी रची। कहीं परम्परा का तत्व ग्रहण भी किया तो उसे नया बनाकर। छन्दों के समान ही उनके काव्य में प्रयुक्त रूप-विधाओं के नवीन प्रयोग भी इसी ओर संकेत करते हैं।

अगर मैं अपने विचार का उपसंहार करना चाहूँ तो कहना पड़ेगा कि पश्चिमी और भारतीय मनीषीयों ने स्वच्छन्दतावाद के जो निष्कर्ष हमारे सामने रखे हैं वे हैं- स्वातंत्र्य-भावना, अनुभूति, कल्पना, प्रकृति-चित्रण और शिल्पगत स्वतंत्रता की प्रधानता का होना। ...और इन निकषों पर दिनकर का काव्य स्वच्छन्दतावादी काव्यधारा की संपूर्ण विशेषताओं से समन्वित-परिलक्षित होता है।

अत: स्वच्छन्दतावादी काव्यधारा के श्रेष्ठ कवि के रूप में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का आकलन निर्विवाद और असंदिग्ध होगा।

-सुशील कुमार (लेखक हिन्दी के सुपरिचित कवि है)

Tuesday, June 09, 2009

थिएटर के पितामह को आखिरी सलाम

कल हिन्दी कवि जगत के व्यंग्य-सूर्य ओम प्रकाश आदित्य के साथ-साथ भारतीय रंगमंच के शीर्षस्थ नाम हबीब तनवीर का सूरज भी बुझ गया। कलाजगत के इतिहास में 8 जून 2009 की तिथि रंगमंच को अनाथ कर जाने के तौर पर भी याद की जायेगी। युवा पत्राकर आलोक सिंह साहिल और चर्चित कला-समीक्षक अजित राय हबीब तनवीर को याद कर रहे हैं॰॰॰॰॰


चित्र साभार- मयंक
जिस जिस को था ये इश्क का अजार
मर गए अकसर हमारे साथ के बीमार...


मशहूर नाटककार, डायरेक्टर, कवि और एक्टर हबीब तनवीर महज एक नाम नहीं वरन ऐसी दरख्त हैं जिनकी छांव से थिएटर की दुनिया में कदम रखने वाला हर शख्स खुद को महफूज महसूस करता रहा है। एक ऐसा अंबर जिसके तले कला के न जाने कितने ही सितारे रोशन हुए। पर आज ये इंदू (नक्षत्र) खुद कहीं विलीन हो गया है। यह कुछ वैसा ही जैसे रात होने पर सूरज नजर नहीं आता....तब जबकि चांद उसकी रोशनी में ही अपनी चमक पर इतराता रहता है। काल की घनेरी छाया ने उन्हें हमसे दूर कर दिया है, लेकिन थिएटर जगत हमेशा उनकी आभा से दैदीप्यमान रहेगा।

तनवीर जन्म और आरंभिक जीवन
आगरा बाजार और चरनदास चोर जैसे कालजयी नाटकों के रचनाकार तनवीर साहब (हबीब अहमद खान) का जन्म एक सितम्बर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हफीज अहमद खान के घर हुआ था, जो मूलत: पाकिस्तान के पेशावर से यहां आए थे।
जाना रंगमंच के शताब्दी पुरुष का
हबीब तनवीर के रंगकर्म में हमें भारतीय परंपरा, लोक और वैश्विक दृष्टि का जो समन्वय दिखाई देता है, वह विकासमान जन संस्कृति का वैकल्पिक मॉडल है। उन्होंने बार-बार कहा है कि रंगमंच का मूल उद्देश्य दर्शकों को आनंद प्रदान करना है। लेकिन उनके किसी नाट्य लेख का गैर-राजनीतिक पाठ संभव नहीं है। उनका अंतिम नाटक ‘राजरक्त’ (रवींद्र नाथ टैगोर) भी धर्म और सत्ता की टकराहटों में विकसित होता है। हबीब तनवीर को जीवन में कई सम्मान और पुरस्कार मिले। उनके नाटक ‘चरणदास चोर’ के लिए उन्हें विश्व के सबसे प्रतिष्ठित नाटक समारोह में ‘फ्रिज फस्र्ट’ अवार्ड एडिनबरा, इंग्लैंड में मिला। 1969 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार भी मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की पहल पर उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत किया गया। हबीब तनवीर ने हालांकि दिल्ली में 1948 से ही नाटक करना शुरू कर दिया था, लेकिन 1954 में प्रस्तुत ‘आगरा बाजार’ से उन्हें अभूतपूर्व ख्याति मिली। 1973 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी आदिवासी कलाकारों के साथ प्रयोग करना शुरू किया। विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘चरणदास चोर’ (1975) से उन्हें विश्व भर में ख्याति मिली। इसी साल जनवरी में 86 साल की उम्र में उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘चरणदास चोर’ का निर्देशन-मंचन किया था। इस नाटक में हवलदार के रूप में निभाई गई उनकी भूमिका सदा याद की जाएगी। उन्होंने भारत-पाक विभाजन पर आधारित असगर वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नइ वेख्यां वो जम्यइ नइ’ का 1990 में श्रीराम सेंटर रंगमंडल के कलाकारों के साथ मंचन किया था। अस्पताल में भर्ती होने से पहले वह इसे दोबारा तैयार करने में लगे हुए थे। इस वर्ष इस नाटक के मंचन के बीस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर पूरे साल दुनिया भर में इस नाटक का उत्सव मनाया जाने वाला है।

रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती जैसा उद्घोष
यह एक संयोग ही था कि जब 1 सितंबर, 2002 को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हबीब तनवीर का 80वां जन्मदिन मनाया जा रहा था, तो ब. व. कारंथ के निधन की खबर ने सबको शोकाकुल कर दिया। कुछ साल पहले अपनी धर्मपत्नी मोनिका मिश्र के निधन पर वह भीतर से टूट गए थे। मिलने पर वह अकसर कहते कि उन्हें अपनी आत्मकथा पूरी करनी है। कुछ वर्ष पूर्व अपने दो नाटकों के कारण वह मध्य प्रदेश में हिंदू कट्टरपंथियों के हमलों का शिकार हुए थे। विचारों से वामपंथी होने के बावजूद वह बार-बार कहते थे कि रंगमंच से क्रांति नहीं हो सकती। रंगमंच को रंगमंच रहने दिया जाए।

जिम्मेदारी विरासत बढ़ाने की
हबीब तनवीर के जाने के बाद भारतीय रंगमंच ने अपना एक ‘आइकन’ खो दिया है। उन्होंने शहरी रंगमंच को छोड़कर ग्रामीण रंगमंच को चुनने का कठिन जोखिम उठाया। उन्होंने स्थानीयता को वैश्विक पहचान दी। उनकी फिदा बाई जैसी कई अभिनेत्रियाँ जीते जी किवदंती बन गर्इं। उनकी इकलौती बेटी नगीन तनवीर के सामने ‘नया थिएटर’ भी चलाने की जिम्मेदारी है। हालांकि नगीन हमेशा इस जिम्मेदारी से बचने की घोषणा करती रही हैं। हबीब साहब अकसर कहते थे कि किसी के जाने से कोई काल नहीं रुक सकता। उन्हें यकीन था कि कोई न कोई उनके काल को आगे बढ़ाएगा। जिस हिंदी रंगमंच को उन्होंने इतना दिया, आज उन पर हिंदी में एक भी ढंग की किताब का न होना दु:खद है। हिंदी समाज कब तक अपने नाटकों के मरने का इंतजार करता रहेगा। अभी हाल तक उनका कोई नाटक प्रकाशित नहीं था। अब जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो हमें चाहिए कि हम उनकी महत्वपूर्ण विरासत को आगे बढ़ाएं। हमें नगीन तनवीर को दिलासा दिलाना चाहिए कि इस घड़ी में हम उनके साथ हैं।
--अजित राय
हाई स्कूल तक की पढ़ाई उन्होंने लौरी मुनिसिपल हाई स्कूल, रायपुर से की। फिर 1944 में नागपुर के मौरिस कॉलेज से बीए की पढ़ाई करने के बाद एमए करने वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए।
युवावस्था से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया और इस तरह हबीब अहमद खान अब अपने तखल्लुस तनवीर के साथ हबीब तनवीर बन गए।

रेडियो से हुई करियर की शुरूआत
एमए की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे 1945 में बॉम्बे (आज की मुंबई) चले गए जहां वे ऑल इंडिया रेडियो से प्रोड्यूसर के रूप में जुड़ गए। साथ ही हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखना भी शुरू कर दिया। जल्द ही वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुड़ गए। आगे चलकर वे इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन(इप्टा) से जुड़े और उसी के होकर रह गए।

जिस समय वे इप्टा से जुड़े उस समय देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय मशहूर अभिनेता और थिएटर एक्टर बलराज साहनी साहब इप्टा की कमान संभाले हुए थे। दुर्भाग्यवश ब्रितानिया हुकूमत को रंगमंच के माध्यम से इन रंगकारों की जनक्रांति रास नहीं आई और उन्होंने बलराज साहनी समेत सभी प्रमुख लोगों को सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया था।

ये वह समय था जब हबीब तनवीर ने अभिनय का ककहरा सीखना ही शुरू किया था। लेकिन सभी बड़े लोगों (गुरुओं) के जेल चले जाने से वे बिल्कुल टूट से गए थे।

तन्हा संघर्ष
इतिहास जब बनना होता है तो अकसर कुछ छोटी घटनाएं कारक के रूप में सामने आ जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ, तन्हा और कमजोर पड़ चुके तनवीर साहब जब जेल में बलराज साहब से मिलने पहुंचे तो बलराज साहब ने उनके कंधे पर पूरे इप्टा का भार डाल दिया। सच्चाई यह थी कि उन्हें उस वक्त न तो लिखना आता था और न ही सही से अभिनय करना, लेकिन गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए तनवीर साहब ने जैसे-तैसे नाटक लिखना शुरू किया। वे पूरे समय कहानी लिखते, लोगों को इकट्ठा करते और उनसे नाटक करवाते। प्रॉम्टिंग से लगाए, गाना, मेकअप करना जैसे सारा काम वह खुद ही करते थे। समय के साथ-साथ उनकी कलम और अभिनय में धार आती गई और वे अभिनय के उस मकाम पर पहुंच गए...जहां उनके बाद कोई दूसरा पहुंचने की सोच भी न सका।

जब खाया थप्पड़
एक और घटना का उल्लेख मौजूं होगा। बात उस समय की है जब अभिनय का यह वटवृक्ष अभी पल्लवित हो रहा था। बलराज साहब एक नाटक का निर्देशन कर रहे थे, उस नाटक के एक दृश्य में तनवीर साहब को रोने की एक्टिंग करनी थी। लेकिन बार-बार कोशिश करने के बावजूद वे रो नहीं पा रहे थे। वास्तव में, उन्हें झिझक हो रही थी। कई बार प्रयास करने पर भी जब स्थिति जस की तस बनी रही तब बलराज साहब मंच पर चढ़े और एक जोरदार तमाचा उन्हें रसीद कर दिया, फिर क्या था तनवीर साहब ऐसे रोए कि खुद उनके गुरू भी अचंभित हो गए। इस तरह उनकी अभिनय यात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई। वे हमेशा इस बात को मानते रहे कि बलराज साहब का थप्पड़ न खाते जाने कहां खाक छान रहे होते।

दिल्ली का रुख
इसी दौरान देश आजाद हो गया। आजादी के बाद सात सालों तक वे वहीं (बॉम्बे) अपने कला को मांझते रहे। इसके बाद 1954 में उन्होंने दिल्ली का रुख किया। यहां उन्होंने कद्सिया जैदी के हिंदुस्तानी थिएटर और चिल्ड्रेंस थिएटर के साथ अनेकों नाटकों में काम किया। इसी बीच उनकी जिंदगी में मोहतरमा मोनिका मिश्रा का आगमन हुआ जो बाद में उनकी पत्नी बनीं।

इसी साल यानी 1954 में उन्होंने अपना कालजयी नाटक आगरा बाजार तैयार किया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें उन्होंने किसी ट्रेंड एक्टर को नहीं लिया था बल्कि लोकल नॉन ट्रेंड लोगों को लिया था। इस सफल अनुभव ने उन्हें इस कदर उत्साहित किया कि फिर वे छत्तीसगढ़ में ऐसे ही नॉन ट्रेंड लोगों के साथ मिलकर उन्हें संवारने में जुट गए।

हबीब तनवीर के नाटक

आगरा बाजार (1954)
शतरंज के मोगरे (1954)
लाला शोहरत राय (1954)
मिट्टी की गाड़ी (1958)
गांव के नांव ससुराल,
मोर नांव दामाद (1973)
चरनदास चोर (1975)
उत्तर रामचरित्र (1977)
बहादुर कलरीन (1978)
पोंगा पंडित
जिस लाहौर नई देख्या (1990)
कामदेव का अपना बसंत रितु का सपना (1993)
जहरीली हवा (2002)
राज रक्त (2006)
बर्लिन के आठ महीने
उनकी जिंदगी में एक घटना और घटी जिसने उनको थिएटर को रूट लेवल तक ले जाने में मदद किया। वह था उनका 1955 में इंग्लैंड जाना, जहां उन्होंने दो सालों तक अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्हें बर्लिन में तकरीबन 8 महीने रहने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने वहां बहुत सारे नाटक देखे। सौभाग्यवश उन्हें यूरोप के प्रख्यात नाटककार बर्टोल्ट ब्रेच्ट के नाटको को भी देखने का मौका मिला। इसमें उन्होंने पाया कि वे लोकल मुहावरों और लोकोक्तियों का जमकर प्रयोग करते थे। इससे वे बहुत प्रभावित हुए। बाद में भारत लौटकर उन्होंने इसी चीज को अपने नाटकों में अपनाया। इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें रूट लेवल तक अपनी पकड़ बनाने में मदद की।
नया थिएटर का जन्म 1958 में जब वे लौटकर भारत आए तो छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना पहला महत्वपूर्ण नाटक मिट्टी की गाड़ी बनाई। इसकी सफलता ने आगे चलकर नया थिएटर के शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया। और 1959 में उन्होंने अपनी पत्नी मोनिका मिश्रा के साथ भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की।

उनका रंगकर्म पूरे उफान पर था कि 1972 में में एक और बड़ी क्रांतिकारी घटना घटी। छत्तीसगढ़ की लोककथा पर उन्होंने गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद, का निर्माण किया, जिसने धमाल मचा दिया। इसने उनके नाट्य जीवन को एक अलग मुकाम और बुलंदी बख्शी।

चरनदास चोर ने गढ़ी थिएटर की नई परिभाषा
वक्त के साथ तनवीर साहब की सीमाएं बढ़ती जा रही थीं। उनकी ख्याति सरहद पार बहुत दूर तक पहुंचने लगी थी। जब भी थिएटर की बात आती तनवीर साहब को याद किया जाता। 1975 में वह समय आया जब उन्होंने मॉडर्न थिएटर की नई परिभाषा गढ़ते हुए चरनदास चोर रचा। इसकी सफलता का आलम यह रहा कि मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस नाटक को इसी नाम से स्मिता पाटिल जैसी अभिनेत्री के साथ बड़े पर्दे पर पेश किया।

थिएटर की दुनिया से इतर उन्होंने 9 फीचर फिल्मों में भी काम किया, जिसमें रिचर्ड एटनबर्ग की गांधी भी शामिल है।
हर सफल इंसान के साथ कुछ स्याह पहलू भी उनकी जिंदगी में वह दौर भी आया जब उनका नाटक पोंगा पंडित कट्टरपथियों के निशाने पर आया। अपनी दो किताबों को लेकर उनपर जानलेवा हमले भी हुए।
2005 में उनकी जिंदगी और नया थिएटर परे एक डाक्यूमेंटरी फिल्म गांव के नांव थिएटर, मोर नांव हबीब (मेरा गांव थिएटर है, मेरा नाम हबीब है) भी बनी।

आखिर के तन्हा दिन
अपनी पत्नी मोनिका से बेइंतहां मोहब्बत करने वाले हबीब तनवीर 2005 में उनकी मौत के बाद बिल्कुल तन्हा हो चले थे और टूट गए थे। उसके बाद भी अगर वह जिंदा थे तो इसकी वजह शायद उनकी रगों में दौड़ता रंगकर्म था, जो उन्हें तयशुदा मिशन को पूरा किए बगैर जाने की इजाजत नहीं देता।

उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

--आलोक सिंह साहिल

हिंदी मंचों के कविसूर्य थे ओम प्रकाश आदित्य

कल हिन्दी कविता की मंचीय परम्परा को समृद्ध करने वाले वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि ओमप्रकाश आदित्य की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। हिन्दी काव्य जगत इस कवि के चले जाने के बाद शोकाकुल है। हिन्द-युग्म के कवि अरुण मित्तल अद्‍भुत कवि आदित्य के प्रति अपनी यह श्रद्धाँजलि अर्पित की है-


हिंदी मंचो के कविसूर्य श्रद्धेय श्री ओम प्रकाश 'आदित्य'


हिंदी काव्य मंचो पर यदि तीन शब्दों को जोड़ा जाए - कविता, हास्य और छंद, तो मात्र एक ही नाम जहन में आएगा और वो होगा श्री ओम प्रकाश 'आदित्य', सुकोमल चेहरा, अल्हड भाषा, उच्चारण में मिठास, शब्दों में सम्मोहन की शक्ति, क्या नहीं था उस महान साहित्य मनीषी के पास, आज गजल और गीत में संस्कार है, जीवन दर्शन है, छंद है परन्तु वो इस पीढी के एकमात्र ऐसे रचनाकार दिखे जिन्होंने इन सभी जरूरी भावों को हास्य की सहजता के साथ प्रस्तुत किया. सचमुच आदित्य दादा ने मंचो पर हास्य का एक ऐसा युग जिया, और एक ऐसा स्तर स्थापित किया जिसे आने वाले युग में किसी कवि द्बारा छू पाना सरल नहीं होगा. उनका कोई सानी नहीं था. मंच पर आते ही मधुर सी भूमिका, सरल और अल्हड शब्दों में कवियों का अभिवादन, छोटे बड़े सभी कवियों को प्यार और सम्मान उनका नियम था.

सादगी आदित्य दा की पोशाक थी. उन्होंने काव्य पाठ के लिए कभी चुटकुलों का सहारा नहीं लिया, कभी किसी पर फब्तियां नहीं कसी, कभी किसी का भूल से भी मजाक नहीं बनाया, मंचों के स्तरहीन टोटकों से हमेशा परे रहकर अपनी बात कहने का अद्भुत हुनर हर किसी को उनका दीवाना बना देता था.
आदित्य जी घनाक्षरी छंदों से काव्यपाठ की शुरुआत करते थे दो चार छंद और एक दो प्रतिनिधि कवितायेँ और बीच बीच में उनके संस्मरण जो वास्तव में प्रेरणा दायक होते थे, मैं हरदम कहता हूँ की "हास्य में कविता" और वो भी 'छंद' के साथ, मुझे बहुत ज्यादा नाम नहीं सूझते 'गोपाल प्रसाद व्यास, काका हाथरसी और फिर घूम फिरकर आदित्य दा. उनके छंद पढने का अंदाज़ निराला था. हर शब्द को चबा चबा कर बोलना और साहित्यिक शैली में हास्य की बात घनाक्षरी छंदों में लिखना एक छोटा सा उदहारण है


"अबके चुनाव की लहर ने कहर ढाया, नदियों के साथ कैसे कैसे नाले बह गए
उल्लुओं को अम्बुआ की डाल पर देख कर, हौसले बसंत के अनंत तक ढह गए
भारत में कभी गंगू तेलियों का राज होगा, जाते जाते राजा भोज मंत्रियों से कह गए
चाँद से चरित्र वाले नेता सब चले गए, नेताओं के नाम पर ये कलंक रह गए


उनकी उपमाएं और उपमान अद्वितीय थे. उन्होंने हर प्रकार का हास्य लिखा, छोटी बहर के छन्दों में भी, घनाक्षरी तो उनका प्रिय छंद रहा ही, आल्हा छंद में पूरी राजनीति का चरित्र बांधकर जब वो सुनाते थे तो श्रोता झूम उठते थे, एक उदहारण है

सुमरण कर के मंत्रिपद का, भ्रष्टाचार का ध्यान लगाय
करुँ वंदना उस कुर्सी की, जिस पे सबका मन ललचाय
बिन बिजली के कैसा बादल, बिन पूँजी क्या साहूकार

बिन बन्दूक करे क्या गोली, बिना मूठ कैसी तलवार

बिना डंक बिच्छु क्या मारे, फन बिन सांप डसे क्या जाय,
रूप बिना वेश्या क्या पावै, घूस बिना अफसर क्या खाय

बिन जल के मछली ना जीवे, बिन जंगल न जिए सियार
बिन कुर्सी मंत्री न जीवे, जो जीवे उसको धिक्कार


इसी आल्हा में हर्षद मेहता काण्ड के कारण हुए विवाद पर लिखा-

"कुर्सी छोडो, कुर्सी छोडो गूँज उठा संसद में नाद,
दिल्ली में नरसिम्हा रोये, आँसू गिरे हैदराबाद


उन्होंने हास्य के हर पहलू को जिया, एक छंद की अंतिम पंक्ति है :

पिछले चुनावों से वो मेरा गधा लापता है,
ढूँढने आया हूँ उसे संसद भवन में


एक और कविता में उन्होंने बहुत अच्छा हास्य और व्यंग पिरोया है, जो पिछले दिनों काफी चर्चित रही :

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं
......
घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्वयनप्राश देखो


आदित्य जी के साहित्य के बारे में जितना लिखो कम है उन्होंने एक ऐसा प्रयोग भी किया जो सचमुच उनके साहित्य के प्रति समर्पण और अपने साथी और अग्रज कवियों के प्रति सम्मान को दिखता है. इतना ही नहीं उस प्रयोग से उनकी साहित्यिक प्रतिभा के विस्तार का भी सहज ही अनुमान हो जाता है. उन्होंने एक ऐसी कविता लिखी कि एक विशेष स्थिति पर यदि १०-१२ हिंदी के प्रसिद्द कवियों को लिखने के लिए कहा जाता तो वो कैसा लिखते. स्थिति थी की एक लड़की अपने घर वालों से लड़कर छत पर बैठी है और कूदकर मरना चाहती है, हालांकि इस कविता में काफी कवियों की शैली में उन्होंने लिखा है परन्तु मैं दो उदाहरण जो सचमुच विचित्र ही नहीं बल्कि विधा में भी विपरीत से ही लगते हैं प्रस्तुत कर रहा हूँ

सुमित्रा नंदन पन्त जी की शैली में :


स्वर्ण शोध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुन्दर प्रतिपल
उन्मन उन्मन अपलक नीरव
शशि मुख पर कोमल कुंतल पट
कसमस कसमस चिर यौवन घट
पल पल प्रतिपल, छल छल करती निर्मल दृगजल
ज्यों निर्झर के दो नील कवँल
ये रूप चपल ज्यों धुप धवल
अति मौन कौन, रूपसी बोलो
प्रिय बोलो न


काका हाथरसी जी की शैली में

गौरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है, भली करै करतार
भली करै करतां, न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार के नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना
उधर कूदना, मेरे ऊपर मत गिर पड़ना



और न जाने कितनी ही कवितायेँ मेरे मन में रम, रच बस गयी हैं, विद्यार्थी की प्रार्थना, दुल्हे की घोडी, संपादक पर कविता, बूढा, आधुनिक शादी, नोट की आरती आदि आदि ..... आदित्य जी ने देश के स्वाभिमान की बात जहाँ भी आई वहाँ वहाँ खुलकर बोला, अंग्रेजी के प्रसिद्द लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह द्बारा हिंदी भाषा पर की गयी अपमानजनक टिप्पणी पर उन्होंने "ओ खुशवन्ता" नाम से कविता लिखी जिसे मंचो पर काफी स्नेह मिला...

कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ थी


ओ खुशवन्ता
भारत में चरता विचरंता
अंग्रेजी की बात करंता
हिंदी दिए दरिद्र दिखंता
क्यों लन्दन जा नहीं बसंता


केवल हास्य ही नहीं जहाँ कही भी उन्हें लगा की रस परिवर्तन की जरूरत है, उन्होंने वो भी किया उनकी कविता "सैनिक की पत्नी का पत्र" इस बात का प्रमाण है जिसमे एक छंद में उन्होंने लिखा:

"आप सीमा पर गए चिंता इसकी नहीं है
दुःख यही है की प्राण मैं भी कुछ धारती
मुझे एक बन्दूक थमा के चले जाते
चुन चुन कर यहाँ देश द्रोहियों को मारती
आप क्रुद्ध होके वहां सीमा पर युद्ध करें
पूजा पाठ में समय मैं यहाँ गुजारती
मात्रि भूमि मंदिर में वन्दे मातरम गाके
विजयी तिरंगे की उतारती हूँ आरती


मैंने उनको बचपन से सुना है, पढ़ा है और मनन भी किया है, मेरे पापा श्री महावीर प्रसाद मित्तल न केवल कविताओं के शौकीन रहे बल्कि उन्होंने मुझे आदित्य जी की कई कवितायेँ सुनाई भी और याद भी करवा दी, आदित्य जी की पहली कविता जो मुझे याद हुई वो चुनावी परिप्रेक्ष्य में थी जिसमे प्रधानमंत्री की कुर्सी की पीडा का वर्णन था.

देखो पी एम् की कुर्सी बिचारी बताओ मैं किसको वरूं
न मैं ब्याही रही न कुवांरी बताओ मैं किसको वरूं


और अनेक कवितायेँ और अनेक रूप हैं आदित्य जी के साहित्य सृजन के, जीवन की सरलता के सम्बन्ध में उनका एक सार्थक छंद, भाई चिराग जैन जी के ब्लॉग से उठाकर परोस रहा हूँ,

दाल-रोटी दी तो दाल-रोटी खा के सो गया मैं
आँसू दिये तूने आँसू पिए जा रहा हूँ मैं
दुख दिए तूने मैंने कभी न शिक़ायत की
जब सुख दिए सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी तो पतित पावन है
जो तू करा ता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाउंगा
तूने कहा जिए जा तो जिए जा रहा हूँ मैं


सचमुच "दुल्हे की घोडी", एक विशुध्ध हास्य कविता में "जीवन दर्शन" की इतनी सार गर्भित पंक्तियाँ सुनकर उन्हें नमन करने पर विवश हो गया: (घोडी भाग रही है और दूल्हा पीठ से चिपका हुआ है, घोडी के भागने की गति पर)

घोडी चलचित्र सी
युग के चरित्र सी
कुल के कुपात्र सी
आवारा छात्र से
पथ भ्रष्ट योगी सी
कामातुर भोगी सी
उच्छल तरंग सी
अतुकांत कविता सी
और छंद भंग सी

दौडी चली जा रही थी ...........


१५ नवम्बर, २००७ को दस्तक नयी पीढी नाम से एक काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसमे १५ युवा कवियों ने काव्य पाठ किया, जिनमे एक मैं भी था, सञ्चालन भाई चिराग जैन ने किया, आदित्य दादा, अल्हड बीकानेरी जी और डॉ कुंवर बेचैन जी उसमे विशेष रूप से युवा कवियों में संभावनाएं तलाशने के लिए उपस्थित थे, पूरे कवि सम्मलेन में न केवल उन्होंने हर कवि को मन से सुना बल्कि अंत में आदित्य जी ने सबकी प्रतिभा की सराहना भी की और लगभग हर कवि से सम्बंधित बात करते हुए आशीर्वचन भी कहे.... ये प्रमाण था उनके साहित्य के प्रति समर्पण का, वो चाहते थे की मंच पर अच्छे स्तर की कविता हो और उसी की तलाश में उन्होंने हर नौसीखिए कवि के एक एक शब्द को सुना.

यह तय है की आदित्य जी की रचना धर्मिता को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता, वो एक ऐसा व्यक्तित्व था जो हमेशा हमेशा के लिए अपनी कविताओं से हमारे दिल में बस गया. उनका कवि परवार से अकस्मात चले जाना एक अपूर्णीय क्षति है, आदित्य जी आज भी कहीं आँखों में तस्वीर बनकर बसे हैं सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम दिल्ली में, काव्य पाठ करते कवि ओमप्रकाश आदित्य, हिंदी भवन में "दस्तक नयी पीढी की' कार्यक्रम में श्री जगदीश मित्तल जी के जन्मदिवस पर युवा कवियों को आर्शीवाद देते पितामह कवि आदित्य जी. हर समय उतने ही सरल, सौम्य, और सचमुच के बड़े कवि. कौन कहता है की वो चले गए ......... साहित्यकार कभी नहीं मरते, अमर होते हैं .... आदित्य दादा आज भी हम सब के दिलों में हैं, हर मंच पर आज भी उनकी अमिट छाप है, हमारी जुबान पर आज भी उनकी कवितायेँ हैं, वो हम सब में बसे हैं ........ समस्त हिंदी साहित्य उनके ईमानदार साहित्य सृजन का ऋणि रहेगा