
नशा कोई भी हो, हर हाल में नुकसानदेह है. लेकिन सिगरेट पीना एक ऐसा नशा हैं जो पीने वालों के साथ-साथ ना पीने वालों को भी अपना शिकार बनाता है. सिगरेट से निकलता धुआँ सैकड़ों लोगों की जिन्दगियों में अँधेरा कर देता है. टी.बी, फेफडों का कैंसर, मुँह का कैंसर आदि बीमारियाँ तथा प्रजनन क्षमता में कमी जैसे भयानक परिणाम सामने आते हैं. किन्तु आज समाज में "हर फिक्र को धुँए में उड़ाने" की प्रवृति जन्म ले चुकी है. सिगरेट पर रोक लगाने के लिये कई कानून भी बनाये गये हैं, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों में सिगरेट पीना कानूनन अपराध है. ऐसा करने पर जुर्माना तथा सजा हो सकती है. लोगों को जागरूक करने के लिए सिगरेट के पैकेट पर बड़े-बड़े अक्षरों तथा चित्रों में चेतावनी दिये जाने का कानून बना है. यहाँ तक की अट्ठारह साल से कम उम्र के लोगों को सिगरेट न बेचना तथा स्कूल/कालेजों से सौ ग़ज की दूरी तक सिगरेट की कोइ भी दुकान न होना कानून लागू किया गया है.
लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या केवल कानून बनाना देना ही इस समस्या का हल है. कानून तो पहले भी बने थे उनका नतीजा क्या निकला, कुछ नहीं. जब तक कानून को पूरी इमानदारी से लागू ना किया जाए, हल निकल भी कैसे सकता है. आप अपने आस-पास कितने ही उदाहरण देख सकते हैं जहाँ स्वयं पुलिस वाले ही कानून की धज्जियां उड़ाते हुए मिल जायेगें. बसों में लिखा होता है कि "धूम्रपान निषेध है" लेकिन वहाँ कंडक्टर और ड्राइवर ही सिगरेट पीते मिल जायेगें तो वो दूसरों से क्या कहेगें ?
खै़र यहाँ मेरा मक़सद कानून को कोसना नहीं है वरन लापरवाहियों की तरफ ध्यान दिलाना था. अगर सरकार सही में सिगरेट मुक्त वातावरण चाहती है तो उसे समय-समय पर नशा मुक्त कैम्प लगाने चाहिये और लोगों को नशे से मुक्त होने में मदद करनी चाहिये.
दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

मार्कण्डेय