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Thursday, May 20, 2010

मुखोटे लगा लो .....पैसा कमा लो

तू बेवकूफ है झूठ नहीं बोल सकती थी ...........?
तेरी शकल पर झलक जाता है तेरे मन का भाव ....ऐसे कैसे काम करेगी तू?

अच्छी बातें करने वाले सारे लोग ही अच्छे हो ऐसा जरूरी नहीं होता ...जितना दूर रह सको ऐसे लोगो से उतना दूर रहो ................

उसने पूछा और तूने बता दिया ......बेवकूफ कहीं की ........कुछ नहीं हो सकता तेरा .......

ज्यादा मेहनत और लगन से काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है ..काम कोई नहीं देखता .............


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यूँ ही अगर लिखती जाऊँ तो बात बहुत लम्बी हो जाएगी

ये तमाम वाक्य...अक्सर उस लड़की को कहे जाते रहे हैं जो इस दुनिया में रहकर भी उस जैसी नहीं बन पा रही है ....यहाँ मैं ये भी कहना चाहूँगी कि बात सिर्फ उस एक लड़की कि नहीं है ...न जाने कौन-कौन हो इस तरह के दो पाटो में शामिल ...........

बचपन की पढ़ाई-लिखाई और युवा मन के सपनों के साथ आप जब आगे की दुनिया में बढ़ते हैं तो दृश्य बदलने लगता है .......जो आँखे फाड़-फाड़ कर इस दृश्य का लुत्फ़ उठा लेते हैं, वो आगे की इस दुनिया में आगे बढ़ जाते है और जिनकी आँखे इस अजीब तरह के प्रकाश में चुंधिया जाती हैं, वो पहले आँखे मलते हैं और फिर हाथ मलते रह जाते हैं ............जो बातें मैं लिख रही हूँ , बिल्कुल भी नई नहीं हैं ..कहानी, उपन्यास और फिल्मों में कई बार संघर्ष के ऐसे किस्से कमाल किये गए है ........मगर हकीकत में भी जब एक ऐसे बॉक्स के ऑफिस पर आपको हिट होने के लिए मेहनत करनी पड़े जिसका कोई रिश्ता आपके काम से नहीं है .......तो सारी पढ़ाई-लिखाई और सपने कूड़ेदान में डाल देने का मन करता है ........वैसे इन निजी भावनाओं के आलावा भी कुछ तथ्य है जो इन हालातों के लिए जिम्मेदार है ................

प्रोफेशनल बनो
जब आप नौकरी करने निकलते हैं, तो आप के निश्छल और कभी मूर्खता भरे स्वभाव को देखते हुए कहा जाता है क़ि प्रोफेशनल बनो ..........सच मत बोलो .......सब कुछ छुपाओ ...काम आता हो तो भी मत करो.....बॉस के सामने न आता हो तो भी करने का दिखावा करो ........ये कुछ ऐसे टिप्स है जो तथाकथित प्रोफेशनल बनने में आपकी मदद करते हैं ........... कभी कभी मैं सोचती हूँ अगर ये पैमाना न होता तो देश कहीं आगे होता ..यहाँ हर जगह इंसान को नोचा जा रहा है ......जो काम करना चाहता है उसे करने नहीं देते जो नहीं करता उसे फलक पर बिठा देते हैं ...कौन क्यों कब कहाँ कैसे पहुँच गया .......आप सोचते रह जाइये लेकिन कुछ नहीं सूझेगा ...अगर सूझ भी गया तो उस रास्ते पर चलने के लिए आप शायद खुद को तैयार न कर पाए ..........आखिरी रास्ता कता बचा ...अलग अलग सूरते तय करती है ...कभी मुड़ जाना हुआ .......कभी लौटा आना ......कभी खुद को अलविदा करके एक मुखोटे को अपनाना .................फिर फराज के वो शब्द कि .......मंजिले दूर भी है ....मंजिले नजदीक भी ....अपने ही पाँव में कोई जंजीर पड़ी हो जैसे ........


हिमानी दीवान

Friday, June 19, 2009

भक्ति के नाम पर लूटते हैं पुजारी

दीपाली पन्त तिवारी "दिशा" बैंगलोर में रहती हैं..... बारहवीं कक्षा से ही कविताओं का शौक लगा....शादी से पूर्व शिक्षण कार्य भी किया है और इलैक्ट्रोनिक मीडिया से भी जुडी रही हैं....बरेली के चैनल वी एम दर्पण में न्यूज रिपोर्टर, न्यूज एंकर तथा एंकर भी रही हैं.....आजकल ब्लॉगिंग में जी-जान से जुटी हैं..... अपने ब्लॉग "दिशा" तथा वेबसाइट दैट्स हिन्दी डाट काम, मोहल्ला पर भी पाई जाती हैं...हिंद युग्म से हाल ही में जुड़ने के बाद इन्हें लगता है जैसे इनकी कई खूबियों को राह मिल गयी है. आमीन....


कह्ते हैं कि भगवान श्रद्धा-भक्ति और विश्वास के भूखे होते हैं. श्रद्धा से किया गया स्मरण मात्र भी प्रभु को खुश करने के लिये काफ़ी है. लेकिन उनका बनाया इंसान इन बातों को नही समझता. उसकी नजरों में पैसों के बिना किसी चीज का कोई मोल नही है.
जी हाँ मैं बात कर रही हूँ. वैष्णो धाम तथा ऐसे ही कई तीर्थों की, जहां श्रद्धालु दूर-दूर से अपनी मुरादें पूरी होने की आस लिये प्रभु दर्शन को आते हैं लेकिन वहां आकर उन्हें मिलता है तिरस्कार. 'जय माता दी' के नारों के बीच रास्ते की कठिनाईयों को भुलाते हुए जो श्रद्धालु माता के द्वार पहुँचते हैं, उन्हें क्या पता होता है कि यहां उनके द्वारा लायी गयी भेंट का कोई आदर नहीं अपितु उसे तो कूड़े की तरह एक कोने में फ़ेंक दिया जायेगा और प्रसाद स्वरूप उन्हें धक्के मिलेंगे, प्रभु दर्शन तो दूर की बात है.
इसी तरह अन्य स्थानों पर भी यही हाल है. अब आप जम्मू स्थित रघुनाथ मंदिर का ही उदाहरण ले लीजिये. रघुनाथ मंदिर एक ऐसा धर्म स्थल जो बहुत प्रसिद्ध है. वैष्णो धाम से लौटते हुए हजारों श्रद्धालु जम्मू स्थित इस स्थल पर प्रभु दर्शन के लिये अवश्य आते हैं. रघुनाथ मंदिर की प्रसिद्धता को देखते हुए और आतंकी हमले के बाद यहां चौकसी बढा़ दी गयी है. दरवाजे पर ही पुलिस चौकी है जो सभी आने जाने वालों की तलाशी लेती है ताकि कोइ लूटेरा या आतंकी मंदिर में प्रवेश न कर सके. लेकिन वे यह नही जानते कि असली लुटेरे तो मंदिर के भीतर ही हैं. अब आप सोचेंगे कि मैं किन लुटेरों कि बात कर रही हूं. आजकल पुजारी किसी लुटेरे से कम हैं क्या? यहां मंदिर में प्रवेश करने के बाद पुजारी पाँच सौ तथा हजार के नोट दिखाकर आपको जताते हैं कि आप भी इसी तरह की दक्षिणा उनकी थाली में रखें, यदि आप ऐसा नही करते तो वो आपको खरी-खोटी सुनाने से और तिरस्कृत करने से भी नहीं चूकेंगे. इस मंदिर के प्रांगण में कई अन्य मंदिर भी हैं. अत: लूटने का ये सिलसिला हर मंदिर में होता है. आज सभी तीर्थस्थानों में प्रोफ़ेशनलिज्म इस कदर हावी हो गया है कि लोगों की भावनायें कहीं भी मायने नहीं रखती. तीर्थस्थानों में बैठे पुजारियों को तो अपने नोटों से मतलब. इनका शीश प्रभु के आगे नहीं बल्कि ५०० और १००० के नोटों की हरियाली के आगे झुकता है.
कहा जाता है कि "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी".अर्थात जिसकी जो भावना हो उसे वैसा ही दिखाई देता है. जहां श्रद्धालुओं के लिये पत्थर की मूरत साक्षात प्रभु हैं, वहीं पुजारियों के लिये केवल लूटने का एक जरिया है.

दीपाली तिवारी