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Friday, August 13, 2010

लंदन में 15 अगस्त मनाना ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है...

भारत देश हमारा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा...

जब से अपने भारत देश ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाई है उसमे एक साल और बढ़ गया है..15 अगस्त के दिन भारत के हर शहर, गाँव, गली-कूचे..देशभक्ति से ओत-प्रोत लोगों की बातों से गुंजित होंगे...गाने-फ़िल्में, डांस आदि के कल्चरल प्रोग्राम होंगे, स्पीच होगी और सड़कों पर तरह-तरह की वेश-भूषा में परेड निकलेंगीं...और लोग भीड़ में धक्का खाते हुये, या घर की छतों से उन्हें देखने का आनंद उठायेंगे...... जिन्हें दिल्ली जाकर भीड़ में शामिल होकर लालकिले पर झंडा लहराते हुये देखने का व प्राइम मिनिस्टर की दी हुई स्पीच सुनने का और परेड देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा वह अपने घर या चौपाल में बैठे टीवी पर ही देखकर दिल्ली में हुये उत्सव का आनंद लेने की कोशिश करेंगे. स्कूलों के बच्चे लाइन में खड़े होकर ( जैसा मुझे अपना बचपन याद आता है ) '' 'जन-गण-मन' और '' वन्देमातरम '' जैसे देशभक्ति के गाने गायेंगे..आसमान में पतंगें उड़ रही होंगी..क्या सीन होगा...और हम यहाँ बैठे हुए ज़ी टीवी पर उनकी कुछ झलकियाँ देखकर अपने देश के बारे में सोचकर अपनी आँखे नम करेंगें..क्योंकि यहाँ इतनी दूर रहकर टीवी की झलकियाँ ही तिरंगे को दिखाकर दिल में तरंगें पैदाकर हलचल मचाकर अपना गुजरा हुआ जमाना याद दिला देती हैं...इन तरंगों का भी उठना बहुत जरूरी है...कितने ही देशभक्त पतंगों की तरह देश पर कुर्बान हो गये. गाँधी जी ने, साथ में और भी तमाम देश-भक्तों ने पता नहीं क्या-क्या झेला देश की आजादी को प्राप्त करने के लिये और साथ में न जाने कितने और लोगों ने भी कुर्बानियाँ दीं जिनके नाम भी नहीं पता सबको.

लेकिन इतना सब कुछ हुआ..क्यों हुआ..देश को आजाद कराने के पीछे उन महान आत्माओं के सपने थे अपने देश की सुन्दर तस्वीर के. लेकिन लोग कैसे रहेंगे आजादी के बाद...और उनके इस दुनिया से जाने के बाद और उस आजादी का भविष्य में किस तरह इस्तेमाल किया जायेगा इसका उन लोगों को कोई अनुमान नहीं रहा होगा. जो गाँधी जी के सिद्धांत थे उनपर कितना अमल हो रहा है ? अहिंसा की जगह हिंसा का प्रयोग, शांति की जगह अशांति, बेईमानी, रिश्बतबाजी, हर जगह फैला आतंक, भ्रष्टाचार, दरिद्रता, अनैतिकता, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव..और भी न जाने कितनी समस्यों से देश ग्रस्त हो चुका है...इनका निवारण करने की तरफ कौन से कदम उठे हैं ? गरीबी, अत्याचार, लोगों के प्रति अन्याय..किसी भी क्षेत्र में सुधार होता नजर नहीं आ रहा है...जनता टैक्स देती है लेकिन उसका सदुपयोग उनके इस्तेमाल के साधनों की तरफ नहीं बल्कि किसी और तरफ नाजायज रूप में खर्च होता है....

बिजली, सड़कें, गंदगी, पानी और महँगाई से सूखता लोगों का खून
लाचारी, मजबूरी, कानून का डर शांत कर देता है तब उनका जुनून.

इन सब बातों को लिखते हुए, जिनसे आप सब लोग मुझसे अधिक परिचित हैं, सोचती हूँ कि कुछ लोगों के दिल में ये ख्याल आ रहा होगा या जिज्ञासा हो रही होगी कि मैं आप लोगों को बताऊँ कि यहाँ यू. के. में 15 अगस्त का दिन कैसे मनाया जाता है..लेकिन आपको शायद ताज्जुब होगा कि इतने साल यहाँ रहने के वावजूद भी मैंने इस बात पर कभी गौर नहीं किया था..मैं इस तरह के समारोह के बारे में अनजान रही थी..इस बारे में कुछ विदित ही नहीं हो पाया था अब तक. एक तो अंग्रेज लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों मनाने लगे..ये तो वही बात होगी कि किसी के हाथ से सुई लेकर उसी की आँख में चुभो दो..मतलब ये कि उन पर ज़ोर दो कि तुम लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों नहीं मनाते इस देश में. अरे भाई, जो हमारा देश छोड़ने पर मजबूर हुये उनको याद दिलाकर जले में नमक छिडकने जैसा हुआ कि नहीं ये ? इस बारे में कोई जश्न यहाँ खुले आम नहीं होता. हमारे अपने आजादी-दिवस पर भारतीयों के लिये न कोई छुट्टी का दिन रखा गया है ( इनके अपने त्योहारों के दिन होते हैं जिन पर छुट्टी होती है ) न कोई झंडा लहराना, न परेड न स्कूलों में कुछ..और न ही लाइब्रेरी में हमारे स्वतंत्रता दिवस को इस देश में मनाने के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है. लेकिन यहाँ कुछ जगहों पर जहाँ अधिक भारतीय रहते हैं वहाँ भारतीय लोग मिलकर किसी हाल वगैरा में लोकल काउंसिल की मदद से इस दिवस को मनाने का आयोजन रखते हैं..और लन्दन में भारतीय विद्या-भवन में भी इस अवसर पर समारोह मनाया जाता है जिसमे भारतीय नृत्य-गाना, सितार और तबला-वादन आदि का प्रोग्राम होता है. और भारतीय हाई कमिशनर '' रायल केनजिंगटन पैलेस गार्डेन '' नाम की बिल्डिंग के बाहर अपने देश का तिरंगा फहराता है और वहाँ के सुन्दर गार्डेन या हाल में स्पीच देता है...उसके बाद वहाँ पर कुछ कल्चरल प्रोग्राम होता है नाच-गाना इत्यादि...और खाने आदि का कार्यक्रम होता है...इस बार का प्रोग्राम है: 15 अगस्त को 10.30-3.00 तक के प्रोग्राम में 11 बजे सुबह भारतीय हाई कमिशनर नलिन सूरी अपने देश का तिरंगा ऊँचा करेंगे उसके बाद '' इंडियन जिमखाना क्लब '' में खाने का प्रबंध होगा जहाँ भारत के सभी क्षेत्रों के खाने के स्वाद के स्टाल होंगे व भारतीय कल्चरल प्रोग्राम भी होंगे जिसमे शायद भरत-नाट्यम नृत्य और संगीत आदि है.

आप सभी पाठकों को व हिन्दयुग्म से जुड़े सभी सदस्यों को इस स्वतंत्रता दिवस पर बधाई व मेरी शुभकामनायें...जय हिंद ! वन्देमातरम !

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका ने लंदन से अपना अनुभव हमें भेजा है....तस्वीर लंदन के किसी पुराने समारोह की है, 15 अगस्त के मौके पर)

Monday, July 26, 2010

गोरों की रसोई में हिंदुस्तानी मसालों का राज

जहाँ तक भारतीय मसालों की खुशबू विदेशों में फैलने का सवाल या जिक्र है तो वो विदेशों में अभी से नहीं बल्कि पता नहीं कितने बरसों से फैली हुई है...सभी बड़े-बड़े फूड और ग्रॉसरी स्टोर भरे पड़े हैं भारतीय मसालों और आटा, दाल, चावल, घी, तेल से...सभी गोरे और काले लोग भारतीय खाने के क्रेजी यानी दीवाने हुए जा रहे हैं। 'करी' उन सबकी फेवरट डिश है..और चिकेन टिक्का मसाला तो सरताज बना है भारतीय '' करी '' में उन सबके लिये..मसालेदार चिकेन कोरमा भी चावल के साथ बहुत खाते हैं.. काफी समय पहले इटैलियन खाना टॉप पर समझा जाता था ब्रिटेन में फिर चाइनीज खाना हुआ टॉप पर लेकिन अब सालों से भारतीय खाना ही टॉप पर है और छा गया है उन सबके दिल-दिमाग और पेट पर. गोरे लोग तो हैं ही दीवाने भारतीय खाने के..जिसे वह जमकर खाते हैं..साथ में अफ्रीकन, चाइनीज, इटैलियन भी अब हमारे देसी खाने के शौक़ीन होते जा रहे हैं...और जर्मन लोगों की तो पूछो ही ना...हर जर्मन चाहें किसी उम्र का भी हो उसे भारतीय खाना बहुत पसंद है...यहाँ पर कुछ गोरों के कुत्ते भी करी पसंद करते हैं...उनके संग खाते-खाते उनकी भी आदत पड़ गयी....ये मजाक की बात नहीं बल्कि सही है...और '' करी '' शब्द से उनका मतलब होता है..भारतीय मसाले वाली डिश...यानी दाल या सब्जी..चाहें वह '' मीट करी '' हो '' वेजिटेबिल करी '' या '' लेंटिल करी '' ( दाल ). लस्सी भी बड़े शौक से पीते हैं ये लोग. अधिकतर गोरों को कहते सुना हैं कि उन्हें उनका खाना अब अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह फीका होता है...यानि कि स्वादरहित...यहाँ हर तरह के मूड का फूड मिलता है और लोग अपने मूड के हिसाब से फूड खाते हैं...मतलब कि अब तो फ्यूजन फूड का भी कबसे फैशन चल पड़ा है...फ्रेंच फ्राइज ( french fries: आलुओं की तली हुई लम्बी फांके ) इन्हें यहाँ पोटैटो चिप्स भी कहते हैं...हाँ, तो इनके साथ करी भी खाते हैं अब लोग...पैकेट में जो बिकते हैं उन्हें क्रिस्प बोलते हैं...तो अब कुछ क्रिस्प या चिप्स भी यहाँ ब्रिटिश स्टोर्स में मसाला पड़े बिकने लगे हैं..पिज्जा के साथ फ्रेंच फ्राइज और आग में या ओवेन में भुने हुये आलू में सोया मिंस और राजमा की सूखी मसाले वाली सब्जी भर कर खाते हैं..जिसे जैकेट पोटैटो के नाम से बोलते हैं.
यहाँ भारतीय लोग तो हैं ही अपने खाने के शौक़ीन..घर में भी बनाते हैं और बाहर भी खाते हैं रेस्टोरेंट में. जो लोग भारत के जिस ख़ास क्षेत्र से आये हैं और जिन मसालों का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में होता है भारत में वह सभी मसाले यहाँ भारतीय ग्रासरी या फूड स्टोर्स में उपलब्ध हैं. और कई सालों से यहाँ के अपने भी बड़े-बड़े नामी स्टोर्स जैसे कि: Asda,Tesco, Sainsbury, Waitrose, Marks & Spencer, Iceland, Co Op, Lidl (जर्मन) आदि ग्रासरी स्टोर्स या कहो फूड स्टोर भी तमाम भारतीय मसाले बेचने लगे हैं...कुछ मसाले तो जैसे काली मिर्च, तेजपत्ता, इलायची आदि और कुछ अन्य भी मसाले भारतीय दुकानों की तुलना में अब इन स्टोर्स में सस्ते मिलते हैं...साथ में इन स्टोर्स में स्वाद में बहुत ही उम्दा तरीके का दही मिलता है. जिन इलाकों में भारतीय लोगों की तादाद अधिक है वहाँ के ग्रासरी स्टोर्स में अब इंडियन कुल्फी जिसमे सभी तरह की जैसे केसर, बादाम, पिस्ता, आम से बनी हुई और साथ में गुलाबजामुन और गाजर का हलवा इत्यादि भी बिकने लगे हैं. उत्तर भारत, दक्षिण भारत, गुजरात और पंजाब सब तरह के खानों के रेस्टोरेंट हैं जहाँ मिठाइयाँ भी मिलती हैं...और ब्रिटिश लोग भी भारतीय मिठाइयों के शौक़ीन हो रहे हैं वह चाहें काले लोग हों अफ्रीका के या गोरे किसी भी देश के...समोसा और पकौड़े तो बड़े ही शौक से खाते हैं जैसे कि हम लोग...और उनमें अगर मिर्च कम लगे तो कहते हैं कि जितना अधिक चटपटा हो उतना मजा आता है खाने में.. हर बिदेशी के घर में यहाँ कई तरह के भारतीय मसाले मिलेंगे..ये बात और है कि सभी प्रकार के नहीं क्योंकि अब तक उन लोगों को सब तरह के मसालों का खाने में उपयोग करना नहीं आता..लेकिन उनका उपयोग जानने के लिये बहुत उत्सुक रहते हैं...मेक्सिकन और मोरक्कन लोग अपने खाने में जीरा का प्रयोग काफी करते हैं, मोरक्कन लोग हरीसा सौस बहुत खाते हैं अपने खाने में..जिसमे मुख्य रूप से सूखी लाल मिर्च होती हैं जिन्हें तेल, धनिया पाउडर व नीबू का रस डालकर पीस कर बनाते हैं और यह एक लाल रंग के पेस्ट की तरह दिखती है, ग्रीक लोग मसालों को अधिक इस्तेमाल नहीं करते बस जीरा, काली मिर्च पाउडर और मिर्च पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, चाइनीज लोग जब करी बनाते हैं तो उसमें फाइव स्पाइस यानि कि पंच पूरन पिसे मसाले का प्रयोग करते हैं जो मेथी, सौंफ, कालीमिर्च, दालचीनी, लौंग और सोंठ ( सूखी अदरक ) का मिश्रण होता है...और इटैलियन लोग जब tomato sauce बनाते हैं pizza या pasta के लिये तो कभी-कभी उसमे bayleaf यानि तेजपत्ता डालकर बनाते हैं उससे sauce का flavour कुछ बढ़ जाता है. और वह लोग लाल सूखी मिरचों का इस्तेमाल उसे पीसकर भी करते हैं और साबुत मिरचों का इस्तेमाल हर्ब और चिली आयल बनाने में भी करते हैं...मतलब साबुत सूखी मिरचें ओलिव आयल में कुछ दिन डालकर रखते हैं फिर उस चटपटे तेल को pizza पर छिड़क कर खाते हैं या उसे अन्य प्रकार से भी इस्तेमाल करते हैं अपने खाने में ( हर्ब कई प्रकार के होते हैं जो इटैलियन खानों में ऐसे इस्तेमाल करते हैं जैसे हम लोग अगर धनिया या पोदीना का इस्तेमाल अपने खाने में डालकर करें ) और ब्रिटिश गोरे लोग कुछ मसाले जैसे हल्दी, मिर्च, धनिया और जीरा पाउडर, गरम मसाला, कालीमिर्च पाउडर का और जायफल पाउडर का इस्तमाल ही अधिक करना जानते हैं...मेथी व सौंफ का इस्तेमाल करना वह लोग नहीं जानते...जायफल के पाउडर को सेव की चटनी, कुछ ख़ास प्रकार के केक व पालक की सब्जी में बहुत इस्तेमाल करते हैं. अमरीकन लोग apple यानि सेब से और pumpkin यानि कद्दू से मीठी डिश pie जिसे आप पेस्ट्री भी कह सकते हैं खूब बनाते हैं और जिसमे दालचीनी पाउडर का खूब प्रयोग होता है.
कई बार ऐसा हुआ कि जब सुपरमार्केट में कुछ खरीदने गयी तो किसी गोरी या गोरा ने मुझसे पूछा कि मैं उस मसाले का इस्तेमाल कैसे और किस तरह के खाने में करूँगी और वह फिर मेरे बताने पर बड़े कौतूहल से सुनते हैं...और कई बार सब्जियाँ खरीदते हुये वो लोग पूछते हैं कि मैं उस सब्जी को किस मसाले से बनाउँगी...बैंगन का उपयोग करना यहाँ के बहुत लोग नहीं जानते और एक बार जब मैं बैंगन खरीद रही थी तो एक लेडी को जिज्ञासा हुई कि उसका कैसे इस्तेमाल होता है..तो मैंने उसे बैगन से बनने वाली तमाम तरह की चीजें बतायीं और उनमें पड़ने वाले मसालों के नाम भी..अक्सर इसी तरह ये लोग नये मसालों का इस्तेमाल करना भी जानते रहते हैं..और हाँ, ये लोग रोटी, पराठा, पूरी, और नान बगैरा बनाने को झंझट समझते हैं और बचते रहते हैं...उन चीजों को रेडीमेड ही खरीदते हैं...इन लोगों को इलायची, नारियल और केसर का उपयोग भी करना नहीं आता..क्यों कि इनके खाने में ये नहीं पड़ती और मिठाइयों में वैनिला व अन्य प्रकार के एसेन्स पड़ते हैं...लन्दन में न जाने कितने भारतीय रेस्टोरेंट हैं जहाँ खाने वाले गोरों की संख्या उतनी ही मिलेगी जितनी कि भारतीय लोगों की..बल्कि कई बार उनसे भी ज्यादा..कुछ भारतीय रेस्टोरेंट सारा दिन खुलते हैं..कुछ केवल दोपहर और शाम को यानि कि लंच व डिनर के लिये और कुछ शाम को ही जो Take Away फूड कहलाते हैं जहाँ लोग खाना खरीदकर घर ले जाकर खाते हैं..और ऐसी जगहों पर अधिकतर अंग्रेज ही खरीदते हुये देखे जाते हैं जो भारतीय खाने के शौक़ीन हैं. आम की भी इन दिनों भरमार है हालांकि इस साल अभी लंगड़ा आम नहीं आया है..लेकिन चौंसा आम आ रहा है..और भी प्रकार के आम जैसे हनी पाकिस्तान से आ रहा है...एक आम करीब ५० रूपए का मिलता है यहाँ.

स्ट्राबेरी, सेव, नाशपाती, प्लम, रास्पबेरी , ब्लैकबेरी, रेड करेंट और आड़ू यहाँ ब्रिटेन में खूब उगाये जाते हैं. यूरोप के अन्य देशों से व अफ्रीकन देशों से भी तमाम खाने की चीजें आती हैं...स्पेन से तरबूज, खरबूजा, कई प्रकार के संतरे, वेस्ट इंडीज से केले, साइप्रस से भी तरबूज और खरबूजा, इटली से अँगूर, पीचेज, टमाटर, संतरे और अफ्रीका से तमाम तरह की सब्जियाँ जिनमे जमीन के अन्दर उगने वाली भी होती हैं, कद्दू व कच्चे केले...भारत से तो तमाम फल और सब्जियाँ आती हैं...उनकी तारीफ में क्या और कितना कहूँ...कई सालों पहले न इतने स्टोर थे और ना ही इतनी विविध प्रकार के फल व सब्जियाँ..लेकिन अब अन्य सभी चीजों के साथ मसालों की भी हर जगह भरमार है...
मसालों ने बनाया हर देश में मुकाम, हिंदुस्तान का ऊँचा कर दिया नाम...है ना कमाल की बात..? जय हिंद !!!!!

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका लंदन में रहती हैं)