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Tuesday, September 08, 2009

ब्लू फिल्म से फालतू दृश्य काट दिए गए...

मैं नहीं जानता था कि रागिनी उन बीस हज़ार रुपयों का क्या करेगी? पहले तो वह बुटीक खोलना चाहती थी। लेकिन वह एक इच्छा पर इतने दिन टिकने वाली नहीं थी और टिकती भी तो बीस हज़ार रुपयों में बुटीक कैसे खोला जा सकता था? मैं जानता था कि उसे तलाक़ की कार्रवाई के लिए उन पैसों की ज़रूरत नहीं है। वह तलाक़ चाहती ही नहीं थी। हम दोनों में शायद एक ही बात कॉमन थी कि हम दोनों कश्मीर जाना चाहते थे। यह भी हो सकता था कि वह उन पैसों से कश्मीर जाना चाहती हो, विजय के साथ या अकेले ही। उसे बच्चे भी बहुत पसन्द थे लेकिन बच्चे पैदा करने के लिए तो पैसों की ज़रूरत नहीं होती। उसे लालकिला भी अच्छा लगता था लेकिन वह भी बिकाऊ नहीं था और बिकाऊ होता भी तो बीस हज़ार में नहीं बिकता। हम दोनों ने एक बार साथ में लालकिला देखा था। लालकिले से लौटते हुए हम एक दूसरे किले में रुक गए थे। उस छोटे वीरान किले में एक बड़ा सा तालाब था, जिसमें सूखे पेड़ थे। मैं पत्थरों के बीच बैठा था। वह सामने इस तरह खड़ी थी कि उसका सिर थोड़ा सा हिलता था तो मुझे दोपहर का सूरज दिखाई देता था। मैंने तालाब में पत्थर फेंकते हुए उससे कहा था कि मैं उससे प्यार करता हूं। वह मेरी और लगातार देखती रही थी और मुस्कुराई थी। कम्बख़्त सूरज की वज़ह से मैं उसकी आँखें भी नहीं पढ़ पाया था। उसे अच्छा लगा था। ऐसा उसने कहा था। क्या वह उन बीस हज़ार में कहीं से यह अच्छा लगना खरीदना चाहती थी? नहीं, पिताजी ने मुझे बताया था कि अच्छा लगना दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं मिलता। यदि मिलता होता तो वे एक-दो ट्यूशन पढ़ाकर माँ के लिए थोड़ा अच्छा लगना खरीद लाते।
यादव ने भी रागिनी से यही पूछा कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया? वह घर में अकेली थी और उसके लिए चाय बनाकर लाई थी। उससे पहले यादव ने कहा था, “बहुत सामान है तुम्हारे घर में।“ वह पीली छत, हरी दीवारों और फ़ानूस वाला ड्रॉइंग रूम था- रागिनी का ड्रॉइंग रूम। वह खुश हुई थी और उसने कहा था कि बस ज़रूरत भर की चीजें हैं। फिर उसने टीवी ऑन कर दिया था। मैं या लता वैसा टीवी देखते थे तो हमें बहुत अजीब लगता था। हमारी आँखें ऊपर से नीचे चलते हुए फ़्रेम की आदी हो चुकी थी। फिर वे दोनों दो बहनों की कहानी वाले एक धारावाहिक की बात करने लगे। उन दोनों बहनों के चेहरे एक जैसे थे। यादव ने कहा, हमशक्ल। मैं बचपन में यह शब्द बहुत मुश्किल से सीख पाया था। मुश्किल चीजें हमेशा याद रहती हैं। इसी तरह ज़िप वाले नेकर मुझे बहुत कष्ट देते थे। यादव ने उसे बताया कि उसे सनी देओल की फ़िल्में बहुत पसन्द हैं और एक लड़की लगभग उसके बिस्तर पर आ गई थी, जिसे छोड़कर वह पाँचवीं बार ‘गदर’ देखने पहुँचा था। रागिनी हँसी। मुझे उसका हँसना बहुत अच्छा लगता था और उसे हँसना बहुत अच्छा लगता था और इस तरह अच्छा लगना बहुत आसान था। मेरा मन करता था कि मैं उस अच्छा लगने का कम से कम आधा हिस्सा माँ को दे दूं। लेकिन माँ को अपने गाँव वाला अच्छा लगना चाहिए था। उसके लिए हमें माँ को उसके मायके छोड़कर आना पड़ता, जहाँ सांय सांय करता एक उजाड़ घर था। वहाँ भी उसे बुरा ही लगता। माँ को अच्छा लगने के लिए कम से कम चालीस साल पहले जाना पड़ता, जहाँ वह बच्ची होती। उस स्थिति में पिताजी को भी फिर से जवान होना पड़ता। इसमें यह भी फ़ायदा होता कि उनका पेट ठीक हो जाता। फिर वे कभी नहीं चिल्लाने की कसम भी खा लेते। इस तरह सबको मौके मिलने चाहिए थे कि लोग अपनी गलतियाँ सुधार सकें। गलतियों का अहसास होना और उन्हें सुधारने के लिए अतीत में न लौट पाना, गलतियाँ करने से भी बुरा था।

माँ और पिताजी की उम्र चालीस साल कम होने पर मुझे और लता को पिछले जन्म में लौटना पड़ता। लौटते हुए रास्ते में जब वह आठ साल की होती तो स्कूल के कमरे की ढहती हुई छत का पत्थर अपने सिर पर गिरने से भी बचा सकती थी। वह पहले ही दौड़कर आसमान के नीचे आ जाती और छत टूटने को देखने का इंतज़ार करती रहती। कोई और बच्चा भी उधर से गुज़र रहा होता तो वह उसे आवाज़ लगाकर उधर जाने से रोक लेती। बच्चा उसकी बात न मानता तो वह उसे बातों में लगा लेती। बचपन से ही उसे दुनिया भर की बातें आती थी। वह बच्चा मैं भी हो सकता था, लेकिन मैं होता तो बातों में लगने के लालच के बिना भी चुपचाप उसकी बात मान लेता। इस तरह उसके सिर पर पत्थर का गिरना और उसका एक घंटे तक दर्द से बिलबिलाना टल जाता और बरसों बाद की उसकी बीमारी, सपने, बेहोशी और कभी कभी का पागलपन भी। वैसे माँ के अनुसार पागलपन तो हमारे खून में था।
पिछले जन्म में हम कुछ भी हो सकते थे। हो सकता है कि लता लड़का होती और मैं लड़की और हम भाई-बहन भी न होते। वैसे मुझे विकल्प दिया जाता तो मैं कोई पक्षी बनना चाहता जैसे साइबेरियन सारस। विकल्प होने पर लता खरगोश बनना चाहती और रागिनी लड़की। उसे लड़की होना बहुत पसन्द था। पिताजी लेखक बनना चाहते और माँ डॉक्टर। यादव, यादव ही रहना चाहता। उनके घर में कार थी।
हाँ, मैं मर गया था। आँखें बहुत दुख रही थी, इसलिए मैंने मरने से पहले रसोई में से एक कपड़ा ढूंढ़कर उसे ठंडे पानी में भिगोकर आँखों पर बाँध लिया था। बेकारी में मरने वाले लोग आमतौर पर सस्ती रस्सियों और छोटी लाइन की रेलगाड़ियों का इस्तेमाल करते होंगे। वैसे रेलगाड़ी खरीदनी नहीं पड़ती इसलिए बड़ी लाइन की गाड़ी के आगे कटकर भी मरा जा सकता है। सस्ती रस्सियाँ कई बार टूट जाती होंगी। दूसरी रस्सी खरीदने के पैसे नहीं बचते होंगे इसलिए कुछ आत्महत्याएँ स्थगित भी हो जाती होंगी। वैसे मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता कि मैं क्यों और कैसे मरा? मुझे सहानुभूति और स्पष्टीकरणों से बेहद चिढ़ थी।
वह कैमरा और उसमें बनी फ़िल्म यादव के पास ही रह गई थी। उसने उसे एडिट करके फ़ालतू दृश्य काट दिए थे। अब वह सोलह मिनट सैंतीस सेकंड की आदर्श ब्लू फ़िल्म बन गई थी। उसके अपने परिष्कृत रूप में तैयार हो जाने के बाद उसने रागिनी से सम्पर्क किया और क़ीमत माँगी। क़ीमत एक लाख थी और उसी के लिए वह उसके घर आया था, जब वे दोनों हमशक्ल बहनों वाले धारावाहिक की चर्चा कर रहे थे। यादव ने फिर से उससे पूछा कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया?
लता ज़िद पर अड़ गई थी कि वह वीरेन्द्र से ही शादी करेगी। पिताजी चुपचाप अख़बार पढ़ते रहे थे जिसमें मतदान के दौरान आठ ज़गहों पर बूथ कैपचरिंग का समाचार था। माँ उसे डाँटती और रोती रही थी। माँ हौद में से पानी निकालकर पूरे घर में बाल्टियों से फेंक रही थी। फ़र्श को लग रहा होगा कि बारिश आ रही है और सब छतें चूने लगी हैं। छतों को लग रहा होगा कि गली का पानी घर में भर रहा है। माँ कहती थी कि जो इंसान अपने माँ बाप से प्यार नहीं कर सकता, वह किसी से नहीं कर सकता। लता कहती थी कि वह वीरेन्द्र से इतना प्यार करती है कि अपनी कलाई की नस भी काट सकती है।
वे डर गए। वे इतना डरे कि माँ ने रोना और पानी गिराना बन्द कर दिया। पिताजी तुरंत फ़िल्म वाला पन्ना पढ़ने लगे जिसमें बिपाशा बसु की कोई बात थी। फिर अगले दिन पिताजी वीरेन्द्र के घर गए। उस सुबह से ही उनकी कमर में दर्द था और उन्हें झुककर चलना पड़ रहा था। वे चलते चलते सड़क पर ही बैठ जाते थे और बैठते नहीं थे तो गिर जाते थे। एक दो बार ऐसा भी लगा कि कोई बस उनके ऊपर से निकल जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ।
वीरेन्द्र के पिता एक भले आदमी थे और सज्जन पुरुष थे और अच्छे स्वभाव के थे। वे कलफ़ लगे हुए कोरे सफेद कुरते पहनते थे और मुस्कुराते रहते थे। वे नगरपालिका अध्यक्ष बनने का सपना रखते थे। उन्होंने पिताजी से उनकी कमर के बारे में पूछा और चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एक अध्यापक का जीवन बहुत संघर्षमयी होता है और उन्हें अध्यापकों और भिखारियों पर बहुत तरस आता है। वे एक दयालु इंसान भी थी। कुछ मिनट बाद जब पानी आया तो उन्होंने भिखारियों वाला कथन दोहराते हुए उसके लिए क्षमा भी माँगी। उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र था। उन्होंने पिताजी से कहा कि वे सिगरेट पीना चाहते हैं और क्या वे मेज पर से लाइटर उठाकर उन्हें पकड़ा सकते हैं? वे तख़्त पर अधलेटे थे। पिताजी ने उठकर लाइटर पकड़ा दिया। वीरेन्द्र के पिता को अपनी धन-दौलत का ज़रा भी घमंड नहीं था। उन्होंने सिगरेट सुलगाते हुए, लाइटर पकड़ाने में पिताजी को हुए कष्ट के लिए माफ़ी भी माँगी। वे बाकी अधेड़ लोगों की तरह प्रेम को सामाजिक बुराई भी नहीं मानते थे। उन्होंने ख़ुद कहा कि वीरेन्द्र लता से बहुत प्यार करता है। वे समाज के दुख-दर्द को अपना मानने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि वे लता की बीमारी के बारे में जानते हैं और रोग तो किसी के शरीर में भी हो सकता है। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उन्हें ख़ुद मधुमेह है। वे सत्यवादी व्यक्ति थे। विवाह सात लाख में तय हुआ। वीरेन्द्र भी लता से बहुत प्यार करता था।
फिर रागिनी यादव को अपनी शादी की एलबम दिखाने लगी थी। वह हर फ़ोटो में मुस्कुरा रही थी। शुरु की एक फ़ोटो में उसे सिर्फ़ मेंहदी से रचे हाथ कैमरे के सामने रखने थे और उसने दोनों हाथों के बीच अपना मुस्कुराता हुआ चेहरा भी रख दिया था। विदाई के समय भी वह रो नहीं पाई थी, इसलिए फ़ोटोग्राफर ने बाद में एक और लड़की को दुल्हन बनाकर तस्वीरें खींची थी और उन्हें ही एलबम में लगाया था।
यादव ने कहा कि वह सौदा नब्बे हज़ार में तय कर सकता है, यदि रागिनी यह बता दे कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया? यह जानने के लिए वह बहुत उत्सुक था। वह मुस्कुराई और अलमारी में से एक अख़बार उठाकर लाई। यादव ने उसकी तारीख पर ध्यान नहीं दिया। रागिनी ने बताया कि इस दिन विजय का जन्मदिन था और वह उसे कोई सरप्राइज़ गिफ्ट देना चाहती थी। इसलिए उसने दैनिक भास्कर के स्थानीय संस्करण के तीसरे पन्ने पर बड़ा बड़ा ‘आई लव यू विजय’ छपवाया था। उसने कहा कि उसने अपने पूरे शरीर पर चार ज़गह उसके नाम का टैटू भी गुदवाया है। पूरा खर्च छब्बीस-सत्ताईस हज़ार रुपए हो गया था।
वह कुछ बड़ा सोच रहा था। उसे निराशा हुई। उसे दस हज़ार जाने का दुख भी हुआ। वह वे टैटू भी देखना चाहता था, लेकिन उसने ऐसा कहा नहीं। उसने अपने बैग में से एक सीडी निकाली। रागिनी अन्दर वाले कमरे में गई और पैसे ले आई। यादव ने कहा कि वह चाहे तो सीडी चलाकर चेक भी कर सकती है। उसने कहा, नहीं। यादव ने भी बिना गिने नोट अपने बैग में रख लिए। सब नोटों पर कहीं कहीं नीली स्याही भी लगी हुई थी। चलते चलते यादव ने कहा कि वह बहुत सुन्दर है। उसने ‘शुक्रिया’ कहा।
यादव ने पैंतालीस हज़ार रुपए मेरे माँ और पिताजी को दे दिए। उस सीडी की उसने कई कॉपी बना रखी थी, जिनमें से कुछ उसके पिता के ट्रांसपोर्ट के बिज़नेस के ज़रिए नेपाल में ले जाकर बेच दी गई। वहाँ से वे भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी बिकी। मेरा मृत्यु के बाद के जीवन में बहुत विश्वास नहीं था, फिर भी मैं चाहता था कि उस फ़िल्म के आख़िर में क्रेडिट लिखे आते, जिनमें मेरे नाम के आगे ‘स्वर्गीय’ लिखा होता। ज़िन्दा लोगों को ब्लू फ़िल्म का एक फ़ायदा यह भी था कि आप अपनी पीठ को पहचानना सीख सकते थे। नहीं तो हो सकता है कि किसी दिन कोई आपकी पीठ उठाकर ले जा रहा हो और आप शांत रहकर उसे देखते रहें।
उस ब्लू फ़िल्म से होने वाली कमाई का आधा हिस्सा यादव रॉयल्टी की तरह पिताजी को देता रहा। उसने कहा कि इसे वे मेरी अमानत समझकर रख लें। वे रखते रहे। छ: महीने बाद जब लता की शादी हुई तो उन्हें जीपीएफ से सिर्फ़ एक लाख निकलवाने पड़े।
ज़िन्दगी भी एक ब्लू फ़िल्म थी जिसके सुखांत के लिए हम सब नंगे हो गए थे। सुखांत सबको पसन्द थे, ख़ासकर माँ और रागिनी को।

गौरव सोलंकी
(ये इस कहानी का आखिरी भाग है)

Tuesday, August 11, 2009

मेरी अच्छी बहन लता किसी भी क्षण मर सकती थी

ब्लू फिल्म-भाग 6

ज़िंदगी ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं हो सकती थी। लता अस्वस्थ रहने लगी थी। वह नींद से अचानक चौंककर जग जाती और चिल्लाने लगती। कभी मेरा नाम लेकर, कभी माँ का, कभी बिल्ली, कभी दीवार, कभी छाया। शुरु में हमने सोचा कि कोई डरावना सपना देख लेती होगी। लेकिन फिर उसका पसीने में भीगकर चिल्लाते हुए जगना हर रात होने लगा तो हमें चिंता हुई। अब वह जागने के बाद भी डरी रहती और हममें से किसी को नहीं पहचानती। हम पास जाने की कोशिश करते तो डरकर और चीखती। माँ कमरे का दरवाज़ा कसकर बन्द कर देती थी कि कहीं पड़ोसी न सुन लें। अगर माँ उसके साथ किसी रात अकेली होती और वह चिल्लाती तो माँ उसे थामने से पहले दरवाज़े की ओर भागती। कई बार हड़बड़ी में दरवाज़ा जल्दी से बन्द नहीं होता था और पड़ोसी कुछ न कुछ सुन ही लेते थे। वैसे दरवाज़े इतने भी बढ़िया नहीं थे कि आवाज़ को रोक पाते। कभी-कभी तो वे हवा को भी नहीं रोक पाते थे। बंद दरवाज़े के बाहर खड़े होकर फूंक मारो तो उसका थोड़ा हिस्सा दूसरी तरफ भी महसूस होता था। यह वहम भी हो सकता था।
दस पन्द्रह मिनट बाद लता सामान्य हो जाती थी और भोलेपन से पूछती थी कि तुम सब आधी रात में बैठकर मुझे क्यों घूर रहे हो? कई दिन तक तो हम उसे कुछ नहीं बताते थे। मैं अपने कमरे में जाकर पड़ जाता। माँ उसे अपने पास खींचकर लाड़ से थपथपाकर सुलाती थी। हर रात हम अपने अपने बिस्तर पर पड़े नींद की नहीं, उसके जागने की प्रतीक्षा करते रहते थे। माँ पानी का एक गिलास और रामायण सिरहाने के पास मेज पर रखकर सोती थी। उसके सोने के बाद एक चाकू उसके तकिये के नीचे सरका देती थी, लेकिन सब बेअसर रहता था। हम हर दिन और चुप, और चिंतित, और निराश होते जाते थे।
एक रात उसके जागने के इंतज़ार में हम तीनों को ही नींद आ गई। पिताजी की आँख अचानक खुली तो उन्होंने लता के पलंग की ओर देखा। वह वहाँ नहीं थी। कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था। वे हड़बड़ाकर उठे और माँ को उठाया। माँ ने मुझे आवाज़ लगाई। तब तक पिताजी आँगन में पहुँच चुके थे। मैं और माँ दौड़कर उनके पीछे पहुँचे तो देखा कि वह मेन गेट वाली दीवार पर चढ़कर बिल्कुल सीधी खड़ी है। गली की ट्यूबलाइट की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह एकटक हमारी ओर देख रही थी। हम भीतर तक काँप गए। वह शुद्ध डर था, जो एक बार महसूस हो जाने के बाद जीवन भर सुख-दुख के हर क्षण में याद रहता है। लता की फ़िक्र भी उस डर के कई क्षण बाद हमारे ज़ेहन में आई।
वह दीवार करीब बारह फ़ुट ऊँची होगी। वह उस तरफ गिरती तो पक्के चबूतरे पर गिरती और इस तरफ़ गिरती तो पक्की ईंटों के फ़र्श पर। पिताजी दौड़कर लोहे के दरवाज़े पर से चढ़ने की कोशिश करने लगे। माँ दीवार के सहारे उसके बिल्कुल नीचे जाकर बाँहें फैलाकर खड़ी हो गई और मुझे कुछ भी नहीं सूझा। मैं बुत बना उसे देखता रहा। वह उस लता की तरह नहीं थी, जो मुझे हर साल राखी बाँधती थी और पैसे माँगती थी। उसकी दृष्टि का आत्मविश्वास मेरे सोने वाले कमरे में टँगी तस्वीर में कलेक्टर के हाथों ईनाम लेती लता से कई गुना अधिक था। वह बहुत भयंकर थी और बेबस भी। मैं आकर अपने बिस्तर पर लेट गया। मुझे पहली बार इतना हीन होने का अहसास हुआ। मैं जैसे कुछ भी नहीं था। मेरी अच्छी बहन लता किसी भी क्षण मर सकती थी। मुझे उसे दीवार से उतारकर अन्दर लाने में माँ-पिताजी की मदद करनी चाहिए थी, लेकिन मैं वह भी नहीं कर पाया। मैं निष्क्रियता की हद तक उदास था। यदि उस रात मेरी मौत का फ़रमान मुझे सुनाया जाता तो मैं उससे शत-प्रतिशत सहमत होता।
जब माँ और पिताजी उसे अन्दर लेकर आए तो मुझे रागिनी की बहुत याद आ रही थी। मैं उसी समय उससे बात करना चाहता था। फ़ोन मेरे कमरे में होता तो शायद कर भी लेता। लेकिन उसने अपना नम्बर मुझे नहीं दिया था। मैं पहले शिल्पा के घर तीन बार घंटी बजाता और यदि वह जग रही होती और इशारा समझ जाती तो रागिनी को फ़ोन करके मुझसे बात करने के लिए कहती। मगर इतनी रात को यह सब होना बहुत मुश्किल था और वह भी तब, जब फ़ोन दूसरे कमरे में रखा हो।
माँ रोती जाती थी, लता बेहोश थी, पिताजी उसका माथा मल रहे थे और मैं एक लड़की को याद कर रहा था, जो अपने पति के बिस्तर पर आराम से सो रही होगी। मैं यह भी सोच रहा था कि किसका हाथ कहाँ होगा और किसके पैर कहाँ? लेकिन मैं बुरा नहीं था, मज़बूर था। बहुत कमज़ोर भी।
आख़िर मैं उठकर दूसरे कमरे में गया। बल्ब की पीली रोशनी में पिताजी और भी बूढ़े नज़र आ रहे थे। लता के माथे पर तेजी से चलती उनकी उंगलियाँ कहीं ठहरकर रो लेना चाहती थीं। मेरे मन में आया कि जब तक नई सरकार नहीं आती, मुझे किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा लेना चाहिए। मैंने पिताजी से लेट जाने के लिए कहा। उन्होंने रुककर मेरी ओर देखा और उठकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए। मैं लता के सिरहाने बैठकर उसका सिर दबाता रहा। माँ रोती रही।

गौरव सोलंकी
कहानी जारी है...