Saturday, August 08, 2009

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है...

हर अहद में हर चीज़ बदलती रही लेकिन

एक दर्द-ए-मोहब्बत है जो पहले की तरह है।


प्यार का कोई इतिहास तो नहीं है, लेकिन इसका दर्द हमेशा एक जैसा ही है। अगर माना जाए, तो प्यार की शुरुआत दुनिया में आदम और हव्वा के ज़माने से हुई थी। लेकिन प्यार की मिसाल में किसी का नाम आता है, तो विदेश में रोमियो और जूलियट, तो हिंदुस्तान में लैला-मजनू और शीरी-फ़रहाद को प्यार की बेमिसाल मूरत माना जाता है। अपने प्यार के लिए इन्होंने दुनिया की तमाम बंदिशों को हंसते-हंसते पार कर लिया। अपने महबूब के लिए ज़माने के तानों से लेकर गोलियां तक खाईं, लेकिन प्यार का एहसास और दर्द कभी कम नहीं हुआ। तमाम मौसम बदले, रुत बदलीं, वक्त बदला, लोग बदले, लेकिन वो मीठा सा प्यार कभी नहीं बदला।

जब कोई आपसे प्यार का एहसास करता है, तो दिल में एक अजीब से हलचल होती है। कभी-कभी सपनों में किसी की छुअन महसूस सी होती है। कभी-कभी लगता है कि दुनिया में इसके सिवा कुछ भी नहीं है, दुनिया में सबसे हसीन अगर कुछ है, तो सिर्फ़ आपका महबूब और आपका प्यार है। फिर ज़माने की परवाह किसे होती है। आपका प्यार आपसे जितना दूर जाता है, उससे अपनेपन का एहसास और भी बढ़ जाता है। बदलते मौसम के साथ पल-पल प्यार के रंग भी बदलते हैं.. दुनिया और सपनीली हो जाती है... मन में कुछ-कुछ होता है, कई बार लगता है कि ये ज़मीन और आसमान एक क्यों नहीं हो जाते, कई बार दिल चाहता है कि सारा जहान झुककर आपके कदमों में आ गिरे।

बसंत के हसीन मौसम में प्यार को पंख लग जाते हैं। अपने महबूब के साथ सपनों की दुनिया बसाई जाती है... लेकिन वक्त बदला तो प्यार का अंदाज भी बदल गया। बाग-बगीचों और प्रेम पत्रों से निकलकर प्यार रेसत्रां और पार्क में पहुंच गया। लव-लेटर की जगह ई-मेल और एसएमएस ने ले ली... मोबाइल पर बतियाने का जो दौर शुरु होता है, वो घंटो तक चलता है....लंबी बातचीत के बाद भी लगता है, कि अभी तो बात ही क्या हुई है। ऐसे में मोबाइल कंपनियां भी धड़ल्ले से फायदा उठा रही हैं। प्यार के इस एहसास को हर कोई कैश कराने में लगा है। जेब हल्की हो रही है... गर्लफ्रेंड को रिझाने के लिए बाज़ार भी नये-नये नुस्खे ला रहा है।

प्यार का एहसास कराने के लिए वेलेंटाइन डे नाम का एक त्योहार ही चल निकला है। प्यार मॉर्डन हो गया है, लेकिन प्यार करने वाले अब भी ज़माने से नहीं डरते, प्यार पर पहरा लगाने वाले हर दौर में थे और आज भी हैं। आदिम युग में प्यार करने वालों को पत्थर मार-मार कर कुचल दिया जाता था, सलीम और अनारकली को भला कौन भूल सकता है। एक कनीज को अपना प्यार अमर करने के लिए दीवार में चुन जाना कबूल था।... वक्त बदला, सदियां बदली, लेकिन न तो प्यार के दुश्मन बदले, न प्यार का अंदाज़ बदला और न ही प्यार के एहसास में कोई कमी आई। लेकिन अब प्यार पर पहरा लगाने वाले ज़ालिम ही नहीं जल्लाद भी हो गये।

चाहें पश्चिमी उत्तर प्रदेश हो, या हरियाणा, प्यार की ख़ता सिर्फ़ मौत होती है। वहशियाना मौत, ऐसी मौत जिसमें मां-बाप और भाई-बहन ही अपने जिगर के टुकड़ों का क़त्ले-आम कर देते हैं। बात-बात में पश्चिम की नकल कर मॉडर्न होने का दम भरने वाले हम लोग इस मामले में मॉर्डन बनने की कोशिश कतई नहीं करते। मां-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की छूट खुलेआम देते हैं, समाज के ठेकेदार फ्लेक्सीबिलिटी की बात करते हैं, लेकिन जब कोई ज़माने के सामने अपने प्यार का इज़हार करता है, तो यही ज़माना दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।

फिर मज़हब और जात-बिरादरी का रोना रोया जाता है। हिंदू और मुसलमान पर बहस होती है, मांगलिक और गैर मांगलिक पर बहस होती है। हरियाणा की खाप पंचायत के फैसलों को कौन भूला होगा, प्यार कर अपनी नई दुनिया बसाने वाले एक युवक को सिर्फ़ इसलिये मार डाला गया, कि उसने एक ही गोत्र में शादी की थी, लेकिन हुआ क्या? खूब हो-हल्ला मचा, लेकिन वोट के ठेकेदारों के मुंह से उफ़्फ़ तक नहीं निकली... लेकिन सलाम है...प्यार के परिंदों को जिन्होंने हर अहद में अपने प्यार को अमर रखा, और ज़माने की हर दीवार को गिरा दिया।

अबयज़ खान

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4 बैठकबाजों का कहना है :

Manju Gupta का कहना है कि -

आलेख हकीकत को बयाँ करता है ,प्यार तो ईश्वर की नियामत है . प्यार करने वालों पर जमाने का ठेकेदारों का कहर क्यों ?सदबुद्धि दे .बधाई

Disha का कहना है कि -

सबसे बड़ी बात यह है कि हर इंसा की नस-नस में प्यार भरा है फर्क सिर्फ इतना है कि उस प्यार के रुप अलग-अलग हैं. किसी भी रिश्ते के मूल में प्यार और अपनत्व ही होता है तभी वो रिश्ता आगे बढ़ता है. मैने नोटिस किया है कि प्यार के नाम पर ज्यादा बवाल अशिक्षित वर्ग या ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है. उनमें दो प्यार करने वालों के खिलाफ होकर इज्जत, समाज, और न्याय की के नाम पर सजाएँ देने की हिम्मत और ताकत तो है लेकिन वहीं उन्हीं के घरों में माँ-बहिन.बीबी-बेटी और बहु के साथ बलात्कार करने वालों की फौज है उनके खिलाफ वे लोग जबान भी नहीं खोलते है. तब वो समाज के ठेकेदार पता नहीं कौन से बिल में छुप जाते है. उसमें उनकी इज्जत नहीं जाती है. अगर दो लोग अपनी पसंद से जिन्दगी बिताना चाहे तो उन लोगों की कि मरी हुई आत्मा में ना जाने कहाँ से सारे जहान की ताकत आ जाती है.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बेशक प्यार खुदा की सब से खूबसूरत नियामत है फिर भी किसी मजहब या धरम ने उसके हर रूप को अपनाया नहीं है मुझे तो यकी बात कई बार समझ नहीं आती कि प्यार की दुहाई देने वाले धर्म< धर्म के नाम पर ही आदमी पर बन्दिशें लगा देते हैं अगर प्यार को वो मानते तो आज दुनिया मे सिर्फ प्यार होता तब ये मोह्ब्बत भी दर्द ना हो कर एक खुशी होती मेरा मानना है कि तब नफरत इस कदर ना होती शायद आपना अपना नज़रिया है।कोई और समाज - धर्म मोह्ब्बत की क्यों इज़ाज़त नहीं देता क्यों उसे दर्द बना देता है अगर इस पर कुछ रोशनी डा; सकें तो कृपा होगी।

Shamikh Faraz का कहना है कि -

अगर अपने प्यार को पाना है तो दुनिया से बगावत तो करनी ही पड़ेगी.

मुझसे ज्यादा है अगर तुमको ज़माने का ख्याल
तो मेरी याद में यह अश्क बहती क्यों हो
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बगावत कर दो
वरना जहाँ माँ बाप कहते हैं शादी कर लो.

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