Showing posts with label surya mandir. Show all posts
Showing posts with label surya mandir. Show all posts

Wednesday, March 18, 2009

खंडहर होता सूर्य का रथ

पिछले दिनों पुरी की यात्रा के बारे में आपसे जिक्र किया। पुरी से आधा घंटा और भुवनेश्वर से करीबन डेढ़ घंटे दूरी पर स्थित है कोणार्क। पुरी और कोणार्क दोनों ही समुद्र तट से सटे हुए हैं। आज आपको कोणार्क लेकर चलूँगा। सूर्य भगवान को समर्पित यह मंदिर पूर्व की ओर मुख करे हुए है। कहते हैं पहले समुद्र की लहरें इस मंदिर के द्वार को छूती थीं लेकिन अब सागर इससे तीन किलोमीटर दूर हो गया है और बीच में आ गये हैं पेड़ व दुकानें। कोणार्क, कोण व अर्क (सूर्य) की संधि से बना एक शब्द है। सन १२५० में बने सूर्य को समर्पित इस मंदिर को राजा नरसिंह देव ने बनवाया।





इस की संरचना रथ के समान है जिसमें १२ जोड़ी पहिये लगे हुए हैं और इसे ७ घोड़े खींच रहे है। जी हाँ घोड़े....



शायद ही कोई एक घोड़ा आपको पूरा दिखाई देगा।

इस मंदिर की खासियत यह भी है कि यहाँ आप सूर्य की किरणों से समय जान सकते हैं। १२-१२ चक्र १२ महीनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के बारे में बताते हैं।



मंदिर परिसर में अंदर घुसते ही आपको दो मूर्तियाँ दिखेंगी। ज़रा गौर से देखिये।



सबसे नीचे इंसान, उसके ऊपर हाथी और फिर शेर। गाइड ने बताया कि हाथी लक्ष्मी को दर्शाता है और सिंह शक्ति को। इसका अर्थ यह हुआ है कि जब व्यक्ति के पास लक्ष्मी और शक्ति दोनों आ जाती हैं तो उसको घमंड हो जाता है और उसकी हालत असहाय व्यक्ति की तरह हो जाती है जैसा कि आप चित्र में देख पा रहे हैं।

इस दिशा द्वार को सिंह द्वार भी कहा जाता है। सिंह कहाँ है, इसके बारे में बाद में बताऊँगा।

मंदिर में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ था। इस मंदिर के पत्थरों को लोहे से जोड़-जोड़ कर बनवाया गया। समुद्री हवाओं से मंदिर टूटता जा रहा है और इसी के मद्देनज़र पहले १९०३ में इसको ठीक करवाया गया और फिर बाद में १९८५ में इसकी मरम्मत हुई।



जमीन पर अंकित १९८५....



और ये १९०३..



मंदिर के अंदर आप घुस नहीं सकते क्योंकि उसको पत्थरों और सीमेंट से भरा जा चुका है। यदि उन खम्भों को निकाला गया तो मंदिर कभी भी ढह सकता है।



मंदिर में कुछ लोहे के खंभे लगे हुए थे वे अब एक ओर रखे गये हैं। खासियत यह कि इस पर जंग नहीं लगाया हुआ है और इसे देखने वैज्ञानिक भी आते हैं। जमीन से कुछ लोहे के टुकड़े अब निकाल दिये गये हैं।



स्तम्भों पर मूर्तियों की नक्काशी देखिये।



अब जरा मंदिर के प्रवेश द्वार को देखिये। बाईं और दाईं ओर आपको घोड़े दिख रहे होंगे जो रथ को खीच रहे हैं। यदि दिक्कत है तो आपको नीचे के चित्रों में दिखाई देंगें।



यहाँ कुछ नहीं है... जो थे वो अब नहीं हैं...



मंदिर की शिल्पकारी को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। सबसे नीचे आपको छोटे-छोटे हाथी बने हुए दिखाई देंगे। बच्चों को जानवरों की कहानियाँ पसंद होती हैं और उन्हें हाथी घोड़े अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसलिये उनके लिये राजा ने सबसे नीचे ऐसी ही नक्काशी करवाई।



बीच में आपको यौवन दिखाई देगा। कामसूत्र से प्रेरित उसकी विभिन्न मुद्रायें दर्शाती ये मूर्तियाँ जीवन के दूसरे पड़ाव को बताती हैं।



सबसे ऊपर हैं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ। वृद्धाश्रम में इंसान ईश्वर का स्मरण करता है इसलिये राजा ने सबसे ऊपर उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाई। इस तरह पूरी हुई इंसान की जीवन यात्रा।



कालचक्र जिससे आप समय पता लगा सकते हैं।



पहियों के बीचों बीच लगे पत्थर की परछाई खम्भे के जिस हिस्से पर पड़ती है उससे समय की गणना होती है। चित्र के दाईं ओर पूरब है जहाँ से शुरु में सूर्य की किरणें आयेंगी। चक्र में ६ का अंक उस जगह है जहाँ हमारी घड़ी में ९ का अंक होता है। इस तरह पहली परछाई उसी पर पड़ेगी उसके बाद घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में उसके अंक चलते हैं। चक्र के चारों ओर बिंदु हैं जिनके बीच की दूरी तीन मिनट के बराबर होती है। इसी गणना के सहारे समय निकाला जाता है।


इन चक्रों के मध्य भी आपको युवतियों और देवी-देवताओं की आकृतियाँ दिखाईं पड़ जायेंगी।


यह है अश्व द्वार



यहाँ मंदिर की मरम्मत का काम चल रहा है। समुद्री हवा के थपेड़ों ने मंदिर को बेजान सा कर दिया है।



परिसर का तीसरा भाग... जो आप देख रहें हैं वो अब अपनी ऊँचाई का आधा हो चुका है। ऊपरी हिस्सा ढह चुका है।



ढही हुई कुछ और दीवारें।



ये सिंह द्वार का टूटा हुआ शेर....सिंह जंगल का राजा होता है... पर यहाँ....



गज द्वार... दोनों हाथी अब तक सही सलामत...कमाल है!!



बहुत मुश्किल से मंदिर को सम्भाल कर रखा हुआ है। उड़ीसा की मूर्तिकला को प्रदर्शित करता यह मंदिर अपने आप में अनूठा है। सरकार इस खंडहर होते मेंदिर को बचा ले तो ये बहुत बड़ी कामयाबी होगी। हमारे देश में वैसे भी इन ऐतिहासिक इमारतों व मंदिरों को कोई नहीं पूछता, वरना आमेर जैसे कितने ही किले और कोणार्क जैसे मंदिर असहाय से धूप में खड़े पथरीली आँखों से हमारी ओर नहीं ताकते.....

ओड़िशा से तपन शर्मा