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Saturday, November 28, 2009

महात्मा जोतीबा फुले का ब्राह्मणवाद से संघर्ष

क्रांतिकारी समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले की 119वीं पुण्यतिथि पर विशेष

ब्रिटिश काल में सामाजिक न्याय की एक बड़ी लड़ाई लड़ने वाले महान योद्धा महात्मा जोतीबाराव फुले का स्थान भारतीय सामाजिक क्रान्तिकारियों में सबसे महत्वपूर्ण है। हजारों वर्षों से भारत में शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों पर होनेवाले अत्याचारों के विरूद्ध उनके संघर्षों के कारण ही ब्रिटिशराज में परिवर्तन आने शुरू हुये और अंग्रेज शासकों द्वारा नये कानून बनाये गये। जोतीबा ने भारतीय समाज की सबसे बड़ी बीमारी जाति व्यवस्था और उसकी जड़ ब्राह्मणवाद को न केवल समझा बल्कि उस पर जबरदस्त प्रहार भी किये जो परिवर्तनवादी जन आन्दोलन के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरो में दर्ज है। इसी कारण डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें अपना गुरू माना और उनके सामाजिक दर्शन को अपने आन्दोलन का मुख्य आधार बनाया। ब्राह्मणवाद और पुरोहित वर्ग दोनों से ही जोतीबा का संघर्ष तब तक चला जब तक वे जीवित रहे। उनके आन्दोलन का केन्द्र हिन्दु धर्म की वे तमाम कुरीतिया और परम्पराये रहीं जो ब्राह्मणवाद की सदियो से पोषक रही है और जिसके कारण ही देश के बहुसंख्यक नागरिक वर्ग को शिक्षा समेत सभी मानवाधिकारों से सदियों तक वंचित रहना पड़ा।

ब्राह्मणवर्ग विशेषकर पुरोहितों ने अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिये ही वर्ण व्यवस्था की स्थापना की थी। अंततः पीड़ित बहुसंख्यक जनता, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका विरोध ही करती रही। वर्ण व्यवस्था से लाभ उठाने वाला दूसरा वर्ग शासकों का था, जिन्होंने पुरोहितों के हितों को अगर बढ़ाया नहीं तो घटाया भी नहीं। अंग्रेज शासकों ने भी उसी नीति का अनुसरण किया, उनके द्वारा ब्राह्मणों के बीच शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिये जो कुछ किया गया उसका लिखित प्रमाण उपलब्ध है। बरतानिया सरकार भी ब्राह्मणों को तुष्ट करने और उनका सहयोग प्राप्त करने में अपने पूर्ववर्ती शासकों से पीछे नहीं रही। उनकी मान्यता थी कि साम्राज्य के स्थायित्व के लिये यह जरूरी है। अंततः 1813 के चार्टर एक्ट में शिक्षा पर खर्च करने के लिये जो एक लाख रूपये का प्रावधान किया गया था उसका एक अंश ब्राह्मणों की शिक्षा पर खर्च किया जाने लगा। बनारस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना (1791) से लेकर 1820-21 तक उसमें तथा दिल्ली, आगरा और पुणे स्थित सभी महाविद्यालयों में भरती केवल छात्रवृत्ति प्राप्त विद्यार्थियों तक ही सीमित थी जो सभी ब्राह्मण थे। 1820-21 के बाद, मांग को देखते हुये, यद्यापि इन महाविद्यालयों में गैर- ब्राह्मण विद्यार्थियों की भी भरती होने लगी, पर छात्रवृत्ति केवल ब्राह्मण विद्यार्थियो को ही दी जाती रही। 1836 मे इस योजना को समाप्त करने का निर्णय लिया गया जो 1838 से लागू हुआ। इसके परिणाम स्वरूप जहाँ 1833 मे दिल्ली महाविद्यालय मे 431 छात्र थे जिनमें से 377 छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती थी। वहाँ 1840-41 मे छात्रों की संख्या घटकर मात्र 155 रह गयी। 1838 के बाद अंग्रेजी शासन ने ”इनकिलट्रेशन“ नाम से एक नयी योजना की शुरूआत की जिसका उद्देश्य था कि पहले ऊपर के वर्ग यानी ब्राह्मणों को शिक्षित किया जाय, ऐसा करने से शिक्षा स्वतः ही निचले स्तर तक पहुंच जायेगी। अंग्रेज सरकार का जमीनी सच्चाइयों से कोई सरोकार नहीं था, अगर वे इस ओर जरासा भी ध्यान देते तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगती कि, जिस वर्ग ने सदियों से निम्नवर्ग को पढ़ने के अधिकार और अवसरों से बराबर वंचित रखा, भला वे क्योंकर उन्हें पढ़ाते, अंततः वह योजना बुरी तरह असफल रही। उसके बाद 1854 में ”वूडस डीस्पैच” आया, जिसके अन्तर्गत सरकार ने जनता को शिक्षित करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया। यह जिम्मेदारी किस प्रकार निभायी गयी इसके साक्षी हंटर कमीशन (1881) मे जोतीबा के दिये गये वे प्रतिवेदन है, जिसमें कई जगह यह बताया गया है, कि किस प्रकार ब्राह्मण शिक्षको और विद्यार्थियो ने निम्न वर्ग के गरीब विद्यार्थियो की शिक्षा के मार्ग में रोड़े अटकाये।

लेखिका- सुजाता पारमीता

20 मार्च 1955 को दिल्ली में जन्म। यहीं के भारतीय मास कम्यूनिकेशन संस्थान से डिप्लोमा, फिर पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट से आगे की पढ़ाई।
दिल्ली की पहली दलित सांस्कृतिक संस्था 'आव्हान थिएटर सिनेमा एंच मास मीडिया' की संस्थापिका। आजकल मुम्बई में दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और महिलाओं की सांस्कृतिक विरासत पर काम कर रही हैं। हंस, कथादेश, महानगर, अन्यथा में कई कहानियाँ और लेख प्रकाशित। 'जाति पर हिन्दी सिनेमा' और 'आदिवासी चित्रकला' पर पुस्तक लिखने में व्यस्त।
जोतीबा धार्मिक कार्यों में ब्राह्मण पुराहितों की सहायता लेने के विरूद्ध थे। इसलिये जनमानस में चेतना के प्रसार के लिये उन्होंने दो पुस्तकें लिखी - पुरोहितों का पर्दाफाश (1867) और ब्रिटिश साम्राज्य में ब्राह्मणी वेश में गुलामी (1873) पहली पुस्तक मे जोतीबा ने बताया कि किस प्रकार जन्म से मरण तक विभिन्न कर्मकाडों द्वारा पुरोहित यजमानों का आर्थिक शोषण करते हैं और दूसरी पुस्तक में किस प्रकार लोगों की अशिक्षा अज्ञानता तथा अन्धविश्वास का लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने शूद्रों और अतिशूद्रों को गुलाम बना रखा है। उन्होंने 1872 में इसी आशय का एक घोषणापत्र भी प्रकाशित किया। जोतीबा सिर्फ पुस्तक लिखकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे, इसीलिये 24 सितम्बर 1873 को उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की एक सभा आयोजित की, जिसमें मार्गदर्शन के लिये सत्यशोधक समाज नाम से एक केद्रीय सगंठन बनाया गया। बाद में कई स्थानों पर उसकी अन्य शाखायें स्थापित की गयीं।

जोतीबा ने ब्राह्मण पुरोहित के बिना ही दो विधवा विवाह सम्पन्न कराये। पहला विवाह दिसम्बर 1873 में और दूसरा उसी के पाँच महीने बाद मई 1874 में। ब्राह्मणों ने विवाह रोकने के लिये क्या कुछ नहीं किया पर सफल न हो सके। इसके बाद जोतीबा के एक अनुयायी ने भी अपने बेटे का विवाह ब्राह्मण पुरोहित के बिना सम्पन्न कराया इस पर पुरोहित मामले को न्यायालय में ले गया। अवर जज जो स्वयं ब्राह्मण थे उस पुरोहित के पक्ष में ही निर्णय दिया। इस निर्णय से खिन्न जोतीबा ने जिला न्यायाधीश के यहाँ अपील की। जिला न्यायधीश ने निचले न्यायालय के फैसले के विरूद्ध निर्णय दिया। पुरोहित कहाँ हार मानने वाला था उसने उस निर्णय के बाद मुम्बई उच्च न्यायालय में अपील दायर की परन्तु वहाँ भी वह हार गया। इस प्रकरण के बाद से पुणे का ब्राह्मणवर्ग जोतीबा के खिलाफ हो गया।

यहाँ इसीसे मिलते-जुलते एक अन्य मुकदमे का जिक्र करना जरूरी है। 1878 पुणे में एक व्यक्ति ने अपने पुश्तैनी पुरोहित की बजाय अन्य पुरोहित से अपने बेटे की शादी करवायी प्रभावित पुरोहित ने महादेव गोविन्द रानडे के न्यायालय में जो उन दिनों पुणे में ही प्रथम श्रेणी के अवर जज थे, मुकदमा दायर किया जिसमें दक्षिणा के अलावा हरजाने की भी मांग की। रानडे ने पुरोहित के पक्ष में निर्णय दिया और आगे कहा कि वादी को बुलाना या ना बुलाना प्रतिवादी की इच्छा पर निर्भर नहीं करता। लेकिन बाद में जिला और उच्च दोनों ही न्यायालयों ने न्यायमूर्ती रानडे के इस फैसले को रद्द कर दिया अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम घातक हो सकते थे। ब्राह्मण पुरोहितों के बिना वैद्य विवाह सम्पन्न नहीं हो सकते इस परम्परावादी दलिल को अमान्य करने वाला बम्बई न्यायालय तीसरा न्यायालय था। बंगाल तथा तत्कालीन पश्चिमोत्तर उच्चतर न्यायालाय इसे पहले ही अस्वीकार कर चुके थे, बाद में मद्रास उच्चतर न्यायालय ने भी इसे नामंजुर कर दिया था जिसके बाद तो यह विवाद का विषय ही नहीं रहा। जोतीबा के लिये ये बड़ी जीत साबित हुयी।

विभिन्न भारतीय प्रांतों में पहले से ही प्रचलित दक्षिणा प्रथा को अंग्रेज शासकों ने अपने शासन काल में भी जारी रखा। बारहाल उन्होंने दक्षिणा कोष की अधिकतम सीमा 50,000 रूपये वार्षिक निर्धारित कर दी। कई अन्य उपाय भी किये गये जिनसे दक्षिणा पाने वाले ब्राह्मणों की संख्या कम होती गयी। एक बार तय किया गया कि बची हुयी राशि में से प्रतिवर्ष 20,000 रूपये पुणे महाविद्यालय को दिये जायेंगे क्योंकि उसमें अधिकतर ब्राह्मण ही पढ़ते-पढ़ाते थे। एक बार जब कोष मे 3,000 रूपये अतिरिक्त बच गये तो पुणे के कुछ सुधारवादी ब्राह्मणों ने गवर्नर को आवेदन दिया कि इस बची हुयी राशि को आधे-आधे भाग मे बाँट कर संस्कृत और मराठी में मौलिक साहित्य तैयार करने वाले साहित्यकारों को परितोषिक के रूप में दे दिये जायँ। लेकिन पुणे के परम्परावादी ब्राह्मणों ने इसे जाति विरोधी मान कर इसके लिये पहल करने वालों को दंडित करने के लिए एक समिती गठित की और सभा के लिए एक दिन भी निश्चित किया। जब समझाने से काम नहीं बना तब सुधारवादियों ने जोतीबा से भेंट कर मदद मांगी। जोतीबा ने तब कुछ दलित बस्तियों में से 200 हट्टे-कट्टे जवान लड़के जमा किये और जुलूस बनाकर निर्धारित स्थान पर पहुँचे। जोतीबा के साथ उन लोगों को देखकर, वहा जमा हुये ब्राह्मणों के होश उड़ गये, लेकिन जोतीबा के सुझावों पर उन्होंने अपनी सहमति दे दी और वे समझौते के लिए राजी हो गये। बाद मे गवर्नर ने भी बची हुयी राशी को साहित्य सृजन के कार्य पर खर्च किये जाने की अनुमति दे दी।

बड़ौदा राज मे बहुत वर्षो से ब्राह्मणो को रोज मुफ्त खिचडी बांटने की प्रथा चली आ रही थी। राजकोष से इस प्रथा पर प्रतिवर्ष एक मोटी रकम खर्च की जाती थी। जोतीबा ने 1884 मे बड़ौदा महाराज को इसके संबध में लिखा और उनसे जा कर मिले। उन्होंने महाराज को समझाया की जब कठोर परिश्रम कर राजकोष भरने वाले किसान भूखे-नंगे जीवन जी रहे हैं तो ब्राह्मणों पर इतना खर्च करना कहाँ तक उचित है। उसके बाद बड़ौदा राज मे खिचड़ी बाँटने की प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

जोतीबा के जीवनकाल में पुणे जिले में जमींदार और साहूकार प्रायः सभी ब्राह्मण ही थे। सरकारी कार्यालयों में भी निम्न और मध्यम स्तर पर काम करने वाले सभी कर्मचारी ब्राह्मण थे। अतः गरीब दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को कहीं से भी न्याय नहीं मिलता। जोतीबा ने इस स्थिति से निपटने के लिये ”दीनबन्धु“ नाम की एक पत्रिका निकाली। उसके बाद उन्होंने खेतिहरो की चाबुक (1873) शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसमें गरीब किसानों की समस्याएँ उसके कारण और निदान पर प्रकाश डाला गया। सरकारी कर्मचारीयो के शोषण से गरीब जनता की रक्षा के लिये जोतीबा ने अपनी पुस्तक में यह मांग रखी की सरकारी नौकरीयो में ब्राह्मणों की नियुक्ति उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक ना की जाय बाकी बचे स्थानों पर शूद्रों-अतिशूद्रों के होनहार युवको को प्रशिक्षित कर नियुक्त किया गया। पुरोहितों के चुंगल से शूद्रों की रक्षा करने के लिये उन्होंने प्राईमरी शिक्षा को अनिवार्य बनाने की मांग की। जोतीबा ने शूद्रों, अतिशूद्रों और किसानों के कल्याण के लिये जो सुझाव उस वक्त बताये थे इतने वर्षों बाद आज कार्यान्वित किये जा रहे है। जिनमें नदियों पर बांध बांधना, कुएँ खोदने के लिये सरकार द्वारा गरीबों को वित्तीय सहायता प्रदान करना, समय-समय पर प्रदर्शनी लगाकर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराना, अच्छी नस्ल के मवेशियों का आयात करना तथा वैज्ञानिक ढंग से खेती की शिक्षा जनमानस तक पहुँचाना शामिल हैं। पुणे जिले की जुनार तहसील में 1884 में जोतीबा ने गरीब किसानों पर होने वाले जुल्मों के विरोध में देश का पहला किसान सत्याग्रह किया जो सालभर तक चला और तभी समाप्त हुआ जब जमींदार, साहूकार और सरकार के प्रतिनिधियों ने स्वयं आकर जोतीबा से समझौता किया।

दलितों के बीच चेतना जगाने और दलित नेतृत्व तैयार करने के लिये जोतिबा निरन्तर दलित बस्तियों में आया-जाया करते थे। जोतिबा भारतीय मजदूर आन्दोलन के जन्मदाताओं में प्रमुख थे। वे जब भी मुंबई जाते अपने प्रवास के दौरान मजदूर बस्तियों में भी जरूर जाते। नारायणराव लोखंडे जिन्होंने 1880 में देश का प्रथम मजदूर संगठन "बम्बई मीलहैड" की स्थापना की थी। उनके अनुयायी और सत्य शोधक समाज के प्रमुख सदस्य थे। 1889 मे बम्बई नगरपालिका और अलिबाग नगरपालिका के दलित मजदूरों ने जो सफल हड़ताल की थी वह भी जोतीबा के प्रयासों का ही नतीजा था।

आज शिवाजी महाराज पर अपना दावा ठोंकने वालों को यह शायद ही याद हो कि जोतिबा ने ही रायगढ जाकर पत्थर और पत्तियों के ढेर तले दबी जीर्ण शीर्ण अवस्था में पड़ी शिवाजी महाराज की समाधी को ढूँढ़ निकाला और उसकी मरमत्त भी करवाई। बाद में उन्होंने शिवाजी महाराज पर एक छन्दबद्ध जीवनी भी लिखी।

स्मृतियाँ और पुराण शूद्रों और स्त्रियों के खिलाफ वह अध्यादेश है जो उनके जीवन को पूरी तरह से नियन्त्रित करता है। उन्हें गुलामी में जीने के लिये बाध्य करता है, आज भी जिसका असर भारत के सभी धर्मो पर समान रूप से दिखायी देता है। अस्पृशता, देवदासी प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह, कन्याभ्रूण हत्या, बेगारी और विधवा विवाह पर पाबन्दी जैसी अनेक अमानवीय धार्मिक प्रथाएँ हैं, जो देश के लगभग सभी राज्यों में अगर आज जिंदा है, तो इसके पीछे भी पुरोहित वर्ग का ही हाथ है। हालाँकि जोतीबा के समय में कानून सती प्रथा को बन्द किया जा चुका था और कहीं-कहीं विधवा विवाह होने लगे थे। पर महिलाओं की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं आया था। जोतीबा ने विष्णू शास्त्री पंड़ित द्वारा चलाये जा रहे विधवा विवाह आन्दोलन में पूरा सहयोग दिया। उन्होंने बाल-विवाह और बहुविवाह का भी खुलकर विरोध किया। उनके द्वारा लिखी गयी ”सतसार“ नामक एक पुस्तिका में भी स्त्रियों की स्थिति पर रोशनी डाली गयी है। यहाँ विशेष रूप से ऐसी दो घटनाओं का जिक्र जरूरी है जो साबित करती हैं कि जोतीबा के विचार इन मुद्दों पर कितने कठोर थे। एक बार जब महादेव गोविन्द रानडे जो उन दिनों पुणे में जज थे, जोतीबा को बताया कि उनकी भी एक बाल विधवा बहन है, तो उन्होंने दुखी हो कर पूछा कि उसका विवाह क्यों नहीं किया गया। जब रानाडे से जबाब देते नहीं बना और वे टाल-मटोल करने लगे तो पास बैठे जोतीबा भड़क गये और गुस्से में बोले "राव साहब, आप अपने आप को आगे से समाज सुधारक ना ही कहें तो अच्छा होगा"। बाद में जोतीबा ने रानडे को दूसरी बार तब फटकारा जब उन्हें पता चला कि अपनी पहली पत्नी के मरने के बाद उन्होने 32 वर्ष की उम्र में एक 11 वर्ष की बच्ची से दूसरा विवाह किया।

जोतीबा की राय में अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धविश्वास स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति में सबसे बड़ी बाधायें थीं। अततः उन्होंने लड़कियों के लिये तीन स्कूल खोले- पहला जुलाई 1851 में, दूसरा उसके तुरन्त दो महिने बाद और तीसरा एक वर्ष बाद सितम्बर 1852 में। तीसरे स्कूल में दलित लड़के भी भर्ती किये गये। वे एक रात्रि पाठशाला भी चलाया करते थे। जोतीबा की पत्नि सावित्रीबाई फुले जिन्हें भारत की प्रथम हिन्दु महिला सामाजिक कार्यकर्ता और अध्यापिका होने का गौरव हासिल है उस स्कूल मे पढ़ाया करती थीं। दलितों के लिये पहला पुस्तकालय भी जोतीबा ने ही खोला था। उन्होंने 1868 में अपने पीने के पानी के हौज से दलितों को पानी लेने की अनुमती दे दी थी।

ब्राह्मणवाद से शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों के सम्मान और अधिकार के लिये शायद ही किसी ने इतना संघर्ष किया जितना कि जोतीबा ने किया। आज भी अनके विचार सभी भारतीय दलित और स्त्रीवादी आन्दोलन के लिये मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं, जब पूँजीवाद और भुमंडलीकरण की बदौलत उपजी भयानक असमानता की चपेट में आया गरीब दलित और आदिवासी वर्ग लगातार मर रहा है।

Tuesday, August 25, 2009

माँओं ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया...

शायर अहमद फ़राज़ की पहली पुण्यतिथि पर


अहमद फ़राज़ एक ऐसा नाम जिसके बिना उर्दू शायरी अधूरी है. आज अगर एशिया में इश्किया शायरी में फैज़ अहमद "फैज़" के बाद किसी शायर का नाम आता है तो वो हैं अहमद "फ़राज़". आज उनकी ग़ज़लें हिन्दुस्तान और पकिस्तान के अलावा कई और मुल्कों में भी मशहूर हैं. जहाँ भी इंसानी आबादी पाई जाती है. उनकी ग़ज़लें पढ़ी और सुनी जाती है.

अहमद फ़राज़ साहब की पैदाइश पकिस्तान के नौशेरा जिले में 14 जनवरी 1931 को को एक पठान परिवार में हुई. उन्होंने पेशावर युनिवर्सिटी से इल्म हासिल किया और वही पर कुछ वक़्त तक रीडर भी रहे. उनका विसाल (निधन) 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद के एक अस्पताल में हुआ. वो गुर्दे की बीमारी में मुब्तिला हो चुके थे. उन्हें पकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाल-ऐ-इम्तियाज़ भी हासिल था. इसी के साथ उन्हें कई और गैर मुल्की सम्मान भी मिले था.

फ़राज़ साहब की मकबूलियत और शोहरत का अंदाजा एक वाकये से लगाया जा सकता है. एक दफा अमेरिका में उनका मुशायरा था जिसके बाद एक लड़की उनके पास आटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने कहा "फराज़ा". फराज़ ने चौंककर कहा "यह क्या नाम हुआ?" तो बच्ची ने कहा "मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे। लेकिन बेटी पैदा हो गयी तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया।"

इस बात पर एक शे'र कहा था.

"तुझे और कितनी मोहब्बतें चाहिए फराज़,
मांओ ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया"


क्या कहते हैं दूसरे शायर

फ़राज़ की शायरी ग़में दौराँ और ग़में जानाँ का एक हसीन संगम है। उनकी ग़ज़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है। उनकी नज़्में ग़में दौराँ की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है।
कुंवर महेंद्र सिंह बेदी "सहर"

आज के दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है। पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा वह काबिले तारीफ है।
डॉ. अली जावेद
(नेशलन काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के निदेशक)

फराज़ उर्दू रोमांटिक शायरी का ऐसा नाम है जिसकी गज़लों और नज्मों से तीन पीढ़ियां वाकिफ है। इस वक्त उनके जितने शेर लोगों को याद है उतने शायद ही किसी अन्य शायर के हों
मशहूर शायर मुमताज राशिद

फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊँचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है।
मजरूह सुल्तानपुरी
इसी तरह से उनकी वतनपरस्ती की एक मिसाल मिलती है. पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले मुल्कों में एक जश्ने-शायराँ (काव्योत्सव) बहुत मशहूर है—अल मरबिद पोयट्री फेस्टिवल. उसमें तमाम मुल्कों से अलग-अलग ज़बानों के मशहूर शायर हिस्सा लेने के लिए बुलाये जाते हैं. उसी में पाकिस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने आए थे जनाब अहमद फ़राज़. हिन्दुस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने के लिए भेजे गए थे जनाब रिफ़त सरोश. यह वह वक़्त था जब इराक़ की लड़ाई ईरान से चल रही थी और ख़ूब घमासान चल रहा था.

तमाम मुल्कों के शायर बग़दाद में मौजूद थे. इराक़ी हुकूमत को लगा कि यह बढ़िया मौक़ा है दुनिया भर के शायरों को ‘ईरान की ज़्यादतियों को दिखाने का'. इसलिए उन्होंने काव्योत्सव के एक दिन पहले जंग के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस का इन्तज़ाम किया और सभी को एक-एक यूनिफॉर्म पकड़ाना शुरू कर दिया। सबब यह बताया गया कि जंग के मोर्चे पर जा रहे हैं तो जंग की पोशाक ही होनी चाहिए। हिफाज़त के मद्देनज़र यह ज़रूरी है. तमाम मुल्कों के शायर पोशाक की पुलिन्दा लेकर बस में जा बैठे। जब एक भारत से गए हिंदी कवि का नंबर आया तो वह अड़ गए कि मैं यह नहीं पहनूंगा. इंचार्ज इराक़ी कमाण्डर उसे समझाने आया तो उन्होंने उसे समझाना शुरू कर दिया और बताया कि मैं बसरा से एक बार उस इलाक़े को देखने एक पत्रकार के रूप में सादे लिबास में जा चुका हूँ। दुबारा अगर आप उस इलाक़े में ले ही जाना चाहते हैं तो मैं जैसा हूँ, भारतीय, वैसा ही चलूँगा. आपकी फौजी वर्दी पहनकर हर्गिज़ नहीं जाऊँगा। कभी अगर फौजी वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूँगा, इराक़ या ईरान के लिए नहीं। अफसर ज़रा तन्नाया लेकिन कर कुछ न पाया। उसने तुरुप चाल चली कि अगर मोर्चे पर आपको कुछ हो गया, गोली ही लग गई तो ?

"तो मैं, ज़ाहिर है कि मर जाऊँगा। लेकिन मरूँगा तो भारतीय. आपकी सैनिक वर्दी में अगर मरा तो मेरी पहचान भी सही न हो सकेगी," उन्होंने कहा।

उन हिंदी कवि के साथ साथ रिफ़त सरोश साहब भी अड़ गए. और लोग भी मेरी इस दलील में शामिल न हो जाएँ, इस डर से वर्दी न लेने वाले लोगों को साथ न ले जाना मुनासिब पाया गया और वह वापस रिफ़त साहब के साथ होटल लौट आये. लॉबी में देखा कि फ़राज़ साहब पहले से ही कुछ चाहने वालों के साथ बैठे हैं।

उन्होंने ही टोका : ‘तो आप लोग भी नहीं गए?’
‘जी नहीं ! हमें उनकी वर्दी पहनना गवारा नहीं था.’ हिंदी कवि ने कहा।
‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी। मैं भी इसी वजह वापस आ गया।’ फ़राज़ साहब ने कहा।

फिर हिंदी कवि ने मजाकिया लहजे में कहा कि इतने लम्बे-तगड़े पठानी बदन पर कोई इराक़ी वर्दी फिट भी तो नहीं आ सकती थी, फ़राज़ साहब। इतने ख़ूबसूरत बदन के सामने वर्दी को खुदकुशी करनी पड़ती और उन्होंने फ़राज़ साहब की ही ग़ज़ल का एक शेर उन्हें नजर किया :

जिसको देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है।
शहर का शहर हुआ दाखिले-ज़िन्दा जानाँ!


फ़राज़ साहब को जिन दो ग़मों ने ज़िन्दगी भर परेशान किया. वो हैं उन्हें देश निकला दे देना और पकिस्तान में जम्हूरियत कायम न हो पाना.

उन्होंने एक ग़ज़ल कही थी.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है तो जमाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ


कुछ लोगों का कहना है कि यह ग़ज़ल फ़राज़ साहब ने अपनी महबूबा के लिए कही थी तो कुछ लोगो का कहना है कि उन्होंने यह ग़ज़ल पुष्पा डोगरा के लिए कही थी जो कि भारतीय कत्थक डांसर थी. लेकिन अहमद फ़राज़ साहब का कहना था कि यह ग़ज़ल उन्होंने पकिस्तान की जम्हूरियत के लिए कही. फर्क सिर्फ इतना है कि उसे अपनी महबूबा मान लिया है.

दूसरा गम उन्हें देश निकाला से मिला था. अपने इस गम को कितनी खूबसूरती से उन्होंने अपने अश'आर में कहा है.

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा।


हिजरत यानी देश से दूर रहने का दर्द और अपने देश की यादें अपनी उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


फ़राज़ साहब हिन्दोस्तानी मुशायरों में उन्हें बख्शी गई इज़्जत का बयां करते नहीं थकते थे.

"हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं"

वैसे तो फ़राज़ एक ग़ज़ल कहने वाले शायर कि हैसियत से जाने जाते हैं. लेकिन उनकी नज्मों का भी कोई सानी नहीं है.

ये दुख आसाँ न थे जानाँ
पुरानी दास्तानों में तो होता था
कि कोई शाहज़ादी या कोई नीलम परी
देवों या आसेबों की क़ैदी
अपने आदम ज़ाद दीवाने की रह तकते


फ़राज़ साहब को गुज़रे एक साल हो गया मगर उनकी शाइरी आने वाली कई पीढ़ियों को रोशनी देगी....

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


शामिख फ़राज़
(लेखक हिंदयुग्म के यूनिपाठक भी हैं...)