Sunday, November 29, 2009

एक डिस्टर्ब्ड जिन्न

रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कम्प्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद करो और पड़ोसी हाजिर। खुद को खुद ही गालियां देते हुए दरवाजा खोलने उठा कि यार ! ये किस मुहल्ले में आकर बस गया तू? जहां के आदर्श जनों को ये भी शऊर नहीं कि कम से कम मांगने तो टाइम से आ जाना चाहिए। दरवाजा खोला तो पहचानते देर न लगी। सामने जिन्न! हवा निकल गई। बड़ा चौड़ा होकर उठा था कि पड़ोसी को वो झाड़ूंगा! वो झाड़ूंगा कि सात जन्मों तक मांगना भूल जाएगा । पर सामने जिन्न देखा तो बरसों से याद हनुमान चालीसा एकदम भूल गया।
‘नमस्कार सर!’ उसने ऐसे दोनों हाथ जोड़े जैसे चुनाव के दिनों में वोट मांगने वाले जोड़ते हैं।
‘कौन?? अलादीन का जिन्न? मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो अब अपने दिन भी फिरे।’
‘नहीं सर!’
‘तो कौन सा जिन्न? आलू-प्याज जिन्न?’
‘नहीं सर!’ उसने चेहरे पर ऐसी मुस्कराहट बिखेरी जैसी कभी विवाह से पूर्व अपने चेहरे पर हुआ करती थी।
‘तो चीनी-पत्ती जिन्न?’
‘सर नहीं! वह तो आपके पड़ोस वालों के घर डेरा जमाए बैठा है।’
‘सब्जी-भाजी जिन्न?’
‘नहीं सर!’
‘आटा-दाल जिन्न?’
‘नहीं, साहब नहीं!’ कह उसने अपना सिर पीटा। बडी दया आई मुझे यह करते उस पर। जिस देश में जिन्न की यह दशा हो वहां आम आदमी की क्या दशा होगी? पर यहां है ही कौन जो इस बात का अंदाजा लगाए।
‘तो यार अब ये नया जिन्न कहां से आ गया? अच्छा तो मुर्गीदाना जिन्न?’ मैंने जिन्नों के भार तले दबे दिमाग पर थोड़ा और भार डाल करंट जिन्न याद कर पूछा।
‘नहीं।’ अबके वह मुस्कुराया। मेरी हालत पर ही मुस्कराया होगा। अपनी हालत पर तो यहां कोई नहीं मुस्कराता। और वह तो ठहरा जिन्न।
‘तो जिन्ना का जिन्न?’
‘उसे तो सोए हुए फिर बड़े दिन हो गए। वाह! क्या कमाल का जिन्न था! जागा। पार्टी के कई कभी न सोने वाले बंदों को गहरी नींद सुला फिर सो गया।’
‘तो बाबरी मस्जिद का जिन्न?’
‘नहीं।’
‘तो मेरे बाप हो आखिर कौन से जिन्न? क्या ये देश अब जिन्नों के अधीन ही होगा? क्या इस देश पर क्या अब जिन्न ही राज करेंगे?’
‘नहीं भाई साहब! भीतर आने को नहीं कहोगे? ठंड लग रही है। बुरा न मानों तो भीतर चाय का कप भी हो जाए और बात भी। मैं परेशान करने वाला जिन्न नहीं, परेशान हुआ जिन्न हूँ।’ कह वह भीतर झांकने लगा।
‘देखो जिन्न साहब ! आप मेरे यहां गलती से आ गए हैं शायद! ये कब्रिस्तान नहीं। वार्ड नंबर 14 का हाउस नंबर 125 है।’ कह मैंने दरवाजा बंद करना चाहा तो उसने दोनों हाथ एकबार फिर जोड़े। बड़े दिनों बाद अपने सामने किसी को हाथ जोड़े देखा तो अपना मन लबालब दया से भर आया घोर सूखे के बावजूद भी। और मैं न चाहते हुए भी उसे भीतर ले गया। जितने को मैं चाय बना कर लाया तब तक वह हीटर सेक काफी चुस्त हो चुका था। जिन्नों के बारे में जो अब तक मेरी राय थी बदलते देर न लगी। मैंने चाय की चुस्की ले चुटकी लेते पूछा,‘अच्छा तो एक बात बताओ.....’
‘पर ये मत पूछना कि लूटमार कब खत्म होगी। और जो चाहो पूछो।’ कह उसने गहरी सांस ली। लगा बंदा लूटमार का शिकार हो ही ज्यों जिन्न बना हो।
‘ये जिन्न बोतल से बाहर आते कैसे हैं? जबकि बोतल के ढक्कन पर देश के अति जिम्मेदार लोग जमे होते हैं।’
‘अपराधी जेल से बाहर बिना ताला खुले कैसे आते हैं? और ये तो जिन्न हैं जिन्न! आका ने हुक्म दिया तो आ गए। किसीको मरवा गए तो किसीको संजीवनी पिलवा गए। सरकारी फाइलों और सरकारी पाइपों की लीकेज आजतक कोई रोक सका? असल में ये हमारी फाइलों और पाइपों का वंशानुगत मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट है। कुछ समझे?’ हालांकि मैं कुछ न समझा था पर अपने को बुद्धिजीवी घोषित करने के लिए मैंने उसके आगे सहज मुंडी हिला दी,‘ तो तुम किस किस्म के जिन्न हो?’
‘मैं तो आपजिओं का सताया जिन्न हूं।’
‘मतलब!!!’
‘ आपजिओं ने अब तो कब्रिस्तान को भी हथियाना शुरू कर दिया है। अब वहां रहें तो कहां? तुम्हारे मुहल्ले में कोई कमरा किराए के लिए खाली हो तो... किराए की चिंता नहीं। बस कोई परेशान करने वाला न हो। कम से कम मरने के बाद कौन चैन से रहना नहीं चाहता?’ मित्रो! पहली बार एक परेशान जिन्न देखा, वरना आजतक संसद और फुटपाथ वालों दोनों को ये जिन्न परेशान करते रहे।


-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Saturday, November 28, 2009

महात्मा जोतीबा फुले का ब्राह्मणवाद से संघर्ष

क्रांतिकारी समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले की 119वीं पुण्यतिथि पर विशेष

ब्रिटिश काल में सामाजिक न्याय की एक बड़ी लड़ाई लड़ने वाले महान योद्धा महात्मा जोतीबाराव फुले का स्थान भारतीय सामाजिक क्रान्तिकारियों में सबसे महत्वपूर्ण है। हजारों वर्षों से भारत में शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों पर होनेवाले अत्याचारों के विरूद्ध उनके संघर्षों के कारण ही ब्रिटिशराज में परिवर्तन आने शुरू हुये और अंग्रेज शासकों द्वारा नये कानून बनाये गये। जोतीबा ने भारतीय समाज की सबसे बड़ी बीमारी जाति व्यवस्था और उसकी जड़ ब्राह्मणवाद को न केवल समझा बल्कि उस पर जबरदस्त प्रहार भी किये जो परिवर्तनवादी जन आन्दोलन के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरो में दर्ज है। इसी कारण डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें अपना गुरू माना और उनके सामाजिक दर्शन को अपने आन्दोलन का मुख्य आधार बनाया। ब्राह्मणवाद और पुरोहित वर्ग दोनों से ही जोतीबा का संघर्ष तब तक चला जब तक वे जीवित रहे। उनके आन्दोलन का केन्द्र हिन्दु धर्म की वे तमाम कुरीतिया और परम्पराये रहीं जो ब्राह्मणवाद की सदियो से पोषक रही है और जिसके कारण ही देश के बहुसंख्यक नागरिक वर्ग को शिक्षा समेत सभी मानवाधिकारों से सदियों तक वंचित रहना पड़ा।

ब्राह्मणवर्ग विशेषकर पुरोहितों ने अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिये ही वर्ण व्यवस्था की स्थापना की थी। अंततः पीड़ित बहुसंख्यक जनता, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका विरोध ही करती रही। वर्ण व्यवस्था से लाभ उठाने वाला दूसरा वर्ग शासकों का था, जिन्होंने पुरोहितों के हितों को अगर बढ़ाया नहीं तो घटाया भी नहीं। अंग्रेज शासकों ने भी उसी नीति का अनुसरण किया, उनके द्वारा ब्राह्मणों के बीच शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिये जो कुछ किया गया उसका लिखित प्रमाण उपलब्ध है। बरतानिया सरकार भी ब्राह्मणों को तुष्ट करने और उनका सहयोग प्राप्त करने में अपने पूर्ववर्ती शासकों से पीछे नहीं रही। उनकी मान्यता थी कि साम्राज्य के स्थायित्व के लिये यह जरूरी है। अंततः 1813 के चार्टर एक्ट में शिक्षा पर खर्च करने के लिये जो एक लाख रूपये का प्रावधान किया गया था उसका एक अंश ब्राह्मणों की शिक्षा पर खर्च किया जाने लगा। बनारस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना (1791) से लेकर 1820-21 तक उसमें तथा दिल्ली, आगरा और पुणे स्थित सभी महाविद्यालयों में भरती केवल छात्रवृत्ति प्राप्त विद्यार्थियों तक ही सीमित थी जो सभी ब्राह्मण थे। 1820-21 के बाद, मांग को देखते हुये, यद्यापि इन महाविद्यालयों में गैर- ब्राह्मण विद्यार्थियों की भी भरती होने लगी, पर छात्रवृत्ति केवल ब्राह्मण विद्यार्थियो को ही दी जाती रही। 1836 मे इस योजना को समाप्त करने का निर्णय लिया गया जो 1838 से लागू हुआ। इसके परिणाम स्वरूप जहाँ 1833 मे दिल्ली महाविद्यालय मे 431 छात्र थे जिनमें से 377 छात्रों को छात्रवृत्ति मिलती थी। वहाँ 1840-41 मे छात्रों की संख्या घटकर मात्र 155 रह गयी। 1838 के बाद अंग्रेजी शासन ने ”इनकिलट्रेशन“ नाम से एक नयी योजना की शुरूआत की जिसका उद्देश्य था कि पहले ऊपर के वर्ग यानी ब्राह्मणों को शिक्षित किया जाय, ऐसा करने से शिक्षा स्वतः ही निचले स्तर तक पहुंच जायेगी। अंग्रेज सरकार का जमीनी सच्चाइयों से कोई सरोकार नहीं था, अगर वे इस ओर जरासा भी ध्यान देते तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगती कि, जिस वर्ग ने सदियों से निम्नवर्ग को पढ़ने के अधिकार और अवसरों से बराबर वंचित रखा, भला वे क्योंकर उन्हें पढ़ाते, अंततः वह योजना बुरी तरह असफल रही। उसके बाद 1854 में ”वूडस डीस्पैच” आया, जिसके अन्तर्गत सरकार ने जनता को शिक्षित करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया। यह जिम्मेदारी किस प्रकार निभायी गयी इसके साक्षी हंटर कमीशन (1881) मे जोतीबा के दिये गये वे प्रतिवेदन है, जिसमें कई जगह यह बताया गया है, कि किस प्रकार ब्राह्मण शिक्षको और विद्यार्थियो ने निम्न वर्ग के गरीब विद्यार्थियो की शिक्षा के मार्ग में रोड़े अटकाये।

लेखिका- सुजाता पारमीता

20 मार्च 1955 को दिल्ली में जन्म। यहीं के भारतीय मास कम्यूनिकेशन संस्थान से डिप्लोमा, फिर पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट से आगे की पढ़ाई।
दिल्ली की पहली दलित सांस्कृतिक संस्था 'आव्हान थिएटर सिनेमा एंच मास मीडिया' की संस्थापिका। आजकल मुम्बई में दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और महिलाओं की सांस्कृतिक विरासत पर काम कर रही हैं। हंस, कथादेश, महानगर, अन्यथा में कई कहानियाँ और लेख प्रकाशित। 'जाति पर हिन्दी सिनेमा' और 'आदिवासी चित्रकला' पर पुस्तक लिखने में व्यस्त।
जोतीबा धार्मिक कार्यों में ब्राह्मण पुराहितों की सहायता लेने के विरूद्ध थे। इसलिये जनमानस में चेतना के प्रसार के लिये उन्होंने दो पुस्तकें लिखी - पुरोहितों का पर्दाफाश (1867) और ब्रिटिश साम्राज्य में ब्राह्मणी वेश में गुलामी (1873) पहली पुस्तक मे जोतीबा ने बताया कि किस प्रकार जन्म से मरण तक विभिन्न कर्मकाडों द्वारा पुरोहित यजमानों का आर्थिक शोषण करते हैं और दूसरी पुस्तक में किस प्रकार लोगों की अशिक्षा अज्ञानता तथा अन्धविश्वास का लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने शूद्रों और अतिशूद्रों को गुलाम बना रखा है। उन्होंने 1872 में इसी आशय का एक घोषणापत्र भी प्रकाशित किया। जोतीबा सिर्फ पुस्तक लिखकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे, इसीलिये 24 सितम्बर 1873 को उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की एक सभा आयोजित की, जिसमें मार्गदर्शन के लिये सत्यशोधक समाज नाम से एक केद्रीय सगंठन बनाया गया। बाद में कई स्थानों पर उसकी अन्य शाखायें स्थापित की गयीं।

जोतीबा ने ब्राह्मण पुरोहित के बिना ही दो विधवा विवाह सम्पन्न कराये। पहला विवाह दिसम्बर 1873 में और दूसरा उसी के पाँच महीने बाद मई 1874 में। ब्राह्मणों ने विवाह रोकने के लिये क्या कुछ नहीं किया पर सफल न हो सके। इसके बाद जोतीबा के एक अनुयायी ने भी अपने बेटे का विवाह ब्राह्मण पुरोहित के बिना सम्पन्न कराया इस पर पुरोहित मामले को न्यायालय में ले गया। अवर जज जो स्वयं ब्राह्मण थे उस पुरोहित के पक्ष में ही निर्णय दिया। इस निर्णय से खिन्न जोतीबा ने जिला न्यायाधीश के यहाँ अपील की। जिला न्यायधीश ने निचले न्यायालय के फैसले के विरूद्ध निर्णय दिया। पुरोहित कहाँ हार मानने वाला था उसने उस निर्णय के बाद मुम्बई उच्च न्यायालय में अपील दायर की परन्तु वहाँ भी वह हार गया। इस प्रकरण के बाद से पुणे का ब्राह्मणवर्ग जोतीबा के खिलाफ हो गया।

यहाँ इसीसे मिलते-जुलते एक अन्य मुकदमे का जिक्र करना जरूरी है। 1878 पुणे में एक व्यक्ति ने अपने पुश्तैनी पुरोहित की बजाय अन्य पुरोहित से अपने बेटे की शादी करवायी प्रभावित पुरोहित ने महादेव गोविन्द रानडे के न्यायालय में जो उन दिनों पुणे में ही प्रथम श्रेणी के अवर जज थे, मुकदमा दायर किया जिसमें दक्षिणा के अलावा हरजाने की भी मांग की। रानडे ने पुरोहित के पक्ष में निर्णय दिया और आगे कहा कि वादी को बुलाना या ना बुलाना प्रतिवादी की इच्छा पर निर्भर नहीं करता। लेकिन बाद में जिला और उच्च दोनों ही न्यायालयों ने न्यायमूर्ती रानडे के इस फैसले को रद्द कर दिया अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम घातक हो सकते थे। ब्राह्मण पुरोहितों के बिना वैद्य विवाह सम्पन्न नहीं हो सकते इस परम्परावादी दलिल को अमान्य करने वाला बम्बई न्यायालय तीसरा न्यायालय था। बंगाल तथा तत्कालीन पश्चिमोत्तर उच्चतर न्यायालाय इसे पहले ही अस्वीकार कर चुके थे, बाद में मद्रास उच्चतर न्यायालय ने भी इसे नामंजुर कर दिया था जिसके बाद तो यह विवाद का विषय ही नहीं रहा। जोतीबा के लिये ये बड़ी जीत साबित हुयी।

विभिन्न भारतीय प्रांतों में पहले से ही प्रचलित दक्षिणा प्रथा को अंग्रेज शासकों ने अपने शासन काल में भी जारी रखा। बारहाल उन्होंने दक्षिणा कोष की अधिकतम सीमा 50,000 रूपये वार्षिक निर्धारित कर दी। कई अन्य उपाय भी किये गये जिनसे दक्षिणा पाने वाले ब्राह्मणों की संख्या कम होती गयी। एक बार तय किया गया कि बची हुयी राशि में से प्रतिवर्ष 20,000 रूपये पुणे महाविद्यालय को दिये जायेंगे क्योंकि उसमें अधिकतर ब्राह्मण ही पढ़ते-पढ़ाते थे। एक बार जब कोष मे 3,000 रूपये अतिरिक्त बच गये तो पुणे के कुछ सुधारवादी ब्राह्मणों ने गवर्नर को आवेदन दिया कि इस बची हुयी राशि को आधे-आधे भाग मे बाँट कर संस्कृत और मराठी में मौलिक साहित्य तैयार करने वाले साहित्यकारों को परितोषिक के रूप में दे दिये जायँ। लेकिन पुणे के परम्परावादी ब्राह्मणों ने इसे जाति विरोधी मान कर इसके लिये पहल करने वालों को दंडित करने के लिए एक समिती गठित की और सभा के लिए एक दिन भी निश्चित किया। जब समझाने से काम नहीं बना तब सुधारवादियों ने जोतीबा से भेंट कर मदद मांगी। जोतीबा ने तब कुछ दलित बस्तियों में से 200 हट्टे-कट्टे जवान लड़के जमा किये और जुलूस बनाकर निर्धारित स्थान पर पहुँचे। जोतीबा के साथ उन लोगों को देखकर, वहा जमा हुये ब्राह्मणों के होश उड़ गये, लेकिन जोतीबा के सुझावों पर उन्होंने अपनी सहमति दे दी और वे समझौते के लिए राजी हो गये। बाद मे गवर्नर ने भी बची हुयी राशी को साहित्य सृजन के कार्य पर खर्च किये जाने की अनुमति दे दी।

बड़ौदा राज मे बहुत वर्षो से ब्राह्मणो को रोज मुफ्त खिचडी बांटने की प्रथा चली आ रही थी। राजकोष से इस प्रथा पर प्रतिवर्ष एक मोटी रकम खर्च की जाती थी। जोतीबा ने 1884 मे बड़ौदा महाराज को इसके संबध में लिखा और उनसे जा कर मिले। उन्होंने महाराज को समझाया की जब कठोर परिश्रम कर राजकोष भरने वाले किसान भूखे-नंगे जीवन जी रहे हैं तो ब्राह्मणों पर इतना खर्च करना कहाँ तक उचित है। उसके बाद बड़ौदा राज मे खिचड़ी बाँटने की प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

जोतीबा के जीवनकाल में पुणे जिले में जमींदार और साहूकार प्रायः सभी ब्राह्मण ही थे। सरकारी कार्यालयों में भी निम्न और मध्यम स्तर पर काम करने वाले सभी कर्मचारी ब्राह्मण थे। अतः गरीब दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को कहीं से भी न्याय नहीं मिलता। जोतीबा ने इस स्थिति से निपटने के लिये ”दीनबन्धु“ नाम की एक पत्रिका निकाली। उसके बाद उन्होंने खेतिहरो की चाबुक (1873) शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसमें गरीब किसानों की समस्याएँ उसके कारण और निदान पर प्रकाश डाला गया। सरकारी कर्मचारीयो के शोषण से गरीब जनता की रक्षा के लिये जोतीबा ने अपनी पुस्तक में यह मांग रखी की सरकारी नौकरीयो में ब्राह्मणों की नियुक्ति उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक ना की जाय बाकी बचे स्थानों पर शूद्रों-अतिशूद्रों के होनहार युवको को प्रशिक्षित कर नियुक्त किया गया। पुरोहितों के चुंगल से शूद्रों की रक्षा करने के लिये उन्होंने प्राईमरी शिक्षा को अनिवार्य बनाने की मांग की। जोतीबा ने शूद्रों, अतिशूद्रों और किसानों के कल्याण के लिये जो सुझाव उस वक्त बताये थे इतने वर्षों बाद आज कार्यान्वित किये जा रहे है। जिनमें नदियों पर बांध बांधना, कुएँ खोदने के लिये सरकार द्वारा गरीबों को वित्तीय सहायता प्रदान करना, समय-समय पर प्रदर्शनी लगाकर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराना, अच्छी नस्ल के मवेशियों का आयात करना तथा वैज्ञानिक ढंग से खेती की शिक्षा जनमानस तक पहुँचाना शामिल हैं। पुणे जिले की जुनार तहसील में 1884 में जोतीबा ने गरीब किसानों पर होने वाले जुल्मों के विरोध में देश का पहला किसान सत्याग्रह किया जो सालभर तक चला और तभी समाप्त हुआ जब जमींदार, साहूकार और सरकार के प्रतिनिधियों ने स्वयं आकर जोतीबा से समझौता किया।

दलितों के बीच चेतना जगाने और दलित नेतृत्व तैयार करने के लिये जोतिबा निरन्तर दलित बस्तियों में आया-जाया करते थे। जोतिबा भारतीय मजदूर आन्दोलन के जन्मदाताओं में प्रमुख थे। वे जब भी मुंबई जाते अपने प्रवास के दौरान मजदूर बस्तियों में भी जरूर जाते। नारायणराव लोखंडे जिन्होंने 1880 में देश का प्रथम मजदूर संगठन "बम्बई मीलहैड" की स्थापना की थी। उनके अनुयायी और सत्य शोधक समाज के प्रमुख सदस्य थे। 1889 मे बम्बई नगरपालिका और अलिबाग नगरपालिका के दलित मजदूरों ने जो सफल हड़ताल की थी वह भी जोतीबा के प्रयासों का ही नतीजा था।

आज शिवाजी महाराज पर अपना दावा ठोंकने वालों को यह शायद ही याद हो कि जोतिबा ने ही रायगढ जाकर पत्थर और पत्तियों के ढेर तले दबी जीर्ण शीर्ण अवस्था में पड़ी शिवाजी महाराज की समाधी को ढूँढ़ निकाला और उसकी मरमत्त भी करवाई। बाद में उन्होंने शिवाजी महाराज पर एक छन्दबद्ध जीवनी भी लिखी।

स्मृतियाँ और पुराण शूद्रों और स्त्रियों के खिलाफ वह अध्यादेश है जो उनके जीवन को पूरी तरह से नियन्त्रित करता है। उन्हें गुलामी में जीने के लिये बाध्य करता है, आज भी जिसका असर भारत के सभी धर्मो पर समान रूप से दिखायी देता है। अस्पृशता, देवदासी प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह, कन्याभ्रूण हत्या, बेगारी और विधवा विवाह पर पाबन्दी जैसी अनेक अमानवीय धार्मिक प्रथाएँ हैं, जो देश के लगभग सभी राज्यों में अगर आज जिंदा है, तो इसके पीछे भी पुरोहित वर्ग का ही हाथ है। हालाँकि जोतीबा के समय में कानून सती प्रथा को बन्द किया जा चुका था और कहीं-कहीं विधवा विवाह होने लगे थे। पर महिलाओं की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं आया था। जोतीबा ने विष्णू शास्त्री पंड़ित द्वारा चलाये जा रहे विधवा विवाह आन्दोलन में पूरा सहयोग दिया। उन्होंने बाल-विवाह और बहुविवाह का भी खुलकर विरोध किया। उनके द्वारा लिखी गयी ”सतसार“ नामक एक पुस्तिका में भी स्त्रियों की स्थिति पर रोशनी डाली गयी है। यहाँ विशेष रूप से ऐसी दो घटनाओं का जिक्र जरूरी है जो साबित करती हैं कि जोतीबा के विचार इन मुद्दों पर कितने कठोर थे। एक बार जब महादेव गोविन्द रानडे जो उन दिनों पुणे में जज थे, जोतीबा को बताया कि उनकी भी एक बाल विधवा बहन है, तो उन्होंने दुखी हो कर पूछा कि उसका विवाह क्यों नहीं किया गया। जब रानाडे से जबाब देते नहीं बना और वे टाल-मटोल करने लगे तो पास बैठे जोतीबा भड़क गये और गुस्से में बोले "राव साहब, आप अपने आप को आगे से समाज सुधारक ना ही कहें तो अच्छा होगा"। बाद में जोतीबा ने रानडे को दूसरी बार तब फटकारा जब उन्हें पता चला कि अपनी पहली पत्नी के मरने के बाद उन्होने 32 वर्ष की उम्र में एक 11 वर्ष की बच्ची से दूसरा विवाह किया।

जोतीबा की राय में अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धविश्वास स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति में सबसे बड़ी बाधायें थीं। अततः उन्होंने लड़कियों के लिये तीन स्कूल खोले- पहला जुलाई 1851 में, दूसरा उसके तुरन्त दो महिने बाद और तीसरा एक वर्ष बाद सितम्बर 1852 में। तीसरे स्कूल में दलित लड़के भी भर्ती किये गये। वे एक रात्रि पाठशाला भी चलाया करते थे। जोतीबा की पत्नि सावित्रीबाई फुले जिन्हें भारत की प्रथम हिन्दु महिला सामाजिक कार्यकर्ता और अध्यापिका होने का गौरव हासिल है उस स्कूल मे पढ़ाया करती थीं। दलितों के लिये पहला पुस्तकालय भी जोतीबा ने ही खोला था। उन्होंने 1868 में अपने पीने के पानी के हौज से दलितों को पानी लेने की अनुमती दे दी थी।

ब्राह्मणवाद से शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों के सम्मान और अधिकार के लिये शायद ही किसी ने इतना संघर्ष किया जितना कि जोतीबा ने किया। आज भी अनके विचार सभी भारतीय दलित और स्त्रीवादी आन्दोलन के लिये मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं, जब पूँजीवाद और भुमंडलीकरण की बदौलत उपजी भयानक असमानता की चपेट में आया गरीब दलित और आदिवासी वर्ग लगातार मर रहा है।

Tuesday, November 24, 2009

आपका पेट फल

मेषः- आपने जो कुछ पिछले कई महीनों से पेट काट कर जमा किया है अब उसे मन मसोस कर आटे दाल पर खर्च करना ही होगा। आपको भीतर ही भीतर किसी मेहमान के आने की चिंता हर पल सताएगी। इस चिंता के कारण न तो आप दिन में जागे रह सकेंगे और न ही रात को घर वालों को चैन से सोने देंगे। गणेश जी का कहना है कि घर में खर्च को देखते हुए संयम बरतें नही तो घर में हंगामा हो सकता है। उपाय- पीपल को रोज सुबह पानी चढ़ाएं।

वृषः- चाह कर भी आप अपने घर आने वाले मेहमानों को टाल कर भी नहीं टाल पाएंगे। असल में उनके अपने घर में आटा दाल खत्म हो चुके हैं। जितना वे पड़ोस से बेशरम बन ले सकते थे, उतना ले चुके हैं। कुल मिलाकर उनके पास अब आपके घर आने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा है। इसलिए गणेश जी का कहना है कि जैसे भी हो उनको झेलें। उपाय- कुत्ते को रोटी दें।

मिथुनः-बढ़ती महंगाई को देख कर अब आपकी भी रिश्वत लेने की योजना सिरे चढ़ेगी। आपके साहब आपसे अपने लिए लंच न लाने पर नाराज हो सकते हैं। इसलिए गणेश जी का कहना है कि किसी अनहोनी से बचने के लिए आप अपने लिए लंच भले न ले जाएं पर साहब के लिए लंच जरूर ले जाएं। जिसकी आपने कई दिनों से गलत फाइल रोक रखी है वह आपके घर उल्टे पांव कुछ लेकर आने वाला है। जो कुछ दे, निःसंकोच ले लीजिए। उपाय- फिलहाल मौज करें।

कर्कः- औरों की जेब पर आप सपरिवार डट कर मौज मस्ती करेंगे। गणेश जी का कहना है कि आपका मंगल केंद्र में होने से लग रहा है कि आपकी सास आपको किचन का सारा सामान लेकर आएंगी और आपका पूरा महीना भरपेट खाकर कटेगा। उपाय- अपने पेट का ध्यान रखें।

सिंहः- आप अबके भी महंगाई से उबरने की बहुत कोशिश करेंगे पर गणेश जी साफ देख रहे हैं कि कुछ न कर पांएगे। सब्जी खाने से आपका पेट खराब हो सकता है। बच्चों के लाख कहने पर भी उनके साथ बाजार न जाएं। वे आपको केक खाने के लिए परेशान कर सकते हैं और आपके पास पैसे न होने के कारण आपको कलंकित होना पड़ सकता है। उपाय- कौवे का काग बलि दें।

कन्याः- आप सरकारी टूअर पर रहेंगे जिससे आपका पेट तो भर जाएगा पर घर के बाकी जनों को पड़ोसी के घर से आई तड़के की बास से ही प्रसन्न होना पड़ेगा। गणेश जी का कहना है कि माना आपने कई महीनों से मदिरा पान नहीं किया है सो आपका मन कर सकता है पर भलाई इसी में है कि मदिरा के पैसों से घर में बच्चों के लिए मिठाई ले आएं। उन्हें भी लगेगा कि उनके पापा सरकारी टूअर से आएं है। उपाय- साहब को कोई अच्छा सा गिफ्ट दें।

तुलाः- किचन के डिब्बे खाली देख आप खालीपन और निराशा का अनुभव कर पत्नी को पतिआने की असफल कोशिश यह कह करेंगे कि ये महंगाई और अधिक दिन जिंदा रहने वाली नहीं। सपने में ही फल मेवों के दर्शन होंगे। गणेश जी कहना है कि बीवी बच्चों को कुछ दिन उसके मायके भेज दें। भले ही बच्चों को स्कूल से एबसेंट करवानी पड़े। उपाय- मलका का दान करें।

वृश्चिकः-पड़ोसी का आप पूरा लाभ लेंगे। आप उसे जैसे चाहे खाने में महारत रखते हैं। इसलिए आपको कितनी भी महंगाई क्यों न हो जाए चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं। वैसे भी आप जब ते कुंआरे हैं, गणेश जी का कहना है तब तक आपके वारे न्यारे हैं। उपाय- जब तक कुंआरे हैं आपको कुछ करने की जरूरत नहीं।

धनुः-आप सब्जियों की परेशानियों के चलते अकेला रहना पसंद करेंगे । हो सकता है आपके मन में यह सुविचार भी आएं कि आपने विवाह क्यों किया। हो सकता है महंगाई को देख आपका मन वैराग्य की ओर भी प्रवृत हो। गणेश जी का कहना है कि आप अब शिली के बदले ईश्वर की शरण में अधिक समय बिताएंगे। शुभ रंग- अरबी का।

मकरः- आपका गुजारा हाथी की चाल चल रहा है। भगवान की दया से विभाग भी आपको अच्छा मिला है। पड़ोसी आपके घर से बासमती चावलों की खुशबू को सूंघ परेशान रहते हैं और इनकम टैक्स विभाग को भी सूचित करने की योजना बना रहे हैं। गणेश जी का कहना है कि कुछ दिन के लिए बासमती चावल बनाना बंद कर दें। वरना बुरा होते देर नहीं लगती। उपाय- शुद्ध देसी घी के दीए जलाएं।

कुंभ- आप घर में फल लाने में कामयाब होंगे। चीनी लाने के मामले में आपको अबके खुशी मिलेगी। इससे परिवार में आपका कद ऊंचा होगा। गणेश जी का मानना है कि बादाम छवारे लाने के लिए आपको कठोर निर्णय लेना पड़ सकता है। बच्चों द्वारा पुराने दिनों को याद करने पर आपको उनके विरोध का सामना करना पड़ सकता है। उपाय- सूखे नलके पर रोज सुबह चाय पिए बगैर जल चढ़ाएं।

मीनः- आपकी पत्नी रोटी बनाने के पुराने तरीकों को बचत वाला टच देगी। कम खर्च में वह अधिक जायकेदार भोजन बनाने की कोशिश करेगी ताकि आप महंगाई के नियंत्रण में रह सकें। गणेश जी का कहना है कि पड़ोसी द्वारा आपको सपरिवार अपने घर डिनर पर बुलाने के भी पूरे योग बन रहे हैं। आपको पिछले सारे बैर भुलाकर जेब के हित में दो दिन व्रत रख जरूर जाना चाहिए। उपाय-इधर उधर से उधार लेना शुरू कर दें।

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

Friday, November 20, 2009

महंगाई नियरे राखिए,संसद कुटि छवाई


अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद । स्रोत- केगलकार्टून्स । अनुवादक- शैलेश भारतवासी

महंगाई में बंस गरीब का, हो गई अब कमाल। राम रहीम को छोड़ के, घर में सब बेहाल। थाली घर घर में फिरे, जीभ मरी मुख माहीं। दाल भात चहुं दिसि दिखे, पर पेट तो कछु नाहीं। जो दाल दे रोटी दे, मुझे तो वही सरकार। अब तो मूली के पत्ते भी, हो गए पहाड़। जान गवाय रोटी मिले, हर कोई लेए गवाए। दो रोटी जिसे मिले, अब वही स्वर्ग को जाय। कंट्रोल रेट सब झूठ है, मत भरमो जग कोय। चोर बाजारी किए बिना, यहां साध न होय।

डिग्री लिए रोए जग मुआ, नौकरी मिलि न कोय। मूंगफली जो बेच रहा, अब सोई पंडित होय। रेता र्इंटा चोरी के, दो कमरे लिए बनाय। तां चढ़ी बंदा बांग दे, पर रोटी कहां से पाय। दिन भर रोजा रखत है, राती भी कुछ न खाय। अब तो हर पल दिखत है, सबको बस खुदाय। रामू ‘यामू सलमान अब, क्या बाजार को जाई। सारा दिन मंते घूमे, सब खाली झोला आई। बकरी खाती गंद है, ताकि काढ़ी खाल। जो जनता को खात है, वो हो रहे तालो ताल। पेट में रोटी, रोटी में पेट, देखे जो वो ही ग्यानी। भूखा पेट रोटी में समाए, यह तत कहत है रानी।
मनवा चीनी में लिपटा, पंख घी लिपटाय। हाथ मले और सिर धुने, सरकार चुप रही जाए। आंखड़ियां झाई पड़ी, सब्जी निहारी निहारी, जीभड़िया छाले पड़े, दूध पुकारि पुकारि। बहुत दिनन से देखती, बाट तुम्हारी पनीर। फाकों से मुक्ति मिले, तो अमर हो ये सरीर।

जनता खड़ी बाजार में, लिए थालियां हाथ। जिसके घर रोटी मिले, ले जाए सबको साथ। हे प्रभु इतना दीजिओ, मेरा परिवार पल जाए। पड़ोसी भाड़ में जाए, साधु भाड़ में जाए।
सपने में रोटी मिली,सोबत दिया जगाय। आंखिन खोली तो क्या देखा,घर रोटी को हाय। बहुत दिनन से जोवता, बाट तुम्हारी लंच। जीभ तरसे तुझ मिलन को, मारे महंगाई के दंश। चोट सतानी महंगाई की,अंग अग जरजर होई। हंसने वाले हंस रहे, जनता मरी रोई रोई। रोटी रोटी न कहो, रोटी वाले बेईमान। जा पेट रोटी संचरै, वही यहां सुलतान। जो रोऊं तो जग हंसे, हंसों तो पेट दुखाई। अब तब तक मन में रोना है, जब तक कम न हो महंगाई। कै जनता को मार दे, या कम कर दे महंगाई। अब ये पेट की आग और, मुझसे सही न जाई। भूखा सारा देस है, क्या खावै क्या सोवे। आटा लाया जत्न से , बच्चे दूध को रोवै।

जनता को उपवास भाया, अब करे निरंतर उपवास। सिवाय रूखे सूखे के, कुछ नहीं उस के हाथ। आया था इस देस में, खाने को बहुरूप। आ कर यहां पर फंस गया, सब जगह भूख ही भूख। अरहर से कल मिला, लाहौरिया भरपूरि। सकल पाप देखत गए, ज्यों सांई मिला हजूरि। अल्लाह को था ढूंढता, कल चानक मिलिया आई, सोचा था उसको खाऊंगा, पर उसने मेरी खाई। मार्किट में हाहाकार, जीव जीव भटकाहिं, छिलके वाले छिलके चुगै,मटरों से नजर चुराहिं। निम्न वर्ग समाज का, रटे कंटरोल कंटरोल,वो क्या जाने बेचारा, क्या सत्ता को झोल। जनता कुत्ता सरकार की,गली गली भटकाए। गली वाले भी खुद बेचारे, और गली में जाए। बंदे ये जग बाजार का, खाला का घर नाहीं। कीमत दे माल ले जा, तब घर में चूल्हा जलाहीं।

रोटी न रिश्ते उपजै, रोटी तो हाट बिकाहीं। लालू पालू जेहि रूचै, नोट दे ले जाहीं। ऐसा मिला न कोय जो,घर आए को दे खिलाए। घर आए साधु तो अब , दरवाजा खुद बंद हुई जाय । महंगाई महंगाई करे मरे , हर मानुस की जात। स्वर्ग में खाएंगे, क्या दाल क्या भात। खिलावन वाले तो मुए, मुए अब खावनहार। सौ सौ ढाबे थे जहां, अब जमा घटाकर चार। साधु आप ही खाइए, और न खिलाइए कोय। आप खाए सुख उपजे, और खिलाए दुख होय। हाट बाजार ह्वै ह्वै गया ,केती बार गरीब। हर बार वहां बिकती देखी, उसने एक सलीब। हम घर बांधा आपणा, अब चूल्हा चैका बंद। न जीने का अधिकार उसे , जेब हो जिसकी तंग। जिनि वोट पाए ते जिए, वोटर अब चालनहार। उनते पाछै पूंगरे, संभलें वे करतार।

महंगाई नियरे राखिए,संसद कुटि छवाई। बिन दवा बिन दारू कै, पेट रहे सफाई।


अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Tuesday, November 17, 2009

रामकृष्ण पाण्डेय- आंदोलनों में अपनी भूमिका तलाशने वाला पत्रकार

हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार और कवि रामकृष्ण पांडेय का सोमवार शाम निधन हो गया। न्यूज एजेंसी यूएनआई से रिटायर हुए रामकृष्ण पाण्डेय लम्बे समय से मधुमेह से पीड़ित थे। सोमवार, 16 नवम्बर को इनकी तबियत अचानक खराब हो गई जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनका देहान्त हो गया। आज शाम उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इनके परिवार में इनकी पत्नि के अलावा इनकी दो बेटियाँ भी हैं।

कम्यूनिस्ट आंदोलन से जुड़े रामकृष्ण पाण्डेय को इनके कुछ करीबी और जानकार कुछ यूँ करते हैं। हम इस माध्यम से हिन्द-युग्म की ओर से श्रद्धाँजलि दे रहे हैं।


वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे

सुबह रंजित वर्मा से रामकृष्ण पाण्डेय की मृत्यु का समाचार सुनकर एकबारगी यकीन नहीं हुआ की हर हफ्ते हँसते-मुस्कराते मिलाने वाले पाण्डेय जी इतनी जल्दी धोखा दे जायेंगे। वे हमारे बीच एक अपरिहार्य उपस्थिति थे। हाल में ही उन्होंने यूएनआई में अपनी दूसरी पारी शुरू की थी और अपनी कई किताबों के प्रकाशन की योजनाएँ बना रहे थे। पाण्डेय जी से मेरा परिचय दस साल पहले हुआ था। वे जल्दी ही आत्मीय हो गए। काफी दिनों बाद उन्होंने अपना संकलन भी दिया। मिलना-
एक प्रतिबद्ध पत्रकार थे

रामकृष्ण पाण्डेय एक वरिष्ठ पत्रकार थे, कवि भी थे। वे इतने सज्जन थे कि किसी भी बात के लिए मना नहीं करते थे। हमेशा जन के लिए प्रतिबद्ध पत्रकार की तरह लगे रहे। वे इस वय में भी लगातार काम करते रहे, अपनी अस्वस्थता की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हालाँकि मेरा कभी उनसे बहुत व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा, लेकिन प्रोफेशनल सम्बंध ज़रूर रहा। मैंने जब कभी भी उन्हें समयांतर के लिए लिखने के लिए कहा, उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावज़ूद लिखा। अक्टूबर 2009 अंक में भी उनकी लिखी एक समीक्षा छपी है। उन्होंने कभी भी अपनी पीड़ा, अपनी बीमारी का प्रचार नहीं किया। कल जब उनकी मृत्यु का समाचार मिला तो पता चला कि वे पिछले 1 सप्ताह से गंभीर रूप से बीमार थे। यूएनआई के अलावा उन्होंने लघुपत्रिकाओं में प्रतिबद्ध किस्म का लेखन किया। इनके लेखों और कविताओं में समाज की चिंताएँ रिफ्लैक्ट होती हैं। इनका एक कविता-संग्रह भी प्रकाशित है। एक और तैयार है। आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न नहीं थे, इसके बावज़ूद भी वे जन संघर्ष और मानवीय पीड़ा की कलम बनते रहे।

--पंकज बिष्ट, संपादक- समयांतर
जुलना बाद में कम हो गया था लेकिन समयांतर में लगातार अपनी टिप्पणियों और लेखों से उन्होंने न केवल ध्यान खिंचा बल्कि समकालीन प्रश्नों पर बेहद सादे ढंग से लिखा। पिछले साल रंजित, कुमार मुकुल, अजय प्रकाश, पाण्डेय जी आदि ने मंडी हाउस में नियमित मिलने और रचना पाठ का एक कार्यक्रम शुरू किया जिसमे मैं भी शामिल हो गया, हालाँकि कुछ मित्रों ने निहित स्वार्थों के लिए तोड़फोड़ करने और हूट करने की कोशिश की लेकिन यह आयोजन लगातार चलता रहा। पाण्डेय जी अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण गोष्ठी के अनिवार्य हिस्सा थे। सही मायने में वे साहित्य के गंभीर अध्येता थे और समकालीनता बोध से भरे पूरे थे। कविता के नए सौंदर्य,सवाल,भाषा और चुनौतियों के प्रति वे निरंतर सचेत थे और नए से नए कवियों को लगातार पढ़ते थे। आनंद प्रकाश जी की तरह पाण्डेय जी नयी पीढ़ी में अपने समकालीन धुन्ध्ते इ अपनी जगह थे। स्वयं पाण्डेय जी हिंदी साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा से पूरी तरह उपेक्षित थे लेकिन इसकी उन्हें परवाह ही कहाँ थी। वे अपनी भूमिका देश में चल रहे आंदोलनों में तलाशते थे और लगातार अपनी टिप्पणियों से उसमें भागीदार भी होते। पांडेय जी इस मामले में बेहद संकोची थे कि कोई उन्हें साहित्यकार माने ही। इसी झोंक में वे अपनी जगह ब्रेख्त या किसी और कवी की कविता सुनाने लगते। यह आज के आत्ममुग्ध लोगों की दुनिया में दुर्लभ बात है। शायद यह खूबी अपने दौर में एक गंभीर सांस्कृतिक कर्म के प्रति इमानदार सरोकारों से ही पैदा होती होती है। उनका जाना हमारे एक जरूरी दोस्त का जाना है लेकिन वे हमारी भावनाओं और संवेदना में हमेशा मौजूद रहेंगे।

--रामजी यादव, युवा कवि, सहसंपादक- पुस्तक वार्ता


पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे

रामकृष्ण का बहुत लम्बा कैरियर रहा। पटना में जन्मे, वहीं से इनके कैरियर की शुरूआत हुई। पटना से जेएनयू आ गये।
बहुत अधिक परिचित नहीं था। हालाँकि उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व से लगातार प्रभावित ज़रूर रहा। उनके पत्रकारी कैरियर में कोई कंट्रोवर्सी नहीं रही, वे पूरी तरह बेदाग रहे। यही क्या कम बड़ी उपलब्धि है!

--विमल झा, फीचर संपादक, दैनिक भास्कर
कविताएँ लिखते रहे। पाण्डेय जी मूल रूप से कवि ही थे, लेकिन चूँकि बाद में पत्रकारिता से भी जुड़ गये,इसलिए एक लम्बा कैरियर पत्रकारीय भी रहा। पाण्डेय जी प्रगतिशील आंदोलन के लिए लगातार खाद-पानी का काम करते रहे। उनकी कविताएँ प्रमुख रूप से नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित कविता संग्रह में प्रकाशित हुई, जिसमें इनके अलावा उदय प्रकाश और अरुण कमल की कविताएँ भी संकलित थीं। इनकी समझ बहुत ही अच्छी थी। मार्क्सवादी नज़रिया रखते थे। कविताओं की साफ समझ रखते थे। गोष्ठियों में जब किसी कविता पर अपने विचार देते थे तो कुछ न कुछ नया दृष्टिकोण लेकर उपस्तित होते थे। नई बात खोज ही लेते थे। युवा कवियों के बीच भी काफी लोकप्रिय थे। हालाँकि उनकी रचनाएँ समकालीनता से पूरी तरह लैश थीं, फिर भी उन्हें हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे। यह पूरे हिन्दी साहित्य के लिए चिंता की बात है।

--रंजीत वर्मा, कवि-लेखक