Sunday, February 01, 2009

गरीब की रोटी होगी और महंगी....

इसे गरीब का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद भी उसे सस्ती रोटी नहीं मिल पा रही है। यही नहीं आगामी सीजन में उसकी रोटी अब और महंगी हो जाएगी क्योंकि सरकार ने गेहूँ के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर दी है।
उल्लेखनीय है कि 2007-08 देश में गेहूं का उत्पादन 784 लाख टन हुआ जो एक रिकार्ड है जबकि 2006-07 में उत्पादन 758.1 लाख टन था। रिकार्ड उत्पादन के बावजूद देश में गेहूँ के भाव भी रिकार्ड ही बना गए।

मार्केटिंग वर्ष 2007-08 (अप्रैल-मार्च) में गेहूं का समर्थन मूल्य 850 रुपए प्रति क्विंटल था जिसे 2008-09 में बढ़ाकर 1000 रुपए कर दिया गया। इससे खुले बाजार में गेहूं के भाव में वृद्वि होना स्वाभाविक ही था। अब सरकार ने 2009-10 के लिए इसे बढ़ा कर 1080 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है। इससे नि:संदेह आगामी महीनों में गेहूं के भाव में और तेजी आएगी।
गत वर्ष देश में गेहूं का रिकार्ड उत्पादन होने के कारण आरंभ यह उम्मीद थी कि भाव नीचे रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण बाजार से अधिकांश गेहूं सरकार द्वारा खरीद कर लिया जाना रहा।
मार्केटिंग वर्ष 2008-09 के दौरान मंडियों में कुल 248.28 लाख टन गेहूं की आवक हुई और इसमें से सरकार ने 226.82 लाख टन की खरीद की। यह भी एक रिकार्ड है। वास्तव में न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिक होने के कारण किसान जहां अधिक से अधिक गेहूं मंडी में लाए वहीं सरकारी अंकुश के कारण व्यापारियों ने इसकी खरीद नहीं की। परिणाम स्वरुप बाजार में गेहूं का स्टाक कम हुआ और बाजार में भाव बढ़ने लगे। हालांकि भाव पर काबू रखने के लिए सरकार ने खुले बाजार में 50 लाख टन गेहूँ बेचने की घोषणा की। यह घोषणा सरकार ने सितम्बर में की थी और उस समय दिल्ली बाजार में खुदरा क्वालिटी की गेहूं के भाव 1060/1063 रुपए प्रति क्विंटल चल रहे थे। सरकारी की इस घोषणा पर कार्यवाही कछुए की चाल से की गई और यही कारण है कि भाव में कोई मंदी नहीं आई और बढ़ते-बढ़ते अब 1182/1185 रुपए हो गए।
सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी किए जाने के बाद दिल्ली में भाव बढ़ कर 1192/1195 रुपए हो गए हैं और संभावना है कि जल्दी ही भाव 1200 रुपए का आंकड़ा पार कर जाएंगे।
ज्ञातव्य है कि इस वर्ष एक जनवरी को सरकारी गोदामों में कुल 180.62 लाख टन गेहूं का स्टाक था जबकि बफर मानदंडों के अनुसार इस तिथि को 82 लाख टन का स्टाक होना चाहिए।
इस प्रकार सरकारी गोदाम तो भरे हैं लेकिन बाजार में भाव कम नहीं हो रहे हैं।
यह संभव है कि आगामी सीजन आरंभ होने पर नई गेहूं की आवक बढ़ने के बाद भाव में कुछ मंदी आए, लेकिन यह तो तय है कि आम आदमी को गेहूं सस्ती नहीं मिलेगी। उसकी रोटी तो महंगी हो ही चुकी है।

राजनीति का शिकार
वास्तव में आम आदमी राजनीति का शिकार हो रहा है। जानकारों का कहना है कि योजना आयोग और प्रधान मंत्री कार्यालय गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में किसी प्रकार की बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि गत वर्ष ही भाव में 150 रुपए की बढ़ोतरी की गई थी।
लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए सरकार ने किसानों के वोट हासिल करने के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर ही दी है।

चलते-चलते
गुलज़ार की ये त्रिवेणी शायद सरकार को भी पसंद आये-

"मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
"

राजेश शर्मा

Saturday, January 31, 2009

सोने का पिंजर (3)

तीसरा अध्याय

गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम....!

एक नाम सबको याद हो जाता है, वीजा। लेकिन यह होता क्या है? कैसे बनता है? अधिकांश नहीं जानते। तुम्हारे यहाँ से संदेशा आता है कि वीजा बनवाना है, तो पासपोर्ट चाहिए।
अरे आप लोगों ने अपना पासपोर्ट भी नहीं बनवाया? कैसे लोग हैं आप?
लेकिन बेटा हम पासपोर्ट का क्या करते? यहाँ तो एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए केवल टिकट चाहिए।
नहीं, नहीं, सब फालतू की बाते हैं, आधुनिकता का यही तकाज़ा है कि आपके पास पासपोर्ट हो, क्रेडिट कार्ड हो, एटीएम कार्ड हो। चलिए अब बना लीजिए फटाफट।
तीन महीने पासपोर्ट में लग गए, अब वीज़ा की तैयारी शुरू करो। आपकी इनकम का स्टेटमेंट चाहिए। बेंक में कम से कम दो-चार लाख रूपए पड़े होने चाहिए। वह भी सेविंग अकाउण्ट में। दो-चार एफ.डी. भी होनी चाहिए। लगना चाहिए कि आप के पास धन-दौलत है, आप वापस आएँगे। घर का मकान होना तो निहायत ज़रूरी है। स्वयं का व्यापार है तो वीज़ा मिलना आसान है, क्योंकि अपना व्यापार करने तो वापस आना ही पड़ेगा। आपके बैंक में इतना रूपया होना चाहिए कि आपको अमेरिका में अकेले भी रहना पड़े तो रह सकें। क्या पता आपका बेटा आपको धक्का मारकर निकाल दे या फिर आपको ही वहाँ उसके साथ रहना नहीं भाए। फिर क्या करेंगे आप? सरकार क्यों आपका बोझा उठाए? इसलिए मकान के कागज़ भी चाहिए, इनकम टेक्स के कागज़ भी। जितने सबूत ले जा सको, ले लो। पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए। यहीं से शुरू होता है हमारा हीनता-बोध। बात-बात पर झुँझलाहट सुनायी पड़ती है कि अरे, आपके पास यह नहीं है, यह नहीं है। अरे आपका वेतन इतना कम है? यहाँ तो चपरासी को भी इससे ज़्यादा मिलता है। हमे लगने लगता है कि हम वाकई बहुत ग़रीब हैं। हमारे पास दिखाने को तो कुछ भी नहीं है। क्या हुआ जो हम यहाँ स्वाभिमान से रहते हों, लेकिन तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है।
अब कैसे बताएँ कि हमने तो पूरे परिवार का पेट पाला है। भारत में वेतन हज़ारों में ही मिलता है। एक डॉक्टर हो या फिर इंजीनियर, वेतन तो कुछ हज़ार बस। अब उसमें से कहाँ से लाएं लाखों की जमा रकम? भारत में तो बुद्धि-सम्पन्न संतानों की प्राप्ति के लिए संस्कार किए जाते हैं। बस एक ही बात का ध्यान रखा जाता है कि संतान बुद्धिशाली हो, जिससे वह पढ़-लिखकर माँ-बाप का सहारा बन सके। घर में बेईमानी का पैसा नहीं आना चाहिए, नहीं तो संतान बिगड़ जाएगी, पैसे का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए, नहीं तो संतान के संस्कार बिगड़ जाएँगे। बस एक ही बात रहती है कि कैसे भी हों, संतान को संस्कारवान बना दें। बस एक बार संतान कुछ बन जाए तो हम गंगा नहायें। हमारा धर्म तो संतान में ही सीमित रहता है। संतान कुछ बन गयी तो पुण्य, नहीं बनी तो पाप। हम तो बुद्धि के भरोसे ही संतानों को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। पैसे के भरोसे तो विद्या नहीं खरीदी जाती है। कोई भी नहीं चाहता कि हम हमारे बच्चों के लिए विद्या खरीदें। लेकिन अब तो चलन ही दूसरा हो गया। बच्चे पूछते हैं कि तुमने हम पर कितना रूपया खर्च किया? रूपया खर्च किया हो तो ठीक, नहीं तो तुमने कुछ नहीं किया।
सारा खेल ही पैसे का हो गया। हमने तो बुद्धि को महत्त्व दिया और तुमने कहा कि नहीं पैसा होना चाहिए। अब कहाँ से लाएं पैसा, जिसके सहारे वीजा मिले? खैर, जैसे-तैसे करके दिखा ही दिए कि कुछ लाख रूपये तो हमारे पास भी हैं। मकान भी है, गाड़ी भी है आदि, आदि। थैला भरकर सबूत एकत्र कर लिए और चल दिए खुशी-खुशी तुम्हारे दरबार में। हमने सोचा था कि भला तुम्हें क्या तकलीफ होगी हमारे वहाँ जाने में? हम कौन सा बसने जा रहे हैं, हम तो बस देखने ही तो जा रहे हैं तुम्हारा स्वर्ग। लेकिन तुमने कहा कि नहीं। तुम सब लालची देश के हो, जब तुम्हारी युवा-पीढ़ी हमारे लालच में आ जाती है, तब तुम क्यों नहीं? क्या गारंटी है कि तुम वहाँ बसना नहीं चाहोगे? फिर तुम्हारे पास तो ममता का कारण भी है।
वीजा साक्षात्कार के समय एक प्रश्न उछाला गया- “क्या करते हो?”
मेरे पति ने कहा- “डॉक्टर हूँ। “
“तुम्हारे पेशेंट को बाद में कौन देखेगा? नहीं, तुम्हें नहीं मिल सकता वीजा।“
एक मिनट के कुछ हिस्सों में ही फरमान जारी हो गया कि, स्वर्ग के दरवाजे तुम्हारे लिए नहीं खुल सकते। बहस की गुंजाइश नहीं, धक्के मारकर बाहर कर दिए जाओगे।
लोग कहने लगे कि डाक्टर से उन्हें डर लगता है कि कहीं वहीं बस नहीं जाए।
लेकिन वहाँ तो दो साल और पढ़ना पड़ता है, तब ही नौकरी सम्भव है? और इस उम्र में कौन पढ़ेगा? क्या कोई भी डॉक्टर अपनी कमाई छोड़कर वहाँ बसेगा, इस उम्र में?
लेकिन तुम्हारा स्टैम्प मौत का फरमान जैसा होता है। सारे सपने एक बार में ही बिखर जाते हैं। बरसों का सिंचित स्वाभिमान चूर-चूर हो जाता है।
लोग पूछते हैं- “अरे तुम्हें नहीं मिला वीजा? उसे तो मिल गया था। “
“क्या पूछा था तुमसे?”
“तुम्हें बताना ही नहीं था कि हम डॉक्टर हैं।“ जितने मुँह उतनी सलाह। आप क्षण-क्षण टूटते रहते हो। तुम्हारे वीजा-ऑफिस में लोग घण्टों बैठे रहते हैं, अब आस जगे? कुछ हँसते हुए बाहर निकलते हैं और कुछ रोते हुए। बाहर घूम रहे भिखारियों को कोई सौ रूपया दान देता है तो कोई दस रूपया। भिखारी भी जानते हैं कि किसे वीजा मिला है और किसे नहीं। तुम्हारे लिए तो रोज़ की ही बात है लेकिन हमारे लिए तो जीवन में पहली बार होती है। ‘बे मुरव्वत से तेरे कूँचे से हम निकले’ कहते हुए हमारे जैसे जाने कितने ही लोग तुम्हारे यहाँ से धकियाए जाते हैं। क्या पैसे वाले और क्या बिना पैसे वाले।
आदमी को कहा जाता है कि एक बार और प्रयास कर लो, पहले तो तुमसे चूक हो गयी अब सावधानी बरतना। कितने ही ऐसे लोग हैं जो दूसरी बार में भी धकियाए जाते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें किस बात के लिए उम्र-कैद की सजा सुनायी गयी है। क्यों नहीं वह अपने बच्चों से मिलने जा सकता? एक असुरक्षा-बोध मन में समाने लगता है। कहीं ऐसा नहीं हो कि हम कभी जा ही नहीं पाएँ? जरा सा बुखार भी मन को चिन्तित कर देता है कि हम बेटे के पास नहीं हैं, उसके सर पर हाथ फेरने को मन तरस जाता है। हर तरफ बेचारगी छा जाती है। बार-बार तुम्हारे यहाँ आकर बेइज्जत होने का मन भी नहीं करता। भारत में हर आदमी अपनी इज्जत को ही रोता है, उसे चाहे रोटी नहीं मिले लेकिन वह जिल्लत की रोटी कभी नहीं चाहता।
कितने चक्कर काटे आखिर तुम्हारे यहाँ? फिर कौन सी तुम्हारी फीस कम है? एक बार मैं पूरे दस हजार से भी ज्यादा खर्च हो जाते हैं, एक आदमी के। हजारों रूपयों में कमाने वाला भारतीय भला इतना पैसा तो अपने ऊपर कभी एक-बारगी में भी खर्च नहीं करता है और वह एक मिनट में ही तुम्हें दे आता है! केवल तुम्हारी ना सुनने के लिए! लोग तो कहते हैं कि यह भी तुम्हारे लिए एक धंधा है, पैसे कमाने का। रोज ही लोगों को धकियाते हो और उनकी फीस डकार जाते हो। बेचारे कुछ करना चाहें तो फिर डरा देते हो। बच्चे कहते हैं कि ऐसा भूल कर भी नहीं करना, नहीं तो जिन्दगी भर कम्प्यूटर में फीड हो जाएगा आपका नाम-ब्लैक लिस्ट में। फिर क्या पता बेटे-बेटियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़े? ना बाबा ना, ऐसा काम नहीं करना। अपमान का घूँट पीकर रह जाओ।
मुझे तो लगता है कि तुम शरीफों के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हो, बदमाशों को तो तुम रोक नहीं पाते। सारे ही आतंककारियों के पास तुम्हारा ग्रीन कार्ड है। सभी को तो तुमने सुरक्षा प्रदान की है। हाँ शायद तुम्हें ऐसे आतंककारियों की भी तो जरूरत पड़ती होगी न? तुम्हें तो कभी अफगानिस्तान को, कभी ईराक को नेस्तनाबूत करना जो पड़ता है। सारी दुनिया पर बादशाहत करने के लिए हिंसक लोग भी चाहिए ही न?। कैसी है तुम्हारी दुनिया, सारी दुनिया ही तुमने समेट रखी है। तुम भी क्या करो? यूरोपियन्स ने तुम पर आकर अधिकार जो कर लिया है। तुम्हारे वाशिंदे तो बेचारे बहुत सीधे-सादे लोग हैं। वे इतने आराम-तलब हैं कि उन्हें केवल आराम से मतलब है, काम से नहीं। उनके इतने बड़े देश को न जाने कितने यूरोपीय देशों के वासियों ने अपने कब्जे में कर रखा है?
जब तुम्हारी भूमि वीरान पड़ी थी, कुछ लाख लोग ही तो थे तुम्हारे पास। उस समय अंग्रेज वहाँ घुस आए थे। उन्होंने कितनी मार-काट की थी तुम्हारे यहाँ, तुम्हें कुछ याद है? तुम्हारा इतिहास कहता है कि अंग्रेज यहाँ आए और उन्होंने लाखों अमेरिकन्स को मारा। जो जितने अमेरिकन्स को मारता था उसे उतना ही बड़ा पुरस्कार मिलता था। उन्हें लगा कि अरे यह स्थान तो सुरक्षित है। यूरोप तो एशिया से लगा हुआ है, यहाँ तो सुरक्षा पर खतरा मँडरा सकता है। उन्होंने तुम्हारी धरती पर ही अपना आशियाना बनाने का प्रण कर लिया। सौलहवीं शताब्दी में तुम्हारे यहाँ जंगल और समुद्र के अलावा और क्या था? इंसानों की बस्ती कैसे बसे यही प्रश्न था अंग्रेजों के पास। तब वे अफ्रीका से गुलामों के रूप में ले आए थे वहाँ के वाशिंदों को। कुदरत भी कैसा खेल खेलती है, गोरा रंग है तो राजा और काला रंग है तो गुलाम! तुम्हें तब जरूरत थी ऐसे मेहनतकश इंसानों की जो तुम्हारी धरती को निखार सके, उसे रूप दे सके। तब तुमने किसी को भी वीजा से नहीं बाँधा। बस बेचारे काले लोग बँधे तुम्हारे एग्रीमेंट से। आज जो तुम देख रहे हो, वह सब उन काले लोगों की मेहनत का ही परिणाम है। कल क्या आज भी तो तुम्हारे यहाँ काले लोग ही तुम्हारे शहरों को साफ-सुथरा रख रहे हैं। तुम्हारे यहाँ के गोरे तो आज भी आराम-तलब ही बने हुए हैं।
मैं तुम्हारे वीजा-नियमों की बात कर रही थी। मैंने लाइन में खड़े लोगों के मन में एक भय देखा है जो उनकी आँखों में उतर आता है।
तुम कहते हो कि हमारे यहाँ हर कोई आकर बसना चाहता है। हम क्या करें? हमें नियम कड़े रखने पड़ते हैं।
लेकिन क्या तुम्हारे ये कड़े नियम सुपरिणाम देते हैं? कितने पंजाबी, कितनी बार शादी कर-कर के तुम्हारे यहाँ अपने पूरे परिवार को ले गए हैं? तुमने कितनों को रोक लिया? एक बार रोका, दो बार रोका, लेकिन उन्होंने कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया। लेकिन बेचारे वो माँ-बाप जिनके लाड़ले वहाँ पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं, तुमने उन्हें भी रोक लिया। एक तरफ तो तुम अपने नियमों की दुहाई देते हो, दूसरी तरफ तुम लाचार दिखायी देते हो।
तुम्हारे शहरों के नियम इतने कड़े हैं कि आदमी वीजा समाप्त होने के बाद एक दिन भी नहीं रह सकता तो फिर तुम्हें वीजा देने में डर क्यों है? लेकिन यह बात नहीं है, तुम केवल माँ-बाप को ही रोकते हो। पंजाबी व्यक्ति जो वहाँ बसे भारतीयों को भोजन खिलाते हैं भला उन्हें तुम क्यों रोकोगे? यदि तुमने उन्हें रोक लिया तो भारतीय भूखा नहीं मर जाएगा? आज सारे ही अमेरिका में पंजाबी लोग अपने खाने से भारतीयों को वहाँ टिकने में सहयोग कर रहे हैं। यदि उन्हें भारतीय खाना नहीं मिलेगा तब फिर वे कैसे आजीवन तुम्हारी सेवा कर सकेंगे? इसलिए तुम्हारा वीजा-कार्यालय केवल डर पैदा करता है, वह भी केवल सीधे लोगों के मन में। तुम जिसे चाहते हो उसे बुला लेते हो और जिसे नहीं, उसे भगा देते हो।
फिर तुम बूढ़े माँ-बापों को अपने यहाँ आने भी क्यों दो? यदि भारत के सारे ही माता-पिता वहाँ जाकर बस गए तब तो तुम्हारा बहुत नुक्सान हो जाएगा। तुम तो सामाजिक-सुरक्षा के नाम पर बहुत बड़ा टैक्स वसूल करते हो। बूढ़े माता-पिता की सुरक्षा करना तुम्हारी सरकारों का कार्य है। अतः वे बुढ़ापे में इस टैक्स की सहायता से उन्हें आर्थिक सहयोग देते हैं। भारतीय भी टैक्स देते हैं लेकिन उनका टैक्स तो पुनः उनके माता-पिता के लिए काम नहीं आता। वह तो तुम्हारे पास ही रह जाता है। न ही इस अतुल धनराशि को तुम भारत भेजते हो। कभी देखी है तुमने भारत में आकर उन माता-पिता की स्थिति को? हमारे भारत में हमारा एक ही सपना होता है कि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाएं जिससे हमारा बुढ़ापा सुधर जाए। इसलिए बेचारे माता-पिता खुद रूखी खाते हैं लेकिन अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजते हैं। अपने जीवन की सारी जमा-पूँजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। जब बच्चों के मन में आता है कि वे भी अमेरिका जाएं तब भी वे उन्हें भेजते हैं। यहाँ ऐसे बहुत से माता-पिता मिल जाएँगे जिन्होंने लाखों रूपया कर्ज लिया है अपने बच्चों को तुम्हारे पास भेजने के लिए। आज वे बेचारे कर्ज में डूबे हैं और तुम उनके बच्चों से अपना देश उन्नत कर रहे हो।
हमने हिम्मत करके एक बार और तुम्हारे वीजा-कार्यालय में दस्तक दी। इस बार हमारी बेटी कि जिद थी कि नहीं भैया से मिलकर आएँगे। हम इस बार भी बड़ी आशा से तुम्हारे दरबार में चले आए कि शायद इस बार तुम्हारे यहाँ हमारी सुनाई हो जाए। लेकिन इस बार भी तुमने हमें टका सा जवाब दे दिया। कारण भी बड़ा अजीब था, हमारे आगे एक वृद्ध दम्पत्ति थे, उनका साक्षात्कार पूरा हुआ और हम आगे बढ़े।
मेरी बेटी ने उनसे पूछ लिया कि अंकल क्या हुआ?
तुम्हारी ऑफीसर ने देख लिया। बस फिर क्या था, वह एकदम चिढ़ गयी। गुस्से में बोली कि उनसे क्या पूछ रही थीं?
मैंने बात को सम्भालने की कोशिश भी की लेकिन बात तो बिगड़ गयी थी। उनका डर कायम रहना चाहिए, यदि यह डर ही मिट गया तब फिर कैसे काम चलेगा?
बस हमसे पूछा कि वेतन कितना है? बेचारे भारतीयों का वेतन तो हजारों में ही होता है, बता दिया। अरे यह तो बहुत कम है, और धड़ाक से लगाया स्टेम्प और हो गया हजारों रूपयों का नास। बेटी कुछ बोलने को हुई तो जवाब मिला कि तुम चुप रहो, तुम्हारे कारण ही नहीं दे रही हूँ, इन्हें तो मैं एक बार कन्सीडर कर भी लेती लेकिन तुम्हें तो कदापि नहीं।
कैसा मानसिक अवसाद दे जाते हैं तुम्हारे ये अफसर? कभी तुमने सोचा है? लेकिन तुम क्यों सोचोंगे? तुम्हारे लिए तो हम केवल कीड़े-मकोड़े हैं। तुम्हारे यहाँ आकर भीड़ बढ़ाने वाले और तुम्हारे संचित धन को हड़पने वाले। तुम जानते हो कि हमारी संताने कभी प्रतिक्रिया स्वरूप तुम्हें नहीं छोड़कर आएँगी। तुम्हें तो उनसे मतलब है। वे तुम्हारे देश की उन्नति में सहायक जो हैं। फिर तुम चालीस प्रतिशत के करीब उनसे टेक्स भी तो वसूलते हो। तुम उन्हें क्या देते हो? वे तो वहाँ जाकर अपना शाही जीवन ही भूल जाते हैं। बेचारे किस मानसिक तनाव में रहते हैं। आधे के करीब तो तुम पैसा वापस ले लेते हो, फिर वे क्या तो खाए और क्या बचाए? वे कैसे अपने माता-पिता को पैसे भेजे? वे तो स्वयं पाई-पाई बचाकर वीकेण्ड मनाते हैं। उनसे ज्यादा सुख से तो उनके माता-पिता भारत में रहते हैं जो हजारों रूपया ही कमाते हैं।
हमारे यहाँ टैक्स बचाने के कितने साधन हैं, लेकिन तुम्हारे यहाँ नहीं। चालीस प्रतिशत मतलब चालीस प्रतिशत। कहीं कमी नहीं। तुम्हारे यहाँ एक साधारण भारतीय को पाँच या छः हजार डॉलर मिलते हैं, तुम उसमें से दो हजार डॉलर से अधिक तो काट ही लेते हो। एक-डेढ़ हजार मकान किराए में चला जाता है। बाकी बचते हैं दो या तीन हजार। अब उसमें क्या खाए और क्या बचाए? हमने जिन बच्चों को फूल जैसा पाला था, पानी भी जिन्होंने कभी हाथ से नहीं पीया था आज वे ही हाथ बर्तन माँज रहे हैं। हमारे यहाँ लड़के तो कभी हिलते भी नहीं, लड़कियों को तो हम कह भी देते हैं कि हमारा रसोई में हाथ बँटा दो। लेकिन तुम्हारे यहाँ तो बेचारे लड़के ही बर्तन माँजते रहते हैं।
यहाँ हर आदमी पूछता है कि अरे नौकर नहीं है क्या? कितना ही समझा दो लेकिन यहाँ के आदमी के सर से नौकर का भूत निकलता ही नहीं। वे समझ ही नहीं पाते कि वहाँ नौकर रखना आसान नहीं है? एक घण्टे के दस डॉलर देने पड़ते हैं। नौकर को इतना पैसा दे दें तो फिर खाएँगे क्या? हमारे जैसे नहीं कि हजार-पाँच सौ में बाई मिल जाती है जो सारा दिन काम कर देती है। गरीब से गरीब आदमी भी बर्तन-वाली तो रख ही लेता है। हमारे यहाँ घर की बहू को अगर बर्तन माँजने पड़े तो हमें शर्मिंदगी होती है। लोग कहते हैं कि कैसा घर है जहाँ बेचारी बहु को बर्तन माँजने पड़ रहे हैं? लोग बहु के आते ही बर्तनवाली तो लगा ही लेते हैं। अब तुम्हारे यहाँ क्या बहु और क्या दामाद, सभी तो गू-मूत साफ करते हैं।
फिर भी होड़ लगी है तुम्हारे यहाँ आने की। जैसे स्वर्ग किसी ने नहीं देखा लेकिन सभी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। वैसे ही तुम्हारा जाप करते हैं लोग यहाँ। अमेरिका जाने का अर्थ है जीवनभर के पापों का धुलना। जब कुछ लोगों को वीजा नहीं मिलता तो वे भी गलत तरीके अपनाते हैं। दलालों के झाँसे में आते हैं और कभी तो उन्हें दलाल अमेरिका के जहाज में बैठा पाता है और कभी नहीं। न जाने कितने ही युवा और बुजुर्ग इस झाँसे में आकर अपना सब कुछ खो बैठते हैं। एक तरफ तुम्हारा ऐलान है कि हमारे यहाँ नियम इतने कड़े हैं कि हमारी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। और दूसरी तरफ तुम इतने डरते हो वीजा देने से? क्या तुम्हारी पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकारा है जो बिना वीजा के वहाँ रहते हैं? यह दोष तो हमारी पुलिस पर ही तुम लगाते हो। फिर तुम्हें डर कैसा?

डॉ अजित गुप्ता
क्रमश:

Friday, January 30, 2009

मदमस्त पीढियां, लड़खड़ाती सभ्यताएं....

मैंगलौर में पब में क्या हुआ, ये सब को पता है। किसने क्या कहा, ये बात दोहराने की जरूरत नहीं है। लेकिन जो कुछ हुआ, उसका दोषी कौन है, ये जानना जरूरी है। उसी की पड़ताल करते हैं आज। कठघरे में खड़े होंगे राजनैतिक दल, श्री राम सेना, मीडिया और हम।

पब में युवा नाच रहे थे, शराब पी रहे थे, और क्या क्या कर रहे थे..ये हमें नहीं पता। रेव पार्टी थी या नहीं, ये भी नहीं पता। रेव पार्टी गैरकानूनी है क्योंकि वहाँ ड्रग्स का सेवन होता है। उस पब में क्या वैसा हो रहा था? यदि हाँ, तो क्या हमारा युवा वर्ग अपने भविष्य को लेकर चिंतित नहीं है? ड्रग्स सेहत के लिये हानिकारक है, क्या उसके नशे में हमारा युवा खोता जा रहा है? इस सबके जिम्मेवार वे खुद हैं, उनके माता-पिता हैं। और अगर वैसा नहीं था..और केवल लोग नाच-गा रहे थे..तो..?

वैसे कोई अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी में क्या करता है उससे किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? हम कौन होते हैं किसी की ज़िन्दगी में दखल देने वाले। पूछिये किसी से भी यही जवाब मिलेगा...मेरी पर्सनल लाइफ है..तू कौन होता है? बात भी सही है। अब श्रीराम सेना या मनसे या शिवसेना या और भी कोई "संस्कृति समर्थक" दल कौन होता है लड़के-लड़कियों को पीटने वाला? उन्होंने कोई ठेका नहीं लिया हुआ देश का। और न ही वे हमेशा सही होते हैं। ये दल वैलेंटाइन डे का विरोध करेंगे लेकिन युवाओं में बसंत पंचमी के बारे में जागरुकता नहीं फैलायेंगे। भई प्यार का इज़हार हर कोई अपने तरीके से करता है। भारतीय तरीका यदि है तो लोगों तक पहुँचा जाये। अब पाश्चात्य की कब तक बुराई करेंगे? वहाँ से पैसा भी तो बहुत आता है... ये केवल हिंदू दल करते हों ऐसा नहीं है। सानिया मिर्ज़ा को कैसी ड्रेस पहननी चाहिये, ये उलेमा और फतवा जारी करने वाले संगठन बताते हैं। फलाने पर १ करोड़ का इनाम, कभी ये फतवा कभी वो फतवा। जिन लोगों को फ़तवे का मतलब नहीं पता वे भी इस शब्द से वाकिफ़ हो गये हैं।

अब बात करते हैं राजनैतिक दलों की। ये दल अब नैतिक दल बन गये हैं। कर्नाटक में येदुरप्पा बोले कि पब कल्चर गलत है तो कांग्रेस शासित प्रदेश राजस्थान के सी.एम. अशोक गहलोत भी यही जुबान बोले। पर इनको समझाओ की शराब से इन्हें कितनी कमाई होती है। पब कैसे बंद करोगे? दिल्ली में शीला आँटी ने कुछ समय पहले कहा था कि मॉल में भी ठेके खुलने चाहिये। अब? भई जब पैसा दिख रहा हो तो थोड़ा सोच कर बोलिये। कर्नाटक के ४००० पबों को कैसे बंद करोगे? बंद करना है तो ड्रग्स के बारे में जागरूकता फैलाये। किसी पर पाबंदी ठीक नहीं। डेमोक्रेसी के खिलाफ है। लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। वैसे अगले ही पल कांग्रेस और बीजेपी दोनों पीछे हट जायेंगी..हम जानते हैं...

अब बात करते हैं उस क्षेत्र की जो अपनी ही धुन में चला जा रहा है। यानि कि मीडिया। श्री राम सेना नामक संगठन का हमला होने वाला है। ये बात कुछ मीडिया वालों को पता थी। तो बस पहुँच गये कैमरा लेकर। पुलिस को सूचित करना अपना धर्म नहीं समझा। लड़कियों को पिटते हुए देखते रहे पर खुद कुछ नहीं किया सिवाय शूट करने के। अगर रोक देते तो ब्रेकिंग न्यूज़ कैसे दिखा पाते? हद है पत्रकारों की... या सोच का फर्क है....

मैंगलौर में जो कुछ हुआ वो गलत हुआ। हमें कोई हक नहीं कुछ करने का, किसी को कुछ कहने का। पुलिस व कानून अपनी जगह है। पब चलते रहेंगे। उन्हें बंद करना कोई उपाय नहीं है। ज़ोर जबर्दस्ती से अपनी बात कोई नहीं मनवा सकता है। युवाओं को खुद समझना होगा कि उनके लिये क्या सही है व क्या गलत। राजनैतिक दल, मीडिया, 'सेना', उलेमा या हम..सब इसी समाज का हिस्सा हैं... थोड़ा सोच समझकर काम लिया जाये तो स्थिति से निपटा जा सकता है।

तपन शर्मा

Thursday, January 29, 2009

पद्मश्री का बनता मजाक...

इसे मजाक नहीं तो और क्या कहेंगे। पद्मश्री वो सम्मान है जो भारतीय नागरिक को उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये दिया जाता है। हर वर्ष कभी खेल रत्न तो कभी अर्जुन अवार्ड विवादों में घिरे रहे। इस बार भी विवाद कम नहीं है। महाराष्ट्र और कर्नाटक की दो सेनाओं की वजह से इस सम्मान से जुड़े कुछ सवाल थोड़े समय के लिये पीछे चले गये।

कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। लेकिन राजनीति में हर ओर गधे ही गधे हैं। कांग्रेस सरकार की मदद की समाजवादी पार्टी ने। तो एहसान तो उतारा ही जाना चाहिये। सपा नेता अमर सिंह के बड़े भाई की बहू, यानि ऐश्वर्य राय बच्चन को पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा के साथ ही विवाद ने जन्म ले लिया था। सवाल है कि इस वर्ष ऐश्वर्या राय ने ऐसा क्या काम किया है जो लोगों को नज़र नहीं आ रहा और सरकार देख पा रही है। ऐश्वर्या का कला के क्षेत्र में योगदान उतना ही है जैसा पिछले सालों में था। उसमें कोई बदलाव देखा नहीं गया है।अब सरकार या अमर सिंह कुछ भी कहें लेकिन दाल में कुछ काला तो जरूर है।

अब बात एक और बड़े सवाल की जो पिछले से ज्यादा बड़ा और गम्भीर है। दुनिया जानती है भारत को ओलम्पिक में बॉक्सिंग के खेल में पहली बार पदक मिला। पदक दिलवाने वाले थे विरेंद्र कुमार और अखिल कुमार। पर खेल में पद्मश्री ले गये भज्जी और धोनी। अभिनव बिंद्रा को जरूर पद्म विभूषण दिया गया। लेकिन इन दोनों मुक्केबाजों को कुछ हाथ नहीं लगा। कोई सम्मान नहीं मिला। क्रिकेट के खिलाड़ी जब जीत कर घर लौटते हैं तो उनके स्वागत में सड़कें खाली की जाती हैं। पर इन विजेताओं का समान ही नहीं होता है। कोई पूछे सरकार से कि हरभजन सिंह ने क्या किया है भारत के लिये, कम से कम २००८ के कैलेंडर वर्ष में। मुझे नहीं लगता है कि इन मुक्केबाज़ों से बड़ा योगदान महेंद्र सिंह धोनी या हरभजन सिंह ने किया है। अलबत्ता भज्जी तो नित नये विवाद में फँसे रहे। पहले साइमंड्स के साथ "मंकी" विवाद हो या रावण का भेष धर कर सीता संग रियलिटी शो में नाचना। या फिर शराब का विज्ञापन करना या खुले बाल कर रैम्प पर चलना। इतना सब होने के बाद भी सरकार यदि इसको खेल के प्रति उनका महत्वपूर्ण योगदान समझती है तो मुझे सरकार की आँखों पर पट्टी लगी नजर आ रही है जो क्रिकेट से ऊपर सोच ही नहीं पा रही है। शायद उन्हें क्रिकेट की जगह पैसा दिख रहा है। सानिया नेहवाल मलेशिया से वापस आती हैं तो उनका स्वागत नहीं होता। इससे पहले तो उन्हें वीज़ा के चक्कर काटने पड़ते हैं। यदि इसी तरह बाकी खेलों और खिलाड़ियों को नज़रंदाज़ करने का सिलसिला चलता रहा तो बाकि खेल समाप्त ही हो जायेंगे। यदि सरकार इन खेलों के उत्थान के लिये कुछ नहीं करती तो इन खिलाड़ियों की हौंसला-अफ्ज़ाई तो कर ही सकती है।

पद्मश्री जैसे सम्मान से साथ राजनीति करके सरकार क्या साबित करना चाहती है उसको जवाब देना चाहिये।

तपन शर्मा

Tuesday, January 27, 2009

मीडिया को नियंत्रित कैसे करें

बैठक में अब लोग जुटने लगे हैं.....नए चेहरे भी हैं और जाने-पहचाने नाम भी....अलग-अलग विचारों के, अलग उम्र-मिज़ाज के...इसकी चर्चा भी होने लगी है....आज से बैठक में राजकिशोर भी आयेंगे....राजकिशोर इस दौर के सबसे चर्चित स्तंभकारों में से हैं....अमूमन हर अखबार में आप राजकिशोर को पढ सकते हैं...हिंद-युग्म के प्रयासों को खूब पसंद करते हैं और ब्लॉगिंग को भी अहम विधा मानते हैं...मार्क्सवादी राजनीति को गांधीवादी शैली में अमल करने के पक्षधर राजकिशोर हर मुद्दे पर लिखते हैं...बैठक में हम इनका स्वागत करते हैं और अक्सर इनसे विचारों की खुराक लेते रहेंगे...


महाकवि अकबर इलाहाबादी की शिकायत थी:
"रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा-जाके थाने में,
कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में।"
कहां अकबर और कहां यह नाचीज़। फिर भी मैं खुदा का नाम लेना चाहता हूं। साथ ही, यह उम्मीद भी करना चाहता हूं कि रक़ीब नाखुश नहीं होंगे, बल्कि समर्थन ही करेंगे।

मुद्दा मीडिया पर नियंत्रण का है। मीडिया की स्वतंत्रता वस्तुत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हिस्सा है। भारत में इसकी शुरूआत अंग्रेजी हुकूमत के दौर में हुई। वरना, एकाध अपवाद को छोड़ कर, इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने की बात किसी ने सोची तक नहीं। यह दुनिया का अकेला देश है, जहां शास्त्रार्थ (पब्लिक डिबेट) की लंबी परंपरा रही है। शास्त्रार्थ में भाग लेनेवाला विद्वान कुछ भी कह सकता था, किसी भी मत का प्रतिपादन कर सकता था और किसी भी सिद्धांत की आलोचना कर सकता था। वेदों के प्रति श्रद्धा भारत की चिंतन परंपरा का एक प्रमुख स्तंभ रहा है, पर वेद निंदकों को भी सहन किया जाता था और उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दिया जाता था। यहां तक कि ईश्वर का अस्तित्व भी सर्वमान्य नहीं रहा है। जो ईश्वर को मानते हैं, उनके बीच भी यह स्वीकार करने की उदारता रही है कि ईश्वर तक पहुंचने का कोई एक निश्चित पथ नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से सत्य तक पहुंचने का रास्ता और ज्यादा दुरूह तथा कंटकाकीर्ण हो जाता है, यह सभी चिंतकों को मालूम था।

मालूम तो यह बात तो ब्रिटिश शासकों को भी थी। लेकिन इस तरह की स्वतंत्रता उनके राजनीतिक-आर्थिक हितों के प्रतिकूल थी। इसीलिए जब ग्रेट ब्रिटेन के लेखक, पत्रकार और नागरिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब भारत में उनके साम्राज्यवादी प्रतिनिधि इस स्वतंत्रता को कुचलने के लिए तरह-तरह के तरीके अपना रहे थे। स्वाधीन भारत में बहुत समय तक इसकी जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि राज्य और मीडिया एकमएक हो चुके थे। जब राज्य से लोगों का मोहभंग शुरू हुआ, तब मीडिया को भी अपनी स्वाभाविक मुद्रा में आना पड़ा। ध्यान देने की बात है कि इमरजेंसी में विपक्ष और प्रेस, दोनों पर एक साथ हमला हुआ। बाद में भी प्रेस पर नियंत्रण रखने की कई कोशिशें हुर्इं। ऐसी हर कोशिश स्वयं बदनाम हो कर और कोशिशकर्ता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को बदनाम करके इतिहास की अंधेरी गलियों में बिला गई। मीडिया को नियंत्रित करने की इच्छा एक बार फिर देखने में आ रही है। मनमोहन सिंह के कूटनीतिक आश्वासन (कूटनीतिक इसलिए कि मीडिया पर नियंत्रण का विधेयक उन्हीं के मंत्रिमंडल ने बनवाया है) के बाद बाघ जंगल में लौट चुका है। पर यह आदमखोर बाघ है, यह हम कैसे भूल सकते हैं?

इस बार लेकिन मामला थोड़ा अलग भी है। मीडिया से शिकायत सिर्फ सरकार को नहीं है। जहां तक सरकार की शिकायत का सवाल है, देश के लोग अब यह मानने लगे हैं कि जिस बात से सरकार को शिकायत है, वह जरूर ठीक होगी। इसी आधार पर कुछ सिरफिरे बुद्धिजीवी आतंकवाद के विरुद्ध बोलना भी उचित नहीं मानते। परंतु जब शिकायत (गंभीर शिकायत) सामान्य जन को भी होने लगे, तब यह स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी है कि कारण वाजिब होंगे। आज मीडिया का आतंक बढ़ रहा है, पर उसका यश धूमिल हो रहा है। जनता की यह शिकायत वाजिब है, तभी मीडिया के प्रतिनिधि भी समय-समय पर आश्वासन देते रहते हैं कि हम आत्म-नियंत्रण के पक्ष में हैं, हमें बाहर से नियंत्रित करने की कोशिश न की जाए। ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि मीडिया के आत्म के साथ-साथ राष्ट्र का भी एक आत्म है और दोनों के बीच अंतर्विरोध पैदा हो जाए, तो पहला स्थान राष्ट्र के आत्म को ही मिलेगा। राष्ट्र से भी ऊंची चीज मानवता है। इसलिए सही क्रम यह होगा -- मीडिया से बड़ा देश और देश से बड़ी मानवता।

जहां तक मीडिया द्वारा आत्म-नियंत्रण का प्रश्न है, मैं इसे बोगस सिद्धांत मानता हूं। पहले बोगस नहीं था, पर अब बिलकुल बोगस है। पूरी दुनिया में कहीं भी मीडिया अभिव्यक्ति और विचार-विमर्श का निष्पक्ष माध्यम नहीं रह गया है। कुछ विचार पत्रों को छोड़ दिया जाए, तो मीडिया के सभी माध्यम ज्यादा से ज्यादा रुपया कमाने के लिए चलाए जा रहे है। बल्कि बहुत-से मीडियाकर्मी भी सार्वजनिक तौर पर यह दावा करते देखे जाते हैं कि मुनाफा करने में बुराई क्या है? अगर हम कमा कर कंपनी को मुनाफे में नहीं रख सकते, तो कल हमारा अखबार या चैनल ही बंद हो जाएगा। फिर हम क्या करेंगे? यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि सभी मीडिया संस्थान ज्वायंट स्टॉक कंपनी के रूप में रजिस्टर कराए जाते हैं -- कोई भी कंपनी ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में रजिस्टर नहीं कराई जाती। मीडिया कंपनियों के शेयर जब स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे-बेचे जा सकते हैं, तब उद्देश्य की वह पवित्रता कहां रही जिसका लोकतांत्रिक औजार के रूप में बखान किया जाता है? ऐसी हालत में सामाजिक नियंत्रण से कैसे बचा जा सकता है? आत्म-नियंत्रण के आश्वासन पर कितना भरोसा किया जा सकता है? अगर आत्म-नियंत्रण का सिद्धांत काम करता होता, तो मीडिया से किसी को शिकायत ही क्यों होती?

दरअसल, जब भी मीडिया को नियंत्रित या अनुशासित करने का मुद्दा सामने आता है, यह भुला दिया जाता है कि नियंत्रण का प्रावधान तो हमारे संविधान में ही है। संविधान में स्वतंत्रता की अन्य किस्मों की ही तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी निरंकुश नहीं छोड़ा गया है। उस पर लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, कदाचार, अपराध उद्दीपन, राज्य की सुरक्षा आदि के हित में अंकुश लगाने की व्यवस्था है। ये सभी शर्तें मीडिया पर भी लागू होती हैं। मीडिया के किसी भी प्रतिनिधि ने यह दावा नहीं किया है कि हम संविधान और कानून से ऊपर हैं। फिर मीडिया पर अलग से नियंत्रण लागू करने की बात सोची या कही ही क्यों जाती है?

इसलिए सोची या कही जाती है कि संविधान में विहित अंकुशों का अनुपालन हो रहा है या नहीं, यह देखने के लिए देश में कोई एजेंसी नहीं है। अपराधों को रोकने के लिए कानून हैं, आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए प्रकोष्ठ हैं, भ्रष्टाचार का निरोध करने के लिए एजेंसियां हैं, मानव अधिकारों की रक्षा करने के लिए मानवाधिकार आयोग हैं, परंतु इस पर निगाह रखने के लिए कोई संस्थागत प्रबंध नहीं है कि प्रेस और मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण तो नहीं कर रहे हैं। ऐसी संस्था का प्रबंध न होना संविधान की अवमानना है। जिस समाज में ऐसी संस्था नहीं है, वह मीडिया की तानाशाही झेलने के लिए अभिशप्त है।

कहने को हमारे यहां प्रेस परिषद नाम की कानून द्वारा गठित संस्था है। वह काफी पुरानी भी है। लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं है, न उससे कोई डरता है। इसलिए कि वह सिर्फ मीडिया के कदाचार की भत्र्सना कर सकता है, उसे दंडित नहीं कर सकता। प्रेस परिषद को और अधिक अधिकार देने की मांग समय-समय पर उठाई जाती है। यह मांग बेमानी है। बजाय इसके प्रेस परिषद को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए कि वह मीडिया की गतिविधियों पर निगरानी रखे तथा वह जब भी कानून तोड़े, परिषद उसे नोटिस जारी करे। अगर परिषद कानून तोड़क के स्पष्टीकरण से सहमत नहीं है, तो वह मामले को न्यायालय में ले जाए। मेरे खयाल से, यही एक जनतांत्रिक, आपत्तिमुक्त और कारगर व्यवस्था है जिसके जरिए मीडिया को नियंत्रित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया खर्चीली, लंबी और कुछ हद तक उबाऊ जरूर है। लेकिन जब मामले का संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बुनियादी चीज से हो, तो खर्च और परिश्रम की चिंता करना बेवकूफी है। एक किलो सर्फ से शहर भर के कपड़े नहीं धोए जा सकते।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)