इसे मजाक नहीं तो और क्या कहेंगे। पद्मश्री वो सम्मान है जो भारतीय नागरिक को उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये दिया जाता है। हर वर्ष कभी खेल रत्न तो कभी अर्जुन अवार्ड विवादों में घिरे रहे। इस बार भी विवाद कम नहीं है। महाराष्ट्र और कर्नाटक की दो सेनाओं की वजह से इस सम्मान से जुड़े कुछ सवाल थोड़े समय के लिये पीछे चले गये।
कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। लेकिन राजनीति में हर ओर गधे ही गधे हैं। कांग्रेस सरकार की मदद की समाजवादी पार्टी ने। तो एहसान तो उतारा ही जाना चाहिये। सपा नेता अमर सिंह के बड़े भाई की बहू, यानि ऐश्वर्य राय बच्चन को पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा के साथ ही विवाद ने जन्म ले लिया था। सवाल है कि इस वर्ष ऐश्वर्या राय ने ऐसा क्या काम किया है जो लोगों को नज़र नहीं आ रहा और सरकार देख पा रही है। ऐश्वर्या का कला के क्षेत्र में योगदान उतना ही है जैसा पिछले सालों में था। उसमें कोई बदलाव देखा नहीं गया है।अब सरकार या अमर सिंह कुछ भी कहें लेकिन दाल में कुछ काला तो जरूर है।
अब बात एक और बड़े सवाल की जो पिछले से ज्यादा बड़ा और गम्भीर है। दुनिया जानती है भारत को ओलम्पिक में बॉक्सिंग के खेल में पहली बार पदक मिला। पदक दिलवाने वाले थे विरेंद्र कुमार और अखिल कुमार। पर खेल में पद्मश्री ले गये भज्जी और धोनी। अभिनव बिंद्रा को जरूर पद्म विभूषण दिया गया। लेकिन इन दोनों मुक्केबाजों को कुछ हाथ नहीं लगा। कोई सम्मान नहीं मिला। क्रिकेट के खिलाड़ी जब जीत कर घर लौटते हैं तो उनके स्वागत में सड़कें खाली की जाती हैं। पर इन विजेताओं का समान ही नहीं होता है। कोई पूछे सरकार से कि हरभजन सिंह ने क्या किया है भारत के लिये, कम से कम २००८ के कैलेंडर वर्ष में। मुझे नहीं लगता है कि इन मुक्केबाज़ों से बड़ा योगदान महेंद्र सिंह धोनी या हरभजन सिंह ने किया है। अलबत्ता भज्जी तो नित नये विवाद में फँसे रहे। पहले साइमंड्स के साथ "मंकी" विवाद हो या रावण का भेष धर कर सीता संग रियलिटी शो में नाचना। या फिर शराब का विज्ञापन करना या खुले बाल कर रैम्प पर चलना। इतना सब होने के बाद भी सरकार यदि इसको खेल के प्रति उनका महत्वपूर्ण योगदान समझती है तो मुझे सरकार की आँखों पर पट्टी लगी नजर आ रही है जो क्रिकेट से ऊपर सोच ही नहीं पा रही है। शायद उन्हें क्रिकेट की जगह पैसा दिख रहा है। सानिया नेहवाल मलेशिया से वापस आती हैं तो उनका स्वागत नहीं होता। इससे पहले तो उन्हें वीज़ा के चक्कर काटने पड़ते हैं। यदि इसी तरह बाकी खेलों और खिलाड़ियों को नज़रंदाज़ करने का सिलसिला चलता रहा तो बाकि खेल समाप्त ही हो जायेंगे। यदि सरकार इन खेलों के उत्थान के लिये कुछ नहीं करती तो इन खिलाड़ियों की हौंसला-अफ्ज़ाई तो कर ही सकती है।
पद्मश्री जैसे सम्मान से साथ राजनीति करके सरकार क्या साबित करना चाहती है उसको जवाब देना चाहिये।
तपन शर्मा

मार्कण्डेय