Friday, March 12, 2010

महिला आरक्षण के सख्त विरोध में

O राजकिशोर

महिला आरक्षण विधेयक अगर पास हो गया तो कोई प्रलय नहीं आ जाएगा। लेकिन मीडिया में और खासकर महिला जगत में इसे लेकर उत्सव का जो माहौल है, वह लगभाग अश्लील जान पड़ता है। इनके मूड से ऐसा लगता है जैसे जन्नत का एक तिहाई हिस्सा महिलाओं को सौंप दिया जाने वाला है और कुछ गंवार लोग इसके विरोध में लट्ठ लेकर घूम रहे हैं। जो आरक्षण के भीतर आरक्षण चाहते हैं, उनकी जाति चिंता उनकी समाज चिंता के स्तर का पर्दाफाश करती है। पुराने द्विज संस्कारों की भुतही नकल करते हुए पिछड़ी जातियों के ये तथाकथित नेता आमतौर पर अपनी बहू-बेटियों को सार्वजनिक जीवन में उतरने से रोकते हैं। लेकिन जब स्त्री मात्र के लिए विधायिका की कुछ जगहें स्थायी रूप से खाली कराने का मौका आता है तब ये चौंक कर जाग उठते हैं और अपना फर्रा पेश कर देते हैं कि जब तक हमारे समुदाय की स्त्रियों को उनका हिस्सा नहीं दिया जाता, तब तक हम यह कानून नहीं बनने देंगे। इन शूरवीरों में यह कहने की हिम्मत नहीं है कि महिलाओं को तमाम तरह की नौकरियों और पदों में एक-तिहाई या उससे ज्यादा हिस्सा दो, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से सम्मानित महसूस कर सकें।

यह हिम्मत तो द्विजों में भी नहीं हैं, क्योंकि उनका एक बड़ा हिस्सा वास्तव में स्त्री-विरोधी है और नहीं चाहता कि स्त्रियों को आगे लाने के लिए कुछ दिनों के लिए खुद पीछे बैठा जाए। चूंकि लोकसभा में 543 और विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या 4,109 है, इसलिए अगर लोकसभा में181 और विधानसभाओं में कुल मिला कर 1,167 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं तो पुरुष वर्ग का, वास्तविक जीवन में, कोई नुकसान होने वाला नहीं है।

पुरुषों की दरियादिली, जो अन्य मामलों में कम ही दिखाई पड़ती है, इस खास मामले में कबड्डी-कबड्डी का ध्वनि-घोष कर रही है, तो यह बहुत रहस्यमय नहीं है। वे बहुत कम कीमत चुका कर दानवीर का तमगा खरीदना चाहते हैं। असल बेचैनी सामान्य पुरुष सांसदों और विधायकों में है लेकिन वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि उनके आका किसी भी कीमत पर लोकसभा का अगला चुनाव जीतना चाहते हैं। इनके लिए चुनावी जीत देश और उसके भविष्य से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। स्त्रियों के शुभैषी शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि संसदीय जीवन में स्त्रियों के इतनी बड़ी संख्या में उतरने से राजनीति का चरित्र ही बदल जाएगा। मेरी भविष्यवाणी यह है कि राजनीति का चरित्र बदले या न बदले, स्त्रियों का चरित्र जरूर बदल जाएगा। वे पुरुष मुट्ठियों में बंधे चुनाव टिकट के लिए जन सेवा के बल पर नहीं, बल्कि अपने स्त्रीत्व के बल पर वीभत्स और दयनीय प्रतिद्वंद्विता करेंगी, जैसे पुरुषों को पैसे, बाहुबल और शक्ति पीठों से सामीप्य के आधार पर प्रतिद्वंद्विता करते हुए देखा जाता है।

यह सारा मायालोक राजीव गांधी का खड़ा किया हुआ है, जिन्होंने शाह बानो नामक एक बेसहारा और बूढ़ी मुसलमान औरत से उसका मानवीय और संवैधानिक हक छीनने के लिए देश का कानून ही बदल डाला था। पंचायतों और नगर निकायों में स्त्रियों के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देकर राजीव ने भारत के इतिहास में अपने दस्तखत जोड़ दिए हैं। पर यह कठोर सत्य बहुत आसानी और बेदर्दी से भुला दिया जाता है कि राजीव गांधी का लक्ष्य न तो पंचायतों को गांव की और न नगरपालिकाओं को शहर की संसद के रूप में विकसित करना था।

तब भी यह सच था और आज भी यही सच है कि स्थानीय निकाय केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं को लागू करने की प्रशासनिक इकाइयां मात्र हैं और निर्वाचित सरपंच को सरकार द्वारा नियुक्त खंड विकास अधिकारी के सामने भीगी बिल्ली बन कर रहना पड़ता है।

महिलाओं के नए हिमायती-कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी, सभी-पंचायतों और नगरपालिकों पर से सरकारी अंकुश हटाने के लिए अब भी राजी नहीं हैं। अपनी-अपनी पार्टियों में स्त्रियों को अधिक से अधिक जगह और सम्मान देने की बात तक उनके दिलों में पैदा नहीं होती। फिर भी वे महिला आरक्षण विधेयक के शैदाई बने हुए हैं, ताकि कोई एक दल अपने को महिला आरक्षण का एकमात्र पैरवीकार साबित कर वोटों का मैदान न चर जाए। पढ़ने-लिखने वाली महिलाएं भी खुश हैं कि लोकसभा की अध्यक्षता का काम एक महिला को सौंप दिया गया, तब जाकर संसद में महिलाओं के लिए अलग से एक टॉयलेट बन सका। अपनी बिरादरी को कानून के बल पर तैंतीस प्रतिशत तक ले जाने की ख्वाहिश रखने वाली महिला सांसद क्या अंधी हैं कि इसके पहले इस असाधारण स्त्री-विरोधी चूक पर उनकी नजर तक नहीं गई?

सरपंच या नगरपालिका अध्यक्ष का काम प्रशासनिक जिम्मेदारी का है। सरकार जैसी शक्ति न होते हुए भी बेचारों को, जिनके अधीन स्थानीय पुलिस तक नहीं होती, तमाम तरह के सरकारी काम निपटाने पड़ते हैं। इस व्यवस्था का सही विस्तार यह होता कि प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर- चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक- स्त्रियों को तैंतीस या पचास प्रतिशत तक आरक्षण दे दिया जाता। इससे आम महिलाओं का ज्यादा भला और सशक्तीकरण भी होता। वर्तमान विधेयक स्त्रियों को पंद्रह सौ से भी कम सीटों के लिए आमंत्रित करता है। इसलिए महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से भी यह विधेयक घाटे का सौदा है। दक्षिण एशिया में चुनिंदा सीटों पर महिलाओं को बैठते हुए हम पहले भी देख चुके हैं और आज भी देख रहे हैं। कौन दावा कर सकता है कि इससे राजनीति के चरित्र में कोई उल्लेखनीय फर्क आया है?

यह सही है कि परिमाण में वृद्धि होने से गुण भी बदल जाता है, पर भारत की राजनीति यह नहीं होने जा रहा है। पुरुषों की तरह महिलाएं भी अपने समय और संस्कृति की उपज होती हैं। विधायिका में पिछड़ी जातियों और दलितों के बेशी संख्या में आने से बेईमानी और सत्तावाद बढ़ा है या कम हुआ है? अगर आप चाहते हैं कि पैसा, पद और पॉवर के इस दलदल में नाक तक धंसने का अधिकार स्त्रियों को भी मिलना चाहिए तो आप ऐसे समानतावादी हैं जो जन्नत और दोजख के फर्क को मिटा देना चाहता है। आपका एतराज यह है कि बदनीयती और बेईमानी पर किसी एक जेंडर का एकाधिकार क्यों हो? अगर लोकसभा का चुनाव लड़ने में दस-पंद्रह करोड़ और विधानसभा का चुनाव लड़ने पर दो-तीन करोड़ का न्यूनतम खर्च आता है, तो महिलाएं भी इसका जुगाड़ कर लेंगी। बेशक अपने पिता या पति की कमाई पर उनका अधिकार भरण-पोषण से ज्यादा न हो और अपनी कमाई पर वे सिर्फ अपना अधिकार रखना चाहें तो यह दांपत्य कलह का कारण बन जाता हो, लेकिन चूंकि सांसद और विधायक का पद हर तरह से लाभ का पद है, इसलिए महिला उम्मीदवारों को अपनी फाइनेंसिंग कराने में दिक्कत पेश नहीं आएगी।
चुन लिए जाने के बाद उन्हें यह कर्ज उतारना भी होगा, जो जनता की कमाई हड़पने के पाप में हिस्सेदारी के बगैर मुमकिन नहीं है। अंतत: सचाई यही ठहरती है कि इस विधेयक के माध्यम से लोभी और छलात्कारी पुरुष महिलाओं को अपनी भ्रष्ट बिरादरी में शामिल करने पर आमादा हैं। यह बहुत खुशी की बात होगी अगर महिलाएं इस चक्रव्यूह को भेद सकें। लेकिन यह तैंतीस प्रतिशत और सड़सठ प्रतिशत यानी दीये और तूफान का मुकाबला होगा। फिर संसद के बाहर तो पुरुष वर्चस्व को बने ही रहना है।

मूल आपत्ति लेकिन दूसरी है। इसका संबंध राजनीति की परिभाषा से है। राजनीति क्या है? क्या यह पैसा, पद और पॉवर हासिल करने में प्रतिद्वंद्विता का खेल है? क्या राज्य की शक्तियां मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को अधिक से अधिक लूट का अवसर देने के लिए हैं? जो भी व्यक्ति ऐसा सोचकर राजनीति में आता है या राजनीति में बना हुआ है, वह राजनीति, संविधान और जनता के साथ खुल्लमखुल्ला बलात्कार करता है। जब कोई व्यक्ति राजनीति में आरक्षण की मांग करता है तो यह मांग बलात्कारियों के इस नापाक क्लब में शामिल होने की मांग बन जाती है। कोई कह सकता है कि बेईमानी कहां नहीं है- धर्म में नहीं है, संस्कृति में नहीं है, शिक्षा में नहीं है या साहित्य में नहीं है? इसका त्वरित जवाब यह है कि भेड़ की खाल में कुछ भेड़िए भी टहल रहे हैं, इसलिए धर्म, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य की परिभाषा तो नहीं बदल दी जाएगी? इसी तरह, अगर आज राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर दिखाई पड़ रही है और राजनेता, एक वर्ग के रूप में, श्रद्धा और विश्वास के नहीं, बल्कि नफरत के पात्र हो गए हैं तो इससे प्रभावित होकर राजनीति की परिभाषा कैसे बदल दी जा सकती है? सांसद और विधायक चुने जाने पर संविधान की आत्मा और उसके शब्दों के अनुसार काम करने की जो शपथ ली जाती है, उस पर काली स्याही कैसे पोती जा सकती है?

राजनीति की एकमात्र वैध परिभाषा यह है कि यह जनता की सेवा करने का एक पवित्र माध्यम है। तकनीकी तौर पर तो हमारे मंत्री, सांसद, विधायक आदि भी जन सेवक (पब्लिक सरवेंट) कहलाते हैं और इसलिए उन्हें कुछ विशिष्ट अधिकार भी दिए गए हैं, लेकिन इनमें से प्राय: सभी पब्लिक को ही अपना सरवेंट समझते हैं।

यह राजनीति का खलनायकीकरण है। धीरोदात्त नायक तो वही राजनेता कहलाएगा, जिसे जनता की सेवा करने में आनंद आता है और जो अपने लिए कम से कम की कामना करता है। यही वह बिंदु है जहां आकर राजनीतिक और नैतिक का द्वंद्व मिट जाता है। इसी अर्थ में हर नैतिक कर्म एक राजनीतिक कर्म है और हर राजनीतिक कर्म एक नैतिक कर्म।

इसीलिए यह प्रश्न भी वैध है कि नैतिकता में आरक्षण कैसा? अच्छा बनने के लिए तैंतीस या पचास प्रतिशत आरक्षण की कामना क्यों? सेवा के क्षेत्र में विशेषाधिकार के लिए जगह कहां है? जो स्त्री या पुरुष जन सेवा करना चाहता है, उसकी राह कौन रोक सकता है? जो संसद या विधानसभा में पहुंच कर जनता की सेवा करना चाहता है, उसके लिए दरवाजा पहले से ही खुला हुआ है-लोगों की भलाई करने में अपने आप को झोंक दीजिए, लोग आपको अपने कंधों पर बैठा कर संसद और विधानसभा के दरवाजे तक ले जाएंगे।

अगर संसद या विधानसभा में सीट आरक्षित कर दिए जाने के बाद ही कोई जन सेवा के मैदान में उतरना चाहता है, तो उसकी नीयत पर शक करने का हमें पूरा हक है। महिला आरक्षण विधेयक राजनीति की पतित परिभाषा को मान्यता देता है और स्त्रियों को आमंत्रित करता है कि हम पुरुष जो कर रहे हैं, आओ तुम भी वही करो। अन्यथा यह विधेयक पेश करने के पहले सरकार चुनाव कानून में ऐसे संशोधन जरूर करती, जिससे गरीब से गरीब आदमी भी चुनाव लड़ना चाहे तो लड़ सके। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन सिर्फ तैंतीस प्रतिशत नहीं, सौ प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए खुल जाएंगी।

(जनसत्ता से साभार)

Tuesday, March 09, 2010

मैं एकता कपूर से नहीं डरती - ज्योति गाबा


फिल्म 'इडियट बॉक्स' का एक दृश्य'

ज्योति गाबा का नाम लेने पर लोगों के जहन में उनका चेहरा नहीं आयेगा पर यह निश्चित हैं कि फिल्म ‘इडियट बाक्स’ के रिलीज होते ही यह नाम घर-घर में चर्चा का विषय होगा। इस फिल्म की कहानी इस बात पर आधारित है कि टी वी ने लोगों की जिन्दगी में कितना अहम दखल देना शुरू कर दिया है। इस फिल्म में ज्योति टी वी की चर्चित सुपर स्टार क्वीन एकता कपूर से प्रभावित किरदार अनेकता कपूर निभा रही हैं। हाल ही में फिल्म के प्रचारक आई एम पन्नू ने फिल्म पत्रकार अशोक भाटिया की बातचीत ज्योति से करवाई। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंशः-

प्रश्न- जब आपको इस फिल्म में इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए चुना गया तब आपको कैसा महसूस हुआ?
ज्योति- यह एक अलग ही प्रकार का अनुभव है। जब मुझे पहली बार इस फिल्म में मुझे मेरा किरदार सुनाया गया तो मुझे लगा कि यह मेरे लिए बहुत ही चुनौतिपूर्ण किरदार है। आज एकता कपूर बहुत बड़ा नाम है और यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं ऐसी भूमिका कर रही हूँ जो एकता कपूर से प्रभावित है।

प्रश्न- आपने इस भूमिका को करने के लिए किस तरह की तैयारी की और फिल्म के पर्दे पर उसे उतारने में किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
ज्योति- सच बताऊँ तो मुझे इस तरह की भूमिका कैमरे के सामने करने में जरा भी कठिनाई नहीं आई क्योंकि मुझे पहले से ही इस भूमिका के बारे में बहुत कुछ बता दिया गया था। इस फिल्म के निर्देशक सुनन्दा मित्रा ने पहले ही से इस भूमिका के बारे में विस्तार से समझा दिया था और स्पष्ट था कि मुझे कैमरे के सामने किस प्रकार प्रस्तुत होना है। इसके अलावा मुझे इसके लिए कुछ खास होमवर्क नहीं करना पडा था।

प्रश्न- इस समय आप इस फिल्म को लेकर कितना उत्साहित हैं?
ज्योति- मैंने इसके पहले फिल्म ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’, ‘सुनो ना’ वगैरह की है तथा बहुत से धारावाहिक किये हैं पर पहली बार कुछ अलग करने को मिला है। यह मेरे पिछले काम से बिल्कुल ही अलग है। मैंनें अब तक 300 विज्ञापन फिल्में की है उसमें से बहुत-सी जवान गृहिणी अथवा जवान प्यारी माँ की भूमिकाए वाली थीं। इस फिल्म में मेरे लिए एक मौका था कि मैं अनेकता कपूर के रूप में अपने को एक अच्छे कलाकार के रुप में स्थापित कर सकूँ। इसलिए इस फिल्म को लेकर उत्साहित होना स्वाभाविक है।

प्रश्न- नाम व आपके मेकअप के अलावा आपकी कौन-सी बात एकता कपूर से मिलती है?
ज्योति- एकता कपूर बालाजी टेलिफिल्म की मुखिया हैं और इस फिल्म में मेरी कंपनी का नाम लालाजी टेलिफिल्म है। एकता हाथ में अंगुठियाँ पहनना पसंद करती हैं और फिल्म में मैं भी बहुत सी रिंगस् पहनती हूँ। मेरी चाल-ढाल, पहनावे को भी बिल्कुल एकता के समान दिखाया गया है।

प्रश्न- आप असल जिन्दगी में एकता से मिल चुकी हैं?
ज्योति- दुर्भाग्यवश नहीं, पर एक अवार्ड फंक्शन में मैंने उनको बहुत ही करीब से देखा था, बस। परन्तु मैंने उनके बारे में बहुत कुछ अखबारों में पढ़ा है। कुछ बातें मुझे उसके करीबी दोस्तों से भी जानने को मिली और उन सब बातों की जानकरी होने के कारण मुझे अपनी भूमिका निभाने में सहायता भी मिली। मैंने जो जानकारी प्राप्त की थी उसके अनुसार एकता बहुत ही कड़क व मेहनती महिला है।

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि एकता इस फिल्म को देख कर कुछ नाराज़ होंगी?
ज्योति- नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। हमारा ऐसा कुछ विचार नहीं था कि उनको इस फिल्म के माध्यम से थोड़ा भी अपसेट किया जाए। वह स्वयं एक समझदार फिल्म निर्माता हैं। उन्हें पता है कि फिल्म को फिल्म की दृष्टी से ही देखा जाता है, व्यक्तिगत तौर पर नहीं। हमने फिल्म में उनको सकारात्मक रुप में पेश किया है और फिल्म देख कर उन्हें फिल्म पर गर्व होगा।


प्रश्न- फिल्म के रिलीज के समय यदि आपका सामना एकता कपूर से हो गया तो आप क्या करेंगी?
ज्योति- मैं उनसे डरूँगी नहीं बल्कि उनके पास जाकर नम्रता से अपना परिचय दूँगी कि ....हाय मैं अनेकता कपूर हूँ।

प्रश्न- भविष्य में और कोई जिन्दा आदमी का किरदार जिसे आप अपने अभिनय द्वारा पर्दे पर साकार करना चाहें?
ज्योति- हाँ, ऐसा मौका मिला तो मैं सोनिया गांधी की भूमिका करना चाहूँगी।

प्रश्न- अंत में आप ‘इडियट बाक्स’ के बारे में चंद शब्दों में क्या कहना चाहेंगी?
ज्योति- यह कोई हकीकत नहीं है। एक हास्य फिल्म है। जब भी दर्शक इस फिल्म को देखे तो महसूस करें कि यही आज घर-घर की कहानी है और उसे अपने ही घर की कहानी समझे। मुझे आशा है कि दर्शक इस फिल्म को अवश्य स्वीकार करेंगे।

प्रस्तुति: अशोक भाटिया

Sunday, March 07, 2010

आज की शिक्षा एकलव्य का अँगूठा ही नहीं उसकी गर्दन भी माँगती है

हिम्मत सेठ प्रतिष्ठित पाक्षिक महावीर समता सन्देश के प्रधान सम्पादक हैं और अपनी जनपक्षधरता, बेबाकी तथा जुझारूपन के लिये जाने जाते हैं। दक्षिणी राजस्थान की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर बहस के केन्द्र में लाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हाल में समान बचपन अभियान की प्रीति शर्मा उनसे की गयी बातचीत का प्रमुख अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-सम्पादक

प्रश्न - पूँजीवादी और पीत पत्रकारिता के इस दौर में नागरिक पत्रकारिता को अपना माध्यम बनाने के पीछे
आपकी कौन-सी मूल भावना काम कर रही थी?
उत्तर - हिन्दुस्तान जिंक मे काम करते हुए जब मैंने देखा कि मजदूरों की समस्याओं को नहीं सुना जाता है तो 1968 में कुछ लोगों के साथ मिल कर मैंने मजदूर यूनियन बनाया और इस यूनियन के माध्यम से हम मजदूरों की आवाज़ को प्रशासन के समक्ष लाने लगे। हिन्दुस्तान जिंक छोड़ने के बाद भी नागरिक पत्रकारिता के माध्यम से मैं वंचित वर्ग के मुद्दों को सामने लाने के लिए काम करता रहा, क्योंकि हमे लगता था कि वंचित और निम्न वर्ग के लोगों की आवाज़ को दबा दिया जाता है। हमारे देश में आज़ादी के 63 वर्ष बीत जाने के बाद विकास तो हुआ है पर निचले तबके के लोगों पर ध्यान नहीं दिया गया और उनके साथ गैरबराबरी की जाती रही है। मैं शुरू से समाजवादी विचारधारा से जुड़ा रहा हूँ और गैरबराबरी पर काम करता रहा हूँ। मेरा मानना है कि नागरिक पत्रकारिता ही बहुसंख्यक जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सकती है।

प्रश्न - समता संदेश के माध्यम से आप शिक्षा में भेदभाव के खि़लाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। आपकी समझ से शिक्षा व्यवस्था के लगातार समाज के बहुसंख्यक वंचित तबके के प्रति संवेदन शून्य होते चले जाने के पीछे कौन से कारक ज़िम्मेदार हैं?
उत्तर- यह एकदम सही है कि आज की शिक्षा व्यवस्था समाज के बहुसंख्यक वंचित तबके के प्रति संवेदन शून्य है क्योंकि
इस शिक्षा व्यवस्था का माफियाकरण हो चुका है। शिक्षा में दलाली होने लगी है और पूँजीवादी लोग चाहते हैं कि शिक्षा को उच्च वर्ग के लिए सुरक्षित रखा जाए। जिस तरह की शिक्षा उच्च तबके के बच्चों को मिल रही है वैसी शिक्षा निचले तबके के लोगों को नहीं मिले। शिक्षा में यह जो गैरबराबरी की व्यवस्था है यह नयी नहीं है। यह तो महाभारत काल से ही ज़ारी है। उस काल में भी जब एकलव्य द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहता था तो गुरू ने मना कर दिया क्योंकि एकलव्य निम्न जाति का भील था। इतना ही नहीं जब एकलव्य अपने प्रयत्नों से धनुर्धारी बन गया तो द्रोणाचार्य ने छल से उसका अँगूठा ही कटवा दिया। इस प्रसंग से लगता है कि शिक्षा हमेशा से राजा महाराजाओं और श्रेष्ठ लोगों के लिए ही रही है। आज जब हमारे देश में लोकतन्त्र है जिसमें सभी को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है तो अमीर और सत्ताधारी लोग, सरकार तथा प्रशासन से जुड़े लोग नहीं चाहते कि शिक्षा सभी के पास हो। वे नहीं चाहते कि हमारे बच्चे वहाँ तक पहुँच पाएँ जहाँ पर उनके बच्चे पहुँचते हैं। वे समाज में गैरबराबरी को कायम रखना चाहते हैं। आज वे एकलव्य से केवल उसका अँगूठा नहीं बल्कि उसकी गर्दन भी मांग रहे हैं। मेरा मानना है कि जितने भी एनजीओ हैं उनको अपने उद्देश्यों में शिक्षा का मुद्दा रखना चाहिए और जो एनजीओ सक्षम हैं उन्हें एक स्कूल ज़रूर खोलना चाहिए।

प्रश्न - आपके अनुसार वर्तमान शिक्षा में व्याप्त विषमता और वर्गीय भेदभाव के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं?
उत्तर - उच्च वर्ग के व पूँजीवादी लोग कभी नहीं चाहते कि शिक्षा में समानता हो। अगर समानता होगी तो सब पढ़-लिखलेंगे और उच्च वर्ग के बच्चों से प्रतियोगिता करेंगे। इसलिए वे चाहते हैं कि विषमता बनी रहनी चाहिए और आज की जो शिक्षा है वह स्वयं विषमता को बढ़ावा दे रही है। आज कहीं दून स्कूल, कहीं केन्द्रीय विद्यालय, कहीं औपचारिक तो कहीं अनौपचारिक स्कूल खुले हुए हैं जो समाज में विषमता पैदा करते हैं। आज वही लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जिनके पास शिक्षा को खरीदने की क्षमता है। शिक्षा प्राप्त करने के लिए बच्चों को डोनेशन देना पड़ता है। आज अगर किसी को डॉक्टर बनना होता है तो 40-50 लाख रुपये तक डोनेशन देना पड़ता है। अब जो बच्चे डोनेशन देकर पढ़ेंगे वे भला क्यों सामाजिक हित के बारे में सोचेंगे। उनका लक्ष्य तो जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक मुनाफा कमाना ही रहेगा।

प्रश्न - सरकार द्वारा शिक्षा की संवैधानिक जवाबदेहियों से पलायन और निर्बाध निजीकरण-बाज़ारीकरण कीनीतीयों के क्या परिणाम होंगे?
उत्तर - निजीकरण व बाज़ारीकरण से नीचे के तबके के लोग शिक्षा से वंचित रह जाएँगे और पूँजीपतियों के बच्चे ही शिक्षा प्राप्त कर पाएँगे। पर क्या वे सभी वर्ग के लोगों के लिए सोच पाएँगे? आज अखबारों में हम पढ़ते हैं कि फलाने आई.ए.एस. के घर में छापा पड़ा और उसके पास करोड़ों की सम्पत्ति बरामद हुई। तो क्या इस तरह की लूट मार वाली संस्कृति वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का परिणाम नहीं है? दरअसल यह सब सरकार, विश्व बैंक, तथा यूनिसेफ की साज़िश है। हम देखते हैं कि अमेरिका जो सबसे बड़ा पूँजीवादी देश है उसकी शिक्षा व्यवस्था सरकार के हाथ में है और भारत में दिन-दूने रात-चौगुने की रफ़्तार से रोज़ नये-नये निजी स्कूल खुलते जा रहे हैं। एक तरफ हमारे देश में दिल्ली पब्लिक स्कूल हैं जहाँ छोटी कक्षाओं की फ़ीस भी 50 हजार रुपये तक होती है और दूसरी तरफ गाँव के वे स्कूल हैं जहाँ बच्चों को पढ़ाने के लिये शिक्षक नहीं हैं। अब गाँव से पढ़ने वाला बच्चा दिल्ली पब्लिक स्कूल के बच्चे के साथ प्रतियोगिता कैसे कर पाएगा? उदयपुर में काफी जोर-शोर से आईआई. टी. खुलवाने का आन्दोलन चला पर कोई बताये कि इस आई.आई.टी. के खुलने का फ़ायदा क्या है। जितना बजट आई.आई.टी. व आई.आई.एम. में खर्च होगा उससे तो गाँव के स्कूलों का कायापलट हो सकता है। गाँव के स्कूलों में पूरी सुविधा नहीं मिल पाती है। सोचने की बात है कि गाँव से जो बच्चे दसवीं व बारहवीं करके निकलते हैं क्या वे इन संस्थानों मे प्रवेश पा सकेंगे? तो फिर क्या इन संस्थानों में बाहर से आकर बच्चे पढ़ेंगे? अभी कपिल सिब्बल द्वारा संसद लाया गया विधेयक जिसमें 6 से 14 साल के बच्चों के लिए मुफ़्त व अनिवार्य शिक्षा की बात की गई है। उसी विधयक लिए प्राइवेट स्कूलों को 25 प्रतिशत का अनुदान देने का प्रस्ताव भी है। कपिल सिब्बल संसद के इसी सत्र में यह भी कहते है कि नये स्कूल खोलने के लिये हमारे पास बजट का प्रावधान नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि थोड़े से गरीब बच्चे भी वहाँ पढ़ सकें लेकिन बाकी बच्चों का क्या होगा?

प्रश्न - वर्तमान मुख्यधारा मंे मीडिया का शिक्षा अथवा आम जनता के सरोकार के दूसरे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं दिखाई देता। इस मीडिया को ज़िम्मेदार बनाने के लिये किस तरह के प्रयासों की ज़रूरत है?
उत्तर - मैं मीडिया को दोषी नहीं मानता क्योंकि व्यवस्था ही गड़बड़ है। इस व्यवस्था में सभी पूँजी के पीछे भाग रहे हैं। आज सरकारें बदल जाती हैं पर नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं होता। इससे पता चलता है कि तमाम सत्ताधारी पार्टियाँ आम जनता के हितों से जुड़े मुद्दों की अनदेखी करने के मामले में लगभग एक जैसी राय रखती हैं और मौका मिलने पर वही काम करती हैं जिनसे पूँजीपति वर्ग का फ़ायदा हो। आज का मुख्यधारा का मीडिया एक उद्योग है और वह केवल अपना व्यवसाय चमकाने में लगा है। अगर लोग चाहते हैं कि आम जनता का मुद्दा मीडिया में आए तो उन्हें उन मुद्दों को लेकर आन्दोलन करना पड़ेगा। स्कूलों में अध्यापकों की कमी पहले भी रही है पर जब स्कूलों में ताले लगा दिए गए तभी यह खबर अखबारों में छपी। इसलिए मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिये जनता को आगे आना होगा।

प्रश्न -दक्षिणी राजस्थान में शिक्षा में समान अवसर की मांग को लेकर जो अभियान चल रहा है उसे प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी समझ से क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर - समान बचपन अभियान अच्छा अभियान है क्योंकि यह बचपन से समानता की बात करता है और समान अवसर की लड़ाई लड़ते हुए शिक्षा की गैरबराबरी को ख़त्म करना चाहता है। पर इसके साथ ही और भी जो सामाजिक विषमताएँ हैं जैसे जाति प्रथा व स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव आदि उन पर भी ध्यान देना होगा।

Wednesday, March 03, 2010

अलमस्त शायर फ़िराक़ गोरखपुरी

आज यानी 3 मार्च को अपने ही ढंग के अलमस्त शायर फिराक़ गोरखपुरी की पुण्यतिथि है। फिराक़ साहब को याद करते ही मैं लौट जाती हूँ अपने बचपन के दिनों में।
चूँकि मेरे पिताजी फिराक़ साहब के स्टूडेंट रहे है तो वे काफी करीबी से उनसे वाकिफ़ रहे है। फिराक़ की शायरी का अंदाज, उनका चुटकी बजाकर सिगरेट झाड़ना, बड़ी-बड़ी आंखे फैलाकर बात करना या 'वर्डस्वर्थ' पड़ते-पड़ते शायरी करने लगना सब कुछ अनोखा था। फिराक़ साहब मेरे पिता को इलाहाबाद यूनिवेर्सिटी में अंग्रजी पढ़ाते थे।
उर्दू जगत और शायरी की दुनिया में फिराक़ गोरखपुरी का अपना एक अलग ही वजूद है। उनका पूरा नाम रघुपति सहाय था। 'फिराक'उनका तख़ल्लुस था।
28 अगस्त 1896 को जन्मे रघुपति सहाय का फिराक़ गोरखपुरी बनने का सफ़र बड़ा रोचक रहा है। यूँ तो फिराक़ साहब के शुरूआती दिनों का सफ़र गोरखपुर से शुरू हुआ लेकिन पहचान उन्हें अपनी कर्मभूमि इलाहबाद से मिली। आई.सी.एस. में चयन के बाद उन्होंने एक साल के बाद ही त्यागपत्र दे दिया और १९३० में इलाहबाद यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक नियुक्त हुए। कहने को तो वे अंग्रेजी के एक अध्यापक थे लेकिन प्रतिष्ठित हुए एक उर्दू शायर के रूप में। फिराक़ ने उर्दू जगत को
गजलों, नज़्मों और रुबाइयो की एक बड़ी सौगात दी है।

"बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते है"

या फिर ... "शामे-ग़म कुछ उस निगाहे-नाज़ की बातें करो, बेखुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो"

"न हैरत कर तेरे आगे जो हम कुछ चुप से रहते हैं
हमारे दरमियां-ऐ-दोस्त लाखों ख़्वाब हायल है"

फिराक़ साहब एक सौन्दर्यप्रिय व्यक्ति थे। बदसूरती उन्हें किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं थी शायद यही कारण था जिसने उनके पारिवारिक जीवन को तहस-नहस कर दिया था। फिराक़ के एक वक्तव्य के अनुसार, "उनका एक ऐसी बदसूरती से पाला पड़ा जिसने उनके खून में ज़हर घोल दिया"। शायद यही वजह है कि फिराक़ ने जिस बीवी को ठुकरा दिया था, उसकी तलाश "रूप" की रुबाइयों में करते रहे।
उनकी रुबाई की झलक देखिये-

आइन ए नील गूं से फूटी है किरन
आकाश पे अधखिले कंवल का जोबन
यूँ उदी फ़ज़ा में लहलहाती है शफ़क
जिस तरह खिले तेरे तबस्सुम का चमन।

फिराक़ एक बेहद मुँहफट और दबंग शख्सियत थे। एक बार वे एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे, काफी देर बाद उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया। फिराक़ ने माइक संभालते ही चुटकी ली और बोले, 'हजरात! अभी आप कव्वाली सुन रहे थे अब कुछ शेर सुनिए'।
इसी तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोग हमेशा फिराक़ और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को लड़ा देने की कोशिश करते रहते थे। एक महफिल में फिराक़ और झा दोनों ही थे एक साहब दर्शकों को संबोधित करते हुए बोले,'फिराक़ साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं" इस पर फिराक़ तुरंत उठे और बोले, "भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक ख़ास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते"। फिराक़ की हाज़िर-जवाबी ने उन हज़रत का मिजाज़ दुरुस्त कर दिया।

अपने अंतिम दिनों में जब शारीरिक अस्वस्थता निरंतर उन्हें घेर रही थी वो काफी अकेले हो गए थे। अपने अकेलेपन को उन्होंने कुछ इस तरह बयां किया-
'अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, यूँ ही कभूं लब खोले हैं, पहले फिराक़ को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं'।

फिराक़ गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र का वो जगमगाता सितारा हैं जिसकी रौशनी आज भी शायरी को एक नया मक़ा दे रही है। इस अलमस्त शायर की शायरी की गूँज हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।
बकौल फिराक़ 'ऐ मौत आके ख़ामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अन्दर हम गूंजते रहेंगे'।

प्रस्तुति- स्मिता मिश्रा

Monday, March 01, 2010

कैसे न मनाएं होली

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

होली रंगों का त्यौहार है. पूरे देश में इस के आने से कुछ दिन पहली ही धूम सी मच जाती है. कहीं हास्य कवि सम्मलेन होते हैं तो कहीं मूर्ख सम्मलेन. युवा पीढ़ी सब से ज्यादा उत्साहित रहती है. कुछ पर्यावरण प्रेमी पर्यावरण संबंधी सवाल उठाते हैं तो कुछ गुबारों के फेंके जाने पर कानूनी रोक की बात करते हैं. मैंने रमेश नगर में तीन अलग अलग लड़कियों से इन प्रश्नों के उत्तर मांगे कि होली कैसे मनाई जाए और कैसे मनाई जाए. इस के अलावा मेरी जिज्ञासा यह भी थी कि होली पर सब से लोकप्रिय मिठाई कौन सी है. इन सवालों के जवाब हिन्दयुग्म के पाठकों के लिए विडियो क्लिप लिए हैं उन्हीं तीन युवा और प्रबुद्ध लड़कियों की ज़बान से, जो यहाँ प्रस्तुत हैं. हिन्दयुग्म के पाठक इन सवालों पर क्या सोचते हैं, यह जां कर प्रसन्नता होगी.
धन्यवाद – प्रेमचंद सहजवाला