Friday, February 06, 2009

जय हो, जय हो, जय हो!!!.....जय, जय, जय हो......



पटना में एक शख्स ने फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के खिलाफ याचिका दायर की है....नाम पर उन्हें आपत्ति तो है ही, इस फिल्म की साधारण विषयवस्तु को इतना आगे तक पहुंचने में भी उन्हें सोची-समझी चाल दिखती है.... बहरहाल,बैठक में एक चिट्टी आयी है शिवानी की....शिवानी त्रिपाठी महुआ न्यूज़ चैनल में कैमरे के आगे ड्यूटी बजाती हैं....चुपके-चुपके बैठक में आती रही हैं....चूंकि, शिवानी गोरखपुर की हैं तो कृपया इस चिट्ठी को पटना के शख्स की याचिका न समझें....

फिल्म बेहतरीन है.....निर्देशन गज़ब का है....केबीसी के हर सवाल का नायक के अतीत से जुड़ाव बेहतरीन था...पर सबसे बेहतर था मलिन बस्ती के उन बच्चों से इतना उम्दा अभिनय करवा लेना....
और कोयले को बाज़ार में हीरे के भाव बेच मुनाफ़ा कैसे कमाया जाता है, ये कोई इन निर्देशकों से सीखे जिन्होंने हमारा ही कचरा हमें खूबसूरती के साथ चांदी की तश्तरी में अति आत्मविश्वास के साथ परोस दिया....और हमने निवाला दर निवाला मुंह में डालना भी शुरु कर दिया....मगर, जो फिल्म वैश्विक स्तर पर डंका बजवा रही हो, फिल्म क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानित ऑस्कर की मजबूत दावेदार हो, भारत के सिनेमाघरों में पहले हफ़्ते में ही दर्शक नहीं जुटा पायी....

बहरहाल, सभी बातों पर गौर करने के बाद अगर कोई पूछे कि क्या स्लमडॉग को ऑस्कर में जाना चाहिए या ये अवार्ड मिलना चाहिए (जो लगभग तय ही है) तो होगा हां....क्योंकि ऑस्कर की दौड़ में पहुंचनेवाली हर भारतीय फिल्म का हाल कुछ ऐसा ही था....जी हां, चाहे बात 80 के दशक की मदर इंडिया की हो या लगान की, स्माइल पिंकी या स्लमडॉग.....इन सभी फिल्मों में एक चीज़ कॉंमन है....ग़रीबी, दरिद्रता, भूखी-नंगी जनता, क्योंकि इनमें ही दिखता है इन्हें “रियल इंडिया...."

माना कि फिल्म के दृश्यों में मुंबई की मलिन बस्तियों से काफी साम्य था, मुंबई की इन बस्तियों में रहने वालों की यही दशा होती है, मगर मुंबई ऐसी ही है ये भी नहीं कह सकते..... मुंबई सिर्फ गंदी ही नहीं है....यही मुंबई समंदर के खूबसूरत किनारों, ऊंची इमारतों, ग्लैमर की चकाचौंध और आधुनिकता के चरम के लिए भी अग्रणी मानी जाती है...तो इतने वृहद और संपन्न पक्ष की अनदेखी क्यों कर दी गयी...आखिर इस पक्ष को शून्य कर बाहर की दुनिया को इस फिल्म के माध्यम से क्या दिखाने और जताने की कोशिश की गयी....यही कि हम जो थे, वही हैं और वही रह गये....
ठीक है कि डायरेक्टर की प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि गंदगी बेचने का उसका तरीका लह गया....और अगर इस फिल्म को ऑस्कर मिलता है तो केवल इसलिए नहीं कि वाकई ये फिल्म बेहतरीन बनी और संगीत ज़बरदस्त रहा....कारण और भी हैं.....मसलन, ये एक हॉलीवुड के डायरेक्टर ने बनायी है और इसमें भारत की ग़रीबी का वीभत्स और लाचार रूप दिखाया गया है....आप भी जानते हैं कि भारत घूमने आने वाले पर्यटकों के कैमरे भी झोपड़ियों और भीख के कटोरे पर ही ज़्यादा फ्लैश चमकाते हैं....ठीक वैसे ही जैसे किसी वीआईपी भारतीय मेहमान जैसे बिल क्लिंटन, प्रिंस चार्ल्स, मिलिबैंड आदि को घूमने के लिए सूरत, अहमदाबाद, दिल्ली, कश्मीर की वादियां, गोवा की बेरोकटोक हवा या केरल-कन्याकुमारी की खूबसूरती और सागर की गहराई में खो जाने वाला सूरज नहीं मिलता....उन्हें तो बस दिखता है राजस्थान के किलों के साये में सूखा बंजर नज़ारा, उन्हें देखकर आंखें फाड़ सकने वाले ग्रामीण....यहां तक तो गनीमत थी.....पर इस बार तो हद हो गयी, जब ब्रिटेन के विदेश मंत्री के भारतीय गांवों को देखने की इच्छा पर अमेठी का सबसे ग़रीब, दरिद्र परिवार दिखाया गया....किसे दोष देंगे हम??

ख़ैर, इतना तो कहा जा सकता है कि बवाल इस फिल्म के नाम में स्लम के साथ डॉग पर नहीं बल्कि पूरे देश को स्लमडॉग साबित करने की उनकी चाही-अनचाही कोशिशों पर मचना चाहिए था....स्लमडॉगों का ऐसा देश जहां जन-गण-मन अधिनायक जय का गान होता है, वहां अब सबके होठों पर है “जय हो....” का स्वर...

शिवानी त्रिपाठी

Wednesday, February 04, 2009

राष्ट्रपति मात्र संवैधानिक पद या उससे भी बढ़कर कुछ?

भारत का राष्ट्रपति इस देश का प्रथम नागरिक होता है। ये पाठ हमें बचपन से पढ़ाया जाता है। लेकिन ये प्रथम नागरिक आखिर करता क्या है? पिछले कुछ सालों से इस पद के लिये राजनैतिक पार्टियों में घमासान छिड़ा हुआ है। केंद्र की राजनीति में यह पद कितना अहम है इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं। श्रीमति प्रतिभा देविसिंह पाटिल। हमारे देश की राष्ट्रपति। इनका चुनाव जुलाई २००७ में डा. ए. पी. जे अब्दुल कलाम के जाने के बाद हुआ। चुनाव में खड़े थे पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत। प्रतिभा पाटिल कांग्रेस पार्टी की सदस्य रह चुकी हैं। सांसद और गवर्नर जैसे पद पर आसीन रह चुकी हैं। शेखावत बीजेपी के सदस्य हैं। तो जाहिर सी बात थी कि युद्ध तो होना ही था.. बाजी मारी कांग्रेस ने क्योंकि उसके सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभा में अधिक हैं।

कुछ वर्ष और पीछे चलें तो हम पायेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने अफ्जल गुरु को फाँसी की सज़ा दी। ये नाम अब पहचान का मोहताज नहीं। इसने सज़ा माफी की अपील की राष्ट्रपति से। राष्ट्रपति ने सलाह के लिये केंद्र मंत्रालय भेजा... तब से फाइल वहीं है...कितने साल फाइल दबी रहेगी ये सब वोटों पर निर्भर करता है.. आप लोग समझदार हैं इसलिये आगे बताना बेवकूफी है...ये राजनीति है...

मई २००५ नवीन चावला की चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्ति...
मार्च २००६ एनडीए के २०४ सदस्य नवीन चावला को हटाने राष्ट्रपति के पास गये। चावला पर कांग्रेस से मिलीभगत का आरोप...राष्ट्रपति ने याचिका गोपालस्वामी को न भेज कर मनमोहन सिंह को भेजी। सरकार ने मामला दबा दिया। बीजेपी सुप्रीम कोर्ट गई.. कोर्ट ने कहा कि वो कुछ नहीं कर सकती.. मुख्य चुनाव आयुक्त ही ये केस देख सकते हैं... उसके बाद गोपालस्वामी को याचिका भेजी गई। गौरतलब है कि केवल सीईसी ही चुनाव आयुक्त को हटा सकते हैं। गोपालास्वामी ने नवीन चावला से जवाब माँगा। तीन बार जवाब माँगने पर चावला ने दिसम्बर २००८ में अपना जवाब दिया। एक महीने के भीतर गोपालस्वामी ने उन्हें हटाने की बात राष्ट्रपति से की.. राष्ट्रपति ने सरकार से कहा.. सरकार मामला दबा गई...

जब राष्ट्रपति भी सरकार का हो... चुनाव आयुक्त भी.. तो कांग्रेस सरकार राजनीति क्यों न करे?

बात इतनी नहीं... बात और भी गम्भीर है.. इस वाकये के बाद मेरा दिमाग यही सोचता रहा कि आखिर राष्ट्रपति के पास ताकतें कौन सी हैं? आइये जानें, जहाँ से लेख की शुरुआत हुई थी...

१. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है..यानि उसको शपथ दिलाता है: प्रधानमंत्री केंद्र सरकार के द्वारा ही चुना जाता है।
२. राज्यपाल और सुप्रीमकोर्ट के जजों को शपथ: लेकिन उन्हें चुनती है केंद्र सरकार
३. तीनों सेनाओं का नेतृत्व करता है राष्ट्रपति लेकिन बजट निर्धारित करती है केंद्र सरकार
४. चीफ जस्टिस को शपथ... लेकिन चुनती है केंद्र केबिनेट
५. लोकसभा को भंग कर सकता है राष्ट्रपति: लेकिन निर्देश मिलते हैं केंद्र सरकार से..
६. साल के पहले सत्र का शुरुआती भाषण देने की औपचारिकता निभाता है राष्ट्रपति
७. इमेरजेंसी लागू करता है राष्ट्रपति लेकिन निर्णय लेती है सरकार
८. फाँसी सज़ा पर अपील होने पर माफी दे सकता है राष्ट्रपति लेकिन निर्णय लेती है केंद्र सरकार
९. सरकार द्वारा पारित बिल राष्ट्रपति केवल एक बार ही वापस भेज सकता है.. केंद्र सरकार यदि दोबारा राष्ट्रपति को बिल भेजे तो उसे औपचारिकता निभानी होगी और मुहर लगानी होगी।

ऊपर की जब ताकतें पढेंगे तो पायेंगे कि राष्ट्रपति केंद्र सरकार का खिलौना होने के अलावा और कुछ नहीं। यदि राष्ट्रपति को हटाना हो तो पार्लियेमेंट में वोटिंग से ये भी हो जायेगा। तो आखिर यह पद रखा ही क्यों हुआ है? क्या ज़रुरत है इस पद की? जनता की कमाई का १.५ लाख रूपया प्रतिमाह इस पद पर आसीन व्यक्ति के पास चला जाता है जो महज रबर स्टाम्प के और कुछ नहीं!!! राष्ट्रपति का देश के प्रति योगदान संदेह खड़ा करता है!

क्या यह महज एक संवैधानिक पद है और कुछ नहीं? ऐसे सवाल तब तब उठेंगे जब जब अफ्जल गुरु का जिक्र होगा.. जब जब नवीन चावला का जिक्र होगा.. केंद्र फाइलें दबाता रहेगा... कोर्ट फटकारता रहेगा.. राष्ट्रपति सिर्फ सुनेगा, देखेगा... पर कुछ कर न सकेगा!!!

हो सकता है कि यह सवाल आज से पूर्व भी उठे हों लेकिन आज इन्हें पुन: उठाना अपना दायित्व समझता हूँ.. हो सकता है कि कोई ऐसा काम हो जो राष्ट्रपति अपने बूते कर सकता हो और मुझे या अन्य किसी को न पता हो... आप जरुर बतायें...

--तपन शर्मा

Tuesday, February 03, 2009

बैंकिंग उद्योग के लिए एक प्रस्ताव

बैंकिग और बीमा, ये दो उद्योग ऐसे हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ये अपनी पूंजी से नहीं, अपने ग्राहकों की पूंजी से चलते हैं। जो कंपनी बीमा करती है, वह अपने पास से पैसा नहीं लौटाती। उसने जिनका बीमा किया हुआ है, उन्हीं के द्वारा जमा किए गए पैसे में से क्लेम निपटाती है। चूंकि हर साल जितने लोग क्लेम लेते हैं, उससे अधिक लोग बीमा करवाते हैं और किस्तें अदा करते हैं, इसलिए बीमा कंपनियों के पास अथाह पैसा जमा हो जाता है। बैंकों की अमीरी का रहस्य भी यही है। बैंक ऋण दे कर पैसा कमाते हैं। लेकिन यह ऋण वे अपनी जेब से नहीं देते। ग्राहकों द्वारा जमा किया गया पैसा उनकी पूंजी बन जाता है, जिससे उनमें ऋण देने की क्षमता आती है। इस तरह बैंक दूसरों के पैसे से अपना पैसा बनाते हैं। सीधे शब्दों में कहा जाए तो दोनों ही पाप करते हैं। यह निजी पूंजी नहीं है। सार्वजनिक पूंजी है, इसलिए इसका इस्तेमाल जनहित में ही होना चाहिए।

इस्लाम में सूद लेना हराम माना गया है। इसके लिए उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। इसमें कोई शक नहीं कि पैसे से पैसा पैदा नहीं होता। अमरूद के पेड़ से अमरूद पैदा होता है, गाय के पेट से बछड़ा निकलता है और स्त्री बच्चा देती है। लेकिन लोहे से लोहा पैदा नहीं होता, न लकड़ी से लकड़ी पैदा होती है। कागज का रुपया भी ऐसा ही एक निर्जीव पदार्थ है। उसमें वैसा ही कागज पैदा करने की क्षमता कहां ! फिर भी अगर सदियों से यह संभव होता रहा है, तो इसीलिए कि ऋण लेनेवाले की मजबूरी से फायदा उठाने की कोशिश की जाती रही है। उधार देना सहयोग करने की क्रिया होनी चाहिए न कि मुनाफा कमाने की।

जहां मुनाफा होता है वहीं नुकसान होने की संभावना होती है। यही कारण है कि बैंकों के डूबते रहने की घटना होती रहती है। आजादी के पहले हर साल कुछ बैंक डूबते थे और हजारों ग्राहकों का पैसा मारा जाता था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने जब बैंकिंग उद्योग को रेगुलेट करना शुरू किया, तब बैंक डूबने की घटनाएं बंद होने लगीं। अब यदा-कदा ही ऐसा होता है। उस स्थिति में रिजर्व बैंक आवश्यक कार्रवाई कर ग्राहकों के पैसे का इंतजाम कर देता है। लेकिन अमेरिका और कुछ अन्य देशों में ऐसा नहीं है। जहां बैंकों पर नियंत्रण नहीं होता, वे लालच में गलत सौदे करने लगते हैं और समय पर पैसे की वापसी नहीं होती, तो दिवालिया होने लगते हैं। बैंक ग्राहकों का पैसा डूब जाता है। इस बार अमेरिका में यही हुआ, जिससे वहां मंदी आ गई। अब अमेरिका की मंदी पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है।

बड़ा सवाल यह नहीं है कि बैंकिंग उद्योग कैसे हमेशा फूलता-फलता रहे। मुनाफाखोरी के किसी धंधे में समाज की क्या रुचि हो सकती है। समाज का काम मुनाफाखोरी को रोकना है। बैंकिंग उद्योग अगर यह तय करे कि वह दस प्रतिशत सालाना से ज्यादा मुनाफा नहीं कमाएगा, तो यह उद्योग प्राइवेट हाथों में रह सकता है। अभी हालत यह है कि बैंक कई सौ गुना मुनाफा कमा रहे हैं। पैसा जमा करनेवालों को कम ब्याज देते हैं और ऋण लेनेवालों से ज्यादा ब्याज वसूल करते हैं। बीच का पैसा खा कर वे मोटाते जाते हैं। चूंकि ऋण देने के पीछे कोई सामाजिक लक्ष्य नहीं होता, इसलिए वे गरीबों को ऋण नहीं देते ताकि वे अपने जरूरी काम निपटा सकें, बल्कि अमीरों को (ताकि वे इस पैसे से और पैसा पैदा कर सकें) और मध्य वर्ग के लोगों को (क्योंकि इनके पास कुछ पैसा पहले से होता है) ऋण देते हैं। इस तरह बैंकिंग पैसे का खेल बन कर रह गई है, जिससे गरीबों का या वास्तविक जरूरतमंदों का कोई भला नहीं होता। गरीब भले ही ईमानदार हो और समय पर पैसा चुकाने की नीयत रखता हो, पर उसे ऋण नहीं मिलेगा, क्योंकि उसके पास जमानत देने के लिए कुछ नहीं होता।

इन सब बुराइयों का इलाज है। इलाज यह है कि पैसे पर सूद लेना और सूद देना, दोनों बंद कर दिए जाएं। यह दलाली की कमाई है। दलाली की कमाई से कोई देश फूलता-फलता नहीं है। कायदे से होना यह चाहिए कि जो लोग बैंकों में पैसा जमा करते हैं, वे उसकी रखवाली के लिए एक निश्चित मात्रा में प्रबंधकीय शुल्क दें। यह बैंक की असली कमाई होगी। इस कमाई से जरूरतमंद लोगों को ऋण दिया जा सकता है। इस ऋण पर भी ब्याज न ले कर प्रशासनिक शुल्क लिया जाना चाहिए। इन दोनों शुल्कों की राशि से ही बैंकों को अपना कामकाज चलाना चाहिए। इस तरह बैंकिंग मुनाफे का उद्योग न रह कर जन सेवा का उपक्रम बन जाएगी। इसे जन बैंकिग कहा जा सकता है।

सवाल उठता है कि रुपया जमा करनेवालों के पैसे का क्या जाए। पैसे को अचल रखना ठीक नहीं है। उसका प्रवाह बने रहना चाहिए। नहीं तो अर्थव्यवस्था कुछ हद तक ठप हो जाएगी। लेकिन दूसरे के पैसे का इस्तेमाल बहुत सावधानी से होना चाहिए। इसलिए देश के अर्थशास्त्रियों को आपस में विचार करके इस विषय में अपना मत देना चाहिए। यह हो सकता है कि इस जमा राशि का एक हिस्सा छोटे उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने के लिए खर्च किया जाए और एक हिस्सा मध्य वर्ग तथा निर्धन लोगों को ऋण देने में खर्च किया जाए। इनसे किसी तरह की जमानत न ली जाए। जैसा कि उपर कहा गया है, ऋण की सभी रकमों पर सिर्फ प्रबंधकीय शुल्क लिया जाए। अमीर संस्थानों को ऋण देने की कोई जरूरत नहीं है। वे अपने शेयरहोल्डरों से जितना अधिक पैसा ले सकते हैं, लें और उसी से धंधा करें। जहां तक ऋण की अदायगी का सवाल है, यह जगजाहिर हो चुका है कि ज्यादातर बड़े ऋण प्राप्तकर्ता ही बैंकों को धोखा देते हैं और उनका पैसा डकार जाते हैं। जो छोटी रकमें लेते हैं, उनमें से ज्यादातर ऋण चुका देते हैं। नई व्यवस्था में जो लोग ऋण नहीं चुका पाते, उन्हें पुलिस, पंचायत आदि की सहायता से ऋण चुकाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। बदले में उन्हें दिवालिया घोषित कर (ताकि वे भविष्य में ऋण न ले सकें) उनसे विभिन्न कार्यक्रमों में मजदूरी भी कराई जा सकती है। यह भी हो सकता है कि उन्हें श्रम जेल में डाल दिया जाए और वहां काम करवाया जाए। जब उधार की पूरी रकम चुक जाए, तो उनकी दिवालिया वाली स्थिति खत्म की जा सकती है। फिर भी बैंकों को घाटा हो सकता है। चूंकि बैंक जन सेवा कर रहे हैं, इसलिए इस घाटे की पूर्ति सरकार को करनी चाहिए। सरकार को इसलिए कि वह मुनाफा कमाने के लिए नहीं, जनता का जीवन सुगम बनाने के लिए चुनी जाती है।

सीएनबीसी टीवी चैनल में काम करनेवाली और एक समय हमारे बगल में रहनेवाली एक लड़की को, जो बिजनेस समाचार देखती है, जब मैंने यह स्कीम सुनाई, तो उसने खट से कहा कि यह तो सोशलिस्टिक बैंकिंग है। वर्तमान बैंकिंग के लिए उसने कैपिटलिस्टिक बैंकिंग की संज्ञा का उपयोग किया। निश्चय ही वह एक क्षण में मेरी बात समझ गई। क्या मैं पाठक-पाठिकाओं से खूब सोच कर यह बताने का निवेदन कर सकता हूं कि कौन-सी बैंकिंग समाज के ज्यादा हित में होगी - कैपिटलिस्टिक या सोशलिस्टिक?

राजकिशोर

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)

Monday, February 02, 2009

वो "पब" याद आये, बहुत याद आये....


कोई भी लेख लिखना जाने क्यूं मुझे असुविधा जनक सा लगता है.....पर कभी-कभी ऐसा कुछ घट जाता है के ये बेहद मुश्किल काम भी किए बग़ैर चैन नहीं पड़ता...अभी एक ख़बर पढ़ी थी मंग्लुरु की...एक नयी- नवेली सेना द्बारा पब संस्कृति के विरोध की ......पब संस्कृति का मैं भी किसी भी तरह से पक्षधर नहीं हूँ.....ना यूँ खुले आम उन्मुक्तता ही मुझे पसंद है.....हाँ खुला होना एक अलग बात है...लिहाजा मुझे भी इस सेना का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि मेरे ख्यालात समझ कर उनहोंने इस का विरोध किया... मगर क्या विरोध किया.....? क्या किसी को ऐसा करने का हक है..? विरोध करने के क्या यही तरीके रह गए हैं...?
अगर लड़कियों के बयान पर भी गौर करें तो (और गौर क्यूं ना करें..? वो भी तो इसी मुल्क की नागरिक हैं... ना भी हों तो इंसान तो हैं ही..) तो उनके मुताबिक वहाँ पर विरोध प्रकट करने के नाम पर जो मार-पिटाई हुई...बाल पकड़ कर घसीटा गया...बदतमीज़ियां की गयीं......और तो और कपड़े तक उतरवाने की बात हो गयी.. तो अब इस विरोध का क्या अर्थ निकाला जाए...क्या वास्तव में ये लोग "नग्नता" का विरोध करने गए थे...साफ़-साफ़ नहीं लगता आपको कि कौन-सी कुंठाएं लेकर गए थे वहाँ पर...? इस से अधिक स्पष्ट तो मेरे ख्याल से और क्या होगा...?

हो सकता है सेना प्रमुख कहें कि इस में कुछ बाहरी लोग भी शामिल हो गए होंगे...... लेकिन एक आग के ख़िलाफ़ दूसरी आग भड़काना कहाँ तक ठीक है...और इस आयोजन से होने वाले नुक्सान का जिम्मेवार कौन है...."नुक़सान" से मेरा मतलब है कि उन लड़कियों के सारे नही तो कुछ बयानों में तो सच्चाई होगी ही .... यही कहा जायेगा कि सब राजनीति का खेल है.....चुनाव का चक्कर है ......पब्लिसिटी स्टंट है....और बात ख़त्म ..... हाँ मालूम है कि इन महान लोगों के बगैर तो ना राजनीति चल सकती है, ना चुनाव ही हो सकते हैं ...और देश का, कल्चर का, सभ्यता-संस्कृति का तो उद्धार कदापि नहीं हो सकता.....पर ज़रा उन चंद लड़कियों के दिल से तो कोई पूछ कर तो देखे कि उस वक्त उनके दिल पर क्या बीती होगी ...चाहे कैसी भी ग़लत राह पर कुछ युवा जा रहे हों ...पर ये अपमान किस तरह से शोभा देता है....इस से हमारी कौन सी सभ्यता का सिर ऊंचा हो जायेगा...कौन सी संस्कृति फले-फूलेगी.....और नैतिकता ...........????

इश्वर किसी को भी इतना नैतिक ना बनाए ..जिन्हें दंगे फसाद टाइप के ये आयोजन भी नैतिक कार्यवाई लगते हों, उनकी अक्ल पर हंसूं या रोऊँ ....अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का सबको हक है...हाँ ...जो संयम से, सही तरीके से जियेगा वो ख़ुद पर अहसान करेगा....और नहीं तो जल्द बर्बाद हो जायेगा ...इससे ज्यादा और क्या.......

(दोनों कार्टून लेखक ने ही बनाये हैं...)

मनु "बे-तक्ख्ल्लुस

Sunday, February 01, 2009

गरीब की रोटी होगी और महंगी....

इसे गरीब का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद भी उसे सस्ती रोटी नहीं मिल पा रही है। यही नहीं आगामी सीजन में उसकी रोटी अब और महंगी हो जाएगी क्योंकि सरकार ने गेहूँ के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर दी है।
उल्लेखनीय है कि 2007-08 देश में गेहूं का उत्पादन 784 लाख टन हुआ जो एक रिकार्ड है जबकि 2006-07 में उत्पादन 758.1 लाख टन था। रिकार्ड उत्पादन के बावजूद देश में गेहूँ के भाव भी रिकार्ड ही बना गए।

मार्केटिंग वर्ष 2007-08 (अप्रैल-मार्च) में गेहूं का समर्थन मूल्य 850 रुपए प्रति क्विंटल था जिसे 2008-09 में बढ़ाकर 1000 रुपए कर दिया गया। इससे खुले बाजार में गेहूं के भाव में वृद्वि होना स्वाभाविक ही था। अब सरकार ने 2009-10 के लिए इसे बढ़ा कर 1080 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है। इससे नि:संदेह आगामी महीनों में गेहूं के भाव में और तेजी आएगी।
गत वर्ष देश में गेहूं का रिकार्ड उत्पादन होने के कारण आरंभ यह उम्मीद थी कि भाव नीचे रहेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण बाजार से अधिकांश गेहूं सरकार द्वारा खरीद कर लिया जाना रहा।
मार्केटिंग वर्ष 2008-09 के दौरान मंडियों में कुल 248.28 लाख टन गेहूं की आवक हुई और इसमें से सरकार ने 226.82 लाख टन की खरीद की। यह भी एक रिकार्ड है। वास्तव में न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिक होने के कारण किसान जहां अधिक से अधिक गेहूं मंडी में लाए वहीं सरकारी अंकुश के कारण व्यापारियों ने इसकी खरीद नहीं की। परिणाम स्वरुप बाजार में गेहूं का स्टाक कम हुआ और बाजार में भाव बढ़ने लगे। हालांकि भाव पर काबू रखने के लिए सरकार ने खुले बाजार में 50 लाख टन गेहूँ बेचने की घोषणा की। यह घोषणा सरकार ने सितम्बर में की थी और उस समय दिल्ली बाजार में खुदरा क्वालिटी की गेहूं के भाव 1060/1063 रुपए प्रति क्विंटल चल रहे थे। सरकारी की इस घोषणा पर कार्यवाही कछुए की चाल से की गई और यही कारण है कि भाव में कोई मंदी नहीं आई और बढ़ते-बढ़ते अब 1182/1185 रुपए हो गए।
सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी किए जाने के बाद दिल्ली में भाव बढ़ कर 1192/1195 रुपए हो गए हैं और संभावना है कि जल्दी ही भाव 1200 रुपए का आंकड़ा पार कर जाएंगे।
ज्ञातव्य है कि इस वर्ष एक जनवरी को सरकारी गोदामों में कुल 180.62 लाख टन गेहूं का स्टाक था जबकि बफर मानदंडों के अनुसार इस तिथि को 82 लाख टन का स्टाक होना चाहिए।
इस प्रकार सरकारी गोदाम तो भरे हैं लेकिन बाजार में भाव कम नहीं हो रहे हैं।
यह संभव है कि आगामी सीजन आरंभ होने पर नई गेहूं की आवक बढ़ने के बाद भाव में कुछ मंदी आए, लेकिन यह तो तय है कि आम आदमी को गेहूं सस्ती नहीं मिलेगी। उसकी रोटी तो महंगी हो ही चुकी है।

राजनीति का शिकार
वास्तव में आम आदमी राजनीति का शिकार हो रहा है। जानकारों का कहना है कि योजना आयोग और प्रधान मंत्री कार्यालय गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में किसी प्रकार की बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि गत वर्ष ही भाव में 150 रुपए की बढ़ोतरी की गई थी।
लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए सरकार ने किसानों के वोट हासिल करने के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर ही दी है।

चलते-चलते
गुलज़ार की ये त्रिवेणी शायद सरकार को भी पसंद आये-

"मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
"

राजेश शर्मा