
पटना में एक शख्स ने फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के खिलाफ याचिका दायर की है....नाम पर उन्हें आपत्ति तो है ही, इस फिल्म की साधारण विषयवस्तु को इतना आगे तक पहुंचने में भी उन्हें सोची-समझी चाल दिखती है.... बहरहाल,बैठक में एक चिट्टी आयी है शिवानी की....शिवानी त्रिपाठी महुआ न्यूज़ चैनल में कैमरे के आगे ड्यूटी बजाती हैं....चुपके-चुपके बैठक में आती रही हैं....चूंकि, शिवानी गोरखपुर की हैं तो कृपया इस चिट्ठी को पटना के शख्स की याचिका न समझें....
फिल्म बेहतरीन है.....निर्देशन गज़ब का है....केबीसी के हर सवाल का नायक के अतीत से जुड़ाव बेहतरीन था...पर सबसे बेहतर था मलिन बस्ती के उन बच्चों से इतना उम्दा अभिनय करवा लेना....
और कोयले को बाज़ार में हीरे के भाव बेच मुनाफ़ा कैसे कमाया जाता है, ये कोई इन निर्देशकों से सीखे जिन्होंने हमारा ही कचरा हमें खूबसूरती के साथ चांदी की तश्तरी में अति आत्मविश्वास के साथ परोस दिया....और हमने निवाला दर निवाला मुंह में डालना भी शुरु कर दिया....मगर, जो फिल्म वैश्विक स्तर पर डंका बजवा रही हो, फिल्म क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानित ऑस्कर की मजबूत दावेदार हो, भारत के सिनेमाघरों में पहले हफ़्ते में ही दर्शक नहीं जुटा पायी....

बहरहाल, सभी बातों पर गौर करने के बाद अगर कोई पूछे कि क्या स्लमडॉग को ऑस्कर में जाना चाहिए या ये अवार्ड मिलना चाहिए (जो लगभग तय ही है) तो होगा हां....क्योंकि ऑस्कर की दौड़ में पहुंचनेवाली हर भारतीय फिल्म का हाल कुछ ऐसा ही था....जी हां, चाहे बात 80 के दशक की मदर इंडिया की हो या लगान की, स्माइल पिंकी या स्लमडॉग.....इन सभी फिल्मों में एक चीज़ कॉंमन है....ग़रीबी, दरिद्रता, भूखी-नंगी जनता, क्योंकि इनमें ही दिखता है इन्हें “रियल इंडिया...."
माना कि फिल्म के दृश्यों में मुंबई की मलिन बस्तियों से काफी साम्य था, मुंबई की इन बस्तियों में रहने वालों की यही दशा होती है, मगर मुंबई ऐसी ही है ये भी नहीं कह सकते..... मुंबई सिर्फ गंदी ही नहीं है....यही मुंबई समंदर के खूबसूरत किनारों, ऊंची इमारतों, ग्लैमर की चकाचौंध और आधुनिकता के चरम के लिए भी अग्रणी मानी जाती है...तो इतने वृहद और संपन्न पक्ष की अनदेखी क्यों कर दी गयी...आखिर इस पक्ष को शून्य कर बाहर की दुनिया को इस फिल्म के माध्यम से क्या दिखाने और जताने की कोशिश की गयी....यही कि हम जो थे, वही हैं और वही रह गये....
ठीक है कि डायरेक्टर की प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि गंदगी बेचने का उसका तरीका लह गया....और अगर इस फिल्म को ऑस्कर मिलता है तो केवल इसलिए नहीं कि वाकई ये फिल्म बेहतरीन बनी और संगीत ज़बरदस्त रहा....कारण और भी हैं.....मसलन, ये एक हॉलीवुड के डायरेक्टर ने बनायी है और इसमें भारत की ग़रीबी का वीभत्स और लाचार रूप दिखाया गया है....आप भी जानते हैं कि भारत घूमने आने वाले पर्यटकों के कैमरे भी झोपड़ियों और भीख के कटोरे पर ही ज़्यादा फ्लैश चमकाते हैं....ठीक वैसे ही जैसे किसी वीआईपी भारतीय मेहमान जैसे बिल क्लिंटन, प्रिंस चार्ल्स, मिलिबैंड आदि को घूमने के लिए सूरत, अहमदाबाद, दिल्ली, कश्मीर की वादियां, गोवा की बेरोकटोक हवा या केरल-कन्याकुमारी की खूबसूरती और सागर की गहराई में खो जाने वाला सूरज नहीं मिलता....उन्हें तो बस दिखता है राजस्थान के किलों के साये में सूखा बंजर नज़ारा, उन्हें देखकर आंखें फाड़ सकने वाले ग्रामीण....यहां तक तो गनीमत थी.....पर इस बार तो हद हो गयी, जब ब्रिटेन के विदेश मंत्री के भारतीय गांवों को देखने की इच्छा पर अमेठी का सबसे ग़रीब, दरिद्र परिवार दिखाया गया....किसे दोष देंगे हम??
ख़ैर, इतना तो कहा जा सकता है कि बवाल इस फिल्म के नाम में स्लम के साथ डॉग पर नहीं बल्कि पूरे देश को स्लमडॉग साबित करने की उनकी चाही-अनचाही कोशिशों पर मचना चाहिए था....स्लमडॉगों का ऐसा देश जहां जन-गण-मन अधिनायक जय का गान होता है, वहां अब सबके होठों पर है “जय हो....” का स्वर...
शिवानी त्रिपाठी

मार्कण्डेय