Showing posts with label christianitty. Show all posts
Showing posts with label christianitty. Show all posts

Saturday, July 10, 2010

आओ कुछ देर के लिए नास्तिक हो जाएं...

ऐसा अक्सर होता है कि मैं जब कहता हूं ‘मैं नास्तिक हूँ’ तो लोग कहते हैं तुम निराश हो इसीलिये ऐसी बात कर रहे हो। उनके अनुसार सिर्फ असफल और निराश व्यक्ति ही नास्तिक होता है। नास्तिक होने को किसी मुम्बईया फिल्म की तर्ज़ पर भगवान से गुस्सा हो जाने की तरह लिया जाता है और माना जाता है कि अंत में व्यक्ति को भगवान के पास आना ही होगा। नास्तिकता भगवान के प्रति किसी तरह के गुस्से से नहीं बल्कि एक बहुत लम्बी विचार-प्रक्रिया तथा तर्क पर आधारित होती है। यह असफलता या निराशा से नहीं बल्कि अपने दम पर सफल हो सकने के विश्वास से पैदा होती है। अगर आप नास्तिक हैं तो आप शत-प्रतिशत प्रयास करेंगे ना कि किसी आस्तिक की तरह आधा-अधूरा काम करके भगवान से उम्मीद करेंगे कि वो साथ दे। आस्तिक लोग असफल होने पर भगवान को दोष दे सकते हैं मगर नास्तिक कहता है कि मेरे प्रयास में कमी थी क्योंकि उसके लिये किस्मत कुछ नहीं होती। सब कुछ सिर्फ कर्म और कर्म ही होते हैं।
भगवान इंसान द्वारा ही बनाया हुआ हैं। हम जिन सवालों का उत्तर नहीं जानते उन्हे भगवान पर छोड देते हैं। इसी तरह धर्म भी इंसान ने ही खुद को बांधे रखने और डराने के लिये बनाया है। धर्म की बात इसीलिये कर रहा हूं क्योंकि धर्म और भगवान एक दूसरे से जुडे हुए हैं अगर धर्म इंसान ने बनाया है तो ईश्वर भी इंसान ने ही बनाया है। आप ध्यान से सोचेंगे तो हमारी हर धार्मिक प्रथा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण पायेंगे।
एक उदाहरण देता हूं - हम कहते हैं कि बारिश के समय देव सो जाते है इसीलिये शादी-ब्याह नहीं किये जा सकते। जब देवउठनी-ग्यारस पर देव उठते हैं तब शुभ कार्य शुरु होते हैं। जब हमारा धर्म बनाया गया तब आवागमन के साधन नहीं थे। बारिश के समय में जब नदी-नाले पूर होते थे, रास्ते बन्द हो जाते थे और लोग एक दूसरे से सम्पर्क भी नहीं कर पाते थे ऐसी स्थिति में कोई विवाह सम्बन्ध होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। इसीलिये कहा गया कि देव सो गये है और यह एक नियम बना दिया गया। चूंकि हर समय हर बात को तर्क की सहायता से नहीं समझाया जा सकता है इसीलिये भगवान का डर बता दिया गया और यह निश्चित हो गया कि अमुक समय में कोई शादी नहीं होगी। धर्म इंसान को नियमों में बांधने के लिये बनाया गया। ऐसे नियम जिनके अनुसार चलने पर जीने में सहूलियत हो। अगर नियम होते हैं तो उनके टूटने का खतरा भी होता है। लोग नियमों को ना तोडें यानि धर्म पर चलें इसके लिये कोई डर बताया जाना आवश्यक था इसीलिये भगवान को जन्म दिया गया परंतु समय के साथ जब नियमों में कोई बदलाव नही होता तो वो अप्रासंगिक हो जाते हैं जैसा कि आज हो रहा है।
वास्तव में भगवान का जन्म ही दुर्बलता से हुआ है। यह उन लोगो के लिये है जो कमज़ोर और भीरू हैं। अगर आप स्वयं अच्छा और बुरा समझते हैं; सही और गलत में भेद कर सकते हैं तो आपको भगवान की कोई ज़रूरत नहीं। अपनी यह बात एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूँ। जब बच्चा छोटा होता है तो उसे सुलाने के लिये माँ कहती है कि बेटा सो जा वरना बाबा आ जायेगा तो बच्चा बाबा के डर से सो जाता है। यहां स्वघोषित मां धर्म है बेटा आस्तिक और बाबा है ईश्वर जो वास्तव में है ही नहीं। हालांकि माँ बेटे के भले के लिये उसे सुला रही है पर गलत तरीके से। अगर बेटा समझदार है तो उसे बाबा से डराने की क्या ज़रूरत ? कुछ ऐसी ही नास्तिकता है।
नास्तिकता तर्क पर आधारित है, आस्तिकता की तरह झूठी श्रद्धा और विश्वास पर नहीं। आस्तिक स्वयं कहते है कि "भगवान आस्था का भूखा है"। वास्तव में भगवान आस्था का भूखा नहीं बल्कि उसका अस्तित्व ही आस्था से है। भगवान आस्था के बिना कुछ नहीं। तभी तो सारे चमत्कार और यहां तक की दुआयें भी विश्वास ना होने पर असर नहीं करती। आस्तिक जिसे भगवान की शक्ति कहते हैं वो वास्तव में विश्वास की शक्ति होती है परंतु नास्तिक किसी भगवान नाम की स्वनिर्मित संस्था में विश्वास करने की बजाय खुद में विश्वास करना पसंद करते हैं। आस्तिक कायर होता है जिसे अपने साथ भगवान का साथ चाहिए होता है। मुश्किल पलों का सामना करने में उसे डर लगता है। ऐसी स्थिति मे भगवान उसे एक मनोवैज्ञानिक आधार देता है जिससे प्रार्थना करके उसे थोडी राहत मिलती है। नास्तिक भगवान को नहीं मानता इसीलिये खुद ही लडता है चाहे वक़्त कैसा भी हो ।
अब एक बार फिर से सोचिये। जो नहीं मानता उसके लिये भगवान कुछ नहीं है और जो मानता है उसके लिये भगवान सब कुछ है इसका मतलब हुआ कि भगवान इतना कमज़ोर है कि वो सिर्फ मानने से ही ज़िन्दा है तब तो यह महज़ भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं!
आखिरी में एक बात फिर कहूंगा कि नास्तिकता निराशा का नहीं बल्कि खुद और सिर्फ खुद पर विश्वास का नाम है। अगर सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर आप खुले दिमाग से सोचेंगे तो शायद नवीन सागर की इस पंक्ति का मतलब समझ पायेंगे।
“जिसका कोई नहीं है उसका भगवान है... क्योंकि भगवान कोई नहीं है"
जो इतना कहने के बाद भी समझ नहीं पा रहे तो मतलब साफ है कि वो समझना चाहते नहीं है। वैसे भी उनके अनुसार भगवान तो विश्वास का नाम है तो ऐसी स्थिति में तर्क क्या कर सकता है। अगर नास्तिकता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको इस विश्वास से मुक्त होना होगा; इस पर सन्देह करना होगा, इससे सवाल करने होंगे. और खुद ही सत्य खोजना होगा।

विपुल शुक्ला
39, प्रगति नगर, इन्दौर
मो.- 9907728575


(विपुल हिंदयुग्म के बुनियादी सदस्यों में से हैं...पढाई और नौकरी के फेर में हिंदयुग्म पर आवाजाही घटती-बढ़ती रही, मगर इंदौर में हिंदयुग्म के बैनर तले हमेशा आयोजन करवाते रहे...उम्र छोटी है पर नास्तिक होने के लिए बड़ा होना भी कोई शर्त नहीं)