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Tuesday, May 11, 2010

भाषा पर बवेला क्यों...

आलोक सिंह साहिल

मीडिया की भाषा...आज की तारीख में, मीडिया से जुड़ी हर दूसरी बहस का मुद्दा सिर्फ यही है...मीडिया से आशय टीवी चैनलों की भाषा से है...अमूमन हर रोज कहीं न कहीं किसी अखबार, पत्रिका या नेट पर किसी कोने में मीडिया की भाषा पर पढ़ने को मिल जाता है....समझ नहीं आता...कि माजरा क्या है...मुझे नहीं लगता (शायद उम्र का भी दोष है, क्योंकि तब मैं पैदा भी नहीं हुआ था, या फिर इसका कारण व्यापक अध्ययन की कमी हो सकती है) कि इतनी बहस किसी बड़े से बड़े कालजयी कवि, लेखक या उनकी रचना में युक्त भाषा पर हुआ होगा...
कम से कम इससे एक बात तो साफ हो ही जाती है कि लोग मीडिया का एहतराम तो करते हैं...
खैर, मुद्दे पर लौटते हैं, मीडिया की भाषा...
पिछले 15-17 सालों से मैं लगातार टीवी चैनलों को देखता आ रहा हूँ...तब से, जब समाचार और चैनल का मतलब, सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था...जिस पर हर बुलेटिन में कोई न कोई मंत्री जी हाथों में कैंची लिए, फीता (रिबन) काटते दिखते...और जिसकी भाषा में मानो मोहन राकेश और पंत जी की आत्माओं ने कब्जा कर रखा था....तब मुझे अच्छे से याद है, शायद ही कभी मैंने टीवी या इससे इतर कहीं टीवी की भाषा पर कोई बवेला खड़ा होते देखा या सुना (अगर हुआ भी होगा, तो ऐसा जिसे नगण्य मानने में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ेगी)....
फिर, आज क्यों...? क्या इसलिए कि आज मीडिया ने अपने पर बड़े तेजी से फैला लिए हैं...और यह बात उन लोगों के हाजमे के लिए माकूल नहीं, जिन्हें लाख कोशिशों के बाद भी इस इंडस्ट्री में हाइप नहीं मिल पाया...या फिर वजह कोई दूसरी है...आखिर किस बात से एतराज है लोगों को...इससे कि आज मीडिया की भाषा ज्यादा सरल और लोकप्रिय हो गई है...आज हम हिंदी के समाचार में धड़ल्ले से ऊर्दू और अंग्रेज़ी के लोकप्रिय शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते...या फिर उनके लिए यही महत्वपूर्ण है कि जब बात हिंदी की हो, तो सिर्फ हिंदी का ही उपयोग किया जाए...भला यह कौन सी बुद्धिमत्ता है...
मुझे याद है, हिंद युग्म के एक कार्यक्रम के दौरान राजेंद्र यादव जी ने कहा था, “16वीं शताब्दी से पहले की रचनाओं को लॉकर में बंद कर देना चाहिए क्योंकि इससे हिंदी को सबसे अधिक नुकसान हुआ है”....क्षणिक तौर पर शायद यह बात हमारे मन को बुरी लगे....लेकिन ज़रा शांत दिमाग से सोचिए...क्या इतनी गलत बात कह दी थी राजेंद्र जी ने, वह भी तो इसी भाषा की रोटी खाते हैं...हिंदी का बुरा भला क्योंकर सोचेंगे...
हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है...लेकिन जब हमारा सामना पूरे राष्ट्र से होता है, तो निश्चित रूप से हमें ऐसे सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली भाषा की दरकार होती है, जो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के हर उस व्यक्ति को समझ आ जाए, जिसे हिंदी का एलिमेंटरी ज्ञान भी हो....और इसी भाषा का तो टीवी चैनलों में प्रयोग होता है...हां, आपको आपत्ति हो सकती है इस बात से कि...उसमें बहुतेरे शब्द अंग्रेजी और ऊर्दू के होते हैं...ये तो हिंदी के साथ नाइंसाफी है!
लेकिन ज़रा इसका दूसरा पहलू भी तो देखिए...नाइंसाफी तो आप कर रहे हैं, हिंदी को दायरों में संकुचित करके...क्या जरूरी है कि हिंदी सिर्फ 2-3 हिंदी भाषी राज्यों की ही अमानत बनी रहे...अगर आज इसका फलक विस्तृत हो रहा है, तो इसमें गलत क्या है...और वैसे भी हिंदी में मिश्रित ऊर्दू, अंग्रेजी और कुछ देशज शब्द तो हिंदी की सुंदरता और इसकी गरिष्ठता बढ़ाने के लिए हैं....भला इनसे हिंदी को क्या ख़तरा...
16वीं सदी में मशहूर शायर मसहफी ने एक शेर लिखा था...मौजूं है...इसलिए लिख रहा हूं...
खुदा रखे जबां हमने सुनी है मिर ओ मिर्ज़ा की,
कहें किस मुंह से ऐ मसहफी ऊर्दू हमारी है...
ऊपर लिखा हुआ शेर, कदाचित साहित्य में पहला दस्तावेज है, जो यह बताता है कि हिंदी और ऊर्दू कभी अलग नहीं थे...ऊर्दू तो हिंदी का ही एक अंश है...तो फिर ऊर्दू से गुरेज क्यों..दूसरी बात अंग्रेज़ी की...तो आज की तारीख में, हमारी बोल-चाल की भाषा में सामान्य रूप से 15-20 फीसदी शब्द अंग्रेज़ी के होते हैं...जो उन्हीं शब्दों के हिंदी वर्जन से ज्यादा सहज और ग्राह्य हैं...अगर इन्हीं शब्दों को हम अपनी भाषा में प्रयुक्त करते हैं, तो फिर बवेला क्यों मचता है...
हां, एक स्तर पर मीडिया की भाषा के ख़िलाफ उठने वाली आवाजों को थोड़ा जायज ठहराया जा सकता है, वह है उच्चारण के स्तर पर....आज के तमाम टीवी स्टार्स (एंकर, बेहतर होगा समाचार वाचकों) की तल्लफुस माशा अल्लाह होती है...यह दुखद है, लेकिन कुछ बातों के लिए तो हमें एक्सक्यूज़ मिलना ही चाहिए....और शायद भाषायी स्तर पर हो रहे आलोचना में यही एकमात्र स्तर है, जहां आलोचक सही सही ठहरते हैं...लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस मसले पर ध्यान बिरले ही लोग देते हैं...फिर किस बात के लिए हल्लाबोल...
सच तो यह है कि, टीवी चैनलों ने हिंदी का जितना प्रसार किया है...उतना और किसी ने नहीं किया...चाहे वह कोई साहित्यिक रचना हो...या कोई हिंदी का प्रकांड विद्वान...
एक सामान्य सी बात है....रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास का नाम हर एक को याद है...अक्सर लोगों को इसकी पंक्तियाँ भी याद हैं....क्योंकि रामचरित मानस की सहजता ने इसे लोकप्रिय और लोकगामी बनाया...और जन-जन ने इसे अंगीकार कर लिया...शायद ही दुनिया की कोई ऐसी भाषा हो जिसमें इसका अनुवाद न हुआ....लेकिन मुट्ठीभर लोगों को भी शायद ही याद होगा (हिंदी के स्नातकों या परास्नातकों की बात छोड़ दें, तो क्योंकि पास होने के लिए बहुत कुछ पढ़ना पड़ता है) कवि केशव दास जी ने भी रामचरित मानस की तुलना में रामचंद्रिका की रचना की...लेकिन पूर्वाग्रही भाषा के चलते यह हिंदी के कुछ विशेष विद्वानों और संग्रहालयों से आगे नहीं बढ़ पाया...
तो, अगर लोग आज मीडिया की भाषा को ऐसे ही स्तर पर पहुँचाने की कल्पना करते हैं, जहां पहुँच कर इसकी कम्यूनिकेशन की क्षमता खत्म हो जाए और यह सिर्फ कुछ पोशीदा शय में शुमार हो जाए...तो इसे सिर्फ उनकी गफलत ही कहा जा सकता है...

Thursday, March 25, 2010

एक भाषा हुआ करती है

आज से हम हिन्दी भाषा, साहित्य, इसमें बाज़ार और बनियाबाज़ी की घुसपैठ पर युवा कहानीकार अभिषेक कश्यप की पड़तालों की शृंखला का प्रकाशन शुरू कर रहे हैं। 'हिन्दीबाज़ी' नामक इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रत्येक वृहस्पतिवार को अभिषेक कश्यप हिन्दी भाषा और भाषाबाजों की नीयत पर रोशनी डालेंगे॰॰॰॰॰



एक भाषा हुआ करती है!
~अभिषेक कश्यप*

हिंदी शायद संसार की इकलौती ऐसी भाषा है जिसके परजीवी मलाई-रबड़ी पर पलते हैं और श्रमजीवी आर्थिक तंगी, अभाव, वंचना और अपमान का शिकार होते हैं। यह कड़वा सच है कि हिन्दी को जिन मनीषियों ने आधुनिक दृष्टि दी, नये मुहावरों, वाक्य-विन्यासों से लैस किया, अपने कृतित्व के जरिए जिन्होंने हिंदी को जनता की जुबान बना दी, उन्हें अपमानित, प्रताडि़त और विक्षिप्त होना पड़ा। उनमें से ज्यादातर मनीषियों को ताउम्र दो वक्त की रोटी की जद्दोजहज के बीच एक कठिन जिद के बूते अपनी रचनात्मक प्रतिभा को बचाए रखना पड़ा। एक ऐसी भाषा जिसमें साँस लेते हुए रघुवीर सहाय अपमानित हुए, मुक्तिबोध अभाव, वंचना और लंबी बीमारी से ग्रस्त होकर मरे, महाकवि निराला अर्द्ध-विक्षिप्त हुए और भुवनेश्वर ने मानसिक संतुलन खोकर भीख मांगते हुए दम तोड़ा। इसके उलट जो परजीवी हुए, प्रबंधन कुशल रहे वे हिन्दी की मलाई-रबड़ी खा-खाकर अघाते रहे।
हिंदी के परजीवी बनकर भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, चमचों और मसखरों ने ताकत और सत्ता हासिल की। विश्वविद्यालय, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग तो इन परजीवियों के सबसे सुरक्षित, सबसे आरामदेह शरणगाह रहे हैं। यहां मोटी तनख्वाह के साथ सेमिनारों, गोष्ठियों, कार्यशालाओं की मौज-मस्ती और विश्व हिंदी सम्मेलनों, विदेश यात्राओं का सुख भोगते हुए ये परजीवी हिंदी के उन श्रमजीवियों को हिकारत की नजर से देखते हैं जिनके लिए हिंदी और भाषा का संस्कार ही जीवन है। ये वे लोग हैं जो हिंदी भाषा और साहित्य के लिए घर फूँक तमाशा देखने में तनिक संकोच नहीं करते। जो अपनी मेहनत की कमाई से लघु पत्रिकाएँ निकालते हैं, कहानियाँ-कविताएँ लिखकर हिन्दी ही नहीं अहिंदी भाषी प्रदेशों के वाशिंदों को भी हिंदी भाषा और साहित्य से जुडऩे के लिए प्रेरित करते हैं। देशभर में ऐसी सैकड़ों प्रतिभाएं हैं जो छोटी-मोटी नौकरियां, धंधे यहां तक कि किसी बनिये के दुकान पर हजार-पन्द्रह सौ की बेगारी खटते हुए भी तमाम अभावों के बावजूद हिंदी के लिए वह कर रही हैं, विश्वविद्यालयों के मुफ्तखोर हिंदी प्राध्यापक, सरकारी अकादमियां और सार्वजनिक उपक्रमों के हिंदी विभाग जिसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। खासकर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्राध्यापक कहे जाने वाले मसखरे तो प्रतिभाहीन नकलचियों को ‘फंटूशलाल जी की कविताओं में स्त्री-विमर्श’ सरीखे निरर्थक विषयों पर पीएचडी की डिग्री बाँटने में ही व्यस्त हैं। और सरकार ऐसे मसखरों और नकलची शोध छात्रों को तनख्वाह-वजीफे के साथ तरह-तरह की सुविधाएँ देकर धन्य होती है।
हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने अपनी भाषा-शृंखला की लंबी कविता ‘एक भाषा हुआ करती है’ में इस हौलनाक विडंबना को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है-
‘एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएँ और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं
बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती
गाती बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और
सबसे खूंखार सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और गरीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा
वह भाषा जिसे वक्त-जरूरत तस्कर, हत्यारे, नेता,
दलाल, अफसर, भंडुए, रंडियाँ और जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं
वह भाषा जिसमें
लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएँ
‘ईश्वर’ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध
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एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीनेवाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बाँटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिट्ठियाँ
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भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दंडनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबंधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां वर्जित हैं विचार
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भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे
चाकर टांगते हैं तमगे
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अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिनभर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी
राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि।’

मित्रो! इस कविता से गुजरने के बाद क्या आपको हिंदी के अज्ञात कुलशील मानस पुत्रों, हिंदी के श्रमजीवियों की असहनीय व्यथा पर दु:ख नहीं हो रहा? क्या आपको विश्वविद्यालयों, अकादमियों, सार्वजनिक उपक्रमों में मलाई काटते हिंदी के परजीवियों और अपने नितांत निजी स्वार्थों व अश्लील महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंदी का इस्तेमाल करने वाले तस्करों, नेताओं, दलालों, चमचों, मसखरों और भंडुओं पर गुस्सा नहीं आ रहा?
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*लेखक कहानीकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं