कुछ दिन पहले मोबाइल पर एक एसएमएस आया ...एक लड़की बस स्टॉप पर खड़ी थी
तभी वहां एक आदमी आया और बोला
ऐ चलती है क्या नौ से बारह
लड़की ने पलटकर देखा
और कहा
पापा
मैं
हूँ
मेरे छोटे भाई-बहिन जो इस सन्देश की गहराई को भांप नहीं सके उन्हें इस पर हंसी आ गई ..लेकिन मेरे सामने एक गंभीर दृश्य अंकित हो गया ..जिसने कई परतों को पलटना शुरू कर दिया.
उनमें से एक समसामयिक परत है निरुपमा की मौत का मामला ....ये मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी गुथ्थी हर मामले की तरह न जाने कब तक सुलझेगी लेकिन कुछ उलझाने वाले सवाल ये है कि अगर सचमुच में निरुपमा की हत्या की गई है तो उसकी मुख्य वजह क्या है ......एक दूसरी जाति के लड़के से सम्बन्ध या फिर उसका बिन ब्याहे माँ बनना .......इस सवाल का जवाब तो हत्या करने वाले को ही ठीक-ठीक मालूम होगा. लेकिन अगर ये हत्या है तो इसे सिर्फ निरुपमा की हत्या नहीं माना जाना चाहिए ...हर उस लड़की के लिए मौत का एक प्रस्ताव पेश करने वाली इस घटना पर अलोक धन्वा के ये शब्द काफी कुछ कह जाने में मदद करते है ................. सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है/तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत/घर से बाहर/ लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं/मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा/कि तुम अब/ उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो/वह कहीं भी हो सकती है/ गिर सकती है/बिखर सकती है/लेकिन वह खुद शमिल होगी सब में/ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी/सब कुछ देखेगी/शुरू से अन्त तक/अपना अन्त भी देखती हुई जायेगी/किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी।
मेरा ये सब लिखना लड़कियों के घर से भागने को सही ठहराने के लिए नहीं है ...बल्कि अभिभावकों के संकीर्ण और अड़ियल रवैये को गलत बताने के लिए है ....क्योंकि घर से भागने की वजह कहीं न कहीं घर से मिलने वाले प्यार और सहयोग की कमी भी है
दूसरी बात जो इस घटना से उठी है उसमे स्त्री मुक्ति से जुड़े कुछ सवाल उठ खड़े हुए है .....आधुनिक संसाधनों का भरपूर प्रयोग करने वाले प्रहरी निरुपमा के प्रेंगनेंट होने की खबर सुनकर ये प्रश्न उठा रहे है क़ि उसके जैसी पढ़ी-लिखी लड़की को क्या गर्भ निरोधक के बारे में जानकारी नहीं थी ....अगर वह उनका इस्तेमाल करती तो शायद उसकी ये नियति न होती ................जाने माने लेखक और विचारक राजकिशोर का ताजतारीन लेख अखबार में पढ़ा तो स्त्री मुक्ति का ये प्रश्न और भी गहरा गया ....जादुई गोली के पचास साल ...यहाँ वो जादुई गोली का इस्तेमाल गर्भनिरोधक गोली के लिए कर रहे है ....वे कहते हैं ...इस गोली ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है ..अगर ये गोली न होती तो यौन क्रांति भी न होती . यौन क्रांति न होती तो स्त्री स्वंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते ..इस गोली ने एक महतवपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है क़ि यौन समागम कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है ...यह वैसा ही है जैसा एक मानव व्यवहार है जैसे खाना, पीना या चलना-फिरना ........
अगर बिना कोई तर्क किये इन शब्दों पर सहमति की मोहर लगा दी जाती है तो स्त्री विमर्श के लिए उठने वाले सभी सवाल खुद ही ढेर हो जायेंगे .....................लेकिन क्या ये इतना आसान होगा भावनात्मक और प्रयोगात्मक दोनों सूरतों में क्या शब्दों की ये आजादी समाज में अकार ले सकती है ...................ये बेहद पेचीदा प्रश्न है। सम्भोग अगर आजादी है तो ये समाज उसे कब क्या नाम देगा इसकी आजादी वो हमेशा से लेता आया है ......यूँ तो पत्नी ...नहीं तो प्रेमिका ........और वर्ना वेश्या
हिमानी दीवान

मार्कण्डेय