Friday, August 13, 2010

लंदन में 15 अगस्त मनाना ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है...

भारत देश हमारा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा...

जब से अपने भारत देश ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाई है उसमे एक साल और बढ़ गया है..15 अगस्त के दिन भारत के हर शहर, गाँव, गली-कूचे..देशभक्ति से ओत-प्रोत लोगों की बातों से गुंजित होंगे...गाने-फ़िल्में, डांस आदि के कल्चरल प्रोग्राम होंगे, स्पीच होगी और सड़कों पर तरह-तरह की वेश-भूषा में परेड निकलेंगीं...और लोग भीड़ में धक्का खाते हुये, या घर की छतों से उन्हें देखने का आनंद उठायेंगे...... जिन्हें दिल्ली जाकर भीड़ में शामिल होकर लालकिले पर झंडा लहराते हुये देखने का व प्राइम मिनिस्टर की दी हुई स्पीच सुनने का और परेड देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा वह अपने घर या चौपाल में बैठे टीवी पर ही देखकर दिल्ली में हुये उत्सव का आनंद लेने की कोशिश करेंगे. स्कूलों के बच्चे लाइन में खड़े होकर ( जैसा मुझे अपना बचपन याद आता है ) '' 'जन-गण-मन' और '' वन्देमातरम '' जैसे देशभक्ति के गाने गायेंगे..आसमान में पतंगें उड़ रही होंगी..क्या सीन होगा...और हम यहाँ बैठे हुए ज़ी टीवी पर उनकी कुछ झलकियाँ देखकर अपने देश के बारे में सोचकर अपनी आँखे नम करेंगें..क्योंकि यहाँ इतनी दूर रहकर टीवी की झलकियाँ ही तिरंगे को दिखाकर दिल में तरंगें पैदाकर हलचल मचाकर अपना गुजरा हुआ जमाना याद दिला देती हैं...इन तरंगों का भी उठना बहुत जरूरी है...कितने ही देशभक्त पतंगों की तरह देश पर कुर्बान हो गये. गाँधी जी ने, साथ में और भी तमाम देश-भक्तों ने पता नहीं क्या-क्या झेला देश की आजादी को प्राप्त करने के लिये और साथ में न जाने कितने और लोगों ने भी कुर्बानियाँ दीं जिनके नाम भी नहीं पता सबको.

लेकिन इतना सब कुछ हुआ..क्यों हुआ..देश को आजाद कराने के पीछे उन महान आत्माओं के सपने थे अपने देश की सुन्दर तस्वीर के. लेकिन लोग कैसे रहेंगे आजादी के बाद...और उनके इस दुनिया से जाने के बाद और उस आजादी का भविष्य में किस तरह इस्तेमाल किया जायेगा इसका उन लोगों को कोई अनुमान नहीं रहा होगा. जो गाँधी जी के सिद्धांत थे उनपर कितना अमल हो रहा है ? अहिंसा की जगह हिंसा का प्रयोग, शांति की जगह अशांति, बेईमानी, रिश्बतबाजी, हर जगह फैला आतंक, भ्रष्टाचार, दरिद्रता, अनैतिकता, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव..और भी न जाने कितनी समस्यों से देश ग्रस्त हो चुका है...इनका निवारण करने की तरफ कौन से कदम उठे हैं ? गरीबी, अत्याचार, लोगों के प्रति अन्याय..किसी भी क्षेत्र में सुधार होता नजर नहीं आ रहा है...जनता टैक्स देती है लेकिन उसका सदुपयोग उनके इस्तेमाल के साधनों की तरफ नहीं बल्कि किसी और तरफ नाजायज रूप में खर्च होता है....

बिजली, सड़कें, गंदगी, पानी और महँगाई से सूखता लोगों का खून
लाचारी, मजबूरी, कानून का डर शांत कर देता है तब उनका जुनून.

इन सब बातों को लिखते हुए, जिनसे आप सब लोग मुझसे अधिक परिचित हैं, सोचती हूँ कि कुछ लोगों के दिल में ये ख्याल आ रहा होगा या जिज्ञासा हो रही होगी कि मैं आप लोगों को बताऊँ कि यहाँ यू. के. में 15 अगस्त का दिन कैसे मनाया जाता है..लेकिन आपको शायद ताज्जुब होगा कि इतने साल यहाँ रहने के वावजूद भी मैंने इस बात पर कभी गौर नहीं किया था..मैं इस तरह के समारोह के बारे में अनजान रही थी..इस बारे में कुछ विदित ही नहीं हो पाया था अब तक. एक तो अंग्रेज लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों मनाने लगे..ये तो वही बात होगी कि किसी के हाथ से सुई लेकर उसी की आँख में चुभो दो..मतलब ये कि उन पर ज़ोर दो कि तुम लोग हमारे भारतीय स्वतंत्रता-दिवस को क्यों नहीं मनाते इस देश में. अरे भाई, जो हमारा देश छोड़ने पर मजबूर हुये उनको याद दिलाकर जले में नमक छिडकने जैसा हुआ कि नहीं ये ? इस बारे में कोई जश्न यहाँ खुले आम नहीं होता. हमारे अपने आजादी-दिवस पर भारतीयों के लिये न कोई छुट्टी का दिन रखा गया है ( इनके अपने त्योहारों के दिन होते हैं जिन पर छुट्टी होती है ) न कोई झंडा लहराना, न परेड न स्कूलों में कुछ..और न ही लाइब्रेरी में हमारे स्वतंत्रता दिवस को इस देश में मनाने के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है. लेकिन यहाँ कुछ जगहों पर जहाँ अधिक भारतीय रहते हैं वहाँ भारतीय लोग मिलकर किसी हाल वगैरा में लोकल काउंसिल की मदद से इस दिवस को मनाने का आयोजन रखते हैं..और लन्दन में भारतीय विद्या-भवन में भी इस अवसर पर समारोह मनाया जाता है जिसमे भारतीय नृत्य-गाना, सितार और तबला-वादन आदि का प्रोग्राम होता है. और भारतीय हाई कमिशनर '' रायल केनजिंगटन पैलेस गार्डेन '' नाम की बिल्डिंग के बाहर अपने देश का तिरंगा फहराता है और वहाँ के सुन्दर गार्डेन या हाल में स्पीच देता है...उसके बाद वहाँ पर कुछ कल्चरल प्रोग्राम होता है नाच-गाना इत्यादि...और खाने आदि का कार्यक्रम होता है...इस बार का प्रोग्राम है: 15 अगस्त को 10.30-3.00 तक के प्रोग्राम में 11 बजे सुबह भारतीय हाई कमिशनर नलिन सूरी अपने देश का तिरंगा ऊँचा करेंगे उसके बाद '' इंडियन जिमखाना क्लब '' में खाने का प्रबंध होगा जहाँ भारत के सभी क्षेत्रों के खाने के स्वाद के स्टाल होंगे व भारतीय कल्चरल प्रोग्राम भी होंगे जिसमे शायद भरत-नाट्यम नृत्य और संगीत आदि है.

आप सभी पाठकों को व हिन्दयुग्म से जुड़े सभी सदस्यों को इस स्वतंत्रता दिवस पर बधाई व मेरी शुभकामनायें...जय हिंद ! वन्देमातरम !

शन्नो अग्रवाल
(लेखिका ने लंदन से अपना अनुभव हमें भेजा है....तस्वीर लंदन के किसी पुराने समारोह की है, 15 अगस्त के मौके पर)

Thursday, August 12, 2010

चश्मा उतारकर देखिए कितना आज़ाद है मुल्क...

बिहार के किसी गांव में डायन बताकर जब सुखनी को नंगा कर दिया जाता है और भीड़ उसे निर्वस्त्र कर पीटती है, भोपाल में जब तथाकथित रामभक्त लड़के और लड़कियों को पकड़कर बेइज्जत करते हैं और छेड़खानी भी करते हैं तो राम के नाम पर माफ हो जाता है, महाराष्ट्र में जब अपनी मेहनत के बल पर पैदा अनाज को बेचकर कोई किसान मुट्ठी भर अनाज देखने और उसे पकाने की जद्दोजहद करते हुए अपनी जान दे देता है, छत्तीसगढ़ में नक्सली और पुलिस के बीच मौत का तांडव कराने वाले लोग जब नक्सलियों को आदमी जात से हटाकर देखते हैं और पुलिसवालों के घर पर पुक्का फाड़ कर चिल्लाने वाले लोगों का कलेजा ऐंठा जाता है, लेकिन सियासतदां के घर किसी लाश के जलने की बू कभी नहीं पहुंच पाती, और हमारी जेलों में बिना जुर्म के जिंदगी काटने वालों को हत्यारों के बाहर घूमने पर हंसी भी आती है और रोना भी..और हां जनाब इन सारी घटनाओं का किसी एक शहर या राज्य में होने का मुहर नहीं है, ये तो पूरे देश की आजाद तस्वीर के पीछे से झांकती घटनाएं हैं, तो सवाल है कि फिर देश तो आजाद है लेकिन क्या इन दबंग और गुंडातत्वों के अलावा हमें भी आजादी है बोलने की, सोचने की या फिर रोने और हंसने की भी, नहीं है। क्या ये आजादी उड़ीसा के एक आदिवासी की भी आजादी है जो रेल पर चढ़ने का सपना देखते देखते मौत के बिस्तर पर कराह रहा है,क्या जेसिका लाल को आजादी दिलाने के लिए जोर लगाने वाले लोगों ने रोज महिलाओं के देह में नजरें धंसाने के बाद उनकी निर्ममता से हत्या कर देने वाले लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। क्या प्रिंस को बचाने वाले हाथ कोयला खदान में मरने वाले मजदूरों को बचाने के लिए भी उठ रहे हैं, नहीं क्योंकि उनपर कैमरे के रस का नशा नहीं चढ़ रहा है। दरअसल हम आजाद तो यकीनन हैं लेकिन ये आजादी बस कुछ खास तबके और लोगों के लिए है, उनके लिए है जो सहरसा में भूख से मरने वाले एक रिक्शे वाले की मौत को किसी भी हाल में भूख से मौत नहीं होना साबित कर देते हैं, उनके लिए है जो मुंबई की सड़कों पर सरेआम लोगों को पीटते चलते हैं क्योंकि वो उत्तर भारत से ताल्लुक रखते हैं, उनके लिए है जो खाद्य सुरक्षा पर हाईप्रोफाइल बैठक करते हैं 1600 से 2200 रूपये प्लेट वाले खाने की कई सौ थालियां फिकवां देते हैं ये सोचे बगैर कि इसी देश में कई लोग रोज भूखे मरते हैं जिन्हें मीडिया कवर नहीं करता और ना ही प्रशासन में कोई रिकॉर्ड दर्ज होता है, ताकि जलाने का पैसा सरकार की जेब ढीली ना कर दे...ये तमाम लोग आजाद हैं...लिखते समय हिचकिचाहट इसीलिए होती है क्योंकि आजादी के बारे में लिखते वक्त तो भाषणबाजी पर उतारू हो जाते हैं न हम. इसलिए खुद पर शर्म आती है क्यों अब ये बातें और इन्हें करने वालों पर कोई भरोसा नहीं बचा।
राष्ट्र के तौर पर हमारे देश की जब पहचान नहीं थी तो कवायद हुई कि पहले राष्ट्र के तौर पर हम संगठित और परिभाषित हों...1857 की क्रांति के असफल हो जाने के पीछे बस यही वजह थी कि हम संगठित राष्ट्रवाद की परिभाषा से अलग एक लड़ाई लड़ रहे थे जहां कुंअर सिंह की लड़ाई अपनी जायदाद छिन जाने की वजह से थी, नाना साहब की लड़ाई बेदखल हो जाने की वजह से थी, तो झांसी की रानी की लड़ाई की अपनी वजहें थीं। एक व्यापक उद्देश्य की कमी और अपने निजी मामलों के चलते अंग्रेजों से लोहा ले रहे लोगों की लड़ाई की वजह से ही ये एक राष्ट्रीय क्रांति के तौर पर परिभाषित नहीं हो सका....लेकिन वहां से देश के बुद्धिजीवियों और नेताओं ने इसकी समीक्षा करते हुए पहले देश को राष्ट्रीय भावना से भरने की कोशिश की..ये लंबा दौर रहा जिसमें लोगों को व्यापक उद्देश्य के लिए लड़ाई लड़ने को तैयार किया गया...जब आजादी मिली तो राष्ट्रीय भावना चरम पर थी...फिर आजादी के 63 सालों के बाद क्या वो भावना और मजबूत हुई है या फिर एक बार फिर अपनी अपनी लड़ाई में फंसने की नौबत आ गई है...जाहिर तौर पर अब महंगाई से आपके घर में नमक नहीं खरीदे जाने को लेकर संसद में सिरफुटव्वल करने वाले लोगों को भूख, गरीबी और महंगाई डायन से तब तक कोई सरोकार नहीं है जब तक उन्हें इसका सियासी फायदा दिख ना जाए...घर में तकिया में मुंह छिपा के रो लेने को आजादी मान लें तो हैं आजाद, नहीं तो मुंहतक्की करनी पड़ेगी जनाब, आजादी महसूस करने के लिए। खैर फिर भी चश्मे का रंग बदलता है इसमें शक नहीं है मुझे। हम कभी देश में महंगाई डायन की बात करते हैं तो विश्व में बढ़ती अपनी ताकत को पहचान कर खुश भी होते हैं..फिर अंदरूनी हालात पर चर्चा करते हैं और फिर कभी निराश हो जाते हैं..ऐसे में आजादी के आइने में अगर युवाओं चेहरों पर झुर्रियां और जवान शरीर पर बेड़ियां दिखें तो यकीनन दुख होगा, अगर हमाम में सभी नंगे हैं बोलकर हम अपनी नंगई पर बेहया बन जाएं तो हम आजादी के सही मायने के हिस्सा नहीं हैं...लेकिन फिर भी इस नंगई के खिलाफ लड़ने वाले भी हैं..कुछ लड़ रहे हैं तो कुछ तैयार बैठे हैं इस लड़ाई का कंधा बनने के लिए...ऐसे लोग अंदरूनी तौर पर आजादी को खा रही ताकतों से खींचने की फिराक में देह लहूलुहान कर रहे हैं...इन लोगों की नजर और मदद से आजादी के सही मायने की तलाश चल रही है कहीं इसी मिट्टी पर जहां हम आजाद होने का जश्न मनाकर भी कभी कभार आजाद महसूस नहीं कर पाते। लेकिन वाकई हम आजाद हैं सिर्फ इस आजादी की बयार मजदूरों के देह से लेकर डायन बताकर जलील की जाने वाली महिलाओं तक और आत्महत्या कर रहे किसानों से लेकर भूख से मर रहे लोगों तक पहुंचने की देर है...कि जब वो अपना हक जान सकेंगे और भूख से मर जाने से बेहतर खड़ा होकर सवाल करना सीख लेंगे...कि जब किसी मीडिया की बपौती का हिस्सा नहीं होगा किसके न्याय की लड़ाई लड़नी है और किसकी नहीं...कि जब न्याय की भीख मांगने वाले हाथ उठेंगे हक की आवाज के साथ...फिर आजादी के मायने इक बार फिर वही होंगे जिसका सपना कभी देखा गया होगा..यकीनन हम आजाद हैं क्योंकि सपनों को टूटने ना देने की मुहिम पर लगे कुछ लोग जिंदा हैं और जगे हुए हैं..और जगाने की कोशिश कर रहे हैं दूसरों को जिनके मन पर मूर्छा लग गयी है...और यही आस काले चश्मे का रंग फिर बदल देती है और फिर उम्मीद और जीत का शीश लगा कर फिर महसूस होता है कि हां हम हैं आजाद, देश आजाद है, हमारे लोग आजाद हैं, लिहाजा मैं भी हूं आजाद

अमृत उपाध्याय

Wednesday, August 11, 2010

धर्मशास्त्रों ने दी बालिका विवाह यानी मर्दों को 'बलात्कार' की आज़ादी?

भारत में बाल-विवाह को जनवृद्धि का एक जिम्मेदार कारण माना जाता है, पर इसका भी समुचित विवेचन नहीं किया जाता। बाल-विवाह वैसे तो लड़के-लड़की दोनो को फाँसने वाली घटना का नाम है, पर सामाजिक सच्चाई यह है कि लड़की इसकी चपेट में अधिक है। उसे बोझ, पराया धन, दूसरे की धरोहर आदि समझा जाता है और जल्दी-से जल्दी उसे ब्याह की लौह्–शृंखला पहना कर सिर का बोझ हल्का करना उचित समझा जाता है। आखिर ‘कन्यादान’ का भी तो महत्त्व है (मानो लड़की इन्सान नहीं,कोई चीज हो)। ‘राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण’(एन.एस.एस.) ५२वें का आँकड़ा है कि प्रति हज़ार में, ०-१४ उम्र-सीमा की ब्याही गयीं लड़कियाँ ४ हैं और लड़के भी चार हैं। पर १५-१९ वर्ष की वय सीमा में पुरुष के ब्याहों की संख्या जहाँ ५० (शहरी १९, ग्रामीण ६१) है, वहीं स्त्री के ब्याहों की संख्या २६४ (शहरी १२६, ग्रामीण ३१६) है। अर्थात्, १००० में ५० लड़के ही, पर लड़कियाँ २६४। यानी, प्रतिज़ार २१४ लड़कियाँ लड़कों की तुलना मे अधिक ब्याही जाती हैं। यानी, जैसे ही थोड़ी बड़ी हुई लड़की, समाज की आँखों में खटकने लगती है उस की बढ़ोतरी। उसे बिना किसी पुरुष की दासी बनाए,चैन् नहीं पाता वह । फिर तो, यह आँकड़ा सिर्फ़ बाल-विवाह का नहीं लगता। ५० लड़कियाँ ५० लड़कों के साथ विवाह में नाथ दी गयीं,तो भले दिलमेल सम्बन्ध नहीं बना, पर उम्रगत अनमेलपन की स्थिति तो प्रायः नहीं है। परन्तु, बाकी २१४ लड़कियाँ कहाँ जाती हैं? स्पष्ट है कि वे अपने से पर्याप्त बड़े या प्रौढ़ मर्द के साथ नत्थी कर दी जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में तो यह संख्या और ज़्यादा है--३१६ लड़कियाँ, पर १६ लड़के। यानी, २५५ लड़कियाँ उम्र-दृष्टि से अनमेल-विवाह में धकेली जाती हैं।

यह तय है कि लड़की जितने ही पहले यौन-जीवन में घसीटी जाएगी, उतने ही बच्चे पैदा करने को अभिशप्त होगी। पर, बात केवल इतनी नहीं है सीधी-सपाट। खेलने-खाने या स्कूल जाने के जो दिन होते हैं (और कौन से दिन ऐसे नहीं होने चाहिए लड़की के लिए? लड़के के लिए तो ऐसे दिन जीवन भर सम्भावित हैं), उन में लड़की बच्चा जनने को बाध्य हो जाती है। कम उम्र में गर्भवती बनायी जाती है, तो उस का गर्भकाल भी लम्बा खिंच जाता है और वह पीड़ादायी भी ज़्यादा होता है। उस में प्रसव-मौत अधिक सम्भावी हो जाती है। बच्चे भी कमजोर या मृत पैदा होते हैं। कम उम्र की लड़की अबोध होती है,साथ ही विवाह की बेड़ी में वह शिक्षा के अवसर से भी वंचित कर दी गयी होती है। इस कारण, अपनी पीड़ाओं तथा उस के कारणों को भी ना समझ पाती है और ज़्यादा घुटती रहती है। उस की देह को कब्जे में ले लेना उस के पति (जो प्रायः बड़ा या कभी-कभी अधेड़ तक होता है) के लिए ज़्यादा आसान होता है और आसान होता है उसे अपनी अन्धी हवस के गड्ढे में गिरा देना (याद कीजिए फ़िल्म ‘बैण्डेट क्वीन’), उसे यौन-रोग दे देना तथा उसकी मासूमियत में उस के पेट को भारी-बेडौल बना देना आसान होता है।

लड़की के बाल-विवाह की प्रथा भी तो एक दीर्घकालीन धार्मिक-सांस्कृतिक आधार रखती है। ‘संस्कार-मयूख’ में बौधायन का वचन है कि भले ही अयोग्य वर हो ,पर कन्या को रजस्वला होने के पूर्व ब्याह दें। ‘गौतमधर्मसूत्र’(१-२-२३) वस्त्र पहनने की समझ विकसित होते ही कन्या को ब्याहने की सीख देता है, तो ‘व्यास-स्मृति’(२३) भी कहती है कि अधोवस्त्र पहनने की उम्र होने पर ब्याहना चाहिए। फिर,‘संवर्त स्मृति’ ने तो विवाह-योग्य कन्याओं को चार आयु-वर्गों में बाँटा है---गौरी (८ वर्ष), रोहिणी (९ वर्ष), कन्या (१० वर्ष) और रजस्वला (१० वर्ष से अधिक)।

कन्या को छोटी अवस्था में ब्याहने यानी किसी मर्द के बिस्तर पर पटक देने के पीछे की सोच वैदिक काल से चली आ रही एक भय-धारणा की भ्रांति थी, जो स्त्री को भोग्या मानने वाली पुरुष-कामान्धता से उपजी थी। ऋग्वेद के एक मंत्र का भाव था कि कन्या के देह-विकास में सहायक माने जाने वाले सोम,गन्धर्व और अग्नि उस के प्रथम, द्वितीय व तृतीय पति (उपभोक्ता)बन सकते हैं; तब कोई मनुष्य (पुरुष) उस से ब्याह करे, तो उस को चौथा पति बनना पड़ेगा। ‘अत्रि-संहिता’ ने ऋग्वेदोक्त मन्त्र(१०-८५-४०) का भावानुवाद करते कुछ जोड़ कर कहा---

पूर्वं स्त्रियः सुरैर्भुक्ता सोमगन्धर्ववह्निभिः
भुंजते मानवाः पश्चात् नताःदुष्यन्तिकर्हिचित्।

लेखक- डॉ.रवीन्द्र कुमार पाठक
पाठक विगहा (गाँव), जम्होर, औरंगाबाद, (बिहार) में जन्मे रवीन्द्र कुमार पाठक का यह आलेख इन्हीं की हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘जनसंख्या-समस्या के स्त्री-पाठ के रास्ते...’ से लिया गया है। रवीन्द्र ने NCERT द्वारा शिक्षकों के लिए भाषा और व्याकरण की पुस्तकों को तैयार करने में विशेषज्ञ के तौर पर सहयोग दिया है। इनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और एक प्रेस में है। वर्तमान में जी.एल.ए.कॉलेज, मेदिनीनगर (डाल्टनगंज), झारखंड में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं।
मो.- ०९८०१०९१६८२
ईमेल- rkpathakaubr@gmail.com
यानी, सोम-गन्धर्व-अग्नि – इन देवों द्वारा चखी जा कर भी कोई स्त्री जब मनुष्यों(मर्दों) द्वारा चखी जाती है , तब भी वह दूषित नहीं होती । वाह रे! क्या भाषा है! स्त्री-देह की पवित्रता इस उद्देश्य से घोषित की जा रही है कि पुरुष उसे पत्नी बनाने यानी चखने से इन्कार न कर दें ।(क्या यह किसी नारी-देह के दलाल-भड़ुवे की भाषा नहीं लगती?) फिर भी यह खटका तो लगा ही रहता था कि कहीं उक्त देव कन्या को पहले ही चख कर जूठी न कर दें। (कामुकों की देव-कल्पना भी तो कामुक रूप में ही होगी,वह भी वृद्ध देवों द्वारा बच्ची को यौन-बुभुक्षार्थ देखने वाली अनमेल कामुकता!) फिर जूठी हुई (नथ उतारी गयी) कन्या का दान(बिक्री?) कैसे किया जाएगा? अक्षतयोनि कन्या के दान में ही तो पुण्य मिलता है! यानी, कन्या रजस्वला हुई नहीं कि उस पर लार टपकाते औरतखोर मर्दों के हक में स्मृतिकारों ने व्यवस्था करनी शुरु कर दी। वहाँ भी करेले को नीम पर चढ़ाया गया, यानी एकमुखी अनमेल विवाह किये गये, अर्थात् कन्या के गले में पर्याप्त बड़े मर्द को लटका दिया गया। ‘मनुस्मृति’(९-९४) ने खुलेआम व्यवस्था दी—

त्रिंशवर्षोद्वहेत् कन्यां हृद्यांद्वादशवार्षिकीम्
त्र्यष्टवर्षोष्टवर्षी वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥

यानी, १२ वर्षीया कन्या को ३० वर्षीय मर्द और ८ वर्षीया कन्या को २४ वर्षीय मर्द से विवाहित करना धर्मसंगत है। यानी, वर्तमान कानूनों की दृष्टि से जो बलात्कार है, उस की खुलेआम प्रेरणा हिन्दू-संस्कृति के संविधान कहे जाने वाले ‘मनुस्मृति’ ने दी है। कन्या की उम्र को हर हाल में छोटा रखने का का समर्थन ‘वसिष्ठस्मृति’(८-१),‘गौतमस्मृति’(४-१),‘याज्ञवल्क्य-स्मृति’(१-५२) ने भी किया है। आश्रम-व्यवस्था के शिथिल होने से धीरे-धीरे वर की भी आयु गिरी, जिस से ऐसी भी स्थितियाँ आने लगीं जिन में वर-कन्या की उम्र का भेद ज़्यादा न रह गया। तब,‘बालिका-वधू’ फ़िल्म और धारावाहिक की तरह उभयमुखी बाल-विवाह होने लगे। आज बड़ी संख्या में यह भी व्याप्त है। पर, इस में भी तो बच्ची अधिक पीड़ित होती है। कच्ची उम्र में दासता के संस्थान (विवाह) में भर्ती कर दी जाने से, ‘वधू’(घर की शोभा, रसोइया, प्रजनन-मशीन और समग्रतः घरेलू कैदी) के तमाम आरोपित मूल्यों-जिम्मेदारियों और उन में निहित अन्यायों को झेलती, बच्ची ही तो अधिक संत्रस्त होती है। उस का सब से भयंकर रूप होता है उस का असमय गर्भ से लद जाना। विशेषतः बच्चियों के लिए त्रासकारी---‘बाल-विवाह’ की इस कुरीति को संस्कृति के नाम पर ढोते रहने की अमानुषिक मूढ़ता इतनी आम रही है कि १८९२ ई. में महाराष्ट्र में जब उसे प्रतिबन्धित करने हेतु कानून लाया जा रहा था, तो उस का उग्र विरोध करने वाले पोंगापंथियों के नेता थे बाल गंगाधर तिलक।

बच्ची का अनमेल विवाह माने क्या ? उस का खेलना-कूदना,स्कूल जाना(यदि बाप-माँ ने भेजा है, तो) छुड़वा कर,उसे किसी लड़के(अक्सर बड़े-प्रौढ़ मर्द) की दासी बनाते हुए, चिर-परिचित माहौल से सदा-सदा के लिए काट कर, यौन-शोषण में डाल देने—यौन-रोग व गर्भ झेलने, बच्चे पालने तथा लद-फद कपड़ों व शृंगार को ढोते हुए घरेलू काम-काज करते रहने की अन्तहीन शोषण-चक्की के पाटों के बीच धीरे से रख देने का नाम है बाल-विवाह।

‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’-१ (एन.एफ.एच.एस. - १) के अनुसार (२०-२४ वय-अन्तराल में विद्यमान) लड़कियों में से ५२.२% अठारह वर्ष के अन्दर ब्याह डाली गयी थीं । ‘एन.एफ.एच.एस.-२’ में यह आँकड़ा ५०% का था। हाल के सर्वेक्षण ‘एन.एफ.एच.एस.-३’ (२००५-०६ ई.) में यह आँकड़ा ४४.५%(शहरी २८.१%,ग्रामीण ५२.५%) है। शैक्षिक स्तर पर देखा जाए तो इन में अशिक्षित रहीं ७१.६% लड़कियाँ १८ वर्ष के भीतर किये गये विवाह की शिकार हैं । इसी तरह ८ वर्ष से कम अवधि तक शिक्षित हुईं ५५.१%, ८-९ साल तक पढ़ीं ३५.८% तथा १० साल या अधिक अवधि तक शिक्षित १२.८% लड़कियाँ ऐसी हैं; जो १८ साल से कम उम्र में ही ब्याही गयी हैं । २५-२९ वर्षीय लड़कों में से २९.३% (शहरी १६.७%, ग्रामीण ३६.५%) २१ वर्ष के भीतर ही ब्याह में गये दिखे। स्पष्टतः,‘एन.एफ.एच.एस.-३’ के अनुसार कम से कम आधी लड़कियाँ अपने से अधिक उम्र के लड़कों से ब्याही गयीं। ( एक तो इस सर्वे में लड़की को १८ तथा लड़कों को २१ वर्ष तक विवाहित देखने की अनमेल सोच काम कर ही रही है।)

‘यूनिसेफ’ ने १९८६-२००३ ई. के काल-खण्ड के अध्ययन से, २०-२४ वय-अन्तराल में आने वालीं उन लड़कियों का प्रतिशत में आँकड़ा पेश किया, जो १८ की उम्र तक ब्याह डाली गयी थीं—

भारत-४६ (शहरी २६, ग्रामीण ५४), पाकिस्तान-३२ (शहरी २१, ग्रामीण १५), श्रीलंका-१४ (शहरी १०, गामीण १५), नेपाल-५६ (शहरी ३८, ग्रामीण ५९), बांग्ला देश ६५ (शहरी ४८, ग्रामीण ७०), चांड-७१(शहरी ६५, ग्रामीण ७४), इण्डोनेशिया-२४ (शहरी १४, ग्रामीण ३५), द.अफ़्रिका-८(शहरी ५, ग्रामीण १२), सेंट्रल अफ़्रिकन रिपब्लिक-५७ (शहरी ५४, ग्रामीण ५९), मिस्र-२० (शहरी ११, ग्रामीण १४), माली-६५ (शहरी-४६, ग्रामीण-७४),घाना-३६ (शहरी २५, ग्रामीण ४२), मैक्सिको-२५ (शहरी ३१, ग्रामीण २१), सूडान-२७ (शहरी १९, ग्रामीण ३४), निगार-७७ (शहरी ४६, ग्रामीण ८६), यमन-४८(शहरी ४१, ग्रामीण ५२)।

बाल-विवाह से असमय गर्भ ढोने को मज़बूर बच्चियों का आँकड़ा यदि न देखें तो यह तस्वीर अधूरी रह जाती है। ‘विश्व बैंक’ की रिपोर्ट के अनुसार २००३ में १५-१९ वर्ष की २१% लड़कियाँ ‘माँ’ बनायी जा चुकी थीं। ‘एन.एफ.एच.एस.-३’ में यह आँकड़ा १६%(शहरी ८.७%,ग्रामीण १९) है, जो बिहार में २५%(ग्रामीण २७.६),उ.प्र.में१४.३%(ग्रामीण २७.६%),झारखण्ड में २७.५% (ग्रामीण ३२.७%) तथा उत्तरांचल में ६.२%(ग्रामीण ७.८%) है।

बाल विवाह और ऊपर से तमाम स्त्री-विरोधी मान्यताओं और व्यवस्थाओं की शिकार बनीं,कुपोषित हुईं लड़कियाँ जब प्रसव की नौबत तक पहुँचती हैं, तो बड़ी संख्या में वे मौत की भेंट चढ़ जाती हैं। उन के बच्चे भी मृत या बेहद कमजोर पैदा होते हैं। यदि बच्ची जनम जाती है, तो बेटे के भूखे इस समाज द्वारा उस की और उस बच्चीनुमा माँ की उपेक्षा शुरु हो जाती है। इस से वह और कमजोर हो जाती है। वह खुद कुपोषित है,तो उस के पास दूध कहाँ से बनेगा? दूध नहीं बना तो बच्ची को क्या पिलाएगी? वैसे दूध होने पर भी बच्ची सन्तान को कम ही समय तक स्तनपान कराने की छूट उसे समाज देता है,साथ ही बेटे की चाह में कुछ ही महीनों में पुनः गर्भ-धारण का दबाव उस पर डालता है। ऐसी स्थिति में ०-४ वर्ष की बच्चियों की मौत-दर ऊँची होती है। ‘एन.एस.एस.-१९८७’ के अनुसार प्रति हज़ार जीवित प्रसव पर इस उम्र की ३६.८ बच्चियाँ और ३३.६ बालक मर जाते हैं। ‘एन.एफ.एच.एस.-२’ के अनुसार प्रति हज़ार जीवित प्रसव पर, ०-५ वर्ष की उम्र के बीच में ही ९४.९ बच्चे मर जाते हैं, जिन में बच्चियाँ अधिक होती हैं। भारतीय बच्चियों में २५% अपना १५ वाँ जन्मदिन भी नहीं देख पाती हैं। इस तरह से प्रतिवर्ष लड़कों की अपेक्षा लड़कियाँ तीन लाख ज़्यादा मरती हैं।

इस समूची क्रूर व्यवस्था के परिणामस्वरूप माँ बनीं वे कमसिन लड़कियाँ यदि बच पाती हैं,तो उन की कंचन-काया मुर्दा-खण्डहर में असमय तब्दील हुई दिखाई देती है। जिन में महादेवी वर्मा,इन्दिरा गाँधी, किरण बेदी, कल्पना चावला, बछेन्द्री पाल, सुधा मूर्ति, पी.टी.उषा, सायना नेहवाल या ना जाने किस-किस की संभावना थी,पर वे ही बच्चा दर बच्चा जनते-पालते बन जाती हैं केवल घरेलू-बीमार प्रजनन-मशीन।

Tuesday, August 10, 2010

दिल्ली का बर्थडे और बिगड़ने की ख्वाहिश...

2005 था शायद....2005 ही था...5 अक्टूबर 2005...दिल्ली आए ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था....नए-नए दोस्तों में दो-चार ‘अच्छे’ दोस्त बन गए थे...उन्हीं में से एक का जन्मदिन था...वो दिल्ली का ही रहनेवाला है.....मेरे कम ही दोस्त ऐसे हैं जिनके पिताओं ने दिल्ली में अपना घर बना लिया और यहीं के हैं....उनमें से एक था..उसके घर पर बर्थडे की पार्टी थी...हम भी आमंत्रित थे...मेरे लिए दिल्ली भी नई थी और किसी बर्थडे की पार्टी भी....अच्छा लग रहा था कि ‘दिल्ली’ के किसी दोस्त का बर्थडे है और वहां बुलाया गया हूं....हम दो-तीन दोस्त इकट्ठे घर पहुंचे तो देखा पार्टी शुरू नहीं हुई है....कुछ और दोस्त पहुंचे हुए हैं....तीन-चार लड़कियां भी थीं...मैं उन्हें जानता था...ज़्यादा तो नहीं, मगर पहचान भर दोस्ती थी....ये नहीं जानता था कि उनसे किसी एक ही पार्टी में मुलाकात होगी....घर में और कोई था नहीं.....दोस्त के मां-पिताजी शायद पुणे गए हुए थे....बस हम सात-आठ दोस्त ही थे और एक नौकर....
पार्टी शुरु हुई....दोस्तों में आपसी परिचय हुआ, थोड़ा हंसी-मज़ाक और फिर शराब परोसी गई...मैं पीता नहीं हूं, तो बाक़ी मुझे चौंककर देखने लगे...एक और दोस्त और नहीं पीता था...हम दोनों ने कोल्ड ड्रिंक पी और संतुष्ट रहे...फिर दो लड़कियों ने अपना गिफ्ट निकाला और उसे दिया....सबके सामने गिफ्ट खोलने को कहा गया....दोस्त ने खोला तो कांडम का डिब्बा था.....दस का पैक...मैंने कांडम पहली बार तभी देखा था, इतना नज़दीक से...थोडा संकोच हो रहा था मगर अचानक सबके सामने ‘भोला’ बनता तो बेवकूफी होती.....ऐसे बैठा रहा जैसे बडी नॉर्मल-सी बात हो मेरे लिए....हालांकि, कांडम को लेकर बहुत ज़्यादा सोचा नहीं था इससे पहले और ये तो बिल्कुल ही नहीं सोचा था कि दो लड़कियां एक दोस्त को कांडम भी गिफ्ट कर सकती हैं...फिर आपसी मज़ाक शुरू हुआ....दोस्त से कहा गया कि वो कांडम खोले और लगाकर दिखाए....फिर किसी तरह से ये सब टाला गया और हंसी-मज़ाक की वजहें बदलती रहीं...मेरे लिए ये सब बिल्कुल नया था...मैं अब तक बहुत असहज महसूस कर चुका था....इन सबके बीच शराब का नशा परवान पर था और औपचारिक हंसी-मज़ाक अब गाली-गलौज तक पहुंच चुका था....किसी दोस्त ने मुझसे भी दो-चार बातें कहीं जो मुझे अच्छी नहीं लगीं....उस रात किसी को वापस नहीं जाना था....खा-पीकर वहीं सो जाना था और सुबह अपने-अपने घर जाना था....ये मेरे पिछले पार्टी अनुभवों से अलग था...मुझे ये बर्दाश्त नहीं हुआ.....जब सब पी लिए और नींद में जाने लगे तो मैं ढाई बजे रात को नौकर से दरवाज़ा खुलवाकर उसके घर से निकल गया...एक और दोस्त भी साथ में था जिसने पी नहीं थी....हम जैसे-तैसे वापस अपने कमरे तक पहुंच गए और उस रात को भूलने की कोशिश करने लगे..उस रात को मैं न चाहते हुए भी बिगड़ गया था...
वो रात भूल भी चुका था कि अचानक पांच साल बाद फिर याद आ गई....9 अगस्त मेरा जन्मदिन होता है...8 अगस्त की रात से इतने फोन कॉल्स आते हैं कि बैटरी चार्ज में लगाकर ही बात करनी पड़ती है...एकाध गिफ्ट भी मिलते हैं...डायरी, पेन, किताबें, शर्ट, डियोड्रेंट वगैरह....इस बार दो कांडम मिले...ऑफिस के एक साथी ने दिया....बाद में कहा गया कि मज़ाक है....शुक्र है, मुझे कांडम खोलकर दिखाने और पहनने के लिए नहीं कहा गया था...इस बार ये मज़ाक बुरा नहीं लगा.....अच्छा लगा...शायद उम्र का असर हो....शायद दिल्ली के तोहफों की आदत लग गई हो....लाख प्रचार देख लें बिंदास बोल, मगर कांडम से शर्म जुड़ी हुई है....हाथ में कांडम लेकर बहुत अच्छा नहीं लगता....जन्मदिन के दिन भी नहीं....मज़ाक के तौर पर तो बिल्कुल भी नहीं...कांडम कोई मज़ाक की चीज़ तो है नहीं...शायद ये अहसास दिलाने की चीज़ है कि जन्मदिन बड़ा होने के लिए होते हैं...
खैर, जन्मदिन से जुड़ी कई यादें हैं....कांडम दिल्ली से जुड़ी हुई याद है...सबसे अलग.....जब स्कूल में था तो एक दोस्त ने जन्मदिन पर एक कैसेट गिफ्ट किया था....कुमार सानू की आवाज़ में किशोर कुमार के हिट गाने....कई दिनों तक संभाल कर रखा....पहला गाना था ‘समझौता ग़मों से कर लो, समझौता....’..फिर एक दिन वो कैसेट टूट गई.....मुझे बुरा लगा था..वो बुरा लगना याद है अब तक....वो गाना भी कभी भूल नहीं पाया....न ही वो लड़की जिसने कैसेट दी थी....उस लड़की से पूछूंगा, इस जन्मदिन पर याद क्यों नहीं किया.... क्या मुझे गिफ्ट नहीं दोगी इस बार....कैसेट न सही, कांडम ही सही....मज़ाक में ही....प्लीज़...दिल्ली के बर्थडे में बिगड़ना ज़रूरी-है....इस रात को चाहकर भी बिगड़ नहीं पाया.....


निखिल आनंद गिरि

Monday, August 09, 2010

मेरा नाम तरुण है याद रखियेगा

करीबन २ साल पहले जब मैं दिल्ली में अंध विद्यालय में गया था तब सोचा नहीं था कि दोबारा ऐसा मौका मिल पायेगा । पिछले सप्ताह अपनी कम्पनी के माध्यम से एक ऐसे संस्थान में जाने का मौका मिला जहाँ उन बच्चों को पढ़ाया जाता है जो बच्चे एक आम स्कूल में नहीं जा सकते। बच्चों के मानसिक विकास हेतु बनाया गया यह संस्थान है "रोटरी इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्पेशल चिल्ड्रन"। इस स्कूल की स्थापना लगभग १४ वर्ष पूर्व हुई लेकिन गत वर्ष ही इसे Rotary Club द्वारा चलाया जाने लगा है।

मिलकर मनाएँ आज़ादी
बैठक पर आज़ादी का पर्व मनाने का मन हुआ है.....9 अगस्त से 15 अगस्त तक हम वैसे लेख आमंत्रित करते हैं जो देश की तस्वीर तय करें, आज़ाद देश की तस्वीर....सच्ची तस्वीर...ये लेख किसी भी मुद्दे पर हो सकता है.... आपबीती भी हो सकती है....किसी मोहल्ले, गांव, शहर या आदमी की कहानी भी हो सकती है जिसके लिए आज़ादी के मायने हमसे अलग हैं....कोई फोटो भी हो सकती है, जो इस मौके पर बांटी जा सके....वक्त ज़रा कम है, मगर आप हमारे साथ होंगे, ऐसा यकीन है... यह इस शृंखला की पहली पोस्ट है.....13 अगस्त तक आखिरी पोस्ट भेजें ताकि हमें भी पढ़ने का वक्त मिले...
संपादक
वहाँ जाकर पता चला कि वहाँ ४ से ४० वर्ष की आयु तक के बच्चे पढ़ते हैं। ४० साल के बच्चे!! सुबह दस से दोपहर दो बजे ये सभी बच्चे स्कूल में आते हैं। उन्हें बोलना सिखाया जाता है, उनके दिमाग के विकास के लिये तरह तरह के खेल-खिलाये जाते हैं। कुछ बच्चों को बोलने में तकलीफ़ थी तो किसी को सुनने में दिक्कत। हम १२-१५ लोग थे। हमने वहाँ बच्चों से बात की, उनके साथ वे पल बाँटे जिन्हें शायद वे और हम दोनों याद रखेंगे। वहाँ बच्चों के लिये संगीत का भी प्रबंध था। रंग दे बसंती के गीत पर जिस तरह से वो नाच रहे थे उस उत्साह से शायद हम न नाच पायें। मोहे मोहे तू रंग दे बसंती.. मुझे नहीं पता कि उन्हें इस गीत के मतलब पता हैं या नहीं, नहीं पता कि उन्हें स्वतंत्रता दिवस या आज़ादी का मायने पता हैं, पर इतना जरूर है कि वे सचमुच में आज़ाद हैं। आज़ाद हैं द्वेष से, आज़ाद हैं ईर्ष्या से, उन्हें परवाह नहीं है इस दुनिया की, तेज़ी से बढ़ते कम्पीटीशन की, वे मुक्त हैं, वे स्वतंत्र हैं।

मेरे एक साथी के मुताबिक ये लोग "Pure State" में हैं। इनका मन बेहद साफ़ है। हम जिस भी क्लास रूम में जाते वहाँ सभी बच्चे अपने आप ही खड़े हो जाते। कोई नमस्ते से हाथ जोड़ता दिखा तो कोई पैर छूने के लिये दौड़ा।

मदर टेरेसा का फ़ोटो दिखा जो दर्शाता है कि इन बच्चों को किस तरह के प्यार और ममता की जरूरत है।

स्कूल में ७-८ कमरे हैं। हर उम्र और मानसिक स्तर के आधार पर साठ बच्चों को बाँटा जाता है।


जानवर, फूलों और खेल-कूद के सामान की तस्वीरें दीवारों पर टँगी दिखाईं दी।


खेल-कूद की तस्वीर ने मुझे आकर्षित किया। दरअसल, मैं हैरान था कि जिस गरीब तबके से ये बच्चे यहाँ पढ़ने व सीखने आते हैं उनके लिये इस तस्वीर में रगबी, गोल्फ़ व बॉलिंग जैसे महँगे और अमीरों के खेल दर्शाये गये थे।

एक कमरे में हमने यह चित्र बना हुआ पाया।

"Lord's grace is enough for us"। भगवान की हम पर असीम कृपा है। यही वाक्य इन बच्चों को हिम्मत बँधाता होगा। अगर हर व्यक्ति यही सोचने लगेगा तो यह दुनिया कितनी खुशहाल हो जायेगी। लेकिन हम यह नहीं समझ सकते। इसकी समझ तो इन बच्चों को ही होगी। फिर कैसे हम "गर्व" से स्वयं को समझदार कहते हैं? झूठा गर्व!! झूठा अहम!!
ये संस्थान "Special Children" के लिये है। ये लोग स्पेशल हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये हमसे नहीं सीखते अपितु हम इनसे कुछ न कुछ जरूर सीख सकते हैं। इनकी दुनिया छोटी जरूर है पर बहुत "बड़ी" है। तरुण नाम के एक "बच्चे" ने शेर की मिमिकरी की। तरुण ने हमें अमिताभ बच्चन की तरह भी कर के दिखाया जैसा उन्होंने "पा" में किया था। चंद और तस्वीरें आप के लिये शायद आपके दिल और दिमाग पर वो छाप छोड़ जाये जिसे लेकर हम लोग वहाँ से वापिस लौट आये।






चलते-चलते दो वीडियो भी आपके लिये। एक में है तरूण और दूसरे में रंग दे बसंती पर झूमते ये बच्चे आज़ादी का जश्न मनाते हुए।





जाते हुए तरुण ने हम से कहा "मेरा नाम तरुण है याद रखियेगा"....याद रहेगा.....



--तपन शर्मा