
मिलकर मनाएँ आज़ादी
बैठक पर आज़ादी का पर्व मनाने का मन हुआ है.....9 अगस्त से 15 अगस्त तक हम वैसे लेख आमंत्रित करते हैं जो देश की तस्वीर तय करें, आज़ाद देश की तस्वीर....सच्ची तस्वीर...ये लेख किसी भी मुद्दे पर हो सकता है.... आपबीती भी हो सकती है....किसी मोहल्ले, गांव, शहर या आदमी की कहानी भी हो सकती है जिसके लिए आज़ादी के मायने हमसे अलग हैं....कोई फोटो भी हो सकती है, जो इस मौके पर बांटी जा सके....वक्त ज़रा कम है, मगर आप हमारे साथ होंगे, ऐसा यकीन है... यह इस शृंखला की पहली पोस्ट है.....13 अगस्त तक आखिरी पोस्ट भेजें ताकि हमें भी पढ़ने का वक्त मिले...
संपादक
वहाँ जाकर पता चला कि वहाँ ४ से ४० वर्ष की आयु तक के बच्चे पढ़ते हैं। ४० साल के बच्चे!! सुबह दस से दोपहर दो बजे ये सभी बच्चे स्कूल में आते हैं। उन्हें बोलना सिखाया जाता है, उनके दिमाग के विकास के लिये तरह तरह के खेल-खिलाये जाते हैं। कुछ बच्चों को बोलने में तकलीफ़ थी तो किसी को सुनने में दिक्कत। हम १२-१५ लोग थे। हमने वहाँ बच्चों से बात की, उनके साथ वे पल बाँटे जिन्हें शायद वे और हम दोनों याद रखेंगे। वहाँ बच्चों के लिये संगीत का भी प्रबंध था। रंग दे बसंती के गीत पर जिस तरह से वो नाच रहे थे उस उत्साह से शायद हम न नाच पायें। मोहे मोहे तू रंग दे बसंती.. मुझे नहीं पता कि उन्हें इस गीत के मतलब पता हैं या नहीं, नहीं पता कि उन्हें स्वतंत्रता दिवस या आज़ादी का मायने पता हैं, पर इतना जरूर है कि वे सचमुच में आज़ाद हैं। आज़ाद हैं द्वेष से, आज़ाद हैं ईर्ष्या से, उन्हें परवाह नहीं है इस दुनिया की, तेज़ी से बढ़ते कम्पीटीशन की, वे मुक्त हैं, वे स्वतंत्र हैं।बैठक पर आज़ादी का पर्व मनाने का मन हुआ है.....9 अगस्त से 15 अगस्त तक हम वैसे लेख आमंत्रित करते हैं जो देश की तस्वीर तय करें, आज़ाद देश की तस्वीर....सच्ची तस्वीर...ये लेख किसी भी मुद्दे पर हो सकता है.... आपबीती भी हो सकती है....किसी मोहल्ले, गांव, शहर या आदमी की कहानी भी हो सकती है जिसके लिए आज़ादी के मायने हमसे अलग हैं....कोई फोटो भी हो सकती है, जो इस मौके पर बांटी जा सके....वक्त ज़रा कम है, मगर आप हमारे साथ होंगे, ऐसा यकीन है... यह इस शृंखला की पहली पोस्ट है.....13 अगस्त तक आखिरी पोस्ट भेजें ताकि हमें भी पढ़ने का वक्त मिले...
संपादक

मेरे एक साथी के मुताबिक ये लोग "Pure State" में हैं। इनका मन बेहद साफ़ है। हम जिस भी क्लास रूम में जाते वहाँ सभी बच्चे अपने आप ही खड़े हो जाते। कोई नमस्ते से हाथ जोड़ता दिखा तो कोई पैर छूने के लिये दौड़ा।

मदर टेरेसा का फ़ोटो दिखा जो दर्शाता है कि इन बच्चों को किस तरह के प्यार और ममता की जरूरत है।

स्कूल में ७-८ कमरे हैं। हर उम्र और मानसिक स्तर के आधार पर साठ बच्चों को बाँटा जाता है।


जानवर, फूलों और खेल-कूद के सामान की तस्वीरें दीवारों पर टँगी दिखाईं दी।


खेल-कूद की तस्वीर ने मुझे आकर्षित किया। दरअसल, मैं हैरान था कि जिस गरीब तबके से ये बच्चे यहाँ पढ़ने व सीखने आते हैं उनके लिये इस तस्वीर में रगबी, गोल्फ़ व बॉलिंग जैसे महँगे और अमीरों के खेल दर्शाये गये थे।

एक कमरे में हमने यह चित्र बना हुआ पाया।

"Lord's grace is enough for us"। भगवान की हम पर असीम कृपा है। यही वाक्य इन बच्चों को हिम्मत बँधाता होगा। अगर हर व्यक्ति यही सोचने लगेगा तो यह दुनिया कितनी खुशहाल हो जायेगी। लेकिन हम यह नहीं समझ सकते। इसकी समझ तो इन बच्चों को ही होगी। फिर कैसे हम "गर्व" से स्वयं को समझदार कहते हैं? झूठा गर्व!! झूठा अहम!!
ये संस्थान "Special Children" के लिये है। ये लोग स्पेशल हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये हमसे नहीं सीखते अपितु हम इनसे कुछ न कुछ जरूर सीख सकते हैं। इनकी दुनिया छोटी जरूर है पर बहुत "बड़ी" है। तरुण नाम के एक "बच्चे" ने शेर की मिमिकरी की। तरुण ने हमें अमिताभ बच्चन की तरह भी कर के दिखाया जैसा उन्होंने "पा" में किया था। चंद और तस्वीरें आप के लिये शायद आपके दिल और दिमाग पर वो छाप छोड़ जाये जिसे लेकर हम लोग वहाँ से वापिस लौट आये।





चलते-चलते दो वीडियो भी आपके लिये। एक में है तरूण और दूसरे में रंग दे बसंती पर झूमते ये बच्चे आज़ादी का जश्न मनाते हुए।
जाते हुए तरुण ने हम से कहा "मेरा नाम तरुण है याद रखियेगा"....याद रहेगा.....

--तपन शर्मा

मार्कण्डेय