Monday, August 09, 2010

मेरा नाम तरुण है याद रखियेगा

करीबन २ साल पहले जब मैं दिल्ली में अंध विद्यालय में गया था तब सोचा नहीं था कि दोबारा ऐसा मौका मिल पायेगा । पिछले सप्ताह अपनी कम्पनी के माध्यम से एक ऐसे संस्थान में जाने का मौका मिला जहाँ उन बच्चों को पढ़ाया जाता है जो बच्चे एक आम स्कूल में नहीं जा सकते। बच्चों के मानसिक विकास हेतु बनाया गया यह संस्थान है "रोटरी इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्पेशल चिल्ड्रन"। इस स्कूल की स्थापना लगभग १४ वर्ष पूर्व हुई लेकिन गत वर्ष ही इसे Rotary Club द्वारा चलाया जाने लगा है।

मिलकर मनाएँ आज़ादी
बैठक पर आज़ादी का पर्व मनाने का मन हुआ है.....9 अगस्त से 15 अगस्त तक हम वैसे लेख आमंत्रित करते हैं जो देश की तस्वीर तय करें, आज़ाद देश की तस्वीर....सच्ची तस्वीर...ये लेख किसी भी मुद्दे पर हो सकता है.... आपबीती भी हो सकती है....किसी मोहल्ले, गांव, शहर या आदमी की कहानी भी हो सकती है जिसके लिए आज़ादी के मायने हमसे अलग हैं....कोई फोटो भी हो सकती है, जो इस मौके पर बांटी जा सके....वक्त ज़रा कम है, मगर आप हमारे साथ होंगे, ऐसा यकीन है... यह इस शृंखला की पहली पोस्ट है.....13 अगस्त तक आखिरी पोस्ट भेजें ताकि हमें भी पढ़ने का वक्त मिले...
संपादक
वहाँ जाकर पता चला कि वहाँ ४ से ४० वर्ष की आयु तक के बच्चे पढ़ते हैं। ४० साल के बच्चे!! सुबह दस से दोपहर दो बजे ये सभी बच्चे स्कूल में आते हैं। उन्हें बोलना सिखाया जाता है, उनके दिमाग के विकास के लिये तरह तरह के खेल-खिलाये जाते हैं। कुछ बच्चों को बोलने में तकलीफ़ थी तो किसी को सुनने में दिक्कत। हम १२-१५ लोग थे। हमने वहाँ बच्चों से बात की, उनके साथ वे पल बाँटे जिन्हें शायद वे और हम दोनों याद रखेंगे। वहाँ बच्चों के लिये संगीत का भी प्रबंध था। रंग दे बसंती के गीत पर जिस तरह से वो नाच रहे थे उस उत्साह से शायद हम न नाच पायें। मोहे मोहे तू रंग दे बसंती.. मुझे नहीं पता कि उन्हें इस गीत के मतलब पता हैं या नहीं, नहीं पता कि उन्हें स्वतंत्रता दिवस या आज़ादी का मायने पता हैं, पर इतना जरूर है कि वे सचमुच में आज़ाद हैं। आज़ाद हैं द्वेष से, आज़ाद हैं ईर्ष्या से, उन्हें परवाह नहीं है इस दुनिया की, तेज़ी से बढ़ते कम्पीटीशन की, वे मुक्त हैं, वे स्वतंत्र हैं।

मेरे एक साथी के मुताबिक ये लोग "Pure State" में हैं। इनका मन बेहद साफ़ है। हम जिस भी क्लास रूम में जाते वहाँ सभी बच्चे अपने आप ही खड़े हो जाते। कोई नमस्ते से हाथ जोड़ता दिखा तो कोई पैर छूने के लिये दौड़ा।

मदर टेरेसा का फ़ोटो दिखा जो दर्शाता है कि इन बच्चों को किस तरह के प्यार और ममता की जरूरत है।

स्कूल में ७-८ कमरे हैं। हर उम्र और मानसिक स्तर के आधार पर साठ बच्चों को बाँटा जाता है।


जानवर, फूलों और खेल-कूद के सामान की तस्वीरें दीवारों पर टँगी दिखाईं दी।


खेल-कूद की तस्वीर ने मुझे आकर्षित किया। दरअसल, मैं हैरान था कि जिस गरीब तबके से ये बच्चे यहाँ पढ़ने व सीखने आते हैं उनके लिये इस तस्वीर में रगबी, गोल्फ़ व बॉलिंग जैसे महँगे और अमीरों के खेल दर्शाये गये थे।

एक कमरे में हमने यह चित्र बना हुआ पाया।

"Lord's grace is enough for us"। भगवान की हम पर असीम कृपा है। यही वाक्य इन बच्चों को हिम्मत बँधाता होगा। अगर हर व्यक्ति यही सोचने लगेगा तो यह दुनिया कितनी खुशहाल हो जायेगी। लेकिन हम यह नहीं समझ सकते। इसकी समझ तो इन बच्चों को ही होगी। फिर कैसे हम "गर्व" से स्वयं को समझदार कहते हैं? झूठा गर्व!! झूठा अहम!!
ये संस्थान "Special Children" के लिये है। ये लोग स्पेशल हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये हमसे नहीं सीखते अपितु हम इनसे कुछ न कुछ जरूर सीख सकते हैं। इनकी दुनिया छोटी जरूर है पर बहुत "बड़ी" है। तरुण नाम के एक "बच्चे" ने शेर की मिमिकरी की। तरुण ने हमें अमिताभ बच्चन की तरह भी कर के दिखाया जैसा उन्होंने "पा" में किया था। चंद और तस्वीरें आप के लिये शायद आपके दिल और दिमाग पर वो छाप छोड़ जाये जिसे लेकर हम लोग वहाँ से वापिस लौट आये।






चलते-चलते दो वीडियो भी आपके लिये। एक में है तरूण और दूसरे में रंग दे बसंती पर झूमते ये बच्चे आज़ादी का जश्न मनाते हुए।





जाते हुए तरुण ने हम से कहा "मेरा नाम तरुण है याद रखियेगा"....याद रहेगा.....



--तपन शर्मा

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8 बैठकबाजों का कहना है :

ajit gupta का कहना है कि -

हमारे घर के पास भी एक ब्‍लाइंड स्‍कूल है और एक मूक-बधिर स्‍कूल। हमारा वहाँ जाना होता रहता है और मेरे पति जो डाक्‍टर है अपनी सेवाएं विगत 20 वर्षों से उन्‍हें नि:शुल्‍क दे रहे हैं।

indu puri का कहना है कि -

हा हा हा
देखा कितना मजा आता है इनकी कम्पनी में किसी दिन इन्हें कलम या पेन्सिल पकड़ा कर कहिये कि फूल,पट्टी,चिड़िया या कार कैसी होती है और उन्हें इन दृष्टिहीनो की नजर से देखिये,बड़े अभूत होते है इनके बने चित्र क्योंकि जिन चीजों को इन्होने देखा ही नही उनकी 'इमेज'इनके दिमाग में हमारी कल्पना से भी परे होती है.
मूक बधर बच्चों के साथ रह कर,उन्हें कुछ दिया नही दिया?नही जानती किन्तु सांकेतिक भाषा जरूर सीख गई और लिप्स मोवमेंट समझना भी.जो स्कूल में पढते समय मेरे बहुत काम आ रहे हैं.
सब जानकर पढ़ कर अच्छा लगा.

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

इन स्कूलों में बच्चों की मानसिकता पर बहुत ध्यान दिया जाता है!... बच्चे उनके स्तर स्तर पर शिक्षा ग्रहं करें और अपना निर्वाह करने लायक बने ...यही यहां के शिक्षकों का उद्देश्य होता है!.... इतना ही नहीं कुछ बच्चे बहुत ज्यादा तरक्की करके उछें स्थानों पर भी बिराजमान हो जाते है!...कई गीत-कार. संगीत-कार, पेंटर्स,डोक्टर्स और इंजीनियर्स भी इस स्कूलों से शिक्षा प्राप्त देखने को मिल जाते है!... बहुत बढिया लेख!

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

इन स्कूलों में बच्चों की मानसिकता पर बहुत ध्यान दिया जाता है!... बच्चे उनके स्तर स्तर पर शिक्षा ग्रहं करें और अपना निर्वाह करने लायक बने ...यही यहां के शिक्षकों का उद्देश्य होता है!.... इतना ही नहीं कुछ बच्चे बहुत ज्यादा तरक्की करके उछें स्थानों पर भी बिराजमान हो जाते है!...कई गीत-कार. संगीत कार, पेंटर्स,डोक्टर्स और इंजीनियर्स भी इस स्कूलों से शिक्षा प्राप्त देखने को मिल जाते है!... बहुत बढिया लेख!

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

amazing experience,,,

सजीव सारथी का कहना है कि -

great tapan, aapka yahi attitude mujhe bahut achha lagta hai, baithak par nayatrak sahab bahut kuch naya kar rahe hain, unhen bhi badhaasyi dijiyega

सजीव सारथी का कहना है कि -

great tapan, tumhaara yahi attitude mujhe bahut achha lagta hai, keep it up....aajkal baithak par niyantrak sahab bahut kuch naya kar rahe hain, unhen bhi meri badhaayi dijiyega

संपादक का कहना है कि -

sajeev ji....
aap baithak pe aate rahiyega to aur bhi jamegi baithak...

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